Sunday, 31 May 2026

"एक पंथ दो काज"

रिपोर्ताज 

              "एक पंथ दो काज"

         पिछले वर्ष 28 मार्च को साहित्य सृजन कुटुम्ब, (न्यास), दिल्ली को दिल्ली सरकार से रजिस्ट्रेशन प्राप्त हुआ और 14 अप्रैल को 2025 को संस्था द्वारा अम्बेडकर जयन्ती पर एक काव्य गोष्ठी/ परिचय आयोजित की गई। गोष्ठी के साथ साथ कुछ नए पदाधिकारियों को भी संस्था द्वारा नामित किया गया ताकि आगामी कार्यक्रमों को सुचारू रूप से संचालित किया जा सके। इसी क्रम में 28 मई को प्रयागराज में वीर सावरकर के जन्मोत्सव पर संस्था द्वारा प्रयागराज के कवियों के साथ हल्दीराम के प्रांगण में एक काव्य संध्या "शब्दांजलि" का सफल आयोजन किया गया साथ ही प्रयागराज के तीन वरिष्ठ साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया। कुछ कवियों को आश्चर्य हुआ भी कि दिल्ली की संस्था प्रयागराज में आकर न केवल वरिष्ठों को सम्मानित कर रही है वरन लोकल कवियों का उत्साहवर्धन भी कर रही है। निश्चित प्रयागराज के कार्यक्रम की उत्साहजनक प्रतिक्रिया ने ये तय कर दिया कि संस्था हर वर्ष 28 मई को कार्यक्रम आयोजित करेगी।

         7 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम में तय हो गया कि 28 मई -2026 को संस्था द्वारा शिमला में कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। तुरन्त पवन शर्मा जी से सम्पर्क साधा गया और मॉल रोड पर स्थित रोटरी क्लब को बुक कर दिया गया लेकिन लेकिन लेकिन अचानक घोषणा हुई कि हिमाचल में 27,28,29 मई को पंचायत चुनाव के कारण कार्यक्रम सम्भव नहीं है। अब भाई साहब आनन फानन में 28 मई को दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी की और लो जी वेदांता रेस्टोरेंट मुनिरका को पूरे दिन के लिए बुक कर दिया गया। अच्छी बात ये है कि संस्था की अध्यक्ष का अवतरण दिवस भी 28 को है तो एक पंथ दो काज कहावत का पालन करते हुए सारी व्यवस्थाएं कर दी गईं।

         नौतपा के रंग में रंगे दिन को हमने ठेंगा दिखाने की चेष्टा करते हुए सुबह सात बजे ही घर छोड़ दिया। रैपिडो एवम् रैपिड ट्रेन को अपना माध्यम बनाते हुए ठीक 11.35 बजे मुनिरका मेट्रो 🚇 से उतरे। मेट्रो के वातानुकूल का आनन्द बाहर आते ही छू मंतर हो गया, भाई साहब धूप से अपने चेहरे और सर को बचाने की असफल चेष्टा की तो कानों में हल्की सी सरगोशी करती आवाज़ आई। क्यूँ बे मज़ा आया न हम नौतपा है बेटे दूई मिनिट में 90 मिनिट की ठण्डी गुल कर देते हैं। हमने पलटकर जवाब न देने में ही अपनी अच्छी वाली भलाई समझी और ग्यारह नम्बर का सद्पयोग करते हुए जा पहुंचे वेदांता रेस्टोरेंट। ठीक 11.40 पर दीप प्रज्ज्वलित किया गया फिर बर्थ डे गर्ल सन्तोष संप्रति जी ने 2021 से संस्था किए जा रहे कार्यों पर प्रकाश डाला। फिर व्यक्तिगत परिचय एवम् उपस्थित साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। बॉस एक बताना तो भूल इच गए 11.00 बजे से 1.00 तक सम्मान के साथ साथ खान पान लगातार चलता रहा। अब कार्यक्रम में कौन कौन पधारे है ऊपर पोस्टर में ख़ुदई देख लो महाराज।

         अब बारी थी कवि सम्मेलन का तो संचालन की जिम्मेदारी हमारे हिस्से आई और हमने समय की नज़ाकत को समझते हुए 5 कवियों को एक ग्रुप में रखकर आमन्त्रित किया और लो जी को तीन बजते बजते दो तिहाई कवि कविता पढ़कर अपनी अपनी कुर्सियों पर स्वादिष्ट भोजन का रसस्वादन करने लगे। मजे की बात तो यूँ हुई साहिब कि कइयों ने क्या पढ़ा ये तो उन्हें भी शायद पता न चला हो🤣🤣🤣🤣🤣 लेकिन भाई एक साहब आए और वो अपने वाले हैं न फ़िराक़ गोरखपुरी साहब उनकी ग़ज़ल को यूँ तो कइयों ने गाया होगा लेकिन नीना सिंह (जगजीत सिंह नीना सिंह) जो अपनी बुआ के बढ़िया वाले लमडे हैं की ग़ज़ल की ज़मीन पर इधर उधर से लपेटी ग़ज़ल कह डाली फिर जी नी भरा तो ग़ुलाम अली की ज़मीन इस्तेमाल करके फिर से ग़ज़ल ठोकी और ये जा और वो जा🤓🤓🤓🤓। लो आप भी देख लो:-

रात भी, नींद भी, कहानी भी / फ़िराक़ गोरखपुरी
 फ़िराक़ गोरखपुरी »
रात भी, नींद भी, कहानी भी
हाय, क्या चीज़ है जवानी भी

एक पैगाम-ए-ज़िन्दगानी भी
आशिकी मर्गे-नागहानी भी

इस अदा का तेरी जवाब नहीं
मेहरबानी भी, सरगरानी भी

दिल को अपने भी गम थे दुनिया में
कुछ बलायें थी आसमानी भी

मंसबे-दिल खुशी लुटाता है
गमे-पिन्हान भी, पासबानी भी

दिल को शोलों से करती है सैराब
ज़िन्दगी आग भी है, पानी भी

शादकामों को ये नहीं तौफ़ीक़
दिले-गमगीं की शादमानी भी

लाख हुस्न-ए-यकीं से बढकर है
इन निगाहों की बदगुमानी भी

तंगना-ए-दिले-मलाल में है
देहर-ए-हस्ती की बेकरानी भी

इश्के-नाकाम की है परछाई
शादमानी भी, कामरानी भी

देख दिल के निगारखाने में
ज़ख्म-ए-पिन्हान की है निशानी भी

खल्क क्या क्या मुझे नहीं कहती
कुछ सुनूं मैं तेरी जुबानी भी

आये तारीक-ए-इश्क में सौ बार
मौत के दौर दरमियानी भी

अपनी मासूमियों के परदे में
हो गई वो नजर सयानी भी

दिन को सूरजमुखी है वो नौगुल
रात को वो है रातरानी भी

दिले-बदनाम तेरे बारे में
लोग कहते हैं इक कहानी भी

नज़्म करते कोई नयी दुनिया
कि ये दुनिया हुई पुरानी भी

दिल को आदाबे-बंदगी भी ना आये
कर गये लोग हुक्मरानी भी

जौरे-कम कम का शुक्रिया बस है
आप की इतनी मेहरबानी भी

दिल में एक हूक सी उठे ऐ दोस्त
याद आये तेरी जवानी भी

सर से पा तक सुपुर्दगी की अदा
एक अन्दाजे-तुर्कमानी भी

पास रहना किसी का रात की रात
मेहमानी भी, मेजबानी भी

जो ना अक्स-ए-जबीं-ए-नाज की है
दिल में इक नूर-ए-कहकशानी भी

ज़िन्दगी ऐन दीद-ए-यार ’फ़िराक़’
ज़िन्दगी हिज़्र की कहानी भी

मर्गे-नागहानी= अचानक मौत
सरगरानी=गुस्सा मन्सब=मन्सूबा
सैराब=भिगोना शादकाम=भाग्यवान लोग
तौफ़ीक=काबिलियत शादमानी=खुशी
तन्गामा-ए-दिले-मलाल=दुखी दिल के थोडे से हिस्से में
देहर-ए-हस्ती=ज़िन्दगी का समन्दर बेकरानी=असन्ख्य
कामरानी=सफ़लता निगारखाना=जहां बहुत लडकियां हों
पिन्हान=छुपा हुआ खल्क=दुनिया तारीके-इश्क=मोहब्बत का इतिहास
दौर=वक्त, समय दरमियानी=बीच में नौगुल=नया फ़ूल
नज़्म=नया बनाना जौर=कहर पा=पांव सुपुर्दगी=समर्पण
तुर्कमानी=विद्रोही अक्स-ए-जबीं-ए-नाज़=किसी प्यारे का चेहरा
नूर=प्रकाश कहकशां=आकाश गंगा ऐन= असलियत में।

         अब आप ही सोच लो कित्ते समझदार लोग पड़े हैं दुनिया में। ठीक तीन बजे केक महाशय को लाया गया अच्छी बात ये थी की उसे काटने के स्थान पर केक को नमस्ते करके सबको बरोबर हिस्से में बांट दिया गया। सच कै रिया हूं भाई साहब बिना अण्डे का केक कटने से बच भी गया और सच कै रिया हूं मुझे तो केक भी फूल टू सनातनी नज़र आया। धूमधड़ाका नाच गाना काफ़ी देर तक चलता रहा। साढ़े चार बजे के क़रीब अन्तिम सत्र की कमान हमने फ़िर संभाली और बचे खुचे कवियों ने अपनी कविताई से माहौल को खुश गवार कर दिया। अन्तिम कवि के तौर पर हमारी बारी आई और हमने कुछ अलग करते हुए एक मुक्तक और एक ग़ज़ल युद्ध की विभीषिका से उपजे हालातों पर कोरे कागज़ पर अपनी उकेर दी अच्छी बात ये रही उपस्थित ने इसे सराहा भी। आप भी आनन्द लें।

मुक्तक 

जिसमें जितना रोष है बाक़ी ,वो उतना मदहोश 
लेकिन ये भी सच है खाली, होता उसका कोश 
भाग्य लिखे को कौन मिटाए, सुन लो तुम भी 'दीप'
रखता जो भी होश, वो पाता जीवन में सन्तोष 
        -प्रदीप डीएस भट्ट -26052026

“जंग किसी भी मसअले क़ा हल नही है”

जंग किसी भी मसअले क़ा, हल नही है
छिड़ गई बाक़ी किसी का, कल नही है

अब के भी बरसात, गर रुठी रही तो
पेड होंगे, पर लटकते, फ़ल नही है 

जिस तरह बर्बाद, धरती कर रहे हैं
क्या हमारा खुद से ही ये, छल नही है

दिन-ब-दिन आबादी, बढती जा रही है 
कल जो देखोगे, कहीं पर, जल नही है

खेत प्यासे बरसों से, बूँदों को तरसें
और नदी में प्यारी वो, कल-कल नही है

हाल में किस जी रहा, हलधर कहूँ क्या
कर्ज़ सर पे, हाथ में पर, हल नही है 

कल की खातिर, आज पेड़ों को सँवारो  
कल कहोगे हाय !, क्यूँ जंगल नही है

माना जीती जंग लेकिन, मन तो हारा
ये ख़ुशी क़ा आज, निश्चित पल नही है

हर तरफ दिखतीं है केवल, मुश्किलें ही 
क्यूँ निकलता, कोई इनका, हल नही है

क्यूँ परीशां हो रहे , तुम ‘दीप’बोलो
आसमाँ है छत, धरा हलचल नही है

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-24-02-2022

        अंत में राष्ट्र गान फिर विदाई 🎁 गिफ्ट और भैय्या हम भी निकल पड़े मेरठ की जानिब लेकिन जे क्या अभी 🚇 में बैठे ही थे कि इन्द्र देवता ने हल्की सी हवा के ठीक ठाक सी बारिश जो कि गाजियाबाद तक साथ साथ चली। फिर हमने बारिश को वहीं से टाटा बाय बाय कहा और लपक लिए मेरठ रैपिड की ओर।


प्रदीप डीएस भट्ट -31052006




Saturday, 30 May 2026

See no Evil जिमखाना या जिमखाला क्लब

Robert bear की क़िताब है see no evil जो कि 2002 में पब्लिश हुई है। बकौल राबर्ट बियर CIA का भारत की राजधानी दिल्ली सबसे सेफेस्ट हाउस अगर कोई था तो वो था जिमखाना क्लब 

Monday, 27 April 2026

"मी होर्मुज बोलतोय"

"मी होर्मुज बोलतोय"
(यानि रजिया गुंडों में फंस गई)

         रात के डेढ़ बजे के करीब मुबलिया घनघना उठा। हमने एक दूसरे से लिपटी अपनी टांगों को बेडवा से नीचे उतारा और साइड पर रक्खे स्टूल से मुबलिया पर मन ही मन बड़बड़ाते झपट पड़े कि ये कौन ससुर का नाती है जो इत्ती रात को हमारी नींद में खलल डालने की हिम्मत दिखा रहा है। जय राम जी करके पूछा आप कौन साहब हैं जो इत्ती रात को हमें घड़घड़ा दिए हो भाई उधर से सपाट स्वर उभरा "मी होर्मुज बोलतोय"। एक सेकेंड को तो हमारी डिबरी भी टाइट हो गई लगा कोई भूत है जो खाली टाइम में हमारी ख़ाली पीली फिरकी ले रहा है इसलिए हमने अपनी आवाज़ में चाटुकारिता की सभी प्रकार की मलाई लपेटते हुए हदों के अंदर रहते हुए मिमियाते हूं पूछा कौन होर्मुज जी। शायद होर्मुज को ऐसी उम्मीद नहीं थी इसलिए थोड़ा तल्खी लिए हुई आवाज़ आई बेटा हम ओमन और ईरान के मध्य मात्र 33 किलोमिटर लम्बे समुद्री गलियारे हैं फारस की खाड़ी से ओमन की खाड़ी को जोड़ते हैं। ये जो तुम अपनी स्कूटी चलाते हो न  इसमें डलने वाला तेल हमारे गलियारे से होते हुए ही तुम तक पहुंचता है और हां सुनो बे ये गैस LNG वाली तुम्हारे पेट वाली नहीं बे,ये भी हमीं से होकर तुम तक आती है समझे या और समझाऊं। हम कुछ कहते कि फ़िर से आवाज़ आई जरथूष्ट्र धर्म जानते हो अहुरा मज़दा हमारे देवता हैं उन्हीं से हमने नाम झटक लिया है, बेटा दुनिया का 20 से 30 प्रतिशत और एक करोड़ बैरल प्रतिदिन तेल हमारी छाती को चीरकर तुम सब तक पहुंचता है। और हां आखिरी बात फ़ारसी में तंगेह ए होरमोज कहलाते हैं हम।

         हमने अपने बरबंटो को अच्छी तरह खोलते हुए पूछा महाराज जे तो बताइए आप हमसे चाहते क्या हो। होर्मुज महाराज की हूं की आवाज़ आई फ़िर बोले देखो प्रदीप बाबू "भैंसों की लड़ाई में झुंडो का नुक़सान" हो रहा है पूरी दुनिया त्राहिमाम त्राहिमाम कर रही है। ये ट्रंप तो अमेरिका की पूरी इमेज़ के साथ बेइज्जती करवाकर ही मानेगा जहां तक इजरायल का सवाल है उसने अपना उल्लू सीधा कर लिया है। जहां तक प्रश्न ईरान का है तो इतने सारे नेताओं के मरने के बाद भी वो युद्ध युद्ध खेलने में मज़ा ले रहा है उसे अपने आवाम की चिंता बिलकुल भी नहीं है। अब ये सब कुछ गंवाकर होश में आयेगा तो क्या ही उखाड़ लेगा। लेकिन इन सब की गुंडई का खामियाजा मुझ अकेले को भुगतना पड़ रहा है। ट्रंप तो हुड़कचुल्लू है और नेतन्याहू शातिर लोमड़ी के दिमाग़ वाला और ईरान उसे आग की भयावता का अंदाजा है मगर वो अपनी बेवकूफाना हरकतों से आग को आग से बुझाने की कोशिश कर रहा है। मैंने मज़े लेने के लिए पूछ ही लिया और पाकिस्तान वो जो शान्ति शान्ति खेल रहा है उसके बारे में तो भाई साहब कुछ विशेष टिप्पणी तो कीजिए।होर्मुज झुंझलाहट से बोले "बुड्ढा मरे या जवान इसको हत्या से काम"। फ़िर एक गहरी स्वांस लेकर होर्मुज बोले हमने इसलिए फ़ोन किया कि तुम पहली फुर्सत में कल ही हमारे ऊपर एक व्यंग्य में हास्य का तड़का लगाते हुए एक आलेख लिख मारो नई तो बाक़ी का तो पता नहीं पर तुम्हारे पेट की गैस का इलाज़ हम परमानेंट कर देंगे। ये तो सीधे सीधे लॉरेंस विश्नोई की धमकी सी लगी सो सपना देख रही आँखें एक झटके में खुल गईं। हमने राम जी का नाम लिया और होर्मुज की चेतावनी को सीरियसली लेते हुए अगले दिन विस्तार से आलेख का खाका खींचना प्रारम्भ कर दिया। अब इत्ती प्यारी से धमकी के बाद नींद तो आने से रही न महाराज। लेकिन होर्मुज भाई साहब की रूदाली से ऐसा लगा कि आज की तारीख़ में होर्मुज उर्फ़ तंगगेह ए हार्मोज से सही सलामत जहाज़ निकालना ऐसा ही है जैसे जॉइंट फैमिली में एक पति अपनी को देने के लिए बाज़ार से कुछ लाए और पूरे परिवार की सीसीटीवी नुमा बनी आंखों में धूल झोंकते हुए सही सलामत वो सामान बीवी के हवाले कर पाए।

         सो मसला यूं है कि इजरायल ने अमेरिका को पपीते के पेड़ पर चढ़ा दिया कि भैय्ये यो जो ईरानवा है न ससुरा 460 किलो यूरेनियम संवर्धन करके बैठा है क्या पता कब परमाणु परमाणु खेलने लगे इसीलिए अगर तुम्हें अपनी चौधराहट सलामत रखनी है तो पहली फुर्सत में इसको पेल दो नई तो भविष्य में ये तुम्हे रगड़ देगा। ट्रंप जो भयंकर वाले अन्प्रिडेक्टेबल हैं ने घूरकर नेतन्याहू को देखा फिर आधे गुस्से और आधी हंसी हंसते हुए कहा अबे अभी जुलाई में तो पेला था संसुरा ठंडा हुआ पड़ा है काहे मरे हुए को मरवाते हो बे। नेतन्याहू ने खींसे निपोरते हुए कहा तुम भी न बुढ़ापे में सठिया गए हो ट्रंप बाबू। देखो ऐसा है तुमने जो जुलाई में ईरान को पेला था वो तो टीजर मात्र था अच्छा एक बात बताओ तुमने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कुल कितनी लड़ाई जीती है, वियतनाम, कोरिया ,इराक़, अफगानिस्तान अबे सारी की सारी लड़ाई तुमने हारी हैं लेकिन हार कर भी तुम जीतते हो सोचो भला क्यूँ , सोचो सोचो महाराज। देखो हर लड़ाई हारने के बाद अमेरिका का रक्षा उद्योग आगे पीछे की सारी कसर पूरी कर देता है। यानि तुम्हारा और दुश्मन देश का पुराना गोला बारूद मिसाइल सब ख़त्म फिर नया उत्पादन और भइया अमेरिका नया माल बनाकर बेचकर अगली पिछली सब कसर निकाल लेता है तो फिर से सोचो अर्जुन रूपी ट्रंप और ईरान का नाम ओ निशान मिटा दो। फिर मैं तो हूं न इधर से तुम इधर से मैं भाई साहब मिलकर ईरानवा का कचूमर बना डालेंगे। ट्रंप ने आखिरी प्रश्न दागा ठीक है है। हमला तो कर दूंगा लेकिन कोई कारण भी तो चाहिए।  नेतन्याहू शातिराना मुस्कान बिखेरते बोले "ड्रिल बेबी ड्रिल" और बस ट्रंप ने कह दिया यलगार हो और लो जी 28 फ़रवरी इतिहास में दर्ज हो गई।

         बिना विचारे जो करे वो पाछे पछताए, सुना है न आपने अब उधर से अमेरिका और उधर इजरायल दे दना दन शुरू। सभी को लगा हफ़्ते भर की जंग में ईरान हांफते हुए अमेरिका और इजरायल के आगे लम लेट हो जाएगा लेकिन लेकिन लेकिन ईरान ने जब पेलना शुरू किया तो ईरान से 2300 किलोमीटर दूर इज़रायल को अपनी ग़लती का अहसास हुआ कि उसने ग़लत जगह पंगा ले लिया है लेकिन बाज़ी तो हाथ से निकल चुकी थी सो मरता क्या न करता उसने ईरान की नाजायज औलाद को उधेड़ना शुरू कर दिया यानि हिजबुल्लाह जिसने लेबनान पर कब्ज़ा किया हुआ है। अब हिजबुल्लाह की जान तो ईरानी तोते में है सो ज़ाहिर सी बात है ईरान सकपकाया भी सबकबाया भी और फिर से उसने दे दना दन शुरू और अमेरिका के इजरायल भी और ज्यादा गहरी चोट खाने लगा। जल्दी ही ईरान को समझ आ गया कि इज़रायल और अमेरिका से निपटना इतना आसान नहीं है सो उसने एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस के तहत बिना किसी चेतावनी के अमेरिका के सैनिक अड्डों पर जो कि बहरीन, ओमन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात इराक़ व सीरिया में दीपावली का धूम धड़ाका करना शुरू किया बस यही बात अमेरिका को खल गई कि मारना है तो इजरायल को मारो मेरे अड्डे पर बमबारी क्यूँ मैं तो छोटा सा नन्हा सा शैतानी बच्चा हूँ। 

         युद्ध में सब कुछ जायज़ है ये ईरान ने अमेरिका को अच्छी तरह से समझा दिया वैसे भी ईरानियन तो बीस बरसों से अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग की तैयारी कर रहे थे उन्हें पता था कि अमेरिका लंपट बाज़ी जरूर करेगा सो उसने अमेरिका को वहां वहां ठोका जहां अमेरिका की नस दबी हुई थी । जिस गति से युद्ध लड़ा जा रहा था उससे ज्यादा तेज़ गति से ट्रंप भाई साहब की ज़बान। रोज़ रोज नए नए दावे ईरान ख़त्म और ही पल ईरान फिर अमेरिका पर तिरछी चोट कर देता। अब हालात ये कि इस युद्ध में इज़रायल एक तरह से गायब हो गया और ये युद्ध अमेरिका बनाम ईरान होकर रह गया। यानि "हींग लगी न फ़िटकरी और रंग आ गयो चोखा " जय हो नेतन्याहू बाबा की। ट्रंप बोलते रहे और ईरान ठोकता रहा। युद्ध की शुरुआत ईरान में रिज़ीम चेंज करने को लेकर थी बाद में सबको समझ आ गया ये तो तेल का खेल है। फ़िर तेल के चक्कर में अमेरिका का जब कुछ ज़्यादा ही तेल निकलने लगा तो ट्रंप महाराज आएं बाएं शाएं बोलते हुए कभी युद्ध जीत गए, कभी अमेरिका ने अपना टार्गेट अचीव कर लिया कभी होर्मुज से हमारा तेल नहीं आता है जिसका आता है वो देश खुलवा ले। मतलब कुछ भी यूरोप को भद्दी भद्दी गालियां और अंत में आख़िरी पासा पहले ईरान होर्मुज खोले तब समझौता होगा, फिर एक तरफ़ा युद्ध विराम लेकिन धमकी निरन्तर। आख़िर ये चल क्या रहा है होर्मुज बाबू।

         सबसे अजीब स्थिति तो पाकिस्तान ने पैदा कर दी है होर्मुज होर्मुज खेलते ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध विराम की बिसात नम्बर एक आतंकवादी देश पाकिस्तान करवा रहा है। पाकिस्तान को भी पता है अमेरिका उसे बलि का बकरा बना रहा है लेकिन उसकी मज़बूरी है भाई उसका कशकोल खाली है देश कैसे चलाए या ख़ुद का खर्चा कैसे निकाले सो उसे लग रहा है इसी बहाने अमेरिका कुछ डॉलर उसके काशकोल में डाल दे तो कुछ बात बने। लेकिन लेकिन लेकिन होर्मुज बेचारा क्या करे। अच्छा खासे 100 जहाज़ रोज़ उसे सलाम करके निकल रहे थे लेकिन अब सलाम तो छोड़ो कलाम भी न हो रहा ऊपर से उसकी छाती पर कभी गोला गिर रहा है कभी नन्नक वाली मिसाइल। इस चक्कर में कभी इसका जहाज़ कभी उसका जहाज़ उसके पेट में अलग से समाए जा रहा है। इस युद्ध के चक्कर में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की रेटिंग शेयर मार्किट की तरह नीचे गोते लगा रही है। सुना है परसों ट्रंप पर किसी ने हमला कर दिया है। भई जे कैसा चाचा चौधरी है जो अपनी रक्षा न कर पा रहा और दूसरों को बता रहा है रिज़ीम चेंज करो और लोकतंत्र बचाओ। भाई साहब इस बिचारे लोकतन्त्र की हालात भी इस होर्मुज की ही तरह हो गई है। कहीं एक दिन लोकतन्त्र भी न कहे "मी लोकतन्त्र बोलतोय"।

प्रदीप भट्ट 
व्यंग्यकार, मेरठ 

         

Wednesday, 8 April 2026

"एक्सीडेंटल एंकर"

कार्यक्रम के 23=24 साल बाद 
रिपोर्ताज, चलेगा न 

"एक्सीडेंटल एंकर " 

"आगाज अच्छा है तो फिर अंजाम की, परवाह किसे है 
सूरज दिखाए रास्ता फिर शाम की, परवाह किसे है "

         अब देखो न ये बरसतिया भी मार्च तो छोड़ो अप्रैल में भी पिंड नहीं छोड़ रही। कल ही खबर मिली है कि इस बार अल नीनो भाई साहब की सक्रियता के चलते बरसात जून के बाद कम होगी I यानि समान्य से कम। हम भी खाली बैठे क्या करते सो पुरानी अल्बम ही टटोल बैठे और वहाँ मिले तीन चार ठो फुटवा. भाई साहब बाहर बारिश और कमरे के अन्दर बैठे हम और फिर मिले एल्बम के अन्दर फोटो, बस बन गया मुड और 23,24 बरस की घटना का स्मृति के आधार पर रिपोर्ताज तैय्यार I  जे हुई न बात।

         आप सोच रहे होंगे ये क्या शीर्षक दे दिया भाई ने I  तो हुज़ूर बात है यही कोई 2002-2003 की ,उस बख्त हम दिल्ली में ड्यूटी बजाते वो भी भारत सरकार की प्रोटोकॉल ऑफिसर/लाइजिनिंग। कभी इस मिनिस्ट्री कभी उस मिनिस्ट्री शाम को वापिस अपने दड़बे में। तो हुआ यूँ कि हमारे डिपार्टमेंट अजी जनाब Khadi &Village Industries Commission के हिस्से में सितम्बर माह में हिन्दी की बिंदी लगाने के लिए एक कवि सम्मेलन का आयोजन आया।

        दिवंगत सरला माहेश्वरी जी जो दूरदर्शन की बढ़िया वाली न्यूज रीडर रहीं,KVIC के हर कार्यक्रम में बतौर ऐंकर उपस्थित रहती थी। ख़ैर इंतजामात हुए और चार कवियों को 360 डिग्री मीडिया के खुराना जी( पूरा नाम याद नी आ रहा है मियाँ) द्वारा आमंत्रित भी कर लिया गया I  दिल्ली का हैदराबाद हाउस वैन्यू भी निर्धारित हो गया I डेट तो मुझे याद न आ री लेकिन शाम सात से प्रोग्राम शुरू होना था I और भाई साहब उसी समय लगभग 6 सवा 6 बजे राम जी ने ऊपर के सभी नल खोल दिए और बरखा रानी ने ऐसा धूम धड़ाका किया कि बाहर खड़े IP VIP  सब हॉल के अन्दर I चेयरमैन डॉक्टर महेश शर्मा, chief executive officer बसु जी भी पधार चुके थे मिनिस्ट्री से भी राज्य मंत्री के अतिरिक्त सभी आमंत्रित अतिथि बारिश की रफ्तार देखते हुए समय से पहले ही अपना स्थान ले चुके थे।
      
         थोड़ी अव्यवस्था जरूर हो गई थी। आमंत्रित दर्शकों का इंतजार हो रहा था तभी ख़ुद को बौछारों से बचाते हुए पद्मश्री अशोक चक्रधर,ओम प्रकाश आदित्य और बाकी दो कवि भी बरसात की नजाकत को समझते हुए सीधे हॉल में मैंने और अन्य ने उन सभी को गर्मा गर्म चाय पिलाकर थोड़ा गर्म किया फिर मैं उन्हें उनके स्थान पर बिठाकर व्यवस्था में लग गया।लगभग 7.00 बजे हमारे डायरेक्टर एस पी सिंह जी मुझे ढूंढते हुए हॉल में पहुंचे और बिना भूमिका बांधे हुए बोले " देख भाई प्रदीप सरला जी तो आने की ना हैं,वो तो बारिश में फंस गई हैं उनकी गाड़ी ख़राब हो गई है I चेयरमैन साहब ने बोला है प्रदीप को बोलकर कवि सम्मेलन शुरू करो I मैं एक दम से अचकचा गया फिर बोल दिया सर ऑफिस के प्रोग्राम में एंकरिंग करना अलग है देखो तो सामने कौन बैठे हैं I मेरे और सिंह साहब के बीच होती बातचीत को देखते हुए चेयरमैन साहब ख़ुद सीट से उठकर आए और सीधे बोले प्रदीप चलो प्रोग्राम शुरू कर वाओ। मैंने तुम्हें कविताएँ पढ़ते देखा है, और जाकर बैठ गए वापिस अपनी सीट पर I 

         कोई और चारा न देखकर मैं सीधे अशोक चक्रधर जी के पास गया और समस्या बताई। उन्होंने कंधे पर हौले से हाथ रखकर हौसला अफजाई की और कहा कोशिश करो सब हो जाएगा। आप कवियों का परिचय पढ़कर माइक् मेरे हवाले कर दें बाक़ी मैं सम्भाल लूँगा I  मैंने भी लाइन से सब भगवानों को स्मरण किया और लो जी सब कुछ ठीक ठाक से निपट किया I  घर आकर उस शाम बनी स्थिति पर एक शेर लिखा और सो गए I  फिर अगले चार सालों तक ऐंकर की  भूमिका निभाते रहे फ़िर मुंबई पोस्टिंग हो गई और हमने भी एंकरिंग से दूरी बना ली। कारण स्पष्ट है दोस्तों जिस काम को करने में सहजता न हो वो करना ही क्यूँ है। और कुछ तो याद न आ रिया है I 
        अब बस भैय्या थोड़े लिखे को ज्यादा समझना।

-प्रदीप डीएस भट्ट -08042026

Monday, 6 April 2026

"गोबर इकॉनमी"

गोबर इकोनॉमी "धूप पर टैक्स" 
सोलर सिस्टम लेना है तो 
नेप्रा से लाइसेंस लेना होगा 
Ipp की मंहगी बिजली कौन खरीदेगा 


         भारत जब 1947 में स्वतंत्र हुआ तो भारत की इकोनॉमी कृषि आधारित थी। ऐसा इसलिए कि भारत की 80 प्रतिशत जनता गांवों में निवास करती थी सो भारत सरकार किसानों का हित पहले देखती थी बाक़ी का भी ख्याल रक्खा जाता था किन्तु परन्तु लेकिन गांव पहले गांव का किसान पहले।  20% शहरी आबादी का जहां तक ताल्लुक़ है तो कपड़े के मिल कुछ कल कारखाने बैलेंस करने के लिए काफ़ी थी। दिल्ली जहां राजनीति का अखाड़ा थीं वहीं मुम्बई सपनों की नगरी का ताज पहनकर लोगों को ख़्वाब देखना सीखा रही थी जो कुछ बच गए और फ़िल्मों में कुछ न कर पाए वे बिचारे पहले नौकरी और फिर छोकरी पाने के पीछे ही अपनी जिन्दगी निकाल देते थे। बाक़ी शहरों का तो पता नहीं लेकिन मद्रास, हैदराबाद, बैंगलोर और भाई साहब कलकत्ता का कमोबेश हाल ऐसा ही था। चीन हमसे बाद में आजाद हुआ लेकिन नब्बे के दशक में उसने तरक्की की ऐसी राह पकड़ी कि क्वार्टर सेंचुरी पूरी करते करते वो विश्व की दूसरी अर्थव्यवस्था बन गया और 2025 आते आते 20 करोड़ ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनकर आस पास के छोटे मोटे देशों को बिना डकार लिए हज़म करता जा रहा है।

         जहां तक अपने देश भारत का ज़िक्र है सच्ची बता रिया हूं 2014 के नेतृत्व परिवर्तन के बाद विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है और तीसरे पॉयदान की ओर मजबूती से क़दम बढ़ा रहा है। 12 बरस में छः अंकों की छ्लांग लगाना आसान काम नहीं है लेकिन मानो न मानो भारत ने ऐसा कर दिखाया है। भारत में लगभग 14.5 करोड़ गाय ,10.98 करोड़ भैंस, 14.88 से 15.4 करोड़ के लगभग बकरी, 7.42 करोड़ के लगभग भेड़ हैं और आबादी चलो फिलहाल 140 करोड़ ही मान लो वो क्या है न 1अप्रैल से जनगणना जो शुरू हो गई है। अब ज़्यादा मगजमारी करनी तो म्हारे बस की न है पर मोटा मोटी पकड़ो तो दुग्ध, दही, मक्खन, देसी घी और छाछ भाई साहब कोई कमी न है और कम पड़ जाएगी तो अनपढ़ किसान समझने की भूल करने वालों ध्यान से सुनो ये वही किसान है जो भारत के नागरिक को ज़्यादा गाढ़ा दुग्ध पीने से रोकता है और सवेरे सवेरे दुध में शुद्ध पानी मिलाकर बंदों का हाजमा ठीक रखता है। कुछ किसान तो और भी ज्यादा समझदार हैं पता नहीं कहां कहां से नई तरकीबें खोजकर दुग्ध, पनीर, खोया बना डालते हैं और हम भी बिना डकार के सब कुछ हज़म कर जाते हैं। सड़े हुए तेल के भटूरे खाने वाले का ये मिलावटी आइटम क्या ही बिगाड़ लेगा जी। और बिगाड़ कर करेगा भी क्या हम तो मुनाफे के लिए भगवान तक को नहीं बख्शते डेढ़ सौ रूपये किलो वाला पूजा वाला देसी घी, मिलावटी तिल के तेल से दीया बाती करते भक्त जन सोचते हैं जब हम शुद्ध नहीं खा रहे तो तुम्हें ( भगवान जी को) कहां से शुद्ध खिलाएंगे। अच्छी बात ये है कि भगवान जी समझदार हैं, माया तो उन्हीं की है सो एडजस्ट कर लेते हैं।


वहीं पाकिस्तान में लगभग छः करोड़ गाय, 4.02 करोड़ भैंस, 8.3 करोड़ बकरियां व 3.27 करोड़ भेड़े हैं।

Tuesday, 31 March 2026

एक पंथ दो काज

रिपोर्ताज 

         आपने एक कहावत सुनी होगी "एक पंथ दो काज" तो भैय्या हुआ यूँ के मेरठ के प्रतिष्ठित कॉलेज मेरठ कॉलेज जिसकी स्थापना 1892 में हुई यानि 134 बसंत देख चुके खूबसूरत और पुराने कॉलेज और इसका फ़ैलाव भाई साहब पूरम पट्ट 106 एकड़ में। महराज इत्ते में तो कम से कम दो यूनिवर्सिटी बन जाएं। अंग्रेजों के जमाने में लाल पत्थर से बना पूरा कॉलेज अपने आप में एक अद्भुत कृति है। ये विषय अलग कि नये बनाए गए भवनों में यहाँ वहाँ कुछ उघाड़े हुए पलस्तर अपनी दयनीय स्थिति पर खुदई ठहाका मारकर हँसते हुए दिखाई देते हैं। 10 विभागीय पुस्तकालय, कुल 31 प्रोगशालाएं, (अठ्ठासी) 88 अध्ययन कक्ष और दो सभागार यानि कुल मिलाकर पठन पाठन के लिए एक आदर्श स्थान। अब 134 बरस पहले जब इसकी स्थापना हुई होगी तो आने जाने में लोगों को डर लगता होगा। अरे भईया डर तो लगेगा न। नीरा जंगल रहा होगा। बैल गाड़ी, इक्का दुक्का साईकिल और एक आध फटफटीया बस इतना ही सामान होगा कच्ची पक्की सड़कों पर। और आज तो इसकी लोकेशन प्राइम हो गई लगता है असली मेरठ यहीं है बाक़ी सब तो चाय कम पानी।

         तो फिर से हुआ यूँ के प्रोफेसर रेखा राणा जी ने फोन पर हमसे हमारी प्रोफाइल भेजने को कहा। लो जी हमने कम लिखे को ज़्यादा समझना की तर्ज़ पर प्रोफाइल भेज दी और अगले दिन उन्होंने हमें निर्णायक की भूमिका के लिए लॉक कर दिया। अगले दिन वाट्सअप पर पत्र की प्रति के साथ में हमारी स्वीकृति की गुज़ारिश भी। तो लो भाई साहब 27 मार्च समय ग्यारह बजे भी निर्धारित हो गया। लेकिन जे क्या योगी जी ने 26 मार्च अष्टमी और 27 मार्च की नवमी को भी सरकारी अवकाश घोषित कर दिया। दोपहर में रेखा जी का फ़ोन सर कार्यक्रम 27 की जगह 30 को होना निश्चित हुआ है। तकलीफ़ के लिए माफ़ी। कोई गल्ल नी जी ऐसी स्थिति से तो हम कई बार दुई चार हुए हैं। 29 को फिर फोन सर दूसरे निर्णायक किन्हीं कारण वश आने में असमर्थ हैं। आप कुछ कर सकते हैं। ऐसा पहले भी घटित हो चुका है सो सधे हुए अंदाज़ में हमने सजेशन दे डाला आप अपने या अन्य किसी डिपार्टमेंट से किसी को साथ बिठा दीजिएगा बाकी हम संभाल लेंगे। हां सर ये ही ठीक रहेगा कहते हुए उन्होंने फोन रख दिया।

         अब ऐसा है न हर सरकारी संस्था का हाल यही है वित्तीय वर्ष के अंतिम माह के अंतिम दिनों में ही सबको सब कुछ करना होता है। नहीं हो पाया तो बजट लेप्स और अगले साल उतना ही बजट कम मिलना है सो प्रोफ़ेसर बच्चों को पढ़ाएंगे भी, और जितने काम निर्धारित हैं के अतिरिक्त संस्कृति का समन्वय भी करेंगे। स्टाफ कम है लेकिन करना तो पड़ेगा ही। सो मैं रेखा जी की मज़बूरी समझता हूं। सो भैय्या अपनी आदत अनुसार हम तो पंद्रह मिनिट पहले ही डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन पहुंच गए पता चला जिन बच्चों को सहभागिता करनी है वे एग्जाम में बिजी हैं, बारह बजे छूटेंगे। चाय पानी के बाद रेखा जी ने गुज़ारिश की कि सर यदि आपत्ति न हो तो तब तक दूसरे प्रोग्राम का शुभारंभ कर आएं। मना करने का तो सवाल ही नहीं होता सो डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स पहुंच गए। पता चला नेचुरल फोटोग्राफी की प्रतियोगिता है। स्टूडेंट्स मेरठ कॉलेज के कॉर्नर चुनेंगे और फ़ोटो क्लिक करके जियो टैग के साथ डेढ़ घंटे में सब्मिट करेंगे। ख़ैर कार्यक्रम का शुभारंभ किया, चाय नाश्ता फिर अपने निर्धारित कार्यक्रम स्थल में। 

         लगभग 12.40 पर कार्यक्रम शुरू हुआ, दीप प्रज्जवलन फिर मान सम्मान की प्रक्रिया अन्ततः, मौर्य जी के साथ निर्णायक की भूमिका में आ गए। कुल आठ प्रतिभागियों ने रचना पाठ किया के अतिरिक्त लॉ स्टूडेंट सुगंध सक्सेना जो कि चेहरे के पैरालिसिस से पीड़ित थी ने अलग से कविता प्रस्तुत की। कविता अच्छी थी किंतु उस लड़की को कविता पढ़ते हुए बोलने में जो पीड़ा हो रही थी उसकी हिम्मत के लिए मैंने उसे अपनी तरफ़ से आशीर्वाद स्वरूप लिफ़ाफ़े....रेखा जी के संग सम्मानित किया (चित्र में देख सकते हैं) निश्चित आत्मा को सन्तोष प्राप्त हुआ अब जे जरूरी थोड़े है कि सिर्फ़ लिफ़ाफ़ा लिया ही जाए भाई साहब लिफ़ाफ़ा देने का भी अपना आनन्द है। ख़ैर  सुगंध  की जिजीविषा को प्रणाम! अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि निर्णायक सिर्फ़ निर्णय देवें सो फरमाइश पर कविता भी पढ़नी पड़ी लेकिन सुगंध सक्सेना की जिजीविषा को प्रणाम करते हुए जो पढ़ा उसका आनन्द आप भी लें।

“व्योम के ओम”

जब लक्ष्य किया निर्धारण तब,
रखा मक़सद मंज़िल पाना।
अच्छे बच्चों क़ी आदत है,
पढ़ते पढ़ते ही सो जाना॥

खाने पीने का ध्यान नहीं,
ना लेते ये विश्राम कभी ।
शादी हो या कोई जलसा,
नही फिक्र कभी करता कलवा
उसकी आँखों में स्वप्न कई
रखता ध्येय बस पढ़ते जाना॥

        अच्छे बच्चों की आदत.....

रखते हैं गुरु का मान सदा,
तीनों लोकों का इन्हें पता।
कक्षा में ये अव्वल आते,
उपहार गुरु से भी पाते
रकना न कभी भी सीखा है
सीखा है बस चलते जाना॥

       अच्छे बातों की आदत.....

ये साक्षात सत के प्रहरी,
रखते हैं सोच सदा गहरी।
हिम शिख छू लेना लक्ष्य प्रथम
गुरुओं से सीखी विद्या प्र्थम
ये पेड चढे या फिर पर्वत 
सीखा है सदा चढ़ते जाना॥

       अच्छे बातों की आदत.....

ख़ुश रहते मात पिता इनसे,
लेते हैं मित्र सलाह इनसे
निश्च्य होता है इनका सही
पीछे ना मुड़ के देखा कभी,
जैसी दृष्टी वैसी सृष्टी
मिले मोड मगर सीधे जाना॥

         अच्छे बच्चों की आदत....

किसमें इतना है साहस जो,
पथ इनका बढ अवरुद्ध करे।
मार्तण्ड तेज है मस्तक पर,
अरि आगे आने से भी डरे
अवनी सबकी पालन कर्ता
सीखा है व्योम में मिल जाना॥

         अच्छे बच्चों की आदत....

होली के रंग ना भाते इन्हें,
ना दीवाली की फुलझडियाँ।
ये उर्ध्वलोक पाना चाहते,
तैय्यारी पूर्ण कर के आते
दूजे का जीवन रोशन कर
इच्छा ‘प्रदीप’ है बन जाना॥

                                                                     - प्रदीप देवीशरण भट्ट -11:02:2020

         अशोक जी ने जहाँ संचालन किया वहीँ रेखा जी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत कर कार्यक्रम संपन्न होने की घोषणा की। अंत में सामुहिक चित्र फिर कुछ बच्चों के सवालों का जवाब देते हुए विदाई ली। तभी रेखा जी का फ़ोन घनघना उठा उन्होंने मुस्कुराते हुए हमारी तरफ़ देखा, हम भी मुस्कुरा उठे और चल पड़े पुनः डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स की ओर। अच्छी बात ये थी कि उस कार्यक्रम के दोनों निर्णायक आ चुके थे, सो पुनः स्टेज़ शेयर किया और बच्चों के साथ यादगार पल की तस्वीरें मोबाइल में कैद की। अब हमने रेखा जी से विदा ली और एक खूबसूरत दिन की यादें समेटे घर की ओर चल पड़े।

प्रदीप डीएस भट्ट -31032026

Thursday, 12 March 2026

"दिल्ली का ज़िंदा गाँव"

रिपोर्ताज 

        "दिल्ली का ज़िंदा गाँव"

         अगर मैं मोटा मोटी कहूं तो दिल्ली का इतिहास लगभग 5000- 5500 सौ वर्ष पुराना है यानि महाभारत काल से मान लिया जाए तो दसवीं शताब्दी में तोमर वंश के राजा अनंगपाल ने इसे बसाया उसके बाद चौहान 's फिर दिल्ली सल्तनत फिर मुग़लस फिर अंग्रेज आए जिन्होंने 1911 में कलकत्ता से राजधानी उखाड़ी और वापिस दिल्ली में स्थापित कर दी। अब भैय्या इससे पहिले यानि कि 5000 साल पहले का इतिहास तो राम जी जाने। किशन जी तो द्वापर में हुए और इसी कालखंड में हुए कौरव भी और पाण्डव भी। जहां तक हमारा प्रश्न है तो महाराज हमने तो इस हसीन दिल्ली को 1980 से अपना मित्र बनाया वो भी बढ़िया वाला😊। कहीं भी नैन मटक्का कर आवें पर भाई साहब जो मज़ा दिल्ली की गोद में बैठने का है वो और कहीं कहां। डी टी सी बस एक मात्र सहारा होती थी उस समय हमारी घुमक्कड़ी का।  चालीस पैसे का टिकिट न खरीदना पड़े उसके लिए क्या क्या जतन नहीं किए।🤓🤓🤓

         1961 में जहां दिल्ली में 300 गाँव होते थे वहीं 2011 आते आते उनकी संख्या सिकुड़कर 112 रह गई थी अब तो दिल्ली में शायद इक्का दुक्का गांव ही बचे हों वो भी 2027 की जनगणना तक शायद विलुप्त न हो जाएं। मियां जी सरकारी भाषा में इसे ही तो विकास कहते हैं 🤣🤣🤣🤣🤣। तो भाई साहब उन्हीं 112 गाँव में से एक मुनिरका गांव की सन्तोष सम्प्रति जो साहित्य सृजन कुटुम्ब संस्था की संस्थापिका अध्यक्ष हैं और हम संस्थापक मंत्री। फ़ोन पर ही गुफ़्तियाए😁😁😁😁😁 और तय हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर कार्यक्रम आयोजित किया जाए लेकिन कुछ अलग अंदाज़ में। वोडा फ़ोन वाले आइडिये का तो पता नी चल रहा है या नहीं लेकिन अपना आइडिया निकल पड़ा। अब भैय्या लिखने पढ़ने का काम तो टीचर जी ही बढ़िया कर सकती हैं सो 1 मार्च के प्रोग्राम में जब हम पटेल चौक, द्वारका मोड़ मिले तो उन्होंने कार्यक्रम का पूरा खाका प्रस्तुत कर हमें चमत्कृत कर दिया और 7 मार्च को उसे जमीन पर उतार भी दिया। अब संतोष जी के काम का तरीका ऐसा ही है यानि फास्ट टैग से भी तेज़।

         सो हुआ यूँ के हम 7 को सुबह सुबह निकले। रैपिड 🚇 के सहारे दरिया गंज हंस पत्रिका के ऑफिस लेकिन अफसोस साहब दिल गड्ढे में। हल्के हल्के पसीने में तर बत्तर होते हुए ढूंढ़ते ढांढते जब हम हंस पत्रिका के कार्यालय पहुंचें तो वहां बड़े से शटर के ओर लटके हुए बड़े से ताले🔐 में ने हमें मुँह चिढ़ाते हुए पूछा "काला  हंस - काला हंस" यहां कैसे। अब समझ नी आया वो ये उद्बोधन हमारी शक्ल देखकर दे रहा था या हमारे कहानी संग्रह "काला हंस" को। और भई ये काला हंस- काला हंस दो बार क्यूँ बोला कहीं उसमें किक फिल्म के करेक्टर नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की आत्मा तो नहीं घुस गई। जो दो बार बोलता है पोलैंड पौलेंड। हमने भी खीजते हुए पूछ ही लिया अबे तुम शनिवार को कैसे बंद हो बे? तो भाई साहब शटर के दूसरी ओर लटके हुए ताले 🔐 🔐 🔒 के जुड़वां भाई ने गुस्से से अपनी छेद रूपी आँख को नीला पीला करते हुए कहा क्यों बे सरकारी छुट्टी का मज़ा क्या तुम ही लोगे चच्चा। हम भी तो फिर आगे के शब्द उसने चिढ़ाने के उद्देश्य से हवा में तैरने के लिए छोड़ दिए। हम खिसियाए हुए से अपनी तशरीफ़ का टोकरा वापिस मोड़ते हुए खरामा खरामा दिल्ली गेट 🚇 की ओर लपक लिए।
  
         एक बात कहें वैसे कई बार कह चुके हैं फ़र्क तो किसी पे पड़ता नहीं फिर भी एक बार और सुन लो भाई साहब समय के कुछ ज़्यादा ही पाबंद हैं हम सो ठीक 2.10 पर सन्तोष जी के घर जा पहुंचे। 💦 पानी पिया और सामान लेकर मुनिरका गांव की टेढ़ी मेढ़ी गलियों से पहचान करते हुए पिलर वाले समुदाय भवन जा पहुंचे। कुछ व्यवस्थाएं हमने मिलकर ठीक की और धीरे धीरे प्रतियोगी आने लगे। स्टूडेंट की मम्मियां, गाँव की महिलाएं वो भी पूरे टशन के साथ, निर्णायक मण्डल और कुछ कवि मित्र। दीप प्रज्ज्ववल, सरस्वती वन्दना, निर्णायक मण्डल , कवियों का आदर सत्कार फिर गर्मा गर्म चाय पकौड़े। ठीक 4.35 पर महिलाओं के लिए आयोजित नारी शक्ति संगम प्रश्नोत्तरी जिसमें 75 प्रश्न 75 अंक एवम् समय पूरम पट्ट एक घंटा। पुरस्कारों में प्रथम 3100/-, द्वितीय 2100/- व तृतीय 1100/-  निर्धारित था। मुनिरका गाँव की ही एक महिला जो यू ट्यूबर है ने पूरा कार्यक्रम फ़ेसबुक पर लाइव किया, धनवान बनो देवी। निर्णायक मण्डल ने सूचित किया कि तृतीय स्थान पर दो महिलाओं ने बराबर अंक प्राप्त किए हैं तो क्या राशि आधी आधी कर दी जाए। अध्यक्ष ने हमसे विचार विमर्श किया और फिर अध्यक्ष तो अध्यक्ष ठहरी तुरंत 1100/- का एक और लिफ़ाफ़ा तैयार और लो जी प्रथम पुरस्कारशालिनी खन्ना, द्वितीय वन्दना चौधरी एवम तृतीय की संयुक्त दावेदार और पुरुस्कृत हुई पूनम अरोड़ा एवम् खुशबू कुमारी। एन्नू कैदे बड़े दिल वाला या वाली जी समझे के नाही। ❤️ 🌹🌹🌹🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

        विजेताओं को पुरस्कार राशि प्रदान करने का पुनीत कार्य हमें दिया गया। बात तो कायदे की थी अरे भाई संस्था के मंत्री हो🤠🤠🤠😂😂 कुछ काम तुम भी तो करो की तर्ज़ पर हमने इस जिम्मेदारी का निर्वहन किया। इसके बाद छोटी छोटी कविताओं के पाठ का दौर।  हमने कविता न पढ़कर छोटी छोटी दो कहानियां उपस्थित जनों के साथ साझा की जिन्हें सभी ने सराहा भी और साथ ही साझा की साहित्य सृजन कुटुम्ब की अभी तक की यात्रा 🧳 साथ ही यह भी साझा किया कि साहित्य सृजन कुटुम्ब संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम चाहे दिल्ली में हों या बाहर संस्था ने आज तक किसी भी प्रतिभागी से एक भी पैसा नहीं लिया है और सभी का धन्यवाद अलग से। अब खेल ख़त्म तो पैसा हजम की तर्ज़ पर सबने फिर से काले जाम का जायका गर्मा गर्म चाय की सुड़की के साथ लिया और लौट पड़े अपने अपने घरौंदे की ओर।

प्रदीप डीएस भट्ट -11032026