मैन्यू लगता पंजाब चुनाव से पहले पता नी कि कि देखना पड़ेगा। बताओ जी पंजाब के लोग तो पहले ही भगवंत मान के बेवड़े पन से परेशान थे ।रोज़ अख़बार में अलिखित अछपित खबर में मान जी "मान न मान मैं तेरा मेहमान" की तर्ज पर आज इधर गिरे कल उधर लुढ़के ।
"प्रदीप की कलम से "
अपनी बेबाक राय अवश्य रखे किन्तु इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि आपकी बेबाक राय से व्यक्ति विशेष के सम्मान को ठेस न लगे । हम अपनी स्व्तंत्रता के प्रति सजग रहे किन्तु दूसरों कि स्वतन्त्रता मे बाधक भी न बने ।
Thursday, 22 October 2026
Saturday, 10 October 2026
"ज़बान संभाल के "
"ज़बान संभाल के"
"रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पाताल
आप कह भीतर भई, जूती खाए कपाल "
1993 में दूर के दर्शन पर एक ठो सीरियल आईल रहिन " ज़बान संभाल के" जो कि अँग्रेजी सीरियल "Mind your language" का हिन्दी रूपांतरण ही था,नहीं था फिर भी हमारे कहने से समझ लो।जिसमें मोहन भारती बने बढ़िया वाले एक्टरवा पंकज कपूर हिन्दी सिखाते सिखाते किन किन परेशानियों से दो चार होते हैं ये उस ज़माने के नौजवानों से पूछिए! जनाब 1993 से 1998 तक दो सीजन आए वो भी पूरम.पट्ट 106 किन्तु परन्तु लेकिन किसने कितनी जुबान सम्भाली ये भी उसी दौर के "जनरेशन एक्स" से पूछ लो लेकिन एक बात तो तय है कि उस ज़माने के लोग ऐसे फैमिली सीरियल देखकर दिल खोलकर हँस लिया करते थे वो भी परिवार के साथ इसी बहाने दस पाँच ग्राम खून भी बढ़ जाता था। आज के सीरियलों की तो पूछो मती इतना कुछ उघाड़ दिया है कि ढांपने को कुछ बचा ही नहीं। आज जब जेन जी, जेन अल्फा फलाना ढिंमकाना पता नहीं किन किन विशेषणों से एक अदना से आदमी को पुकारा जाता है तो वो भयंकर वाला कन्फ्यूज हो जाता है। किसी को समझ ही नहीं आता कि बाप या बुआ ने तो हमारा नाम अटरू, मटरू, बिट्टू सिट्टू चमेली, फरजाना या अब्दुल रक्खा था फिर ये ससुरे कौन हैं और हमें किस नाम से पुकार रहे हैं। कुछ ये सोचकर खुश कि चलो बैठे बिठाए हमें अंग्रेज़ी नाम मिल गए कुछ ये सोचकर तैश में तने बैठे हैं कि अबकी बार किसी ने उन्हें जेन जी फेन जी बोला तो वो उसको भरी सर्दी में बर्फ की सिल्ली पर लिटाकर लता मंगेशकर का गाना गुनगुनायेंगे "यारा सिल्ली सिल्ली गायेंगे, बिरहा की रात का जलना" और जो इन लपड़ झंडीस की फ़िराद लेगा उसको उल्टा लटकाकर नीचे से मिर्च की धौंकनी देकर दूसरा गाना गायेंगे "आ देखें जरा किसमें कितना है दम"
यथा राजा तथा प्रजा
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20 जुलाई को जंतर-मंतर के प्रदर्शन के बाद इस सो कॉल्ड जेन जी ने जो तबाही मचाई उससे पूरा देश हक्का बक्का रह गया। "दिल्ली पुलिस आपके लिए सदैव आपके साथ" का नारा देने वाली दिल्ली पुलिस के जवानों के धैर्य की जितनी परीक्षा ली गई कम से कम मैंने अपने जीवन में इतनी पहले कभी नहीं देखी। 1966 का साधु-संतो पर हुए अत्याचारों की कहानी हो या टिकैत सीनियर और अभी हाल ही में टिकैत जूनियर द्वारा किसान आंदोलन के नाम पर जो अराजकता फैलाई गई और कुछ सो कॉल्ड किसानों ने जो नरभषी रूप धारण किया उससे साफ पता चला कि ये किसान के भेष में विदेशी फंडिड भेड़िये हैं जो सो कॉल्ड किसान आंदोलन जीवि लाल किले की प्राचीर तक अपना भौंडा प्रदर्शन करते नज़र आए और दिल्ली पुलिस मौन रहते हुए पिटती रही। इसके अतिरिक्त भी न जाने ऐसी कितनी ही कहानियां हैं जहाँ दिल्ली पुलिस के हाथ बाँध दिए गए जैसे देश की राजधानी की पुलिस इसीलिए बनी है। यहाँ यह विशेष है कि दिल्ली पुलिस में नब्बे प्रतिशत लोग हरियाणा पंजाब उत्तर प्रदेश से आते हैं जब कि यहाँ के लोग मूँछ की ख़ातिर राजे रजवाड़ों से भी भिड जाने के लिए जाने जाते हैं। अब ऐसा भी नहीं है कि दिल्ली पुलिस पहले से ऐसी है इतिहास उठाकर देख लो इनके कारनामें। रामलीला मैदान में बाबा रामदेव का प्रदर्शन याद है न, इधर इशारा हुआ उधर रात में ही दिल्ली पुलिस ने बाबा रामदेव को तिगनी का नाच नचा दिया था हालत यह हो गई थी कि बाबा को लेडीज कुर्ता पायजामा पहनकर रात के अंधेरे में छुपकर भागना पड़ा था लेकिन दिल्ली पुलिस तो दिल्ली पुलिस ठहरी बाबा को पहचान लिया और फिर ठूँस दिया जेल में। फिर अब क्या बात हो गई दिल्ली पुलिस इतनी निरीह नज़र आ रही है। तो भैय्या यथा राजा तथा प्रजा।
आओ स्कूल ठीक करें
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सभी को लगा कि तिलचट्टों को जो करना था कर लिया चलो जान छूटी लेकिन वो तिलचट्टे ही क्या जो लाल हिट 🎯 का स्वाद चखकर भी किचन में आना छोड़ दें सो ये फिर जहां जहाँ भाजपा की सरकारें हैं उन्हीं प्रदेशों के स्कूल में जाकर हाय तौबा मचाने लगे। एक दो बार की तो ठीक है लेकिन कुछ स्कूल के कर्णधारों ने बाक़ी कुछ गाँव वाले भी इनकी ऊल जलूल हरकतों से उकता गए थे सो जयपुर के एक गाँव में इनका बढ़िया वाला ठोक पीट कर गाँव के बाहर ही स्वागत कर डाला बस फिर क्या था जैसे ही वीडियो वॉयरल हुई इन तिलचट्टों की शामत आ गई ये स्कूल के बाहर ही लपेट लिए गए । कुछ बच्चों ने भी इनको ढंग से आरती उतार डाली। उसपे तुर्रा ये कि ये बीजेपी वाले राज्यों में ही चेकिंग चेकिंग खेल रहे थे तो ये जल्दी ही एक्सपोज़्ड ही गए। इन्होंने भी अपनी रणनीति बदली और अब ये सीधे बदतमीज़ी पर उतर गए वैसे भी तमीज़ की उम्मीद करनी तो इनसे बेईमानी ही है। झारखण्ड में स्टूडेंट चिल्लाते रहे लेकिन ये वहां न फटके फटकते तो कांग्रेस इनका भी बाबा रामदेव वाला इलाज़ करके ही छोड़ती सो इन्हें लगा कि स्कूल चेकिंग में तो पक्के वाला पिटने का डर है इसलिए अपने आक़ा केजरीवाल से इन्होंने निर्देश लिए और तुरंत गोल 🏣 पोस्ट चेंज करते हुए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की फरमाइशी प्रोग्राम में शामिल हो गए। वैसे याद दिलाता चलूँ कि मैं "जंतर मंतर छूमंतर" में पहले ही सीजेपी की पैदाइश बता चुका हूँ और अब तो केजरीवाल खुदई कह चुके हैं कि सीजेपी हमारा ही बालक है। अब हुआ ये कि तिलचट्टे स्कूल ठीक करने चले थे लोगों ने इनका दिमाग़ ही ठीक कर दिया।
नई उमर की बर्बाद फसल "जेन जी और भेंन जी"
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दो कचौरी एक समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा जैसे टुच्चे नारे लगाकर ये ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा लेने चले हैं। इधर ये एक नारा वॉयरल हुआ फिर तो घटिया पन से लबरेज़ नारों की बौछार सी आ गई। इसमें प्रधानमंत्री को टारगेट करते हुए ऐसे भद्दे नारे गढ़े गए जिनको मुझे लिखने में ही शर्म आ रही है। अब जब एक पक्ष बिलकुल ही नंगा हुआ जा रहा है तो दूसरी तरफ़ से सोशल मीडिया पर इसका जवाब दिया जाने लगा जैसे दो समोसा दो किलाे आटा, तेरा बाप भी इसमें आता। अज़ीब बात ये रही कि इन नारों पर लड़कियाँ ही ज्यादा फैलती हुई और भोंडा डांस करती नज़र आई। वामपंथ का यह नारा सीमा पर देश की सुरक्षा करने वालो पर भरोसा नहीं करता। सबसे बडी बात नारा लगाने वाली नारी को अपने बाप पर भरोसा नही है, पति पर भरोसा नही है भाई पर भरोसा नहीं है अपने बॉय फ्रेंड पर भरोसा नहीं है। फिर भरोसा किस पर है इसी के साथ दूसरी तरफ़ से इसके प्रतिवाद स्वरूप एक ठो और नारा "एक समोसा दो ठो आलू ये लडकी है बिलकुल चालू। क्या जेनजी की यही भाषा है, इससे भी बड़ा सवाल यह भी कि ये भाषा इन्हें कौन सिखा रहा है। आश्चर्य ये है कि भोंडी के भोंडे पन में क्या पुरुष क्या महिलाएं सोशल मीडिया पर रील बनाकर फेंक रही हैं किसलिए ताकि कुछ आमदनी हो सके। ये देखकर एक सवाल परेशान करने लगा भैय्या ये किसकी औलाद हैं और हैं तो हैं पर क्यूं हैं। जिन्हें देश तो छोड़ो न अपने माँ की चिंता न बाप की फिर भविष्य की तो क्या ही होगी। फिर नीरज दद्दा का लिखा गाना याद आ गया "कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे" ।
डेलुलू सेलुलू यानि delushion में ही सोल्यूशन
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जहाँ रजिस्ट्रेश रहित तिलचट्टा पार्टी विदेशी मीरजाफरो के कंधे पर रखकर अपनी नकली बंदूकें चला रही है उससे कॉन्ग्रेस, सपा सब परेशान हैं कि मीडिया की सारी मलाई इन्हें मिल रही है और हमें छाछ भी नसीब नहीं हो रही है। सो आनन फानन में राहुल गाँधी ने दो दिन दिल्ली में उधम मचाने की कोशिश की जिसमें आकाशवाणी के अन्दर घुसना तक शामिल है। देश के प्रधानमंत्री को चौकीदार चोर है बताने वाले को आकाशवाणी के गेट पर तैनात एक चौकीदार ने दिन में ही आईना दिखा दिया कि महाराज बिना आज्ञा अंदर प्रवेश वर्जित है वो भी बड़े वाला। राहुल का चेहरा देखकर सबको समझ आ गया कि चौकीदार की ताकत क्या है सिवाय एक सौ चालीस साल पुरानी के बड़े बड़े दिग्गज़ को। 9,10 को राहुल ने असफल घुड़दौड़ को आयोजन किया फिर 11 को तिलचट्टों को प्रदर्शन के लिए छोड़ चेन्नई निकल गए। तिलचट्टों ने मुंबई से निकलते हुए 10 को कुछ ज़्यादा ही ज़बान खोल दी, मोदी डर गया, ट्रेन बंद 🚇 मेट्रो बंद करने पर प्रधानमंत्री को बल्ड प्रेशर नापने की सलाह दे डाली। ये देखकर एक बात तो समझ में आ गई कि इन्हें लाल 🎯 हिट की जबरदस्त जरूरत है सो अगले दिन दिल्ली पुलिस ने दीपके फ़ीफके, रांका पांका और दास को ज़्यादा उदास करते हुए हवाई जहाज़ में ही लाल 🎯 हिट छिड़क कर दबोच लिया उधर राठी को गुरूग्राम की लाठी देकर दिखाकर दिल्ली की लाठी पकड़ा दी। दिन भर चली चिल्ल पों के बाद दिल्ली पुलिस ने सबको अपने अपने दड़बों में घुसेड़ने में सफ़लता प्राप्त की।
हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे
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राजनीति में सदा से गला काट प्रतियोगिता रही है लेकिन प्रत्यक्ष इस बार दिखाई दे रही है। कॉन्ग्रेस आगे कभी तिलचट्टा सपा तो कहीं हैय्ये नहीं जहां तक केजरीवाल का संबंध है तिलचट्टे तो उन्हीं की पैदाइश है सो वो आराम से घर से ही बाइट देकर इतिश्री समझ ले रिए हैं। तिलचट्टों ने ज़बरदस्त प्रदर्शन किया तो राहुल को रात में चेन्नई में कॉन्ग्रेस चवन्नी बनती नज़र आई तो 11 को राष्ट्रपति से रोना रोया फिर राहुल को अपनी दादी का लोकसभा में दिया बयान याद आया कि सुप्रीम कोर्ट तय नहीं करेगा कि सरकार कैसे चलेगी वरन् सुप्रीम कोर्ट को सरकार की नीतियों का समर्थन करना चाहिए बस फिर क्या था 12 की सुबह सुबह ही हुड़दंग शुरू और बाराखंबा रोड़ से सीधे सुप्रीम कोर्ट मार्च। बीच में चेले चपाटों ने सीजेआइ से मिलने का समय माँग लिया। बताओ जी जो बंदा 420 के केस में जमानत पर है वो सीजेआई से मिलेगा। सीजेआई ने मिलने से साफ़ मना कर दिया और लिख भेजा भैय्या याचिका लगाओ वहीं मिलेंगे और लो जी अपने आपको सुपर डूपर समझने वाला बंदा अपने ही बने जाल में फंस गया। जब तक बात समझ में आई तक तक याचिका लग गई। लेकिन बंदे ने फ़ैसला कर लिया सुप्रीम कोर्ट जाना है तो जाना है सो याचिका लगी साढ़े चार और बंदा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा साढ़े छः बजे, दस मिनिट सुप्रीम कोर्ट रूपी हॉल्ट पर गाड़ी रोकी फिर लौट के बुद्धु घर को चल दिया। पूछो भई सुप्रीम कोर्ट जाकर क्या ही उखाड़ा तुमने हां आज ये खबर अवश्य आई कि जो पेटिशन कॉन्ग्रेस ने लगाई है उसमें 14 ठो गलतियां मिली, भाई कुछ तो ठीक कर लो। इधर सपा के मुखिया दुखियाओं के साथ राहुल के जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट, थोबड़ा दिखाया और वापिस अपने दड़बों में। अब कोई इनसे पूछे कि तुम सबको मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा चाहिए और ये पता नहीं कि ज्ञानेश का इस्तीफ़ा कैसे होगा। इधर ये सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट खेलने में व्यस्त उधर मोटा भाई ने ऑर्डर निकाल दिया कि प्रोटेस्ट के लिए जंतर मंतर तत्काल प्रभाव से छूमंतर किया जाता है। अब जिसे 🪧 प्रोटेस्ट करना है तो बेटा बुराड़ी जाओ, कड़कड़डूमा मैदान जाओ या रामलीला मैदान। सच कै रिया हूँ ऐन्नू कैदे मास्टर स्ट्रोक। लो कल लो बात। राहुल नमाज़ बख्शवाने गए थे रोज़े गले लगाकर लौटे। इधर दीपके फिफ्के, रांका फांका और दास उदास बड़ी मुश्किल से थूक गले से नीचे उतारने की असफल कोशिश कर रहे हैं।
सत्यमेव जयते
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नॉर्थ ईस्ट के कॉन्ग्रेस सांसद और जवाहर लाल नेहरू के प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल को 11 छात्राओं के यौन शोषण का दोषी पाया गया है। जवाहर लाल नेहरू की इंटरनल इन्क्वारी टीम ने अंगोमचा बिमोल को दोषी पाया है। इस पर एफ आर आई भी हो चुकी है बीजेपी की महिला सांसद राष्ट्रपति से भी इस मुद्दे पर मिल रही हैं लेकिन मजाल है कॉन्ग्रेस के सो कॉल्ड अध्यक्ष और सो कॉल्ड युवा नेता ने इस घटना पर कुछ भी कहने की ज़हमत उठाई है। कॉन्ग्रेस में महिलाओं के साथ समय समय पर बदतमीज़ी होती रहती है लेकिन एक्शन वही ढाक के तीन पात। अब प्रश्न है कि ये कांग्रेस के सांसद है तो सपा, तिलचट्टा गैंग, आप के पाप क्यूँ चुप हैं। सबको बिना सबूत के ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा चाहिए लेकिन दोष सिद्धी के बाद भी अंगोमचा बिमोल से इस्तीफ़ा तो छोड़िये बल्कि कांग्रेस उन्हें सभी प्रकार की सहायता प्रदान करने का निर्णय ले रही है। अब सवाल है कि सोशल मीडिया पर उपलब्ध वीडियो के अनुसार राहुल ghandy गाँधी पर भी रेप का चार्ज है। केरलम कॉन्ग्रेस का ट्वीट कि " डियर सूर्यकांत यदि कानून व्यवस्था संभालना तुम्हारे बस का रोग नहीं है तो तुम इस्तीफ़ा दो हम किसी और को बिठायेंगे। इसी को कहते है दिमाग़ी नक्सल होना।
असल जेन जी बिट्टू तबाही और स्मित मच्छार
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जहाँ एक तरफ़ तिलचट्टे फ़िलचट्टे गैंग के offernder और लफ्फंडर क्या क्या और क्यूँ क्यूँ कर चूँ चूँ का मुरब्बा बने जा रहे हैं। समझ नहीं आता इन्होंने पढ़ने लिखने में अपनी अपना समय क्यूँ बर्बाद किया। इनसे अच्छे तो अनपढ़ ही ठीक हैं ख़ैर जो वास्तव में पढ़ना लिखना चाहते हैं वे अपने घर में छात्रावासों में अपने इम्तेहान की तैय्यारी करते हुए दिखाई दे रहे हैं और जाहिल बड़े बुजुर्गों को सड़कों पर गाली देकर अपना ज्ञान बाँट रहे हैं । लेकिन कुछ हैं जो समय और देश की तरक्की में अपना योगदान दे रहे हैं। एक ऐसी महिला जो महिला होमगार्ड परीक्षा में साड़ी में दौड़ लगाती है वहीं दूसरी महिला साड़ी में ही मैराथन दौड़ में दौड़ पड़ती है ताकि उसके बच्चे पढ़ लिख कर कुछ बन सकें। मध्य प्रदेश का एक जेन जी सुरेंद्र सिंह चौधरी जो गंदे तालाब को साफ़ करने का बीड़ा उठाता है और आखिरकार उसे स्वच्छ करके ही दम लेता है उसके इस क़दम से उस अकेले गांव को नहीं वरन आसपास के गांवों को भी पीने के लिए स्वच्छ पानी मिलता है। उसका नाम सुनकर लगेगा कि ये तो किसी गैंगस्टर का नाम है सुरेंद्र सिंह चौधरी उर्फ़ बिट्टू तबाही ने अजनार नदी के गंदे पानी में सात महीने तक स्वच्छता की ऐसी तबाही मचाई कि लोगों ने कहा वाह क्या बात है। इसी प्रकार गुजरात के नागर ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए कैप्टन स्मित मच्छार जिन्होंने फ्लाई दुबई की फ्लाइट में 174 यात्रियों और 6 क्रू मेंबर्स की अपनी जान पर खेलकर जान बचाई जब सह पायलट ने आतंकवादी गतिविधि को अंजाम देने की कुचेष्टा की किन्तु कैप्टन स्मित ने बुरी तरह घायल होने के बाद भी कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया जिससे यात्रियों ने समय रहते बड़ी दुर्घटना से बचा लिया। आज इजराइल कैप्टन स्मित को सबसे बड़ा नागरिक सम्मान देने की घोषणा कर चुका है। उधर तिलचट्टे, आपिए, पापिए देश में अराजकता लाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। लेकिन बात बात पे दिल्ली पुलिस और भारत सरकार को प्रवचन देने वाला सुप्रीम कोर्ट राहुल एंड कम्पनी के लिए 4.30 के बाद भी कैसे और क्यूँ खुला रहा। सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर सवाल उठना लाज़िमी है ख़ैर भैय्या प्रोटेस्ट करो लेकिन जुबान सम्भाल के।
चलते चलते
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दिल्ली के व्यापारी इन तिलचट्टों से इतना परेशान हो गए कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका ही डाल दी। भैय्या तीन हज़ार करोड़ का नुक़सान कम थोड़े होता है। जंतर मंतर छूमंतर हो चुका है। तिलचट्टे परेशान अब बुराड़ी में प्रदर्शन के लिए कम से कम एक लाख आदमी लगेंगे, कहां से लाएंगे इत्ते आदमी सो जे डी यू के ऑफिस की दीवार कूदकर रांका और दास जंतर मंतर में जा घुसे, बस भाई साहब ग़लती से मिस्टेक हो गई और दिल्ली पुलिस ने 5 दिन के लिए ठूंस दिया जेल में, अब सो कॉल्ड तिरंगा यात्रा के चक्कर में दीपके फिफ्के भी जेल के दरवाज़े पर । यानि लग गई न लंका।
प्रदीप भट्ट
लेखक, मेरठ
17102026
Wednesday, 7 October 2026
"बरसत्ती बुआ और हम"
रिपोर्ताज
"बरससत्ती बुआ और हम"
सितम्बर के प्रथम रविवार को हम यानि "हम ख़ुदई भई" सज धज के रैपिडो से नमो भारत 🚉 🚉 स्टेशन से मात्र 500 सौ मीटर दूर ही पहुंचे होंगे कि बरसत्ती बुआ आसमान में विचरण करते हुए गढ़ गंगा की तरफ़ धूम धड़ाका करने जाती प्रतीत हुईं बस तभी हमारी भी निगाह ऊपर आसमान की ओर गई हमने बुआ को छेड़ते हुए कहा, बुआ मेरठ में नहीं बरसोगी का इससे पहले की बुआ कछु जवाब देती हम ने कटाक्ष कर दिया बुआ लगता है पानी 💦 🌊 🌊 🌊 ख़त्म हुई गवा है हमार तो नहाने का मन था चलो अगली बार ही सही। वैसे तो बरसत्ती बुआ को हमसे बहुत बड़े वाला प्यार है लेकिन लगता है उस दिन बुआ फूफा से लड़ भिड़ के विचर रहीं थीं कछु मूड ख़राब सा तो लगा पर इत्ता होगा पता नहीं था सो बुआ के पीछे भागते आ रहे बादल 🌨️ 🌨️ के टुकड़े को बुआ ने इशारा किया और वो ससुरा बिलकुल हमीं पर मतबल हमारे आस पास ही सौ दुई सौ मीटर में बरस 🌧️ 🌧️ 🌧️ 🌧️ ☔ ☔ ☔ पड़ा। अब कर लो क्या करो नमो भारत स्टेशन सामने और हम इधर पानी से सराबोर। पांच मिनिट में हमें निपटा के बादल 🌨️ ये तो ये जा वो जा और हम नीरज जी के गाने की तरह वहीं खड़े खड़े पता नहीं क्या क्या देखते रहे। पानी से तरबतर कपड़े उस पर बाटा की चप्पल भाई साहब ऐसे लग रिया था जैसे हम सौ दो सो किलो के हो गए हों। अब बारादरी में ऐसे तो जा नहीं सकते थे सो उसी अवस्था में एक ठो टैक्सी 🚕 बुक की ख़ुद को पिछली सीट पर धकेला और पहला ये काम किया आलोक जी को बताने का कि भैय्या बरससत्ती बुआ के आशीर्वाद से हम आ न सकेंगे। कपड़े सूख गए चप्पल सूखने के बाद भी इस लायक न रही कि उसे आगे पहन सकें हाँ बढ़िया वाला ज़ुकाम अवश्य हो गया।
अक्टूबर में फिर आमंत्रण दिल की महफ़िल सजी है 4 अक्तूबर को चले आइए। ज़ुकाम भी बीच बीच में मेडन ऑवर करके सताता रहा कभी लगे ठीक हो गया फिर दो दिन बाद फिर वही। ख़ैर डॉक्टर से तीन दिन की दवा ली और 4 अक्तूबर को दवाई जेब में रख जा पहुँचे महफ़िल ए बारादरी वो टाइम से पहले। माला जी और आलोक जी ने स्वागत किया। धीरे धीरे महफ़िल सजने लगी। तभी विनय विक्रम जी सपत्नीक ने हॉल में प्रवेश किया हमने इशारा किया और उन्होंने हमारा मान रखते हुए बगल की सीटों को पवित्र कर दिया 🪔। ठीक 3.20 बजे हॉल में आलोक जी की आवाज़ गूंजी यानि कार्यक्रम विधिवत शुरू डॉक्टर शफक सोपोरी Z टी वी के प्रस्तोता अनुराग मुस्कान मित्र श्वेता सिंह उमा, बारादरी के अध्यक्ष सुरेन्द्र सिंघल जी, डॉक्टर माला कपूर ' गौहर' बरसों से बारादरी का सम्मान का ख़्वाब संजोने वाले भाई इंद्रजीत सुकुमार जिन्हें इस बार बारादरी सम्मान से नवाज दिया गया। सुभाष चंदर जी, मासूम गाजियाबादी यानि कुल जमा 68 साहित्य साधकों की उपस्थिति रही। एक से एक बढ़िया प्रस्तुति। सच तो ये है कि अगर ये गोष्ठी हो तो ये अगले दिन सुबह 🌄 🌅 🌄 🌅 तक भी बदस्तूर जारी रह सकती है । महफ़िल ए बारादरी में शिरकत करने का मतलब जैसे कोई यू पी एस सी क्रैक करके मसूरी के लाल बहादुर ट्रेनिंग सेंटर में आई ए एस की ट्रेनिंग ले रहा हो और उस ट्रेनिंग के ऑब्जर्वर सदा बहार आलोक यात्री,😊 भाई साहब रिज़ल्ट अजी जाने भी दो
एक से बढ़कर एक कलाम ज़रा गौर फरमाएं :-
केत्ता रेउड़ी खइहौ भइया सरम करो।।
वै ब्वालैं तुमका तनखइया सरम करो।।
लीक भये हैं पेपर इत्ते काव कही।
उमिर बीति गै बनि कनकइया सरम करो।।
* *विनय विक्रम सिंह*
लाॅंघ सकूं तो लाॅंघ में जाऊॅं, उन नैनन की कोर
जाने क्या उस ओर? सखी री! जाने क्या उस ओर
*शुभ्रा पालीवाल*
हुकूमत की थी गलती और तुम चुपचाप बैठे थे
तुम्हें तो लिखना आता था तुम्हें लिखकर बताना था
* *सचिन परवाना*
कोई समझे न समझे वो मुझे अच्छा समझती है
मैं बूढ़ा हो रहा हूँ माँ मुझे बच्चा समझती है
डॉ नसीम अलीग
ख्वाब कुछ ढूँढिए फिर पुराने कभी।
जिन्दगी हँस उठे इस बहाने कभी।
मिल रहे घाव हैं हर किसी को यहाँ।
मिल सका कब किसी को है पूरा जहाँ।
चल चलें आँसुओं को भुलाने कभी।
* *अभिलाषा विनय*
“तुलसी सूख जाएगी”
वो बच्चों की तरह भोली है, हरदम मुस्कुराएगी
अगर अपनी कसम दे दूँ, मुझे आँखे दिखाएगी
करुँ मैं लाख कोशिश पर, शहर बिलकूल न आएगी
मेरी माँ को यही डर है, के तुलसी सूख जाएगी
* *प्रदीप भट्ट मेरठ*
अनुराग मुस्कान सपोरी जी माला जी और दद्दा सुरेंद्र सिंहल जी को सुनना निश्चित एक सुखद अहसास है। स्वर्गीय गोविंद गुलशन जी की सुपुत्री प्रिय खुश्बू ने अपने बढ़िया वाले संचालन से ये साबित किया कि शायरी दिलों में ही नहीं खून में भी भरी होती है। अच्छी बात ये रही कि इस बार कार्यक्रम तय समय के आस पास ही सम्पन्न हुआ। बढ़िया वाला जलपान फिर फोटो शूट और लो जी राम जी का नाम लेते वापिस मेरठ वो भी एसी की ठंडी हवा के साथ तो गले की तो........ होनी ही थी तो भाई साहब एक सबक कि डॉक्टर से दवा लेकर जेब में मति रक्खो मियां कम स कम एक ख़ुराक़ तो लीजिए वरना करते रहिए खों खों मैंनू की लोड।
चलते चलते
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डॉक्टर माला कपूर जी ने ग्रुप फ़ोटो को देखकर टिप्पणी की कि
Attendance was 68...in this photo
there are only 37😴
बस भाई साहब पढ़ते ही खुपड़ियां 🙂↕️ 🗣️ 🗣️ 🙂↕️ के तार झनझना उठे और इंस्टेंट एक शेर लिख मारा
"हमारा नाम दर्ज़ है, तिरी किताबों में
ये और बात हम, तस्वीर से नदारत हैं"
वैसे फ़ोटो में हमने भी बंदो की गिनती की, एक बंदा दूसरे के पीछे छुपा हुआ मिला लेकिन कि फरक पैंदा है जी 38 हो 37।
प्रदीप डीएस भट्ट -07102026
Tuesday, 29 September 2026
"झुमका ढूँढती वंदे भारत"
रिपोर्ताज
"झुमका ढूँढती वंदे भारत"
"दरगाहों पर जाना क्यूँ है, बेमतलब इतराना क्यूँ है
धर्म सनातन सर्वश्रेष्ठ फ़िर, दर दूजा खटकाना क्यूँ है"
तो हुआ यूँ के जुलाई -२०२३ में हम हैदराबाद को टाटा टाटा बाय बाय करके अपनी खूबसूरत तशरीफ़ को मेरठ में स्थापित कर चुके थे। दिल्ली, गुरूग्राम, गाजियाबाद में तो महीने में दो चार बार साहित्यिक यज्ञ में अपनी आहूति देने जाने लगे थे साथ ही मदुरई, रामेश्वरम, धनुषकोडी, कन्याकुमारी, तिरुवनंतपुरम, दमन, वड़ोदरा मुम्बई नागालैंड मथुरा , लखनऊ, हरिद्वार बस भैय्या इत्ते ही शहर याद आ रहे हैं बाक़ी के लिए सर्दियों में बादाम खाने पड़ेंगे। इसी बीच २०२४ में मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल और युगधारा फाउंडेशन लखनऊ को अपने वाले कहानी संग्रह "काला हंस" की प्रविष्टि भेज दी। अचानक एक दिन ख़बर मिली कि काला हंस 3100/- का सम्मान पाकर गोरा हो गया है। सच कै रिया हूँ मियां घणी ज़ोर की ख़ुशी हुई। पुरस्कार समारोह मई -२०२५ में ऋषिकेश फिर हरिद्वार फिर किन्ही कारणों से पोस्टपोन। दिसम्बर २०२५ में हम लेखक गाँव देहरादून के कार्यक्रम में उपस्थित होना चाहते थे लेकिन एक पारिवारिक कार्यक्रम आन पड़ा सो भैय्या मथुरा कार्यक्रम को हरी झंडी दे दी तभी युगधारा से खबर आई कि उन्हीं तारीखों में युगधारा फाउंडेशन भी हरिद्वार में "काला हंस" को गोरा बनाने का कार्यक्रम तै कर चुका है। स्नेही सौम्या से क्षमा मांगते हुए अगले कार्यक्रम में उपस्थित होने की गुहार लगाई और लो जी सौम्या तो सौम्या ठहरी तुरंत हां भरते हुए "तथास्तु दादा" कहकर हमारा संकट हर लिया।
दिसम्बर २०२५ से सितम्बर २०२६ तक हम जैसे तुम्नक् से कवि और लेखक बहुत सारे आत्म मुग्धता के शिकार स्व घोषित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कवियों और लेखकों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने में पसीना बहाते रहे। कोई जर्मनी से, कोई फ्रांस से कोई दुबई से कोई सऊदी से तो कोई रूस से भाई साहब और अंतर्राष्ट्रीय नाम याद रखने के लिए इस बार बादाम के साथ किशमिश भी खानी पड़ेगी। क्या करें माहराज ऐसे महानुभावों की गिनती ख़त्म होने का नाम ही नी ले री। मज़े की बात ये कि ये सारे अंतर्राष्ट्रीय कवि लेखक गली मुहल्ले के कवि गोष्ठी तक छोड़ना पसन्द नहीं करते तो फिर ये विदेशों में रहते कितना हैं। सोचो सोचो सोचने में पैसे थोड़े ही लगते हैं। समझ में आ जाए दिल खोलकर ६० ग्राम हँस लेना भाई।
तो भैय्या जैसे ही ख़बर मिली कि युगधारा १९,२० सितम्बर को अयोध्या में कार्यक्रम करेगा हमने पहली फुर्सत में रेलवे मिनिस्टर से टांका भिड़ाकर आने जाने की कन्फ़र्म टिकिट झटक ली। १८ को अयोध्या एक्सप्रेस पकड़ी और लो जी सुबह टाइम से पॉंच मिनिट पहले यानि ६:१५ को अयोध्या कैंट स्टेशन, रेपिडो से फटफटिया बुक की और ८:०१ KM दूर होटल राम लला, तपस्वी की छावनी के इर्द गिर्द चक्कर लगाते रहे लेकिन कऊनो बता के न दीन्ह, भैय्या हमें बार बार चक्कर काटता देख पुलिस ने पूछा, हमने बताया लेकिन रिज़ल्ट ज़ीरो बटे लड्डू वो भी सरसों के तेल वाले। घूमफिर के जब पांचवीं बार वहीं पहुंचे तो पुलिस वाले फिर पूछे का हुआ मिल्ला नहीं हमने भी फटफटिया पर बैठे बैठे ना में मुंडी हिलाई और जे क्या १०० मीटर दूर पर नज़र पड़ी होटल राम लला हमने घूरकर पुलिस वालों की तरफ़ देखना चाहा फिर बाबा जी का ख़्याल मय बुल्डोजर याद आ गया तुरंत अपनी औकात में आए फिर ज़बरदस्ती चेहरे पर मुस्कान लाते हुए धन्यवाद कहा और लपक लिए होटल की तरफ़। फटफटिया वाले को कुछ एक्स्ट्रा देकर विदा किया। सौम्या संग गर्मा गर्म चाय फिर सीधे बीकानेर के राजा रवि त्रिपाठी जी के तुम में। फ्रेश हुए आलू के पराठे संग चाय और सीधे कथा मण्डप में।
कार्यक्रम का प्रारम्भ वाग्देवी के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ l इसके बाद सरस्वती वन्दना नीरू गुप्ता मोहिनी ने प्रस्तुत की l उद्घाटन कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण भरत नाट्यम में गणेश वन्दना की नृत्य प्रस्तुति रही l कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता सीधी, मध्यप्रदेश से पधारे डॉ श्रीनिवास शुक्ल सरस ने की, मुख्य अतिथि के रामलला पैलेस के आचार्य परम आदरणीय
ब्रह्मदास महाराज जी रहे l विशिष्ट अतिथि के रूप में कानपुर के डी ए वी कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ राजेश तिवारी विरल, लखनऊ के प्रो विश्वंभर शुक्ल, देहरादून के शिव मोहन सिंह , मुंबई के डॉ कृपा शंकर मिश्र उपस्थित रहे l आचार्य ब्रह्मदास महाराज ने आशीर्वचन में संस्था के कार्य की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों से भारतीय संस्कृति और साहित्य का संरक्षण होगा और समाज को सही दिशा मिलेगी सत्र का कुशल संचालन नागपुर वाले म्हारे मित्र रामकृष्ण वि सहस्रबुदधे ने किया।संस्था की पत्रिका युगधारा के नवीन अंक का लोकार्पण हुआ, साथ ही विभिन्न 6 राज्यों से उपस्थित रचनाकारों की 14 साहित्यिक कृतियां भी लोकार्पित हुईं। संस्था
के सर्वोच्च साहित्य शिरोमणि सम्मान से नागपुर के वरिष्ठ साहित्यकार रामकृष्ण वि सहस्रबुदधे और लखनऊ की डॉ करुणा पांडेय को सम्मानित किया गया । गोस्वामी तुलसी दास सम्मान डॉ इंदु अग्रवाल
और पं प्रताप नारायण मिश्र सम्मान डॉ राजेश तिवारी विरल को प्रदान किया गया। इसी अवसर पर हमारे कहानी संग्रह "काला हंस" को भी "सरस्वती साधक" सम्मान और साथ में रुपये ३१००/- से देकर सम्मानित किया गया। इस सत्र का संचालन महासचिव सौम्या मिश्रा अनुश्री ने किया।
अगले दिन सुबह ही चूँकि प्रिय सौम्या को किसी इम्तेहान के लिए वापिस लखनऊ लौटना पड़ा तो हमने प्रिय प्रणव के साथ सुबह सुबह राम लला फिर हनुमान गढ़ी के दर्शन कर अयोध्या जी आने का ध्येय पूर्ण कर लिया होटल वापिस गर्मागर्म आलू पूरी से पेट पूजा की फिर मिली जुली सरकार के देख रेख में विविध राज्यों से आए 60 साहित्यकारों ने अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में प्रतिभाग करते हुए अपना अपना अप्रतिम काव्य पाठ प्रस्तुत किया। अब भाई साहब वो कवि कैसा जो माइक जल्दी छोड़ दे। लोग भरे बैठे रहते हैं महीनों और कभी सालों तक बस एक मौके के इंतज़ार में तो जिन्हें मौक़ा मिला उन्होंने कई कई दफ़ा अध्यक्षीय भाषण देकर ख़ुद को हल्का किया तो बाक़ी बचे शेष और अवशेषों ने टोके जाने के खौफ़ से न मंच की ओर देखा न ही संचालक की ओर मुंडी घुमाई बस जितना लपेट सकते थे लपेट दिया। हॉल बड़ा बचे खुचे दर्शक और हॉल में गूँजती हुई आवाज़ हमने दूर बैठकर संचालक महोदय को इन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कवियों के डर से खुदई कविता पढ़ने से स्पष्ट मना कर दिया अनुज जनार्दन को लगा ह्म्म नाराज़ हैं अब उसे कैसे बताएं कभी कभी कविता न पढ़ना भी पढ़ने के बराबर मान लिया जाना चाहिए आख़िर जिन्होंने पढ़ा है उन्हें सुना कितनों ने जाना कितनों ने और पहचाना कितनों ने हाँ भड़ास ज़रूर निकल गई कि अयोध्या जी में पढ़ आए हाँ नई तो।
शाम को डिनर के लिए सभी रेस्टोरेंट में जुटे पहली थाली हमें मिली हमने अभी हाथ जोड़कर पहला टुकड़ा तोड़ा ही था कि झट से बजरंगी आए फट से रोटी उठाई खट से बाहर । भाई साहब सब हक्के बक्के से देख रहे थे तभी गेट पार जाकर बजरंगी बोले अबे हमने एक ही रोटी उठाई है बाक़ी तुम ठूस लो और हां हमारी रोटी के पैसे सौम्या के खाते में डलवा देना (बजरंगी की भाव भंगिमाएं देखकर हमें ऐसा ही फील हुआ) । अगले दिन सुबह तैय्यार हुए ई रिक्शा ली मौर्या की कचौरी खाई, सरयू जाकर जल छिड़का आचमन किया फिर खूबसूरत पथ निरीक्षण करते हुए शिला स्थल देखा फिर मंदिर निर्माण स्थल देखा और सर नवाते हुए वापिस होटल सामान उठाया और अयोध्या धाम रेलवे स्टेशन,११:४५ वंदे भारत ली और झटक से सामान ऊपर रक्खा और फटक से सीट पर। ३,४ घण्टे बाद अहसास हुआ इस वंदे भारत से तो हमारी नमो भारत ज़्यादा बढ़िया है। ये १०२ की स्पीड से आगे नहीं बढ़ रही और नमो भारत है कि १६१ तक की स्पीड टच करती हैं। अभी हम कैलकुलेशन में व्यस्त थे कि वंदे भारत रुक गई,१०,२०,३० अजी नहीं पूरे एक घण्टे
हमें तनिक गुस्सा आ गया अगल बगल से ट्रेन गुज़र रही और हम.... ख़ैर टी टी तो क्या बताता हमने वंदे को वंदे किया और रुकने की वज़ह पूछी। हमारा पूछना था कि वंदे भड़क गई बोलो बरसों पहले बरेली में झुमका गिरा था उसे ही ढूंढ रही हूँ तुम्हें मदद करनी है तो करो वरना निकलो। हमने कहां देवी जहाँ तुम खड़ी हो वो जगह टिसुआ हॉल्ट से भी १० KM पहले है यहाँ से बरेली ४०,५० KM तो होगा। अब वंदे और भड़क गई और बोली सुनो बे शराफ़त से बता रहे हैं सुन लो ये नेता फेता तो वंदे संदे चला देते हैं बड़े बड़े दावे अलग से पर ट्रैक वही पुराने और घिसे पिटे तो हम चले कहां पे उड़ सकते नहीं चल सकते नहीं तो बेटा हमारी हम जानी तुम्हारी तुम समझे और ज़्यादा बोले तो याद दिला देंगे नानी। हमने मौके की नज़ाकत को समझा और वंदे को वंदे करते हुए मेरठ आने तक घुड़पचंद की तरह शांत बच्चे की तरह बैठे रहे ये सोचकर कि बात तो वंदे ने भी ठीक ही कही है। उधर वंदे एक घंटा लेट होने के बाद भी कवर करती हुई ९:०५ की जगह ९:२० पर मेरठ आ ही पहुंची। बाहर आए टैक्सी ली और सीधे 🧁 🏠 🏡 फिर स्वीट बेड और 🧁 वाली 😴 😴 😴।
विशेष: तीन दिनी अयोध्या जी प्रवास में जितनों से भी बात हुई एक बात क्रिस्टल क्लियर समझ आ गई कि मंदिर में चोरी हुई या करवाई गई उसका इफेक्ट दर्शनार्थियों पर बहुत ज़्यादा पड़ा है। भले ही एफ आर आई में चंपक राय और एक हैं का नाम नहीं है लेकिन अयोध्या जी वासियों में रोष बहुत है और वो चंपक राय की कार्यप्रणाली से कतई खुश नहीं हैं। बातचीत बाहर भी की और मन्दिर के अंदर भी । ये दाग किसी सर्फ़ से नहीं धुलने वाले।
"अब दाग़ दार दामन, कोई नहीं मिलेगा
इस दौर में सभी हैं, उजले लिबास वाले"
-प्रदीप भट्ट - मेरठ
24092026
टिसुआ
Tuesday, 8 September 2026
नाराज फूफास और चच्चा ट्रम्प
"नाराज़ फूफास और चच्चा ट्रम्प "
नाराज़ देशी फूफास्
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ख़ैर भाई साहब एक बात बताएं आपको ये जो मोदी जी हैं ना विपक्षियों को चैन से बैठने ही नी देते सच बता रिया हूँ मियां बड़ा गज़ब करते हैं और कई बार तो एक दिन में दो बार और अगर मूड में हों तो तीन चार बार भी। अब जे क्या बात हुई कि आपने सी जे पी की ओर मुँह करके विपक्षियों को पेल दिया महाराज कित्ता ज़लील करोगे और कितनी बार मेरे भाई। अब जे कहने की क्या जरूरत थी कि ग्रामीण और अर्बन नक्सल तो ख़त्म से ही हो गए किंतु परन्तु लेकिन कुछ दिमाग़ी नक्सल अभी भी अराफ़ात के मामू के लड़के की तरह खुराफात कर रहे हैं। अब कांग्रेसी तो कोंग्रेसी ठहरे उड़ते हुए तीर लेने के आदी सो चिदंबरम महाराज ने फौरन यह कहकर कि मैं सौ फ़ीसदी दिमाग़ी नक्सल हूँ कांग्रेस में पुनः अपना भविष्य ढूँढने की कोशिश की लेकिन कॉन्ग्रेस में निठल्लो की कमी है क्या एक से बढ़कर एक सो सबने "कैच मी ईफ यू कैन" की तर्ज़ पर तुरन्त उड़ते तीर की कॉपी बनाई और लगे चिल्लाने मैं भी दिमाग़ी नक्सल, मैं भी दिमाग़ी नक्सल। लेकिन होना तो कुछ था नहीं सो दो चार दिन मिमियाकर फंटाश की गोली खाकर एक किनारे हो लिए। तभी घाघ श्री केजरीवाल महाराज ने भी इसमें अपना भविष्य तलाशने की कोशिश और दो चार दिन चिल्लाए मैं भी दिमाग़ी नक्सल, मैं भी दिमाग़ी नक्सल पर हुआ कुच्छो ना सो वो भी पांचवें दिन लेफ्ट राइट लेफ्ट राइट करके अपने दड़बे में जा घुसे। अब मोदी जी हैं कि मानते नहीं सो एक बार फिर एक कार्यक्रम में विपक्षियों को डंक मार दिया कि कुछ लोगों को अच्छे काम भी अच्छे नहीं लगते ससुरे नाराज़ फूफा की तरह इधर उधर घूमते रहते हैं। ये जुमला पहले से कहीं कुछ ज्यादा ही तीखा था किंतु लगा बिलकुल निशाने पर और विपक्षियों ने राग भीम पलासी की तरह राग रोना रुनव्वा शुरू कर दिया। कुछ कांग्रेसियों ने इसे व्यक्तिगत ले लिया (व्यक्तिगत से तात्पर्य ghandy गाँधी परिवार के ग़ुलाम) और लगे चिल्ल पों करने वो भी नमक मिर्च के साथ ताकि हमारी भी कुछ टुक टुकाहट हो जाए ghandy परिवार में। अब ग़ुलामी की आदत तो बल्डवा में अन्दर तक घुसी हुई है सो नाराज़ फूफा के साथ उन्होंने नाराज़ जीजा को और एड कर लिया ताकि तीर अन्दर तक सीधा ही जाए। वैसे बहुत दिनों से सोशल मीडिया में नाराज़ फूफाओं की फेहरिस्त में तीन नाम बहुत चले। पहले पूर्व आर बी आई गवर्नर रघुराम राजन जिनका तर्क किसी के पल्ले नहीं पड़ा कि भारत को सेमीकंडक्टर बनाने की क्या ज़रूरत है हमें कौन सा सुपर पॉवर बनना है, दूसरे वही रवीश कुमार जिनका कहना था कि मेरठ प्रयागराज गंगा एक्सप्रेस वे से पॉंच घंटे पहले पहुंचकर आदमी क्या करेगा। इस बन्दे को पत्रकार किसने बना दिया या किसने बनने दिया और क्यूँ भाई तीसरे कन्हैया कुमार भाई साहब इनका ज्ञान तो सर्वोपरि है कहते हैं सरकार इतनी बढ़िया सड़के बनकर सरकार बिहार का पानी चुराना चाहती है। अरी मोरी मैय्या।
फूफागिरी
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क्या कै रिए हो मियां कि आपको नाराज़ फूफास का उदाहरण कुछ समझ नी आया तो चलो नाराज़ फूफा कैसे होते है उसका एकदम ताज़ा ताज़ा उदाहरण लपको। राजस्थान के खैरथल तिजारा जिसे अब भर्तृहरि नगर कहा जाता है, के उल्ला हेड़ी गाँव के अशोक शर्मा के साले के बेटे की बारात एक गाँव में आई थी, चूंकि अशोक शर्मा को दूल्हे की कार की पिछली सीट पर बिठा दिया गया अब पिछली सीट पर धरे सामान के साथ फूफा जी जैसे तैसे पैर सिकोड़कर बैठे रहे उन्हें ये बात बुरी तो लगी पर वो चुप रहे लेकिन जैसे ही दूल्हे ने अपने दोस्त अरविन्द वर्मा को आगे वाली सीट पर बिठा लिया। बस भाई साहब फूफा अशोक शर्मा इस हरकत को दिल पर ले गए और जैसे ही बारात जनवासे पर रुकी उन्होंने निश्चय कर लिया कि इन्हें सबक सिखाना जरूरी है, इन्हें पता तो चले कि फूफा क्या होता है और लीजिए साहब फूफा अशोक शर्मा ने रात के अंधेरे में 15 गाड़ियों में बर्फ काटने वाले सुए से पंचर कर डाले, एक आध गाड़ी का टायर भी टें बोल गया। सुबह जब लोगों को पता चला तो आसपास के कैमरे चैक हुए और फूफा जी अपनी फूफा गिरी करते हुए कैमरे में क़ैद। अब आप खुदई सोच लो ये तो दस बीस साल पुराने फूफा का कारनामा है लेकिन जो अभी अभी ताज़ा ताज़ा जीजा बने हैं वो भी छोरियों से कम थोड़े हैं, कुछ न कुछ तो वो भी करेंगे और भविष्य में फूफा बनकर फूफागिरी।
अब इन विपक्षियों ने अपने आस पास इतने अटरम शटरम टाइप के लोग भर रक्खे हैं कि इन्हें खुदई समझ नहीं आता कि किस विषय पर क्या बोलना है। बस जो जिसके जी में आता है बक बका देता है। दर्शक सोच सोचकर पागल कि भाई ये सो कॉल्ड प्रवक्ता आख़िर कहना क्या चाहता है। पर प्रवक्ता को दर्शकों से क्या लेना देना उसे तो ट्रेनिंग मिली हुई है विषय कोई भी जगह कोई भी हो उसे बस बीजेपी आर आर एस को कोसना है अगर मौक़ा मिले तो पहले अमित शाह को बाद में प्रधानमंत्री मोदी को गलियाँ बक दो कोई ज़्यादा उछले तो उस आदमी या पत्रकार को बीजेपी वाले हो कहकर दडबड़ा दो लेकिन सावधान योगी जी को सपने में भी कुछ मत कहना वरना टन्न टप्णा टन टन तारा चलती है क्या नौ से बारह गाना गाते देर नहीं लगेगी। किसी ने पूछ लिया ये टन्न टणा क्या होता है तो योगी जी के काले चश्मे वाले अवतार की फोटो दिखा दी जाती है उनके साथ खड़े दो यमराज हाथ में सरसों के तेल से पिलाया लकड़ी का लट्ठ लहराते हुए नज़र आते हैं। इसलिए दिमाग़ी नक्सली हो या नाराज़ फूफा उनके इलाक़े से दूर रहना ही पसंद करते हैं यकीं नहीं तो महाभारत के संजय नाम वाले उमेठू चंद से पूछ लो। क्या कहा समझ नहीं आया तो टिकैत बंधुओं से पूछ लो और ताज़ा मसाला चाहिए तो जेन जी की भेन्न जी से पूछ लो। बाबा और उनका बुल्डोजर दिल्ली की सीमा से लगे उत्तर प्रदेश की धरती पर पांव रखने वाले से पूछ लो। वो ओखला का विधायक क्या नाम था चलो जो भी था हां याद आया आप का अमानतुल्ल खां। भाई साहब अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या बसा रक्खे थे किसी की हिम्मत न हुई उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग की कब्जाई हुई ज़मीन पर पैर धरने की क्या पुलिस क्या कार्यपालिका सब सर्च करके उल्टे पांव उत्तर प्रदेश में। फिर हुई बाबा की एंट्री पुलिस भी वही कार्यपालिका भी जिस ज़मीन पे पुलिस पैर नहीं धर सकी उसी पुलिस ने बाबा के आशीर्वाद से पूरा बुल्डोजर रख दिया। अमानुल्ला खड़ा खड़ा देखता रहा और कुछ ही घंटों में पूरी जमीन उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के कब्ज़े में।
ख़ैर ये तो देश के हालातों पर छोटी सी टिप्पणी है कि देश में किए जा रहे बढ़िया वाले हर छोटे बड़े काम पर भी विपक्ष कैसे रोना राट मचाता है। जहाँ तक बात दिमाग़ी नक्सल की है तो वो नक्सलजिम उनकी आत्मा के परमात्मा से मिलन के बाद ही विदा हो पाएगा लेकिन जहाँ सवाल नाराज़ फूफा का है तो देश में तो उनकी अकड़ पकड़ ढीली करने वाले कई समझदार लोग हैं लेकिन अगर बात अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हो तो..... तो आजकल ट्रेंड में तो पता नहीं किसके वाले डोनाल्ड ट्रम्प ही चल रहे हैं। पूरी दुनिया में कुल जमा 193 देश हैं अगरचे मैं गलत नहीं हूं तो डोनाल्ड भाई का पंगा हर देश से हैं ये बात अलग है कि ईरान से पंगा करके उन्होंने पूरे अमेरिका को नंगा कर दिया है। देश के देश इस फ़ालतू के युद्ध से बरबाद हुए जा रहे हैं लेकिन इस बंदे को फ़र्क ही नहीं पड़ रहा। ये जानते हुए भी कि अमेरिका में मिड टर्म चुनाव हैं और चुनाव के नतीजे मियां जी को चौंका सकते हैं फिर भी हर एक से पंगा लिए जा रहे हैं। जब पहले टर्न में ट्रम्प जीतकर आए थे तो कहते नहीं थकते थे कि अमेरिका को हर जगह अपनी नाक नहीं घुसेड़नी चाहिए लेकिन अगले दूसरे टर्न में चुनाव हारने के बाद जो हिंसा इस बंदे के सहयोग से हुई वो अमेरिकी इतिहास की अभूतपूर्व घटना के रूप में दर्ज़ हुई। अमेरिका में पूरा अखाड़ा करने के बाद अप्रत्याशित रूप से कमला हैरिस को हराकर बंदा सत्ता में आया और ऐसा आया कि लोग इसके जाने का इंतज़ार कर रहे हैं। इसने अमरीका तो छोड़ो पूरे विश्व को अपनी हनक और सनक से इस क़दर परेशान कर दिया है कि विदेशी नेताओं ने इसे नाराज़ फूफा की उपाधि से नवाज दिया है। असली मुसीबत यह है कि पता नहीं किस देश ने इसको अपनी बुआ ब्याह दी है जो इस फूफा की तशरीफ़ नहीं सुजा पा रही। ये अंतर्राष्ट्रीय नाराज़ फूफा पता नहीं किसका क्या करके मानेगा।
नाराज़ चच्चा 'ट्रम्प'
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सन 2001 में न्यूयॉर्क के एक निवेश बैंक के अर्थशास्त्री को विश्व में उभरती चार अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक नाम सुझाना था। वो चार अर्थव्यवस्थाएं थीं भारत, चीन, रूस और ब्राज़ील। तो भैय्या उसने यूँ ही एक नाम सुझाया बी आर आई सी। ये महज़ मार्केटिंग को ध्यान में रखकर गढ़ा गया शब्द था ताकि अंतराष्ट्रीय स्तर पर इसे यूज़ किया जा सके। लेकिन "होनी तो होकर रहे अनहोनी न होए जाको राखे साईंया मार सके न कोय" और लीजिए हुज़ूर आगे चलकर यही नाम इतना मज़बूत हो गया कि एक कूटनीतिक पहचान ही बन गया। 2010 में इसमें साउथ अफ्रीका जुड़ा तो इसका नया नामकरण हो गया "ब्रिक्स' आज इसमें दुनिया के ग्यारह देश, और दस साझेदार देश, दुनिया की 49 प्रतिशत यानि आधी आबादी, 41 प्रतिशत जीडीपी और पच्चीस प्रतिशत ट्रेड। अच्छी बात ये है कि इस बार ब्रिक्स की मेजबानी भारत ने की वो भी दिल्ली के भारत मंडपम में 12,13 सितम्बर को। भारत और विषयों के अतिरिक्त जहाँ यू पी आई को ज़्यादा से ज्यादा देशों तक कनेक्ट करना चाहेगा वहीं ब्राज़ील अपने पिक्स जैसे तेज़ भुगतान वाले राष्ट्रीय सिस्टम को आपस में जोड़ने पर बल देगा। रूस जहाँ भारत का प्रामाणिक मित्र है उसके साथ रक्षा के एनर्जी पर भी बात होगी वहीं चीन अपने 400 डेलीगेशन के साथ अपने राष्ट्रपति के साथ भारत में बहुत कुछ संभावनाएं तलाशेंगे। ईरान भारत के साथ परस्पर सहयोग और बढ़ाना चाहेगा वहीं दूर बैठा नाराज़ चच्चा ट्रम्प कुछ उल्टा सीधा न करे ऐसा तो हो नहीं सकता न सो उसने 12 सितम्बर को घोषणा कर दी कि जिन भारतीयों की नौकरी जाएगी उन भारतीयों पर लागू 60 दिन का गैप पीरियड लागू नहीं होगा यानि इधर नौकरी गई उधर फ्लाइट पकड़ो और निकल लो अपने देश। लेकिन अच्छी बात ये रही कि शी जिनपिंग और पुतिन ने ब्रिक्स के मंच से भारत की भट्टी में तपी पकी ब्रिक्स यानि ईंट अमेरिका की तरफ़ यह कहकर उछाल दी कि आज ब्रिक्स जी सेवन से बहुत बड़ा हो गया है। अब चच्चा ट्रम्प को बढ़िया वाले एसी की हवा भी गर्म लग रही है लेकिन क्या करें कुछ हो जो नहीं सकता तो खिसयानी बिल्ली खम्भा ही नोचेगी।
अब ऐसा भी नहीं है कि पुतिन और शी जिनपिंग ने चच्चा ट्रम्प को चिढ़ाने भर के लिए जुमला फेंका हो। ज़्यादा नहीं थोड़ा सा तुलनात्मक अध्ययन करें जैसे कि जी सेवन की ग्लोबल जीडीपी में हिस्सेदारी 29% है जब कि ब्रिक्स की 40%, मैन्युफैक्चरिंग में जी सेवन की हिस्सेदारी 33% है तो ब्रिक्स की 40%, तेल गैस प्रोडक्शन में जी सेवन जहाँ 26% पर है वहीं ब्रिक्स 43% और भाई साहब आबादी के हिसाब से जी सेवन 80 करोड़ पर है वहीं ब्रिक्स की आबादी 400 करोड़ है और ये आंकड़े पिछले पांच वर्षों के आधार पर आकलन करते है। अब इन परिस्थियों में लड़ाई तो होनी है। अमेरिका जहाँ डॉलर का दबदबा बनाए रखना चाहता हैं वहीं ब्रिक्स देश इस दबदबे को चुनौती देते दिखते हैं। हाल के अंतरराष्ट्रीय घटना क्रम को देखते हुए यूरोप भी फूंक फूंक कर कदम रखना चाहता है उसे भी अहसास है कि अमेरिका किसी का सगा नहीं है वरना क्या कारण है कि यूरोप व्यापारिक सौदा हो चुका है और अमेरिका भी किंतु परन्तु में ही उलझा हुआ है।
पिरामिड ऑफ privileged
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प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स में भारी वाली ईंट बड़े हल्के अंदाज़ में हँसते हँसते ये कहकर उछाल दी कि मजबूत देशों को पिरामिड ऑफ प्रिवलेजज्ड की तरह व्यवहार करने से बाज आना चाहिए। इस विश्व में जितने भी देश हैं उन सभी की अपनी संप्रभुता है और मज़बूत देशों को उनकी संप्रभुता का ख़्याल रखना चाहिए लेकिन चच्चा ट्रम्प को भारत के नाराज़ फूफास की तरह इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। ब्रिक्स की मजबूती में वो अमेरिका का उभार कम होते देख रहे हैं उनकी कोशिश है कि किसी भी तरह ब्रिक्स को यूरोप को मक्खन लगाकर कमज़ोर किया जाए लेकिन भारत ने यूरोप को भी छाछ को फूंककर फूंककर पीना सिखा दिया है। सो अब ट्रम्प बौखलाहट में क्या करेंगे एक पेनजोन लेंगे नहीं बल्कि भारत सहित कुछ देशों को फिर से टैरिफ टैरिफ़ से डराने की कोशिश करेंगे
तो चलो चच्चा कोशिश करके देश लो कहीं ऐसा न हो समय से पहले ही अमेरिका राष्ट्रपति से भूतपूर्व न हो जाओ।
चलते चलते भारत सरकार से निवेदन कृपया प्रशासन में अन्दर तक घुस चुके भ्रष्टाचार के जंग से मुक्ति दिलाएं वरना क्या कारण है अमेरिका चीन की लड़ाई में जो बिजनेस भारत आना चाहिए था वो वियतनाम और ताईवान कैसे झटक कर लेता जा रहा है। सिर्फ़ आंकड़ों आंकड़ो पर भरोसे की जगह धरातल पर उतरे और एफ डी आई के लिए सिंगल विंडो सिस्टम सख़्ती से लागू करे। विदेशी तो छोड़िये देसी उद्योगपति भी इतना तंग आ चुका है कि वो भारत में इन्वेस्टमेंट न करके विदेशों में इन्वेस्ट कर रहा है। सबक विपक्षियों को ही नहीं आपको भी लेने चाहिए। जहाँ जरूरी हो वहीं नाक घुसेडिये हर जगह नहीं। अच्छा आपको भी उदाहरण चाहिए तो याद कीजिए जब टाटा नैनो कार का प्लांट पश्चिम बंगाल के सिंगुर में लगाना चाहते थे। टाटा इतने परेशान हो गए कि उन्होंने ये नैनो का आइडिया ही ड्रॉप करने का फ़ैसला किया और तभी गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी ने सिर्फ़ एक कॉल से वो नैनो का प्लांट सिंगुर से गुजरात खींच लिया था वो भी सिंगल विंडो द्वारा। सो पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें की तर्ज़ पर पुनः ध्यान दे वरना।
प्रदीप भट्ट
लेखक, मेरठ
16092026
Tuesday, 1 September 2026
"इज़्ज़त के लिए इज़्ज़त घर"
"इज़्ज़त के लिए इज़्ज़त घर"
राजा बाबू स्टेज़ के हर कोने का इस्तेमाल करते हुए महिलाओं पर बोल रहे हैं, फिर कट टू कट मनु स्मृति अपना ज्ञान बखार रहे हैं और बड़े मनोयोग से एक रहस्य से पर्दा उठा रहे हैं कि समाज में दो तरह के कप हैं एक प्लास्टिक जो दलितों के लिए है और दूसरा काँच का जो सवर्णो के लिए है। प्लास्टिक वाले कप में दलित को चाय मिलती है और काँच वाले में स्वर्ण को। एक बार फिर कट टू कट जेन जी और फ़िर जेन अल्फ़ा न जाने क्या क्या बीच में हल्द्वानी की घटना भी घुसेड़ दी। मज़ा तो तब आता है जब कार्यक्रम के बाद राजा बाबू चाय बाँटते दिखते हैं और जे क्या हुआ भाई साहब प्लास्टिक वाले कप में सबको बड़े मनोयोग से चाय पकड़ा रहे हैं !!! एक बार फिर कट टू कट राजा बाबू चाय पी रहे हैं वो भी काँच वाले कप में मतबल किसी बढ़िया कार्यक्रम का क्रियाक्रम कैसे किया जाता ये खासियत सिर्फ़ और सिर्फ़ राजा बाबू से सीखी जा सकती है। ये सब देखकर मेरी दोनों आँखें कुछ ज़्यादा ही खुल गई न न न भाई साहब मैं कोई सपना नी देख रहा, समझा करो मियां, अगर समझ में आवे तो। राजा बाबू का चलायमान ज्ञान देखकर मेरी आँखे या फिर बरबंटे या कुछ भी कह लो पर सच तो ये है कि इतने घुमावदार ज्ञान को देखकर सुनकर मुझे 3 इडियट की क्लास का वो टीचर याद हो आया जो आमिर ख़ान की हरकतों से परेशान होकर पूछता है "आख़िर कहना क्या चाहते हो" । अब आमिर ने क्या जवाब दिया वो तो हम सबको पता ही है लेकिन राहुल गाँधी का जवाब तैय्यार है। "मेरी मर्ज़ी"। अब कल्लो क्या बात करोगे इस बन्दे से।
यूँ तो हर व्यक्ति स्वतंत्र है कहीं भी कुछ भी बक बकियाने के लिए लेकिन भाई साहब जो बंदा जन्मजात ईसाई हो और वोटो की अगुवाहट में कुर्ते पे जनेऊ टांगने से बाज न आता हो तो फिर ऐसे भले माणुस को अगर सार्वजनिक स्थान पर मनु स्मृति पर अपना ज्ञान उड़ेलना पड़े और वो भी संस्कृत के श्लोक को उद्धृत करते हुए "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमयंते तत्र देवता" फिर उस ज्ञान की जबरदस्त खिल्ली उड़े तो... सोचो सोचो इसके आस पास रहने वाले चुकन्दर टाइप लोग भी शायद यही चाहते होंगे की जित्ती जल्दी हो सके इस बन्दे को जसपाल भट्टी का उल्टा पुल्टा करके छोड़ देते हैं। तभी तो ये चुकन्दर टाइप लोग जनता की अदालत में ऐसे वैसे जाने कैसे कैसे हिमालय पहाड़ से भी कुछ ज़्यादा ही कठिन मुद्दे पर इस बन्दे की ज्ञान वान पौध को लहलहाने देते हैं। हिट हुए तो हम साथ साथ हैं वरना तुम कौन हम खां म खां। अब महाराज इस बन्दे और इसकी टीम को कोई बताए कि मनुस्मृति वह ग्रन्थ है जो कि स्वयंभू मनु और भृगु के संवाद व प्रवचन के रूप में है। इसमें बारह अध्याय और 2685 से 2694 श्लोक हैं। इसमें ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, संस्कार, आचरण कर्तव्यों एवम् सामाजिक नियमों का उल्लेख है। अब जैसा की होता ही है, समय के साथ और सत्ता के लोलुप लोगों की आकांक्षाओ को पूर्ण करने के लिए धर्म पुस्तकों को अपनी बलि देनी पड़ती है ताकि कुछ गलीच किस्म के लोग सत्ता सत्ता खेल सकें सो मनु स्मृति के साथ भी यही सब हुआ जिनको संस्कृत का स नहीं आता वो मनु स्मृति का अनुवाद अपनी मर्ज़ी से कर देंगे और सनातन से चिढ़ खाए लोग अपनी अल्प बुद्धि से इसमें कुछ नए श्लोक गढ़कर अर्थ का अनर्थ करेंगे उन्हें सनातनियों से क्या सरोकार वो तो बे पेंदे के लौटे हैं आज इसकी ओर लुढ़क जायेंगे कल वर्तमान सत्ता लोभियों से कोई ज़्यादा लाभ दिखाएगा तो ये उस ओर लुढ़क जायेंगे आख़िर जन्मजात लुढ़कु राम जो ठहरे। और ऐसा सिर्फ सनातन के साथ नहीं हुआ है वरन् हर धार्मिक पुस्तक के साथ ऐसा ही छल हुआ है। बलवान के सामने कमजोर को बढ़ावा देना हो या फिर धर्म पुस्तक में घालमेल करना हो लक्ष्य एक ही रहता है किसी भी तरह सत्ता पे काबिज़ हुआ जाए। राजा बाबू इसी कोशिश को करते नज़र आते हैं वो भी मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं मेरी मर्ज़ी की तर्ज़ पर।
एक बात जो मेरे पल्ले आज तक नहीं पड़ी कि सबको ज्ञान क्यूँ देना है फिर चाहे वो सनातनी हो या ईसाई, मुस्लिम हो या सिख, बुद्ध हो या जैनिज्म और भी न जाने कितने दीन , मज़हब भरे पड़े हैं भारत में। सबको ज्ञान भी देना है गाली भी लेकिन सबको सिर्फ़ सनातन को कोसना है। अब कोई इन बांदरों को समझाओ कि समय समय पर सनातन रूपी पारावार से दो मुट्ठी जल लेकर ख़ुद को आर्टिफियल समन्दर समझने वाले लोग ये कब समझेंगे कि धर्म तो सिर्फ एक ही है और वो है सत्य सनातन बाक़ी तो... दिल को ख़ुश रखने को ग़ालिब ख़्याल अच्छा है। और चलो जी अगर इन लोगों को ज्ञान ही देना है तो दे ले भाई, ईसाई लोग ग़रीब गुरबा लोगों को ईसाई बनकर क्या ही कर लेंगे, या मुसलमान इन्हीं बचे खुचे गरीब गुरबा को मुसलमान बनाकर क्या हासिल कर लेंगे सिवाय जनसंख्या वृद्धि के। अगर किसी को गलत वाली फहमी हो कि उच्च पदस्थ ईसाई या मुस्लिम इन कन्वर्टिड लोगों को अपने चर्चों में या महजिदो में जाने देंगे तो मियां ये अभी भी बहुते दूर की कौड़ी है। नागालैण्ड जाकर मैं इस सच्चाई से रु ब रु हो चुका हूँ, कुछ ऐसा ही हाल महजिदो का भी है। "जाति है कि जाति नहीं" भले ये कनवर्ट हो गए हों लेकिन फ़ायदा तो दलित या महादलित या पिछड़ा बने रहने में ही है इसलिए कनवर्ट हुए हैं पैसे के लिए न कि अल्ला या यीशु से इन्हें कोई प्रेम है। बरसों से ऐसे लोग दो नावों की सवारी धड़ल्ले से कर रहे हैं। कोई भी ज्ञानी उन्हें ये नहीं बताता कि तुम ये गलत कर रहे हो क्यूँ कि भारतीय जन मानस में एक कहावत रच बस गई है। "माया तेरे तीन नाम परसी परसा परशुराम" इसलिए "बाप बड़ा न भईया सबसे बड़ा रुपैया" सो ये सोचना ही बेईमानी है कि कोई राजनेता या धर्म भीरु सच बोलेगा हां दोगली टाइप पब्लिक को खुश करने वो सनातन को सरे आम गरियायेगा और सत्ता की दलदल में अंदर तक धंसा छद्म सनातनी ताली बजाएगा।
अब बात करते हैं महिलाओं की। हर पार्टी सिर्फ़ महिलाओं पर फोकस रखना चाहती है कारण भी बड़ा स्पष्ट है आधी आबादी का मामला है जी। "राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट अंत काल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट" अगर आप अपने बचपने का पुनरावलोकन करेंगे तो पाएँगे कि जब आपके माता पिता आपसे बाजार से कुछ सामान लाने के कहते थे तो आपके दिमाग़ में पहला सवाल यही आता था कि कौन सा लाला सामान के बाद ज्यादा लुभाव या रूंगा देगा। आपको इस बात से कोई लेना देना नहीं होता था कि वो लाला इस लुभाव या रूंगे की कीमत सामान की क़ीमत बढ़ाकर या फिर सामान से टांका मारकर आपसे ही दुगना लुभाव या रूंगा वसूल रहा है। ये सब बिना पढ़े लोगों का मार्केटिंग मैनेजमैंट था जिसे आजकल बच्चे लाखों खर्च करके सीखते हैं। बस कुछ ऐसा ही काम ये राजनीतिक पार्टियां करती हैं। चुनाव जीतना है तो फिर बिना कुछ सोचे समझे फ्री फ्री फ्री की रट लगाए रहो, जीत गए तो वारे के न्यारे और नहीं जीते तो बेचारी ई वी एम को लानत अमानत। सामान्यतः कोई भी पार्टी जनता के विषय में नहीं सोचती और जो ग़लती करती है उसे घेरने के लिए राजा बाबू, खाजा बाबू, साझा बाबू जैसे लोग बैठे हैं न कोसने के लिए और अगर कोसने से मन नहीं भरता तो जैसे बादल पानी लाने के लिए समुद्र का सहारा लेता है तो ऐसे चंडोरे टाइप के लोग विदेश निकल लेते हैं अपनी जगह की थैली में न्यू टाइप का ज़हर भरने के लिए।
सिर्फ़ "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमयंते तत्र देवता" पढ़ देने मात्र से तो महिलाओं का उत्थान होने से रहा इसके लिए आवश्यकता है सही सोच की और फिर उस सोच को सही तरीके से लागू करने की। सात आठ सौ वर्ष या लगभग दो सौ वर्ष पर छींटा कशी करने से तो समस्या का समाधान नहीं होने वाला। कहने वाले कह सकते हैं कि हम आपस में लड़ते रहते थे इसी लिए बाहरी लोग हम पर आक्रमण करते रहे और हमें शारीरिक के साथ मानसिक गुलाम बनाते रहे जिस कारण हम चाहकर भी समाज का भला न कर पाए, ये विषय अलग है कि ब्राह्मण परिवार में जन्मे राजा राम मोहन राय ने 1829 के उस दौर में भी सती प्रथा को बंद करवाकर समाज को चेताया जब अंग्रेजों के दमन दौर की आंधी चलती थी साथ ही बाल विवाह, बहु विवाह और जाति गत कठोरता का विरोध किया और सबसे महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं के सम्पत्ति एवम् शिक्षा के अधिकारों की खुलकर वकालत की साथ ही यह भी सिखाया कि हमें आँख मूंदकर किसी भी धार्मिक या सामाजिक नियम को नहीं मानना है बल्कि समय समय पर ऐसे नियमों की समीक्षा भी करते रहनी चाहिए। इस तरह के स्त्रियों के लिए सुधार अन्य दीन या मज़हब में कभी हुए ही नहीं क्यूँ कि वहां महिलाओं को बोलने की स्वतंत्रता ही नहीं है फिर सुधार की अपेक्षा रखना ही बेईमानी है।
अब बात करते हैं स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की तो जो जितने बड़े नाम उस समय कांग्रेस में रहे फिर चाहे वो पुरुष हों या महिला उनमें से शायद ही किसी को ये ख़्याल आया हो कि भारत की महिलाओं की सबसे बड़ी समस्पया शौच करने की है। शहरों में जहाँ ये समस्या 30 प्रतिशत के आस पास रही वहीं गाँवो में ये समस्या नब्बे से पिच्चानबे प्रतिशत के क़रीब रही। शहरों में बाज़ार या सार्वजनिक स्थानों बस अड्डों या रेलवे स्टेशनों पर भी पुरुषों के लिए तो शौचालय मिल भी जाते थे किंतु महिलाओं के लिए ये स्थिति बहुत ज़्यादा अच्छी नहीं थी, गन्दगी बदबू, दरवाज़े का नहीं होना। वहीं गाँवो कस्बों की स्थिति और भी ज्यादा भयावह रही है। महिलाएं मुंह अँधेरे ग्रुप में शौच के लिए जाती रहीं है। अगर अकेले दुकेले गईं तो सुरक्षा का सबसे ज्यादा खतरा। फलानी महिला शौच के लिए गई और कुछ लोगों ने उसकी इज़्ज़त लूट ली और ये सब किसी जाति विशेष के साथ नहीं वरन् हर जाति की महिलाओं की कहानी रही है। अगर पेट ख़राब है तो आप उस महिला की स्थिति के विषय में सोचकर देखिए आपकी रूह काँप जाएगी। दिन भर पेशाब को रोककर रखने से उन्हें इन्फेक्शन हो जाता रहा है। लेकिन इस एक महत्वपूर्ण समस्या का समाधान करने की किसी ने क्यूँ नहीं सोची।
ख़ैर जैसे कूड़ी के भाग बारह बरस में बदलते हैं वैसे ही 2014 में देर से ही सही किंतु गाँव हो या शहर की महिलाएं प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से देश को संबोधित करते हुए महिलाओं के शौच को लेकर बड़ी घोषणा की कि अब महिलाओं के लिए घर में ही शौचालय बनेंगे। अक्तूबर 2014 से पूर्व जहाँ देश में लगभग 43.7 प्रतिशत ही शौचालय थे वहीं देखते देखते जो मिशन 2014 में शुरू हुआ वो 2019 आते आते ग्रामीण क्षेत्र हो या शहरी क्षेत्र तेजी से इस कार्य में प्रगति करने लगा एवम् कुल 1.43 करोड़ शौचालय बनाए गए। लगभग चार वर्षों में लक्षद्वीप में जहाँ सबसे कम 0 शौचालय बने वहीं उत्तर प्रदेश में 513952 शौचालय बने। अभी तक इस योजना में लगभग 10करोड़ से ऊपर शौचालय बन चुके हैं जो ये दर्शाता है कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो कोई भी कार्य दुष्कर नहीं बस कुछ कर गुजरने की चाह का होना ज़रूरी है। महिलाओं को आर्थिक रूप से शैक्षिणिक रूप से मजबूत बनाया जाना चाहिए लेकिन सिर्फ बोलने के लिए नहीं वरन् कुछ कर दिखाने के जज़्बे के साथ। प्रधानमंत्री मोदी चूंकि ज़मीन से जुड़े नेता हैं और गुजरात के एक गाँव से निकलकर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं इसलिए वो जानते हैं कि शैक्षणिक और आर्थिक रूप से महिलाओं को कल भी मजबूत किया जा सकता है परन्तु सबसे पहले उन्हें खुले में शौच की त्रासदी से स्वतंत्रता दी जानी आवश्यक है इसलिए उन्होंने इसे इज़्ज़त घर नाम दिया। ये काम और लोग भी कर सकते थे किंतु उन्हें ये काम करना छोटा और बेतुका लगा। भला महिलाओं को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने से देश का क्या ही भला हो जाएगा इसलिए उन जैसे अक़्ल के अंधे नेताओं ने ख़ाली हवाई जहाज़ भेजकर चार पैकेट सिगरेट मंगवाने से देश का भला करना ज़ारी रक्खा।
चलते चलते हल्द्वानी केस पर एक नज़र। खड़गे जी इस बात से दुःखी थे कि हल्द्वानी में उनके कार्यक्रम के बाद श्रीराम सेना ने कार्यक्रम स्थल का शुद्धिकरण किया और कॉन्ग्रेस इस पर कोई एक्शन नहीं ले रही। ख़ैर राहुल और प्रियंका राज्यसभा में अलॉटेड रूम में गए उनकी बात सुनी और वादा किया कि वो इस पर drastik एक्शन लेंगे लेकिन फिर भूला की तर्ज़ पर बाहर निकलकर भूल गए वो भी मेरी मर्ज़ी के स्टाइल में। अब कट टू कट हल्द्वानी से ख़बर आई कि श्रीराम सेना के दो दलितों ने जो उस कार्यक्रम में शामिल थे ने राहुल पर जातिवाद का आरोप लगाया और एफ आर आई ठोक दी अब आप ही सोचो खड़गे जी जो ख़ुद कांग्रेस अध्यक्ष हैं इत्ते लाचार हैं कि उन्हें हल्द्वानी घटना पर एक्शन के लिए राहुल प्रियंका के आगे लिटररी गिड़गिड़ाना पड़ता है तो भाई ऐसे अध्यक्ष से तो अपनी दूर से ही राम भली लेकिन एक ठो कहावत फिर याद आ गई कि कांग्रेस में अध्यक्ष कोई भी खटोला वहीं बिछेगा जहां ghandy परिवार चाहेगा, क्यूँ सच कै रिया हूँ न मैं। वैसे एक बात और आजकल कांग्रेस की आदत भी न सड़क से दूर पड़े तीर को हवा में उड़ाने की और पीछे का दरवाज़ा खोलने की हो गई है क्यूँ खड़गे प्रकरण ने लोगों को गूगल में उगल करने पर मजबूर कर दिया और पता चला कि खड़गे जी तो प्रैक्टिस वाले बुद्धिष्ट हैं ऐं जे क्या हुआ अब कर लो बात और दूसरी बात हल्द्वानी में राहुल पर एफ आर आई होना यह दर्शाता है कि बीजेपी का मीडिया सेल अध्यक्ष बदलते ही कैसे सरपट दौड़ पड़ा है।
प्रदीप भट्ट :02092026
लेखक, मेरठ
Tuesday, 11 August 2026
"कैच मी ईफ यू कैन"
"कैच मी ईफ यू कैन - राजा बाबू"
ख़ुद को खानदानी प्रधानमंत्री मानने वाले परिवार के चश्म ओ चराग़ का सोशल मीडिया पर आजकल ट्रेंड चल रहा है कि कितने लोग मेरे बेटे को भारत कापी एम बनते देखना चाहते हैं? कितने लोग मेरे भाई को पी एम की कुर्सी पर बैठे देखना चाहते हैं? ऐसी पोस्ट पर कैसे कैसे कमेंट आते हैं बताने वाले क़ाबिल भी नहीं हैं। खैर सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट पढ़ते पढ़ते मुझे भी नींद आ गई। अब नींद में ख़्वाब देखना तो मेरा लोकतांत्रिक और मौलिक अधिकार है। संविधान में मुझे सपना देखने की इजाज़त दी है। अब मैं अपने सपने का शपथ पूर्वक वर्णन करता हूं....। मई जून की गर्मी, चिल्ड ए सी रुम वाह क्या मज़ा है, मैं एक 56 साल का लेखक, कवि, व्यंग्यकार और ज्यादातर विदेश में रहने वाला पार्ट टाइम पॉलिटिशियन हूँ। एक दिन अपनी पार्टी से चुनाव लड़ने के बाद घर लौटता हूं। चुनाव की थकान उतारने के लिए सोडा चखना और एक गिलास के साथ महंगी वाली विदेशी बोतल। सामने टी वी पर समाचार में चुनाव के नतीजे, मेरी अपनी पार्टी सबसे आगे चल रही है, फ़ाइनल नतीजे घोषित होते हैं, मेरी पार्टी 99 के फेर में पड़कर ९९ सीट जीत लेती है, मेरे दरबारी जय जयकार कर रहे हैं, पटाखे फोड़ रहे हैं, मिठाई बांट रहे हैं, मुझे हर तरफ से बधाई मिल रही है, क्या बात है अपनी पार्टी ने तो कमाल ही कर दिया। अब सपने का पार्ट 2 शुरू होता है - अपनी पार्टी वाले मुझे नेता मान लेते हैंमुझे प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव पास कर देते हैं, राम लीला मैदान में विशाल पण्डाल लग जाता है, देसी विदेशी मेहमान आने लगते हैं। मैं भी अपनी पिंक शर्ट और बादामी पेंट पहनकर लम्बी सी कार में सवार होकर शपथ लेने रामलीला मैदान पहुंच जाता हूं, जैसे ही शपथ ग्रहण का मुहूर्त आता है तभी पत्नी जोर जोर से चिल्लाती है, भोर हो गई उठ जाओ। बस फिर क्या सपना टूट जाता है और मेरा पारा सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। मेरे मुंह से पत्नी के लिए बददुआ निकलती है और फिर मैं सोचता हूं कि इडियट अगर थोड़ी देर और सोने देती तो मैं प्रधानमंत्री की शपथ भी ले लेता।। अगले दिन हमने भरी महफ़िल में अपने यार दोस्तों को बताया कि यार सवेरे सवेरे पत्नी ने मूड खराब कर दिया। ज़ाहिर है सामने से सवाल आएगा ही आएगा, क्यों क्या हुआ। तब हमने बड़े मनोयोग से पूर्ण वृतान्त सुनाया, भाई मैं प्रधानमंत्री की शपथ लेने ही वाला था कि पत्नी ने जगा दिया और मेरा पी एम बनने का सपना अधूरा रह गया। कमोबेश मेरे जैसा सपना हर पार्ट टाइम, फुल टाइम पॉलिटिशियन देख रहा है इसलिए संविधान कहता है कि सपना देखो तो बड़ा देखो जैसे मैंने देखा है। ये इंसान का मौलिक अधिकार है इस पर कोई भी सरकार रोक नहीं लगा सकती।
आजकल जिस तरह से प्रधानमंत्री बनने की कोशिशों की होड़ लगी हुई है और जिस तरह विपक्षी पार्टियों के नेता एक नेता दूसरे को धकियाते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी से लिपटने को तैय्यार बैठे हैं ऐसा लगता है जैसे सब अपने अपने पाप इस गँगा मैय्या रूपी कुर्सी पर बैठकर धो लेना चाहते हैं। वास्तव में अगर पाप किए हैं तो धुल सकते हैं लेकिन इसके लिए इन आकांक्षाओं से लबरेज़ महत्वकांक्षी नेताओं को गंगा रूपी जनता जनार्दन की नदी को तैर कर पार करना पड़ेगा न कि सोने से बनी नाव से। बस इसी एक काम से ये उस चमत्कारी कुर्सी तक अपनी पहुँच बना सकते हैं । चाहतों से लबरेज़ पार्टियों के नेताओं की हरकतों को देखकर ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता कि ये जनता जनार्दन नामक वैतरणी को कभी अपने कर्मों के बलबूते पार कर पायेंगे। राज्यों के चुनाव में अलबत्ता ये इक्का दुक्का तुक्का लगाकर ये ज़रूर अपनी आत्मा को संतुष्ट करा सकते हैं। बीजेपी की बिहार और उसके बाद बंगाल की भारी भरकम जीत या उसे फिर विपक्ष का सूपड़ा साफ़ करना भी कह सकते हैं या इंडी की मिंडी बनना भी कह सकते हैं, से एक बात तो तय है कि विपक्ष को बीजेपी से कुछ नहीं वरन् बहुत कुछ सीखने की जरुरत है अगर वो सीखना चाहें तो। लालू का तेजस्वी हो या ममता का अभिषेक, हार के बाद लालू पहले भी चारा चोर थे और बाद में भी लेकिन गली गली मुहल्ले मुहल्ले उनको किसी ने चोर चोर कहकर बेइज्जत नहीं किया, किंतु बंगाली मानस तो बाक़ी देश से आगे की सोचता है सो लोगों ने ममता की हार को उनके भतीजे अभिषेक के प्रति उनके मोह पर ममत्व लुटाने को माना। अब स्थिति ये कि गली गली मुहल्ले मुहल्ले में टी एम सी नेताओं को चोर चोर का भूत पीछा छोड़ने को तैय्यार नहीं। वैसे इस स्थिति पर मुझे 1972 की राजेश खन्ना की पिक्चर राजा रानी का एक ठो गाना वो भी जोर से याद आ रहा है "जब अँधेरा होता है/ आधी रात के बाद/ एक चोर निकलता है/ काली सी सड़क पे/ एक आवाज़ आती है ssss/ चोर चोर चोर चोर चोर चोर। पर टी एम सी की मुसीबत ये है कि चोर चोर की आवाज रात में ही नहीं उन्हें दिन में भी सुनने को पड़ रही है।
अब प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ़ ललक से देखने वाले दावेदारों में से एक ममता बेन तो कट लीं। सो मार्किट में अब केजरी बाबू, राहुल गाँधी और थोड़े बहुत अखिलेश भईया बचे। अखिलेश अपना दम यू पी में जबरदस्त तरीके से 2024 के लोक सभा चुनावों में दिखा चुके हैं तभी तो डिम्पल भाभी एक सवाल के जवाब में बोल पड़ी थीं कि अखिलेश भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं, 37 ठो सांसद हैं भैय्या। बात उनकी भी ठीक ही है इस देश में अभी तक ऐसा कई बार हो चुका है तो उम्मीद लगाए रखने में क्या जाता है जी। जय हो डिंपल भाभी की! लेकिन हम कल ही एक ठो रील देख रहे थे उसमें एक नारा था " सारे यादव देश के जो बचे वो लालू ,अखिलेश के" मतबल लोग भी न कैसा कैसा मजाक करते हैं। अब सोचो ज़रा जी, 2029 में सारे यादव देश के हो जायेगें तो? लेकिन पाँच ठो यादव फिर भी मिल ही जायेंगे आख़िर यादव का मतलब ही परिवार से है। बकौल छत्ती कपूर "समझते नी हो यार" अब रहे केजरीवाल तो भैय्या दिल्ली जीता तो लगा पूरे देश का दिल जीत लिया सो सीधा आप अध्यक्ष/कन्वीनर का मुकाबला प्रधानमंत्री से करने लगे , चैलेन्ज पे चैलेंज बस मोटा भाई की सनक गई और मोटा भाई ने सोने का पानी चढ़ी परात से पानी हटा दिया और भरे चौक में परात पीतल की रह गई। अब भाई साहब जो ख़ुद की सीट हार बैठे उसकी राजनीति में कित्ती बखत रह जाती है खुदई सोच लो मियां। लेकिन जो शांति से बैठ जाए वो केजरीवाल तो हो नहीं सकते सो एक लम्बे पॉज के बाद उन्हें फिर खुजली मची तो पीछे के दरवाज़े से काक्रोच काक्रोच खेलने लगे। आप को क्या लगा मैं झूठ बोल रिया हूँ तो भैय्या गूगल में उगल करके देख लो ये रांका पांका अभिजीत दीपके सब आप के पाप में शामिल मिलेंगे। ये बेचारे तो पपेट हैं इन्हें जंतर मंतर पर छूमंतर करने वाले केजरीवाल ही हैं। अब ये फिर कुछ रुकने के बाद फिर खुजली खुजली खेलने की कोशिश कर रहे हैं पता नी मैन्नू ऐ लगदा है ऐ बंदा अब पंजाब से भी अपना सूपड़ा साफ़ कराकर ही मानेगा।
सुपर से ऊपर
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अब बचे राहुल गाँधी , भई 140 साल पुरानी पार्टी का इकलौता नेता जिसे हारने से डर नहीं लगता और लगे भी क्यूँ हारना कोई बुरी बात थोड़े है। भाई साहब इस बन्दे का कॉन्फिडेंस इत्ता ऊँचा है कि उसे टच करने में आपको कई सीढ़ियां लगानी पड़ेगी फिर भी आप उसके कॉन्फिडेंस को छू नी पाओगे और ऐसा यूँ ही नहीं है ये सब महराज । बक़ौल वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह जी विजय लक्ष्मी पंडित जो कभी स्कूल तक नहीं गईं उन्हें अमेरिका में राजदूत बना दिया जाता है उसके बाद सोवियत संघ में और भी जाने कहाँ कहां और ऐसा इसलिए कि हमार भैय्या प्रधानमंत्री तो हम राजदूत तो बन ही सकते हैं न कमस कम I इसके बाद 1965 में जब लाल बहादुर शास्त्री जी प्रधानमंत्री थे और इन्दिरा गांधी सूचना प्रसारण मंत्री तब एक आश्चर्य चकित घटना हुई। हुआ यूँ के जब नेहरू जी प्रधानमंत्री थे तो एक संविधानिक फैसला लिया गया कि 15 बरस बाद यानि 1965 से अँग्रेजी की जगह हिन्दी राष्ट्रभाषा होगी यानि सरकारी कामकाज की भाषा हिंदी होगी, तमिलनाडु में इस बात पर हंगामा होता है इन्दिरा गाँधी बिना प्रधानमंत्री को बताए तमिलनाडु चली जाती हैं और वादा कर आती हैं कि हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं होगी जब एक सीनियर जर्नलिस्ट इस घटना पर सवाल करते हैं तो इंदिरा बोलती हैं कि मैं देश की नेता हूँ ऐं जी जे क्या बात हुई भाया प्रधानमंत्री से ऊपर कोई नहीं हो सकता लेकिन हमारे नाम के पीछे नेहरू गाँधी लिखा है इसलिए हम कुछ भी कर सकते हैं। इसे ही शास्त्रों में ख़ुद को सुपर से ऊपर समझना कहा गया है।
फटे तो फटे नवाबी न घटे
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"हार में या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं" की तर्ज़ पर प्रधानमंत्री बनने की लालसा लिए ये बंदा लगा पड़ा है । अब ये कब मिलेगा पता नहीं, मिलेगा भी या नहीं, कह नहीं सकते लेकिन कदम सदैव प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर अग्रसर। अब ग़लती इस बन्दे की भी नहीं है। देश को तीन तीन प्रधानमंत्री देने वाले गाँधी "ghandy" परिवार में जिस भी चश्म ओ चिराग़ की आँख खुली उसे मुग़ली घुट्टी 555 की जगह प्रधानमंत्री कुर्सी छाप घुट्टी पिलाई गई तो बंदा और कोई सपना देखे भी तो कैसे सो भैय्या मैं इसमें इस बन्दे की ग़लती कतई नई मानता ग़लती उनकी है जिन्होंने ग़लत घुट्टी पिलाई और घुट्टी भी ऐसी कि कोई पढ़ा लिखा हो न हो फिर भी उसे कहीं भी कुछ भी बना दो। अब उम्र के इस पड़ाव पर आकर ये बंदा कोई दूसरा काम भी तो नहीं सकता न, फिर करे तो क्या करे "वो सुबह कभी तो आएगी" के इंतज़ार में बंदा लगा हुआ। इस चक्कर में कई ट्यूटर बदले जा चुके हैं, पिता के ज़माने में कुली कुली खेलने वाले को पार्टी प्रधान भी बना डाला किंतु परन्तु लेकिन रिज़ल्ट ज्यूँ का त्यूं कारण बन्दे को सुनने की आदत नहीं है कोई कल का जाता आज ही पार्टी छोड़ दे इस बन्दे को कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला कारण सीधा है वो भी जॉनी वाले राजकुमार की तरह कि पार्टी हमसे है हम पार्टी से नहीं। अब कर लो बात क्या करोगे। हाँ जो कोई न सोच सके ऐसा काम ये बंदा जब तब करता रहता है। काक्रोच काक्रोच खेलते खेलते ये बंदा घर से निकला कहीं और के लिए लेकिन जा बैठा प्रधानमंत्री आवास के सामने वो भी बिलकुल एक बिगड़ैल बच्चे की तरह लेकिन ये बंदा समझदार भी है थोड़ा सा सो राँची नहीं गया। झारखण्ड वाले देखते रहे के तुम कब आओगे लेकिन ये बंदा डिज़िटल के ज़माने में शिबू सोरेन के साथ चिट्ठी चिट्ठी खेलने में व्यस्त रहा।
कैच मी इफ़ यू कैन
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सो हुआ यूँ के 1986 में एक ठो पिक्चर आइल रही उका नाम का था हाँ याद आइल गईंल "पीछा करो" जिसमें अपने वाले फारूख शेख, रवि वासवानी, अमजद खान और अनुपम भैय्या और भी न जाने कित्ते कलाकार थे I दो जासूस एक देश द्रोही को पकड़ने के लिए इत्ती ज्यादा उट पटांग हरकतें करते हैं कि दर्शक हँस हँस कर लोट पोट हो जाता है लेकिन वे परिस्थिति से घबराए बिना अपने लक्ष्य को भेदने के लिए तैय्यार रहते हैं I फिर 2002 में स्टीफन sleep बर्ग की फिल्म "Catch Me If You can" (हिम्मत है तो पकड़ के दिखाओ) देखी ।स्टोरी थोड़ी अलग थी लेकिन फिल्म का मिजाज़ "पीछा करो" जैसा ही था I हम एक रील देख रहे थे जिसमें अपने वाले सुब्रह्मण स्वामी जी से किसी पॉडकास्टर ने पूछा कि राजा बाबू प्रधान कब बनेंगे। भाई साहब पहले तो उन्होंने उस पॉड कास्टर को ऊपर से नीचे फिर नीचे से ऊपर की ओर देखा फिर जहरीली मुस्कान के साथ कहा "कभी नहीं" लगे हाथ उन्होंने राजू बाबू द्वारा गिनवाई जा रही विदेशी डिग्रियों का कच्चा चिट्ठा भी खोलकर पॉडकास्टर बोलती बंद कर दी। ऐसे जाने कितनी रील फील तरंगों के माध्यम से कुछ सत्य कुछ अर्धसत्य और कुछ बिलकुल सफ़ेद झूठ वातावरण में चहल कदमी कर रही हैं। लेकिन एक बात तो है और वो ये कि राजा बाबू को प्रधान बनाने के लिए कुछ विदेश एजेंट कुछ देसी एजेंट पूरी तरह हाथ पाँव मार रहे हैं लेकिन वो क्या है ना कि वर्तमान परिवेश में 2047 तक तो कोई उम्मीद नज़र आती नहीं। चलो कुछ खुराफाती लोगों के दिल को ठण्डक पहुँचाने के लिए मान लेते हैं कि राजा बाबू जोड़ तोड़ करके प्रधान बन भी गए तो क्या ही हो जाएगा भैय्या। चलो इस पर भी एक ठो नजर डाल ही लेते हैं।
जेन जी!! फलाना ढिकाना... जिंदाबाद
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एक शब्द है फैंटेसी चलो तो इसी के इर्द गिर्द हम कभी न हो सकने वाले ख़्वाब को देखने का प्रयत्न करते हैं। राजा बाबू प्रधान बन गए हैं, केजरीवाल गृह मंत्री बन गये, अखिलेश यादव रक्षा मंत्री ममता बेन विदेश मंत्री बाक़ी जो मंत्रालय बचे उसके लिए पहले सर फुटव्वल और फिर छीना झपटी ख़ैर विशेष शेष के बाद अवशेष बचे लोगों ने कुछ न कुछ पा लिया तो क्या होगा। चूंकि भारत की जनता वो "गोल्डन डेज़" देखना चाहती है सो फिर से वही भाई चारा भाई चारा वाला खेल जाएगा ना। इसमें पहले की तरह रामू ही चारा बनेगा और और बाक़ी भाई। सारे बांग्लादेशी पाकिस्तानी भाई बिना पासपोर्ट वीज़ा के भारत में बॉर्डर से तार क्रॉस करके हिंदुस्तान आया जाया करेंगे। तार काटने की मशीन भारत में रहने वाले जामु उपलब्ध करा देंगे, भाई भाई का मामला जो है आख़िर। जनता को 24 घण्टे में कम से कम 10 12 बार लाईट आ गई की ख़ुशी प्रदान की जाएगी। वही पुरानी व्यवस्था... गैस, राशन, मिट्टी का तेल—सब कुछ तब भी "ऑनलाइन" ही मिलता था अब फिर से वही सब। ऑनलाइन मतलब... "लाइन में ऑन रहो"। ज़रा-सा लाइन से हटे नहीं कि नंबर गया! बस... वही "ऑनलाइन सिस्टम" फिर से देखने लगेगा। जहां तक महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा है तो फिर वही जब शाम ढलते ही लोग, खासकर महिलाओं को किसी बात का डर नहीं था क्यों कि हर महिला के पास चार-चार, पाँच-पाँच ब्लैक कमांडो हुआ करते थे और महिला सूर्य ढलने के पहले घर पहुँच जाती थी। रात का झंझट ही नहीं।
न न अभी फैंटेसी ख़त्म न हुई है लो और सपने में तैर लो भाई। वही दौर दौर वही दौर... जब जब दिवाली कभी पड़ तब तब दीवाली को सेलिब्रेट करने के आतंकवादी दस पांच शहरों में बम फोड़ देते थे। ...वही दौर... हर दूसरे चौथे दिन शहर-दर-शहर बम की ब्रेकिंग न्यूज सुनने को मिलती थी? वही दौर जब प्रधानमंत्री बोलते थे "पैसे पेड़ पर नहीं उगते!जब भारत में आतंकी हमले हो रहे थे तब गृहमंत्री सूट बदल रहे होंगे और उन्हें इतनी बड़ी घटना पर दो शब्द बोलने का भी टाइम नहीं होगे ! वही दौर जब हिंदू हिंदू होने से ही कतरने लगा था बेटियां महिलाएं सुरक्षित नहीं थी । जहां तक पेपर लीक ही नहीं होता था कोई पेपर कभी लीक नहीं होता था, हर बच्चे के सौ में से सौ नंबर आते थे और हर मोहल्ले, हर कस्बे और हर शहर से मानो हर बच्चा डीएम या डीएसपी बनकर कॉलर टाइट करने लगता था ? सरकारी नौकरियाँ इतनी कि तीन-तीन पोस्ट पर एक अकेला बंदा काम करता था? वही ज़माना... जब हर गली-मोहल्ले में एक AIIMS, एक IIM और एक IIT हुआ करती थी? वही दौर, जब सौ डॉलर का एक रुपया हुआ करता था! महंगाई तो बिल्कुल भी नहीं थी—एक दर्जन में अठारह-अठारह केले आते थे तब। वही दौर चाहिए मुझे। वही दिन, जब रात आठ बजे वाली ट्रेन रात आठ बजे ही आती थी... बस, तारीख़ कौन-सी होगी, ये कोई नहीं जानता था! स्टेशन पर बैठकर उनका इंतज़ार करने का जो रोमांच था, वो आज भी याद आता है। रेलवे स्टेशन तो इतने बड़े-बड़े हुआ करते थे कि कई बार तो वहाँ हवाई जहाज़ उतर जाया करते थे। वही दौर वापस लाना है जब सरकारें नेता नहीं गुण्डे चलाते थे। क्यों कि हिंदू-मुस्लिम जैसी कोई बहस ही नहीं होती थी। मुस्लिम अपने नाम के साथ... "द्विवेदी, तिवारी, शर्मा और शुक्ला" लिखते थे और हिंदू "खान, कुरैशी, हुसैन और अहमद"। बस, इंसान की पहचान इंसान से होती थी।
दिमागी नक्सल
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मोटा भाई छोटा भाई ने देश को ये कहां पहुंचा दिया है। ये भी कोई बात हुई इन दोनों ने कश्मीर से 370 हटाकर वहां की आवाम को खुले में श्वांस लेने की इजाजत कैसे दे दी। राम मन्दिर निर्मित हो गया, 80 करोड़ लोगों को फ्री राशन, उत्तर प्रदेश जैसे बीमारू राज्य में 17 हवाई अड्डे, दिल्ली NcR का मतलब सार्थक करते हुए देश की पहली रैपिड ट्रेन दिल्ली से मेरठ चलवा दी। शौचालय पर बात करने से नाक भौं सिकोड़ते नेताओं को लाल किले से बताया कि महिलाओं के लिए इज़्ज़त घर क्यूं ज़रूरी है। पुराने तौर तरीके कितने अच्छे थे लेकिन इन दोनों ने उन्हें भी न्यू भारत के सांचे में ढाल दिया मतलब BNS की धाराएं लागू हो गईं। नक्सलवाद भी ख़त्म कर दिया। जिस कश्मीर में लोग जाने से डरते थे अब वहां भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गौर जाकर बता रहे हैं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और जल्दी ही अमेरिका कश्मीर पे लागू अमेरिकी टूरिस्टों के लिए धारा को डिग्रेड करने के लिए कहेंगे। यहाँ तक तो ठीक था अमर अब्दुल्ला ने अलग बढ़िया वाला बयान देकर इंडी की मिंडी बना दी उधर पाकिस्तान सदमे में आ गया है।गुलामी के प्रतीक संसद भवन की जगह नया भारतीय संसद भवन बनाकर उन हड़प्पुओं का नुक़सान कर दिया जो हर माह लूटियन में लोट लोट कर करोड़ो छाप रहे थे। भारत की सेना को फ्री हैंड दे दिया साथ में कह दिया जो बातों से माने तो ठीक वरना बिना तेल पानी के ढंग से पेल दो। अब इत्ता फ्री हैंड क्यूँ दिया मोटा भाई छोटा भाई। हद तो मोटा भाई यानि प्रधानमंत्री जी ने ये कहकर कर दी की नक्सल वाद तो ख़त्म हो गया है पर कुछ दिमाग़ी नक्सल अभी भी हैं और लो जी चिदंबरम क्या और केजरीवाल क्या सब एक सुर में चिल्लाने लगे कि"मैं भी दिमाग़ी नक्सल" हूँ! भाई कोई इन्हें बताओ कि ये कोई पद्म भूषण या पद्म विभूषण की उपाधि नहीं है जो ये बच्चों की तरह ख़ुश हो रहे हैं। पर कौन समझाए इन झल्लुओं को। मोटा भाई छोटा भाई रहम करो इन इंडी की मिंडीओ पर।
और अंत में एक कहानी, एक गाँव में प्रधान तबियत खराब हो गई जो उस प्रधान से दुःखी थे वे उसकी मौत की कामना कर रहे थे जब कि कुछ उसकी जिंदगी के लिए प्रार्थना कर रहे थे । उसी गाँव में रहने वाली एक विधवा स्त्री के पुत्र को सपने आने लगे कि वो गाँव का प्रधान बन रहा है। जब बार बार यही सपना दोहराने लगा तो उसने अगले दिन सुबह अपनी माँ से पूछा कि माँ क्या प्रधान मरने वाला है तो मां ने अपने पुत्र को दार्शनिक अंदाज़ में कहा कि क्या पता ये तो भगवान तै करेंगे कि उसे आगे जीना है या मरना, लेकिन तुझे प्रधान के जीने मरने से क्या लेना देना। बच्चा बोला बस यूँ ही पूछ रहा था माँ। ख़ैर चलो मान लो प्रधान मर गया तो अगला प्रधान कौन बनेगा? माँ ने तिरछी नज़र से देखते हुए कहा उसका लड़का, बच्चे ने फिर पूछा अगर वो भी मर जाए तो माँ ने कहा उसकी पत्नी बच्चे ने फिर चहकते हुए पूछा अगर प्रधान की पत्नी भी मर जाए तो? माँ ने बच्चे को ऊपर से नीचे देखते हुए कहा प्रधान का भाई, बच्चे ने फिर पूछा प्रधान के भाई का तो ब्याह भी न हुआ है सो अगर वो भी मर जाए तो? माँ के सब्र का पैमाना छलक गया दो झापड़ रसीद करते हुए बोली बेटे सारा गांव भी मर जाएगा न तेरा नम्बर फिर भी नी आएगा।
प्रदीप भट्ट
लेखक मेरठ
20082026
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