Monday, 16 February 2026

"अकल दाढ़ कब निकलेगी"

      "अकल दाढ़ कब निकलेगी" 

"नादान की दोस्ती जी का जंजाल" 

         क्यूँ भई ये कहावत तो आप सबने सुन ही रक्खी होगी न कि "नादान की दोस्ती जी का जंजाल"। जे क्या कह रिए हो मियां न सुनी तो भैय्ये हम सुना रिए हैं न कान में कच्ची घानी वाला सरसों का तेल जिसमें बढ़िया वाली धांस आए और हां तेल भी काली सरसों वाला पीली वाली तो कतई न। वो क्या है न पीली वाली सरसों से पूरियां तो बढ़िया वाली बन जाएंगी पर कान में डालने के लिए तो काली वाली सरसों का तेल ही चाहिए। एक बार डालो मैल निकलते ही छः महीने तक सब कुछ ऐसे सुनाई देगा जैसे कोई उधारी वाला उधार चुकता करने धीरे से आवाज़ लगाए और आपके कान फटक से उसकी आवाज़ पहचानकर झटक से अपने दरवज्जे पर पहुंच जाए कि ला भैय्या कित्ता लिया था और कित्ता देने आया है और बाक़ी कित्ता बचा और बता के जा बचा हुआ कद वापिस करेगा। मतबल नू है कि तेल एक काम अनेक आप समझ रिए हो न मैं क्या नही बताना चाहता। समझदार को इशारा जो काफ़ी है लो जी एक पैराग्राफ में दो कहावतें वो भी बढ़िया वाली चलो इसी बात पे बत्तीसी दिखाओ।

         ये ऊपर जो हमने दो कहावतों का घाल मेल कर खाका खींचा है न उसकी जड़ में आजकल राहुल की हरकतें हैं मियां भई ऐसी ऐसी लंपटई बातें वो भी संसद के अंदर बाहर दोनों तरफ़ सच कै रिया हूं मियां कई बार तो यूं लगे बंदा समझदार कब होगा। अरे भाई कोई इसे समझाओ कि तुम्हारी उमरिया ढल रही है और समझदरिया घट रही है। बखत से समझ जाओ तो ठीक है वरना दो चार साल बाद कांग्रेस में ऐसा कोई न दिखेगा या समझ लो बचेगा जो तुम्हें समझा सके। आख़िर उमरिया है जब तोहार बढ़ेगी तो मियां उनकी भी तो बढ़ेगी। अगर कुछ घटेगी तो समझदारी वो तुम्हारी वाली "स-पेशल" उनका क्या है वो तो पुराने वाले कांग्रेसी चावल हैं जिस दिन उन्हें लगा कि अब यहाँ चावल क्या दाल भी न पकेगी वो भी ग़ुलाम नबी आज़ाद की तरह छेदी कांग्रेसी नाव से उतर लेंगे और चढ़ लेंगे नसीमुद्दी सिद्दीकी की तरफ़ समाजवादी पार्टी की नाव में। वैसे भी नाव तो सब पार्टियों की काठ की ही बनी हुई है बस देखना ये है छेद किसमें कम हैं। आख़िर महत्वाकांक्षी होना कोई गलत बात थोड़े है मियां।

         जनरल मनोज मुकुंद नरवडे जी की किताब फोर स्टारस ✨ ऑफ डेस्टिनी की पांडुलिपि 2023 से रक्षा मंत्रालय की फ़ाइलों में यहां से वहां टहलती हुई अब तक एप्रूवल की बाट जोह रही है। अब ये भी तो नही कह सकते न कि धूल फांक रही है अब भैय्या मोदी जी के राज में एक काम तो बढ़िया हो ही गया है कि इससे पहले की बाबू अपनी बाबूगिरी दिखाकर फाइल को फ्रिज में डाल दे (आम बोलचाल की सरकारी भाषा में)  वो बाबू मोशाय खुदई फ्रिज में लम लेट हो जाते हैं इसलिए सब कुछ टाइम बाउंड है इत्ते दिन इसके पास इत्ते दिन उसके पास बीच में जहां फाइल अटकी उस स्तर के बाबू की आत्मा कहां कहां भटकेकी जे तो बस मोदी जी जाने या अपने अमित भईया। लेकिन भैय्या जिस किताब के प्रकाशन से देश की सुरक्षा व्यवस्था जुड़ी हो वहां उसकी पांडुलिपि को कई कई लेंसो की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। हम सभी जानते हैं कि ये किताब 15 जून 2020 की चीन और भारत की गलवान घाटी की झड़प पर आधारित है। अब इतनी महत्वपूर्ण घटना पर आधारित क़िताब में क्या दिखाना है क्या छिपाना है ये तो सरकार ही तय करेगी न। वैसे भी महाराज फ़ौज के तीनो अंगों में एक ही चीज़ कॉमन है और वो है डिसिप्लिन बिना डिसिप्लिन किसी भी संस्था का कोई औचित्य नहीं है और ये मामला तो विशुद्ध फ़ौज का है सो दुग्ध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर ही पियेगा। पर एन्नू की लोड ऐ तो LOP हैं जी यानि आप समझ नी रिए हो मियां लोप मतबल गायब और ये महाशय तो जब तक लोप होते ही रहते हैं। "मौज आई फकीर की दिया झोपड़ा फूंक" पर अपना नहीं दूसरों का की तर्ज पर जब मन किया भारत में जब मन किया भारत से बाहर। मेरी समझ में ऐ गल्ल नी आती कि एन्नू कौन इनवाइट करदा है और काई कू। आख़िर अपनी बंदूक में कौन सी गोला बारूद लेकर आते हैं जो भारत में बोलते ही इन पर खुदई  ही वो गोला बारूद फट पड़ता है और ये महाशय हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे का गीत गाते हुए कांग्रेस को दो इंच और पानी में डुबो देते हैं।

         अब आप खुदई समझो जो क़िताब अभी छपी नही ये महाराज उसके विषय में लोक सभा में आएं बाएं शाएं बोलने लगे, स्पीकर ने विषय का सोर्स पूछा तो "कारवां" पत्रिका में छपे लेख का हवाला देने लगे। अब बात तो आगे बढ़नी ही थी बीजेपी ने भी पतंग आसमान में जाने से पहले ही हत्थे से काट डाली। समझदार को इशारा काफ़ी लेकिन समझदार हों तब न महाराज सो स्पीकर पर ठीकरा फोड़ दिया कि स्पीकर लोप को बोलने नहीं दे रहे और अगले दिन घोषणा कर दी कि पूरा विपक्ष स्पीकर ओम बिरला के विरुद्ध नो मोशन कॉन्फिडेंस लाएगा अगले दिन 108 संसद सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस हवा में लहरा दिया लेकिन गलतियां कांग्रेस का पीछा ही नहीं छोड़ती उस नोटिस में भी तीन जगह 2026 की जगह 2025 मेंशन था। ओम बिरला बिफर गए और घोषणा कर दी जब तक फ़ैसला नहीं होगा मैं स्पीकर की सीट पर नहीं बैठूंगा अगले दिन स्पीकर की सीट जगदंबिका पाल जी ने संभाल ली। आदत ख़राब हो जाए तो जाते जाते भी नहीं जाती सो अगले दिन फिर वही रोना धोना और कमाल देखिए अगले दिन भी स्पीकर की सीट पर थे पूर्व कांग्रेसी जगदंबिका पाल, लोप ने उनको पुराना कांग्रेसी होने के नाती नसीहत देने की कोशिश की तो जगदंबिका पाल ने अनावश्यक शोर न मचाने और उन्हें फिर से रुकने और उनकी बात सुनने के लिए कहा पर भाई लोप तो लोप ठहरे नहीं रुके और अब जब रोके से लोप रुके नही तो जगदंबिका पाल ने भी पुरानी खुन्नस में चवन्नी उछालते हुए कह दिया कि अगर आप मेरी सुनते तो विपक्ष में नहीं बैठे होते। लोकसभा में एक क्षण के लिए तो एक दम सन्नाटा पसर गया कांग्रेसियों को काटो तो खून नहीं लेकिन कुछ क्षण बाद फिर वही हो हल्ला शायद शास्त्रों में इसे ही बेशर्मी कहा गया है। 

         चलो यहां तक तो ठीक था लेकिन दो दिन के बाद नरवडे जी की क़िताब "फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी" की पूरी किताब ही सदन में लहरा दी लहराने वाला भी एक मात्र 'लोप ' शायद एक ही किताब छपी या छपवाई गई होगी। शानदार कवर पेज़ की हल्की मोटी सी क़िताब लेकिन उसके अन्दर क्या है ये तो 'लोप' ही जाने। जिस तरह कुछ समय पहले कांग्रेस जनों ने लोकसभा में संविधान संविधान खेला था शायद उसी तर्ज़ पर नरवडे जी की अनपब्लिश्ड किताब के साथ खेला किया गया लेकिन लेकिन लेकिन लोप और कांग्रेसियों को अंदाज़ा भी नहीं था ये खेल उन पर उल्टा पड़ने वाला है आख़िर संविधान तो पब्लिश्ड है किंतु यह क़िताब "फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी" unpublished है और सीक्रेट एक्ट के दायरे में आती है सो जब तक कांग्रेसियों के दिमाग़ की बत्ती जलती तब तक राम नाम सत्य हो चुका था। अब चर्चा चल पड़ी कि बीजेपी राहुल यानि लोप के खिलाफ प्रिविलेज मोशन यानि विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाएगी। कांग्रेस के पुराने बचे खुचे चावलों को पता है कि नरवडे जी के प्रसंग में लोप के विरुद्ध क्या क्या हो सकता है सीक्रेट एक्ट में उनको दो वर्ष की भी यदि सजा हुई तो उनकी संसद सदस्यता जा सकती है शायद लोप को समझ आया और उन्होंने तुरंत शातिराना अंदाज़ में अगले दिन किताब का मुद्दा लोप किया और भारत अमेरिका के बीच हुए करार पर कुछ न समझते हुए किसान के नुकसान का रोना लेकर बैठ गए। 

         किसी भी देश के लिए सत्ता पक्ष के अलावा विपक्ष का मज़बूत होना भी आवश्यक माना गया है चाणक्य नीति भी यही कहती है किंतु यहाँ चाणक्य नीति की किसे समझ है वैसे भी समझने के लिए चाणक्य नीति पढ़नी पड़ेगी और लोप के हैंच मैन तो सारे के सारे ख़ब्बाड़िया यानि लेफ्टिस्ट हैं। लेकिन यहाँ प्रश्न दूसरा है कि जनता ने आपको यानि विपक्ष को इस लायक तो रक्खा कि आप सत्ताधीशों के सामने डटकर खड़े रहें, जनता के हितों के लिए सत्ताधीशों से लड़े लेकिन ये तो खुदई आपस में एक दूसरे का सर फोड़ने पर आमादा हैं तो फिर जनता किससे उम्मीद रक्खे। जाति जाति का खेल खेलने वाले विपक्षियों के रहते जातिवादी यूजीसी बिल कैसे पास हो गया। उड़ता हुआ तीर हवा में जाने से पहले रोका जा सकता था लेकिन बात बे बात पे पोस्टर लहराओ कभी लोकसभा में तो कभी राज्यसभा में और अगर ताज़ी हवा खाने का मन करे तो गांधी जी हैं न उनके पुतले के नीचे खड़े होकर खींसे निपोरो कभी मिमिक्री करो कभी गद्दार गद्दार कहकर अपने ही पुराने साथी का अपमान करो। ये समझ से परे है कि ये अहमकाना ओछी हरकतें राजनीति शास्त्र के किस पन्ने पर लिखी गई हैं जिनका ये मुजाहिरा करते रहते हैं। जहां तक यूजीसी बिल का प्रश्न है ये उड़ता हुआ तीर बीजेपी ने चलाया है देखते हैं 19 मार्च के बाद ये तीर बीजेपी के पिछवाड़े में भी कितना धसता है।

         विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र जिसकी आबादी 140 करोड़ से ज़्यादा ही है कम तो बिलकुल भी नहीं। उस देश का विपक्षी नेता जिसे LOP कहते हैं जिसकी उम्र 55 की है और दिमाग़ अभी भी बचपने की अंधी गलियों में ही भटक रहा है। कहते हैं कुर्सी जिम्मेदारी का एहसास कराती है, कराती होगी महाराज यहाँ तो दूर दूर तक उसका एक भी लक्ष्चण नज़र न आ रहा है। सदन हो या सड़क ये बंदा दिखता है एकदम कड़क लेकिन अंदाज़ ए बयां बिलकुल सड़क छाप..... आप समझ रिए हो न। कुछ लोग उम्र से बड़े हो जाते हैं…
और कुछ लोग उम्र के बाद भी टिफिन-टाइम वाली मानसिकता से बाहर नहीं आते। कुल मिलाकर जैसे क्लास के मॉनिटर ने चॉक छीन ली हो  ना गंभीरता, ना स्थिरता… बस जिद और ड्रामा फुल ऑन। 55 की उम्र कैलेंडर में है, पर दिल-दिमाग अभी भी स्कूल के लास्ट बेंच पर बैठा है! सिर्फ़ महंगे कपड़े पहनना ही शालीनता का पैरामीटर नहीं हो सकता । दम बात में होता है कपड़ों में नहीं।
 
"कहां कब बोलना कितना, समझ में ग़र जो आ जाए 
तो निश्चित मानिए साहिब, कि क़िस्मत भी बदल जाए "

         लेकिन समझदारी और लोप तो दो चुंबकों की तरह नज़र आ रहे हैं जिन्हें जितना पास लाओ वो उतना सटने की जगह दूर हट रहा है। सदन या सदन के बाहर हम वही बोलेंगे जो हमारे मूड में होगा जिसे सुनना हो सुनो वरना लोप के पास एक ब्रह्मास्त्र तो है कि "तुम बीजेपी के एजेंट हो"। वैसे मैं नू कै रिया था राजनीति में सॉफ्टवेयर अपडेट की व्यवस्था नहीं है क्या अगर है तो भैय्या लोप के चाइल्ड वर्ज़न को डिलीट कर कम - स- कम यूथ वाला अपडेट ही मार दो क्यूँ कि बुढ़ापे वाला डाला तो हार्डवेयर क्रश भी हो सकता है। भैय्या एक ठो बात बताओ पचपन की उम्र में इस बंदे अक्ल दाढ़ कब निकलेगी और निकलेगी भी या नहीं। 


प्रदीप भट्ट -17022026
व्यंग्यकार मेरठ 

Tuesday, 10 February 2026

"अपनी सुनाओ फुर्र हो जाओ"

रिपोर्ताज 

"अपनी सुनाओ फुर्र हो जाओ"

"फुर्सत कहां किसी को, सुने जो मेरी दास्तां 
सब अपनी कहने आए थे, कहकर चले गए "

"चरसी यार किसके दम लगाए खिसके"

         न न न आप ग़लती से गलत सोच रिये हो मियां। ये जो कहावतें है न हमारे जीवन में ऐसे रच बस गई हैं जैसे कि आटे में हल्का सा नमक और ठीक ठाक पानी। अब भैय्या रोटी खानी हैं तो पहले गेंहू पीसो फिर आटा गूंथो तब रोटियां खाने को मिलती है। कहने का लब्बोलुआब ये है कि हर घर में कहावतें कहने वाला कोई न कोई दादा दादी, नाना नानी मिल ही जायेंगे जो बच्चों को कहावतों के माध्यम से जीवन का दर्शन समझाने की कोशिश करते हैं पर ये पुनीत कार्य करने वाले ज्यादा तर हमारे बड़े भी निपट से लिए हैं या निपटने वालों की कतार में खाट डालकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं क्यूँ कि अब सब कुछ मुबलिया में जो सिमट कर रह गया है। अब जिस जेन जी को उन्हतर (६९-69) उन्नासी(७९-79) और नवासी (८९-89) का न पता है वो कहावतें क्या ख़ाक समझेंगे जी और चलो समझाने वाले मिल भी जायेंगे पर ससुरा यहाँ 22 सदी की ओर टकटकी लगाए देखने वाले जैन जुआ समझने को तैयार हो तब न। 

         ख़ैर हम खुशनसीब हैं कि हमारे पास भी अनुभव से लबाबल भरी हुई हमारी 83 बसंत देख चुकी और 84 वें बसंत की ओर अग्रसर हमारी प्यारी वाली अम्मा है जिनके पास कहावतों का खज़ाना है इसलिए मैं उन्हें सन्तोष भट्ट उर्फ़ कहावती देवी कहता हूं तो वो प्यार से झिड़क देती हैं, भई उन्हें कित्ती कहावतें याद हैं ये तो उन्हें भी न पता बस मौक़ा मिल जाए और बात से बात निकलते ही तुरन्त ताज़ी ताज़ी कहावत ठोक देती हैं। ये विषय अलग है कि वो ताज़ी ताज़ी कहावतें भी उन 30-40 बरस पुरानी गज़लों जैसी होती हैं जिन्हें घुटे हुए शायर हर महफ़िल में ताज़ा ग़ज़ल कहकर दर्शकों को परोस देते हैं। कुछ कहावतें तो ऐसी हैं भाई साहब जिन्हें समझने में हमें भी पसीने छूट जावें हैं जी। अच्छी वाली बात ये है कि उनका जन्म 9अगस्त -1942 का है और हमारा 27 फ़रवरी (देखा हम kitteee 🤓 स्मार्ट हैं बात बात में अपना अवतरण दिवस बता दिया है, दोस्तों खाली शुभकामनाएं मति देना कछु गिफ्ट विफ़ट भी भिजवाओ भाई साहब) यानि हम अपनी मां के पक्के वाले 9 नम्बरी बेटा हैं। इसलिए उनकी कहावत कहने की कला हममें आनी स्वाभाविक प्रक्रिया का अंग है सो ये कला हमें भी आ गई लगती है। आख़िर हमारे पास मां भी है और ढेर सारी कहावतें अलग से सो असर तो आना ही है। सो ऊपर जो कहावत हमने कोट की है ये उन्होंने ही हमें कभी सुनाई होगी बस इस बार का रिपोर्ताज लिखने बैठा तो रिपोर्ताज का यही विषय मुनासिब लगा। अब जिसे पसन्द आए तो ठीक नहीं तो भैय्या अपने हिसाब से एडजस्ट कर लो भई म्हारे पास और भी तो काम हैं जी।

         सो हुआ यूँ कि जब हमें दिसम्बर के आखिरी हफ़्ते में आदरणीय गोविन्द गुलशन जी की तबियत नासाज़ होने का समाचार मिला तो हम मथुरा कार्यक्रम में थे 30 की शाम तक घर आए और तय किया कि एक दो दिन में मिज़ाज पुर्सी के लिए गाजियाबाद होकर आते हैं लेकिन लेकिन लेकिन आंग्ल वर्ष के प्रथम दिन ही दुखद सूचना प्राप्त हो गई। खैर तेरहवीं में रामलीला ग्राउंड में आयोजित शोकसभा में हाज़िरी लगाई। मुम्बई ग़ज़ल कुम्भ-२०२३ में पांच सात मिनिट की मुलाक़ात वो ट्रेन पकड़ने के लिए निकल रहे थे दो चार शेर उन्होंने कहे दो चार हमनें फिर वो निकल लिए उसके बाद हम भी हैदराबाद छोड़कर मेरठ आ बसे फिर "महफ़िल ए बारादरी" में मुलाक़ात हुई और फिर ये मनहूस ख़बर। अब जब मित्र आलोक यात्री जी ने 7 फ़रवरी - गुलशन जी के अवतरण दिवस पर उनकी पुस्तक के विमोचन का आमंत्रण भेजा तो हाज़िरी न देने का तो प्रश्न ही नही था सो मेरठ स्थित गढ़ रोड़, दिल्ली रोड़ की सड़कों के गड्ढे गिनते गिनते ठीक अपरान्ह 2.30 पर हाज़िरी लगा दी। मौसम भी रंग ऐसे बदल रहा है जैसे गिरगिट या उधार लेकर उधारी वाला उधारी लौटाने के नाम पर रंग बदलता है। लेकिन इस बार इस 🍺 हमने ठंड से कोई पंगा न लेने की कसम जो खा रक्खी है सो अपनी गात पर कई लेयर लपेट ली।

         पूर्व की भांति द्वार पर यात्री जी ने स्वागत किया, चाय बिस्किट और भी कुछ था याद नी, बस बढ़िया वाली चाय की चुस्कियों के बीच दो तीन जन से गप्पीयाए और पहली फुर्सत में दूसरी पंक्ति की प्रथम सीट 🪑 लपक ली। सारा खेल सीट का ही तो है गुरु। ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा और प्रोग्राम 15.20 पर शुरू हो गया। ऐंकरिंग की हल्के वाली ओपनिंग हमेशा की तरह आलोक यात्री जी ने की फिर राशिद भाई ने वन डाउन बैटर की तरह अपनी एंकरिंग से समा बांधा। प्रथम सत्र में गुलशन जी के विषय में कुछ लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए कुछ ने कुछ भी न कहना ही मुनासिब समझा हम भी उनमें से एक रहे। 

         दूसरे सत्र में काव्य की छटा को बिखेरने में पुनः राशिद भाई ने अपनी एंकरिंग से मजबूती प्रदान की। अभी सिलसिला शुरू ही हुआ था तभी मुख्य द्वार पर हलचल महसूस हुई सभी की तरह हमने भी नज़रे घुमाई तो चेहरे पर थोड़ी सी उदासी लिए हुए इक़बाल अशहर साहब नज़र आए निश्चित उन्हें इस श्रद्धांजलि सभा की ख़बर किसी और से मिली होगी लेकिन वे गुलशन जी की याद को पलकों में संजोए आए और कुछ किस्से हम सब से साझा भी किए के अतिरिक्त गुलशन जी के गुरु भाई कृष्ण कुमार नाज़ मुरादाबाद से विशेष रूप से तशरीफ़ लाए। अल्का मिश्र कानपुर से गुलशन जी की ग़ज़लों की चौथी किताब "कल न कल तो तेरे.." को कम समय में छपवाकर लाई वरन् इस मौक़े पर किताब का रस्म-ए-इजरा भी हुआ। गुलशन जी की शागिर्द और बारादरी की संस्थापक अध्यक्ष डॉ. Mala Kapoor, संरक्षक डॉक्टर उर्वशी अग्रवाल, संयोजक आलोक यात्री के अतिरिक्त गुलशन जी का पूरा परिवार गुलशन जी के अवतरण दिवस पर मौजूद रहा। सुरेंद्र सिंघल जी ने कार्यक्रम की सदारत की। इस अवसर पर असलम राशिद जी को "बारादरी सृजन सम्मान" से भी नवाज़ा गया। सुभाष अखिल, सुभाष चंदर के अतिरिक शहर के और भी लोग मौजूद रहे।
         
         आशीष द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना उम्दा रही के अतिरिक्त नाज़ जी,माला कपूर जी ने अच्छी प्रस्तुति दी। मैंने भी अपनी एक ग़ज़ल पढ़ी, मुलाहिजा फरमाएं:-

जुबां तो है लेकिन, जुबानी नहीं है 
ये जम्हूरियत की, निशानी नहीं है 

मिला खा लिया, वरना फाक ए मस्ती 
किसी एक घर की, कहानी नहीं है 

भले छीन ले शम्स, बीनाई मेरी 
हकीकत से नज़रे, चुरानी नहीं है

हटा बद नज़र, अपनी मासूम जां से 
तेरे घर में बेटी, सयानी नहीं है 

जो जुल्मों सितम, देखकर भी न फड़के 
किसी काम की वो, जवानी नहीं है 

कि दहशत में इंसा, जिए जा रहा है 
बची बाकी खू में, रवानी नहीं है 

मेरे '' हाथों में, खंजर ही दे दे 
रगों में लहू, मेरे पानी नहीं है
-प्रदीप भट्ट-

         लेकिन महफ़िल लूटी महफ़िल की सदारत कर रहे वरिष्ठ शायर सुरेंद सिंहल जी ने एक से बढ़कर एक ग़ज़लें पढ़ी। उनकी ग़ज़लों ने सोचने को मजबूर कर दिया कि हमें अभी और मेहनत करने की ज़रूरत है। अंत में इतनी अच्छी महफ़िल में भी लोग ये जताने से गुरेज नहीं करते कि वो बहुत बड़े साहित्यकार और जाने क्या क्या हैं बाक़ी सब कुछ भी नहीं। आए पढ़े और फुर्र। ऐसों साहित्यकारों की सिर्फ़ जय कह दो वरना क्या पता कोई इसमें भी यूजीसी घुसेड़ दे। 8 बजे छूटे फिर वही अपनी सपनों की रानी रेपिडो महारानी की सेवाएं लेते हुए वापिस अपने दड़बे में। सुना है मेरी परेशानी को देखते हुए मोदी जी 22 फ़रवरी को रेपिडो के पूरे रूट को खोल रिए हैं।


-प्रदीप भट्ट -13022026



Saturday, 31 January 2026

"रिटर्न गिfफ"्

"रिटर्न गिफ्ट"

         वीरेंद्र को गोरखपुर के जनता इण्टर कॉलेज में ड्यूटी ज्वाइन किए तीन बरस हो चुके थे। इस आशा के साथ वह शिक्षा निदेशालय के साथ निरन्तर सम्पर्क में था उसका उसका ट्रांसफर गृह नगर बागपत या उसके आस पास के किसी भी जिले में कहीं भी हो जाए लेकिन साहब अब अगर ट्रांसफर भी यूं ही हो जाया करे तो फिर सरकारी काम को ईनाम स्वरूप पद्मश्री न मिल जाए। इधर घरवाले उसे शादी जल्दी करने के लिए घेरे हुए थे आख़िर वो करे तो क्या करे। शादी के बाद नई नई पत्नी को कहां इत्ती दूर लेकर जाएगा। दस तरह के लफड़े नई बहु को गोरखपुर ले गया तो घर वाले तो फिर भी शायद कुछ न बोले लेकिन मोहल्ले वाले ताने मार मार के उसे ये कहकर न जीने देंगे कि इधर शादी की उधर बहु को लेकर मियां जी गोरखपुर। आख़िर शादी अपने लिए की थी या मां बाप की सेवा के लिए, भले ही उनसे उनकी औलाद काबू में ना आ रही हो लेकिन हर बात में बच्चों पर टीका टिप्पणी करने वाले मां बाप कि ये मति करियो वो मत करियो वरना चार लोग क्या कहेंगे। अब इन्हीं नासपीटे "चार लोग क्या कहेंगे" के फेर में पड़कर हर घर की हर मोहल्ले की यही नौटंकी देखकर देखकर वीरेंद्र भी बचपने से अब ब्याह के काबिल हो गया था। आख़िर थक हारकर वीरेंद्र ने शादी के लिए हां कर दी और एक महीने की छुट्टी अप्लाई कर दी और आज ही उसे सूचना मिली कि उसकी छुट्टी मंजूर हो गई है। उसने पहली फुर्सत में शामली में तैनात बड़े भाई सुरेन्द्र जो कि पुलिस में दरोगा हैं को सूचना भेजी कि भैय्या शादी की तारीख़ लॉक कर दो। मैं अगले शनिवार सुबह बागपत पहुंच रहा हूं।

         वीरेंद्र के हां भरते ही पूरे घर में शादी की तैयारी शुरू हो गई। चूंकि लड़की पहले ही देखी जा चुकी थी बस इंतज़ार था तो वीरेन्द्र की हां का और आज वो भी हो गई। लड़की बिरादरी की ही थी सहारनपुर की रहने वाली और गागलहेड़ी के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में PO।
लड़की खूबसूरत हो और सरकारी बैंक में अफसर भाई साहब इसे ही शास्त्रों में सोने पे सुहागा की उपमा दी गई है। पंडितों का भरा पूरा परिवार, लड़की का बड़ा भाई फ़ौज में कर्नल छोटा भाई आई आई टी कानपुर में इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष में अध्ययन रत्त पिता कृषि विभाग में निदेशक। आप यूं समझ लो कि वीरेंद्र की तो पांचों उंगलियां घी में और सर कढ़ाई में वाली स्थिति हो गई। अब वीरेन्द्र का परिवार भी अपर मिडिल क्लास श्रेणी का ठहरा। पिता शंकर शर्मा पंजाब नेशनल बैंक में मैनेजर, बड़ा भाई पुलिस में एक छोटी बहन निकिता जिसकी शादी अम्बाला के बड़े बिजनेस वाली फैमिली में दो साल पहले ही हो चुकी। 27 बीघे जमीन, टयूबवेल, ट्रैक्टर, एक फार्म हाऊस। मतलब जी कुल मिलाकर दोनों परिवार धन धान्य से भरपूर। 

         शनिवार वाया दिल्ली होते हुए वीरेन्द्र भी घर आ पहुंचा और लग गया वो भी अपने ब्याह की तैयारियों में। भले ही बारात शामली से सहारनपुर जानी थी लेकिन बारात तो बारात है जनाब। लोग कहते हैं लड़की की शादी में हज़ारों काम भाई साहब लड़कों की शादी में उससे दो चार काम फ़ालतू ही होते हैं अब जो करे वो ही समझे। सो पहली फुर्सत में वो छोटी बहन को लिवाने अम्बाला जा पहुंचा। आख़िर शादी के घर के सौ काम अम्मा क्या क्या संभालेंगी, भाभी ने फोन पर ही बता दिया दीपू के पेपर अगले हफ़्ते तक चलेंगे सो मैं तभी आ पाऊंगी। खैर आज ये कल वो करते करते शादी का दिन भी आ पहुंचा। शादी बड़े धूमधाम से बागपत से सहारनपुर पहुंची और हंसी खुशी में सभी मांगलिक कार्यों का निष्पादन करते हुए बारात वापिस शामली आ पहुंचीं। सनातनी शादी में हज़ार तरह के रिचुअल होते हैं सो तीन चार दिन फिर यूं ही निकल गए। इधर वीरेंद्र की छुट्टी में भी दस ही दिन शेष रह गए थे सो हनीमून ट्रिप को गोवा की जगह शिमला तय किया गया और वीरेन्द्र और शाश्वती शादी के सुखद पलों को ख्वाबों में सजाते हुए अपनी सेंट्रो कार में सवार होकर शिमला जा पहुंचे।

         होटल बुकिंग बड़े भाई ने पहले ही कर दी थी सो कार सीधे होटल ओबेरॉय सिसिल जा पहुंची। फ्रेश हुए और शिमला लोकल घूमने निकल पड़े अगले दिन कुफ़री भ्रमण किया। बागपत से शिमला के सफ़र में वीरेन्द्र ने बातचीत का सिलसिला प्रारम्भ किया तो शाश्वती को यह अहसास हो गया था कि वीरेन्द्र शर्मिला तो नहीं है लेकिन अनावश्यक बात करना पसन्द नहीं करता। अब शादी तो सौ प्रतिशत घरवालों की मर्ज़ी से ही हुई थी इसलिए वीरेन्द्र रिश्ते की शुरुआत में किसी भी प्रकार की ज़ल्दबाज़ी नहीं चाहता था। वीरेंद्र को जहां पीजीटी टीचर बने तीन बरस हो गए थे वहीं शाश्वती पहले ही प्रयास में डायरेक्ट PO भर्ती हुई थी। वीरेंद्र शाश्वती को इस छोटे से प्रयास में ज्यादा नहीं लेकिन थोड़ा सा जरूर समझना चाहता था ताकि सांसारिक जीवन की शुरुआत की नींव पक्की हो सके इसलिए बातें करते करते ही शाश्वती से कहा ये सही है कि हम दोनों के परिवार ही समृद्ध हैं किंतु मेरा मानना है कि हमें अपनी गृहस्थी का खर्च स्वयं वहन करने की आदत डालनी चाहिए। शाश्वती ने धीरे से अपना बायां हाथ वीरेन्द्र के दाएं हाथ में देते हुए अपनी मौन सहमति प्रकट कर दी थी। वीरेन्द्र एक पल के लिए तो रोमांचित हो उठा था फिर धीरे से शाश्वती के कान में फुसफुसाया धन्यवाद जीवन संगनी।

         पिछले दो दिनों में वीरेन्द्र और शाश्वती कुछ कहकर कुछ मौन रहकर एक दूसरे के विषय में इतना तो समझ गए कि भूकंप के छोटे मोटे झटकों से तो हमारे गृहस्थ जीवन को कुछ नहीं होने वाला जब तक कि भूकंप की तीव्रता रिएक्टर स्केल पर 6,7 की न हो।
जब मन मिल जाएं तो तन स्वत: मिल ही जाते हैं। सो जब सुबह शाश्वती फ्रेश होकर बाथरूम से लौटी तो टेबिल पर एक बड़ा से लिफ़ाफे पर बड़े अक्षरों में अपना नाम लिखा देखकर असमंजस में पड़ गई। पीछे पलटकर देखा तो वीरेन्द्र बाथरूम में फ्रेश होने जा चुका था। वो सोचने लगी कल रात ही वैवाहिक जीवन की शुरुआत करने से पहले वीरेन्द्र ने उसे ॐ लिखा पैंडुलम सोने की चेन के साथ गिफ्ट किया था फिर ये लिफ़ाफे पर मेरा नाम और इसमें क्या है सोचते हुए झिझकते हुए शाश्वती ने लिफ़ाफ़ा खोला तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा वीरेन्द्र ने एक करोड़ की टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी उसके नाम से खरीदी थी और उसे भेंट करने का दिन आज चुना था। शाश्वती बहुत जोर से हंस पड़ी जिसकी आवाज़ बाथरूम से झांक रहे वीरेन्द्र के कानों तक भी गई। थोड़ी देर बाद जब वीरेन्द्र बाथरूम से लौटा तो शाश्वती ने गले लगकर वीरेन्द्र को धन्यवाद में बस इतना कहा मुझे आप पर गर्व है मेरे जीवन साथी।

         होटल छोड़ते छोड़ते भी वीरेन्द्र और शाश्वती को दिन के 11 बज गए। दोनों हंसते मुस्कुराते एक बार फिर से मॉल रोड घूमने निकल पड़े। दो घण्टे कब निकल गए पता ही नही चला।  दोनों ने लंच लिया और मॉल रोड से परिवार के सभी सदस्यों के लिए कुछ न कुछ गिफ्ट खरीदे। शाश्वती सेंट्रो कार की डिक्की में सब कुछ व्यवस्थित करने में व्यस्त हो गई और वीरेन्द्र रास्ते के लिए कुछ रिफ्रेशमेंट लेने सामने की दुकान में चला गया। शाश्वती सब कुछ डिक्की में व्यवस्थित करने के बाद वीरेन्द्र का इंतज़ार करने लगी। थोड़ी देर में वीरेन्द्र दोनों हाथों में सामान समेटे आ पहुंचा और सामान को पिघली सीट पर रक्खा तभी शाश्वती बोली अब कालका तक गाड़ी हम चलाएंगे शर्मा जी। वीरेंद्र ने एक पल को शाश्वती की तरफ़ देखा फिर बोल पड़ा जैसा आपका आदेश देवी और घूमकर कार के दूसरी तरफ का दरवाज़ा खोलकर अगली सीट पर बैठने लगा तो सीट पर एक बड़े से लिफ़ाफे पर अपना नाम और लिफ़ाफे के बाईं ओर रिटर्न गिफ्ट लिखा देखकर चौंक पड़ा। उसने ड्राइविंग सीट पर बैठी शाश्वती को देखकर आंख के इशारे से पूछा क्या है ये तो शाश्वती बोल पड़ी रिटर्न गिफ्ट है शर्मा जी खोलिए तो सही। वीरेंद्र ने लिफ़ाफ़ा खोलकर देखा तो उसमें 50 लाख का लाइफ़ इंश्योरेंस अपने नाम से देखकर चौंक पड़ा। इससे पहले कि वो कुछ पूछता शाश्वती बोल उठी शर्मा जी शादी की तारीख़ तय होते ही मैंने आपकी डिटेल्स इसी लिए मंगाई थी आपने समझा ये डिटेल कार खरीदने के लिए है जब कि ये डिटेल्स दोनों कामों के लिए थी। पिछले तीन दिनों की समझ के आधार पर एक बात तो निश्चित है हम दोनों ही जिन्दगी की अहमियत समझते हैं। नए वैवाहिक जीवन की शुरुआत अगर इस तरह की समझदारी से हो रही है तो शर्मा जी निश्चिंत रहें हमें कोई भूकम्प हिला भी नही पाएगा। तो चलें शर्मा जी! जिन्दगी का स्टेयरिंग एक महिला के हाथ में होने से आपको आपत्ति तो नहीं होने वाली आपको ख़ुशी होगी ऐसी आशा है।

प्रदीप डीएस भट्ट -2801202

Saturday, 17 January 2026

"ये सरकार गिरती क्यूँ नहीं है "

"ये सरकार गिरती क्यूँ नहीं है "

         आपने टीवी पर बांगर सीमेंट का एक एड देखा होगा जिसमें बोमन ईरानी कहते हैं "ये दीवार टूटती क्यूँ नहीं" तभी पार्श्व में एक आवाज़ गूंजती है "ये दीवार बांगर सीमेंट से बनी है टूटेगी कैसे" आजकल अपने देश के हालत भी कुछ कुछ ऐसे ही हैं। सभी विपच्छी (विपक्षी) पार्टियों के नेताओं के पता नहीं कहां कहां सूजन आई पड़ी है। हर दिन हर दो घंटे में कोई न कोई लपड़ियाया सा नेता घंटा बजाकर घोषणा करता है बस कल सरकार चली जाएगी या अमुक दिन तक मोदी खुदई इस्तीफ दे देंगे अब इन  घुडचंदों को कौन बताए कि मोदी और इस्तीफ़ा अजी किस जमाने के आदमी तुम हो। बेटा मोदी का बस चले तो वो तुम्हारा इस्तीफ़ा तुम्हारी घरवाली से लिखवा ले और भाई साहब वो घरवाली भी चांदी जैसे दांत चमकाती हुई जय मोदी जय मोदी करते हुए इस्तीफ़ा सोने की तश्तरी में सजाकर प्रधान सेवक के चरणों में समर्पित कर देगी यानि "तुम्हारी बिल्ली तुम्हें ही म्याऊं" और ये चले हैं जी इस्तीफ़ा इस्तीफ़ा खेलने। मियां कभी चाय पे भी चर्चा किया करो सच्ची सच्ची कै रिया हूं कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा।

         जब 2014 में बीजेपी सत्ता में आई तो विपच्छी पार्टियों को लगा कि बिल्ली के भाग से छींका टूट गया है कोई बात नही 2019 में हम इन्हें ऐसी पटकनी देंगे कि इनके सारे अंजर पंजर ढीले पड़ जाएंगे। लेकिन लेकिन लेकिन जनाब बीजेपी चाणक्य की फॉलोवर वाली पार्टी है और वो भी बड़े वाली आठ कदम पीछे रखती है फिर एकदम से एक सौ आठ कदम आगे, अब कर लो क्या करोगे। 2019 में पूरे जोर से झांसी वाली रानी की तरह लड़ी और लो जी 302 सीटें लेकर विपक्ष की कमरिया ही तोड़ ली। सरसों के झांज वाले तेल में जबरन पकाए गए नारे "चौकीदार चोर है" के नारे की सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी अम्मा बुआ की कि बाबा को माफ़ी मांग कर ही पिंड छुटा। धारा 302 तो पहले से ही फेमस है अब बीजेपी की 302 सीटों ने ऐसा कहर ढाया कि जिधर देखो उधर खलबली खलबली की वोटिंग की जगह वेटिंग मशीन लग गई। अब इसी बौड़मगिरि में विपच्छी पार्टियों के नेताओं ने अपनी बौड़मगिरि का मुज़ाहरा हर जगह पेश करना शुरू कर दिया और तो और जिसने कभी वोटिंग मशीन का बटन तक भी नहीं देखा था वो भी बहुत बड़े ज्ञानी बाबा की तरह हर चैनल पर फुदक फुदक कर ज्ञान बघारने लग गया I लेकिन नतीजा तो वही ढाक के तीन पात होना था और हुआ भी। अब कीट पतंगों की तरह विपच्छी दल भी तिलमिलाए तिलमिलाए से इधर से उधर और उधर से इधर अपना दुखड़ा सुनाते फिर रहे हैं लेकिन वे जिसे भी सुनाने जाएं उसके पास उसका ख़ुद का पर्सनल सा कुछ ज्यादा ही बड़ा दुखड़ा तैयार है अब सब अपनी सुनाना चाहते पर दूसरे की सुनने को कोई राज़ी ही नहीं। अब बेचारा करे तो क्या करे सिवाए अगले पांच बरस तक ठलुआ बैठकर इंतजार करने के।

         जो पत्रकार नेता का चोला पहनकर फोन पर ही कैबिनेट तक बना देते थे अब उनके फोन में इत्ता भी बैलेंस नही कि वो मिस कॉल भी मार सकें। यानि "ग़रीबी में आटा गीला" वाली नौबत आ गई है भाई साहब! एक बहुत पुरानी कहावत है "पहली जीत मंगाए भीख" अब ऐसे महारथियों की आत्मा दिन में तीन बार भविष्य वाणी करने को उछाले मारती है वो भविष्यवाणी कर भी देते हैं लेकिन ससुरी पूरी एक भी नी हो री। ऐसी आत्माओं में एक नाम है पुण्य प्रसून बाजपेई! भाई साहब एक ठो घटना याद आ गई जब श्रद्धेय अटल जी प्रधानमंत्री बने तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में हर चैनल का पत्रकार उनसे सवाल कर रहा था और अटल जी अपने अंदाज़ ए बयां से सबको सन्तुष्ट भी कर रहे थे कि पुण्य प्रसून खड़े हुए और जैसे ही उन्होंने अपना नाम बोला मैं पुण्य प्रसून बाजपेई फलाना से तुरन्त अटल जी ने कहा यहां एक ही बाजपेई काफ़ी है। अब तनिक सोच के देखो कित्ता बड़ा दाग़ लगा था उस दिन बेजत्ती में। तो हुज़ूर आजकल ये सरकार गिरवाने वाले नजूमियों की लिस्ट में प्रथम पायदान पर कब्ज़ा जमाए बैठे हैं।

         ये अकेले ना हैं जिन्हें सरकार गिरवाने का शौक़ हो सुधीर, आकाश, रविश कुमार, अभिसार, अजित अंजुम और हां बरखा रानी भी तो हैं ये वहीं है जिसे जनता ने कोरोना काल में लाशों पर रखने वाली लड़कियों को गिनकर पत्रकारिता का धर्म निभाते देखा था वो भी टीवी पर किसी को उस चैनल का नाम याद हो तो उसकी स्मृति को नमन वो भी दूर से। जब से बीजेपी सत्ता में आई है और मोदी प्रधानमंत्री बने हैं इनके सपनों को पंख तो क्या लगते उल्टे ये  पँख विहीन हुए घूम रहे हैं । ये सारे के सारे भविष्यवक्ता बने बैठे हैं ये और बात की इनकी एक्को भविष्यवाणी सीधी न पड़ रही है उल्टे मोदी के प्रकोप से इन सगरों की आत्मा अंधेरी काल कोठरी में चमगादड़ की मानिंद उल्टी लटकी हुई है। अरे हां एक ठो नाम तो छुट ही गया वो  लखनऊ वाले 4 पीएम वाले संजय शर्मा, अगर किसी को मोदी सरकार गिरवानी हो तो बेहद सस्ते दामों पर ये और पुण्य दोनों विशेषज्ञ सरकार गिरवा देते है। सुबह, दोपहर और शाम कभी भी सरकार गिरवा सकते है। रात में गिराने के स्पेशलिस्ट है। सरकार गिराने के लिए बहुत उम्दा थीम देते है, क़यामत की रात, क़ातिल रात। कभी कभी तो लगता है पहले रामसे ब्रदर्स की हॉरर फ़िल्में लिखते थे। रामसे ब्रदर्स से ध्यान आया जब भी उनकी हॉरर फिल्म में कोई बेहद डरावन सीन आने को होता था तो तुरंत उस डर को कम करने के लिए एक मसखरा हाज़िर हो जाता था। बस कुछ ऐसा ही हाल है इन लपड़ियाओ का। 

         वैसे ये इत्ते काबिल वाले पत्रकार हैं कि अगर किसी पार्टी के पास मुख्यमंत्री का चेहरा न हो तो ये बढ़िया वाली पत्तल चाटकर आपको दूसरे दल से मुख्यमंत्री एक्सपोर्ट भी करा देते हैं लेकिन बात अगर प्रधानमंत्री बनवाने की हो तो इनके पास एक अदद  प्रधानमंत्री भी है।आप चाहें या न चाहें लेकिन ये महाशय हर पार्टी को कन्विंस करते हैं कि पार्टी आपकी हुई तो क्या हुआ प्रधानमंत्री तो ये बंदा ही बनेगा अब इस चक्कर में इंडी गठबंधन मिन्डी ठगबंधन हुआ जा रहा है। अब इन घपड़चौथ को कौन समझाए कि भारत में गांव के प्रधान का भी एक ही सपना होता है कि कुछ जुगाड़ लगे तो वो भी प्रधानमंत्री बन जाए भले ही दो दिन के लिए और केजरू महाराज तो प्रधानमंत्री पद की हवस में पंजाब तोड़कर उसका प्रधानमंत्री बनने तक का ख़्वाब पाले बैठा था।

         भाजपाई कहते हैं कि पीएम मोदी अठारह अठारह घंटे काम करते है। विपक्षी इसे तंज में देखते है लेकिन इसके पीछे का असली सच है कि पीएम मोदी पिछले ग्यारह सालों से रात को सो नहीं पाते है क्योंकि उन्हें भय है कि पुण्य प्रसून और संजय शर्मा और इन जैसे जाने कितने लपड़ झंडीस जाने कब उनकी सरकार गिरवा दें। इसी डरावनी संभावना को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आप को चौकीदार कहकर संबोधित किया था। डर सबको लगता है जनाब पर ये डर ससुरा मोदी का कुच्छो न बिगाड़ पा रिया है। अब जिससे भय भी भयभीत हो उसी को तो मोदी कहा गया है। यकीं न आए तो कोशिश करके देख लो मियां। अगर शरीर के अंग प्रत्यंग से ढाई ढाई सौ ग्राम धुंआ न निकले तो हमसे कहना।

         अब तो हालत ये हो गई है कि चंद्र बाबू नायडू और नीतीश बाबू खुदई मोदी जी को फोन करके पूछते हैं जनाब पुण्य के पुण्य कम तो नही हो गए जो एक हफ्ते बीत जाने पर भी सरकार गिरने का दावा नही कर रहा या उस 4PM वाले संजवा का क्या हुआ लगता है उसकी आँखों का तेज़ आपने घटा दिया है।  अब मोदी तो मोदी ठहरे एक कातिल मुस्कान बिखेरते हुए कहते हैं पुण्य का तो पुण्य अभी बाक़ी है पर लगता है इस सांजवा को शर्म आ गई है वैसे सांजवा को शर्म आए ऐसा नही भी हो सकता क्यूँ कि..... तभी चंद्र बाबू नायडू बीच में टोकते हुए मोदी जी को कहते होंगे जनाब आपकी जलेबी जैसी बात म्हारे पल्ले न पड़ री है। मोदी फिर ठहाका लगाते हुए कहते होंगे मैं दिमाग़ में आने वाली चीज़ हूं समझ में आने वाली नहीं।

        
प्रदीप डीएस भट्ट-
व्यंग्यकार; मेरठ 
17012026

Thursday, 8 January 2026

"मनसा वाचा कर्मणा"

रिपोर्ताज 

    "मनसा वाचा कर्मणा" 

         मनसा अर्थात मन में शुद्ध विचार उत्पन्न करें, बुरे विचार को पनपने न दें, वाचा मतलब जो भी बोले वह सत्य हो,मधुर हो। कर्मणा यानि जो भी करें उसमें ईमानदारी और निष्ठा का समावेश हो। अब आप सोच रिए होंगे इस पण्डित को आज क्या हुआ जो चुटीले अंदाज़ में रिपोर्ताज पेश करने की जगह खाली पेट प्रवचन पेल रहा है 🤔🤔🤔तो मित्रों 😝😝😝  अजी वो वाला नहीं बे जिसको सुनकर 140 करोड़ लोगों की साँसे रुकने लग जाती हैं कि बंदा आज किसकी वाट लगाने वाला है😎😎 तो भैय्या आगमन संस्था को हम सब के बीच लाने वाले स्वर्गीय पवन जैन तो अब हमारे बीच नही रहे😌 किन्तु उनसे हुए जुड़ाव को मैं आज तक अपनी स्मृति में संजोए हुए हूँ। जब वे इस लोक को छोड़कर परलोक सिधारे तब मैं हैदराबाद में posted था। प्रिय निशांत ने उनकी विरासत को सहेजने का जो उल्लेखनीय कार्य किया है जिसके लिए उन्हें साधुवाद।💓💓💓💓💓 आज सभी माल मत्ता तो लेना चाहते हैं किन्तु जहाँ बात विरासत सहेजने की बात आती है तब एक ही वाक्य धड़ाम से माथे पे आ चिपकता है। 😍😍😍अजी छोड़ो भी कैसी कैसी बातें जी करता तुम भी 😛 तो प्रिय निशांत एक बार पुनः साधुवाद स्वीकार करें।🌹🌹🌹🌹

"बात तो कुछ भी नहीं बस, बात मर्यादा की है 
कोई पल में तोड़ देता, और कोई ख़ामोश है "

         अभी हम 29 दिसम्बर को मथुरा की ठिठुरन, गलन💨💨💨💨 और कोहरे भाई साहब❄️❄️❄️ का भरपूर साथ निभाने के बाद मेरठ की धरती पर अवतरित हुए ही थे कि याद आया हमें तो अगले बरस यानि 4 जनवरी को हिन्दी भवन दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम "आगमन वैदुर्य" में अपनी उपस्थिति भी दर्ज़ करनी है। भयंकर वाले कोहरे के साथ ठण्ड ऊपर से गलन और उसके ऊपर से पछवा हवा भाई साहब कित्ती भी लेयर☃️☃️☃️☃️☃️ से तन को ढांप लो पर ठण्डी हवा पता नहीं कहाँ से घुसकर शरीर के साथ शरारत कर ही जाती है उसके बाद आप लेयर लेयर चिल्लाते रहो पर वो हवा अहमद हुसैन महमूद हुसैन की ग़ज़ल "मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा, दश्त मेरा न चमन मेरा " गुनगुनाने हुए पता नहीं कहाँ से निकल जाती है और छोड़ जाती है एक सरसराहट🌊🌫️🌫️ भरी कुछ ज्यादा ही बड़ी सी खामोशी " वो तो अच्छा है कि हम कवि बिरादरी से हैं साथ में थोड़े से लेखक और साथ में छुटभैये वाले हास्य व्यंग्यकार🤪🤪🤪🤪 जो अपनी में मस्त रहते हुए इनका प्रकोप झेल जाते हैं वरना भाई साहब 5-10 मिनिट के गीत ग़ज़ल पढ़ने के लिए कौन खादी वाली रज़ाई का दामन छोड़ता है। पर ये जो चस्का है न कविताई का बस हम कवि बिरादरी वाले ही समझ सकते हैं। कड़कड़ाती ठण्ड💧💧💧💧 में एक हाथ से कंपकंपाते माइक को थामना और दूसरे कंपकंपाते हाथ से पर्ची नुमा मोबाईल को स्क्रॉल करते हुए कविता पढ़ना मियाँ बिलकुल सरहद पर हाथ में पकड़ी हुई AK 47 के जवान सी फिलिंग होती है I जहाँ जवान गोलियां चलाकर दुश्मनों की टैं बुलवाता है हम कवि कुल के धुरंधर अपनी कविताई के शब्दों से अपने कवि दोस्तों की टांय दांय फिस्स कर देते हैं🌛🌛🌛 और हमारे कवि कुल के गुरु भी खिजते हुए अपनी बारी के इन्तेज़ार में वाह वाह वाह वाह, क्या कहने क्या कहने की रट लगाकर चेताते रहते हैं कि बेटा जल्दी माइक छोड़ो वरना माइकल को बोलकर माइक में करंट छुड़ावा देंगे I 🌞🌞🌞

         सो जनाब मथुरा में खोए हुए कविताई के पर्चों का शोक मनाते हुए एक अलग से पर्चा तैय्यार किया और जैकेट के अंदर वाली जेब में सुरक्षित रख दिया ताकि पर्चे को ठण्डी न सताए I चूँकि प्रोग्राम 3 बजे से था तो ठण्ड की कर्मठता को देखते हुए रैपिड और रैपिडो की सवारी को दूर से ही नमस्ते की और टैक्सी की गोद में बैठकर ITO स्थित हिन्दी भवन जा पहुँचे वो भी पूरमपट्ट 2 बजे। पर जे क्या "सुं सा मानस गन्ध" 💏ऊपर गए फिर नीचे आए तो रिसेप्शन के साइड में एक ठो लड़की दिखी पूछताछ की तो बताया कि सर हम सीहोर से आएं हैं थोड़ी देर में और तीन लोग फिर पूछताछ की तो पता चला तीनों महानुभाव मेरठ से,अच्छी बात जे कि ना वो हमें जानते ना हम उन्हें तो background में हेमंत दा का गाना सुनाई देने लगा। "न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जाने, मगर लगता है कुछ ऐसा मेरा हरदम मिल गया " ख़ैर धीरे लोग आते गए और कारवां न जी न मूड बनता गया। अरे भाई इक्कीसवीं सदी है कुछ तो बदलना था सो हमने कारवां को बदलकर मूड कर दिया। बाकी तुम सब अपना अपना देख लो भाई।💁‍♂️🫄

         बढ़िया वाला रिफ्रेशमेंट अगर प्रोग्राम के शुरुआत में ही मिल जाए तो भाईसाहब.... सोने पे सुहागा इसी को कह्ते हैं मियाँ। ठीक 3.20 पर कार्यक्रम शुरू हुआ और धीरे धीरे सोपान दर सोपान चढ़ने लगा। हिन्दी भवन आज खचाखच भरा हुआ नज़र आया,जितने बैठे हुए उतने ही खड़े हुए सच कहूँ हुज़ूर मजा आ गया। आमंत्रित कवियों के अतिरिक्त नवाँकुरो के लिए आयोजित प्रतियोगिता में 500 से अधिक प्रतिभागियों की संख्या ये बताने के लिए पर्याप्त है कि संस्था अपने उद्देश्य के लिए प्रतिबद्ध है।500 में से 20 का चयन फिर 20 में से अंतिम तीन का चयन करना judges के लिए निश्चित आसान नहीं रहा होगा। सब कुछ ठीक चल रहा था तभी एक 20-25 साल के छोरे ने कविता पाठ न कराने के लिए अनाप शनाप बोल दिया यहां तक तो ठीक था फिर ये कहना कि साहित्यकार का अपमान हुआ है मैं चौंक पड़ा और फिर हमने उसे खोपचे में ले जाकर समझाया भई अपनी उम्र देख,बात करने का लहजा देख ,कविता का तो पता नहीं लेकिन तुम्हारी ये बेजा हरकत🥷🥷 बता रही है तुम....  अजी चलो हम अपनी ग़ज़ल का शेर ठोक दिए रहे हैं :-

"तुम ख़ुद से बेज़ार हुए से लगते हो 
 एक बासी अख़बार हुए से लगते हो 
कड़वे बोल कलेजा चीर के जाते हैं 
तुम चाकू की धार हुए से लगते हो "

         अभी इस पहलवान से निपटे ही थे कि एक कुछ कुछ सीनियर सिटिजन से लगने वाले हुज़ूर ए आला ने न जाने किस कारण सम्मान पत्र जमीन पे दे मारा और पता नहीं क्या क्या बड़बड़ाते हुए बाहर की ओर कट लिए। उर्ववी उदल जी अच्छी प्रस्तुति के बाद राजरानी भल्ला की बेहतरीन विशुद्ध हास्य😁😁😁😁😁 कविता ने ये सोचने पर विवश कर दिया कि लोग नाहक सड़ी हुई हास्य कविता सुनने के लिए क्यूँ विवश हों। हमने एक गहरी श्वांस ली ही थी कि हमारी बारी आ गई हमने जैकेट की जेब में हाथ डालकर पर्ची निकाली पर जे क्या ये तो खोई हुई पर्चियां सच कै रिया हूँ जोर का झटका कुछ ज्यादा ही जोर से लगा😈😈😈😈। अब ये चमत्कार कैसे हुआ इसपे चर्चा खर्चा बाद में सो भैय्या जो पढ़ा है तुम भी देख लो :

बीते साल की बातें करके क्या होगा 
हम अच्छे तो साल नया अच्छा होगा 
सुख दुःख क्या हैं एक सिक्के के दो पहलू 
आग लगेगी और फिर कहीं धुंआ होगा 
औषध सारी फेल हुए सुन चारागर 
'दीप' हुआ अच्छा तो असर दुआ होगा 

         लो जी भैंस फिर गई पानी ने एक मोहतरमा ने कविता पढ़ी निश्चित वो वर्तमान सरकार पर तंग करने का प्रयास कर रही थीं। कविता में सब कुछ सहने लायक था सिर्फ़ अंतिम पंक्ति को छोड़कर।महिलाओं की तीन पीढ़ियां वहाँ बैठी थीं वो हत्थे से उखड़ गई हमने समझाया और बताया कि यहीं हिन्दी भवन में 30 जून 2024 को जब हमारी पुस्तक "उर नाद" का लोकार्पण हुआ था तब एक सज्जन ने मर्यादा भूलकर हिन्दू मुस्लिम और धर्म पर टिप्पणी करने लगे तो लोग बहुत ज्यादा उग्र😡😡😡😡 हो गए थे तब उन्हें जैसे तैसे बाहर का रास्ता दिखाया गया था अच्छा ये था कि आज महिला ने कविता पढ़ी थी सो प्रोग्राम समापन के बाद वे तीनों भद्र महिलाएं उन कवित्रियी से फिर विरोध दर्ज कराने पहुँच गई चूँकि हम भी वहीं थे सो हमने धर्म और कर्म पर प्रवचन दे डाले पर भैय्या प्रवचन सुनता कौन है जी जो हमारी सुनता। मेरा विरोध भी अन्तिम पंक्तियाँ को लेकर ही रहा। जिन पँक्तियाँ पर राहुल गाँधी को सुप्रीम कोर्ट से माफ़ी माँगनी पड़ी हो उन पन्क्तियों को पढ़ने से बचना चाहिए।सत्ता का विरोध शालीनता के साथ भी किया जा सकता है हर समय आक्रमकता उचित नहीं। अगर अब भी बात समझ में न आए तो दुष्यंत को पढ़ लें देवी। 🙏🙏🙏🙏

         सर्दी फिर कुलबुलाने लगी थी तभी तूलिका सेठ ने कहा पति देव साथ हैं चलिए आपको गाजियाबाद रैपिड तक डॉप कर देते हैं ।भाई साहब इससे अच्छा क्या हो सकता था सो लपक लिए उनके पीछे नीचे और लो जी नीचे वही कुछ कुछ सीनियर सिटीजन अपनी दो बेटियों के साथ मिल गए हमें देखते ही बोले मैं गुस्सा नहीं करता हूँ पर पता नहीं कैसे आज.... मैंने उनके दोनों हाथ पकड़कर इतना ही कहा क्षमा मांग लें जनाब फिर दोनों लड़कियों से कहा पापा को कॉल्ड वाली कॉफ़ी पिलाओ हमारी तरफ़ से बिल अगले प्रोग्राम में हम देंगे। फिर छलांग लगाकर सेठ साहब की गाड़ी में।अब जब कवियित्री और कवि एक गाड़ी में हों तो भाई साहब सेठ साहब सोच रिए होंगे अबके तो दी आगे न दूँगा लिफ्ट कभी किसी कवि को। 😺😺😺😺😺

प्रदीप डीएस भट्ट-11012026

Tuesday, 6 January 2026

"रुसवा जी काहे रुसवा हो गए हमस"े

रिपोर्ताज 

😅😅😅रुसवा जी काहे रुसवा हुए हमसे 🤣🤣

"बीते साल की बातें करके क्या होगा 
 हम अच्छे तो साल नया अच्छा होगा" 

         तो हुआ यूं के सितम्बर के तृतीय सप्ताह में कोठारी दादा से बात हुई और लो जी हमने तुरन्त फोन पर ही बड़ी वाली मुंडी हिलाकर आंदोत्सव - 2025 के लिए स्वीकृति भी दे दी ये तो बाद में पता चला साहिब कि जे उत्सव तो दिसम्बर में है पर कोई गल्ल नी जी,  क़ीमत ज़ुबान की है जनाब और आजकल क़ीमत का तो पता नी पर ज़ुबान फरियाने का चलन बहुत जोर पर है😛😛😛😛। अन्तिम सप्ताह में फिर एक फोन कि 23,24,25 दिसम्बर "लेखक गांव" देहरादून में उपस्थिति चाहिए हमने बड़ी वाली विनम्रता से फिर बड़ी वाली मुंडी हिलाकर हाथ जोड़ लिए अभी सांस पूरी तरह आई भी न थी कि लखनऊ से प्रिय सौम्या मिश्रा ने सूचना दी कि दादा "काला हंस" को "साहित्य सरस्वती सम्मान" के लिए चुना गया साथ में 3100/- रोकड़ा भी😝😝😝😝। बालक को धन्यवाद दिया लेकिन तिथि फिर वही 27,28 दिसंबर वो भी गंगा मैय्या के किनारे यानी कि हरि के द्वार। भाई साहब फिर चुपचाप हाथ जोड़कर क्षमा मांग ली अब जे तो सम्भव न है न कि मैं आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का प्रयोग कर दुई तीन जगह एक साथ उपस्थित होकर बत्तीसी दिखा सकूँ 😻😻😻। 

         सो भैय्या 25 दिसम्बर को भरे कोहरे में ऐड़ी से चोटी तक कपड़ों से लदे फंदे मेरठ से हरीगढ़ और हरिगढ़ से मथुरा के बस के सफ़र में आनंदोत्सव के ख्वाबों ख्यालों में गुम ठीक 3.15 मथुरा के नए बस अड्डे वहां से मोलभाव कर अस्सी रूपये में ई रिक्शा ली जिसे पुलिस ने चेकिंग के नाम पर सीज कर दिया। पुलिस ने दूसरा ई रिक्शा करवा दिया लेकिन आधा किलोमीटर के बाद उसकी बैटरी भी टैं बोल गई । खैर दस के चार पानी पूरी का स्वाद लिया और फिर पांच रूपये देकर गोवर्धन चौक फिर पांच देकर खंडेलवाल सेवा सदन जा पहुंचे। हरिगढ़ तक जहां सर्दी का प्रकोप झेला वहीं मथुरा में जैकेटवा भी उतारनी पड़ेगी धूप थी ही इत्ती तेज़।

         अंदर के गेट पर हमें देखते ही पता नी कौन था भाई साहब शायद कवियों से उसका छत्तीस का आंकड़ा रहा होगा 🤠🤠🤠 ऊपर से नीचे तक बड़े गौर से ऐसे देखा जैसे एक्सरे करके जानना चाह रहा हो कि हमने कित्ती कविताओं की पसलियाँ तोड़ी हों बोले कवि हो, कविता पढ़ने आए हो हमने जैसे ही मुंडी हिलाई बंदे ने 🛗 लिफ्ट की तरफ़ इशारा किया और बोले दूसरी मंज़िल पहुंचो । लो जी हम लदे फदे पहुंचे और प्रिय विश्वजीत को मोबलिया घुमा दिया। इससे पहले कि प्रिय विश्वजीत कुछ कहें हमने गाना गुनगुना दिया "मैं हूं हसीना खोल दरवाज़ा दिल का आ गया दीवाना तेरा" सामने का दरवज्जा झट से खुला और प्रिय विश्वजीत और साथ में दत्ता जोग एक के ऊपर एक फ्री की तरह दूसरे गाने की पंक्ति गाते हुए बाहर "आइए आपका था हमें इंतज़ार आना था आ गए, कैसे नही आते सरकार। अब बेकार को कोई सरकार कह दे तो पपीते के झाड़ पर चढ़ने का मन कर ही आता है।🤣🤓🤣🤓। खैर रुम नम्बर 205 में डेरा जमा दिया। शाम को कोठारी दादा से मुलाकात हुई वही व्हाइट पेंट और बढ़िया वाली टीशर्ट मतबल ये कि हरिद्वार की तरह यहां भी सर्दी मैय्या को पूरा कॉम्प्लेक्स देने की तैयारी 🫣🫣 अब चूंकि दिन में लंच नहीं लिया तो रात में डिनर वो भी घर जैसा 🤞🏻 जय हो कोठारी दादा। तुसी ग्रेट हो सच्ची!

         अगले दिन यानि 26 दिसम्बर को लोग आते गए और कारवां बढ़ता गया। शाम को मधु पारख, सन्तोष संप्रति with sister और कृष्णा पुरोहित उर्फ़ छोटी बहु के साथ प्रेम मंदिर वहां भीड़ को देखते हुए इतना ही " संसार की इक शय का इतना ही फ़साना है इक भीड़ में आना है इक भीड़ में जाना है"। अब हम तो हम ठहरे जैसे तैसे उस भीड़ में घुसे भी और बाहर भी आ गए पर भाई साहब सच्ची सच्ची कै रिया हूं, भगवान के दर्शन तब करो जब तुम भी फुर्सत में हो और ऊपर वाला भी। वापिसी में ई रिक्शा ने इत्ते झटके दिए कि चूल तक हिल गई। तकलीफ़ में अच्छा बुरा सब याद आता है जी हमने मन मंदिर में प्रेम मंदिर को याद किया और पूछा जे क्या प्रभु दर्शन तो दिए नही चूल हिला दी अलग से। तभी चूल से आवाज़ आई बेटा सब कर्मों का फल है कल ई रिक्शा वाले के अस्सी रूपये मारे थे न याद है। वो तो बेचारा पुलिस के चक्कर में उलझा था तुम जल्दी जल्दी में ही सही उसके पैसे मार बैठे अब भुगतो हमने हाथ जोड़े प्रभु आपका इंसाफ़ कुछ ज़्यादा ही फास्ट न है हाँ नई तो 😹😹😹😹। हम कुछ कहते इससे पहले ही ई रिक्शा ने फिर चूल हिला दी🤕🤕🤕🤕

         27, 28 दिसम्बर में कविताओं, गीतों गज़लों की जो गंग धार बही है उससे मन तृप्त हो गया जो इससे अछूता रहा निश्चित उसके लिए यही कि भैय्या खंडेलवाल सदन में काव्यांजलि की गंगा स्वयं प्रकट हुई और श्रुति श्रोताओं को अपने रस से सराबोर कर दिया और तुमने हाथ मुंह भी नही धोए तो निश्चित मानो तुम्हारी क़िस्मत का ज्योग्राफिया ही बिगड़ा हुआ है। अनुज विश्वजीत ने सूचित किया कि 28 को प्रथम सत्र का संचालन आपके जिम्मे हमने बताया देखो डियर हम संचालन 2007 में ही छोड़ दिए हैं तो उन्होंने तुरन्त ब्रह्मास्त्र चला दिया, दादा आपके लिए कोठारी दादा का आदेश है अब कर लो क्या करो। खैर दादा का आदेश सो तैयारी की तो रात के दो बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई देखा विश्वजीत हाज़िर है किसी के साथ सीधे सीधे बोल दिया दादा इन्हें एडजस्ट करें फिर हमारे कान में बताया कि कोई मोहतरमा एंकरिंग न देने से नाराज़ हैं हमने अधमिची आंखों से तुरन्त सहमति दे दी और हम खिसक कर अन्तिम सत्र में पहुंच गए। 

         प्रिय शिल्पी जो हमारी हैदराबादी धर्म बहन हैं के साथ एक विशेष कार्य हेतु फतेहपुर सीकरी जाने का काम सुगम तरीके से निपटाया और फिर अंतिम सत्र में आदरणीय अजीत दादा, आदरणीय कोठारी दादा, आदरणीय ज्योति नारायण जी, मधु पारख,अजय श्रीवास्तव मदहोश, संचालन रुसवा जी ने संभाला, हमने जो पढ़ने की तैयारी की थी उन पर्चों को किसी की नज़र लग गई पता नहीं कहाँ  लापता हो गए ख़ैर प्लान बी के सहारे नैया पार की लेकिन रुसवा जी हमें सिर्फ़ दस मिनिट जे अच्छी बात ना है जी I किसकी शरारत थी इसमें  रुसवा जी, काहे रुसवा हो गए हमसे रुसवा जी I ख़ैर येन केन प्रकारेण अन्तिम सत्र जानदार शानदार तरीके से अपने चरम तक पहुंचा। फिर उसके बाद राष्ट्रगान और थोड़ी से कुछ ज्यादा धमाचौकड़ी के साथ दिल्ली मिलन की आशाओं के पंखों पर सवार होकर अगले दिन अपने अपने घोंसलों के लिए प्रस्थान। पहले दिन जहां सब इस बात पर परेशान थे कि इत्ते सारे गर्म कपड़े लेकर क्यूँ आए जब कि मथुरा में ठंड अजी जुल्म है ज़ुल्म कर रहे थे 28,29 के कोहरे के साथ शीत लहर ने जता दिया बेटे जो लाए हो पहन लो वरना..... आगे तो हम सभी समझदार हैं न जी 🤧🤧🤧🤧🤧🤧🤧

विशेष: केवल काव्य परिवार की टीम जिसे केवल दादा और खंडेलवाल जी ने लीड किया, अनुज विश्वजीत, दया शंकर मिश्र ,दत्ता प्रसाद जोग और अजय श्रीवास्तव ने पूरे कार्यक्रम को अपने मजबूत कंधों से संबल प्रदान किया। पुनीत अग्रवाल जी ने जहां संस्था के रजिस्ट्रेशन की जानकारी साझा की वहीं उनकी पत्नी व बिटिया ने बेहतरीन KKP गीत प्रस्तुत किया जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। लखनऊ से मेरे अग्रज मजुमदार दादा के तो क्या कहने उनकी फुलझडियां उजाले में अलग रंग भर देती हैं।अब आप पूछोगे अबे तुमने क्या किया तो भैय्या अपना पुराने वाला काम ठूस ठूस के खाया और पूरे घटनाक्रम को शब्दों में पिरोना जे काम क्या कम समझ रिए हो मियां🙆‍♂️😹🤠🤓🤓🤓😝😝😝😝😊😛। कहो कैसी रही।

प्रदीप डीएस भट्ट ---06012026