रिपोर्ताज
"एक पंथ दो काज"
पिछले वर्ष 28 मार्च को साहित्य सृजन कुटुम्ब, (न्यास), दिल्ली को दिल्ली सरकार से रजिस्ट्रेशन प्राप्त हुआ और 14 अप्रैल को 2025 को संस्था द्वारा अम्बेडकर जयन्ती पर एक काव्य गोष्ठी/ परिचय आयोजित की गई। गोष्ठी के साथ साथ कुछ नए पदाधिकारियों को भी संस्था द्वारा नामित किया गया ताकि आगामी कार्यक्रमों को सुचारू रूप से संचालित किया जा सके। इसी क्रम में 28 मई को प्रयागराज में वीर सावरकर के जन्मोत्सव पर संस्था द्वारा प्रयागराज के कवियों के साथ हल्दीराम के प्रांगण में एक काव्य संध्या "शब्दांजलि" का सफल आयोजन किया गया साथ ही प्रयागराज के तीन वरिष्ठ साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया। कुछ कवियों को आश्चर्य हुआ भी कि दिल्ली की संस्था प्रयागराज में आकर न केवल वरिष्ठों को सम्मानित कर रही है वरन लोकल कवियों का उत्साहवर्धन भी कर रही है। निश्चित प्रयागराज के कार्यक्रम की उत्साहजनक प्रतिक्रिया ने ये तय कर दिया कि संस्था हर वर्ष 28 मई को कार्यक्रम आयोजित करेगी।
7 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम में तय हो गया कि 28 मई -2026 को संस्था द्वारा शिमला में कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। तुरन्त पवन शर्मा जी से सम्पर्क साधा गया और मॉल रोड पर स्थित रोटरी क्लब को बुक कर दिया गया लेकिन लेकिन लेकिन अचानक घोषणा हुई कि हिमाचल में 27,28,29 मई को पंचायत चुनाव के कारण कार्यक्रम सम्भव नहीं है। अब भाई साहब आनन फानन में 28 मई को दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी की और लो जी वेदांता रेस्टोरेंट मुनिरका को पूरे दिन के लिए बुक कर दिया गया। अच्छी बात ये है कि संस्था की अध्यक्ष का अवतरण दिवस भी 28 को है तो एक पंथ दो काज कहावत का पालन करते हुए सारी व्यवस्थाएं कर दी गईं।
नौतपा के रंग में रंगे दिन को हमने ठेंगा दिखाने की चेष्टा करते हुए सुबह सात बजे ही घर छोड़ दिया। रैपिडो एवम् रैपिड ट्रेन को अपना माध्यम बनाते हुए ठीक 11.35 बजे मुनिरका मेट्रो 🚇 से उतरे। मेट्रो के वातानुकूल का आनन्द बाहर आते ही छू मंतर हो गया, भाई साहब धूप से अपने चेहरे और सर को बचाने की असफल चेष्टा की तो कानों में हल्की सी सरगोशी करती आवाज़ आई। क्यूँ बे मज़ा आया न हम नौतपा है बेटे दूई मिनिट में 90 मिनिट की ठण्डी गुल कर देते हैं। हमने पलटकर जवाब न देने में ही अपनी अच्छी वाली भलाई समझी और ग्यारह नम्बर का सद्पयोग करते हुए जा पहुंचे वेदांता रेस्टोरेंट। ठीक 11.40 पर दीप प्रज्ज्वलित किया गया फिर बर्थ डे गर्ल सन्तोष संप्रति जी ने 2021 से संस्था किए जा रहे कार्यों पर प्रकाश डाला। फिर व्यक्तिगत परिचय एवम् उपस्थित साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। बॉस एक बताना तो भूल इच गए 11.00 बजे से 1.00 तक सम्मान के साथ साथ खान पान लगातार चलता रहा। अब कार्यक्रम में कौन कौन पधारे है ऊपर पोस्टर में ख़ुदई देख लो महाराज।
अब बारी थी कवि सम्मेलन का तो संचालन की जिम्मेदारी हमारे हिस्से आई और हमने समय की नज़ाकत को समझते हुए 5 कवियों को एक ग्रुप में रखकर आमन्त्रित किया और लो जी को तीन बजते बजते दो तिहाई कवि कविता पढ़कर अपनी अपनी कुर्सियों पर स्वादिष्ट भोजन का रसस्वादन करने लगे। मजे की बात तो यूँ हुई साहिब कि कइयों ने क्या पढ़ा ये तो उन्हें भी शायद पता न चला हो🤣🤣🤣🤣🤣 लेकिन भाई एक साहब आए और वो अपने वाले हैं न फ़िराक़ गोरखपुरी साहब उनकी ग़ज़ल को यूँ तो कइयों ने गाया होगा लेकिन नीना सिंह (जगजीत सिंह नीना सिंह) जो अपनी बुआ के बढ़िया वाले लमडे हैं की ग़ज़ल की ज़मीन पर इधर उधर से लपेटी ग़ज़ल कह डाली फिर जी नी भरा तो ग़ुलाम अली की ज़मीन इस्तेमाल करके फिर से ग़ज़ल ठोकी और ये जा और वो जा🤓🤓🤓🤓। लो आप भी देख लो:-
रात भी, नींद भी, कहानी भी / फ़िराक़ गोरखपुरी
फ़िराक़ गोरखपुरी »
रात भी, नींद भी, कहानी भी
हाय, क्या चीज़ है जवानी भी
एक पैगाम-ए-ज़िन्दगानी भी
आशिकी मर्गे-नागहानी भी
इस अदा का तेरी जवाब नहीं
मेहरबानी भी, सरगरानी भी
दिल को अपने भी गम थे दुनिया में
कुछ बलायें थी आसमानी भी
मंसबे-दिल खुशी लुटाता है
गमे-पिन्हान भी, पासबानी भी
दिल को शोलों से करती है सैराब
ज़िन्दगी आग भी है, पानी भी
शादकामों को ये नहीं तौफ़ीक़
दिले-गमगीं की शादमानी भी
लाख हुस्न-ए-यकीं से बढकर है
इन निगाहों की बदगुमानी भी
तंगना-ए-दिले-मलाल में है
देहर-ए-हस्ती की बेकरानी भी
इश्के-नाकाम की है परछाई
शादमानी भी, कामरानी भी
देख दिल के निगारखाने में
ज़ख्म-ए-पिन्हान की है निशानी भी
खल्क क्या क्या मुझे नहीं कहती
कुछ सुनूं मैं तेरी जुबानी भी
आये तारीक-ए-इश्क में सौ बार
मौत के दौर दरमियानी भी
अपनी मासूमियों के परदे में
हो गई वो नजर सयानी भी
दिन को सूरजमुखी है वो नौगुल
रात को वो है रातरानी भी
दिले-बदनाम तेरे बारे में
लोग कहते हैं इक कहानी भी
नज़्म करते कोई नयी दुनिया
कि ये दुनिया हुई पुरानी भी
दिल को आदाबे-बंदगी भी ना आये
कर गये लोग हुक्मरानी भी
जौरे-कम कम का शुक्रिया बस है
आप की इतनी मेहरबानी भी
दिल में एक हूक सी उठे ऐ दोस्त
याद आये तेरी जवानी भी
सर से पा तक सुपुर्दगी की अदा
एक अन्दाजे-तुर्कमानी भी
पास रहना किसी का रात की रात
मेहमानी भी, मेजबानी भी
जो ना अक्स-ए-जबीं-ए-नाज की है
दिल में इक नूर-ए-कहकशानी भी
ज़िन्दगी ऐन दीद-ए-यार ’फ़िराक़’
ज़िन्दगी हिज़्र की कहानी भी
मर्गे-नागहानी= अचानक मौत
सरगरानी=गुस्सा मन्सब=मन्सूबा
सैराब=भिगोना शादकाम=भाग्यवान लोग
तौफ़ीक=काबिलियत शादमानी=खुशी
तन्गामा-ए-दिले-मलाल=दुखी दिल के थोडे से हिस्से में
देहर-ए-हस्ती=ज़िन्दगी का समन्दर बेकरानी=असन्ख्य
कामरानी=सफ़लता निगारखाना=जहां बहुत लडकियां हों
पिन्हान=छुपा हुआ खल्क=दुनिया तारीके-इश्क=मोहब्बत का इतिहास
दौर=वक्त, समय दरमियानी=बीच में नौगुल=नया फ़ूल
नज़्म=नया बनाना जौर=कहर पा=पांव सुपुर्दगी=समर्पण
तुर्कमानी=विद्रोही अक्स-ए-जबीं-ए-नाज़=किसी प्यारे का चेहरा
नूर=प्रकाश कहकशां=आकाश गंगा ऐन= असलियत में।
अब आप ही सोच लो कित्ते समझदार लोग पड़े हैं दुनिया में। ठीक तीन बजे केक महाशय को लाया गया अच्छी बात ये थी की उसे काटने के स्थान पर केक को नमस्ते करके सबको बरोबर हिस्से में बांट दिया गया। सच कै रिया हूं भाई साहब बिना अण्डे का केक कटने से बच भी गया और सच कै रिया हूं मुझे तो केक भी फूल टू सनातनी नज़र आया। धूमधड़ाका नाच गाना काफ़ी देर तक चलता रहा। साढ़े चार बजे के क़रीब अन्तिम सत्र की कमान हमने फ़िर संभाली और बचे खुचे कवियों ने अपनी कविताई से माहौल को खुश गवार कर दिया। अन्तिम कवि के तौर पर हमारी बारी आई और हमने कुछ अलग करते हुए एक मुक्तक और एक ग़ज़ल युद्ध की विभीषिका से उपजे हालातों पर कोरे कागज़ पर अपनी उकेर दी अच्छी बात ये रही उपस्थित ने इसे सराहा भी। आप भी आनन्द लें।
मुक्तक
जिसमें जितना रोष है बाक़ी ,वो उतना मदहोश
लेकिन ये भी सच है खाली, होता उसका कोश
भाग्य लिखे को कौन मिटाए, सुन लो तुम भी 'दीप'
रखता जो भी होश, वो पाता जीवन में सन्तोष
-प्रदीप डीएस भट्ट -26052026
“जंग किसी भी मसअले क़ा हल नही है”
जंग किसी भी मसअले क़ा, हल नही है
छिड़ गई बाक़ी किसी का, कल नही है
अब के भी बरसात, गर रुठी रही तो
पेड होंगे, पर लटकते, फ़ल नही है
जिस तरह बर्बाद, धरती कर रहे हैं
क्या हमारा खुद से ही ये, छल नही है
दिन-ब-दिन आबादी, बढती जा रही है
कल जो देखोगे, कहीं पर, जल नही है
खेत प्यासे बरसों से, बूँदों को तरसें
और नदी में प्यारी वो, कल-कल नही है
हाल में किस जी रहा, हलधर कहूँ क्या
कर्ज़ सर पे, हाथ में पर, हल नही है
कल की खातिर, आज पेड़ों को सँवारो
कल कहोगे हाय !, क्यूँ जंगल नही है
माना जीती जंग लेकिन, मन तो हारा
ये ख़ुशी क़ा आज, निश्चित पल नही है
हर तरफ दिखतीं है केवल, मुश्किलें ही
क्यूँ निकलता, कोई इनका, हल नही है
क्यूँ परीशां हो रहे , तुम ‘दीप’बोलो
आसमाँ है छत, धरा हलचल नही है
-प्रदीप देवीशरण भट्ट-24-02-2022
अंत में राष्ट्र गान फिर विदाई 🎁 गिफ्ट और भैय्या हम भी निकल पड़े मेरठ की जानिब लेकिन जे क्या अभी 🚇 में बैठे ही थे कि इन्द्र देवता ने हल्की सी हवा के ठीक ठाक सी बारिश जो कि गाजियाबाद तक साथ साथ चली। फिर हमने बारिश को वहीं से टाटा बाय बाय कहा और लपक लिए मेरठ रैपिड की ओर।
प्रदीप डीएस भट्ट -31052006