Sunday, 31 May 2026

"एक पंथ दो काज"

रिपोर्ताज 

              "एक पंथ दो काज"

         पिछले वर्ष 28 मार्च को साहित्य सृजन कुटुम्ब, (न्यास), दिल्ली को दिल्ली सरकार से रजिस्ट्रेशन प्राप्त हुआ और 14 अप्रैल को 2025 को संस्था द्वारा अम्बेडकर जयन्ती पर एक काव्य गोष्ठी/ परिचय आयोजित की गई। गोष्ठी के साथ साथ कुछ नए पदाधिकारियों को भी संस्था द्वारा नामित किया गया ताकि आगामी कार्यक्रमों को सुचारू रूप से संचालित किया जा सके। इसी क्रम में 28 मई को प्रयागराज में वीर सावरकर के जन्मोत्सव पर संस्था द्वारा प्रयागराज के कवियों के साथ हल्दीराम के प्रांगण में एक काव्य संध्या "शब्दांजलि" का सफल आयोजन किया गया साथ ही प्रयागराज के तीन वरिष्ठ साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया। कुछ कवियों को आश्चर्य हुआ भी कि दिल्ली की संस्था प्रयागराज में आकर न केवल वरिष्ठों को सम्मानित कर रही है वरन लोकल कवियों का उत्साहवर्धन भी कर रही है। निश्चित प्रयागराज के कार्यक्रम की उत्साहजनक प्रतिक्रिया ने ये तय कर दिया कि संस्था हर वर्ष 28 मई को कार्यक्रम आयोजित करेगी।

         7 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम में तय हो गया कि 28 मई -2026 को संस्था द्वारा शिमला में कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। तुरन्त पवन शर्मा जी से सम्पर्क साधा गया और मॉल रोड पर स्थित रोटरी क्लब को बुक कर दिया गया लेकिन लेकिन लेकिन अचानक घोषणा हुई कि हिमाचल में 27,28,29 मई को पंचायत चुनाव के कारण कार्यक्रम सम्भव नहीं है। अब भाई साहब आनन फानन में 28 मई को दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी की और लो जी वेदांता रेस्टोरेंट मुनिरका को पूरे दिन के लिए बुक कर दिया गया। अच्छी बात ये है कि संस्था की अध्यक्ष का अवतरण दिवस भी 28 को है तो एक पंथ दो काज कहावत का पालन करते हुए सारी व्यवस्थाएं कर दी गईं।

         नौतपा के रंग में रंगे दिन को हमने ठेंगा दिखाने की चेष्टा करते हुए सुबह सात बजे ही घर छोड़ दिया। रैपिडो एवम् रैपिड ट्रेन को अपना माध्यम बनाते हुए ठीक 11.35 बजे मुनिरका मेट्रो 🚇 से उतरे। मेट्रो के वातानुकूल का आनन्द बाहर आते ही छू मंतर हो गया, भाई साहब धूप से अपने चेहरे और सर को बचाने की असफल चेष्टा की तो कानों में हल्की सी सरगोशी करती आवाज़ आई। क्यूँ बे मज़ा आया न हम नौतपा है बेटे दूई मिनिट में 90 मिनिट की ठण्डी गुल कर देते हैं। हमने पलटकर जवाब न देने में ही अपनी अच्छी वाली भलाई समझी और ग्यारह नम्बर का सद्पयोग करते हुए जा पहुंचे वेदांता रेस्टोरेंट। ठीक 11.40 पर दीप प्रज्ज्वलित किया गया फिर बर्थ डे गर्ल सन्तोष संप्रति जी ने 2021 से संस्था किए जा रहे कार्यों पर प्रकाश डाला। फिर व्यक्तिगत परिचय एवम् उपस्थित साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। बॉस एक बताना तो भूल इच गए 11.00 बजे से 1.00 तक सम्मान के साथ साथ खान पान लगातार चलता रहा। अब कार्यक्रम में कौन कौन पधारे है ऊपर पोस्टर में ख़ुदई देख लो महाराज।

         अब बारी थी कवि सम्मेलन का तो संचालन की जिम्मेदारी हमारे हिस्से आई और हमने समय की नज़ाकत को समझते हुए 5 कवियों को एक ग्रुप में रखकर आमन्त्रित किया और लो जी को तीन बजते बजते दो तिहाई कवि कविता पढ़कर अपनी अपनी कुर्सियों पर स्वादिष्ट भोजन का रसस्वादन करने लगे। मजे की बात तो यूँ हुई साहिब कि कइयों ने क्या पढ़ा ये तो उन्हें भी शायद पता न चला हो🤣🤣🤣🤣🤣 लेकिन भाई एक साहब आए और वो अपने वाले हैं न फ़िराक़ गोरखपुरी साहब उनकी ग़ज़ल को यूँ तो कइयों ने गाया होगा लेकिन नीना सिंह (जगजीत सिंह नीना सिंह) जो अपनी बुआ के बढ़िया वाले लमडे हैं की ग़ज़ल की ज़मीन पर इधर उधर से लपेटी ग़ज़ल कह डाली फिर जी नी भरा तो ग़ुलाम अली की ज़मीन इस्तेमाल करके फिर से ग़ज़ल ठोकी और ये जा और वो जा🤓🤓🤓🤓। लो आप भी देख लो:-

रात भी, नींद भी, कहानी भी / फ़िराक़ गोरखपुरी
 फ़िराक़ गोरखपुरी »
रात भी, नींद भी, कहानी भी
हाय, क्या चीज़ है जवानी भी

एक पैगाम-ए-ज़िन्दगानी भी
आशिकी मर्गे-नागहानी भी

इस अदा का तेरी जवाब नहीं
मेहरबानी भी, सरगरानी भी

दिल को अपने भी गम थे दुनिया में
कुछ बलायें थी आसमानी भी

मंसबे-दिल खुशी लुटाता है
गमे-पिन्हान भी, पासबानी भी

दिल को शोलों से करती है सैराब
ज़िन्दगी आग भी है, पानी भी

शादकामों को ये नहीं तौफ़ीक़
दिले-गमगीं की शादमानी भी

लाख हुस्न-ए-यकीं से बढकर है
इन निगाहों की बदगुमानी भी

तंगना-ए-दिले-मलाल में है
देहर-ए-हस्ती की बेकरानी भी

इश्के-नाकाम की है परछाई
शादमानी भी, कामरानी भी

देख दिल के निगारखाने में
ज़ख्म-ए-पिन्हान की है निशानी भी

खल्क क्या क्या मुझे नहीं कहती
कुछ सुनूं मैं तेरी जुबानी भी

आये तारीक-ए-इश्क में सौ बार
मौत के दौर दरमियानी भी

अपनी मासूमियों के परदे में
हो गई वो नजर सयानी भी

दिन को सूरजमुखी है वो नौगुल
रात को वो है रातरानी भी

दिले-बदनाम तेरे बारे में
लोग कहते हैं इक कहानी भी

नज़्म करते कोई नयी दुनिया
कि ये दुनिया हुई पुरानी भी

दिल को आदाबे-बंदगी भी ना आये
कर गये लोग हुक्मरानी भी

जौरे-कम कम का शुक्रिया बस है
आप की इतनी मेहरबानी भी

दिल में एक हूक सी उठे ऐ दोस्त
याद आये तेरी जवानी भी

सर से पा तक सुपुर्दगी की अदा
एक अन्दाजे-तुर्कमानी भी

पास रहना किसी का रात की रात
मेहमानी भी, मेजबानी भी

जो ना अक्स-ए-जबीं-ए-नाज की है
दिल में इक नूर-ए-कहकशानी भी

ज़िन्दगी ऐन दीद-ए-यार ’फ़िराक़’
ज़िन्दगी हिज़्र की कहानी भी

मर्गे-नागहानी= अचानक मौत
सरगरानी=गुस्सा मन्सब=मन्सूबा
सैराब=भिगोना शादकाम=भाग्यवान लोग
तौफ़ीक=काबिलियत शादमानी=खुशी
तन्गामा-ए-दिले-मलाल=दुखी दिल के थोडे से हिस्से में
देहर-ए-हस्ती=ज़िन्दगी का समन्दर बेकरानी=असन्ख्य
कामरानी=सफ़लता निगारखाना=जहां बहुत लडकियां हों
पिन्हान=छुपा हुआ खल्क=दुनिया तारीके-इश्क=मोहब्बत का इतिहास
दौर=वक्त, समय दरमियानी=बीच में नौगुल=नया फ़ूल
नज़्म=नया बनाना जौर=कहर पा=पांव सुपुर्दगी=समर्पण
तुर्कमानी=विद्रोही अक्स-ए-जबीं-ए-नाज़=किसी प्यारे का चेहरा
नूर=प्रकाश कहकशां=आकाश गंगा ऐन= असलियत में।

         अब आप ही सोच लो कित्ते समझदार लोग पड़े हैं दुनिया में। ठीक तीन बजे केक महाशय को लाया गया अच्छी बात ये थी की उसे काटने के स्थान पर केक को नमस्ते करके सबको बरोबर हिस्से में बांट दिया गया। सच कै रिया हूं भाई साहब बिना अण्डे का केक कटने से बच भी गया और सच कै रिया हूं मुझे तो केक भी फूल टू सनातनी नज़र आया। धूमधड़ाका नाच गाना काफ़ी देर तक चलता रहा। साढ़े चार बजे के क़रीब अन्तिम सत्र की कमान हमने फ़िर संभाली और बचे खुचे कवियों ने अपनी कविताई से माहौल को खुश गवार कर दिया। अन्तिम कवि के तौर पर हमारी बारी आई और हमने कुछ अलग करते हुए एक मुक्तक और एक ग़ज़ल युद्ध की विभीषिका से उपजे हालातों पर कोरे कागज़ पर अपनी उकेर दी अच्छी बात ये रही उपस्थित ने इसे सराहा भी। आप भी आनन्द लें।

मुक्तक 

जिसमें जितना रोष है बाक़ी ,वो उतना मदहोश 
लेकिन ये भी सच है खाली, होता उसका कोश 
भाग्य लिखे को कौन मिटाए, सुन लो तुम भी 'दीप'
रखता जो भी होश, वो पाता जीवन में सन्तोष 
        -प्रदीप डीएस भट्ट -26052026


“ हलचल नही है”

🍁जंग किसी भी मसअले क़ा, हल नही है
 छिड़ गई इसमें किसी का, कल नही है

🍁अब के भी बरसात, जो रुठी रही तो
 पेड तो होंगे, मगर वो , फल नही है 

🍁जिस तरह बर्बाद, धरती कर रहे हैं
 क्या हमारा खुद से ही ये, छल नही है

🍁दिन-ब-दिन आबादी, बढती जा रही है 
 कल जो ढूंँढोगे, कहीं पर, जल नहीं है

🍁खेत प्यासे जल रहे , बूँदों को तरसें
 सूखती है वो नदी , कल-कल नहीं है

🍁हाल में किस जी रहा, हलधर कहूँ क्या
 कर्ज़ सर पे, पर निकलता, हल नही है 

🍁कल की खातिर, आज पेड़ों को लगाओ 
 कल कहोगे हाय !, क्यूँ जंगल नही है

🍁माना जीती जंग लेकिन, मन तो हारा
 ये ख़ुशी क़ा आज, निश्चित पल नही है

🍁हर तरफ बस , मुश्किलें ही मुश्किलें हैं 
 क्यूँ निकलता, इनका कोई, हल नही है

🍁क्यूँ परीशां हो रहे , मैं जानता हूं 
 हाय! अब धरती में भी, हलचल नहीं है 

🍁आसमाँ ने ओढ़ ली, फिर से उदासी 
 'दीप' भू पानी मगर, शतदल नहीं है 

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-24-02-2022

        अंत में राष्ट्र गान फिर विदाई 🎁 गिफ्ट और भैय्या हम भी निकल पड़े मेरठ की जानिब लेकिन जे क्या अभी 🚇 में बैठे ही थे कि इन्द्र देवता ने हल्की सी हवा के ठीक ठाक सी बारिश जो कि गाजियाबाद तक साथ साथ चली। फिर हमने बारिश को वहीं से टाटा बाय बाय कहा और लपक लिए मेरठ रैपिड की ओर।


प्रदीप डीएस भट्ट -31052006




Saturday, 30 May 2026

See no Evil जिमखाना या जिमखाला क्लब

         "जिमखाना या जिमखाला क्लब" 

         ऐसा कई बार होता है कि जो आप दिन में देखते सुनते हैं या उस विषय के बारे में बात करते हैं आपको उससे संबंधित सपने आते हैं। पर अपनी बात ज़रा दूजे क़िस्म की है माहराज अपन जो दिन में क्या रात में भी नहीं देखते या सुनते और जिसकी भविष्य में कहीं दूर तक कहने सुनने की ज़रा सी भी संभावना नहीं होती हमें उस बात के भी सपने आ टपकते हैं। तो हुआँ यूँ कि बहुत साल पहले जब हम दिल्ली में डेरा जमाए हुए थे और भारत सरकार की सेवा कर रहे थे तब स्टाफ़ कार condemnation के लिए सफ़दर जंग एयर पोर्ट कई बार आना जाना हुआ और तब हमारे चक्षुओं ने 27.3 एकड़ में पसरे और 1913 में स्थापित इस जिमखाना क्लब के बाहर से ही दर्शन कर अपने सौभाग्य को प्रणाम किया। हमारे साथी ने जिमखाना क्लब के बारे में जितना वो जानता था हमें बताकर अपने ज्ञान का प्रदर्शन तो किया ही साथ ही बिन मांगी सलाह भी दे डाली बोले गुरु तुमको दिल्ली में इत्ते दिन हो गये तुमने दिल्ली के बारे में क्या क्या जाना। नहीं जाना है तो हमसे पूछो लेकिन अपने आपको अपडेट रक्खा करो। हमने भी उसकी लय में ही उसे जवाब भी थमा दिया अबे तुम रुड़की के बारे में कुछ जानते हो उसने ना में मुंडी हिलाई तो हम फट पड़े अबे रुड़की में गँगा मैय्या बहती है एक जगह नदी ऊपर बहती है और नहर नीचे फिर आगे जाकर नहर ऊपर और नदी नीचे, IIT रुड़की कितनी पुरानी है मालूम है उसने फिर ना में मुंडी हिलाई तो हमने कहा अबे सुनो हर जगह ज्ञान पेलने की आदत से बाज आ जाओ। तुम जैसे लोगों के विषय में ये कहावत मशहूर हो गई कि बन्दर को मिली हल्दी की गाँठ तो वो समझ बैठा ख़ुद को पंसारी। भाई साहब उस दिन हमारे उस साथी ने बड़ी मुश्किल से थूक हलक के नीचे गटका था। ऑफिस आने तक एक दम शांत बैठा रहा। शायद मन ही मन क़सम खा ली हो इस बन्दे से कभी न भिड़ेंगे।

         तो दुबारा यूँ हुआ के कल रात रात हमारे सपने में जिमखाना क्लब आ गया। 27.3 एकड़ में पसरे कल्ब ने इंसानी रूप धारण किया हुआ था इसलिए जब उसने अपना नाम जिमखाना क्लब बताया तो हम सपने में भी चौंक पड़े। फिर अपने होशो हवास पर काबू पाते हुए पूछा अरे भाई 27.3 एकड़ में फैले हो फिर इंसानी रूप में कैसे प्रकट हो गए वो भी हमारे सपने में।उसने कातर दृष्टि से ताकते हुए कहा गुरु हमारा मज़ाक मति बनाओ। देखो जैसे ऋषि मुनि या देवता अपना रूप बदल सकते हैं तो क्या हम नहीं वैसे भी तुम 27.3 एकड़ पर कुछ ज़्यादा ही जोर नहीं दे रहे भैय्या। 5600  सदस्य हैं हमारे ,सब के सब नास पिटे। एक पैर ऑफिस में रखकर हाज़िरी लगाई और झट से दूसरा पैर हमारे गेट के अन्दर। काम धंधा थोड़े करना है। पहले गोरे चिट्टे अंग्रेज रौब झाड़ते थे अब काले अंग्रेज़। अब जिस जिमखाना क्लब ने इंसान रूप धारण करके मेरे सपने में पदार्पण किया था वो तो मुझे एक बारिश में भीगे हुए कुकुर की भाँति लग रहा था और उसकी मरियल सी आवाज़ सुनकर सुनकर सच कै रिया हूं मुझे भी थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई पर जाने दो जी मै कि करना। लेकिन दिल है कि मानता नहीं की तर्ज पर पूछ बैठा अपने बारे में और कुछ बताओ मियां। हमारा ये पूछना था भाई साहब जिमखाना तुनक कर बोला क्यूं बे हम पे पीएचडी करनी है क्या। हमने कहा अब तुम हमारे सपने में आए हो हम थोड़े तुम्हारे सपने में घुसे हैं। पहले समस्या बताओ फिर हम समाधान बता देंगे। जिमखाना ने अपने आधे गंजे होते सर को खुजाया फिर बोला तो सुनो।

Dogs & Indian are not allowed 
----------------------------+-------------------
         एक थे सर स्पेंसर हरकोर्ट हर्बर्ट साहब इन्होंने ही हमारी नींव डाली थी। शुरू में इसका नाम इंपीरियल जिमखाना क्लब था आजादी के बाद इसे दिल्ली जिमखाना क्लब कहा जाने लगा। शुरू शुरू में तो गोरे अंग्रेज़ ही अलाऊ थे फिर कुछ काले अंग्रेज़ मतबल राजा महाराजाओं की भी एंट्री हो गई। इन्हीं भाई साहब ने 1921 में कानपुर में इंजीनिरिंग कॉलिज भी बनवाया था। शुरू में अंग्रेज फिर महाराजा आज़ादी के बाद ब्यूरोक्रेट्स, पॉलिटिशियन ज्यूडिशरी वगैरह वगैरह भी मेंबर बनते चले गए और फिर धीरे धीरे विदेशी जासूस भी हमारे यहां आवागमन करने लगे। सीधे सीधे यूँ समझ लो मियां "इंडियन डिप स्टेट" का शराबखोरी, अय्याशी और भारत देश के विरुद्ध षड्यं त्रों का अड्डा बन बैठे हैं हम। अब बताओ ये मज़ाक नहीं है देश के प्रधानमंत्री के निवास की दीवार और हमारी दीवार आपस में बात करती होंगी तो क्या टॉपिक होते होंगे। वैसे एक बात बतावें राजीव गाँधी ने इसके ऊपर बुलडोज़र चलाने और इसे दिल्ली से बाहर फेंकने के आदेश दिये थे। पीएमओ हो फाइनेंस या डिफेंस वहां दूसरे देशों के लिए जासूसी करने वाले विभीषण शाम को और कभी कभी तो दिन में भी क्लासीफाइड डॉक्यूमेंट्स सौंपने आ जाते थे और मैं सिर्फ देखने के अलावा कुछ नहीं कर पाता दोस्त। आख़िरकार मैंने भी तो इंडिया का नमक खाया है। मैंने हूं करके फिर पूछा अच्छा एक बात बताओ तुम्हारी मेंबरशिप की फीस कितनी है। जिमखाना ने फिर खोपड़ी खुजाई फिर बोला पता नी एक नम्बर में कितना और दो नम्बर में कितना लेकिन गुरु वेटिंग 20,25 साल की है और यहां भी परिवार वाद छाया हुआ है। अगर कोई मर गया तो उसके परिवार को प्राथमिकता। और ये क्लब सरकार को देता क्या है केवल एक हज़ार रूपया साल। और तुर्रा ये कि यहाँ 40 प्रतिशत आई ए एस 40 डिफेंस बाकी 20 परसेंट में बाक़ी सब या गंगू तेली। और ये सब हाथ में शैम्पेन पीते हुए आपस में चर्चा करते हैं कि हमारा देश ग़रीब बहुत है इसका कुच्छो नहीं हो सकता।

          एक लम्बी सी बड्डी वाली फुल श्वांस लेकर जिमखाना बोला और कुछ पूछना है महाराज। हमने कान में उँगली डालकर सर को झटका दिया फिर पूछा ये नाले की क्या कहानी है जिम। अबकी बार जिम ने आँखें तरेरकर हमें देखा फिर हूं करके बोला तो तुम्हे सब मालूम है गुरु सच कै रिया हूं प्रधानमंत्री आवास को उस खुले नाले से खतरा है। माना आज तक कुछ नहीं हुआ भगवान न करे कल कुछ हो गया तो अपनी तो बेजत्ती में दाग़ लग जाएगा ना। ठीक है जिम हमसे क्या चाहते हो बताओ। जिम ने अपनी धंसी हुई आँखों को और अंदर तक धंसा लिया फिर बोला तुम जे सारी बात मोदी जी तक पहुंचाओ और इस चांडाल चौकड़ी से हमें मुक्ति दिलाओ। और हां सुनो जो म्हारी बात पे यकीं न हो तो रॉबर्ट बेयर की किताब see no evil पढ़ लो सब समझ आ जाएगा। वैसे भी इस क़िताब को आए हुए 25 बरस होने को आए हैं पता नहीं इन 25 बरसों में इन देश द्रोहियों ने हमारी छाती पर बैठकर कितने काण्ड किये होंगे। हमने भी कह दिया शहरी विकास मंत्रालय में हमारा जुगाड़ है वहां से खाली करने का नोटिस भिजवाते हैं। सुनते ही जिम ने हमें एक झेंपटा रसीद करते हुए कहा अबे किस दुनिया में रहते हो वहां से नोटिस आ भी गया है और 5 जून तक हमें शिफ़्ट करने का ऑर्डर भी मिल गया है। तुम्हारा मोदी तक जुगाड़ हो तो बात पहुंचाओ कि किसी भी दबाव में आए बग़ैर हमें यहाँ से कहीं और फिंकवा दे समझे। झेंपटा सपने में पड़ा लेकिन आँखें हक़ीकत में खुल गई।

         Robert bear की क़िताब है see no evil जो कि 2002 में पब्लिश हुई है। बकौल राबर्ट बियर CIA का भारत की राजधानी दिल्ली में सबसे सेफेस्ट हाउस अगर कोई था तो वो था जिमखाना क्लब यानि आप जिमखाना क्लब को CIA का मिनी हेडक्वार्टर भी कह सकते हैं। बकौल पंकज प्रसून See no Evil में रॉबर्ट लिखते हैं कि 1971 के युद्ध में बांग्लादेश आजाद हुआ। 1972 में सोवियत संघ ने भारत को एक टी 72 टैंक बेचा था। अमेरिका जानना चाहता था कि भारत इसे किस सीमा पर डिप्लॉय करेगा। रॉ एवम् आई बी  इस विषय पर बहुत चौकसी बरत रही थी लेकिन जो जानकारी कहीं से लीक नहीं हुई वो जानकारी जिमखाना क्लब में अमेरिकी जासूसों ने रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों की बातचीत सुनी और एकदम सही स्थिति मालूम कर ली। अब आप खुदई सोचो इतने डेंजरस डेंजरस काम हो रिए थे इस जिमखाना क्लब में तो क्या भारत का इंटेलीजेंस डिपार्टमेंट दो पैग लगाकर सो रिया था न जी न वो तो एकदम चौकस रहता है पर कुछ नासपीटे धिक्कारी फिर वो चाहे किसी भी लॉबी के हों उनके लिए देश की सुरक्षा में सेंध लगती है तो लग जाए पर उनकी अय्याशी में कमी नहीं आनी चाहिए बस । कुसूर इनका भी नहीं लगता इनको विरासत में जो मिला है ये वैसा ही करेंगे। वैसे भी जिमखाना के अलावे भी न जाने कितने क्लब सरकारी ज़मीन पर चल रहे हैं और सरकारी छाती पर मूंग दल रहे हैं। यकीं नहीं तो उदाहरण दिए देते हैं।

         1930 में भारत के एक बड़े पत्रकार दुर्गादास जो कि एसोसिएटीड प्रेस ऑफ इंडिया अब (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया) संबंधित थे ने जब लन्दन का दौरा किया तो पाया कि वहां पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब बना हुआ है तो बस उन्होंने आते ही जिद पकड़ ली भैय्या हमें भी प्रेस क्लब चाईदा और लो जी सरकारी खर्चे पर पत्रकारों की मौजमस्ती के लिए प्रेस क्लब तैयार। ये विषय अलग है कि उस पर आज तक भी वामपंथियों का कब्ज़ा है क्या कहा आपको वामपंथ नहीं पता। भाई साहब जो सीधे काम को भी उल्टे हाथ से करे वो लेफ्टिस्ट यानि वामपंथी। अब भाई साहब इससे ज़्यादा पोल मति खुलवाओ हमसे। अच्छा नई मानोगे तो सुनो महाराज दिल्ली गोल्फ क्लब, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर भाई साहब सारे के सारे सरकारी ज़मीन पे सरकारी खर्चे पे बने हुए हैं लेकिन कब्ज़ा वामपंथियों का। PTI हो या IIC या दिल्ली गोल्फ क्लब के चुनाव आपको घुसने नहीं देंगे। यक़ीन नहीं तो लालू जी से पूछ लो इत्ते कद्दावर नेता को भी IIC की मेंबरशिप न मिली। हां ये संस्थान काम सरकार विरोधी ही करते रहते हैं। ये जितने भी बजर बट्टू टाइप क्लब हैं ससुरे सगरे के सगरे उल्टे एंग्लो से काम करते हैं। टीएमसी भी ने तो बंगाल में छोटे छोटे बजर बट्टू टाइप क्लब खोल रक्खे थे जो कट मनी से लेकर झट मनी के भ्रष्टाचार में आकंठ में डूबे हुए थे। देख लो दो दिन में सगरे जिन्न की तरह हवा में गायब हो गए। मोदी जी से मिलना तो टेढ़ी खीर है सो जिम की तरह हमने भी मोदी जी की नींद में जुगाड़ लगाया और सारा माजरा सपने में तफ्सील से बयां कर दिया। अच्छी बात ये हुई कि मोदी बोले तुम तो जानते हो प्रदीप बाबू "मोदी है तो मुमकिन है"


प्रदीप भट्ट 
लेखक, मेरठ 
2206026