आजकल जिस तरह से प्रधानमंत्री बनने की कोशिशों की होड़ लगी हुई है और जिस तरह विपक्षी पार्टियों के नेता एक नेता दूसरे को धकियाते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी से लिपटने को तैय्यार बैठे हैं ऐसा लगता है जैसे सब अपने अपने पाप इस गँगा मैय्या रूपी कुर्सी पर बैठकर धो लेना चाहते हैं। वास्तव में अगर पाप किए हैं तो धुल सकते हैं लेकिन इसके लिए इन आकांक्षाओं से लबरेज़ महत्वकांक्षी नेताओं को गंगा रूपी जनता जनार्दन की नदी को तैर कर पार करना पड़ेगा न कि सोने से बनी नाव से। बस इसी एक काम से ये उस चमत्कारी कुर्सी तक अपनी पहुँच बना सकते हैं । चाहतों से लबरेज़ पार्टियों के नेताओं की हरकतों को देखकर ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता कि ये जनता जनार्दन नामक वैतरणी को कभी अपने कर्मों के बलबूते पार कर पायेंगे। राज्यों के चुनाव में अलबत्ता ये इक्का दुक्का तुक्का लगाकर ये ज़रूर अपनी आत्मा को संतुष्ट करा सकते हैं। बीजेपी की बिहार और उसके बाद बंगाल की भारी भरकम जीत या उसे फिर विपक्ष का सूपड़ा साफ़ करना भी कह सकते हैं या इंडी की मिंडी बनना भी कह सकते हैं, से एक बात तो तय है कि विपक्ष को बीजेपी से कुछ नहीं वरन् बहुत कुछ सीखने की जरुरत है अगर वो सीखना चाहें तो। लालू का तेजस्वी हो या ममता का अभिषेक, हार के बाद लालू पहले भी चारा चोर थे और बाद में भी लेकिन गली गली मुहल्ले मुहल्ले उनको किसी ने चोर चोर कहकर बेइज्जत नहीं किया, किंतु बंगाली मानस तो बाक़ी देश से आगे की सोचता है सो लोगों ने ममता की हार को उनके भतीजे अभिषेक के प्रति उनके मोह पर ममत्व लुटाने को माना। अब स्थिति ये कि गली गली मुहल्ले मुहल्ले में टी एम सी नेताओं को चोर चोर का भूत पीछा छोड़ने को तैय्यार नहीं। वैसे इस स्थिति पर मुझे 1972 की राजेश खन्ना की पिक्चर राजा रानी का एक ठो गाना वो भी जोर से याद आ रहा है "जब अँधेरा होता है/ आधी रात के बाद/ एक चोर निकलता है/ काली सी सड़क पे/ एक आवाज़ आती है ssss/ चोर चोर चोर चोर चोर चोर। पर टी एम सी की मुसीबत ये है कि चोर चोर की आवाज रात में ही नहीं उन्हें दिन में भी सुनने को पड़ रही है।
अब प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ़ ललक से देखने वाले दावेदारों में से एक ममता बेन तो कट लीं। सो मार्किट में अब केजरी बाबू, राहुल गाँधी और थोड़े बहुत अखिलेश भईया बचे। अखिलेश अपना दम यू पी में जबरदस्त तरीके से 2024 के लोक सभा चुनावों में दिखा चुके हैं तभी तो डिम्पल भाभी एक सवाल के जवाब में बोल पड़ी थीं कि अखिलेश भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं, 37 ठो सांसद हैं भैय्या। बात उनकी भी ठीक ही है इस देश में अभी तक ऐसा कई बार हो चुका है तो उम्मीद लगाए रखने में क्या जाता है जी। जय हो डिंपल भाभी की! लेकिन हम कल ही एक ठो रील देख रहे थे उसमें एक नारा था " सारे यादव देश के जो बचे वो लालू ,अखिलेश के" मतबल लोग भी न कैसा कैसा मजाक करते हैं। अब सोचो ज़रा जी, 2029 में सारे यादव देश के हो जायेगें तो? लेकिन पाँच ठो यादव फिर भी मिल ही जायेंगे आख़िर यादव का मतलब ही परिवार से है। बकौल छत्ती कपूर "समझते नी हो यार" अब रहे केजरीवाल तो भैय्या दिल्ली जीता तो लगा पूरे देश का दिल जीत लिया सो सीधा आप अध्यक्ष/कन्वीनर का मुकाबला प्रधानमंत्री से करने लगे , चैलेन्ज पे चैलेंज बस मोटा भाई की सनक गई और मोटा भाई ने सोने का पानी चढ़ी परात से पानी हटा दिया और भरे चौक में परात पीतल की रह गई। अब भाई साहब जो ख़ुद की सीट हार बैठे उसकी राजनीति में कित्ती बखत रह जाती है खुदई सोच लो मियां। लेकिन जो शांति से बैठ जाए वो केजरीवाल तो हो नहीं सकते सो एक लम्बे पॉज के बाद उन्हें फिर खुजली मची तो पीछे के दरवाज़े से काक्रोच काक्रोच खेलने लगे। आप को क्या लगा मैं झूठ बोल रिया हूँ तो भैय्या गूगल में उगल करके देख लो ये रांका पांका अभिजीत दीपके सब आप के पाप में शामिल मिलेंगे। ये बेचारे तो पपेट हैं इन्हें जंतर मंतर पर छूमंतर करने वाले केजरीवाल ही हैं। अब ये फिर कुछ रुकने के बाद फिर खुजली खुजली खेलने की कोशिश कर रहे हैं पता नी मैन्नू ऐ लगदा है ऐ बंदा अब पंजाब से भी अपना सूपड़ा साफ़ कराकर ही मानेगा।
सुपर से ऊपर
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अब बचे राहुल गाँधी , भई 140 साल पुरानी पार्टी का इकलौता नेता जिसे हारने से डर नहीं लगता और लगे भी क्यूँ हारना कोई बुरी बात थोड़े है। भाई साहब इस बन्दे का कॉन्फिडेंस इत्ता ऊँचा है कि उसे टच करने में आपको कई सीढ़ियां लगानी पड़ेगी फिर भी आप उसके कॉन्फिडेंस को छू नी पाओगे और ऐसा यूँ ही नहीं है ये सब महराज । बक़ौल वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह जी विजय लक्ष्मी पंडित जो कभी स्कूल तक नहीं गईं उन्हें अमेरिका में राजदूत बना दिया जाता है उसके बाद सोवियत संघ में और भी जाने कहाँ कहां और ऐसा इसलिए कि हमार भैय्या प्रधानमंत्री तो हम राजदूत तो बन ही सकते हैं न कमस कम I इसके बाद 1965 में जब लाल बहादुर शास्त्री जी प्रधानमंत्री थे और इन्दिरा गांधी सूचना प्रसारण मंत्री तब एक आश्चर्य चकित घटना हुई। हुआ यूँ के जब नेहरू जी प्रधानमंत्री थे तो एक संविधानिक फैसला लिया गया कि 15 बरस बाद यानि 1965 से अँग्रेजी की जगह हिन्दी राष्ट्रभाषा होगी यानि सरकारी कामकाज की भाषा हिंदी होगी, तमिलनाडु में इस बात पर हंगामा होता है इन्दिरा गाँधी बिना प्रधानमंत्री को बताए तमिलनाडु चली जाती हैं और वादा कर आती हैं कि हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं होगी जब एक सीनियर जर्नलिस्ट इस घटना पर सवाल करते हैं तो इंदिरा बोलती हैं कि मैं देश की नेता हूँ ऐं जी जे क्या बात हुई भाया प्रधानमंत्री से ऊपर कोई नहीं हो सकता लेकिन हमारे नाम के पीछे नेहरू गाँधी लिखा है इसलिए हम कुछ भी कर सकते हैं। इसे ही शास्त्रों में ख़ुद को सुपर से ऊपर समझना कहा गया है।
फटे तो फटे नवाबी न घटे
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"हार में या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं" की तर्ज़ पर प्रधानमंत्री बनने की लालसा लिए ये बंदा लगा पड़ा है । अब ये कब मिलेगा पता नहीं, मिलेगा भी या नहीं, कह नहीं सकते लेकिन कदम सदैव प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर अग्रसर। अब ग़लती इस बन्दे की भी नहीं है। देश को तीन तीन प्रधानमंत्री देने वाले गाँधी "ghandy" परिवार में जिस भी चश्म ओ चिराग़ की आँख खुली उसे मुग़ली घुट्टी 555 की जगह प्रधानमंत्री कुर्सी छाप घुट्टी पिलाई गई तो बंदा और कोई सपना देखे भी तो कैसे सो भैय्या मैं इसमें इस बन्दे की ग़लती कतई नई मानता ग़लती उनकी है जिन्होंने ग़लत घुट्टी पिलाई और घुट्टी भी ऐसी कि कोई पढ़ा लिखा हो न हो फिर भी उसे कहीं भी कुछ भी बना दो। अब उम्र के इस पड़ाव पर आकर ये बंदा कोई दूसरा काम भी तो नहीं सकता न, फिर करे तो क्या करे "वो सुबह कभी तो आएगी" के इंतज़ार में बंदा लगा हुआ। इस चक्कर में कई ट्यूटर बदले जा चुके हैं, पिता के ज़माने में कुली कुली खेलने वाले को पार्टी प्रधान भी बना डाला किंतु परन्तु लेकिन रिज़ल्ट ज्यूँ का त्यूं कारण बन्दे को सुनने की आदत नहीं है कोई कल का जाता आज ही पार्टी छोड़ दे इस बन्दे को कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला कारण सीधा है वो भी जॉनी वाले राजकुमार की तरह कि पार्टी हमसे है हम पार्टी से नहीं। अब कर लो बात क्या करोगे। हाँ जो कोई न सोच सके ऐसा काम ये बंदा जब तब करता रहता है। काक्रोच काक्रोच खेलते खेलते ये बंदा घर से निकला कहीं और के लिए लेकिन जा बैठा प्रधानमंत्री आवास के सामने वो भी बिलकुल एक बिगड़ैल बच्चे की तरह लेकिन ये बंदा समझदार भी है थोड़ा सा सो राँची नहीं गया। झारखण्ड वाले देखते रहे के तुम कब आओगे लेकिन ये बंदा डिज़िटल के ज़माने में शिबू सोरेन के साथ चिट्ठी चिट्ठी खेलने में व्यस्त रहा।
कैच मी इफ़ यू कैन
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सो हुआ यूँ के 1986 में एक ठो पिक्चर आइल रही उका नाम का था हाँ याद आइल गईंल "पीछा करो" जिसमें अपने वाले फारूख शेख, रवि वासवानी, अमजद खान और अनुपम भैय्या और भी न जाने कित्ते कलाकार थे I दो जासूस एक देश द्रोही को पकड़ने के लिए इत्ती ज्यादा उट पटांग हरकतें करते हैं कि दर्शक हँस हँस कर लोट पोट हो जाता है लेकिन वे परिस्थिति से घबराए बिना अपने लक्ष्य को भेदने के लिए तैय्यार रहते हैं I फिर 2002 में स्टीफन sleep बर्ग की फिल्म "Catch Me If You can" (हिम्मत है तो पकड़ के दिखाओ) देखी ।स्टोरी थोड़ी अलग थी लेकिन फिल्म का मिजाज़ "पीछा करो" जैसा ही था I हम एक रील देख रहे थे जिसमें अपने वाले सुब्रह्मण स्वामी जी से किसी पॉडकास्टर ने पूछा कि राजा बाबू प्रधान कब बनेंगे। भाई साहब पहले तो उन्होंने उस पॉड कास्टर को ऊपर से नीचे फिर नीचे से ऊपर की ओर देखा फिर जहरीली मुस्कान के साथ कहा "कभी नहीं" लगे हाथ उन्होंने राजू बाबू द्वारा गिनवाई जा रही विदेशी डिग्रियों का कच्चा चिट्ठा भी खोलकर पॉडकास्टर बोलती बंद कर दी। ऐसे जाने कितनी रील फील तरंगों के माध्यम से कुछ सत्य कुछ अर्धसत्य और कुछ बिलकुल सफ़ेद झूठ वातावरण में चहल कदमी कर रही हैं। लेकिन एक बात तो है और वो ये कि राजा बाबू को प्रधान बनाने के लिए कुछ विदेश एजेंट कुछ देसी एजेंट पूरी तरह हाथ पाँव मार रहे हैं लेकिन वो क्या है ना कि वर्तमान परिवेश में 2047 तक तो कोई उम्मीद नज़र आती नहीं। चलो कुछ खुराफाती लोगों के दिल को ठण्डक पहुँचाने के लिए मान लेते हैं कि राजा बाबू जोड़ तोड़ करके प्रधान बन भी गए तो क्या ही हो जाएगा भैय्या। चलो इस पर भी एक ठो नजर डाल ही लेते हैं।
जेन जी!! फलाना ढिकाना... जिंदाबाद
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एक शब्द है फैंटेसी चलो तो इसी के इर्द गिर्द हम कभी न हो सकने वाले ख़्वाब को देखने का प्रयत्न करते हैं। राजा बाबू प्रधान बन गए हैं, केजरीवाल गृह मंत्री बन गये, अखिलेश यादव रक्षा मंत्री ममता बेन विदेश मंत्री बाक़ी जो मंत्रालय बचे उसके लिए पहले सर फुटव्वल और फिर छीना झपटी ख़ैर विशेष शेष के बाद अवशेष बचे लोगों ने कुछ न कुछ पा लिया तो क्या होगा। चूंकि भारत की जनता वो "गोल्डन डेज़" देखना चाहती है सो फिर से वही भाई चारा भाई चारा वाला खेल जाएगा ना। इसमें पहले की तरह रामू ही चारा बनेगा और और बाक़ी भाई। सारे बांग्लादेशी पाकिस्तानी भाई बिना पासपोर्ट वीज़ा के भारत में बॉर्डर से तार क्रॉस करके हिंदुस्तान आया जाया करेंगे। तार काटने की मशीन भारत में रहने वाले जामु उपलब्ध करा देंगे, भाई भाई का मामला जो है आख़िर। जनता को 24 घण्टे में कम से कम 10 12 बार लाईट आ गई की ख़ुशी प्रदान की जाएगी। वही पुरानी व्यवस्था... गैस, राशन, मिट्टी का तेल—सब कुछ तब भी "ऑनलाइन" ही मिलता था अब फिर से वही सब। ऑनलाइन मतलब... "लाइन में ऑन रहो"। ज़रा-सा लाइन से हटे नहीं कि नंबर गया! बस... वही "ऑनलाइन सिस्टम" फिर से देखने लगेगा। जहां तक महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा है तो फिर वही जब शाम ढलते ही लोग, खासकर महिलाओं को किसी बात का डर नहीं था क्यों कि हर महिला के पास चार-चार, पाँच-पाँच ब्लैक कमांडो हुआ करते थे और महिला सूर्य ढलने के पहले घर पहुँच जाती थी। रात का झंझट ही नहीं।
न न अभी फैंटेसी ख़त्म न हुई है लो और सपने में तैर लो भाई। वही दौर दौर वही दौर... जब जब दिवाली कभी पड़ तब तब दीवाली को सेलिब्रेट करने के आतंकवादी दस पांच शहरों में बम फोड़ देते थे। ...वही दौर... हर दूसरे चौथे दिन शहर-दर-शहर बम की ब्रेकिंग न्यूज सुनने को मिलती थी? वही दौर जब प्रधानमंत्री बोलते थे "पैसे पेड़ पर नहीं उगते!जब भारत में आतंकी हमले हो रहे थे तब गृहमंत्री सूट बदल रहे होंगे और उन्हें इतनी बड़ी घटना पर दो शब्द बोलने का भी टाइम नहीं होगे ! वही दौर जब हिंदू हिंदू होने से ही कतरने लगा था बेटियां महिलाएं सुरक्षित नहीं थी । जहां तक पेपर लीक ही नहीं होता था कोई पेपर कभी लीक नहीं होता था, हर बच्चे के सौ में से सौ नंबर आते थे और हर मोहल्ले, हर कस्बे और हर शहर से मानो हर बच्चा डीएम या डीएसपी बनकर कॉलर टाइट करने लगता था ? सरकारी नौकरियाँ इतनी कि तीन-तीन पोस्ट पर एक अकेला बंदा काम करता था? वही ज़माना... जब हर गली-मोहल्ले में एक AIIMS, एक IIM और एक IIT हुआ करती थी? वही दौर, जब सौ डॉलर का एक रुपया हुआ करता था! महंगाई तो बिल्कुल भी नहीं थी—एक दर्जन में अठारह-अठारह केले आते थे तब। वही दौर चाहिए मुझे। वही दिन, जब रात आठ बजे वाली ट्रेन रात आठ बजे ही आती थी... बस, तारीख़ कौन-सी होगी, ये कोई नहीं जानता था! स्टेशन पर बैठकर उनका इंतज़ार करने का जो रोमांच था, वो आज भी याद आता है। रेलवे स्टेशन तो इतने बड़े-बड़े हुआ करते थे कि कई बार तो वहाँ हवाई जहाज़ उतर जाया करते थे। वही दौर वापस लाना है जब सरकारें नेता नहीं गुण्डे चलाते थे। क्यों कि हिंदू-मुस्लिम जैसी कोई बहस ही नहीं होती थी। मुस्लिम अपने नाम के साथ... "द्विवेदी, तिवारी, शर्मा और शुक्ला" लिखते थे और हिंदू "खान, कुरैशी, हुसैन और अहमद"। बस, इंसान की पहचान इंसान से होती थी।
दिमागी नक्सल
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मोटा भाई छोटा भाई ने देश को ये कहां पहुंचा दिया है। ये भी कोई बात हुई इन दोनों ने कश्मीर से 370 हटाकर वहां की आवाम को खुले में श्वांस लेने की इजाजत कैसे दे दी। राम मन्दिर निर्मित हो गया, 80 करोड़ लोगों को फ्री राशन, उत्तर प्रदेश जैसे बीमारू राज्य में 17 हवाई अड्डे, दिल्ली NcR का मतलब सार्थक करते हुए देश की पहली रैपिड ट्रेन दिल्ली से मेरठ चलवा दी। शौचालय पर बात करने से नाक भौं सिकोड़ते नेताओं को लाल किले से बताया कि महिलाओं के लिए इज़्ज़त घर क्यूं ज़रूरी है। पुराने तौर तरीके कितने अच्छे थे लेकिन इन दोनों ने उन्हें भी न्यू भारत के सांचे में ढाल दिया मतलब BNS की धाराएं लागू हो गईं। नक्सलवाद भी ख़त्म कर दिया। जिस कश्मीर में लोग जाने से डरते थे अब वहां भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गौर जाकर बता रहे हैं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और जल्दी ही अमेरिका कश्मीर पे लागू अमेरिकी टूरिस्टों के लिए धारा को डिग्रेड करने के लिए कहेंगे। यहाँ तक तो ठीक था अमर अब्दुल्ला ने अलग बढ़िया वाला बयान देकर इंडी की मिंडी बना दी उधर पाकिस्तान सदमे में आ गया है।गुलामी के प्रतीक संसद भवन की जगह नया भारतीय संसद भवन बनाकर उन हड़प्पुओं का नुक़सान कर दिया जो हर माह लूटियन में लोट लोट कर करोड़ो छाप रहे थे। भारत की सेना को फ्री हैंड दे दिया साथ में कह दिया जो बातों से माने तो ठीक वरना बिना तेल पानी के ढंग से पेल दो। अब इत्ता फ्री हैंड क्यूँ दिया मोटा भाई छोटा भाई। हद तो मोटा भाई यानि प्रधानमंत्री जी ने ये कहकर कर दी की नक्सल वाद तो ख़त्म हो गया है पर कुछ दिमाग़ी नक्सल अभी भी हैं और लो जी चिदंबरम क्या और केजरीवाल क्या सब एक सुर में चिल्लाने लगे कि"मैं भी दिमाग़ी नक्सल" हूँ! भाई कोई इन्हें बताओ कि ये कोई पद्म भूषण या पद्म विभूषण की उपाधि नहीं है जो ये बच्चों की तरह ख़ुश हो रहे हैं। पर कौन समझाए इन झल्लुओं को। मोटा भाई छोटा भाई रहम करो इन इंडी की मिंडीओ पर।
और अंत में एक कहानी, एक गाँव में प्रधान तबियत खराब हो गई जो उस प्रधान से दुःखी थे वे उसकी मौत की कामना कर रहे थे जब कि कुछ उसकी जिंदगी के लिए प्रार्थना कर रहे थे । उसी गाँव में रहने वाली एक विधवा स्त्री के पुत्र को सपने आने लगे कि वो गाँव का प्रधान बन रहा है। जब बार बार यही सपना दोहराने लगा तो उसने अगले दिन सुबह अपनी माँ से पूछा कि माँ क्या प्रधान मरने वाला है तो मां ने अपने पुत्र को दार्शनिक अंदाज़ में कहा कि क्या पता ये तो भगवान तै करेंगे कि उसे आगे जीना है या मरना, लेकिन तुझे प्रधान के जीने मरने से क्या लेना देना। बच्चा बोला बस यूँ ही पूछ रहा था माँ। ख़ैर चलो मान लो प्रधान मर गया तो अगला प्रधान कौन बनेगा? माँ ने तिरछी नज़र से देखते हुए कहा उसका लड़का, बच्चे ने फिर पूछा अगर वो भी मर जाए तो माँ ने कहा उसकी पत्नी बच्चे ने फिर चहकते हुए पूछा अगर प्रधान की पत्नी भी मर जाए तो? माँ ने बच्चे को ऊपर से नीचे देखते हुए कहा प्रधान का भाई, बच्चे ने फिर पूछा प्रधान के भाई का तो ब्याह भी न हुआ है सो अगर वो भी मर जाए तो? माँ के सब्र का पैमाना छलक गया दो झापड़ रसीद करते हुए बोली बेटे सारा गांव भी मर जाएगा न तेरा नम्बर फिर भी नी आएगा।
प्रदीप भट्ट
लेखक मेरठ
20082026