सो हुआ यूँ के कि हम एक रील देख रहे थे जिसमें अपने वाले स्वामी से किसी पॉडकास्टर ने पूछा कि राजा बाबू प्रधान कब बनेंगे। भाई साहब पहले तो उन्होंने उस पॉड कास्टर को ऊपर से नीचे फिर नीचे से ऊपर की ओर देखा फिर जहरीली मुस्कान के साथ कहा कभी नहीं लगे हाथ उन्होंने राजू बाबू द्वारा गिनवाई जा रही विदेशी डिग्रियों का कच्चा चिट्ठा भी खोलकर पॉडकास्टर बोलती बंद कर दी। ऐसे जाने कितनी रील फील तरंगों के माध्यम से कुछ सत्य कुछ अर्धसत्य और कुछ बिलकुल सफ़ेद झूठ वातावरण में चहल कदमी कर रही हैं। लेकिन एक बात तो है और वो ये कि राजा बाबू को प्रधान बनाने के लिए कुछ विदेश एजेंट कुछ देसी एजेंट पूरी तरह हाथ पाँव मार रहे हैं लेकिन वो क्या है ना कि वर्तमान परिवेश में 1947 तक तो कोई उम्मीद नज़र आती नहीं उसके बाद मान लो कि राजा बाबू प्रधान बन भी गए तो क्या ही हो जाएगा भैय्या।
पिंकी के भैया पप्पू ने पिंक शर्ट क्या पहन ली की चमचे फूले नहीं समा रहे ।
हाय भैय्या की पिंक शर्ट!
युवा भैय्या जेन जी!! फलाना ढिकाना...
इनकी मुराद पूरी हो जल्द से जल्द राहुल भैय्या प्रधानमंत्री बनें। अरविंद केजरीवाल गृह मंत्री बनें, अखिलेश यादव रक्षा मंत्री ममता बानो विदेश मंत्री बनें और बाकी सभी विपक्षी दलों के नेताओं को भी कोई-न-कोई मंत्रालय मिल जाए।
क्योंकि जनता हिंदुस्तान के वो "गोल्डन डेज़" देखना चाहती है।
वही दौर... जब भाईचारा चरम पर था। इतना भाईचारा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से लोग बिना पासपोर्ट, बिना वीज़ा के आ जाते थे। बस बॉर्डर से तार क्रॉस किया और आ गए हिंदुस्तान।
वही दौर... जब हर छह घंटे, आठ घंटे बाद हम खुशी-खुशी बोलते थे—"लाइट आ गई... लाइट आ गई... लाइट आ गई..." वो खुशियाँ चाहिए हमें।
वो गड्ढे आज भी याद आते हैं, जब उनमें कभी-कभी सड़क निकल आती थी...
वही व्यवस्था... गैस, राशन, मिट्टी का तेल—सब कुछ तब भी "ऑनलाइन" ही मिलता था। ऑनलाइन मतलब... लाइन में ऑन रहो।
ज़रा-सा लाइन से हटे नहीं कि नंबर गया! बस... वही "ऑनलाइन सिस्टम" फिर से देखने हैं मुझे।
वही समय... जब शाम ढलते ही लोग, खासकर महिलाओं को किसी बात का डर नहीं था।
हर महिला के पास चार-चार, पाँच-पाँच ब्लैक कमांडो हुआ करते थे और महिला सूर्य ढलने के पहले घर पहुँच जाती थी। रात का झंझट ही नहीं।
वही दौर... जब दिवाली कभी भी पड़ जाती थी, बम कहीं फट जाते थे...
वही दौर... हर दूसरे चौथे दिन शहर-दर-शहर बम की ब्रेकिंग न्यूज सुनने को मिलती थी?
वही दौर जब प्रधानमंत्री बोलते थे "पैसे पेड़ पर नहीं उगते!
जब भारत में आतंकी हमले हो रहे थे तब गृहमंत्री सूट बदल रहे थे और उन्हें इतनी बड़ी घटना पर दो शब्द बोलने का भी टाइम नहीं था!
वही दौर जब हिंदू हिंदू होने से ही कतरने लगा था बेटियां महिलाएं सुरक्षित नहीं थी
अरे भूल गयीं पाज़िटिव मूड़ में आते हैं...
कोई पेपर कभी लीक नहीं होता था, हर बच्चे के सौ में से सौ नंबर आते थे और हर मोहल्ले, हर कस्बे और हर शहर से मानो हर बच्चा डीएम या डीएसपी बन जाता था?
सरकारी नौकरियाँ तो इतनी थीं कि तीन-तीन पोस्ट पर एक अकेला बंदा काम करता था?
वही ज़माना... जब हर गली-मोहल्ले में एक AIIMS, एक IIM और एक IIT हुआ करती थी?
वही दौर, जब सौ डॉलर का एक रुपया हुआ करता था!
महंगाई तो बिल्कुल भी नहीं थी—एक दर्जन में अठारह-अठारह केले आते थे तब।
वही दौर चाहिए मुझे। वही दिन, जब रात आठ बजे वाली ट्रेन रात आठ बजे ही आती थी... बस, तारीख़ कौन-सी होगी, ये कोई नहीं जानता था!
स्टेशन पर बैठकर उनका इंतज़ार करने का जो रोमांच था, वो आज भी याद आता है। रेलवे स्टेशन तो इतने बड़े-बड़े हुआ करते थे कि कई बार तो वहाँ हवाई जहाज़ उतर जाया करते थे।
वही दौर वापस लाना है, जब हिंदू-मुस्लिम जैसी कोई बहस ही नहीं होती थी। मुस्लिम अपने नाम के साथ... "द्विवेदी, तिवारी, शर्मा और शुक्ला" लिखते थे और हिंदू "खान, कुरैशी, हुसैन और अहमद"। बस, इंसान की पहचान इंसान से होती थी।
मोदी और योगी ने देश बर्बाद कर दिया है।
तो आइए... हम सब मिलकर प्रण लें कि इस बार मोदी जी और योगी जी को वापस नहीं आने देंगे... ताकि हम फिर से वही "गोल्डन डेज़", वही सच्चे दिन, वही अच्छे दिन देख सके।
सही है न??