Monday, 6 April 2026

"गोबर इकॉनमी"

गोबर इकोनॉमी 

         भारत जब 1947 में स्वतंत्र हुआ तो भारत की इकोनॉमी कृषि आधारित थी। ऐसा इसलिए कि भारत की 80 प्रतिशत जनता गांवों में निवास करती थी सो भारत सरकार किसानों का हित पहले देखती थी बाक़ी का भी ख्याल रक्खा जाता था किन्तु परन्तु लेकिन गांव पहले गांव का किसान पहले।  20% शहरी आबादी का जहां तक ताल्लुक़ है तो कपड़े के मिल कुछ कल कारखाने बैलेंस करने के लिए काफ़ी थी। दिल्ली जहां राजनीति का अखाड़ा थीं वहीं मुम्बई सपनों की नगरी का ताज पहनकर लोगों को ख़्वाब देखना सीखा रही थी जो कुछ बच गए और फ़िल्मों में कुछ न कर पाए वे बिचारे पहले नौकरी और फिर छोकरी पाने के पीछे ही अपनी जिन्दगी निकाल देते थे। बाक़ी शहरों का तो पता नहीं लेकिन मद्रास, हैदराबाद, बैंगलोर और भाई साहब कलकत्ता का कमोबेश हाल ऐसा ही था। चीन हमसे बाद में आजाद हुआ लेकिन नब्बे के दशक में उसने तरक्की की ऐसी राह पकड़ी कि क्वार्टर सेंचुरी पूरी करते करते वो विश्व की दूसरी अर्थव्यवस्था बन गया और 2025 आते आते 20 करोड़ ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनकर आस पास के छोटे मोटे देशों को बिना डकार लिए हज़म करता जा रहा है।

         जहां तक अपने देश भारत का ज़िक्र है सच्ची बता रिया हूं 2014 के नेतृत्व परिवर्तन के बाद विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है और तीसरे पॉयदान की ओर मजबूती से क़दम बढ़ा रहा है। 12 बरस में छः अंकों की छ्लांग लगाना आसान काम नहीं है लेकिन मानो न मानो भारत ने ऐसा कर दिखाया है। भारत में लगभग 14.5 करोड़ गाय ,10.98 करोड़ भैंस, 14.88 से 15.4 करोड़ के लगभग बकरी, 7.42 करोड़ के लगभग भेड़ हैं और आबादी चलो फिलहाल 140 करोड़ ही मान लो वो क्या है न 1अप्रैल से जनगणना जो शुरू हो गई है। अब ज़्यादा मगजमारी करनी तो म्हारे बस की न है पर मोटा मोटी पकड़ो तो दुग्ध, दही, मक्खन, देसी घी और छाछ भाई साहब कोई कमी न है और कम पड़ जाएगी तो अनपढ़ किसान समझने की भूल करने वालों ध्यान से सुनो ये वही किसान है जो भारत के नागरिक को ज़्यादा गाढ़ा दुग्ध पीने से रोकता है और सवेरे सवेरे दुध में शुद्ध पानी मिलाकर बंदों का हाजमा ठीक रखता है। कुछ किसान तो और भी ज्यादा समझदार हैं पता नहीं कहां कहां से नई तरकीबें खोजकर दुग्ध, पनीर, खोया बना डालते हैं और हम भी बिना डकार के सब कुछ हज़म कर जाते हैं। सड़े हुए तेल के भटूरे खाने वाले का ये मिलावटी आइटम क्या ही बिगाड़ लेगा जी। और बिगाड़ कर करेगा भी क्या हम तो मुनाफे के लिए भगवान तक को नहीं बख्शते डेढ़ सौ रूपये किलो वाला पूजा वाला देसी घी, मिलावटी तिल के तेल से दीया बाती करते भक्त जन सोचते हैं जब हम शुद्ध नहीं खा रहे तो तुम्हें ( भगवान जी को) कहां से शुद्ध खिलाएंगे। अच्छी बात ये है कि भगवान जी समझदार हैं, माया तो उन्हीं की है सो एडजस्ट कर लेते हैं।


वहीं पाकिस्तान में लगभग छः करोड़ गाय, 4.02 करोड़ भैंस, 8.3 करोड़ बकरियां व 3.27 करोड़ भेड़े हैं।

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