राजा बाबू स्टेज़ के हर कोने का इस्तेमाल करते हुए महिलाओं पर बोल रहे हैं, फिर कट टू कट मनु स्मृति अपना ज्ञान बखार रहे हैं और बड़े मनोयोग से एक रहस्य से पर्दा उठा रहे हैं कि समाज में दो तरह के कप हैं एक प्लास्टिक जो दलितों के लिए है और दूसरा काँच का जो सवर्णो के लिए है। प्लास्टिक वाले कप में दलित को चाय मिलती है और काँच वाले में स्वर्ण को। एक बार फिर कट टू कट जेन जी और फ़िर जेन अल्फ़ा न जाने क्या क्या बीच में हल्द्वानी की घटना भी घुसेड़ दी। मज़ा तो तब आता है जब कार्यक्रम के बाद राजा बाबू चाय बाँटते दिखते हैं और जे क्या हुआ भाई साहब प्लास्टिक वाले कप में सबको बड़े मनोयोग से चाय पकड़ा रहे हैं !!! एक बार फिर कट टू कट राजा बाबू चाय पी रहे हैं वो भी काँच वाले कप में मतबल किसी बढ़िया कार्यक्रम का क्रियाक्रम कैसे किया जाता ये खासियत सिर्फ़ और सिर्फ़ राजा बाबू से सीखी जा सकती है। ये सब देखकर मेरी दोनों आँखें कुछ ज़्यादा ही खुल गई न न न भाई साहब मैं कोई सपना नी देख रहा, समझा करो मियां, अगर समझ में आवे तो। राजा बाबू का चलायमान ज्ञान देखकर मेरी आँखे या फिर बरबंटे या कुछ भी कह लो पर सच तो ये है कि इतने घुमावदार ज्ञान को देखकर सुनकर मुझे 3 इडियट की क्लास का वो टीचर याद हो आया जो आमिर ख़ान की हरकतों से परेशान होकर पूछता है "आख़िर कहना क्या चाहते हो" । अब आमिर ने क्या जवाब दिया वो तो हम सबको पता ही है लेकिन राहुल गाँधी का जवाब तैय्यार है। "मेरी मर्ज़ी"। अब कल्लो क्या बात करोगे इस बन्दे से।
यूँ तो हर व्यक्ति स्वतंत्र है कहीं भी कुछ भी बक बकियाने के लिए लेकिन भाई साहब जो बंदा जन्मजात ईसाई हो और वोटो की अगुवाहट में कुर्ते पे जनेऊ टांगने से बाज न आता हो तो फिर ऐसे भले माणुस को अगर सार्वजनिक स्थान पर मनु स्मृति पर अपना ज्ञान उड़ेलना पड़े और वो भी संस्कृत के श्लोक को उद्धृत करते हुए "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमयंते तत्र देवता" फिर उस ज्ञान की जबरदस्त खिल्ली उड़े तो... सोचो सोचो इसके आस पास रहने वाले चुकन्दर टाइप लोग भी शायद यही चाहते होंगे की जित्ती जल्दी हो सके इस बन्दे को जसपाल भट्टी का उल्टा पुल्टा करके छोड़ देते हैं। तभी तो ये चुकन्दर टाइप लोग जनता की अदालत में ऐसे वैसे जाने कैसे कैसे हिमालय पहाड़ से भी कुछ ज़्यादा ही कठिन मुद्दे पर इस बन्दे की ज्ञान वान पौध को लहलहाने देते हैं। हिट हुए तो हम साथ साथ हैं वरना तुम कौन हम खां म खां। अब महाराज इस बन्दे और इसकी टीम को कोई बताए कि मनुस्मृति वह ग्रन्थ है जो कि स्वयंभू मनु और भृगु के संवाद व प्रवचन के रूप में है। इसमें बारह अध्याय और 2685 से 2694 श्लोक हैं। इसमें ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, संस्कार, आचरण कर्तव्यों एवम् सामाजिक नियमों का उल्लेख है। अब जैसा की होता ही है, समय के साथ और सत्ता के लोलुप लोगों की आकांक्षाओ को पूर्ण करने के लिए धर्म पुस्तकों को अपनी बलि देनी पड़ती है ताकि कुछ गलीच किस्म के लोग सत्ता सत्ता खेल सकें सो मनु स्मृति के साथ भी यही सब हुआ जिनको संस्कृत का स नहीं आता वो मनु स्मृति का अनुवाद अपनी मर्ज़ी से कर देंगे और सनातन से चिढ़ खाए लोग अपनी अल्प बुद्धि से इसमें कुछ नए श्लोक गढ़कर अर्थ का अनर्थ करेंगे उन्हें सनातनियों से क्या सरोकार वो तो बे पेंदे के लौटे हैं आज इसकी ओर लुढ़क जायेंगे कल वर्तमान सत्ता लोभियों से कोई ज़्यादा लाभ दिखाएगा तो ये उस ओर लुढ़क जायेंगे आख़िर जन्मजात लुढ़कु राम जो ठहरे। और ऐसा सिर्फ सनातन के साथ नहीं हुआ है वरन् हर धार्मिक पुस्तक के साथ ऐसा ही छल हुआ है। बलवान के सामने कमजोर को बढ़ावा देना हो या फिर धर्म पुस्तक में घालमेल करना हो लक्ष्य एक ही रहता है किसी भी तरह सत्ता पे काबिज़ हुआ जाए। राजा बाबू इसी कोशिश को करते नज़र आते हैं वो भी मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं मेरी मर्ज़ी की तर्ज़ पर।
एक बात जो मेरे पल्ले आज तक नहीं पड़ी कि सबको ज्ञान क्यूँ देना है फिर चाहे वो सनातनी हो या ईसाई, मुस्लिम हो या सिख, बुद्ध हो या जैनिज्म और भी न जाने कितने दीन , मज़हब भरे पड़े हैं भारत में। सबको ज्ञान भी देना है गाली भी लेकिन सबको सिर्फ़ सनातन को कोसना है। अब कोई इन बांदरों को समझाओ कि समय समय पर सनातन रूपी पारावार से दो मुट्ठी जल लेकर ख़ुद को आर्टिफियल समन्दर समझने वाले लोग ये कब समझेंगे कि धर्म तो सिर्फ एक ही है और वो है सत्य सनातन बाक़ी तो... दिल को ख़ुश रखने को ग़ालिब ख़्याल अच्छा है। और चलो जी अगर इन लोगों को ज्ञान ही देना है तो दे ले भाई, ईसाई लोग ग़रीब गुरबा लोगों को ईसाई बनकर क्या ही कर लेंगे, या मुसलमान इन्हीं बचे खुचे गरीब गुरबा को मुसलमान बनाकर क्या हासिल कर लेंगे सिवाय जनसंख्या वृद्धि के। अगर किसी को गलत वाली फहमी हो कि उच्च पदस्थ ईसाई या मुस्लिम इन कन्वर्टिड लोगों को अपने चर्चों में या महजिदो में जाने देंगे तो मियां ये अभी भी बहुते दूर की कौड़ी है। नागालैण्ड जाकर मैं इस सच्चाई से रु ब रु हो चुका हूँ, कुछ ऐसा ही हाल महजिदो का भी है। "जाति है कि जाति नहीं" भले ये कनवर्ट हो गए हों लेकिन फ़ायदा तो दलित या महादलित या पिछड़ा बने रहने में ही है इसलिए कनवर्ट हुए हैं पैसे के लिए न कि अल्ला या यीशु से इन्हें कोई प्रेम है। बरसों से ऐसे लोग दो नावों की सवारी धड़ल्ले से कर रहे हैं। कोई भी ज्ञानी उन्हें ये नहीं बताता कि तुम ये गलत कर रहे हो क्यूँ कि भारतीय जन मानस में एक कहावत रच बस गई है। "माया तेरे तीन नाम परसी परसा परशुराम" इसलिए "बाप बड़ा न भईया सबसे बड़ा रुपैया" सो ये सोचना ही बेईमानी है कि कोई राजनेता या धर्म भीरु सच बोलेगा हां दोगली टाइप पब्लिक को खुश करने वो सनातन को सरे आम गरियायेगा और सत्ता की दलदल में अंदर तक धंसा छद्म सनातनी ताली बजाएगा।
अब बात करते हैं महिलाओं की। हर पार्टी सिर्फ़ महिलाओं पर फोकस रखना चाहती है कारण भी बड़ा स्पष्ट है आधी आबादी का मामला है जी। "राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट अंत काल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट" अगर आप अपने बचपने का पुनरावलोकन करेंगे तो पाएँगे कि जब आपके माता पिता आपसे बाजार से कुछ सामान लाने के कहते थे तो आपके दिमाग़ में पहला सवाल यही आता था कि कौन सा लाला सामान के बाद ज्यादा लुभाव या रूंगा देगा। आपको इस बात से कोई लेना देना नहीं होता था कि वो लाला इस लुभाव या रूंगे की कीमत सामान की क़ीमत बढ़ाकर या फिर सामान से टांका मारकर आपसे ही दुगना लुभाव या रूंगा वसूल रहा है। ये सब बिना पढ़े लोगों का मार्केटिंग मैनेजमैंट था जिसे आजकल बच्चे लाखों खर्च करके सीखते हैं। बस कुछ ऐसा ही काम ये राजनीतिक पार्टियां करती हैं। चुनाव जीतना है तो फिर बिना कुछ सोचे समझे फ्री फ्री फ्री की रट लगाए रहो, जीत गए तो वारे के न्यारे और नहीं जीते तो बेचारी ई वी एम को लानत अमानत। सामान्यतः कोई भी पार्टी जनता के विषय में नहीं सोचती और जो ग़लती करती है उसे घेरने के लिए राजा बाबू, खाजा बाबू, साझा बाबू जैसे लोग बैठे हैं न कोसने के लिए और अगर कोसने से मन नहीं भरता तो जैसे बादल पानी लाने के लिए समुद्र का सहारा लेता है तो ऐसे चंडोरे टाइप के लोग विदेश निकल लेते हैं अपनी जगह की थैली में न्यू टाइप का ज़हर भरने के लिए।
सिर्फ़ "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमयंते तत्र देवता" पढ़ देने मात्र से तो महिलाओं का उत्थान होने से रहा इसके लिए आवश्यकता है सही सोच की और फिर उस सोच को सही तरीके से लागू करने की। सात आठ सौ वर्ष या लगभग दो सौ वर्ष पर छींटा कशी करने से तो समस्या का समाधान नहीं होने वाला। कहने वाले कह सकते हैं कि हम आपस में लड़ते रहते थे इसी लिए बाहरी लोग हम पर आक्रमण करते रहे और हमें शारीरिक के साथ मानसिक गुलाम बनाते रहे जिस कारण हम चाहकर भी समाज का भला न कर पाए, ये विषय अलग है कि ब्राह्मण परिवार में जन्मे राजा राम मोहन राय ने 1829 के उस दौर में भी सती प्रथा को बंद करवाकर समाज को चेताया जब अंग्रेजों के दमन दौर की आंधी चलती थी साथ ही बाल विवाह, बहु विवाह और जाति गत कठोरता का विरोध किया और सबसे महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं के सम्पत्ति एवम् शिक्षा के अधिकारों की खुलकर वकालत की साथ ही यह भी सिखाया कि हमें आँख मूंदकर किसी भी धार्मिक या सामाजिक नियम को नहीं मानना है बल्कि समय समय पर ऐसे नियमों की समीक्षा भी करते रहनी चाहिए। इस तरह के स्त्रियों के लिए सुधार अन्य दीन या मज़हब में कभी हुए ही नहीं क्यूँ कि वहां महिलाओं को बोलने की स्वतंत्रता ही नहीं है फिर सुधार की अपेक्षा रखना ही बेईमानी है।
अब बात करते हैं स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की तो जो जितने बड़े नाम उस समय कांग्रेस में रहे फिर चाहे वो पुरुष हों या महिला उनमें से शायद ही किसी को ये ख़्याल आया हो कि भारत की महिलाओं की सबसे बड़ी समस्पया शौच करने की है। शहरों में जहाँ ये समस्या 30 प्रतिशत के आस पास रही वहीं गाँवो में ये समस्या नब्बे से पिच्चानबे प्रतिशत के क़रीब रही। शहरों में बाज़ार या सार्वजनिक स्थानों बस अड्डों या रेलवे स्टेशनों पर भी पुरुषों के लिए तो शौचालय मिल भी जाते थे किंतु महिलाओं के लिए ये स्थिति बहुत ज़्यादा अच्छी नहीं थी, गन्दगी बदबू, दरवाज़े का नहीं होना। वहीं गाँवो कस्बों की स्थिति और भी ज्यादा भयावह रही है। महिलाएं मुंह अँधेरे ग्रुप में शौच के लिए जाती रहीं है। अगर अकेले दुकेले गईं तो सुरक्षा का सबसे ज्यादा खतरा। फलानी महिला शौच के लिए गई और कुछ लोगों ने उसकी इज़्ज़त लूट ली और ये सब किसी जाति विशेष के साथ नहीं वरन् हर जाति की महिलाओं की कहानी रही है। अगर पेट ख़राब है तो आप उस महिला की स्थिति के विषय में सोचकर देखिए आपकी रूह काँप जाएगी। दिन भर पेशाब को रोककर रखने से उन्हें इन्फेक्शन हो जाता रहा है। लेकिन इस एक महत्वपूर्ण समस्या का समाधान करने की किसी ने क्यूँ नहीं सोची।
ख़ैर जैसे कूड़ी के भाग बारह बरस में बदलते हैं वैसे ही 2014 में देर से ही सही किंतु गाँव हो या शहर की महिलाएं प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से देश को संबोधित करते हुए महिलाओं के शौच को लेकर बड़ी घोषणा की कि अब महिलाओं के लिए घर में ही शौचालय बनेंगे। अक्तूबर 2014 से पूर्व जहाँ देश में लगभग 43.7 प्रतिशत ही शौचालय थे वहीं देखते देखते जो मिशन 2014 में शुरू हुआ वो 2019 आते आते ग्रामीण क्षेत्र हो या शहरी क्षेत्र तेजी से इस कार्य में प्रगति करने लगा एवम् कुल 1.43 करोड़ शौचालय बनाए गए। लगभग चार वर्षों में लक्षद्वीप में जहाँ सबसे कम 0 शौचालय बने वहीं उत्तर प्रदेश में 513952 शौचालय बने। अभी तक इस योजना में लगभग 10करोड़ से ऊपर शौचालय बन चुके हैं जो ये दर्शाता है कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो कोई भी कार्य दुष्कर नहीं बस कुछ कर गुजरने की चाह का होना ज़रूरी है। महिलाओं को आर्थिक रूप से शैक्षिणिक रूप से मजबूत बनाया जाना चाहिए लेकिन सिर्फ बोलने के लिए नहीं वरन् कुछ कर दिखाने के जज़्बे के साथ। प्रधानमंत्री मोदी चूंकि ज़मीन से जुड़े नेता हैं और गुजरात के एक गाँव से निकलकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं इसलिए वो जानते हैं कि शैक्षणिक और आर्थिक रूप से महिलाओं को कल भी मजबूत किया जा सकता है परन्तु सबसे पहले उन्हें खुले में शौच की त्रासदी से स्वतंत्रता दी जानी आवश्यक है इसलिए उन्होंने इसे इज़्ज़त घर नाम दिया। ये काम और लोग भी कर सकते थे किंतु उन्हें ये काम करना छोटा और बेतुका लगा। भला महिलाओं को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने से देश का क्या ही भला हो जाएगा इसलिए उन जैसे अक़्ल के अंधे नेताओं ने ख़ाली हवाई जहाज़ भेजकर चार पैकेट सिगरेट मंगवाने से देश का भला करना ज़ारी रक्खा।
चलते चलते हल्द्वानी केस पर एक नज़र। खड़गे जी इस बात से दुःखी थे कि हल्द्वानी में उनके कार्यक्रम के बाद श्रीराम सेना ने कार्यक्रम स्थल का शुद्धिकरण किया और कॉन्ग्रेस इस पर कोई एक्शन नहीं ले रही। ख़ैर राहुल और प्रियंका राज्यसभा में अलॉटेड रूम में गए उनकी बात सुनी और वादा किया कि वो इस पर drastik एक्शन लेंगे लेकिन फिर भूला की तर्ज़ पर बाहर निकलकर भूल गए वो भी मेरी मर्ज़ी के स्टाइल में। अब कट टू कट हल्द्वानी से ख़बर आई कि श्रीराम सेना के दो दलितों ने जो उस कार्यक्रम में शामिल थे ने राहुल पर जातिवाद का आरोप लगाया और एफ आर आई ठोक दी अब आप ही सोचो खड़गे जी जो ख़ुद कांग्रेस अध्यक्ष हैं इत्ते लाचार हैं कि उन्हें हल्द्वानी घटना पर एक्शन के लिए राहुल प्रियंका के आगे लिटररी गिड़गिड़ाना पड़ता है तो भाई ऐसे अध्यक्ष से तो अपनी दूर से ही राम भली लेकिन एक ठो कहावत फिर याद आ गई कि कांग्रेस में अध्यक्ष कोई भी खटोला वहीं बिछेगा जहां ghandy परिवार चाहेगा, क्यूँ सच कै रिया हूँ न मैं। वैसे एक बात और आजकल कांग्रेस की आदत भी न सड़क से दूर पड़े तीर को हवा में उड़ाने की और पीछे का दरवाज़ा खोलने की हो गई है क्यूँ खड़गे प्रकरण ने लोगों को गूगल में उगल करने पर मजबूर कर दिया और पता चला कि खड़गे जी तो प्रैक्टिस वाले बुद्धिष्ट हैं ऐं जे क्या हुआ अब कर लो बात और दूसरी बात हल्द्वानी में राहुल पर एफ आर आई होना यह दर्शाता है कि बीजेपी का मीडिया सेल अध्यक्ष बदलते ही कैसे सरपट दौड़ पड़ा है।
प्रदीप भट्ट :02092026
लेखक, मेरठ