Tuesday, 20 February 2024

"अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेला "

रिपोतार्ज़ 

फ़ेसबुक फुटवा पर न जाइए हुज़ूर, ये फ़िल्टर का कमाल है ।

 "फ़िल्टर अगर न होता,ये जवान कैसे दिखतीं 
 बागों के फ़ेसबुक पर, कैसे जी फ़िर चहकतीं "

"मेले में पुस्तकों के, कल ढूँढ़ती थी आँखें 
 मेकअप बिना मुझको, इक भी दिखी न यारों" 
  ........🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣 

प्रदीप DS भट्ट -26324

 दीक्षित दनकौरी जी ने अंतर्राष्टीय पुस्तक मेले हेतु एक व्हाट्सएप ग्रुप पर सभी को आमंत्रित किया कि "चलिए मिलते हैं प्रगति मैदान के पुस्तक मेले में तारीख़ 17 फ़रवरी अपरान्ह 1बजे गेट नंबर 1पर। हमने ग्रुप पर ही अपना हाथ उठा दिया 💪 जैसे जताना चाह रहे हों हमरे बिन सब कुछ सूना 🥰 कभी कभी आत्म मुग्धता का शिकार होना भी गुड वाली फीलिंग दे जाता है भाई लोगों 😊 ख़ैर हमने मेरठ से 16 फ़रवरी में अपनी लकुटी कमरिया उठाई और आ गये अपने मित्र पवन गोयल जी के पास। देखते ही बोले आओ ठाकुर आओ इत्ते दिनों बाद आए हो, सज़ा तो पक्का मिलेगी 😁

राम राम शाम शाम के बाद कुछ देर गप्पा मारी कुछ खाया पिया और तभी उन्होंने बताया कि बीच वाले पुत्र विनय का डायलिसस शरू हो चुका है वो भी हफ़्ते में दो बार, चलो ईस्ट देहली हॉस्पिटल चलते हैं। थोड़ी देर के लिए तो शान्ति पसर गईं लेकिन फ़िर उठे और चल पड़े ईस्ट देहली हॉस्पिटल के लिए। जीवन इसी का नाम है 🔱अगले दिन उसी बालक की अपोलो हॉस्पिटल में भी1:30 की  appintment थी तो मुझे रास्ते में प्रगति मैदान ड्रॉप करते हुए चले गये। 

       तो लो जी हम तो 12:33 पर ही प्रगति मैदान गेट नंबर 1 पहुँच गये एक सेल्फ़ी ली और ग्रुप पर पोस्ट कर दी। जब 1 बजे तक कोई नहीं आया तो हमने ग्रुप पर झाँका आश्चर्य वहाँ दीक्षित जी की इन्तेज़ार की मुद्रा में एक फोटॊ हमने इधर उधर देखा जब नहीं दिखे तो फ़ोन घुमा दिया पता चला वे हॉल नंबर 1 पर खड़े हैं और हम गेट नंबर 1पर ख़ैर थोड़ी देर में उनके दर्शन किए किंतु हमें अपनी निमूढ़ता पर हँसी भी आई 😏😏😏😊  ख़ैर नमस्कार चमत्कार के बाद तय हुआ कि आने वाले और भी मित्रों की 1:45 तक प्रतीक्षा की फ़िर विसर्जन 😉😉😉😁😁😁

ठीक 1:45 पर कुल नौ रत्न जमा हो चुके थे सो फुटाव खींची और हॉल नंबर 1 व 2 में लगभग दो घण्टे बिताने के बाद तय किया कि एक ठो चाय हो जाए तभी सीमा सिकंदर और प्रोफेसर पूनम सिंह जी के दर्शन हो गये। सीमा जी से तो ग़ज़ल कुंभ में मुलाक़ात हो चुकी थी पूनम जी से पहली मुलाक़ात हुईं। चाय के साथ सीमा जी ने घऱ का बना हुआ सैंडविच ऑफर किया तो भईय्या हमने तुरत लपक लिया क्या पता बाद में मिले न मिले। 😜 बाद में एक ठो तिल वाला एक लड्डू अलग से हमने सोचा अपनी तो निकल पड़ी वैसे भी   3:30-4:00 का समय हो रहा था खाना न सही यही सही जो मिले लपेट लो भईय्या। 

"भूखे भजन न होय गोपाला
 पकड़ ये अपनी कंठी माला " 

सर्वसम्मति से तय हुआ कि घऱ चला जाए तो जो थक गये थे वो निकल लिए किंतु हम कुछ देर और रुकना चाहते थे सो हम सीमा सिकंदर जी और पूनम जी फ़िर से हॉल की ओर मुड़े ही थे कि सामने से नासिरा शर्मा व्हील चेयर पर आती दिख गईं। पूनम जी तो उन्हें देखते ही चहक पड़ी कुछ कुछ सीमा जी भी। ख़ैर फरमाइश हुईं तो तुरंत कुछ फ़ोटो क्लिक किये नासिरा जी ने आग्रह किया कि फ़ोटोस उन्हें भी शेयर कर दिये जाएँ। तो तुरंत दान महा कल्याण की तर्ज़ पर जब तक वे गाड़ी तक पहुँची होंगी हमने ये शुभ काम भी कर डाला फ़िर वही हमारी तिकड़ी और पुस्तक मेला के 5 हॉल।घूमते रहे तभी एक मोहतरमा पर निग़ाह पड़ी फ़ेसबुक फ्रेंड हैं भई अच्छी लेखिका भी हैं देखकर अहसास हुआ कि फ़ोटो फ़िल्टर का आविष्कार जिसने भी किया इन जैसी मोहतरमा को देखकर ही किया होगा। ख़ैर मेकअप की दुकान कहना तो ज़्यादती हो जाएगी किंतु ........🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣 घूमते घुमाते ही अंत में रघुवीर शर्मा जी जो पत्नि सहित पुस्तक मेले का आनंद ले रहे थे से पूनम जी ने परिचय कराया। निश्चित ये एक ख़ुशनुमा शानदार मुलाक़ात रही। अंत में सभी ने रुखसती ली और हम भी मंथर गति से चलते हुए माननीय उच्च न्यायालय के गेट के सामने आकर ठहर गए। मेट्रो स्टेशन दूर था पैरों ने और आगे सरकने से मना कर दिया सो भैय्ये ओला ली और सीधे शाहदरा, खाया पीया और सो गये। अगले दिन ज़ल्दी जो उठना था एक ठो प्रोग्राम के लिए। 😱

        यूँ ही प्रिय शिवम् झा ' राब्ता ' से बात हुईं तो पता चला कि वो देहरादून से कल पहुँचेगा 18 को सुबह दिल्ली आ रहा है साथ ही आग्रह किया कि आप अवश्य पधारें।कुछ देर बाद ही पोस्टर भी रिलीज़ कर दिया। मैं थोड़ा असमंजस में था इसलिए मैंने थोड़ा देरी से पहुँचने के लिए शिवम् से अनुमति ली। लेकिन आदत तो आदत है छूटती ही नहीं "देर से जाना ज़ल्दी आना" मुझे प्रोटोकॉल के विरुद्ध लगता है सो गोयल साहब से अनुमति ली और तीन मेट्रो बदलते हुए 10:45 पर मीटिंग हॉल में मुझसे पहले संजीव जी पहुँचे हुए थे। इनसे भी कल एक हल्की सी पुस्तक मेले में मुलाक़ात हुईं थी। मुलाक़ात हुईं तो बताया कि कल पुस्तक मेले में उनकी ....पुस्तक का विमोचन था। ख़ैर धीरे धीरे लोगों का आगमन हुआ। प्रोग्राम 11:45 पर शुरू हुआ। इसी बीच विवेक जी, खुर्रम नूर,राधा गुप्ता,नलनी जी , माहेश्वरी जी उनकी श्रीमती पूनम माहेश्वरी जी और एक और सुंदर सी 😊पूनम थी शायद पूनम मल्होत्रा।दो पूनम दोनों ही सुंदर दोनों ने ही अच्छी प्रस्तुतियाँ दीं। पूनम माहेश्वरी जी ने अच्छा संचालन किया उन्हें पूछकर ही संचालन से संबंधित कुछ सुझाव दिये। मानेंगी तो ठीक नहीं तो जय श्रीराम 👩‍❤️‍👨

तभी श्रीमती मजूमदार और  सरीन जी से मुलाक़ात भी हो गईं। प्रिय राघव से भी मिलना आनंदित कर गया, मुझे नाम याद नहीं किंतु एक लड़के की प्रस्तुती अच्छी लगी। वहां उपस्थित कुछ....को उस लड़के की प्रस्तुती देखकर वे क्या लिख रहे हैं क्या पढ़ रहे हैं स्वयं की रचनाओं पर चिंतन करना चहिए।

जीस्त को मुझसे है गिला देखो
मैं जी रहा हूं हौसला देखो
साथ रहते हैं एक छत के तले
दरमिया फिर भी फासला देखो। 

कुछ VVIP (संजीव जी को छोड़कर)अपना काव्य पाठ करके चलते बने भई VVIP हैं बहुत ज़्यादा व्यस्त हैं मेरी नज़र में जिंदगी में अस्त व्यस्त हैं 🤪 ख़ैर उनके नाम का ज़िक्र करना ही क्यूं 😝

      पूरे दिन के कार्यक्रम में एक से बढ़कर एक प्रस्तुति। कुछ अच्छे कवि और शायर और कुछ लटके झटके वाले परफॉर्मर।कुल मिलाकर एक अच्छा कार्यक्रम। मेरे बराबर में गज़ल गो डॉक्टर कौशल सोनी जी प्रथम पंक्ति में विराजमान थे से संवाद अच्छा कायम हुआ साथ ही उनकी दो बेहतरीन गजलें सुनने का सौभाग्य मिला। मुझे 4 बजे निकलना था किंतु शिवम् ने पुनः अग्रिम पंक्ति में बैठने का आग्रह कर दिया। अफ़सोस दिल गड्ढे में 😎 कभी कभी अनुजों के आगे अग्रजों की नहीं चलती। 🥰 वापसी में इंद्रजीत जी एवम् श्रीमती दीपा शेखर झा से मिलना सुखद रहा। तभी फ़ोन की घंटी बजी मैंने देखा मेरी अभिन्न मित्र का फ़ोन है जब तक मैं उठाऊँ फ़ोन बंद हो गया। ख़ैर दिल्ली हाट से मेट्रो चेंज करते ही मैंने अपनी उन अभिन्न मित्र को फ़ोन लगा दिया। मैं सिर्फ़ जय श्रीराम ही कह पाया बाक़ी ....... बस पुच्छो ना जी। मित्र हैं नाराज़ होने का पूरा हक़ है उन्हें। भले ही जानबूझ गल्ती न की हो लेकिन गल्ती तो गल्ती है। भई दिल्ली टेरेटरी में दो दिनों से हूँ और मित्र को ख़बर तक नहीं ये तो दोस्त के साथ ज़्यादती हुईं न। मैंने मनाने की भरपूर कोशिश की लेकिन .....  !  अच्छी बात ये रही कि मुझे अपनी अभिन्न मित्र का डाँटना घणा अच्छा लगा। यही अच्छे मित्रों की पहचान भी है। बुरा लगा तो कह दिया। दिल में नहीं रक्खा ये अच्छी बात है। 'Again sry दोस्त '  

प्रदीप DS भट्ट -19224

Tuesday, 6 February 2024

नागपुर विजिट

रिपोतार्ज़ 

"दोस्ती में प्रेम का स्थान होना चाहिए 
 क्या ज़रूरी है कि कोई नाम होना चाहिए" 

आप भी सोच रहे होंगे कि इस बार के रिपोतार्ज़ में दोस्ती 🤝के ऊपर ही ग़ज़ल का मतला ठोक दिया। तो मित्रों आप सही सोच रहे हैं। नागपुर में 27,28 जनवरी को युगधारा के दो दिवसीय साहित्यिक महोत्सव हेतु आमंत्रण मिला तो मैं उस वक़्त केरल प्रवास पर था और होटेल के कमरे में आराम फ़रमा रहा था। मैंने अत्यधिक व्यस्तता के चलते बड़ी ही विनम्रता से मित्र राम कृष्ण सहस्रबुड्डे जो कि अब संतरा🍑 नगरी नागपुर में सेट्ल हो चुके हैं को कार्यक्रम में उपस्थित न हो पाने के लिए क्षमा माँग ली। कुछ देर तो शान्ति रही फ़िर उधर से आवाज़ आईं आपके ऊपर मेरा विशेष आधिकार है और अगर मैं चाहूँ तो अपने विशेषाधिकार 👏का भी प्रयोग कर सकता हूँ बाक़ी आपकी सद इच्छा।  सच कहूँ तो दिसंबर -2021 के बाद उनसे मिलना भी नहीं हुआ तो मैंने फ़िर विनम्रता के साथ एक हफ़्ते का समय माँगा फ़िर 21 दिसंबर को उन्हें सूचना दी कि मैंने आने जाने का टिकिट रिज़र्व करा लिया है। मैं 26 जनवरी को चलूँगा और 29 जनवरी को वापसी तय है। उधर से रामकृष्ण जी बोले गुरु हमें पता था हमारे आग्रह को टाल नहीं पाओगे। 

जैसा कि आपको पता ही है मित्रों नॉर्थ में मिड नवंबर से मिड फ़रवरी तक कितनी ख़ूबसूरत सर्दी 🫥पड़ती है। कोहरा इतना कि सड़क के उस ओर का मकान न दिखाई पड़े। सूर्य देवता की मर्ज़ी है दर्शन दें न दें। इनर वियर चार पाँच जोड़ी भी हों तो कम ही हैं।  बस एक ही रास्ता होता है स्त्री का सहारा लिया जाए 😜 ग़लत मत समझियो भैइय्या स्त्री यानि आयरन यानि प्रेस। वैसे ज्यातर स्त्रियाँ ही स्त्री कर इन गीले इनर/आउट वियर की अकड़ ढीली करती हैं। ख़ैर 26 जनवरी को पहले भतीजी को उसके जन्मदिन पर विश् किया फ़िर एक साल का रिचार्ज (ये मेरा स्टाइल है जिस बच्चे का जन्मदिन होता है उसका एक साल का रिचार्ज 😄 नो cash) कर दिया फ़िर सीधे बस स्टैंड और noida होते हुए सीधे सरोजनी नगर मार्किट जहाँ मित्र से मिलना तय था। लेकिन ये क्या पूरा मार्किट बंद और भूख अपने पूरे तामझाम के साथ सताने लगी। ख़ैर मित्र आईं चाय पीते हुए तय किया कि कनॉट प्लेस चला जाए वहीं घूमेंगे फिरेंगे ऐश करेंगे और क्या 🤗🤗🤗🤗🤗

आश्चर्य कनॉट प्लेस का खादी भवन 26 जनवरी को खुला हुआ था सो एक दो पुराने मित्रों से मिले कुछ अपने लिए ख़रीदा फ़िर अपना सामान वहीं रक्खा और मित्र को लेकर पहुँच गये जनपथ मार्किट। दो तीन घण्टे इधर उधर गपशप करते हुए स्ट्रीट फूड का आनंद लिया और वापिस खादी भवन। सामान लिया मित्र से विदाई ली और चल पड़े नई दिल्ली रेलवे स्टेशन आंध्र प्रदेश एक्सप्रेस पकड़ने। लेकिन ये स्टार्टिंग पॉइंट होने के बाद भी  ट्रेन आधा घंटा लेट। ये तो ज़ुल्म है भाई हाड कपाती ठंडी में  बेचारा प्रदीप 😫। B-1/9 में पहुँचे चारों तरफ़ बच्चे ही बच्चे। एक लड़की ने टूटी फूटी हिन्दी में बताया कि "हम कुल 33 बच्चे include एक ladies टीचर और एक male हैं अंकल जी 😏 हम सब विशाखापट्टनम से भी 150 km से 26 जनवरी देखने आए थे आज़ घऱ वापिस जा रहे हैं।" उनका I  कार्ड देखा तो पाया कि ये आदिवासी मंत्रालय के आमंत्रण पर आए हैं। सारा खर्च सरकार कर रही है। सुनकर अच्छा लगा 😄। रात्रि 12-1 बजे तक बच्चे तेलगू में गपियाते रहे। न जाने कब अपुन को निंद्रा रानी ने अपने आगोश में ले लिया। 

अगले दिन 8 बजे आँख खुली तो पाया कि कोहरे ने ट्रेन की रफ्तार को कुंद सा कर दिया है। एक तेलगू परिवार से प्लेटफॉर्म पर बात हो रही थी कि अगर ट्रेन आधा घंटा यहीं से लेट चलेगी तो रास्ते में दो चार घण्टे लेट होनी निश्चित है।उन्होंने बताता सर ये सुबह 4:15 भोपाल पहुँचती है थोड़ा लेट हो जाए तो अच्छा है हमने भी मस्ती में कह दिया😉 हमने ड्राइवर से बात कर ली है अब ये ट्रेन 4:15 की जगह  8:15 पहुँचेगी।  वे हँस पड़े तो हमने कहा आपने दिल्ली पुलिस का स्लोगन नहीं पढ़ा क्या।  "दिल्ली पुलिस आपके लिए सदैव आपके साथ" तो क्या भारतीय ट्रेन ये स्लोगन नहीं अपना सकती " भारतीय ट्रेन आपके लिए सदैव आपके साथ"  इस बात पर हमारे साथ उसी बेंच पर बैठे सरदार जी भी ठहाका लगाए बिना न रह सके। ये फॅमिली अपने बॉस की बेटी की शादी में भोपाल जा रहे थे बामुश्किल चार महीने का बच्चा होगा जिसे उसके वज़न से ज्य़ादा कपड़े पहनाए हुए थे। ख़ैर हमें जैसे ही कल रात्रि की बात याद आई हम मन ही मन मुस्कुरा पड़े।  पोहे के नाश्ते के बाद मोबाइल पर सदमा फ़िल्म के बारे में एक आर्टिकल पढ़ रहे थे। उस आर्टिकल में एक वाक्य आया "उसकी एड़ी भी गीली नहीं हुईं " बस मिल गया मसाला और दतिया स्टेशन आने तक सिर्फ़ पंद्रह मिनिट में एक नज़्म लिख डाली।  सायं 4:45 भोपाल आया तब जाकर गाड़ी ने रफ़्तार पकड़ी उधर लगातार फ़ोन पर सहस्र बुध्दे जी update ले रहे थे गुरु कहाँ तक पहुँचे। आख़िर हमने कह दिया देखो हुज़ूर हमें  इस ट्रेन के लच्छन ठीक न लग रे अब ये ससुरी ट्रेन जब पहुंचाएगी तभी पहुंचेगे वैसे अफीशियल ये ट्रेन 13-14  घण्टे लेट हो चुकी है। सो कुल मिलाकर आज का कार्यक्रम तो अटेंड न हो पावेगा। बाक़ी जय श्रीराम। सायं को मैसेंजर पर एक मोहतरमा का मैसेज जिसमें उन्होंने नज़्म की काफ़ी तारीफ़ लिखी थी साथ ही आग्रह कि समय निकालकर बात कर लें। ऐसा अक्सर होता है किन्तु इन मोहतरमा की विनम्रता ने ध्यान आकर्षित किया। सो उत्तर स्वरूप लिख दिया कि पहली फुर्सत में कॉल करता हूं। ख़ैर जैसे तैसे ट्रेन ने हमें 9:45 संतरा नगरी यानि  नागपुर फ़ेंका।  बाहर आए ऑटो लिया और सीधे होटेल गुलशन प्लाज़ा। रिसेप्शन पर ही प्रिय सौम्या, पूनम मिश्र एवम् रामकृष्ण सहस्र बुड्ढे जी ने स्वागत किया।हमारे वाली ट्रेन में ही ब्रजेश गुप्ता बांदा से भी थे जो लगभग साथ साथ ही होटेल पहुँचे थे। दोनों को कमरा नंबर 207 अलॉट हुआ। फ्रेश हुए नीचे आए खाना खाया और फ़िर वापिस कमरे में। 

28 को सुबह तैय्यार होकर सीधे पाँचवें माले स्थित मीटिंग हॉल में। नाश्ता हुआ और फ़िर 10:20 पर प्रोग्राम शुरू। संचालन की कमान क्रमशः सहस्र बुड्डे अविनाश बाग़डे एवम् चन्द्रिका प्रसाद मिश्र जी ने संभाली।प्रिय सौम्या ने युगधारा संस्था का पिछले छः बरस का लेखा जोखा प्रस्तुत किया। भविष्य की योजनाओं का ख़ाका खींचा तदुपरांत 
उद्घाटन कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो विश्वम्भर  शुक्ल ने की, मुख्य अतिथि के रूप में नगर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सागर खादीवाला और विशिष्ट अतिथि श्री अजय पाठक उपस्थित थे। पुस्तक लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता डॉ श्रीनिवास शुक्ल सरस ने की, मुख्य अतिथि डॉ प्रमोद शुक्ल तथा विशिष्ट अतिथि शिवमोहन सिंह थे। सम्मान समारोह की अध्यक्षता डॉ सरस ने की, मुख्य अतिथि डॉ वीणा दाढ़े और विशिष्ट अतिथि श्री एस पी सिंह थे।कार्यक्रम में प्रो विशंभर शुक्ल, रवि शुक्ल, मुकेश सिंह, विभा प्रकाश की पुस्तकों का लोकार्पण हुआ।विभिन्न सत्रों का संचालन क्रमशः रामकृष्ण वि सहस्रबुद्धे, अविनाश बागड़े और डॉ चंद्रिका प्रसाद मिश्र ने किया। इसी अवसर पर संस्था की ओर से साहित्यकारों को विभिन्न सम्मानों से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर मुझे भी यानि प्रदीप DS भट्ट को शब्द शिल्पी सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रथम सत्र में एक मोहतरमा जो इस बात से नाराज़ हो गईं कि मेरा परिचय क्यूँ नहीं दिया सो झटके से उठीं ऐंकर से माइक छीना फ़िर अपनी साहित्यिक यात्रा /गतिविधियों पर जबरदस्ती दर्शकों को फ़ोकस करने पर मज़बूर किया फ़िर बड़बड़ाती हुईं धम्म से कुर्सी पर पसर गईं। मुझे बेसाख्ता अपना शाहकार शेर याद हो आया सो मैंने उसे पब्लिक में धीरे से उछाल दिया। जिन्होंने सुना और समझा उन्होंने बढ़िया है👌👌👌👌👌 का इशारा कर दिया और बाक़ी अज्जि छड्डो भी ...😜

"ख़ुद को ख़ुश रखने की तरक़ीब यूँ निकाल ली 
 ख़ुद ही ख़रीदी फ़ूल माला, ख़ुद ही गले में डाल ली" 

अंतिम सत्र में बीकानेर से पधारे वरिष्ठ ग़ज़ल गो रवि शुक्ल की अध्यक्षता में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में कृष्ण कुमार द्विवेदी, अर्चना अर्चन, पूनम मिश्रा, हेमलता मिश्रा मानवी, अरुण नामदेव, रूबी दास, प्रभा मेहता, मुकेश सिंह, बृजेश गुप्त,जयश्री कांत, धारा वल्लभ पांडे, मंजूषा किंजवादेकर अनिल मालोकर , रामकृष्ण सहस्र बुढ्ढे ,माधुरी मिश्र, बालकृष्ण महाजन,अमिता शाह सहित उपस्थित कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। मैंने भी अपनी एक ग़ज़ल पढ़कर वाहवाही लूट ली।

“मेरे अपने मिटाने पर तुले हैं”

सखा सब आजमाने पर तुले हैं
नया कुछ गुल खिलाने पर तुले हैं

जनम से नूर आँखों में नही है
मगर दर्पण दिखाने पर तुले हैं

कोई खतरा नही है मुझसे फिर भी
मुझे झूठा बताने पर तुले हैं

न जाने कौन आया ज़िंदगी में
जो सब मुझको हराने पर तुले हैं

कमी क्या रह गई मेरी वफा में
सभी जो भूल जाने पर तुले हैं

ज़रा सा सच ही तो बोला था मैंने
मेरे अपने मिटाने पर तुले हैं

कोई गल्ती नही है मेरी फिर भी
मेरा सर सब झुकाने पर तुले हैं

न जाने क्या है उनकी बेबसी भी
मरे को फिर जिलाने पर तुले हैं

के उनके दिल में क्या है वो ही जाने
मुझे सूरज बताने पर तुले हैं

कोई हो एक गर समझाऊँ उसको
सभी दिल को दुखाने पर तुले हैं

किसी का क्या बिगाडा बोलो मैंने
जो सब मुझको गिराने पर तुले हैं

मैं मुंसिफ हूँ मगर तुम ‘दीप’ देखो
मुझे मुज़रिम बताने पर तुले हैं

सबसे अच्छी बात ये रही कि कार्यक्रम 5 बजे की टाइम लाइन में ही पूर्ण हो गया जब कि ऐसा अक्सर होता नहीं है। एक बात जिस पर प्रिय सौम्या को विचार करना चाहिए कि हर सत्र में मुख्य अतिथि एवम् विशिष्ट अतिथि अलग अलग होने चाहिए। नीरसता से मुक्ति मिलेगी। शुक्ल पक्ष को अहमियत दीजिए लेकिन कृष्ण पक्ष को भी अहमियत मिलनी चाहिए। भगवान कृष्ण कृष्ण पक्ष में ही अवतरित हुए हैं। एंकर को डायस पर विराजमान होते देखकर आश्चर्य लगा। इन विसंगतियों से बचा जाना चाहिए। प्रिय सौम्या जो कि युगधारा की राष्ट्रीय महासचिव हैं की सौम्यता देखिए कि वे आपने भाई प्रणव के साथ लगभग पूरे कार्यक्रम में सबसे पीछे बैठी रहीं ।उससे भी बड़ी बात वरिष्ठ ग़ज़ल गो रवि त्रिपाठी भी छटी पंक्ति में ही बैठे रहे। ख़ैर व्यवस्थाएं हैं आगे दुरुस्त होंगी ऐसा मेरा अंतर्मन कहता है। 

अगले दिन की शुरुआत धारा वल्लभ पाण्डेय एवम् उनकी श्रीमती,मैं और मित्र सहस्र बुड्डे जी ने ज़ीरो प्वाइंट की visit से की। यहीं वो स्थान है जहाँ से भारत वर्ष के सभी शहरों की नपाई शुरू होती है,फ़िर शहीद स्मारक तदुपरांत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का म्यूजियम फ़िर कार्यालय देखने जा पहुँचे। बड़ी ही आत्मियता से हमारा परिचय लेकर सेक्यूरिटी चैक कराने से लेकर अंदर कार्यालय में छुड़वाया गया। लगभग एक घण्टे हमने उस स्थान को देखा समझा जाना लगभग सौ वर्षो का इतिहास समेटे म्यूज़ियम को अपने नज़रिये से समझा।  वापसी में बेहतरीन चाय पी फ़िर वापिस होटेल। थोड़ा आराम किया और फ़िर चल पड़े स्टेशन की ओर बिलासपुर नई दिल्ली राजधानी के सफ़र के लिए। ट्रेन 15 मिनिट पहले ही आ पहुँची। B-2/65 में जा पहुँचे। खाना खाया और सो गये। अगले दिल उठे तो पाया ट्रेन लेट है। शायद कहना चाह रही थी कि राजधानी हैं तो क्या हुआ कोहरा हमें भी सताता है जी। लगभग डेढ़ बजे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन फ़िर मेट्रो बस का सफ़र करते हुए सायं 5:45 मेरठ।  चलो जी एक और साहित्यिक यात्रा पूरी हुईं। सियावर रामचंद्र की जय।।

प्रदीप DS भट्ट -6224

Friday, 19 January 2024

ग़ज़ल कुंभ में नज़्म ये क्या कर रहीं हैं मोहतरमा

रिपोतार्ज़ 

   "ग़ज़ल कुंभ में नज़्म" 
 -ये क्या कर रही हैं मोहतरमा-

पिछले वर्ष हरिद्वार में आयोजित ग़ज़ल कुंभ में किन्ही कारणों से उपस्थिति न दर्ज़ कराने का मलाल इस वर्ष 1 सितंबर -2023 को क्रमांक 39 पर दर्ज़ होने पर कुछ कम  ज़रूर हुआ। 🤗बारह वर्ष के पश्चात होने वाले कुंभ की तुलना में ये कुंभ पिछले 15 वर्ष से निरंतर ग़ज़ल के विद्यार्थियों को साहित्य की गंगा में डुबकी लगाने का अवसर प्रदान करता है। निश्चित रूप से इसके लिए बसंत चौधरी फाउंडेशन,नेपाल  एवम् अंजुमन फरोग ए उर्दू दिल्ली के अतिरिक्त दीक्षित दनकौरी जी एवम् उनकी कर्मठ टीम जिसमें अल्का शरर जी प्रिय सन्तोष सिंह, राजेश उपाध्याय, राजीव मिश्र, कृष्ण गौतम व अन्य के निस्वार्थ अथक परिश्रम के लिए मेरे पास उपर्युक्त शब्द नहीं हैं किंतु टीम ग़ज़ल कुंभ निश्चित रूप से इसकी बधाई की पात्र है। 👌🏽

ख़ैर बहु प्रतीक्षित ग़ज़ल कुंभ की तिथि भी आ पहुँची इसी बीच हम हैदराबाद को बॉय बॉय करके उत्तम प्रदेश के तेजी से विकसित होते शहर मेरठ में अपना डेरा जमा चुका थे। 🤝हरिद्वार में आयोजित  25,26,27 नवंबर को तीन दिवसीय सेमिनार अटेंड करके जब मैं 28 को वापिस आ रहा था तो गुलाबी ठंड ने जकड़ लिया हमने पूछा क्यूँ भाई काहे  इतना प्रेम जता रही हो तो गुलाबी ठंड मुस्कुरा कर बोली ठाकुर 17 बरस तक मुंबई और हैदराबाद में रहे हो तुम्हें बहुत मिस्स्स्स कर रहे थे और  तुमसे चिपकाने को बहुत मन कर रहा था सो चिपक गए अब हमें झेलो। 🤣 नजला ज़ुकाम खाँसी साथ लिए लिए हम एक हफ़्ते तमिलनाडू एवम् केरल का भी प्रवास कर आए किंतु ये मुई बिना सुर वाली खाँसी ने हमारा पिंड न छोड़ा।  देसी नुस्खों के अलावा दो दो डॉक्टर भी बदल लिए किंतु अफ़सोस दिल गड्ढे में .... 🥳

      12 जनवरी को सुबह सुबह मेरठ से हम लदे फंदे ( ठंडी के कपड़ों से)अपने काव्य संग्रह "उर नाद" के सिलसिले में india net book नौयडा जाने के लिए निकले। अभी टिकिट बनवाकर निपटे ही थे कि इंडियन रेलवे का msg आ पहुँचा कि भईय्या ट्रेन संख्या such n such कैंसिल कर रहे हैं। अगर ग़ज़ल कुंभ से प्रेम है तो प्लेन से नई तो भैय्ये माटे माटे यानि पैदल निकल लो 🫣 तभी फ़ोन घनघना उठा देखा तो पाया उधर प्रदीप मिश्र अज़नबी जी यही सूचना दे रहे थे कि ट्रेन कैंसिल हो गईं है और सबने 😏(पता नहीं किन किन ने) प्रवास निरस्त कर दिया है। हमने कहा हुज़ूर बाक़ी को छोड़ो अगर आप तैय्यार हों तो अगले आधे घण्टे में बतावें कि क्या मैं आपका हवाई यात्रा का प्रबंध करूँ। भईय्या एक घंटा प्रतीक्षा के बाद हमने 13 की सुबह 8 बजे का टिकिट बुक किया। लगभग  दो घण्टे बाद अज़नबी जी ने सूचित किया कि .........😫

    अब मेरठ वापिस जाने का कोई सीन तो बन नहीं रहा था सो इंडिया नेट बुक से प्राप्त उर नाद का प्रूफ़ अप्रूव करके टैक्सी ली और सीधे कनॉट प्लेस होते हुए सरोजनी नगर मार्किट जहाँ हमारी मित्र लंच पर प्रतीक्षा कर रही थीं। लंच के बाद जैसी महिलाओं का शग़ल होता है थोड़ी शॉपिंग कर ली जाए हमने भी रुपये 50/- में एक मफ़लर खरीद कर अपने हिस्से की शॉपिंग निपटाई 😜 साँझ घिरने लगी थी सो हौज़ ख़ास उनके घऱ चल दिये। उन्होंने बहुत आग्रह किया कि सुबह यहीं से एअरपोर्ट चले जाना हमने भी विनम्रता से हाथ जोड़ दिए। देवी ये सम्भव नहीं है। अपनी तो आदत हो गईं है एअरपोर्ट पर रात बिताने की और 10 बजे विदाई लेकर सीधे एअरपोर्ट। रात भर जागते रहे सुबह 7 बजे फ्लाइट में बैठते ही सो गए। ठीक 9:40 मुंबई और ठीक 10:45 पर विले पार्ले स्थिति सन्यास आश्रम जा पहुँचे। हमारे मित्र अक्षय चंदेरी पहले ही पहुँच चुके थे। द्वार पर ही दीक्षित से मुलाक़ात हो गईं। नमस्कार चमत्कार के बाद रूम नंबर 203 अलॉट हो गया। कुल चार लोग।बारी बारी से फ्रेश हुए और ठीक 12 बजे खाने की प्रथम प्लेट हमने पकड़ ली। अक्षय जी तुरंत बोल पड़े। आ जाइए सभी पण्डित जी ने शुभारंभ कर दिया है 😄  खाना खाया और सीधे प्रथम तल स्थित कार्यक्रम स्थल पर जहाँ पर क्रम संख्या पूछकर हमें एक बैग दे दिया गया जिसमें ट्रॉफी के साथ बसंत चौधरी जी द्वारा लिखित दो पुस्तकें ख़ूबसूरत कवर के साथ साथ ही शक़ील शिफ़ई जी की पुस्तक झुर्रियाँ भी उसमें मौज़ूद थीं। 

थोड़ा विलम्ब से ही सही कार्यक्रम अपरान्ह 1:20 पर शुरू हुआ। प्रथम सत्र में बसंत चौधरी जी जो कि मुख्य अतिथि थे, स्वास्थय संबंधी समस्या के कारण उपस्थित नहीं हो सके। उनकी अनुपस्थित में श्री अमर जीत मिश्र विशिष्ट अतिथि के अतिरिक्त वीरेंद्र याज्ञनिक ने कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत की। प्रथम सत्र में 95वें वर्षीय श्री नंद लाल पाठक, पुणे  एवम् शक़ील शिफ़ाई मेरठ (अनुपस्थित) ग़ज़ल कुंभ सम्मान -2024 से सम्मानित किया गया। प्रथम सत्र का संचालन देवमणि पाण्डेय जी द्वारा किया गया। श्री नंदलाल पाठक जी की अध्यक्षता में दूसरे सत्र का प्रारम्भ हुआ।सत्र का संचालन अल्का शरर जी द्वारा किया गया। देश भर से पधारे ग़ज़ल गो ने एक से एक पढ़कर प्रस्तुति देकर महफ़िल को रोशन कर दिया। तभी एक मोहतरमा को अल्का जी ने ग़ज़ल प्रस्तुति के लिए प्यार से बुलाया वो बड़ी अदा से आईं फ़िर ग़ज़ल पढ़ने लगीं लेकिन ये क्या मेरी तरह और भी और प्रथम पंक्ति में विराजे दीक्षित जी भी चौंक उठे किंतु वो मोहतरमा बड़ी शान से ग़ज़ल की जगह नज़्म पढ़ इठलाती हुईं नीचे उतरी दीक्षित जी ने टोका तो बहस कि नहीं ये नज़्म नहीं ग़ज़ल ही थी। मेरे जैसे ग़ज़ल के कम जानकर को भी समझ आ रहा था कि ये ग़ज़ल तो कतई न पढ़ रही थी पर भईय्या कौन समझाए ऐसे लोगों को 🤣🤣🤣 न जी न मुझे उनका नाम न पता है जी मैं तो उनकी ग़ज़ल को समझने में मशगूल था 🥰 ख़ैर मेरा भी नंबर सायं को चायपान के बाद आया। ग़ज़ल देखें 

नमक दरिया में थोड़ा सा मिला दूँ 
मैं अपनी आँख का आँसू गिरा दूँ 

ग़मों के साए में जीना है मुश्किल 
ख़ुशी के वास्ते तुमको भुला दूँ 

जो समझा ही नहीं अश्कों की क़ीमत 
तो फ़िर ख़ातिर उसी के क्यूँ गिरा दूँ 

इस तरह पहला दिन बहुत ही शानदार रहा। मैं तुलनात्मक अध्यन पसंद नहीं करता किंतु अल्का शरर जी का संचालन द्वितीय सत्र की ख़ासियत रही।  प्रिय अन्नपूर्णा गुप्ता 'सरगम', बिट्टू जैन 'सना' ,नंदिता माज़ी
कनक लता तिवारी द्वारा सन्यास आश्रम स्थित ख़ूबसूरत भगवान शिव विष्णु की मूर्तियों के समक्ष मेरा सम्मान किया जाना व बिट्टू जैन 'सना' द्वारा अपनी पुस्तक "आँसू और मुस्कान" सप्रेम भेंट करना अद्भुत अनुभूति रही। इसके अतिरिक नेहा नाहटा,रचना जी, पटना बिहार  रूबी भूषण  व खरे जी की छोटी सी बिटिया के साथ मुलाकात उल्लेखनीय रही।रात्रि खाने के बाद मैं अक्षय चंदेरी व मुकेश सिंह( नागपुर) यूँ हीं सन्यास आश्रम के प्राँगण में बैठे थे तभी जुहू घूमकर लौटी अर्चना जी को हमने वहीं रोक लिया और रात्रि 11:30 बजे तक वन बॉय वन गीत ग़ज़ल कविताओं का अविस्मरणीय दौर चला कि चारों का मन ही नहीं कर रहा था ये गोष्ठी समाप्त हो किंतु किंतु किंतु अगले दिन भी पूरे दिन कार्यक्रम अटेंड करना था सो पुनः मिलन की आस लिए चारों अपने अपने कमरे को लौट चले।  

      दूसरे दिन प्रात: तैय्यार होकर नाश्ता किया फ़िर बैग पैक कर लिए ताकि आज 14 की प्रस्तुति के लिए आने वालों को कोई असुविधा न हो। 14 जनवरी का पूरा दिन फ़िर ग़ज़लमय रहा। एक से एक प्रस्तुति जिसमें दीक्षित दनकौरी जी,अल्का शरर जी , ग़ाज़ियाबाद से गार्गी कौशिक, देहरादून से तनुजा शर्मा, बरेली से अभिषेक अग्निहोत्री, सन्तोष सिंह, राजेश उपाध्याय, अहमदाबाद से सावन शुक्ला आदि आदि ने समा बाँध दिया। इस सत्र की ख़ासियत ब्रह्मदेव शर्मा,यशपाल यश अमर त्रिपाठी एवम् दमयंती शर्मा रही। सच कहूँ तो इस ग़ज़ल कुंभ से जाने का मन नहीं कर रहा था।  एक बात मैं बिना संकोच के कहूँगा कि मैं इस ग़ज़ल कुंभ से काफ़ी कुछ सीखकर लौटा हूँ। कुछ लोगों को लगता है कि इस तरह के आयोजन यूँ ही हो जाते हैं।  नहीं मित्रों "कहानी वाला" की 6 मीटिंग आयोजित करने में मुझे और मित्र सुहास को काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी थीं। सो मुझे अहसास है कि 150-160 प्रतिभागियों के रहने, खाने स्टेज़ वगैरह वगैरह के प्रबंध करने में पैसे के अतिरिक्त कितना श्रम लगता है। सो पुनः दीक्षित जी एवम् उनकी टीम को हार्दिक शुभकामनाएं।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹


अंत में सायं 7:30 पर अपने मित्र अरुण भाई के साथ एक ...... बैठकर गपशप की फ़िर 11:15 ऑटो लिया और सीधे बांद्रा  स्टेशन पहुँच गये। मध्य रात्रि 12:20 पर बांद्रा-हरिद्वार ट्रेन में सवार हुए और 16 की प्रात: 5:30 ठंड में सिकुड़ते हुए मेरठ स्टेशन और भईय्या कोहरा इतना कि बस पूछो मति। सूटकेस लुढ़काते हुए बाहर आए तो अचानक दो ढाई फूट पर एक चेहरा दिखा जो कंपकंपाते हुए पूछ रहा था कहाँ जाएंगे बाबूजी। एक तो कोहरा उस पर मुँह खोलते ही मुँह से भी कोहरा ख़ैर जैसे तैसे घऱ पहुँचे। अदरक की चाय पी और ग़ज़ल कुंभ की सुनहरी स्मृतियाँ सँजोए सीधे रजाई में😄😄😄😄😄🤗🤗🤣
प्रदीप DS  भट्ट -191

Thursday, 28 December 2023

संस्कृत के श्लोकों से गुंजित हुआ केरल अधिवेशन

रिपोतार्ज़ 

         (प्रदीप भट्ट से प्रदीप भट्ट ,'यायावर')

" संस्कृत के श्लोकों से गुंजित हुआ केरल अधिवेशन "

दक्षिण भारत की यात्रा के अंतिम पड़ाव में कन्याकुमारी से ट्रेन द्वारा लगभग ढाई घंटे  की सुखद यात्रा (हरियाली एवम् हरे पहाड़ों के नयनाभिराम दर्शन करते हुए) तिरुवनंतपुरम जा पहुँचे। रेलवे स्टेशन से होटेल की दूरी मात्र 600 मीटर बीच में बस स्टैंड भी। मुझे बेसाख्ता अंबाला कैंट  स्टेशन की याद हो आई सड़क के एक ओर स्टेशन दूसरी ओर बस स्टैंड। ख़ैर ऑटो लिया और सीधे होटेल KTC grand chaithram। आप सोच रिये होंगे कि ये क्या लाट साहिबी हुईं कि 600 मीटर के लिए ऑटो जब कि स्वामी प्रदीपानंद तो रोज़ाना दस हज़ार क़दम चलने के आदी हैं 😜तो भैय्ये दो लोगों के पास कुल ठो चार नग अब सर पे कुली की तरह सूटकेस रख के तो न चल सकते। मान लो लुढ़का के भी ले जावें तो 4* होटेल वाले का दरबान क्या सोचेगा कहाँ से ठलुए आ गए। 😜चलो उसे तो  डपट भी देंगे लेकिन रिसेप्शन पर बैठी हुईं किसी महिला की निग़ाह पड़ गईं तो .... अपनी तो बेइज़्ज़ती में दाग़ लगाना तय था न जी 😊 सो भईय्या ऐसा रिस्क न लेते हुए सीधे होटेल में एंट्री ली। पुछताछ की तो पता चला हमारे रूम met राजपाल जी तिरुवनंतपुरम के लोकल दौरे पर हैं। ख़ैर इस समस्या का तोड़ पूछा तो रिसेप्शनिस्ट ने तुरंत अपने मोतियों जैसे सफेद दाँतों के साथ फ़्री में ख़ूबसूरत मुस्कान के साथ डुप्लीकेट चाबी बनाकर हमारे हवाले कर दी। मोतियों जैसे दाँत देखकर हम सोचने लगे ये मोहतरमा कौन सा टूथपेस्ट इस्तेमाल करती होंगी जो इनके दाँत हैदराबादी मोतियों की तरह चमक रिये हैं।😄 मोहतरमा का रंग साँवला  या काला होता तो कोई बात नहीं लेकिन दुग्ध में नहाई काया और चिट्टे रंग पर मोतियों जैसे दाँत ये तो वही बात हुईं कि beauti with brain कहावत याद हो आई 👩‍❤️‍👨। ख़ैर ख़ुशी और ऊर्ज़ा से लबरेज़ जब हमने कमरे में प्रवेश किया तो स्वप्न से जागने जैसा अनुभव हुआ। कमरे की हालात बैचलर्स लाइफ के कमरे सी प्रतीत हो रही थीं।😉सो पहला काम साथ आए होटेल अटेंडेंट को दिया मैं रिसेप्शन में बैठता हूँ कृपया इस कमरे को किसी सुघड़ महिला के कमरे की तरह कर दें। उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से हमें देखा तो हमें अपनी गल्ती का अहसास हो गया। मलयालम हमें नी आवै और हिन्दी अंग्रेज़ी उसे नी आवै तो फ़िर एक समझदार व्यक्ति की तरह उसे और हाउस कीपिंग स्टाफ को इशारों में समझाया तब बात बनी।👏

नहा धोकर तैय्यार हुए और सांय 5 बजे से होने वाले कार्यक्रम स्थल का नीरव जी संग जायज़ा लिया। लौटकर नीरव जी के रूम में ही आए और अवगत कराया कि केरल अधिवेशन के लिए जो थीम सॉंग लिखा है उसे तरन्नुम में प्रस्तुत करना मुश्किल है क्यों कि हरिद्वार महोत्सव में ईनाम  स्वरूप खाँसी भेंट में पाएं हैं।तक़लीफ़ खाँसी से नहीं वरन इस बात से है कि ये मुई खाँसी भी हमारी तरह ही बेसुरी है।😱  नीरव जी ने प्रेम भरी एक वक्र दृष्टि हम पर डाली,उस दृष्टि से हम तो सिहर गए किंतु खाँसी तो खाँसी ठहरी सुसरी और ऐंठ गईं।  नीरव जी ने हुक्म दे दिया थीम सॉंग तो तरन्नुम में ही होगा हमने एक बंध तरन्नुम में दो बार खाँसते हुए सुनाया लेकिन उनका आदेश ज्यों का त्यों कि प्रस्तुति तरन्नुम में ही होगी। ख़ैर ठीक 5 बजे कार्यक्रम की शुरुआत हो गईं हम प्रथम पंक्ति में बैठे बैठे पानी पीते रहे ताकि गला तर रहे। देवियों की प्रस्तुति के बाद देवताओं में प्रथम नंबर पर हमें आमंत्रित किया गया पानी साथ लेकर स्टेज़ पर। माँ शारदे को स्मरण किया और लगभग दो मिनिट की प्रस्तुति तरन्नुम में दी। प्रस्तुति के मध्य खाँसी न आना इस बात का द्योतक रहा कि है नीयत साफ़ हो तो बरक्कत तय है। लगभग 7 बजे तक कार्यक्रम चला सभी मित्रों ने अपनी अपनी प्रस्तुतियों से कार्यक्रम में समा बाँधे रक्खा।

🤗abs 4 की प्रथा के मुताबिक डिनर पश्चात रात्रि में नीरव जी के रूम में सभी अपनी छुपी हुईं प्रतिभा दिखाने जमा हो गए ये विषय अलग कि हम उन कुछ प्रतिभाशाली प्रतिभाओं की प्रतिभा के दर्शन गाँधी नगर और मैसूरु में कर चुके थे 😱। नाच गाना अन्ताक्षरी वगैरह वगैरह। हमने तो पूर्व की भांति पहले ही क्षमा माँग ली कि नाच वाच हमसे न हो पाएगा हाँ बात अगर गाने की है तो बेसुरे स्वर में कोशिश कर सकते हैं लेकिन खाँसी के कारण इस बार वो भी सम्भव नहीं। कुछ लोग पहले मना करने के आदी होते हैं लेकिन जब 🧚‍♂️ ... फ़िर वो शुरू हो जाते हैं या कहूँ कि पूरा माहौल कैप्चर करने की कोशिश करते हैं  और क़ामयाब भी हो जाते हैं जब तक कि .....          सख़्त लफ़्ज़ों की इजाज़त है नहीं मुझको 'प्रदीप'          वरना ख़ुद ही सोचिये मुँह में ज़ुबां मेरे भी है  🙆‍♂️          ख़ैर  अर्धरात्रि तक चले प्रोग्राम की ख़ासियत डॉक्टर रत्नेश की लोक गीत पर बेहतरीन ठुमकों के साथ प्रस्तुति रही। मैंने उनकी तारीफ़ में कहा भी आपकी क़मर जैसे लचक खा रही है इससे कईं देवियों को रश्क हो सकता है कि हाय रे हमने अपनी क़मर को कमरा क्यूँ बना लिया 😩 प्रोग्राम ख़त्म हुआ और मैं अपने  कमरे में आया और सो गया ।

       अगले दिन 10 दिसंबर नाश्ता किया और नीरव जी के निर्देश पर हरिद्वार से ख़रीदी विशेष पोशाक (पीताम्बरी धोती और राम नाम का हॉफ कुर्ता ) पहनकर हॉल में हाज़िर हो गए। नीरव जी तो देखकर अतीव प्रसन्न हो गए। सबकी निग़ाहें हमारी ओर ही थीं कुछ कंठ से तो कुछ इशारों में हमें अच्छा लगने की बधाई दे रहे थे। थोड़ी देर बाद एक महिला ने जो काफ़ी देर से घूरे जा रही थीं पास आकर कह ही दिया। इस ड्रेस में ......। हमने उन्हें धन्यवाद तो दिया किंतु मन ही मन हँसते हुए कहा हे प्रभु रक्षा करो। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केरल के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद खां थे, विशिष्ट अतिथियों में रिटायर्ड मेज़र जनरल अनूप नायर उनकी धर्मपत्नी मीरा नायर एवम् डॉक्टर श्वेता सिन्हा थी। 
मैंने रिटायर्ड मेज़र जनरल अनूप नैयर एवम् ज्ञान चंद मर्मज्ञ जी ने राज्यपाल महोदय का स्वागत किया फ़िर हॉल में पहुँचकर राष्ट्र गान हुआ तत्पश्चात दीप प्रज्ज्वलन तत्पश्चात सरस्वती वंदना फ़िर राज्यपाल महोदय को डायस तक छोड़कर मैंने अपनी सीट पकड़ी। नीरव जी ने राज्यपाल महोदय का स्वागत किया तत्पश्चात नीरव जी द्वारा स्वागत भाषण दिया गया। राज्यपाल महोदय ने भाषण में अपने चिर परिचत अंदाज़ में वेदों की ऋचाओं का एवम् कुरआन की आयतों का सम्मिश्रण कर बड़ी ख़ूबसूरती से माहौल को एक साहित्यिक यज्ञ में परावर्तित कर अपने हिस्से की प्रथम आहुति इस यज्ञ में दी। इस प्रकार साहित्य अधिवेशन के प्रथम सत्र का समापन सँस्कृत के श्लोकों द्वारा पूर्ण  हुआ।

       द्वितीय सत्र में कवि सम्मेलन जिसमें देश के विभिन्न भागों से पधारे कवियों ने रचना पाठ किया। मैंने भी अपने तेवरों के अनुरूप अपनी एक ग़ज़ल पढ़ी  :-

"वफ़ा क्या है जफ़ा क्या है, मुझे तू क्यूँ बताता है
खफ़ा होना है हो जा, बेवज़ह क्यूँ तिलमिलाता है 

हमेशा तू खफ़ा होता, अगरचे मैं हुआ तो क्या 
किया कुछ भी नहीं अहंसा, मग़र फ़िर भी जताता है 

तुझे भी इल्म ये बेहतर, नहीं मुझसा कोई दूजा 
मग़र इसमें कभी उसमें, तू दिलचस्पी दिखाता है

तेरी चालाकियां एक दिन, तुझे लेकर के डूबेंगी 
भला तू है नहीं फ़िर भी, भला बनकर दिखाता है 

तेरी बातें समझ में, कम ही आती हैं मुझे भी 'दीप' 
मेरे पहलू में आकर, मुझसे ही दामन छुड़ाता है

प्रदीप DS भट्ट -

एक बात जो मन को अखर रही थी वह यह कि कुछ मित्र ये जताने में बिलकुल भी संकोच नहीं करते कि वे वरिष्ठ कवि या साहित्यकार हैं। पिछ्ले ढ़ाई या तीन दशक से साहित्य में सक्रिय हैं किन्तु जब प्रस्तुति के लिए मंच पर आमंत्रित किया जाता है तो वही घिसी पीटी गजलें, गीत मुक्तक पढ़कर इतिश्री कर जाते हैं। भाई मेरे पुराना सुनाओ लेकीन कभी नया भी तो गुनगुनाओ। आप वरिष्ठ हो अच्छा है वरिष्ठ वरिष्ठ हो जाइए बस गरिष्ठ मत बनिए। ऐसे मित्रों के लिए एक ताज़ा ग़ज़ल:

ग़ज़ल 
        "कभी नया भी पढ़ा करो"

दुनियां को पढ़ते फिरते हो, कभी तो ख़ुद को पढ़ा करो
वही पुरानी ग़ज़लें, दोहे, कभी नया भी गढ़ा करो

इसका उसका तेरा मेरा, अभी भी तुम उलझे इसमें
बे- मौसम की बारिश जैसा, हरदम न यूँ झड़ा करो 

चलते चलते श्वांस फूलती, बातें पर ओलंपिक की 
अपने घऱ की सीढ़ी पर तुम, धीरे धीरे चढ़ा करो 

काम किया क्या ख़ास जो तुमको, दुनिया वाले याद करें
औरों से क्यूँ जलना भुनना, दिल को अपने बड़ा करो 

चाहत दिल में याद करें सब,सूरज सा तपना सीखो 
या फ़िर ख़ुद को मिट्टी का तुम, छोटा सा इक घड़ा करो 

नया सीखने की ग़र इच्छा, घर से बाहर निकलो तो 
कुछ अच्छा दिख जाये उसको,अपने मन पर मढ़ा करो 

अच्छी ग़ज़लें लिखो गीत या, लिक्खो उम्दा इक मुक्तक 
अच्छी ग़ज़लें सुन दूजे की, बैठ न हरदम कुढ़ा करो 

कब तक वही पुरानी बातें, सबको बतलाओगे 'दीप'
चलो समेटो हिम्मत फ़िर से, हर दिन नव कुछ गढ़ा करो  


प्रदीप देवीशरण भट्ट -101223 (तिरुवनंतपुरम)

सायं 7 बजे तक चले प्रोग्राम में एक से बढ़कर एक गीत ग़ज़लें सुनने को मिलीं। डिनर के बाद नीरव जी के रूम में फ़िर महफ़िल जम गईं। आज़ वो सज्ज़न नदारत थे जिन्होंने कल के प्रोग्राम को लगभग कैप्चर कर ही लिया था। प्रोग्राम शुरू हुआ नंबर आने पर हमने भी एक गीत :-
 इक हंसी शाम को, दिल में मेरा खो गया 
पहले अपना हुआ करता था, 
अब किसी का हो गया 

      आज़ फ़िर पूरे गाने में खाँसी ने डिस्टर्ब नहीं किया।वही मध्य रात्रि तक प्रोग्राम हुआ। कुछ बंधु एक दूसरे के साथ कल प्रात:भगवान विष्णु के मंदिर का प्रोग्राम बनाने एवम् लोकल घूमने का कार्यक्रम तय करते रहे अपन राम जी का नाम लिए और सीधे कमरे में। 

अगले दिन यानि 11 दिसंबर सुबह 5 बजे उठे फ्रेश हुए और सीधे पद्मनाभ मंदिर। धोती ख़रीदी, पहनी सामान जमा कराया और दर्शन करने निकल पड़े।50,100,500 के टिकिट की अलग पंक्ति समय का सदुपयोग करते हुए 500 की पर्ची कटवाई ये विषय अलग की ये पंक्ति भी काफ़ी लम्बी थी। श्रद्धा है भाई। ख़ैर दर्शन करते हुए सभी मित्रों के स्वास्थ एवम् प्रगति पथ पर निरंतर अच्छे  प्रदर्शन की कामना करते हुए (विशेष मित्र के लिए विशेष ) 9 बजे दर्शन कर होटेल वापसी। होटेल वापसी आते हुए चूहे पेट में कलाबाजियां ख़ा रहे है। एक  कहावत है "ब्राह्मण नहाया गज़ब ढहाया भजन किया तो भोजन पाया " सो ड्रेस चेंज की और सीधे नाश्ते की टेबिल पर।

सभी मित्र अपनी अपनी सुविधा अनुसार टोली बनाकर तिरुवनंतपुरम घूमने निकल चुके थे। नाश्ते के बाद मैं नीरव जी और मधु जी होटेल  KTC grand chethram की यादों को अपने अपने मोबाइल में क़ैद कर रहे थे। नीरव जी 12 बजे मीरा जी के यहाँ आमंत्रित थे सो मैंने सोचा इन्हें विदा कर मैं अकेले ही घूमने निकलता हूँ। 

दिन भी अपना है शाम भी अपनी
अवनि पैरों से कहाँ है मपनी 
इक बराहमन अकेला काफ़ी है 
'दीप' को माला कहाँ है जपनी ॥

तभी नीरव जी का मोबाइल घनघना उठा दूसरी तरफ़ अग्रज दर्शन बेज़ार थे जिनकी फ्लाइट सायं 7 बजे थी। समस्या ये थी की 12 बजे चैक आउट करके सामान कहाँ रखें। मैंने तुरंत सुझाव दिया मेरे कमरे में। कुछ देर बाद वे अपने भारी भरकम लगेज (मात्र एक हैंड बैग)के साथ रिसेप्शन पर हाज़िर हो गये। बात चीत शुरू हुईं तो मुझसे पूछा आपका क्या प्रोग्राम है मैंने कहा हुज़ूर नीरव जी को विदा करके घूमने निकलूँगा। थोड़ा असमंजस में देखा तो तुरंत प्रस्ताव दे दिया अभी निकलते हैं हुज़ूर आपके भारी भरकम लगेज को डिक्की में डालेंते हैं घूमते हैं आपको 5 बजे एअरपोर्ट ड्रॉप करके हम होटेल वापिस। बस नीरव जी को विदा किया। टैक्सी वाले को समझाया उसने पाँच मिनिट में रूट फ़ाइनल किया और दो प्रेमी चल पड़े तिरुवनंतपुरम घूमने। पहला पड़ाव नेय्यर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी जा पहुँचे। 2 लोगों के 2 घंटे के लिए 4500/- में पूरी सैर। लेकिन हम तो हम ठहरे दिल्ली वाले 4500/- को 4000/- करवाकर ही माने। बोट ली और निकल पड़े पूवर नदी, वर्कला बीच, बाक़ी जगहों के नाम याद नहीं आ रहे हैं। पहली बार वीडियो भी बनाई। पोस्ट की है रिस्पोंस अच्छा मिला। वहाँ से निकले तो सीधे कोवलम बीच की पहाड़ी पर महादेव के दर्शन किये फ़िर कोवलम बीच का आनंद लिया। अभी आनंद की अनुभूति हो ही रही थी कि बरख़ा रानी ने कानों में धीरे से सरगोशी की कि इससे पहले कि मैं अपना रूप दिखाऊं टैक्सी में बैठ जाओ और इत्तीफ़ाक़न हुआ भी ऐसा ही।बेज़ार जी भुनी हुईं मूँगफली खाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए और बरखा रानी ने उनके चेहरे पर अटखेलियां करती ज़ुल्फ़ों को भिगो दिया😄।बेज़ार जी और मैं भी गर्मागर्म कॉफ़ी के इच्छुक थे और सोच रहे थे कितना अच्छा हो अगर साथ में गर्मागर्म पकौड़ी भी मिल जाएँ किंतु किंतु किंतु बरख़ा रानी ने इजाज़त नहीं दी और हम सड़क पर जमा पानी में बारिश की बूंदें गिरते देखकर उन्हें कढ़ाई में पकौड़ी समझकर संतोष करते रहे। उसी मस्त बारिश में बेज़ार जी को एअरपोर्ट ड्रॉप किया और स्वयं को होटेल में। बेज़ार जी के साथ लगभग पाँच घण्टे की गुफ़्तगू में तय हुआ कि अगले अधिवेशन में दोनों एक कमरे में रहेंगे 😉

      अगले दिन सुबह 6 बजे फ्लाइट थी तो कमरे में लौटे सामान पैक किया और सीधे नीरव जी के रूम में जहाँ अन्य मित्र पहले से ही मौज़ूद थे। थोड़ी बहुत गपशप हुईं फ़िर डिनर के नाम पर तीन दिन से एक मात्र विशुद्ध सात्विक भोजनालय नहीं नहीं विशुद्ध नहीं क्यूँ कि विशुद्ध तो सिर्फ़ मारवाड़ी भोजनालय होता है जहाँ प्याज़ भी वर्जित होती है। अब चूँकि लंच नहीं किया तो सोचा डिनर कर लें तो भैया जी 9,10,11दिसंबर को डिनर के नाम पर बस मसाला डोसा पेपर डोसा या ओनियन उत्पम। मतलब ब्रेकफस्ट  में इडली, वड़ा, उपमा पूरी सब्ज़ी कॉफ़ी जूस और वो दुग्ध में डालकर क्या खाते हैं 😊 छड्डो जी हलियो का पेट सुहालियों से कहाँ भरता है। बारह साल मुंबई में,साढ़े चार साल हैदराबाद में रहने के बाद सोचा साउथ इंडियन की आदत पड़ गईं है बस भैय्ये पिछले एक हफ़्ते से इसी पर जीवन यापन किया है। भला हो veg अरिया निवास  रेस्टोरेंट का जिसने जिलाए रक्खा वरना आस पास के veg के नाम पर बाबा रे बाबा। 👏दिल्ली से 5 दिसंबर की रात्रि को ठंड में 10:15 बजे दिल्ली एअरपोर्ट  पहुँच गए थे ताकि 6 दिसंबर की अल सुबह 5 बजे की फ्लाइट पकड़नी थी और यहाँ तिरुवनंतपुरम से 12 दिसंबर को सुबह 6 बजे की फ्लाइट। अच्छी बात ये थी इस बार दो की जगह कुल छः लोग थे सो अलसुबह 3:30 एअरपोर्ट पहुँचे फ्लाइट ली और 10:15 दिल्ली वहाँ से मेरठ खाना खाया और साढ़े छः बजे कंबल तानकर निद्रा रानी की गोद में अगले दिन आठ बजे जाकर मुबाईल की घंटी सुनकर  आँख खुली। 


बेहतरीन केरल यात्रा की स्मृतियाँ सँजोए !! !


प्रदीप DS भट्ट -291223

Wednesday, 20 December 2023

अब पड़ा तबियत में कुछ आराम सा। तुमने जब पूछा कि कैसे हो प्रदीप

यायावर की डायरी से

"अब पड़ा तबियत में कुछ आराम सा
तुमने जब पूछा कि कैसे हो प्रदीप "

          स्वास्थ्य थोड़ा नरम गरम होने के कारण यात्रा का वृतांत की दूसरी कड़ी में देरी हो गई। ख़ैर रामेश्वरम से लगभग १२ बजे बस ली और चल पड़े मदुरै स्थित मीनाक्षी टेंपल के लिए। एक बात जिसने मुझे प्रभावित किया वह थी मदुरै में और से रामेश्वरम तक साफ़ सुथरी सड़के। नॉर्थ में बस के अंदर पानी कोलड्रिंक बेचनेवालो की धूम रहती है किंतु तमिलनाडु की बसों में लोकल सामान और पानी बिकता तो देखा लेकिन कोल्ड ड्रिंक न जी न। लगभग ४ बजे मदुरै बस स्टैंड और वहां से ऑटो द्वारा मीनाक्षी टेंपल। मीनाक्षी टेंपल में भीड़ सोच रहा था रात दस बजे तक भी दर्शन हो जाएं तो जय श्रीराम वो भी विशेष टिकिट के बाद भी हालात खराब 
थे किंतु पंक्ति के साथ ही पीने के पानी की उचित व्यवस्था भी उपलब्ध थी। लेकिन एक बार दैनिक सांध्य पूजन अर्चन के बाद पंक्ति बड़ी तेजी से घटने लगा।लगभग ६ बजे दर्शन कर बाहर निकले फिर प्रशांत जी के साथ पेट पूजा की। मध्य रात्रि की ट्रेन पकड़ी और प्रातः ६ बजे कन्याकुमारी। स्टेशन से २फर्लांग की दूरी पर स्थित होटल लिया, कुछ देर आराम फिर निकल पड़े।

           सबसे पहले कन्याकुमारी माता के दर्शन किए फिर विवेकानंद रॉक के दर्शन किए। सबसे अद्भुत था तमिल के महान कवि तिरुवल्लू की मूर्ति के दर्शन करना। गर्मी पूरे प्रचंड वेग में थी इसलिए खाना खाया और होटल वापिस। सांय को सूर्यास्त देखने निकल पड़े। बेहतरीन नज़ारा किन्तु अफ़सोस दिल गड्ढे में बेहतरीन नज़ारा तो देखने को मिला किन्तु कन्याकुमारी में सूर्योदय एवम सूर्यास्त के दर्शन नहीं कर पाए। बादलों की आंख मिचौली ने सूर्य को हमसे दूर ही रक्खा।

"सूरज निकलना चाहता है बादल की ओट से
उठिए हुज़ूर ए आला पड़ा काम बहुत है "

क्या करते कुछ शंख खरीदे और चल पड़े मंथर गति से होटल की ओर आख़िर अगले दिन सुबह तिरुवंतपुरम की ट्रैनवा जो पकड़ती थी। तो ९ दिसंबर को प्रातः इडली खाई और चल पड़े अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समिति के तीन दिवसीय अधिवेशन में शिरकत करने के लिए। 

तो तैय्यार हो जाइए रिपोतार्ज के लिए 

प्रदीप DS भट्ट -211223

Monday, 18 December 2023

"देर आए दुरुस्त आए"



यायावर की डायरी से

            "देर आयाद आए"
आप सब सोच रहे होंगे कि ये क्या नया शिगूफा है भाई "यायावर की डायरी से" तो मित्रों हुआ यूं कि जब Abs4 के मैसुरू अधिवेशन में 19 वें अधिवेशन हेतु दर्शन बेजार जी द्वारा केरल के 'कोच्चि' का नाम प्रस्तावित हुआ तो हर्षित होना स्वाभाविक था किंतु किन्ही अपरिहार्य कारणों से अधिवेशन का स्थान बदलकर 'तिरुवंतपुरम' किया गया तो मन में यही विचार आया कि" मन चाहा होता नहीं प्रभु चाहें तत्काल"। ईश्वर की माया तो ईश्वर ही जाने। ख़ैर इस बार Abs4 द्वारा आपके मित्र को "यायावर" की उपाधि से विभूषित किया गया है तो सोचा हर इवेंट को दो पहलुओं में विभक्त कर देते हैं पहला "यायावर की डायरी से" और दूसरे पहलू को 'रिपोतार्ज' द्वारा जो कि सिर्फ़ कार्यक्रम पर फोकस होगा तो आइए यायावर की प्रथम डायरी का श्रीगणेश रामेश्वरम यात्रा से करते हैं।

हैदराबाद में पोस्टिंग के दौरान कोरोना भैय्या से एक लम्बी मुलाकात चली थी। वैक्सिन आई नहीं थी तो अपने मित्र सुहास भटनागर के साथ घर पर बैठे बैठे ही हमने 23 दिसंबर 2020 की जामनगर से रामेश्वरम को जाने वाली ट्रेन की दो टिकिट बुक कर दी किंतु जैसे ही वापिसी के लिए 25 दिसंबर की टिकिट बुक करनी चाही तो लिखा आ गया भैय्या कोरोना भाऊ के कारण ट्रेन कैंसिल की जाती है। आप समझ सकते हैं मूड कित्ता ख़राब हुआ होगा । 12 वर्ष मुंबई में रहकर सिर्फ़ त्रयंबकेश्वर के ही दो तीन दर्शन किए थे सो हमने महाराष्ट्र स्थित परली बैजनाथ घणेश्वर एवम भीमा शंकर के दर्शन करने का फ़ैसला किया और दिसंबर के अंतिम सप्ताह में ये पुण्य अर्जित किया किंतु रामेश्वरम के दर्शन न कर पाने की टीस बाकी थी सो जैसे ही तिरुवंतपुरम फाइनल हुआ हमने 6 दिसंबर की सुबह विजय प्रशांत जी के साथ दिल्ली से मदुरै फ्लाइट, मदुरै से रामेश्वरम बस से पहुंचे। 7 की प्रातः 5.30 बजे 22 कुंडो के पानी से स्नान कर विधिवत पूजन अर्चन कर मन एवम आत्मा तृप्त की तदुपरांत हल्का नाश्ता और फिर निकल पड़े धनुष कोड़ी के लिए। बेहद मनोहारी स्थान। दक्षिण भारत की प्रथम यात्रा का विवरण यहीं तक। अगले अंक में मदुरै के मीनाक्षी टेंपल का विवरण।

प्रदीप भट्ट ,'यायावर'

Friday, 1 December 2023

शब्दों के बाज़ीगर शब्दाक्षर महोत्सव में

रिपोतार्ज़

शब्दों के बाज़ीगर शब्दाक्षर महोत्सव में

जब अक्षर अपनी यात्रा प्रारंभ करते हैं तो वे शब्दों बन जाते हैं, जब शब्द अपनी यात्रा आरंभ करते हैं तो वे वाक्य में परिवर्तित हो जाते हैं और कुछ वाक्यों से मिलकर कविता का निर्माण हो जाता है जो अपनी अनवरत यात्रा के दौरान काव्य संग्रह या कहनी संग्रह उपन्यास,काव्य या महाकाव्यों तक का निर्माण हो जाता है। लेकिन इस पूरी यात्रा में अगर एक चीज़ महत्वपूर्ण है तो वो है शब्द और अक्षर यानि कि शब्दाक्षर। 

पिछ्ले वर्ष अगस्त की 6,7,8 को हम सभी शब्दाक्षर महोत्सव में सम्मिलित होने हेतु चेन्नई में मिले थे। मैंने भी तेलांगना इकाई का उपाध्यक्ष होने के नाते उस महत्वपूर्ण आयोजन में अपनी सहभागिता सुनिश्चित की थी। इस तरह के महोत्सव में सहभागिता करना ही अपने आप में महत्वपूर्ण होता है। केवल कोठरी जी का साहित्य के प्रति समर्पण देखकर निश्चित मन गदगद हो गया था।

इस बार भी 25, 26, 27 नवंबर को हरिद्वार में आयोजित शब्दाक्षर महोत्सव में ज्योति नारायन जी अध्यक्ष तेलांगना इकाई के अतिरिक्त मैंने भी उपाध्यक्ष तेलांगाना ईकाई की हैसियत से ही प्रतिनिधित्व किया। कोठारी जी पूरी तन्मयता के साथ प्रिय अमन शुक्ला, अध्यक्ष हरिद्वार के सहयोग से सारी व्यवस्थाओं में पूर्व की भांति लगे रहे। प्रिय निशांत एवम सागर दोनों ही अपनी अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन हेतु सदैव तत्पर दिखे। पिछली बार टीम दिल्ली अनुपस्थित थी किंतु इस बार पूरी टीम स्मृति कुलश्रेष्ठ जी के नेतृत्व में दिए गए कर्तव्यों को पूर्ण करने में सजग दिखी। इस सजगता को देखकर मैं मन ही मन प्रफुल्लित हो रहा था।😊 आख़िर साड्डी दिल्ली की मेहनत सफ़ल रही।

मैं 25 को योगा एक्सप्रैस से 11.30 हरिद्वार पहुंच गया कुछ ही देर में शताब्दी से दिल्ली टीम भी पहुंच गई और हम सब लगभग 12=15 होटल शर्मा परिवार (निकट शांति कुंज) पहुंच गए। मुझे कमरा नंबर 302 अलॉट किया गया 😁 सांय को रवि प्रताप सिंह जी के आग्रह पर मैं भी मनसा देवी के मंदिर में दर्शन करने चल पड़ा। मंदिर के मध्य में पहुंचकर तय हुआ कि हम सभी अक्षर एवम शब्दों के चंद पुष्प माता जी के चरणों में अर्पित करते चलें और परिणाम स्वरूप मेरी अध्यक्षता में एक कवि गोष्ठी आयोजित हुई। हमारी कविताएं सुनकर दर्शकों के तौर पर जुड़ी मेरठ की एक लड़की नेहा ने भी अपनी एक अच्छी कविता सुनाई। गोष्ठी उपरांत माता जी के दर्शन किए फिर एक ही स्टांस में सभी नीचे उतरे और सीधे होटल। खाना खाया और होटल के लॉन में सभी एकत्र हुए। देहरादून से पधारे डॉक्टर बुद्धिनाथ मिश्र जो कि शब्दाक्षर उत्तरखंड राज्य के अध्यक्ष भी हैं से सभी कवियों का परिचय रवि प्रताप सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष शब्दाक्षर ने कराया फिर आदतानुसार एक कवि गोष्ठी। लगभग 1 बजे वापिस कमरे में आया तो थोड़ी देर बाद ही दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष प्रवीण राही जी आ पहुंचे। एक घण्टे तक बतियाते रहे। अभी सोए ही थे कि 4 बजे मुबलिया घनघना उठा। दूसरी तरफ़ संतोष संप्रति थी, सीधे बोली नीचे रिसेप्शन पर हूं xy फोन नही उठा रहा क्या करूं 😇 हमने भी नींद में ऊंघते हुए कह दिया 302 में आ जाओ दो घंटे आराम करो फिर सुबह देखते हैं 🥰 ख़ैर थोड़ी ही देर में अमन की आवाज़ सुनकर मैंने कमरे से बाहर आकर देखा तो संतोष संप्रिति 301 में शिफ्ट हो चुकी थीं। 

26 को नाश्ते के बाद थर्ड फ्लोर पर हॉल में जा पहुंचे। पहले सेशन में परिचय, सम्मान इत्यादि में 4 बज गए। खाना खाया फिर अनवरत 8,9 कवियो के ग्रुप में सभी को स्टेज़ शेयर करने का मौक़ा दिया गया। ये अच्छा निर्णय था। रात 11 बजे तक तीन ग्रुप ही हो पाए। डिनर के बाद फिर अनौपचारिक कविताओं का दौर। 12 या 1 बजे सोए और सुबह संतोष संप्रति 7 बजे हाज़िर। सीधे सीधे चलो भाई गंगा नहाने चलना है। मना करने की गुंजाइश बिलकुल नहीं थी सो चुपचाप ऑटो लिया स्नान किया और 8.30 वापिस होटल पहुंच गए। नाश्ता किया और हॉल में। वही प्रक्रिया प्रथम सत्र में भी , प्रिय स्मृति कुलश्रेष्ठ का बढ़िया संचालन। पूरे दिन में लगभग 7,8 ग्रुप अपनी प्रस्तुति दे चुके थे। सेकेंड लॉस्ट में हमारा नंबर था सो एक गीत और एक गजल पढ़कर हमने भी साहित्यिक यज्ञ में अपनी आहुति दे दी।

🌷नमक दरिया में थोड़ा सा मिला दूं
मैं अपनी आंख का आंसू गिरा दूं

🌷गमों के साए में जीना है मुश्किल
खुशी के वास्ते तुमको भुला दूं 

श्यामल मजुमदार दादा एवम राजीव खरे ने अपने सत्र में अच्छा संचालन किया। मैंने विश्वजीत जी के इस आग्रह को कि एक सत्र का संचालन मुझे करना है के लिए बड़ी ही विनम्रता से अस्वीकार कर दिया। प्रिय लखन कटनी का संचालन या कहूं कि प्रस्तुति करण बहुत अच्छा है किंतु उन्हें अभी बहुत अधिक सीखना शेष है। एंकर मतलब अपनी वाकपटुता से सभी कुछ साधने की कला अगर एंकर ही मंच पर क्रोध प्रकट करेगा तो रायता बिखरना तय है। मुझे उम्मीद है लखन भविष्य में अपने तैश पर नियंत्रण करना सीख लेंगे।🌹

खाने के बाद होटल के कवर्ड लॉन में कोठरी दादा की अध्यक्षता में फिर गोष्ठी जुड़ गई। विश्वजीत, लखन, स्मृति कुलश्रेष्ठ, सविता बांगड़,वंदना चौधरी, सीमा त्रिवेदी, बिट्टू जैन, राज पुरोहित,
मधु पारख और है हम यानि शाहंशा ए दिल्ली 🤪 अब हम तो हम ठहरे ठंड से बचने के लिए सभी को सुझाव दे रहे थे, सिर ढक लो भैया पैर ढक लो सीना भी कवर कर लो। हमारी बात को सिरयसली लेते हुए विश्वजीत जी ने तुरन्त आधी अधूरी बुक्कल मार ली। चित्र देखें 😝 सुबह चार बजे तक चली गोष्ठी का आनंद शब्दों में बयां करना मुश्किल है। कोठरी दादा कमरा नहीं खुला तो मैंने उन्हें अपने कमरे में सोने का आग्रह किया। वो तो दस मिनिट में ही सो गए। मैं भी प्रयास कर ही रहा था तभी किसी ने मेरा पैर हिलाया देखा तो एक धुंधली सी परछाई दिखी। हमने अपने तेवर में ही पूछा कौन हो देवी यहां क्या कर रही हो तैन्नु की चाइदा। उसने न सुनाई देने वाला अट्टहास लगाया और बोली बहुत प्रवचन दे रहे थे वहां। बच के रहो सर्दी है बुड्ढा जवान नहीं देखती बस चिपक जाती है जिससे चिपकना होता है। तो बेटा हम वही सर्दी हैं अब देखो हम तुमसे कहां कहां चिपकते हैं। हमने हाथ जोड़ते 🙏🏾 हुए कहा देवी रहम करो हमें तीन दिवसीय कार्यक्रम में सम्मिलित होने 5 दिसंबर को केरल जाना है। हमने बड़ी अनुनय विनय की लेकिन उसका दिल न पासीजा बोली हमारे ग्राहक को हमसे बचाओगे तो हम तुम्हे ही अपना ग्राहक न बनाएंगे। कुछ देर बाद कमर में सिहरन सी महसूस हुई हम समझ गए कि अपना हैप्पी बर्डे पक्का। और अगले दिन घर पहुंचते पहुंचते जय श्री राम। सो भैय्या गला चॉक हो गया है। हाथ पैरों में जान सी न लग री, खांसी कौन से सुर की है पता नी चल रिया 😎😦 कोरोना के बाद फिर से काढ़ा पी रहे हैं। लगे है डॉक्टर बाबू को दिखाना भी पड़ेगा नई तो......... चेन्नई से वापिसी में भी कुछ कुछ ऐसा ही हुआ था। 16 अगस्त को हैदरावाद मेट्रो में गिर गए सो अलग। कुछ दिनों तक पट्टी बांधकर और लटकाकर 😏😏😏 वो भी क्या सीन था मेट्रो में चढ़ते ही सीट ऑफर हो जाती थीं।

कुछ लोगों को मन में बसाए और कुछ को घटाए 28 की सांय को घर वापिसी । कल सांय को मजूमदार दादा का फोन आया तो मन प्रफुल्लित हो गया। सीधे बोले राष्ट्रीय कवि प्रदीप भट्ट दादा को प्रणाम 🌷🙏🏾🌹 गले की तो एमसी बीसी हुई पड़ी हुई थीं फिर भी काफ़ी देर तक बतियाते रहे ।
चर्चा के दौरान प्रोग्राम के विषय में मजूमदार दादा ने पूछा तो मैंने बोला प्रोग्राम बहुत अच्छा और स्तरीय हुआ है दादा और अगर फिर भी कोई व्यक्ति इतने अच्छे प्रोग्राम में कमी ढूंढता है तो ये उसकी आंखों का दोष है या फिर मानसिकता का।

तो दोस्तों फिर मिलेंगे किसी नए वैन्यू पर नए मैन्यू के साथ और हां किसी ने वादा किया है दोस्ती निभाने का, देखते हैं भैय्या सिर्फ़ वादा है या दावा। एक शेर याद आ गया।
दावा करूंगा हिज़्र में मूसा के खून का
क्यूं उसने मेरे कातिल के खंजर को बाड़ दी 

प्रदीप DS भट्ट, 011023