"नाराज़ फूफास और चच्चा ट्रम्प "
नाराज़ देशी फूफास्
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ख़ैर भाई साहब एक बात बताएं आपको ये जो मोदी जी हैं ना विपक्षियों को चैन से बैठने ही नी देते सच बता रिया हूँ मियां बड़ा गज़ब करते हैं और कई बार तो एक दिन में दो बार और अगर मूड में हों तो तीन चार बार भी। अब जे क्या बात हुई कि आपने सी जे पी की ओर मुँह करके विपक्षियों को पेल दिया महाराज कित्ता ज़लील करोगे और कितनी बार मेरे भाई। अब जे कहने की क्या जरूरत थी कि ग्रामीण और अर्बन नक्सल तो ख़त्म से ही हो गए किंतु परन्तु लेकिन कुछ दिमाग़ी नक्सल अभी भी अराफ़ात के मामू के लड़के की तरह खुराफात कर रहे हैं। अब कांग्रेसी तो कोंग्रेसी ठहरे उड़ते हुए तीर लेने के आदी सो चिदंबरम महाराज ने फौरन यह कहकर कि मैं सौ फ़ीसदी दिमाग़ी नक्सल हूँ कांग्रेस में पुनः अपना भविष्य ढूँढने की कोशिश की लेकिन कॉन्ग्रेस में निठल्लो की कमी है क्या एक से बढ़कर एक सो सबने "कैच मी ईफ यू कैन" की तर्ज़ पर तुरन्त उड़ते तीर की कॉपी बनाई और लगे चिल्लाने मैं भी दिमाग़ी नक्सल, मैं भी दिमाग़ी नक्सल। लेकिन होना तो कुछ था नहीं सो दो चार दिन मिमियाकर फंटाश की गोली खाकर एक किनारे हो लिए। तभी घाघ श्री केजरीवाल महाराज ने भी इसमें अपना भविष्य तलाशने की कोशिश और दो चार दिन चिल्लाए मैं भी दिमाग़ी नक्सल, मैं भी दिमाग़ी नक्सल पर हुआ कुच्छो ना सो वो भी पांचवें दिन लेफ्ट राइट लेफ्ट राइट करके अपने दड़बे में जा घुसे। अब मोदी जी हैं कि मानते नहीं सो एक बार फिर एक कार्यक्रम में विपक्षियों को डंक मार दिया कि कुछ लोगों को अच्छे काम भी अच्छे नहीं लगते ससुरे नाराज़ फूफा की तरह इधर उधर घूमते रहते हैं। ये जुमला पहले से कहीं कुछ ज्यादा ही तीखा था किंतु लगा बिलकुल निशाने पर और विपक्षियों ने राग भीम पलासी की तरह राग रोना रुनव्वा शुरू कर दिया। कुछ कांग्रेसियों ने इसे व्यक्तिगत ले लिया (व्यक्तिगत से तात्पर्य ghandy गाँधी परिवार के ग़ुलाम) और लगे चिल्ल पों करने वो भी नमक मिर्च के साथ ताकि हमारी भी कुछ टुक टुकाहट हो जाए ghandy परिवार में। अब ग़ुलामी की आदत तो बल्डवा में अन्दर तक घुसी हुई है सो नाराज़ फूफा के साथ उन्होंने नाराज़ जीजा को और एड कर लिया ताकि तीर अन्दर तक सीधा ही जाए। वैसे बहुत दिनों से सोशल मीडिया में नाराज़ फूफाओं की फेहरिस्त में तीन नाम बहुत चले। पहले पूर्व आर बी आई गवर्नर रघुराम राजन जिनका तर्क किसी के पल्ले नहीं पड़ा कि भारत को सेमीकंडक्टर बनाने की क्या ज़रूरत है हमें कौन सा सुपर पॉवर बनना है, दूसरे वही रवीश कुमार जिनका कहना था कि मेरठ प्रयागराज गंगा एक्सप्रेस वे से पॉंच घंटे पहले पहुंचकर आदमी क्या करेगा। इस बन्दे को पत्रकार किसने बना दिया या किसने बनने दिया और क्यूँ भाई तीसरे कन्हैया कुमार भाई साहब इनका ज्ञान तो सर्वोपरि है कहते हैं सरकार इतनी बढ़िया सड़के बनकर सरकार बिहार का पानी चुराना चाहती है। अरी मोरी मैय्या।
फूफागिरी
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क्या कै रिए हो मियां कि आपको नाराज़ फूफास का उदाहरण कुछ समझ नी आया तो चलो नाराज़ फूफा कैसे होते है उसका एकदम ताज़ा ताज़ा उदाहरण लपको। राजस्थान के खैरथल तिजारा जिसे अब भर्तृहरि नगर कहा जाता है, के उल्ला हेड़ी गाँव के अशोक शर्मा के साले के बेटे की बारात एक गाँव में आई थी, चूंकि अशोक शर्मा को दूल्हे की कार की पिछली सीट पर बिठा दिया गया अब पिछली सीट पर धरे सामान के साथ फूफा जी जैसे तैसे पैर सिकोड़कर बैठे रहे उन्हें ये बात बुरी तो लगी पर वो चुप रहे लेकिन जैसे ही दूल्हे ने अपने दोस्त अरविन्द वर्मा को आगे वाली सीट पर बिठा लिया। बस भाई साहब फूफा अशोक शर्मा इस हरकत को दिल पर ले गए और जैसे ही बारात जनवासे पर रुकी उन्होंने निश्चय कर लिया कि इन्हें सबक सिखाना जरूरी है, इन्हें पता तो चले कि फूफा क्या होता है और लीजिए साहब फूफा अशोक शर्मा ने रात के अंधेरे में 15 गाड़ियों में बर्फ काटने वाले सुए से पंचर कर डाले, एक आध गाड़ी का टायर भी टें बोल गया। सुबह जब लोगों को पता चला तो आसपास के कैमरे चैक हुए और फूफा जी अपनी फूफा गिरी करते हुए कैमरे में क़ैद। अब आप खुदई सोच लो ये तो दस बीस साल पुराने फूफा का कारनामा है लेकिन जो अभी अभी ताज़ा ताज़ा जीजा बने हैं वो भी छोरियों से कम थोड़े हैं, कुछ न कुछ तो वो भी करेंगे और भविष्य में फूफा बनकर फूफागिरी।
अब इन विपक्षियों ने अपने आस पास इतने अटरम शटरम टाइप के लोग भर रक्खे हैं कि इन्हें खुदई समझ नहीं आता कि किस विषय पर क्या बोलना है। बस जो जिसके जी में आता है बक बका देता है। दर्शक सोच सोचकर पागल कि भाई ये सो कॉल्ड प्रवक्ता आख़िर कहना क्या चाहता है। पर प्रवक्ता को दर्शकों से क्या लेना देना उसे तो ट्रेनिंग मिली हुई है विषय कोई भी जगह कोई भी हो उसे बस बीजेपी आर आर एस को कोसना है अगर मौक़ा मिले तो पहले अमित शाह को बाद में प्रधानमंत्री मोदी को गलियाँ बक दो कोई ज़्यादा उछले तो उस आदमी या पत्रकार को बीजेपी वाले हो कहकर दडबड़ा दो लेकिन सावधान योगी जी को सपने में भी कुछ मत कहना वरना टन्न टप्णा टन टन तारा चलती है क्या नौ से बारह गाना गाते देर नहीं लगेगी। किसी ने पूछ लिया ये टन्न टणा क्या होता है तो योगी जी के काले चश्मे वाले अवतार की फोटो दिखा दी जाती है उनके साथ खड़े दो यमराज हाथ में सरसों के तेल से पिलाया लकड़ी का लट्ठ लहराते हुए नज़र आते हैं। इसलिए दिमाग़ी नक्सली हो या नाराज़ फूफा उनके इलाक़े से दूर रहना ही पसंद करते हैं यकीं नहीं तो महाभारत के संजय नाम वाले उमेठू चंद से पूछ लो। क्या कहा समझ नहीं आया तो टिकैत बंधुओं से पूछ लो और ताज़ा मसाला चाहिए तो जेन जी की भेन्न जी से पूछ लो। बाबा और उनका बुल्डोजर दिल्ली की सीमा से लगे उत्तर प्रदेश की धरती पर पांव रखने वाले से पूछ लो। वो ओखला का विधायक क्या नाम था चलो जो भी था हां याद आया आप का अमानतुल्ल खां। भाई साहब अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या बसा रक्खे थे किसी की हिम्मत न हुई उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग की कब्जाई हुई ज़मीन पर पैर धरने की क्या पुलिस क्या कार्यपालिका सब सर्च करके उल्टे पांव उत्तर प्रदेश में। फिर हुई बाबा की एंट्री पुलिस भी वही कार्यपालिका भी जिस ज़मीन पे पुलिस पैर नहीं धर सकी उसी पुलिस ने बाबा के आशीर्वाद से पूरा बुल्डोजर रख दिया। अमानुल्ला खड़ा खड़ा देखता रहा और कुछ ही घंटों में पूरी जमीन उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के कब्ज़े में।
ख़ैर ये तो देश के हालातों पर छोटी सी टिप्पणी है कि देश में किए जा रहे बढ़िया वाले हर छोटे बड़े काम पर भी विपक्ष कैसे रोना राट मचाता है। जहाँ तक बात दिमाग़ी नक्सल की है तो वो नक्सलजिम उनकी आत्मा के परमात्मा से मिलन के बाद ही विदा हो पाएगा लेकिन जहाँ सवाल नाराज़ फूफा का है तो देश में तो उनकी अकड़ पकड़ ढीली करने वाले कई समझदार लोग हैं लेकिन अगर बात अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हो तो..... तो आजकल ट्रेंड में तो पता नहीं किसके वाले डोनाल्ड ट्रम्प ही चल रहे हैं। पूरी दुनिया में कुल जमा 193 देश हैं अगरचे मैं गलत नहीं हूं तो डोनाल्ड भाई का पंगा हर देश से हैं ये बात अलग है कि ईरान से पंगा करके उन्होंने पूरे अमेरिका को नंगा कर दिया है। देश के देश इस फ़ालतू के युद्ध से बरबाद हुए जा रहे हैं लेकिन इस बंदे को फ़र्क ही नहीं पड़ रहा। ये जानते हुए भी कि अमेरिका में मिड टर्म चुनाव हैं और चुनाव के नतीजे मियां जी को चौंका सकते हैं फिर भी हर एक से पंगा लिए जा रहे हैं। जब पहले टर्न में ट्रम्प जीतकर आए थे तो कहते नहीं थकते थे कि अमेरिका को हर जगह अपनी नाक नहीं घुसेड़नी चाहिए लेकिन अगले दूसरे टर्न में चुनाव हारने के बाद जो हिंसा इस बंदे के सहयोग से हुई वो अमेरिकी इतिहास की अभूतपूर्व घटना के रूप में दर्ज़ हुई। अमेरिका में पूरा अखाड़ा करने के बाद अप्रत्याशित रूप से कमला हैरिस को हराकर बंदा सत्ता में आया और ऐसा आया कि लोग इसके जाने का इंतज़ार कर रहे हैं। इसने अमरीका तो छोड़ो पूरे विश्व को अपनी हनक और सनक से इस क़दर परेशान कर दिया है कि विदेशी नेताओं ने इसे नाराज़ फूफा की उपाधि से नवाज दिया है। असली मुसीबत यह है कि पता नहीं किस देश ने इसको अपनी बुआ ब्याह दी है जो इस फूफा की तशरीफ़ नहीं सुजा पा रही। ये अंतर्राष्ट्रीय नाराज़ फूफा पता नहीं किसका क्या करके मानेगा।
नाराज़ चच्चा 'ट्रम्प'
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सन 2001 में न्यूयॉर्क के एक निवेश बैंक के अर्थशास्त्री को विश्व में उभरती चार अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक नाम सुझाना था। वो चार अर्थव्यवस्थाएं थीं भारत, चीन, रूस और ब्राज़ील। तो भैय्या उसने यूँ ही एक नाम सुझाया बी आर आई सी। ये महज़ मार्केटिंग को ध्यान में रखकर गढ़ा गया शब्द था ताकि अंतराष्ट्रीय स्तर पर इसे यूज़ किया जा सके। लेकिन "होनी तो होकर रहे अनहोनी न होए जाको राखे साईंया मार सके न कोय" और लीजिए हुज़ूर आगे चलकर यही नाम इतना मज़बूत हो गया कि एक कूटनीतिक पहचान ही बन गया। 2010 में इसमें साउथ अफ्रीका जुड़ा तो इसका नया नामकरण हो गया "ब्रिक्स' आज इसमें दुनिया के ग्यारह देश, और दस साझेदार देश, दुनिया की 49 प्रतिशत यानि आधी आबादी, 41 प्रतिशत जीडीपी और पच्चीस प्रतिशत ट्रेड। अच्छी बात ये है कि इस बार ब्रिक्स की मेजबानी भारत ने की वो भी दिल्ली के भारत मंडपम में 12,13 सितम्बर को। भारत और विषयों के अतिरिक्त जहाँ यू पी आई को ज़्यादा से ज्यादा देशों तक कनेक्ट करना चाहेगा वहीं ब्राज़ील अपने पिक्स जैसे तेज़ भुगतान वाले राष्ट्रीय सिस्टम को आपस में जोड़ने पर बल देगा। रूस जहाँ भारत का प्रामाणिक मित्र है उसके साथ रक्षा के एनर्जी पर भी बात होगी वहीं चीन अपने 400 डेलीगेशन के साथ अपने राष्ट्रपति के साथ भारत में बहुत कुछ संभावनाएं तलाशेंगे। ईरान भारत के साथ परस्पर सहयोग और बढ़ाना चाहेगा वहीं दूर बैठा नाराज़ चच्चा ट्रम्प कुछ उल्टा सीधा न करे ऐसा तो हो नहीं सकता न सो उसने 12 सितम्बर को घोषणा कर दी कि जिन भारतीयों की नौकरी जाएगी उन भारतीयों पर लागू 60 दिन का गैप पीरियड लागू नहीं होगा यानि इधर नौकरी गई उधर फ्लाइट पकड़ो और निकल लो अपने देश। लेकिन अच्छी बात ये रही कि शी जिनपिंग और पुतिन ने ब्रिक्स के मंच से भारत की भट्टी में तपी पकी ब्रिक्स यानि ईंट अमेरिका की तरफ़ यह कहकर उछाल दी कि आज ब्रिक्स जी सेवन से बहुत बड़ा हो गया है। अब चच्चा ट्रम्प को बढ़िया वाले एसी की हवा भी गर्म लग रही है लेकिन क्या करें कुछ हो जो नहीं सकता तो खिसयानी बिल्ली खम्भा ही नोचेगी।
अब ऐसा भी नहीं है कि पुतिन और शी जिनपिंग ने चच्चा ट्रम्प को चिढ़ाने भर के लिए जुमला फेंका हो। ज़्यादा नहीं थोड़ा सा तुलनात्मक अध्ययन करें जैसे कि जी सेवन की ग्लोबल जीडीपी में हिस्सेदारी 29% है जब कि ब्रिक्स की 40%, मैन्युफैक्चरिंग में जी सेवन की हिस्सेदारी 33% है तो ब्रिक्स की 40%, तेल गैस प्रोडक्शन में जी सेवन जहाँ 26% पर है वहीं ब्रिक्स 43% और भाई साहब आबादी के हिसाब से जी सेवन 80 करोड़ पर है वहीं ब्रिक्स की आबादी 400 करोड़ है और ये आंकड़े पिछले पांच वर्षों के आधार पर आकलन करते है। अब इन परिस्थियों में लड़ाई तो होनी है। अमेरिका जहाँ डॉलर का दबदबा बनाए रखना चाहता हैं वहीं ब्रिक्स देश इस दबदबे को चुनौती देते दिखते हैं। हाल के अंतरराष्ट्रीय घटना क्रम को देखते हुए यूरोप भी फूंक फूंक कर कदम रखना चाहता है उसे भी अहसास है कि अमेरिका किसी का सगा नहीं है वरना क्या कारण है कि यूरोप व्यापारिक सौदा हो चुका है और अमेरिका भी किंतु परन्तु में ही उलझा हुआ है।
पिरामिड ऑफ privileged
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प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स में भारी वाली ईंट बड़े हल्के अंदाज़ में हँसते हँसते ये कहकर उछाल दी कि मजबूत देशों को पिरामिड ऑफ प्रिवलेजज्ड की तरह व्यवहार करने से बाज आना चाहिए। इस विश्व में जितने भी देश हैं उन सभी की अपनी संप्रभुता है और मज़बूत देशों को उनकी संप्रभुता का ख़्याल रखना चाहिए लेकिन चच्चा ट्रम्प को भारत के नाराज़ फूफास की तरह इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। ब्रिक्स की मजबूती में वो अमेरिका का उभार कम होते देख रहे हैं उनकी कोशिश है कि किसी भी तरह ब्रिक्स को यूरोप को मक्खन लगाकर कमज़ोर किया जाए लेकिन भारत ने यूरोप को भी छाछ को फूंककर फूंककर पीना सिखा दिया है। सो अब ट्रम्प बौखलाहट में क्या करेंगे एक पेनजोन लेंगे नहीं बल्कि भारत सहित कुछ देशों को फिर से टैरिफ टैरिफ़ से डराने की कोशिश करेंगे
तो चलो चच्चा कोशिश करके देश लो कहीं ऐसा न हो समय से पहले ही अमेरिका राष्ट्रपति से भूतपूर्व न हो जाओ।
चलते चलते भारत सरकार से निवेदन कृपया प्रशासन में अन्दर तक घुस चुके भ्रष्टाचार के जंग से मुक्ति दिलाएं वरना क्या कारण है अमेरिका चीन की लड़ाई में जो बिजनेस भारत आना चाहिए था वो वियतनाम और ताईवान कैसे झटक कर लेता जा रहा है। सिर्फ़ आंकड़ों आंकड़ो पर भरोसे की जगह धरातल पर उतरे और एफ डी आई के लिए सिंगल विंडो सिस्टम सख़्ती से लागू करे। विदेशी तो छोड़िये देसी उद्योगपति भी इतना तंग आ चुका है कि वो भारत में इन्वेस्टमेंट न करके विदेशों में इन्वेस्ट कर रहा है। सबक विपक्षियों को ही नहीं आपको भी लेने चाहिए। जहाँ जरूरी हो वहीं नाक घुसेडिये हर जगह नहीं। अच्छा आपको भी उदाहरण चाहिए तो याद कीजिए जब टाटा नैनो कार का प्लांट पश्चिम बंगाल के सिंगुर में लगाना चाहते थे। टाटा इतने परेशान हो गए कि उन्होंने ये नैनो का आइडिया ही ड्रॉप करने का फ़ैसला किया और तभी गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र दामोदर मोदी ने सिर्फ़ एक कॉल से वो नैनो का प्लांट सिंगुर से गुजरात खींच लिया था वो भी सिंगल विंडो द्वारा। सो पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें की तर्ज़ पर पुनः ध्यान दे वरना।
प्रदीप भट्ट
लेखक, मेरठ
16092026