Wednesday, 8 April 2026

"एक्सीडेंटल एंकर"

कार्यक्रम के 23=24 साल बाद 
रिपोर्ताज, चलेगा न 

"एक्सीडेंटल एंकर " 

"आगाज अच्छा है तो फिर अंजाम की, परवाह किसे है 
सूरज दिखाए रास्ता फिर शाम की, परवाह किसे है "

         अब देखो न ये बरसतिया भी मार्च तो छोड़ो अप्रैल में भी पिंड नहीं छोड़ रही। कल ही खबर मिली है कि इस बार अल नीनो भाई साहब की सक्रियता के चलते बरसात जून के बाद कम होगी I यानि समान्य से कम। हम भी खाली बैठे क्या करते सो पुरानी अल्बम ही टटोल बैठे और वहाँ मिले तीन चार ठो फुटवा. भाई साहब बाहर बारिश और कमरे के अन्दर बैठे हम और फिर मिले एल्बम के अन्दर फोटो, बस बन गया मुड और 23,24 बरस की घटना का स्मृति के आधार पर रिपोर्ताज तैय्यार I  जे हुई न बात।

         आप सोच रहे होंगे ये क्या शीर्षक दे दिया भाई ने I  तो हुज़ूर बात है यही कोई 2002-2003 की ,उस बख्त हम दिल्ली में ड्यूटी बजाते वो भी भारत सरकार की प्रोटोकॉल ऑफिसर/लाइजिनिंग। कभी इस मिनिस्ट्री कभी उस मिनिस्ट्री शाम को वापिस अपने दड़बे में। तो हुआ यूँ कि हमारे डिपार्टमेंट अजी जनाब Khadi &Village Industries Commission के हिस्से में सितम्बर माह में हिन्दी की बिंदी लगाने के लिए एक कवि सम्मेलन का आयोजन आया।

        दिवंगत सरला माहेश्वरी जी जो दूरदर्शन की बढ़िया वाली न्यूज रीडर रहीं,KVIC के हर कार्यक्रम में बतौर ऐंकर उपस्थित रहती थी। ख़ैर इंतजामात हुए और चार कवियों को 360 डिग्री मीडिया द्वारा आमंत्रित भी कर लिया गया I  दिल्ली का हैदराबाद हाउस वैन्यू भी निर्धारित हो गया I डेट तो मुझे याद न आ री लेकिन शाम सात से प्रोग्राम शुरू होना था I और भाई साहब उसी समय लगभग 6 सवा 6 बजे राम जी ने ऊपर के सभी नल खोल दिए और बरखा रानी ने ऐसा धूम धड़ाका किया कि बाहर खड़े IP VIP  सब हॉल के अन्दर I चेयरमैन डॉक्टर महेश शर्मा, chief executive officer बसु जी भी पधार चुके थे मिनिस्ट्री से भी राज्य मंत्री के अतिरिक्त सभी आमंत्रित अतिथि बारिश की रफ्तार देखते हुए समय से पहले ही अपना स्थान ले चुके थे।
      
         थोड़ी अव्यवस्था जरूर हो गई थी। आमंत्रित दर्शकों का इंतजार हो रहा था तभी ख़ुद को बौछारों से बचाते हुए पद्मश्री अशोक चक्रधर,ओम प्रकाश आदित्य और बाकी दो कवि भी बरसात की नजाकत को समझते हुए सीधे हॉल में मैंने और अन्य ने उन सभी को गर्मा गर्म चाय पिलाकर थोड़ा गर्म किया फिर मैं उन्हें उनके स्थान पर बिठाकर व्यवस्था में लग गया।लगभग 7.00 बजे हमारे डायरेक्टर एस पी सिंह जी मुझे ढूंढते हुए हॉल में पहुंचे और बिना भूमिका बांधे हुए बोले " देख भाई प्रदीप सरला जी तो आने की ना हैं,वो तो बारिश में फंस गई हैं उनकी गाड़ी ख़राब हो गई है I चेयरमैन साहब ने बोला है प्रदीप को बोलकर कवि सम्मेलन शुरू करो I मैं एक दम से अचकचा गया फिर बोल दिया सर ऑफिस के प्रोग्राम में एंकरिंग करना अलग है देखो तो सामने कौन बैठे हैं I मेरे और सिंह साहब के बीच होती बातचीत को देखते हुए चेयरमैन साहब ख़ुद सीट से उठकर आए और सीधे बोले प्रदीप चलो प्रोग्राम शुरू कर वाओ। मैंने तुम्हें कविताएँ पढ़ते देखा है, और जाकर बैठ गए वापिस अपनी सीट पर I 

         कोई और चारा ने देखकर मैं सीधे अशोक चक्रधर जी के पास गया और समस्या बताई। उन्होंने कंधे पर हौले से हाथ रखकर हौसला अफजाई की और कहा कोशिश करो सब हो जाएगा। आप कवियों का परिचय पढ़कर माइक् मेरे हवाले कर दें बाक़ी मैं सम्भाल लूँगा I  मैंने भी लाइन से सब भगवानों को स्मरण किया और लो जी सब कुछ ठीक ठाक से निपट किया I  घर आकर उस शाम बनी स्थिति पर एक शेर लिखा और सो गए I  फिर अगले चार सालों तक ऐंकर की  भूमिका निभाते रहे फ़िर मुंबई पोस्टिंग हो गई और हमने भी एंकरिंग से दूरी बना ली। कारण स्पष्ट है दोस्तों जिस काम को करने में सहजता न हो वो करना ही क्यूँ है। और कुछ तो याद न आ रिया है I 
        अब बस भैय्या थोड़े लिखे को ज्यादा समझना।

-प्रदीप डीएस भट्ट -08042026

Monday, 6 April 2026

"गोबर इकॉनमी"

गोबर इकोनॉमी 

         भारत जब 1947 में स्वतंत्र हुआ तो भारत की इकोनॉमी कृषि आधारित थी। ऐसा इसलिए कि भारत की 80 प्रतिशत जनता गांवों में निवास करती थी सो भारत सरकार किसानों का हित पहले देखती थी बाक़ी का भी ख्याल रक्खा जाता था किन्तु परन्तु लेकिन गांव पहले गांव का किसान पहले।  20% शहरी आबादी का जहां तक ताल्लुक़ है तो कपड़े के मिल कुछ कल कारखाने बैलेंस करने के लिए काफ़ी थी। दिल्ली जहां राजनीति का अखाड़ा थीं वहीं मुम्बई सपनों की नगरी का ताज पहनकर लोगों को ख़्वाब देखना सीखा रही थी जो कुछ बच गए और फ़िल्मों में कुछ न कर पाए वे बिचारे पहले नौकरी और फिर छोकरी पाने के पीछे ही अपनी जिन्दगी निकाल देते थे। बाक़ी शहरों का तो पता नहीं लेकिन मद्रास, हैदराबाद, बैंगलोर और भाई साहब कलकत्ता का कमोबेश हाल ऐसा ही था। चीन हमसे बाद में आजाद हुआ लेकिन नब्बे के दशक में उसने तरक्की की ऐसी राह पकड़ी कि क्वार्टर सेंचुरी पूरी करते करते वो विश्व की दूसरी अर्थव्यवस्था बन गया और 2025 आते आते 20 करोड़ ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनकर आस पास के छोटे मोटे देशों को बिना डकार लिए हज़म करता जा रहा है।

         जहां तक अपने देश भारत का ज़िक्र है सच्ची बता रिया हूं 2014 के नेतृत्व परिवर्तन के बाद विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन गया है और तीसरे पॉयदान की ओर मजबूती से क़दम बढ़ा रहा है। 12 बरस में छः अंकों की छ्लांग लगाना आसान काम नहीं है लेकिन मानो न मानो भारत ने ऐसा कर दिखाया है। भारत में लगभग 14.5 करोड़ गाय ,10.98 करोड़ भैंस, 14.88 से 15.4 करोड़ के लगभग बकरी, 7.42 करोड़ के लगभग भेड़ हैं और आबादी चलो फिलहाल 140 करोड़ ही मान लो वो क्या है न 1अप्रैल से जनगणना जो शुरू हो गई है। अब ज़्यादा मगजमारी करनी तो म्हारे बस की न है पर मोटा मोटी पकड़ो तो दुग्ध, दही, मक्खन, देसी घी और छाछ भाई साहब कोई कमी न है और कम पड़ जाएगी तो अनपढ़ किसान समझने की भूल करने वालों ध्यान से सुनो ये वही किसान है जो भारत के नागरिक को ज़्यादा गाढ़ा दुग्ध पीने से रोकता है और सवेरे सवेरे दुध में शुद्ध पानी मिलाकर बंदों का हाजमा ठीक रखता है। कुछ किसान तो और भी ज्यादा समझदार हैं पता नहीं कहां कहां से नई तरकीबें खोजकर दुग्ध, पनीर, खोया बना डालते हैं और हम भी बिना डकार के सब कुछ हज़म कर जाते हैं। सड़े हुए तेल के भटूरे खाने वाले का ये मिलावटी आइटम क्या ही बिगाड़ लेगा जी। और बिगाड़ कर करेगा भी क्या हम तो मुनाफे के लिए भगवान तक को नहीं बख्शते डेढ़ सौ रूपये किलो वाला पूजा वाला देसी घी, मिलावटी तिल के तेल से दीया बाती करते भक्त जन सोचते हैं जब हम शुद्ध नहीं खा रहे तो तुम्हें ( भगवान जी को) कहां से शुद्ध खिलाएंगे। अच्छी बात ये है कि भगवान जी समझदार हैं, माया तो उन्हीं की है सो एडजस्ट कर लेते हैं।


वहीं पाकिस्तान में लगभग छः करोड़ गाय, 4.02 करोड़ भैंस, 8.3 करोड़ बकरियां व 3.27 करोड़ भेड़े हैं।

Tuesday, 31 March 2026

एक पंथ दो काज

रिपोर्ताज 

         आपने एक कहावत सुनी होगी "एक पंथ दो काज" तो भैय्या हुआ यूँ के मेरठ के प्रतिष्ठित कॉलेज मेरठ कॉलेज जिसकी स्थापना 1892 में हुई यानि 134 बसंत देख चुके खूबसूरत और पुराने कॉलेज और इसका फ़ैलाव भाई साहब पूरम पट्ट 106 एकड़ में। महराज इत्ते में तो कम से कम दो यूनिवर्सिटी बन जाएं। अंग्रेजों के जमाने में लाल पत्थर से बना पूरा कॉलेज अपने आप में एक अद्भुत कृति है। ये विषय अलग कि नये बनाए गए भवनों में यहाँ वहाँ कुछ उघाड़े हुए पलस्तर अपनी दयनीय स्थिति पर खुदई ठहाका मारकर हँसते हुए दिखाई देते हैं। 10 विभागीय पुस्तकालय, कुल 31 प्रोगशालाएं, (अठ्ठासी) 88 अध्ययन कक्ष और दो सभागार यानि कुल मिलाकर पठन पाठन के लिए एक आदर्श स्थान। अब 134 बरस पहले जब इसकी स्थापना हुई होगी तो आने जाने में लोगों को डर लगता होगा। अरे भईया डर तो लगेगा न। नीरा जंगल रहा होगा। बैल गाड़ी, इक्का दुक्का साईकिल और एक आध फटफटीया बस इतना ही सामान होगा कच्ची पक्की सड़कों पर। और आज तो इसकी लोकेशन प्राइम हो गई लगता है असली मेरठ यहीं है बाक़ी सब तो चाय कम पानी।

         तो फिर से हुआ यूँ के प्रोफेसर रेखा राणा जी ने फोन पर हमसे हमारी प्रोफाइल भेजने को कहा। लो जी हमने कम लिखे को ज़्यादा समझना की तर्ज़ पर प्रोफाइल भेज दी और अगले दिन उन्होंने हमें निर्णायक की भूमिका के लिए लॉक कर दिया। अगले दिन वाट्सअप पर पत्र की प्रति के साथ में हमारी स्वीकृति की गुज़ारिश भी। तो लो भाई साहब 27 मार्च समय ग्यारह बजे भी निर्धारित हो गया। लेकिन जे क्या योगी जी ने 26 मार्च अष्टमी और 27 मार्च की नवमी को भी सरकारी अवकाश घोषित कर दिया। दोपहर में रेखा जी का फ़ोन सर कार्यक्रम 27 की जगह 30 को होना निश्चित हुआ है। तकलीफ़ के लिए माफ़ी। कोई गल्ल नी जी ऐसी स्थिति से तो हम कई बार दुई चार हुए हैं। 29 को फिर फोन सर दूसरे निर्णायक किन्हीं कारण वश आने में असमर्थ हैं। आप कुछ कर सकते हैं। ऐसा पहले भी घटित हो चुका है सो सधे हुए अंदाज़ में हमने सजेशन दे डाला आप अपने या अन्य किसी डिपार्टमेंट से किसी को साथ बिठा दीजिएगा बाकी हम संभाल लेंगे। हां सर ये ही ठीक रहेगा कहते हुए उन्होंने फोन रख दिया।

         अब ऐसा है न हर सरकारी संस्था का हाल यही है वित्तीय वर्ष के अंतिम माह के अंतिम दिनों में ही सबको सब कुछ करना होता है। नहीं हो पाया तो बजट लेप्स और अगले साल उतना ही बजट कम मिलना है सो प्रोफ़ेसर बच्चों को पढ़ाएंगे भी, और जितने काम निर्धारित हैं के अतिरिक्त संस्कृति का समन्वय भी करेंगे। स्टाफ कम है लेकिन करना तो पड़ेगा ही। सो मैं रेखा जी की मज़बूरी समझता हूं। सो भैय्या अपनी आदत अनुसार हम तो पंद्रह मिनिट पहले ही डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन पहुंच गए पता चला जिन बच्चों को सहभागिता करनी है वे एग्जाम में बिजी हैं, बारह बजे छूटेंगे। चाय पानी के बाद रेखा जी ने गुज़ारिश की कि सर यदि आपत्ति न हो तो तब तक दूसरे प्रोग्राम का शुभारंभ कर आएं। मना करने का तो सवाल ही नहीं होता सो डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स पहुंच गए। पता चला नेचुरल फोटोग्राफी की प्रतियोगिता है। स्टूडेंट्स मेरठ कॉलेज के कॉर्नर चुनेंगे और फ़ोटो क्लिक करके जियो टैग के साथ डेढ़ घंटे में सब्मिट करेंगे। ख़ैर कार्यक्रम का शुभारंभ किया, चाय नाश्ता फिर अपने निर्धारित कार्यक्रम स्थल में। 

         लगभग 12.40 पर कार्यक्रम शुरू हुआ, दीप प्रज्जवलन फिर मान सम्मान की प्रक्रिया अन्ततः, मौर्य जी के साथ निर्णायक की भूमिका में आ गए। कुल आठ प्रतिभागियों ने रचना पाठ किया के अतिरिक्त लॉ स्टूडेंट सुगंध सक्सेना जो कि चेहरे के पैरालिसिस से पीड़ित थी ने अलग से कविता प्रस्तुत की। कविता अच्छी थी किंतु उस लड़की को कविता पढ़ते हुए बोलने में जो पीड़ा हो रही थी उसकी हिम्मत के लिए मैंने उसे अपनी तरफ़ से आशीर्वाद स्वरूप लिफ़ाफ़े....रेखा जी के संग सम्मानित किया (चित्र में देख सकते हैं) निश्चित आत्मा को सन्तोष प्राप्त हुआ अब जे जरूरी थोड़े है कि सिर्फ़ लिफ़ाफ़ा लिया ही जाए भाई साहब लिफ़ाफ़ा देने का भी अपना आनन्द है। ख़ैर  सुगंध  की जिजीविषा को प्रणाम! अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि निर्णायक सिर्फ़ निर्णय देवें सो फरमाइश पर कविता भी पढ़नी पड़ी लेकिन सुगंध सक्सेना की जिजीविषा को प्रणाम करते हुए जो पढ़ा उसका आनन्द आप भी लें।

“व्योम के ओम”

जब लक्ष्य किया निर्धारण तब,
रखा मक़सद मंज़िल पाना।
अच्छे बच्चों क़ी आदत है,
पढ़ते पढ़ते ही सो जाना॥

खाने पीने का ध्यान नहीं,
ना लेते ये विश्राम कभी ।
शादी हो या कोई जलसा,
नही फिक्र कभी करता कलवा
उसकी आँखों में स्वप्न कई
रखता ध्येय बस पढ़ते जाना॥

        अच्छे बच्चों की आदत.....

रखते हैं गुरु का मान सदा,
तीनों लोकों का इन्हें पता।
कक्षा में ये अव्वल आते,
उपहार गुरु से भी पाते
रकना न कभी भी सीखा है
सीखा है बस चलते जाना॥

       अच्छे बातों की आदत.....

ये साक्षात सत के प्रहरी,
रखते हैं सोच सदा गहरी।
हिम शिख छू लेना लक्ष्य प्रथम
गुरुओं से सीखी विद्या प्र्थम
ये पेड चढे या फिर पर्वत 
सीखा है सदा चढ़ते जाना॥

       अच्छे बातों की आदत.....

ख़ुश रहते मात पिता इनसे,
लेते हैं मित्र सलाह इनसे
निश्च्य होता है इनका सही
पीछे ना मुड़ के देखा कभी,
जैसी दृष्टी वैसी सृष्टी
मिले मोड मगर सीधे जाना॥

         अच्छे बच्चों की आदत....

किसमें इतना है साहस जो,
पथ इनका बढ अवरुद्ध करे।
मार्तण्ड तेज है मस्तक पर,
अरि आगे आने से भी डरे
अवनी सबकी पालन कर्ता
सीखा है व्योम में मिल जाना॥

         अच्छे बच्चों की आदत....

होली के रंग ना भाते इन्हें,
ना दीवाली की फुलझडियाँ।
ये उर्ध्वलोक पाना चाहते,
तैय्यारी पूर्ण कर के आते
दूजे का जीवन रोशन कर
इच्छा ‘प्रदीप’ है बन जाना॥

                                                                     - प्रदीप देवीशरण भट्ट -11:02:2020

         अशोक जी ने जहाँ संचालन किया वहीँ रेखा जी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत कर कार्यक्रम संपन्न होने की घोषणा की। अंत में सामुहिक चित्र फिर कुछ बच्चों के सवालों का जवाब देते हुए विदाई ली। तभी रेखा जी का फ़ोन घनघना उठा उन्होंने मुस्कुराते हुए हमारी तरफ़ देखा, हम भी मुस्कुरा उठे और चल पड़े पुनः डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स की ओर। अच्छी बात ये थी कि उस कार्यक्रम के दोनों निर्णायक आ चुके थे, सो पुनः स्टेज़ शेयर किया और बच्चों के साथ यादगार पल की तस्वीरें मोबाइल में कैद की। अब हमने रेखा जी से विदा ली और एक खूबसूरत दिन की यादें समेटे घर की ओर चल पड़े।

प्रदीप डीएस भट्ट -31032026

Thursday, 12 March 2026

"दिल्ली का ज़िंदा गाँव"

रिपोर्ताज 

        "दिल्ली का ज़िंदा गाँव"

         अगर मैं मोटा मोटी कहूं तो दिल्ली का इतिहास लगभग 5000- 5500 सौ वर्ष पुराना है यानि महाभारत काल से मान लिया जाए तो दसवीं शताब्दी में तोमर वंश के राजा अनंगपाल ने इसे बसाया उसके बाद चौहान 's फिर दिल्ली सल्तनत फिर मुग़लस फिर अंग्रेज आए जिन्होंने 1911 में कलकत्ता से राजधानी उखाड़ी और वापिस दिल्ली में स्थापित कर दी। अब भैय्या इससे पहिले यानि कि 5000 साल पहले का इतिहास तो राम जी जाने। किशन जी तो द्वापर में हुए और इसी कालखंड में हुए कौरव भी और पाण्डव भी। जहां तक हमारा प्रश्न है तो महाराज हमने तो इस हसीन दिल्ली को 1980 से अपना मित्र बनाया वो भी बढ़िया वाला😊। कहीं भी नैन मटक्का कर आवें पर भाई साहब जो मज़ा दिल्ली की गोद में बैठने का है वो और कहीं कहां। डी टी सी बस एक मात्र सहारा होती थी उस समय हमारी घुमक्कड़ी का।  चालीस पैसे का टिकिट न खरीदना पड़े उसके लिए क्या क्या जतन नहीं किए।🤓🤓🤓

         1961 में जहां दिल्ली में 300 गाँव होते थे वहीं 2011 आते आते उनकी संख्या सिकुड़कर 112 रह गई थी अब तो दिल्ली में शायद इक्का दुक्का गांव ही बचे हों वो भी 2027 की जनगणना तक शायद विलुप्त न हो जाएं। मियां जी सरकारी भाषा में इसे ही तो विकास कहते हैं 🤣🤣🤣🤣🤣। तो भाई साहब उन्हीं 112 गाँव में से एक मुनिरका गांव की सन्तोष सम्प्रति जो साहित्य सृजन कुटुम्ब संस्था की संस्थापिका अध्यक्ष हैं और हम संस्थापक मंत्री। फ़ोन पर ही गुफ़्तियाए😁😁😁😁😁 और तय हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर कार्यक्रम आयोजित किया जाए लेकिन कुछ अलग अंदाज़ में। वोडा फ़ोन वाले आइडिये का तो पता नी चल रहा है या नहीं लेकिन अपना आइडिया निकल पड़ा। अब भैय्या लिखने पढ़ने का काम तो टीचर जी ही बढ़िया कर सकती हैं सो 1 मार्च के प्रोग्राम में जब हम पटेल चौक, द्वारका मोड़ मिले तो उन्होंने कार्यक्रम का पूरा खाका प्रस्तुत कर हमें चमत्कृत कर दिया और 7 मार्च को उसे जमीन पर उतार भी दिया। अब संतोष जी के काम का तरीका ऐसा ही है यानि फास्ट टैग से भी तेज़।

         सो हुआ यूँ के हम 7 को सुबह सुबह निकले। रैपिड 🚇 के सहारे दरिया गंज हंस पत्रिका के ऑफिस लेकिन अफसोस साहब दिल गड्ढे में। हल्के हल्के पसीने में तर बत्तर होते हुए ढूंढ़ते ढांढते जब हम हंस पत्रिका के कार्यालय पहुंचें तो वहां बड़े से शटर के ओर लटके हुए बड़े से ताले🔐 में ने हमें मुँह चिढ़ाते हुए पूछा "काला  हंस - काला हंस" यहां कैसे। अब समझ नी आया वो ये उद्बोधन हमारी शक्ल देखकर दे रहा था या हमारे कहानी संग्रह "काला हंस" को। और भई ये काला हंस- काला हंस दो बार क्यूँ बोला कहीं उसमें किक फिल्म के करेक्टर नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की आत्मा तो नहीं घुस गई। जो दो बार बोलता है पोलैंड पौलेंड। हमने भी खीजते हुए पूछ ही लिया अबे तुम शनिवार को कैसे बंद हो बे? तो भाई साहब शटर के दूसरी ओर लटके हुए ताले 🔐 🔐 🔒 के जुड़वां भाई ने गुस्से से अपनी छेद रूपी आँख को नीला पीला करते हुए कहा क्यों बे सरकारी छुट्टी का मज़ा क्या तुम ही लोगे चच्चा। हम भी तो फिर आगे के शब्द उसने चिढ़ाने के उद्देश्य से हवा में तैरने के लिए छोड़ दिए। हम खिसियाए हुए से अपनी तशरीफ़ का टोकरा वापिस मोड़ते हुए खरामा खरामा दिल्ली गेट 🚇 की ओर लपक लिए।
  
         एक बात कहें वैसे कई बार कह चुके हैं फ़र्क तो किसी पे पड़ता नहीं फिर भी एक बार और सुन लो भाई साहब समय के कुछ ज़्यादा ही पाबंद हैं हम सो ठीक 2.10 पर सन्तोष जी के घर जा पहुंचे। 💦 पानी पिया और सामान लेकर मुनिरका गांव की टेढ़ी मेढ़ी गलियों से पहचान करते हुए पिलर वाले समुदाय भवन जा पहुंचे। कुछ व्यवस्थाएं हमने मिलकर ठीक की और धीरे धीरे प्रतियोगी आने लगे। स्टूडेंट की मम्मियां, गाँव की महिलाएं वो भी पूरे टशन के साथ, निर्णायक मण्डल और कुछ कवि मित्र। दीप प्रज्ज्ववल, सरस्वती वन्दना, निर्णायक मण्डल , कवियों का आदर सत्कार फिर गर्मा गर्म चाय पकौड़े। ठीक 4.35 पर महिलाओं के लिए आयोजित नारी शक्ति संगम प्रश्नोत्तरी जिसमें 75 प्रश्न 75 अंक एवम् समय पूरम पट्ट एक घंटा। पुरस्कारों में प्रथम 3100/-, द्वितीय 2100/- व तृतीय 1100/-  निर्धारित था। मुनिरका गाँव की ही एक महिला जो यू ट्यूबर है ने पूरा कार्यक्रम फ़ेसबुक पर लाइव किया, धनवान बनो देवी। निर्णायक मण्डल ने सूचित किया कि तृतीय स्थान पर दो महिलाओं ने बराबर अंक प्राप्त किए हैं तो क्या राशि आधी आधी कर दी जाए। अध्यक्ष ने हमसे विचार विमर्श किया और फिर अध्यक्ष तो अध्यक्ष ठहरी तुरंत 1100/- का एक और लिफ़ाफ़ा तैयार और लो जी प्रथम पुरस्कारशालिनी खन्ना, द्वितीय वन्दना चौधरी एवम तृतीय की संयुक्त दावेदार और पुरुस्कृत हुई पूनम अरोड़ा एवम् खुशबू कुमारी। एन्नू कैदे बड़े दिल वाला या वाली जी समझे के नाही। ❤️ 🌹🌹🌹🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

        विजेताओं को पुरस्कार राशि प्रदान करने का पुनीत कार्य हमें दिया गया। बात तो कायदे की थी अरे भाई संस्था के मंत्री हो🤠🤠🤠😂😂 कुछ काम तुम भी तो करो की तर्ज़ पर हमने इस जिम्मेदारी का निर्वहन किया। इसके बाद छोटी छोटी कविताओं के पाठ का दौर।  हमने कविता न पढ़कर छोटी छोटी दो कहानियां उपस्थित जनों के साथ साझा की जिन्हें सभी ने सराहा भी और साथ ही साझा की साहित्य सृजन कुटुम्ब की अभी तक की यात्रा 🧳 साथ ही यह भी साझा किया कि साहित्य सृजन कुटुम्ब संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम चाहे दिल्ली में हों या बाहर संस्था ने आज तक किसी भी प्रतिभागी से एक भी पैसा नहीं लिया है और सभी का धन्यवाद अलग से। अब खेल ख़त्म तो पैसा हजम की तर्ज़ पर सबने फिर से काले जाम का जायका गर्मा गर्म चाय की सुड़की के साथ लिया और लौट पड़े अपने अपने घरौंदे की ओर।

प्रदीप डीएस भट्ट -11032026

Monday, 16 February 2026

"अकल दाढ़ कब निकलेगी"

      "अकल दाढ़ कब निकलेगी" 

"नादान की दोस्ती जी का जंजाल" 

         क्यूँ भई ये कहावत तो आप सबने सुन ही रक्खी होगी न कि "नादान की दोस्ती जी का जंजाल"। जे क्या कह रिए हो मियां न सुनी तो भैय्ये हम सुना रिए हैं न कान में कच्ची घानी वाला सरसों का तेल जिसमें बढ़िया वाली धांस आए और हां तेल भी काली सरसों वाला पीली वाली तो कतई न। वो क्या है न पीली वाली सरसों से पूरियां तो बढ़िया वाली बन जाएंगी पर कान में डालने के लिए तो काली वाली सरसों का तेल ही चाहिए। एक बार डालो मैल निकलते ही छः महीने तक सब कुछ ऐसे सुनाई देगा जैसे कोई उधारी वाला उधार चुकता करने धीरे से आवाज़ लगाए और आपके कान फटक से उसकी आवाज़ पहचानकर झटक से अपने दरवज्जे पर पहुंच जाए कि ला भैय्या कित्ता लिया था और कित्ता देने आया है और बाक़ी कित्ता बचा और बता के जा बचा हुआ कद वापिस करेगा। मतबल नू है कि तेल एक काम अनेक आप समझ रिए हो न मैं क्या नही बताना चाहता। समझदार को इशारा जो काफ़ी है लो जी एक पैराग्राफ में दो कहावतें वो भी बढ़िया वाली चलो इसी बात पे बत्तीसी दिखाओ।

         ये ऊपर जो हमने दो कहावतों का घाल मेल कर खाका खींचा है न उसकी जड़ में आजकल राहुल की हरकतें हैं मियां भई ऐसी ऐसी लंपटई बातें वो भी संसद के अंदर बाहर दोनों तरफ़ सच कै रिया हूं मियां कई बार तो यूं लगे बंदा समझदार कब होगा। अरे भाई कोई इसे समझाओ कि तुम्हारी उमरिया ढल रही है और समझदरिया घट रही है। बखत से समझ जाओ तो ठीक है वरना दो चार साल बाद कांग्रेस में ऐसा कोई न दिखेगा या समझ लो बचेगा जो तुम्हें समझा सके। आख़िर उमरिया है जब तोहार बढ़ेगी तो मियां उनकी भी तो बढ़ेगी। अगर कुछ घटेगी तो समझदारी वो तुम्हारी वाली "स-पेशल" उनका क्या है वो तो पुराने वाले कांग्रेसी चावल हैं जिस दिन उन्हें लगा कि अब यहाँ चावल क्या दाल भी न पकेगी वो भी ग़ुलाम नबी आज़ाद की तरह छेदी कांग्रेसी नाव से उतर लेंगे और चढ़ लेंगे नसीमुद्दी सिद्दीकी की तरफ़ समाजवादी पार्टी की नाव में। वैसे भी नाव तो सब पार्टियों की काठ की ही बनी हुई है बस देखना ये है छेद किसमें कम हैं। आख़िर महत्वाकांक्षी होना कोई गलत बात थोड़े है मियां।

         जनरल मनोज मुकुंद नरवडे जी की किताब फोर स्टारस ✨ ऑफ डेस्टिनी की पांडुलिपि 2023 से रक्षा मंत्रालय की फ़ाइलों में यहां से वहां टहलती हुई अब तक एप्रूवल की बाट जोह रही है। अब ये भी तो नही कह सकते न कि धूल फांक रही है अब भैय्या मोदी जी के राज में एक काम तो बढ़िया हो ही गया है कि इससे पहले की बाबू अपनी बाबूगिरी दिखाकर फाइल को फ्रिज में डाल दे (आम बोलचाल की सरकारी भाषा में)  वो बाबू मोशाय खुदई फ्रिज में लम लेट हो जाते हैं इसलिए सब कुछ टाइम बाउंड है इत्ते दिन इसके पास इत्ते दिन उसके पास बीच में जहां फाइल अटकी उस स्तर के बाबू की आत्मा कहां कहां भटकेकी जे तो बस मोदी जी जाने या अपने अमित भईया। लेकिन भैय्या जिस किताब के प्रकाशन से देश की सुरक्षा व्यवस्था जुड़ी हो वहां उसकी पांडुलिपि को कई कई लेंसो की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। हम सभी जानते हैं कि ये किताब 15 जून 2020 की चीन और भारत की गलवान घाटी की झड़प पर आधारित है। अब इतनी महत्वपूर्ण घटना पर आधारित क़िताब में क्या दिखाना है क्या छिपाना है ये तो सरकार ही तय करेगी न। वैसे भी महाराज फ़ौज के तीनो अंगों में एक ही चीज़ कॉमन है और वो है डिसिप्लिन बिना डिसिप्लिन किसी भी संस्था का कोई औचित्य नहीं है और ये मामला तो विशुद्ध फ़ौज का है सो दुग्ध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर ही पियेगा। पर एन्नू की लोड ऐ तो LOP हैं जी यानि आप समझ नी रिए हो मियां लोप मतबल गायब और ये महाशय तो जब तक लोप होते ही रहते हैं। "मौज आई फकीर की दिया झोपड़ा फूंक" पर अपना नहीं दूसरों का की तर्ज पर जब मन किया भारत में जब मन किया भारत से बाहर। मेरी समझ में ऐ गल्ल नी आती कि एन्नू कौन इनवाइट करदा है और काई कू। आख़िर अपनी बंदूक में कौन सी गोला बारूद लेकर आते हैं जो भारत में बोलते ही इन पर खुदई  ही वो गोला बारूद फट पड़ता है और ये महाशय हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे का गीत गाते हुए कांग्रेस को दो इंच और पानी में डुबो देते हैं।

         अब आप खुदई समझो जो क़िताब अभी छपी नही ये महाराज उसके विषय में लोक सभा में आएं बाएं शाएं बोलने लगे, स्पीकर ने विषय का सोर्स पूछा तो "कारवां" पत्रिका में छपे लेख का हवाला देने लगे। अब बात तो आगे बढ़नी ही थी बीजेपी ने भी पतंग आसमान में जाने से पहले ही हत्थे से काट डाली। समझदार को इशारा काफ़ी लेकिन समझदार हों तब न महाराज सो स्पीकर पर ठीकरा फोड़ दिया कि स्पीकर लोप को बोलने नहीं दे रहे और अगले दिन घोषणा कर दी कि पूरा विपक्ष स्पीकर ओम बिरला के विरुद्ध नो मोशन कॉन्फिडेंस लाएगा अगले दिन 108 संसद सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस हवा में लहरा दिया लेकिन गलतियां कांग्रेस का पीछा ही नहीं छोड़ती उस नोटिस में भी तीन जगह 2026 की जगह 2025 मेंशन था। ओम बिरला बिफर गए और घोषणा कर दी जब तक फ़ैसला नहीं होगा मैं स्पीकर की सीट पर नहीं बैठूंगा अगले दिन स्पीकर की सीट जगदंबिका पाल जी ने संभाल ली। आदत ख़राब हो जाए तो जाते जाते भी नहीं जाती सो अगले दिन फिर वही रोना धोना और कमाल देखिए अगले दिन भी स्पीकर की सीट पर थे पूर्व कांग्रेसी जगदंबिका पाल, लोप ने उनको पुराना कांग्रेसी होने के नाती नसीहत देने की कोशिश की तो जगदंबिका पाल ने अनावश्यक शोर न मचाने और उन्हें फिर से रुकने और उनकी बात सुनने के लिए कहा पर भाई लोप तो लोप ठहरे नहीं रुके और अब जब रोके से लोप रुके नही तो जगदंबिका पाल ने भी पुरानी खुन्नस में चवन्नी उछालते हुए कह दिया कि अगर आप मेरी सुनते तो विपक्ष में नहीं बैठे होते। लोकसभा में एक क्षण के लिए तो एक दम सन्नाटा पसर गया कांग्रेसियों को काटो तो खून नहीं लेकिन कुछ क्षण बाद फिर वही हो हल्ला शायद शास्त्रों में इसे ही बेशर्मी कहा गया है। 

         चलो यहां तक तो ठीक था लेकिन दो दिन के बाद नरवडे जी की क़िताब "फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी" की पूरी किताब ही सदन में लहरा दी लहराने वाला भी एक मात्र 'लोप ' शायद एक ही किताब छपी या छपवाई गई होगी। शानदार कवर पेज़ की हल्की मोटी सी क़िताब लेकिन उसके अन्दर क्या है ये तो 'लोप' ही जाने। जिस तरह कुछ समय पहले कांग्रेस जनों ने लोकसभा में संविधान संविधान खेला था शायद उसी तर्ज़ पर नरवडे जी की अनपब्लिश्ड किताब के साथ खेला किया गया लेकिन लेकिन लेकिन लोप और कांग्रेसियों को अंदाज़ा भी नहीं था ये खेल उन पर उल्टा पड़ने वाला है आख़िर संविधान तो पब्लिश्ड है किंतु यह क़िताब "फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी" unpublished है और सीक्रेट एक्ट के दायरे में आती है सो जब तक कांग्रेसियों के दिमाग़ की बत्ती जलती तब तक राम नाम सत्य हो चुका था। अब चर्चा चल पड़ी कि बीजेपी राहुल यानि लोप के खिलाफ प्रिविलेज मोशन यानि विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाएगी। कांग्रेस के पुराने बचे खुचे चावलों को पता है कि नरवडे जी के प्रसंग में लोप के विरुद्ध क्या क्या हो सकता है सीक्रेट एक्ट में उनको दो वर्ष की भी यदि सजा हुई तो उनकी संसद सदस्यता जा सकती है शायद लोप को समझ आया और उन्होंने तुरंत शातिराना अंदाज़ में अगले दिन किताब का मुद्दा लोप किया और भारत अमेरिका के बीच हुए करार पर कुछ न समझते हुए किसान के नुकसान का रोना लेकर बैठ गए। 

         किसी भी देश के लिए सत्ता पक्ष के अलावा विपक्ष का मज़बूत होना भी आवश्यक माना गया है चाणक्य नीति भी यही कहती है किंतु यहाँ चाणक्य नीति की किसे समझ है वैसे भी समझने के लिए चाणक्य नीति पढ़नी पड़ेगी और लोप के हैंच मैन तो सारे के सारे ख़ब्बाड़िया यानि लेफ्टिस्ट हैं। लेकिन यहाँ प्रश्न दूसरा है कि जनता ने आपको यानि विपक्ष को इस लायक तो रक्खा कि आप सत्ताधीशों के सामने डटकर खड़े रहें, जनता के हितों के लिए सत्ताधीशों से लड़े लेकिन ये तो खुदई आपस में एक दूसरे का सर फोड़ने पर आमादा हैं तो फिर जनता किससे उम्मीद रक्खे। जाति जाति का खेल खेलने वाले विपक्षियों के रहते जातिवादी यूजीसी बिल कैसे पास हो गया। उड़ता हुआ तीर हवा में जाने से पहले रोका जा सकता था लेकिन बात बे बात पे पोस्टर लहराओ कभी लोकसभा में तो कभी राज्यसभा में और अगर ताज़ी हवा खाने का मन करे तो गांधी जी हैं न उनके पुतले के नीचे खड़े होकर खींसे निपोरो कभी मिमिक्री करो कभी गद्दार गद्दार कहकर अपने ही पुराने साथी का अपमान करो। ये समझ से परे है कि ये अहमकाना ओछी हरकतें राजनीति शास्त्र के किस पन्ने पर लिखी गई हैं जिनका ये मुजाहिरा करते रहते हैं। जहां तक यूजीसी बिल का प्रश्न है ये उड़ता हुआ तीर बीजेपी ने चलाया है देखते हैं 19 मार्च के बाद ये तीर बीजेपी के पिछवाड़े में भी कितना धसता है।

         विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र जिसकी आबादी 140 करोड़ से ज़्यादा ही है कम तो बिलकुल भी नहीं। उस देश का विपक्षी नेता जिसे LOP कहते हैं जिसकी उम्र 55 की है और दिमाग़ अभी भी बचपने की अंधी गलियों में ही भटक रहा है। कहते हैं कुर्सी जिम्मेदारी का एहसास कराती है, कराती होगी महाराज यहाँ तो दूर दूर तक उसका एक भी लक्ष्चण नज़र न आ रहा है। सदन हो या सड़क ये बंदा दिखता है एकदम कड़क लेकिन अंदाज़ ए बयां बिलकुल सड़क छाप..... आप समझ रिए हो न। कुछ लोग उम्र से बड़े हो जाते हैं…
और कुछ लोग उम्र के बाद भी टिफिन-टाइम वाली मानसिकता से बाहर नहीं आते। कुल मिलाकर जैसे क्लास के मॉनिटर ने चॉक छीन ली हो  ना गंभीरता, ना स्थिरता… बस जिद और ड्रामा फुल ऑन। 55 की उम्र कैलेंडर में है, पर दिल-दिमाग अभी भी स्कूल के लास्ट बेंच पर बैठा है! सिर्फ़ महंगे कपड़े पहनना ही शालीनता का पैरामीटर नहीं हो सकता । दम बात में होता है कपड़ों में नहीं।
 
"कहां कब बोलना कितना, समझ में ग़र जो आ जाए 
तो निश्चित मानिए साहिब, कि क़िस्मत भी बदल जाए "

         लेकिन समझदारी और लोप तो दो चुंबकों की तरह नज़र आ रहे हैं जिन्हें जितना पास लाओ वो उतना सटने की जगह दूर हट रहा है। सदन या सदन के बाहर हम वही बोलेंगे जो हमारे मूड में होगा जिसे सुनना हो सुनो वरना लोप के पास एक ब्रह्मास्त्र तो है कि "तुम बीजेपी के एजेंट हो"। वैसे मैं नू कै रिया था राजनीति में सॉफ्टवेयर अपडेट की व्यवस्था नहीं है क्या अगर है तो भैय्या लोप के चाइल्ड वर्ज़न को डिलीट कर कम - स- कम यूथ वाला अपडेट ही मार दो क्यूँ कि बुढ़ापे वाला डाला तो हार्डवेयर क्रश भी हो सकता है। भैय्या एक ठो बात बताओ पचपन की उम्र में इस बंदे अक्ल दाढ़ कब निकलेगी और निकलेगी भी या नहीं। 


प्रदीप भट्ट -17022026
व्यंग्यकार मेरठ 

Tuesday, 10 February 2026

"अपनी सुनाओ फुर्र हो जाओ"

रिपोर्ताज 

"अपनी सुनाओ फुर्र हो जाओ"

"फुर्सत कहां किसी को, सुने जो मेरी दास्तां 
सब अपनी कहने आए थे, कहकर चले गए "

"चरसी यार किसके दम लगाए खिसके"

         न न न आप ग़लती से गलत सोच रिये हो मियां। ये जो कहावतें है न हमारे जीवन में ऐसे रच बस गई हैं जैसे कि आटे में हल्का सा नमक और ठीक ठाक पानी। अब भैय्या रोटी खानी हैं तो पहले गेंहू पीसो फिर आटा गूंथो तब रोटियां खाने को मिलती है। कहने का लब्बोलुआब ये है कि हर घर में कहावतें कहने वाला कोई न कोई दादा दादी, नाना नानी मिल ही जायेंगे जो बच्चों को कहावतों के माध्यम से जीवन का दर्शन समझाने की कोशिश करते हैं पर ये पुनीत कार्य करने वाले ज्यादा तर हमारे बड़े भी निपट से लिए हैं या निपटने वालों की कतार में खाट डालकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं क्यूँ कि अब सब कुछ मुबलिया में जो सिमट कर रह गया है। अब जिस जेन जी को उन्हतर (६९-69) उन्नासी(७९-79) और नवासी (८९-89) का न पता है वो कहावतें क्या ख़ाक समझेंगे जी और चलो समझाने वाले मिल भी जायेंगे पर ससुरा यहाँ 22 सदी की ओर टकटकी लगाए देखने वाले जैन जुआ समझने को तैयार हो तब न। 

         ख़ैर हम खुशनसीब हैं कि हमारे पास भी अनुभव से लबाबल भरी हुई हमारी 83 बसंत देख चुकी और 84 वें बसंत की ओर अग्रसर हमारी प्यारी वाली अम्मा है जिनके पास कहावतों का खज़ाना है इसलिए मैं उन्हें सन्तोष भट्ट उर्फ़ कहावती देवी कहता हूं तो वो प्यार से झिड़क देती हैं, भई उन्हें कित्ती कहावतें याद हैं ये तो उन्हें भी न पता बस मौक़ा मिल जाए और बात से बात निकलते ही तुरन्त ताज़ी ताज़ी कहावत ठोक देती हैं। ये विषय अलग है कि वो ताज़ी ताज़ी कहावतें भी उन 30-40 बरस पुरानी गज़लों जैसी होती हैं जिन्हें घुटे हुए शायर हर महफ़िल में ताज़ा ग़ज़ल कहकर दर्शकों को परोस देते हैं। कुछ कहावतें तो ऐसी हैं भाई साहब जिन्हें समझने में हमें भी पसीने छूट जावें हैं जी। अच्छी वाली बात ये है कि उनका जन्म 9अगस्त -1942 का है और हमारा 27 फ़रवरी (देखा हम kitteee 🤓 स्मार्ट हैं बात बात में अपना अवतरण दिवस बता दिया है, दोस्तों खाली शुभकामनाएं मति देना कछु गिफ्ट विफ़ट भी भिजवाओ भाई साहब) यानि हम अपनी मां के पक्के वाले 9 नम्बरी बेटा हैं। इसलिए उनकी कहावत कहने की कला हममें आनी स्वाभाविक प्रक्रिया का अंग है सो ये कला हमें भी आ गई लगती है। आख़िर हमारे पास मां भी है और ढेर सारी कहावतें अलग से सो असर तो आना ही है। सो ऊपर जो कहावत हमने कोट की है ये उन्होंने ही हमें कभी सुनाई होगी बस इस बार का रिपोर्ताज लिखने बैठा तो रिपोर्ताज का यही विषय मुनासिब लगा। अब जिसे पसन्द आए तो ठीक नहीं तो भैय्या अपने हिसाब से एडजस्ट कर लो भई म्हारे पास और भी तो काम हैं जी।

         सो हुआ यूँ कि जब हमें दिसम्बर के आखिरी हफ़्ते में आदरणीय गोविन्द गुलशन जी की तबियत नासाज़ होने का समाचार मिला तो हम मथुरा कार्यक्रम में थे 30 की शाम तक घर आए और तय किया कि एक दो दिन में मिज़ाज पुर्सी के लिए गाजियाबाद होकर आते हैं लेकिन लेकिन लेकिन आंग्ल वर्ष के प्रथम दिन ही दुखद सूचना प्राप्त हो गई। खैर तेरहवीं में रामलीला ग्राउंड में आयोजित शोकसभा में हाज़िरी लगाई। मुम्बई ग़ज़ल कुम्भ-२०२३ में पांच सात मिनिट की मुलाक़ात वो ट्रेन पकड़ने के लिए निकल रहे थे दो चार शेर उन्होंने कहे दो चार हमनें फिर वो निकल लिए उसके बाद हम भी हैदराबाद छोड़कर मेरठ आ बसे फिर "महफ़िल ए बारादरी" में मुलाक़ात हुई और फिर ये मनहूस ख़बर। अब जब मित्र आलोक यात्री जी ने 7 फ़रवरी - गुलशन जी के अवतरण दिवस पर उनकी पुस्तक के विमोचन का आमंत्रण भेजा तो हाज़िरी न देने का तो प्रश्न ही नही था सो मेरठ स्थित गढ़ रोड़, दिल्ली रोड़ की सड़कों के गड्ढे गिनते गिनते ठीक अपरान्ह 2.30 पर हाज़िरी लगा दी। मौसम भी रंग ऐसे बदल रहा है जैसे गिरगिट या उधार लेकर उधारी वाला उधारी लौटाने के नाम पर रंग बदलता है। लेकिन इस बार इस 🍺 हमने ठंड से कोई पंगा न लेने की कसम जो खा रक्खी है सो अपनी गात पर कई लेयर लपेट ली।

         पूर्व की भांति द्वार पर यात्री जी ने स्वागत किया, चाय बिस्किट और भी कुछ था याद नी, बस बढ़िया वाली चाय की चुस्कियों के बीच दो तीन जन से गप्पीयाए और पहली फुर्सत में दूसरी पंक्ति की प्रथम सीट 🪑 लपक ली। सारा खेल सीट का ही तो है गुरु। ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा और प्रोग्राम 15.20 पर शुरू हो गया। ऐंकरिंग की हल्के वाली ओपनिंग हमेशा की तरह आलोक यात्री जी ने की फिर राशिद भाई ने वन डाउन बैटर की तरह अपनी एंकरिंग से समा बांधा। प्रथम सत्र में गुलशन जी के विषय में कुछ लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए कुछ ने कुछ भी न कहना ही मुनासिब समझा हम भी उनमें से एक रहे। 

         दूसरे सत्र में काव्य की छटा को बिखेरने में पुनः राशिद भाई ने अपनी एंकरिंग से मजबूती प्रदान की। अभी सिलसिला शुरू ही हुआ था तभी मुख्य द्वार पर हलचल महसूस हुई सभी की तरह हमने भी नज़रे घुमाई तो चेहरे पर थोड़ी सी उदासी लिए हुए इक़बाल अशहर साहब नज़र आए निश्चित उन्हें इस श्रद्धांजलि सभा की ख़बर किसी और से मिली होगी लेकिन वे गुलशन जी की याद को पलकों में संजोए आए और कुछ किस्से हम सब से साझा भी किए के अतिरिक्त गुलशन जी के गुरु भाई कृष्ण कुमार नाज़ मुरादाबाद से विशेष रूप से तशरीफ़ लाए। अल्का मिश्र कानपुर से गुलशन जी की ग़ज़लों की चौथी किताब "कल न कल तो तेरे.." को कम समय में छपवाकर लाई वरन् इस मौक़े पर किताब का रस्म-ए-इजरा भी हुआ। गुलशन जी की शागिर्द और बारादरी की संस्थापक अध्यक्ष डॉ. Mala Kapoor, संरक्षक डॉक्टर उर्वशी अग्रवाल, संयोजक आलोक यात्री के अतिरिक्त गुलशन जी का पूरा परिवार गुलशन जी के अवतरण दिवस पर मौजूद रहा। सुरेंद्र सिंघल जी ने कार्यक्रम की सदारत की। इस अवसर पर असलम राशिद जी को "बारादरी सृजन सम्मान" से भी नवाज़ा गया। सुभाष अखिल, सुभाष चंदर के अतिरिक शहर के और भी लोग मौजूद रहे।
         
         आशीष द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना उम्दा रही के अतिरिक्त नाज़ जी,माला कपूर जी ने अच्छी प्रस्तुति दी। मैंने भी अपनी एक ग़ज़ल पढ़ी, मुलाहिजा फरमाएं:-

जुबां तो है लेकिन, जुबानी नहीं है 
ये जम्हूरियत की, निशानी नहीं है 

मिला खा लिया, वरना फाक ए मस्ती 
किसी एक घर की, कहानी नहीं है 

भले छीन ले शम्स, बीनाई मेरी 
हकीकत से नज़रे, चुरानी नहीं है

हटा बद नज़र, अपनी मासूम जां से 
तेरे घर में बेटी, सयानी नहीं है 

जो जुल्मों सितम, देखकर भी न फड़के 
किसी काम की वो, जवानी नहीं है 

कि दहशत में इंसा, जिए जा रहा है 
बची बाकी खू में, रवानी नहीं है 

मेरे '' हाथों में, खंजर ही दे दे 
रगों में लहू, मेरे पानी नहीं है
-प्रदीप भट्ट-

         लेकिन महफ़िल लूटी महफ़िल की सदारत कर रहे वरिष्ठ शायर सुरेंद सिंहल जी ने एक से बढ़कर एक ग़ज़लें पढ़ी। उनकी ग़ज़लों ने सोचने को मजबूर कर दिया कि हमें अभी और मेहनत करने की ज़रूरत है। अंत में इतनी अच्छी महफ़िल में भी लोग ये जताने से गुरेज नहीं करते कि वो बहुत बड़े साहित्यकार और जाने क्या क्या हैं बाक़ी सब कुछ भी नहीं। आए पढ़े और फुर्र। ऐसों साहित्यकारों की सिर्फ़ जय कह दो वरना क्या पता कोई इसमें भी यूजीसी घुसेड़ दे। 8 बजे छूटे फिर वही अपनी सपनों की रानी रेपिडो महारानी की सेवाएं लेते हुए वापिस अपने दड़बे में। सुना है मेरी परेशानी को देखते हुए मोदी जी 22 फ़रवरी को रेपिडो के पूरे रूट को खोल रिए हैं।


-प्रदीप भट्ट -13022026