"जिमखाना या जिमखाला क्लब"
ऐसा कई बार होता है कि जो आप दिन में देखते सुनते हैं या उस विषय के बारे में बात करते हैं आपको उससे संबंधित सपने आते हैं। पर अपनी बात ज़रा दूजे क़िस्म की है माहराज अपन जो दिन में क्या रात में भी नहीं देखते या सुनते और जिसकी भविष्य में कहीं दूर तक कहने सुनने की ज़रा सी भी संभावना नहीं होती हमें उस बात के भी सपने आ टपकते हैं। तो हुआँ यूँ कि बहुत साल पहले जब हम दिल्ली में डेरा जमाए हुए थे और भारत सरकार की सेवा कर रहे थे तब स्टाफ़ कार condemnation के लिए सफ़दर जंग एयर पोर्ट कई बार आना जाना हुआ और तब हमारे चक्षुओं ने 27.3 एकड़ में पसरे और 1913 में स्थापित इस जिमखाना क्लब के बाहर से ही दर्शन कर अपने सौभाग्य को प्रणाम किया। हमारे साथी ने जिमखाना क्लब के बारे में जितना वो जानता था हमें बताकर अपने ज्ञान का प्रदर्शन तो किया ही साथ ही बिन मांगी सलाह भी दे डाली बोले गुरु तुमको दिल्ली में इत्ते दिन हो गये तुमने दिल्ली के बारे में क्या क्या जाना। नहीं जाना है तो हमसे पूछो लेकिन अपने आपको अपडेट रक्खा करो। हमने भी उसकी लय में ही उसे जवाब भी थमा दिया अबे तुम रुड़की के बारे में कुछ जानते हो उसने ना में मुंडी हिलाई तो हम फट पड़े अबे रुड़की में गँगा मैय्या बहती है एक जगह नदी ऊपर बहती है और नहर नीचे फिर आगे जाकर नहर ऊपर और नदी नीचे, IIT रुड़की कितनी पुरानी है मालूम है उसने फिर ना में मुंडी हिलाई तो हमने कहा अबे सुनो हर जगह ज्ञान पेलने की आदत से बाज आ जाओ। तुम जैसे लोगों के विषय में ये कहावत मशहूर हो गई कि बन्दर को मिली हल्दी की गाँठ तो वो समझ बैठा ख़ुद को पंसारी। भाई साहब उस दिन हमारे उस साथी ने बड़ी मुश्किल से थूक हलक के नीचे गटका था। ऑफिस आने तक एक दम शांत बैठा रहा। शायद मन ही मन क़सम खा ली हो इस बन्दे से कभी न भिड़ेंगे।
तो दुबारा यूँ हुआ के कल रात रात हमारे सपने में जिमखाना क्लब आ गया। 27.3 एकड़ में पसरे कल्ब ने इंसानी रूप धारण किया हुआ था इसलिए जब उसने अपना नाम जिमखाना क्लब बताया तो हम सपने में भी चौंक पड़े। फिर अपने होशो हवास पर काबू पाते हुए पूछा अरे भाई 27.3 एकड़ में फैले हो फिर इंसानी रूप में कैसे प्रकट हो गए वो भी हमारे सपने में।उसने कातर दृष्टि से ताकते हुए कहा गुरु हमारा मज़ाक मति बनाओ। देखो जैसे ऋषि मुनि या देवता अपना रूप बदल सकते हैं तो क्या हम नहीं वैसे भी तुम 27.3 एकड़ पर कुछ ज़्यादा ही जोर नहीं दे रहे भैय्या। 5600 सदस्य हैं हमारे ,सब के सब नास पिटे। एक पैर ऑफिस में रखकर हाज़िरी लगाई और झट से दूसरा पैर हमारे गेट के अन्दर। काम धंधा थोड़े करना है। पहले गोरे चिट्टे अंग्रेज रौब झाड़ते थे अब काले अंग्रेज़। अब जिस जिमखाना क्लब ने इंसान रूप धारण करके मेरे सपने में पदार्पण किया था वो तो मुझे एक बारिश में भीगे हुए कुकुर की भाँति लग रहा था और उसकी मरियल सी आवाज़ सुनकर सुनकर सच कै रिया हूं मुझे भी थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई पर जाने दो जी मै कि करना। लेकिन दिल है कि मानता नहीं की तर्ज पर पूछ बैठा अपने बारे में और कुछ बताओ मियां। हमारा ये पूछना था भाई साहब जिमखाना तुनक कर बोला क्यूं बे हम पे पीएचडी करनी है क्या। हमने कहा अब तुम हमारे सपने में आए हो हम थोड़े तुम्हारे सपने में घुसे हैं। पहले समस्या बताओ फिर हम समाधान बता देंगे। जिमखाना ने अपने आधे गंजे होते सर को खुजाया फिर बोला तो सुनो।
Dogs & Indian are not allowed
----------------------------+-------------------
एक थे सर स्पेंसर हरकोर्ट हर्बर्ट साहब इन्होंने ही हमारी नींव डाली थी। शुरू में इसका नाम इंपीरियल जिमखाना क्लब था आजादी के बाद इसे दिल्ली जिमखाना क्लब कहा जाने लगा। शुरू शुरू में तो गोरे अंग्रेज़ ही अलाऊ थे फिर कुछ काले अंग्रेज़ मतबल राजा महाराजाओं की भी एंट्री हो गई। इन्हीं भाई साहब ने 1921 में कानपुर में इंजीनिरिंग कॉलिज भी बनवाया था। शुरू में अंग्रेज फिर महाराजा आज़ादी के बाद ब्यूरोक्रेट्स, पॉलिटिशियन ज्यूडिशरी वगैरह वगैरह भी मेंबर बनते चले गए और फिर धीरे धीरे विदेशी जासूस भी हमारे यहां आवागमन करने लगे। सीधे सीधे यूँ समझ लो मियां "इंडियन डिप स्टेट" का शराबखोरी, अय्याशी और भारत देश के विरुद्ध षड्यं त्रों का अड्डा बन बैठे हैं हम। अब बताओ ये मज़ाक नहीं है देश के प्रधानमंत्री के निवास की दीवार और हमारी दीवार आपस में बात करती होंगी तो क्या टॉपिक होते होंगे। वैसे एक बात बतावें राजीव गाँधी ने इसके ऊपर बुलडोज़र चलाने और इसे दिल्ली से बाहर फेंकने के आदेश दिये थे। पीएमओ हो फाइनेंस या डिफेंस वहां दूसरे देशों के लिए जासूसी करने वाले विभीषण शाम को और कभी कभी तो दिन में भी क्लासीफाइड डॉक्यूमेंट्स सौंपने आ जाते थे और मैं सिर्फ देखने के अलावा कुछ नहीं कर पाता दोस्त। आख़िरकार मैंने भी तो इंडिया का नमक खाया है। मैंने हूं करके फिर पूछा अच्छा एक बात बताओ तुम्हारी मेंबरशिप की फीस कितनी है। जिमखाना ने फिर खोपड़ी खुजाई फिर बोला पता नी एक नम्बर में कितना और दो नम्बर में कितना लेकिन गुरु वेटिंग 20,25 साल की है और यहां भी परिवार वाद छाया हुआ है। अगर कोई मर गया तो उसके परिवार को प्राथमिकता। और ये क्लब सरकार को देता क्या है केवल एक हज़ार रूपया साल। और तुर्रा ये कि यहाँ 40 प्रतिशत आई ए एस 40 डिफेंस बाकी 20 परसेंट में बाक़ी सब या गंगू तेली। और ये सब हाथ में शैम्पेन पीते हुए आपस में चर्चा करते हैं कि हमारा देश ग़रीब बहुत है इसका कुच्छो नहीं हो सकता।
एक लम्बी सी बड्डी वाली फुल श्वांस लेकर जिमखाना बोला और कुछ पूछना है महाराज। हमने कान में उँगली डालकर सर को झटका दिया फिर पूछा ये नाले की क्या कहानी है जिम। अबकी बार जिम ने आँखें तरेरकर हमें देखा फिर हूं करके बोला तो तुम्हे सब मालूम है गुरु सच कै रिया हूं प्रधानमंत्री आवास को उस खुले नाले से खतरा है। माना आज तक कुछ नहीं हुआ भगवान न करे कल कुछ हो गया तो अपनी तो बेजत्ती में दाग़ लग जाएगा ना। ठीक है जिम हमसे क्या चाहते हो बताओ। जिम ने अपनी धंसी हुई आँखों को और अंदर तक धंसा लिया फिर बोला तुम जे सारी बात मोदी जी तक पहुंचाओ और इस चांडाल चौकड़ी से हमें मुक्ति दिलाओ। और हां सुनो जो म्हारी बात पे यकीं न हो तो रॉबर्ट बेयर की किताब see no evil पढ़ लो सब समझ आ जाएगा। वैसे भी इस क़िताब को आए हुए 25 बरस होने को आए हैं पता नहीं इन 25 बरसों में इन देश द्रोहियों ने हमारी छाती पर बैठकर कितने काण्ड किये होंगे। हमने भी कह दिया शहरी विकास मंत्रालय में हमारा जुगाड़ है वहां से खाली करने का नोटिस भिजवाते हैं। सुनते ही जिम ने हमें एक झेंपटा रसीद करते हुए कहा अबे किस दुनिया में रहते हो वहां से नोटिस आ भी गया है और 5 जून तक हमें शिफ़्ट करने का ऑर्डर भी मिल गया है। तुम्हारा मोदी तक जुगाड़ हो तो बात पहुंचाओ कि किसी भी दबाव में आए बग़ैर हमें यहाँ से कहीं और फिंकवा दे समझे। झेंपटा सपने में पड़ा लेकिन आँखें हक़ीकत में खुल गई।
1930 में भारत के एक बड़े पत्रकार दुर्गादास जो कि एसोसिएटीड प्रेस ऑफ इंडिया अब (प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया) संबंधित थे ने जब लन्दन का दौरा किया तो पाया कि वहां पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब बना हुआ है तो बस उन्होंने आते ही जिद पकड़ ली भैय्या हमें भी प्रेस क्लब चाईदा और लो जी सरकारी खर्चे पर पत्रकारों की मौजमस्ती के लिए प्रेस क्लब तैयार। ये विषय अलग है कि उस पर आज तक भी वामपंथियों का कब्ज़ा है क्या कहा आपको वामपंथ नहीं पता। भाई साहब जो सीधे काम को भी उल्टे हाथ से करे वो लेफ्टिस्ट यानि वामपंथी। अब भाई साहब इससे ज़्यादा पोल मति खुलवाओ हमसे। अच्छा नई मानोगे तो सुनो महाराज दिल्ली गोल्फ क्लब, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर भाई साहब सारे के सारे सरकारी ज़मीन पे सरकारी खर्चे पे बने हुए हैं लेकिन कब्ज़ा वामपंथियों का। PTI हो या IIC या दिल्ली गोल्फ क्लब के चुनाव आपको घुसने नहीं देंगे। यक़ीन नहीं तो लालू जी से पूछ लो इत्ते कद्दावर नेता को भी IIC की मेंबरशिप न मिली। हां ये संस्थान काम सरकार विरोधी ही करते रहते हैं। ये जितने भी बजर बट्टू टाइप क्लब हैं ससुरे सगरे के सगरे उल्टे एंग्लो से काम करते हैं। टीएमसी भी ने तो बंगाल में छोटे छोटे बजर बट्टू टाइप क्लब खोल रक्खे थे जो कट मनी से लेकर झट मनी के भ्रष्टाचार में आकंठ में डूबे हुए थे। देख लो दो दिन में सगरे जिन्न की तरह हवा में गायब हो गए। मोदी जी से मिलना तो टेढ़ी खीर है सो जिम की तरह हमने भी मोदी जी की नींद में जुगाड़ लगाया और सारा माजरा सपने में तफ्सील से बयां कर दिया। अच्छी बात ये हुई कि मोदी बोले तुम तो जानते हो प्रदीप बाबू "मोदी है तो मुमकिन है"
प्रदीप भट्ट
लेखक, मेरठ
2206026
No comments:
Post a Comment