Tuesday, 31 March 2026

एक पंथ दो काज

रिपोर्ताज 

         आपने एक कहावत सुनी होगी "एक पंथ दो काज" तो भैय्या हुआ यूँ के मेरठ के प्रतिष्ठित कॉलेज मेरठ कॉलेज जिसकी स्थापना 1892 में हुई यानि 134 बसंत देख चुके खूबसूरत और पुराने कॉलेज और इसका फ़ैलाव भाई साहब पूरम पट्ट 106 एकड़ में। महराज इत्ते में तो कम से कम दो यूनिवर्सिटी बन जाएं। अंग्रेजों के जमाने में लाल पत्थर से बना पूरा कॉलेज अपने आप में एक अद्भुत कृति है। ये विषय अलग कि नये बनाए गए भवनों में यहाँ वहाँ कुछ उघाड़े हुए पलस्तर अपनी दयनीय स्थिति पर खुदई ठहाका मारकर हँसते हुए दिखाई देते हैं। 10 विभागीय पुस्तकालय, कुल 31 प्रोगशालाएं, (अठ्ठासी) 88 अध्ययन कक्ष और दो सभागार यानि कुल मिलाकर पठन पाठन के लिए एक आदर्श स्थान। अब 134 बरस पहले जब इसकी स्थापना हुई होगी तो आने जाने में लोगों को डर लगता होगा। अरे भईया डर तो लगेगा न। नीरा जंगल रहा होगा। बैल गाड़ी, इक्का दुक्का साईकिल और एक आध फटफटीया बस इतना ही सामान होगा कच्ची पक्की सड़कों पर। और आज तो इसकी लोकेशन प्राइम हो गई लगता है असली मेरठ यहीं है बाक़ी सब तो चाय कम पानी।

         तो फिर से हुआ यूँ के प्रोफेसर रेखा राणा जी ने फोन पर हमसे हमारी प्रोफाइल भेजने को कहा। लो जी हमने कम लिखे को ज़्यादा समझना की तर्ज़ पर प्रोफाइल भेज दी और अगले दिन उन्होंने हमें निर्णायक की भूमिका के लिए लॉक कर दिया। अगले दिन वाट्सअप पर पत्र की प्रति के साथ में हमारी स्वीकृति की गुज़ारिश भी। तो लो भाई साहब 27 मार्च समय ग्यारह बजे भी निर्धारित हो गया। लेकिन जे क्या योगी जी ने 26 मार्च अष्टमी और 27 मार्च की नवमी को भी सरकारी अवकाश घोषित कर दिया। दोपहर में रेखा जी का फ़ोन सर कार्यक्रम 27 की जगह 30 को होना निश्चित हुआ है। तकलीफ़ के लिए माफ़ी। कोई गल्ल नी जी ऐसी स्थिति से तो हम कई बार दुई चार हुए हैं। 29 को फिर फोन सर दूसरे निर्णायक किन्हीं कारण वश आने में असमर्थ हैं। आप कुछ कर सकते हैं। ऐसा पहले भी घटित हो चुका है सो सधे हुए अंदाज़ में हमने सजेशन दे डाला आप अपने या अन्य किसी डिपार्टमेंट से किसी को साथ बिठा दीजिएगा बाकी हम संभाल लेंगे। हां सर ये ही ठीक रहेगा कहते हुए उन्होंने फोन रख दिया।

         अब ऐसा है न हर सरकारी संस्था का हाल यही है वित्तीय वर्ष के अंतिम माह के अंतिम दिनों में ही सबको सब कुछ करना होता है। नहीं हो पाया तो बजट लेप्स और अगले साल उतना ही बजट कम मिलना है सो प्रोफ़ेसर बच्चों को पढ़ाएंगे भी, और जितने काम निर्धारित हैं के अतिरिक्त संस्कृति का समन्वय भी करेंगे। स्टाफ कम है लेकिन करना तो पड़ेगा ही। सो मैं रेखा जी की मज़बूरी समझता हूं। सो भैय्या अपनी आदत अनुसार हम तो पंद्रह मिनिट पहले ही डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन पहुंच गए पता चला जिन बच्चों को सहभागिता करनी है वे एग्जाम में बिजी हैं, बारह बजे छूटेंगे। चाय पानी के बाद रेखा जी ने गुज़ारिश की कि सर यदि आपत्ति न हो तो तब तक दूसरे प्रोग्राम का शुभारंभ कर आएं। मना करने का तो सवाल ही नहीं होता सो डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स पहुंच गए। पता चला नेचुरल फोटोग्राफी की प्रतियोगिता है। स्टूडेंट्स मेरठ कॉलेज के कॉर्नर चुनेंगे और फ़ोटो क्लिक करके जियो टैग के साथ डेढ़ घंटे में सब्मिट करेंगे। ख़ैर कार्यक्रम का शुभारंभ किया, चाय नाश्ता फिर अपने निर्धारित कार्यक्रम स्थल में। 

         लगभग 12.40 पर कार्यक्रम शुरू हुआ, दीप प्रज्जवलन फिर मान सम्मान की प्रक्रिया अन्ततः, मौर्य जी के साथ निर्णायक की भूमिका में आ गए। कुल आठ प्रतिभागियों ने रचना पाठ किया के अतिरिक्त लॉ स्टूडेंट सुगंध सक्सेना जो कि चेहरे के पैरालिसिस से पीड़ित थी ने अलग से कविता प्रस्तुत की। कविता अच्छी थी किंतु उस लड़की को कविता पढ़ते हुए बोलने में जो पीड़ा हो रही थी उसकी हिम्मत के लिए मैंने उसे अपनी तरफ़ से आशीर्वाद स्वरूप लिफ़ाफ़े....रेखा जी के संग सम्मानित किया (चित्र में देख सकते हैं) निश्चित आत्मा को सन्तोष प्राप्त हुआ अब जे जरूरी थोड़े है कि सिर्फ़ लिफ़ाफ़ा लिया ही जाए भाई साहब लिफ़ाफ़ा देने का भी अपना आनन्द है। ख़ैर  सुगंध  की जिजीविषा को प्रणाम! अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि निर्णायक सिर्फ़ निर्णय देवें सो फरमाइश पर कविता भी पढ़नी पड़ी लेकिन सुगंध सक्सेना की जिजीविषा को प्रणाम करते हुए जो पढ़ा उसका आनन्द आप भी लें।

“व्योम के ओम”

जब लक्ष्य किया निर्धारण तब,
रखा मक़सद मंज़िल पाना।
अच्छे बच्चों क़ी आदत है,
पढ़ते पढ़ते ही सो जाना॥

खाने पीने का ध्यान नहीं,
ना लेते ये विश्राम कभी ।
शादी हो या कोई जलसा,
नही फिक्र कभी करता कलवा
उसकी आँखों में स्वप्न कई
रखता ध्येय बस पढ़ते जाना॥

        अच्छे बच्चों की आदत.....

रखते हैं गुरु का मान सदा,
तीनों लोकों का इन्हें पता।
कक्षा में ये अव्वल आते,
उपहार गुरु से भी पाते
रकना न कभी भी सीखा है
सीखा है बस चलते जाना॥

       अच्छे बातों की आदत.....

ये साक्षात सत के प्रहरी,
रखते हैं सोच सदा गहरी।
हिम शिख छू लेना लक्ष्य प्रथम
गुरुओं से सीखी विद्या प्र्थम
ये पेड चढे या फिर पर्वत 
सीखा है सदा चढ़ते जाना॥

       अच्छे बातों की आदत.....

ख़ुश रहते मात पिता इनसे,
लेते हैं मित्र सलाह इनसे
निश्च्य होता है इनका सही
पीछे ना मुड़ के देखा कभी,
जैसी दृष्टी वैसी सृष्टी
मिले मोड मगर सीधे जाना॥

         अच्छे बच्चों की आदत....

किसमें इतना है साहस जो,
पथ इनका बढ अवरुद्ध करे।
मार्तण्ड तेज है मस्तक पर,
अरि आगे आने से भी डरे
अवनी सबकी पालन कर्ता
सीखा है व्योम में मिल जाना॥

         अच्छे बच्चों की आदत....

होली के रंग ना भाते इन्हें,
ना दीवाली की फुलझडियाँ।
ये उर्ध्वलोक पाना चाहते,
तैय्यारी पूर्ण कर के आते
दूजे का जीवन रोशन कर
इच्छा ‘प्रदीप’ है बन जाना॥

                                                                     - प्रदीप देवीशरण भट्ट -11:02:2020

         अशोक जी ने जहाँ संचालन किया वहीँ रेखा जी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत कर कार्यक्रम संपन्न होने की घोषणा की। अंत में सामुहिक चित्र फिर कुछ बच्चों के सवालों का जवाब देते हुए विदाई ली। तभी रेखा जी का फ़ोन घनघना उठा उन्होंने मुस्कुराते हुए हमारी तरफ़ देखा, हम भी मुस्कुरा उठे और चल पड़े पुनः डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स की ओर। अच्छी बात ये थी कि उस कार्यक्रम के दोनों निर्णायक आ चुके थे, सो पुनः स्टेज़ शेयर किया और बच्चों के साथ यादगार पल की तस्वीरें मोबाइल में कैद की। अब हमने रेखा जी से विदा ली और एक खूबसूरत दिन की यादें समेटे घर की ओर चल पड़े।

प्रदीप डीएस भट्ट -31032026

Thursday, 12 March 2026

"दिल्ली का ज़िंदा गाँव"

रिपोर्ताज 

        "दिल्ली का ज़िंदा गाँव"

         अगर मैं मोटा मोटी कहूं तो दिल्ली का इतिहास लगभग 5000- 5500 सौ वर्ष पुराना है यानि महाभारत काल से मान लिया जाए तो दसवीं शताब्दी में तोमर वंश के राजा अनंगपाल ने इसे बसाया उसके बाद चौहान 's फिर दिल्ली सल्तनत फिर मुग़लस फिर अंग्रेज आए जिन्होंने 1911 में कलकत्ता से राजधानी उखाड़ी और वापिस दिल्ली में स्थापित कर दी। अब भैय्या इससे पहिले यानि कि 5000 साल पहले का इतिहास तो राम जी जाने। किशन जी तो द्वापर में हुए और इसी कालखंड में हुए कौरव भी और पाण्डव भी। जहां तक हमारा प्रश्न है तो महाराज हमने तो इस हसीन दिल्ली को 1980 से अपना मित्र बनाया वो भी बढ़िया वाला😊। कहीं भी नैन मटक्का कर आवें पर भाई साहब जो मज़ा दिल्ली की गोद में बैठने का है वो और कहीं कहां। डी टी सी बस एक मात्र सहारा होती थी उस समय हमारी घुमक्कड़ी का।  चालीस पैसे का टिकिट न खरीदना पड़े उसके लिए क्या क्या जतन नहीं किए।🤓🤓🤓

         1961 में जहां दिल्ली में 300 गाँव होते थे वहीं 2011 आते आते उनकी संख्या सिकुड़कर 112 रह गई थी अब तो दिल्ली में शायद इक्का दुक्का गांव ही बचे हों वो भी 2027 की जनगणना तक शायद विलुप्त न हो जाएं। मियां जी सरकारी भाषा में इसे ही तो विकास कहते हैं 🤣🤣🤣🤣🤣। तो भाई साहब उन्हीं 112 गाँव में से एक मुनिरका गांव की सन्तोष सम्प्रति जो साहित्य सृजन कुटुम्ब संस्था की संस्थापिका अध्यक्ष हैं और हम संस्थापक मंत्री। फ़ोन पर ही गुफ़्तियाए😁😁😁😁😁 और तय हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर कार्यक्रम आयोजित किया जाए लेकिन कुछ अलग अंदाज़ में। वोडा फ़ोन वाले आइडिये का तो पता नी चल रहा है या नहीं लेकिन अपना आइडिया निकल पड़ा। अब भैय्या लिखने पढ़ने का काम तो टीचर जी ही बढ़िया कर सकती हैं सो 1 मार्च के प्रोग्राम में जब हम पटेल चौक, द्वारका मोड़ मिले तो उन्होंने कार्यक्रम का पूरा खाका प्रस्तुत कर हमें चमत्कृत कर दिया और 7 मार्च को उसे जमीन पर उतार भी दिया। अब संतोष जी के काम का तरीका ऐसा ही है यानि फास्ट टैग से भी तेज़।

         सो हुआ यूँ के हम 7 को सुबह सुबह निकले। रैपिड 🚇 के सहारे दरिया गंज हंस पत्रिका के ऑफिस लेकिन अफसोस साहब दिल गड्ढे में। हल्के हल्के पसीने में तर बत्तर होते हुए ढूंढ़ते ढांढते जब हम हंस पत्रिका के कार्यालय पहुंचें तो वहां बड़े से शटर के ओर लटके हुए बड़े से ताले🔐 में ने हमें मुँह चिढ़ाते हुए पूछा "काला  हंस - काला हंस" यहां कैसे। अब समझ नी आया वो ये उद्बोधन हमारी शक्ल देखकर दे रहा था या हमारे कहानी संग्रह "काला हंस" को। और भई ये काला हंस- काला हंस दो बार क्यूँ बोला कहीं उसमें किक फिल्म के करेक्टर नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की आत्मा तो नहीं घुस गई। जो दो बार बोलता है पोलैंड पौलेंड। हमने भी खीजते हुए पूछ ही लिया अबे तुम शनिवार को कैसे बंद हो बे? तो भाई साहब शटर के दूसरी ओर लटके हुए ताले 🔐 🔐 🔒 के जुड़वां भाई ने गुस्से से अपनी छेद रूपी आँख को नीला पीला करते हुए कहा क्यों बे सरकारी छुट्टी का मज़ा क्या तुम ही लोगे चच्चा। हम भी तो फिर आगे के शब्द उसने चिढ़ाने के उद्देश्य से हवा में तैरने के लिए छोड़ दिए। हम खिसियाए हुए से अपनी तशरीफ़ का टोकरा वापिस मोड़ते हुए खरामा खरामा दिल्ली गेट 🚇 की ओर लपक लिए।
  
         एक बात कहें वैसे कई बार कह चुके हैं फ़र्क तो किसी पे पड़ता नहीं फिर भी एक बार और सुन लो भाई साहब समय के कुछ ज़्यादा ही पाबंद हैं हम सो ठीक 2.10 पर सन्तोष जी के घर जा पहुंचे। 💦 पानी पिया और सामान लेकर मुनिरका गांव की टेढ़ी मेढ़ी गलियों से पहचान करते हुए पिलर वाले समुदाय भवन जा पहुंचे। कुछ व्यवस्थाएं हमने मिलकर ठीक की और धीरे धीरे प्रतियोगी आने लगे। स्टूडेंट की मम्मियां, गाँव की महिलाएं वो भी पूरे टशन के साथ, निर्णायक मण्डल और कुछ कवि मित्र। दीप प्रज्ज्ववल, सरस्वती वन्दना, निर्णायक मण्डल , कवियों का आदर सत्कार फिर गर्मा गर्म चाय पकौड़े। ठीक 4.35 पर महिलाओं के लिए आयोजित नारी शक्ति संगम प्रश्नोत्तरी जिसमें 75 प्रश्न 75 अंक एवम् समय पूरम पट्ट एक घंटा। पुरस्कारों में प्रथम 3100/-, द्वितीय 2100/- व तृतीय 1100/-  निर्धारित था। मुनिरका गाँव की ही एक महिला जो यू ट्यूबर है ने पूरा कार्यक्रम फ़ेसबुक पर लाइव किया, धनवान बनो देवी। निर्णायक मण्डल ने सूचित किया कि तृतीय स्थान पर दो महिलाओं ने बराबर अंक प्राप्त किए हैं तो क्या राशि आधी आधी कर दी जाए। अध्यक्ष ने हमसे विचार विमर्श किया और फिर अध्यक्ष तो अध्यक्ष ठहरी तुरंत 1100/- का एक और लिफ़ाफ़ा तैयार और लो जी प्रथम पुरस्कारशालिनी खन्ना, द्वितीय वन्दना चौधरी एवम तृतीय की संयुक्त दावेदार और पुरुस्कृत हुई पूनम अरोड़ा एवम् खुशबू कुमारी। एन्नू कैदे बड़े दिल वाला या वाली जी समझे के नाही। ❤️ 🌹🌹🌹🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

        विजेताओं को पुरस्कार राशि प्रदान करने का पुनीत कार्य हमें दिया गया। बात तो कायदे की थी अरे भाई संस्था के मंत्री हो🤠🤠🤠😂😂 कुछ काम तुम भी तो करो की तर्ज़ पर हमने इस जिम्मेदारी का निर्वहन किया। इसके बाद छोटी छोटी कविताओं के पाठ का दौर।  हमने कविता न पढ़कर छोटी छोटी दो कहानियां उपस्थित जनों के साथ साझा की जिन्हें सभी ने सराहा भी और साथ ही साझा की साहित्य सृजन कुटुम्ब की अभी तक की यात्रा 🧳 साथ ही यह भी साझा किया कि साहित्य सृजन कुटुम्ब संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम चाहे दिल्ली में हों या बाहर संस्था ने आज तक किसी भी प्रतिभागी से एक भी पैसा नहीं लिया है और सभी का धन्यवाद अलग से। अब खेल ख़त्म तो पैसा हजम की तर्ज़ पर सबने फिर से काले जाम का जायका गर्मा गर्म चाय की सुड़की के साथ लिया और लौट पड़े अपने अपने घरौंदे की ओर।

प्रदीप डीएस भट्ट -11032026