Monday, 27 April 2026

"मी होर्मुज बोलतोय"

"मी होर्मुज बोलतोय"
(यानि रजिया गुंडों में फंस गई)

         रात के डेढ़ बजे के करीब मुबलिया घनघना उठा। हमने एक दूसरे से लिपटी अपनी टांगों को बेडवा से नीचे उतारा और साइड पर रक्खे स्टूल से मुबलिया पर मन ही मन बड़बड़ाते झपट पड़े कि ये कौन ससुर का नाती है जो इत्ती रात को हमारी नींद में खलल डालने की हिम्मत दिखा रहा है। जय राम जी करके पूछा आप कौन साहब हैं जो इत्ती रात को हमें घड़घड़ा दिए हो भाई उधर से सपाट स्वर उभरा "मी होर्मुज बोलतोय"। एक सेकेंड को तो हमारी डिबरी भी टाइट हो गई लगा कोई भूत है जो खाली टाइम में हमारी ख़ाली पीली फिरकी ले रहा है इसलिए हमने अपनी आवाज़ में चाटुकारिता की सभी प्रकार की मलाई लपेटते हुए हदों के अंदर रहते हुए मिमियाते हूं पूछा कौन होर्मुज जी। शायद होर्मुज को ऐसी उम्मीद नहीं थी इसलिए थोड़ा तल्खी लिए हुई आवाज़ आई बेटा हम ओमन और ईरान के मध्य मात्र 33 किलोमिटर लम्बे समुद्री गलियारे हैं फारस की खाड़ी से ओमन की खाड़ी को जोड़ते हैं। ये जो तुम अपनी स्कूटी चलाते हो न  इसमें डलने वाला तेल हमारे गलियारे से होते हुए ही तुम तक पहुंचता है और हां सुनो बे ये गैस LNG वाली तुम्हारे पेट वाली नहीं बे,ये भी हमीं से होकर तुम तक आती है समझे या और समझाऊं। हम कुछ कहते कि फ़िर से आवाज़ आई जरथूष्ट्र धर्म जानते हो अहुरा मज़दा हमारे देवता हैं उन्हीं से हमने नाम झटक लिया है, बेटा दुनिया का 20 से 30 प्रतिशत और एक करोड़ बैरल प्रतिदिन तेल हमारी छाती को चीरकर तुम सब तक पहुंचता है। और हां आखिरी बात फ़ारसी में तंगेह ए होरमोज कहलाते हैं हम।

         हमने अपने बरबंटो को अच्छी तरह खोलते हुए पूछा महाराज जे तो बताइए आप हमसे चाहते क्या हो। होर्मुज महाराज की हूं की आवाज़ आई फ़िर बोले देखो प्रदीप बाबू "भैंसों की लड़ाई में झुंडो का नुक़सान" हो रहा है पूरी दुनिया त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है। ये ट्रंप तो अमेरिका की पूरी इमेज़ के साथ बेइज्जती करवाकर ही मानेगा जहां तक इजरायल का सवाल है उसने अपना उल्लू सीधा कर लिया है। जहां तक प्रश्न ईरान का है तो इतने सारे नेताओं के मरने के बाद भी वो युद्ध युद्ध खेलने में मज़ा ले रहा है उसे अपने आवाम की चिंता बिलकुल भी नहीं है। अब ये सब कुछ गंवाकर होश में आयेगा तो क्या ही उखाड़ लेगा। लेकिन इन सब की गुंडई का खामियाजा मुझ अकेले को भुगतना पड़ रहा है। ट्रंप तो हुड़कचुल्लू है और नेतन्याहू शातिर लोमड़ी के दिमाग़ वाला और ईरान उसे आग की भयावता का अंदाजा है मगर वो अपनी बेवकूफाना हरकतों से आग को आग से बुझाने की कोशिश कर रहा है। मैंने मज़े लेने के लिए पूछ ही लिया और पाकिस्तान वो जो शान्ति शान्ति खेल रहा है उसके बारे में तो भाई साहब कुछ विशेष टिप्पणी तो कीजिए।होर्मुज झुंझलाहट से बोले "बुड्ढा मरे या जवान इसको हत्या से काम"। फ़िर एक गहरी स्वांस लेकर होर्मुज बोले हमने इसलिए फ़ोन किया कि तुम पहली फुर्सत में कल ही हमारे ऊपर एक व्यंग्य में हास्य का तड़का लगाते हुए एक आलेख लिख मारो नई तो बाक़ी का तो पता नहीं पर तुम्हारे पेट की गैस का इलाज़ हम परमानेंट कर देंगे। ये तो सीधे सीधे लॉरेंस विश्नोई की धमकी सी लगी सो सपना देख रही आँखें एक झटके में खुल गईं। हमने राम जी का नाम लिया और होर्मुज की चेतावनी को सीरियसली लेते हुए अगले दिन विस्तार से आलेख का खाका खींचना प्रारम्भ कर दिया। अब इत्ती प्यारी से धमकी के बाद नींद तो आने से रही न महाराज। लेकिन होर्मुज भाई साहब की रूदाली से ऐसा लगा कि आज की तारीख़ में होर्मुज उर्फ़ तंगगेह ए हार्मोज से सही सलामत जहाज़ निकालना ऐसा ही है जैसे जॉइंट फैमिली में एक पति अपनी को देने के लिए बाज़ार से कुछ लाए और पूरे परिवार की सीसीटीवी नुमा बनी आंखों में धूल झोंकते हुए सही सलामत वो सामान बीवी के हवाले कर पाए।

         सो मसला यूं है कि इजरायल ने अमेरिका को पपीते के पेड़ पर चढ़ा दिया कि भैय्ये यो जो ईरानवा है न ससुरा 460 किलो यूरेनियम संवर्धन करके बैठा है क्या पता कब परमाणु परमाणु खेलने लगे इसीलिए अगर तुम्हें अपनी चौधराहट सलामत रखनी है तो पहली फुर्सत में इसको पेल दो नई तो भविष्य में ये तुम्हे रगड़ देगा। ट्रंप जो भयंकर वाले अन्प्रिडेक्टेबल हैं ने घूरकर नेतन्याहू को देखा फिर आधे गुस्से और आधी हंसी हंसते हुए कहा अबे अभी जुलाई में तो पेला था संसुरा ठंडा हुआ पड़ा है काहे मरे हुए को मरवाते हो बे। नेतन्याहू ने खींसे निपोरते हुए कहा तुम भी न बुढ़ापे में सठिया गए हो ट्रंप बाबू। देखो ऐसा है तुमने जो जुलाई में ईरान को पेला था वो तो टीजर मात्र था अच्छा एक बात बताओ तुमने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कुल कितनी लड़ाई जीती है, वियतनाम, कोरिया ,इराक़, अफगानिस्तान अबे सारी की सारी लड़ाई तुमने हारी हैं लेकिन हार कर भी तुम जीतते हो सोचो भला क्यूँ , सोचो सोचो महाराज। देखो हर लड़ाई हारने के बाद अमेरिका का रक्षा उद्योग आगे पीछे की सारी कसर पूरी कर देता है। यानि तुम्हारा और दुश्मन देश का पुराना गोला बारूद मिसाइल सब ख़त्म फिर नया उत्पादन और भइया अमेरिका नया माल बनाकर बेचकर अगली पिछली सब कसर निकाल लेता है तो फिर से सोचो अर्जुन रूपी ट्रंप और ईरान का नाम ओ निशान मिटा दो। फिर मैं तो हूं न इधर से तुम इधर से मैं भाई साहब मिलकर ईरानवा का कचूमर बना डालेंगे। ट्रंप ने आखिरी प्रश्न दागा ठीक है है। हमला तो कर दूंगा लेकिन कोई कारण भी तो चाहिए।  नेतन्याहू शातिराना मुस्कान बिखेरते बोले "ड्रिल बेबी ड्रिल" और बस ट्रंप ने कह दिया यलगार हो और लो जी 28 फ़रवरी इतिहास में दर्ज हो गई।

         बिना विचारे जो करे वो पाछे पछताए, सुना है न आपने अब उधर से अमेरिका और उधर इजरायल दे दना दन शुरू। सभी को लगा हफ़्ते भर की जंग में ईरान हांफते हुए अमेरिका और इजरायल के आगे लम लेट हो जाएगा लेकिन लेकिन लेकिन ईरान ने जब पेलना शुरू किया तो ईरान से 2300 किलोमीटर दूर इज़रायल को अपनी ग़लती का अहसास हुआ कि उसने ग़लत जगह पंगा ले लिया है लेकिन बाज़ी तो हाथ से निकल चुकी थी सो मरता क्या न करता उसने ईरान की नाजायज औलाद को उधेड़ना शुरू कर दिया यानि हिजबुल्लाह जिसने लेबनान पर कब्ज़ा किया हुआ है। अब हिजबुल्लाह की जान तो ईरानी तोते में है सो ज़ाहिर सी बात है ईरान सकपकाया भी सबकबाया भी और फिर से उसने दे दना दन शुरू और अमेरिका के इजरायल भी और ज्यादा गहरी चोट खाने लगा। जल्दी ही ईरान को समझ आ गया कि इज़रायल और अमेरिका से निपटना इतना आसान नहीं है सो उसने एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस के तहत बिना किसी चेतावनी के अमेरिका के सैनिक अड्डों पर जो कि बहरीन, ओमन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात इराक़ व सीरिया में दीपावली का धूम धड़ाका करना शुरू किया बस यही बात अमेरिका को खल गई कि मारना है तो इजरायल को मारो मेरे अड्डे पर बमबारी क्यूँ मैं तो छोटा सा नन्हा सा शैतानी बच्चा हूँ। 

         युद्ध में सब कुछ जायज़ है ये ईरान ने अमेरिका को अच्छी तरह से समझा दिया वैसे भी ईरानियन तो बीस बरसों से अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग की तैयारी कर रहे थे उन्हें पता था कि अमेरिका लंपट बाज़ी जरूर करेगा सो उसने अमेरिका को वहां वहां ठोका जहां अमेरिका की नस दबी हुई थी । जिस गति से युद्ध लड़ा जा रहा था उससे ज्यादा तेज़ गति से ट्रंप भाई साहब की ज़बान। रोज़ रोज नए नए दावे ईरान ख़त्म और ही पल ईरान फिर अमेरिका पर तिरछी चोट कर देता। अब हालात ये कि इस युद्ध में इज़रायल एक तरह से गायब हो गया और ये युद्ध अमेरिका बनाम ईरान होकर रह गया। यानि "हींग लगी न फ़िटकरी और रंग आ गयो चोखा " जय हो नेतन्याहू बाबा की। ट्रंप बोलते रहे और ईरान ठोकता रहा। युद्ध की शुरुआत ईरान में रिज़ीम चेंज करने को लेकर थी बाद में सबको समझ आ गया ये तो तेल का खेल है। फ़िर तेल के चक्कर में अमेरिका का जब कुछ ज़्यादा ही तेल निकलने लगा तो ट्रंप महाराज आएं बाएं शाएं बोलते हुए कभी युद्ध जीत गए, कभी अमेरिका ने अपना टार्गेट अचीव कर लिया कभी होर्मुज से हमारा तेल नहीं आता है जिसका आता है वो देश खुलवा ले। मतलब कुछ भी यूरोप को भद्दी भद्दी गालियां और अंत में आख़िरी पासा पहले ईरान होर्मुज खोले तब समझौता होगा, फिर एक तरफ़ा युद्ध विराम लेकिन धमकी निरन्तर। आख़िर ये चल क्या रहा है होर्मुज बाबू।

         सबसे अजीब स्थिति तो पाकिस्तान ने पैदा कर दी है होर्मुज होर्मुज खेलते ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध विराम की बिसात नम्बर एक आतंकवादी देश पाकिस्तान करवा रहा है। पाकिस्तान को भी पता है अमेरिका उसे बलि का बकरा बना रहा है लेकिन उसकी मज़बूरी है भाई उसका कशकोल खाली है देश कैसे चलाए या ख़ुद का खर्चा कैसे निकाले सो उसे लग रहा है इसी बहाने अमेरिका कुछ डॉलर उसके काशकोल में डाल दे तो कुछ बात बने। लेकिन लेकिन लेकिन होर्मुज बेचारा क्या करे। अच्छा खासे 100 जहाज़ रोज़ उसे सलाम करके निकल रहे थे लेकिन अब सलाम तो छोड़ो कलाम भी न हो रहा ऊपर से उसकी छाती पर कभी गोला गिर रहा है कभी नन्नक वाली मिसाइल। इस चक्कर में कभी इसका जहाज़ कभी उसका जहाज़ उसके पेट में अलग से समाए जा रहा है। इस युद्ध के चक्कर में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की रेटिंग शेयर मार्किट की तरह नीचे गोते लगा रही है। सुना है परसों ट्रंप पर किसी ने हमला कर दिया है। भई जे कैसा चाचा चौधरी है जो अपनी रक्षा न कर पा रहा और दूसरों को बता रहा है रिज़ीम चेंज करो और लोकतंत्र बचाओ। भाई साहब इस बिचारे लोकतन्त्र की हालात भी इस होर्मुज की ही तरह हो गई है। कहीं एक दिन लोकतन्त्र भी न कहे "मी लोकतन्त्र बोलतोय"।

प्रदीप भट्ट 
व्यंग्यकार, मेरठ 

         

Wednesday, 8 April 2026

"एक्सीडेंटल एंकर"

कार्यक्रम के 23=24 साल बाद 
रिपोर्ताज, चलेगा न 

"एक्सीडेंटल एंकर " 

"आगाज अच्छा है तो फिर अंजाम की, परवाह किसे है 
सूरज दिखाए रास्ता फिर शाम की, परवाह किसे है "

         अब देखो न ये बरसतिया भी मार्च तो छोड़ो अप्रैल में भी पिंड नहीं छोड़ रही। कल ही खबर मिली है कि इस बार अल नीनो भाई साहब की सक्रियता के चलते बरसात जून के बाद कम होगी I यानि समान्य से कम। हम भी खाली बैठे क्या करते सो पुरानी अल्बम ही टटोल बैठे और वहाँ मिले तीन चार ठो फुटवा. भाई साहब बाहर बारिश और कमरे के अन्दर बैठे हम और फिर मिले एल्बम के अन्दर फोटो, बस बन गया मुड और 23,24 बरस की घटना का स्मृति के आधार पर रिपोर्ताज तैय्यार I  जे हुई न बात।

         आप सोच रहे होंगे ये क्या शीर्षक दे दिया भाई ने I  तो हुज़ूर बात है यही कोई 2002-2003 की ,उस बख्त हम दिल्ली में ड्यूटी बजाते वो भी भारत सरकार की प्रोटोकॉल ऑफिसर/लाइजिनिंग। कभी इस मिनिस्ट्री कभी उस मिनिस्ट्री शाम को वापिस अपने दड़बे में। तो हुआ यूँ कि हमारे डिपार्टमेंट अजी जनाब Khadi &Village Industries Commission के हिस्से में सितम्बर माह में हिन्दी की बिंदी लगाने के लिए एक कवि सम्मेलन का आयोजन आया।

        दिवंगत सरला माहेश्वरी जी जो दूरदर्शन की बढ़िया वाली न्यूज रीडर रहीं,KVIC के हर कार्यक्रम में बतौर ऐंकर उपस्थित रहती थी। ख़ैर इंतजामात हुए और चार कवियों को 360 डिग्री मीडिया के खुराना जी( पूरा नाम याद नी आ रहा है मियाँ) द्वारा आमंत्रित भी कर लिया गया I  दिल्ली का हैदराबाद हाउस वैन्यू भी निर्धारित हो गया I डेट तो मुझे याद न आ री लेकिन शाम सात से प्रोग्राम शुरू होना था I और भाई साहब उसी समय लगभग 6 सवा 6 बजे राम जी ने ऊपर के सभी नल खोल दिए और बरखा रानी ने ऐसा धूम धड़ाका किया कि बाहर खड़े IP VIP  सब हॉल के अन्दर I चेयरमैन डॉक्टर महेश शर्मा, chief executive officer बसु जी भी पधार चुके थे मिनिस्ट्री से भी राज्य मंत्री के अतिरिक्त सभी आमंत्रित अतिथि बारिश की रफ्तार देखते हुए समय से पहले ही अपना स्थान ले चुके थे।
      
         थोड़ी अव्यवस्था जरूर हो गई थी। आमंत्रित दर्शकों का इंतजार हो रहा था तभी ख़ुद को बौछारों से बचाते हुए पद्मश्री अशोक चक्रधर,ओम प्रकाश आदित्य और बाकी दो कवि भी बरसात की नजाकत को समझते हुए सीधे हॉल में मैंने और अन्य ने उन सभी को गर्मा गर्म चाय पिलाकर थोड़ा गर्म किया फिर मैं उन्हें उनके स्थान पर बिठाकर व्यवस्था में लग गया।लगभग 7.00 बजे हमारे डायरेक्टर एस पी सिंह जी मुझे ढूंढते हुए हॉल में पहुंचे और बिना भूमिका बांधे हुए बोले " देख भाई प्रदीप सरला जी तो आने की ना हैं,वो तो बारिश में फंस गई हैं उनकी गाड़ी ख़राब हो गई है I चेयरमैन साहब ने बोला है प्रदीप को बोलकर कवि सम्मेलन शुरू करो I मैं एक दम से अचकचा गया फिर बोल दिया सर ऑफिस के प्रोग्राम में एंकरिंग करना अलग है देखो तो सामने कौन बैठे हैं I मेरे और सिंह साहब के बीच होती बातचीत को देखते हुए चेयरमैन साहब ख़ुद सीट से उठकर आए और सीधे बोले प्रदीप चलो प्रोग्राम शुरू कर वाओ। मैंने तुम्हें कविताएँ पढ़ते देखा है, और जाकर बैठ गए वापिस अपनी सीट पर I 

         कोई और चारा न देखकर मैं सीधे अशोक चक्रधर जी के पास गया और समस्या बताई। उन्होंने कंधे पर हौले से हाथ रखकर हौसला अफजाई की और कहा कोशिश करो सब हो जाएगा। आप कवियों का परिचय पढ़कर माइक् मेरे हवाले कर दें बाक़ी मैं सम्भाल लूँगा I  मैंने भी लाइन से सब भगवानों को स्मरण किया और लो जी सब कुछ ठीक ठाक से निपट किया I  घर आकर उस शाम बनी स्थिति पर एक शेर लिखा और सो गए I  फिर अगले चार सालों तक ऐंकर की  भूमिका निभाते रहे फ़िर मुंबई पोस्टिंग हो गई और हमने भी एंकरिंग से दूरी बना ली। कारण स्पष्ट है दोस्तों जिस काम को करने में सहजता न हो वो करना ही क्यूँ है। और कुछ तो याद न आ रिया है I 
        अब बस भैय्या थोड़े लिखे को ज्यादा समझना।

-प्रदीप डीएस भट्ट -08042026

Monday, 6 April 2026

"गोबर इकॉनमी"

गोबर इकोनॉमी "धूप पर टैक्स" 
सोलर सिस्टम लेना है तो 
नेप्रा से लाइसेंस लेना होगा 
Ipp की मंहगी बिजली कौन खरीदेगा 


         भारत जब 1947 में स्वतंत्र हुआ तो भारत की इकोनॉमी कृषि आधारित थी। ऐसा इसलिए कि भारत की 80 प्रतिशत जनता गांवों में निवास करती थी सो भारत सरकार किसानों का हित पहले देखती थी बाक़ी का भी ख्याल रक्खा जाता था किन्तु परन्तु लेकिन गांव पहले गांव का किसान पहले।  20% शहरी आबादी का जहां तक ताल्लुक़ है तो कपड़े के मिल कुछ कल कारखाने बैलेंस करने के लिए काफ़ी थी। दिल्ली जहां राजनीति का अखाड़ा थीं वहीं मुम्बई सपनों की नगरी का ताज पहनकर लोगों को ख़्वाब देखना सीखा रही थी जो कुछ बच गए और फ़िल्मों में कुछ न कर पाए वे बिचारे पहले नौकरी और फिर छोकरी पाने के पीछे ही अपनी जिन्दगी निकाल देते थे। बाक़ी शहरों का तो पता नहीं लेकिन मद्रास, हैदराबाद, बैंगलोर और भाई साहब कलकत्ता का कमोबेश हाल ऐसा ही था। चीन हमसे बाद में आजाद हुआ लेकिन नब्बे के दशक में उसने तरक्की की ऐसी राह पकड़ी कि क्वार्टर सेंचुरी पूरी करते करते वो विश्व की दूसरी अर्थव्यवस्था बन गया और 2025 आते आते 20 करोड़ ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनकर आस पास के छोटे मोटे देशों को बिना डकार लिए हज़म करता जा रहा है।

         जहां तक अपने देश भारत का ज़िक्र है सच्ची बता रिया हूं 2014 के नेतृत्व परिवर्तन के बाद विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है और तीसरे पॉयदान की ओर मजबूती से क़दम बढ़ा रहा है। 12 बरस में छः अंकों की छ्लांग लगाना आसान काम नहीं है लेकिन मानो न मानो भारत ने ऐसा कर दिखाया है। भारत में लगभग 14.5 करोड़ गाय ,10.98 करोड़ भैंस, 14.88 से 15.4 करोड़ के लगभग बकरी, 7.42 करोड़ के लगभग भेड़ हैं और आबादी चलो फिलहाल 140 करोड़ ही मान लो वो क्या है न 1अप्रैल से जनगणना जो शुरू हो गई है। अब ज़्यादा मगजमारी करनी तो म्हारे बस की न है पर मोटा मोटी पकड़ो तो दुग्ध, दही, मक्खन, देसी घी और छाछ भाई साहब कोई कमी न है और कम पड़ जाएगी तो अनपढ़ किसान समझने की भूल करने वालों ध्यान से सुनो ये वही किसान है जो भारत के नागरिक को ज़्यादा गाढ़ा दुग्ध पीने से रोकता है और सवेरे सवेरे दुध में शुद्ध पानी मिलाकर बंदों का हाजमा ठीक रखता है। कुछ किसान तो और भी ज्यादा समझदार हैं पता नहीं कहां कहां से नई तरकीबें खोजकर दुग्ध, पनीर, खोया बना डालते हैं और हम भी बिना डकार के सब कुछ हज़म कर जाते हैं। सड़े हुए तेल के भटूरे खाने वाले का ये मिलावटी आइटम क्या ही बिगाड़ लेगा जी। और बिगाड़ कर करेगा भी क्या हम तो मुनाफे के लिए भगवान तक को नहीं बख्शते डेढ़ सौ रूपये किलो वाला पूजा वाला देसी घी, मिलावटी तिल के तेल से दीया बाती करते भक्त जन सोचते हैं जब हम शुद्ध नहीं खा रहे तो तुम्हें ( भगवान जी को) कहां से शुद्ध खिलाएंगे। अच्छी बात ये है कि भगवान जी समझदार हैं, माया तो उन्हीं की है सो एडजस्ट कर लेते हैं।


वहीं पाकिस्तान में लगभग छः करोड़ गाय, 4.02 करोड़ भैंस, 8.3 करोड़ बकरियां व 3.27 करोड़ भेड़े हैं।