"अपनी सुनाओ फुर्र हो जाओ"
"फुर्सत कहां किसी को, सुने जो मेरी दास्तां
सब अपनी कहने आए थे, कहकर चले गए "
"चरसी यार किसके दम लगाए खिसके"
न न न आप ग़लती से गलत सोच रिये हो मियां। ये जो कहावतें है न हमारे जीवन में ऐसे रच बस गई हैं जैसे कि आटे में हल्का सा नमक और ठीक ठाक पानी। अब भैय्या रोटी खानी हैं तो पहले गेंहू पीसो फिर आटा गूंथो तब रोटियां खाने को मिलती है। कहने का लब्बोलुआब ये है कि हर घर में कहावतें कहने वाला कोई न कोई दादा दादी, नाना नानी मिल ही जायेंगे जो बच्चों को कहावतों के माध्यम से जीवन का दर्शन समझाने की कोशिश करते हैं पर ये पुनीत कार्य करने वाले ज्यादा तर हमारे बड़े भी निपट से लिए हैं या निपटने वालों की कतार में खाट डालकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं क्यूँ कि अब सब कुछ मुबलिया में जो सिमट कर रह गया है। अब जिस जेन जी को उन्हतर (६९-69) उन्नासी(७९-79) और नवासी (८९-89) का न पता है वो कहावतें क्या ख़ाक समझेंगे जी और चलो समझाने वाले मिल भी जायेंगे पर ससुरा यहाँ 22 सदी की ओर टकटकी लगाए देखने वाले जैन जुआ समझने को तैयार हो तब न।
ख़ैर हम खुशनसीब हैं कि हमारे पास भी अनुभव से लबाबल भरी हुई हमारी 83 बसंत देख चुकी और 84 वें बसंत की ओर अग्रसर हमारी प्यारी वाली अम्मा है जिनके पास कहावतों का खज़ाना है इसलिए मैं उन्हें सन्तोष भट्ट उर्फ़ कहावती देवी कहता हूं तो वो प्यार से झिड़क देती हैं, भई उन्हें कित्ती कहावतें याद हैं ये तो उन्हें भी न पता बस मौक़ा मिल जाए और बात से बात निकलते ही तुरन्त ताज़ी ताज़ी कहावत ठोक देती हैं। ये विषय अलग है कि वो ताज़ी ताज़ी कहावतें भी उन 30-40 बरस पुरानी गज़लों जैसी होती हैं जिन्हें घुटे हुए शायर हर महफ़िल में ताज़ा ग़ज़ल कहकर दर्शकों को परोस देते हैं। कुछ कहावतें तो ऐसी हैं भाई साहब जिन्हें समझने में हमें भी पसीने छूट जावें हैं जी। अच्छी वाली बात ये है कि उनका जन्म 9अगस्त -1942 का है और हमारा 27 फ़रवरी (देखा हम kitteee 🤓 स्मार्ट हैं बात बात में अपना अवतरण दिवस बता दिया है, दोस्तों खाली शुभकामनाएं मति देना कछु गिफ्ट विफ़ट भी भिजवाओ भाई साहब) यानि हम अपनी मां के पक्के वाले 9 नम्बरी बेटा हैं। इसलिए उनकी कहावत कहने की कला हममें आनी स्वाभाविक प्रक्रिया का अंग है सो ये कला हमें भी आ गई लगती है। आख़िर हमारे पास मां भी है और ढेर सारी कहावतें अलग से सो असर तो आना ही है। सो ऊपर जो कहावत हमने कोट की है ये उन्होंने ही हमें कभी सुनाई होगी बस इस बार का रिपोर्ताज लिखने बैठा तो रिपोर्ताज का यही विषय मुनासिब लगा। अब जिसे पसन्द आए तो ठीक नहीं तो भैय्या अपने हिसाब से एडजस्ट कर लो भई म्हारे पास और भी तो काम हैं जी।
सो हुआ यूँ कि जब हमें दिसम्बर के आखिरी हफ़्ते में आदरणीय गोविन्द गुलशन जी की तबियत नासाज़ होने का समाचार मिला तो हम मथुरा कार्यक्रम में थे 30 की शाम तक घर आए और तय किया कि एक दो दिन में मिज़ाज पुर्सी के लिए गाजियाबाद होकर आते हैं लेकिन लेकिन लेकिन आंग्ल वर्ष के प्रथम दिन ही दुखद सूचना प्राप्त हो गई। खैर तेरहवीं में रामलीला ग्राउंड में आयोजित शोकसभा में हाज़िरी लगाई। मुम्बई ग़ज़ल कुम्भ-२०२३ में पांच सात मिनिट की मुलाक़ात वो ट्रेन पकड़ने के लिए निकल रहे थे दो चार शेर उन्होंने कहे दो चार हमनें फिर वो निकल लिए उसके बाद हम भी हैदराबाद छोड़कर मेरठ आ बसे फिर "महफ़िल ए बारादरी" में मुलाक़ात हुई और फिर ये मनहूस ख़बर। अब जब मित्र आलोक यात्री जी ने 7 फ़रवरी - गुलशन जी के अवतरण दिवस पर उनकी पुस्तक के विमोचन का आमंत्रण भेजा तो हाज़िरी न देने का तो प्रश्न ही नही था सो मेरठ स्थित गढ़ रोड़, दिल्ली रोड़ की सड़कों के गड्ढे गिनते गिनते ठीक अपरान्ह 2.30 पर हाज़िरी लगा दी। मौसम भी रंग ऐसे बदल रहा है जैसे गिरगिट या उधार लेकर उधारी वाला उधारी लौटाने के नाम पर रंग बदलता है। लेकिन इस बार इस 🍺 हमने ठंड से कोई पंगा न लेने की कसम जो खा रक्खी है सो अपनी गात पर कई लेयर लपेट ली।
पूर्व की भांति द्वार पर यात्री जी ने स्वागत किया, चाय बिस्किट और भी कुछ था याद नी, बस बढ़िया वाली चाय की चुस्कियों के बीच दो तीन जन से गप्पीयाए और पहली फुर्सत में दूसरी पंक्ति की प्रथम सीट 🪑 लपक ली। सारा खेल सीट का ही तो है गुरु। ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा और प्रोग्राम 15.20 पर शुरू हो गया। ऐंकरिंग की हल्के वाली ओपनिंग हमेशा की तरह आलोक यात्री जी ने की फिर राशिद भाई ने वन डाउन बैटर की तरह अपनी एंकरिंग से समा बांधा। प्रथम सत्र में गुलशन जी के विषय में कुछ लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए कुछ ने कुछ भी न कहना ही मुनासिब समझा हम भी उनमें से एक रहे।
दूसरे सत्र में काव्य की छटा को बिखेरने में पुनः राशिद भाई ने अपनी एंकरिंग से मजबूती प्रदान की। अभी सिलसिला शुरू ही हुआ था तभी मुख्य द्वार पर हलचल महसूस हुई सभी की तरह हमने भी नज़रे घुमाई तो चेहरे पर थोड़ी सी उदासी लिए हुए इक़बाल अशहर साहब नज़र आए निश्चित उन्हें इस श्रद्धांजलि सभा की ख़बर किसी और से मिली होगी लेकिन वे गुलशन जी की याद को पलकों में संजोए आए और कुछ किस्से हम सब से साझा भी किए के अतिरिक्त गुलशन जी के गुरु भाई कृष्ण कुमार नाज़ मुरादाबाद से विशेष रूप से तशरीफ़ लाए। अल्का मिश्र कानपुर से गुलशन जी की ग़ज़लों की चौथी किताब "कल न कल तो तेरे.." को कम समय में छपवाकर लाई वरन् इस मौक़े पर किताब का रस्म-ए-इजरा भी हुआ। गुलशन जी की शागिर्द और बारादरी की संस्थापक अध्यक्ष डॉ. Mala Kapoor, संरक्षक डॉक्टर उर्वशी अग्रवाल, संयोजक आलोक यात्री के अतिरिक्त गुलशन जी का पूरा परिवार गुलशन जी के अवतरण दिवस पर मौजूद रहा। सुरेंद्र सिंघल जी ने कार्यक्रम की सदारत की। इस अवसर पर असलम राशिद जी को "बारादरी सृजन सम्मान" से भी नवाज़ा गया। सुभाष अखिल, सुभाष चंदर के अतिरिक शहर के और भी लोग मौजूद रहे।
आशीष द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना उम्दा रही के अतिरिक्त नाज़ जी,माला कपूर जी ने अच्छी प्रस्तुति दी। मैंने भी अपनी एक ग़ज़ल पढ़ी, मुलाहिजा फरमाएं:-
जुबां तो है लेकिन, जुबानी नहीं है
ये जम्हूरियत की, निशानी नहीं है
मिला खा लिया, वरना फाक ए मस्ती
किसी एक घर की, कहानी नहीं है
भले छीन ले शम्स, बीनाई मेरी
हकीकत से नज़रे, चुरानी नहीं है
हटा बद नज़र, अपनी मासूम जां से
तेरे घर में बेटी, सयानी नहीं है
जो जुल्मों सितम, देखकर भी न फड़के
किसी काम की वो, जवानी नहीं है
कि दहशत में इंसा, जिए जा रहा है
बची बाकी खू में, रवानी नहीं है
मेरे '' हाथों में, खंजर ही दे दे
रगों में लहू, मेरे पानी नहीं है
-प्रदीप भट्ट-
लेकिन महफ़िल लूटी महफ़िल की सदारत कर रहे वरिष्ठ शायर सुरेंद सिंहल जी ने एक से बढ़कर एक ग़ज़लें पढ़ी। उनकी ग़ज़लों ने सोचने को मजबूर कर दिया कि हमें अभी और मेहनत करने की ज़रूरत है। अंत में इतनी अच्छी महफ़िल में भी लोग ये जताने से गुरेज नहीं करते कि वो बहुत बड़े साहित्यकार और जाने क्या क्या हैं बाक़ी सब कुछ भी नहीं। आए पढ़े और फुर्र। ऐसों साहित्यकारों की सिर्फ़ जय कह दो वरना क्या पता कोई इसमें भी यूजीसी घुसेड़ दे। 8 बजे छूटे फिर वही अपनी सपनों की रानी रेपिडो महारानी की सेवाएं लेते हुए वापिस अपने दड़बे में। सुना है मेरी परेशानी को देखते हुए मोदी जी 22 फ़रवरी को रेपिडो के पूरे रूट को खोल रिए हैं।