"स्पिरिट पी तो स्पिरिट ग़ायब"
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अख़बार खोलते ही इधर मार उधर काट कुछ बच जाए तो नेताओं के बेतुके बयान। लेकिन कभी कभी रोचक ख़बर भी मिल जाती है जिसे पढ़कर होंटो पर स्मित उभर आई। बचपन में देखते थे कि लोग पनामा सिगरेट के पैकेट में पासिंग शो की सिगरेट रखते थे लेकिन कुछ लोग पनामा के अलावा कैंची सिगरेट की डब्बी में ढोलक बीड़ी भी दिख जाती थी। बस भाई साहब कल के अख़बार में यही एक ख़बर कि मुजफ्फरनगर में शराब की बड़े ब्रांड की बोतलों में छोटे या घरेलू ब्रांड की शराब बेचते हुए पुलिस ने कुछ लोगों को पकड़ा और टांग दिया जी जेल में। बताओ जी ये भी कोई बात हुई "मान न मान मैं तेरा मेहमान" की तर्ज़ पर असली पुलिस असली ब्रांड की जगह नक़ली शराब पकड़ने पहुँच गई। भाई साहब हमारी नहीं तो कम से कम कुछ अपनी ही इज़्ज़त का ख़्याल रखते मियां। घणा नहीं तो तनिक सा ही सोच लेते कि अगले दिन के अख़बार में ख़बर का शीर्षक क्या बनेगा " असली पुलिस ने नक़ली दारू पकड़ी" भाई साहब इसे ही शास्त्रों में कलयुग को आगमन के तौर पर लिखा गया है।
मैन्यू लगता पंजाब चुनाव से पहले पता नी कि कि देखना पड़ेगा। बताओ जी पंजाब के लोग तो पहले ही भगवंत मान के बेवड़े पन से परेशान थे ।रोज़ अख़बार में अलिखित अछपित खबर में मान जी "मान न मान मैं तेरा मेहमान" की तर्ज पर आज इधर गिरे कल उधर लुढ़के। लेकिन इसके अलावा एक ख़बर ने पीने न पीने वालों के कान से धुंआ निकाल दिया जब ख़बर आई कि भगवंत मान दिल्ली एयरपोर्ट पर ग्रीन चैनल पर पकड़ लिए गए। बकौल कांग्रेसी नेता बंदा दारू की बोतलों पर ड्यूटी चुकाए बिना अपनी ही पिनक में ग्रीन चैनल पार कर रहा था। अब कोई इस भले मानस अरे नहीं नहीं सरदार जी से पूछे कि भैय्या दो बोतल एयरपोर्ट पर फ्री ड्यूटी शॉप पर भी मिल जाती फिर बाहर से ढोकर क्यूँ लाए,पर पिनक के साथ जब सनक मिल जाए तो ऐसा ही हो जाता है। मान को भी पता है कि आप पंजाब में जीते या हारे वो अगला मुख्यमंत्री तो नहीं होने वाला नहीं तो सोचा होगा रस्ते का माल सस्ते में मिल रहा है तो लपेट लो जितना लपेटा जाए। शराब ने अच्छे अच्छों के घर डूबे दिए खेत खलिहान बिकवा दिए फ़िर बंदे की इज्ज़त की तो बात ही क्या। उधर यूक्रेन में एक मसखरे ने मसखरी मसखरी में पूरे देश का डिब्बा गोल कर दिया तो इस बंदे का इत्ता तो यहां भी बनता है जी। पंकज वाले उधास की एक ग़ज़ल याद आ रही वो भी बड़े ज़ोर से "शराब चीज़ ही ऐसी है न छोड़ी जाए ये मेरे यार के जैसी है न तोड़ी जाए"
ऐसा माना जाता है कि भारत में शराब ( अरबी फ़ारसी के जोड़ तोड़ से बने शब्द शर+आब यानि शराब) का इतिहास लगभग 4000 वर्ष से अधिक का है जिसे हम सिन्धु घाटी सभ्यता (जिसमें अनाज और चावल से मादक पदार्थ बनाने के साक्ष्य मिलते हैं।)और ये सिलसिला वैदिक काल से ही चला आ रहा है। यानि प्राचीन काल और वैदिक युग अर्थात 1500 वर्ष पूर्व से माना जाता है। आचार्य चाणक्य यानि मौर्य वंश में मादक पदार्थों पर सरकारी नियंत्रण था। मुगल शासन के दौर में शराब पर आधिकारिक तौर पर पाबंदी थी, लेकिन बाबर और जहाँगीर जैसे शासक इसका छुट्टा होकर सेवन करते थे। वैदिक काल में 'सुरा' (शुरुआती बियर का रूप) और 'सोम' (धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयुक्त पेय) का वर्णन मिलता है। देश के विभिन्न भागों में महुआ और ताड़ी से भी शराब बनाई जाती है। जहाँ तक ब्रिटिश शासन और आबकारी प्रणाली का संबंध है तो अंग्रेजों ने पहली ब्रूवरी 1830 में हिमाचल प्रदेश के कसौली में भारत की पहली ब्रूवरी स्थापित की थी। अंग्रेजों ने घरेलू स्तर पर बनने वाली शराब और ताड़ी को अवैध घोषित कर दिया और आबकारी कानून बना दिया ताकि बड़े पैमाने पर राजस्व वसूला जा सके। इसी के साथ अंग्रेजों ने डिस्टलरीज व लाइसेंस प्रणाली की शुरुआत कर दी। 1760, में अंग्रेजों ने कलकत्ता में शराब की पहली दुकान भी खोल दी और वो भी आधुनिक तौर तरीकों वाली। जहां तक स्वदेशी शराब का प्रश्न है तो बताता चलूँ कि भारत की स्वदेशी व्हिस्की "अमृत व्हिस्की" थी जो कि 1948 में लॉन्च हुई थी ।आज भारत दुनिया में सबसे ज्यादा व्हिस्की की खपत करने वाले देशों में शामिल है, और यह राज्य सरकारों के लिए राजस्व का एक बड़ा स्रोत बनी हुई है।