Saturday, 31 January 2026

"रिटर्न गिfफ"्

"रिटर्न गिफ्ट"

         वीरेंद्र को गोरखपुर के जनता इण्टर कॉलेज में ड्यूटी ज्वाइन किए तीन बरस हो चुके थे। इस आशा के साथ वह शिक्षा निदेशालय के साथ निरन्तर सम्पर्क में था उसका उसका ट्रांसफर गृह नगर बागपत या उसके आस पास के किसी भी जिले में कहीं भी हो जाए लेकिन साहब अब अगर ट्रांसफर भी यूं ही हो जाया करे तो फिर सरकारी काम को ईनाम स्वरूप पद्मश्री न मिल जाए। इधर घरवाले उसे शादी जल्दी करने के लिए घेरे हुए थे आख़िर वो करे तो क्या करे। शादी के बाद नई नई पत्नी को कहां इत्ती दूर लेकर जाएगा। दस तरह के लफड़े नई बहु को गोरखपुर ले गया तो घर वाले तो फिर भी शायद कुछ न बोले लेकिन मोहल्ले वाले ताने मार मार के उसे ये कहकर न जीने देंगे कि इधर शादी की उधर बहु को लेकर मियां जी गोरखपुर। आख़िर शादी अपने लिए की थी या मां बाप की सेवा के लिए, भले ही उनसे उनकी औलाद काबू में ना आ रही हो लेकिन हर बात में बच्चों पर टीका टिप्पणी करने वाले मां बाप कि ये मति करियो वो मत करियो वरना चार लोग क्या कहेंगे। अब इन्हीं नासपीटे "चार लोग क्या कहेंगे" के फेर में पड़कर हर घर की हर मोहल्ले की यही नौटंकी देखकर देखकर वीरेंद्र भी बचपने से अब ब्याह के काबिल हो गया था। आख़िर थक हारकर वीरेंद्र ने शादी के लिए हां कर दी और एक महीने की छुट्टी अप्लाई कर दी और आज ही उसे सूचना मिली कि उसकी छुट्टी मंजूर हो गई है। उसने पहली फुर्सत में शामली में तैनात बड़े भाई सुरेन्द्र जो कि पुलिस में दरोगा हैं को सूचना भेजी कि भैय्या शादी की तारीख़ लॉक कर दो। मैं अगले शनिवार सुबह बागपत पहुंच रहा हूं।

         वीरेंद्र के हां भरते ही पूरे घर में शादी की तैयारी शुरू हो गई। चूंकि लड़की पहले ही देखी जा चुकी थी बस इंतज़ार था तो वीरेन्द्र की हां का और आज वो भी हो गई। लड़की बिरादरी की ही थी सहारनपुर की रहने वाली और गागलहेड़ी के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में PO।
लड़की खूबसूरत हो और सरकारी बैंक में अफसर भाई साहब इसे ही शास्त्रों में सोने पे सुहागा की उपमा दी गई है। पंडितों का भरा पूरा परिवार, लड़की का बड़ा भाई फ़ौज में कर्नल छोटा भाई आई आई टी कानपुर में इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष में अध्ययन रत्त पिता कृषि विभाग में निदेशक। आप यूं समझ लो कि वीरेंद्र की तो पांचों उंगलियां घी में और सर कढ़ाई में वाली स्थिति हो गई। अब वीरेन्द्र का परिवार भी अपर मिडिल क्लास श्रेणी का ठहरा। पिता शंकर शर्मा पंजाब नेशनल बैंक में मैनेजर, बड़ा भाई पुलिस में एक छोटी बहन निकिता जिसकी शादी अम्बाला के बड़े बिजनेस वाली फैमिली में दो साल पहले ही हो चुकी। 27 बीघे जमीन, टयूबवेल, ट्रैक्टर, एक फार्म हाऊस। मतलब जी कुल मिलाकर दोनों परिवार धन धान्य से भरपूर। 

         शनिवार वाया दिल्ली होते हुए वीरेन्द्र भी घर आ पहुंचा और लग गया वो भी अपने ब्याह की तैयारियों में। भले ही बारात शामली से सहारनपुर जानी थी लेकिन बारात तो बारात है जनाब। लोग कहते हैं लड़की की शादी में हज़ारों काम भाई साहब लड़कों की शादी में उससे दो चार काम फ़ालतू ही होते हैं अब जो करे वो ही समझे। सो पहली फुर्सत में वो छोटी बहन को लिवाने अम्बाला जा पहुंचा। आख़िर शादी के घर के सौ काम अम्मा क्या क्या संभालेंगी, भाभी ने फोन पर ही बता दिया दीपू के पेपर अगले हफ़्ते तक चलेंगे सो मैं तभी आ पाऊंगी। खैर आज ये कल वो करते करते शादी का दिन भी आ पहुंचा। शादी बड़े धूमधाम से बागपत से सहारनपुर पहुंची और हंसी खुशी में सभी मांगलिक कार्यों का निष्पादन करते हुए बारात वापिस शामली आ पहुंचीं। सनातनी शादी में हज़ार तरह के रिचुअल होते हैं सो तीन चार दिन फिर यूं ही निकल गए। इधर वीरेंद्र की छुट्टी में भी दस ही दिन शेष रह गए थे सो हनीमून ट्रिप को गोवा की जगह शिमला तय किया गया और वीरेन्द्र और शाश्वती शादी के सुखद पलों को ख्वाबों में सजाते हुए अपनी सेंट्रो कार में सवार होकर शिमला जा पहुंचे।

         होटल बुकिंग बड़े भाई ने पहले ही कर दी थी सो कार सीधे होटल ओबेरॉय सिसिल जा पहुंची। फ्रेश हुए और शिमला लोकल घूमने निकल पड़े अगले दिन कुफ़री भ्रमण किया। बागपत से शिमला के सफ़र में वीरेन्द्र ने बातचीत का सिलसिला प्रारम्भ किया तो शाश्वती को यह अहसास हो गया था कि वीरेन्द्र शर्मिला तो नहीं है लेकिन अनावश्यक बात करना पसन्द नहीं करता। अब शादी तो सौ प्रतिशत घरवालों की मर्ज़ी से ही हुई थी इसलिए वीरेन्द्र रिश्ते की शुरुआत में किसी भी प्रकार की ज़ल्दबाज़ी नहीं चाहता था। वीरेंद्र को जहां पीजीटी टीचर बने तीन बरस हो गए थे वहीं शाश्वती पहले ही प्रयास में डायरेक्ट PO भर्ती हुई थी। वीरेंद्र शाश्वती को इस छोटे से प्रयास में ज्यादा नहीं लेकिन थोड़ा सा जरूर समझना चाहता था ताकि सांसारिक जीवन की शुरुआत की नींव पक्की हो सके इसलिए बातें करते करते ही शाश्वती से कहा ये सही है कि हम दोनों के परिवार ही समृद्ध हैं किंतु मेरा मानना है कि हमें अपनी गृहस्थी का खर्च स्वयं वहन करने की आदत डालनी चाहिए। शाश्वती ने धीरे से अपना बायां हाथ वीरेन्द्र के दाएं हाथ में देते हुए अपनी मौन सहमति प्रकट कर दी थी। वीरेन्द्र एक पल के लिए तो रोमांचित हो उठा था फिर धीरे से शाश्वती के कान में फुसफुसाया धन्यवाद जीवन संगनी।

         पिछले दो दिनों में वीरेन्द्र और शाश्वती कुछ कहकर कुछ मौन रहकर एक दूसरे के विषय में इतना तो समझ गए कि भूकंप के छोटे मोटे झटकों से तो हमारे गृहस्थ जीवन को कुछ नहीं होने वाला जब तक कि भूकंप की तीव्रता रिएक्टर स्केल पर 6,7 की न हो।
जब मन मिल जाएं तो तन स्वत: मिल ही जाते हैं। सो जब सुबह शाश्वती फ्रेश होकर बाथरूम से लौटी तो टेबिल पर एक बड़ा से लिफ़ाफे पर बड़े अक्षरों में अपना नाम लिखा देखकर असमंजस में पड़ गई। पीछे पलटकर देखा तो वीरेन्द्र बाथरूम में फ्रेश होने जा चुका था। वो सोचने लगी कल रात ही वैवाहिक जीवन की शुरुआत करने से पहले वीरेन्द्र ने उसे ॐ लिखा पैंडुलम सोने की चेन के साथ गिफ्ट किया था फिर ये लिफ़ाफे पर मेरा नाम और इसमें क्या है सोचते हुए झिझकते हुए शाश्वती ने लिफ़ाफ़ा खोला तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा वीरेन्द्र ने एक करोड़ की टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी उसके नाम से खरीदी थी और उसे भेंट करने का दिन आज चुना था। शाश्वती बहुत जोर से हंस पड़ी जिसकी आवाज़ बाथरूम से झांक रहे वीरेन्द्र के कानों तक भी गई। थोड़ी देर बाद जब वीरेन्द्र बाथरूम से लौटा तो शाश्वती ने गले लगकर वीरेन्द्र को धन्यवाद में बस इतना कहा मुझे आप पर गर्व है मेरे जीवन साथी।

         होटल छोड़ते छोड़ते भी वीरेन्द्र और शाश्वती को दिन के 11 बज गए। दोनों हंसते मुस्कुराते एक बार फिर से मॉल रोड घूमने निकल पड़े। दो घण्टे कब निकल गए पता ही नही चला।  दोनों ने लंच लिया और मॉल रोड से परिवार के सभी सदस्यों के लिए कुछ न कुछ गिफ्ट खरीदे। शाश्वती सेंट्रो कार की डिक्की में सब कुछ व्यवस्थित करने में व्यस्त हो गई और वीरेन्द्र रास्ते के लिए कुछ रिफ्रेशमेंट लेने सामने की दुकान में चला गया। शाश्वती सब कुछ डिक्की में व्यवस्थित करने के बाद वीरेन्द्र का इंतज़ार करने लगी। थोड़ी देर में वीरेन्द्र दोनों हाथों में सामान समेटे आ पहुंचा और सामान को पिघली सीट पर रक्खा तभी शाश्वती बोली अब कालका तक गाड़ी हम चलाएंगे शर्मा जी। वीरेंद्र ने एक पल को शाश्वती की तरफ़ देखा फिर बोल पड़ा जैसा आपका आदेश देवी और घूमकर कार के दूसरी तरफ का दरवाज़ा खोलकर अगली सीट पर बैठने लगा तो सीट पर एक बड़े से लिफ़ाफे पर अपना नाम और लिफ़ाफे के बाईं ओर रिटर्न गिफ्ट लिखा देखकर चौंक पड़ा। उसने ड्राइविंग सीट पर बैठी शाश्वती को देखकर आंख के इशारे से पूछा क्या है ये तो शाश्वती बोल पड़ी रिटर्न गिफ्ट है शर्मा जी खोलिए तो सही। वीरेंद्र ने लिफ़ाफ़ा खोलकर देखा तो उसमें 50 लाख का लाइफ़ इंश्योरेंस अपने नाम से देखकर चौंक पड़ा। इससे पहले कि वो कुछ पूछता शाश्वती बोल उठी शर्मा जी शादी की तारीख़ तय होते ही मैंने आपकी डिटेल्स इसी लिए मंगाई थी आपने समझा ये डिटेल कार खरीदने के लिए है जब कि ये डिटेल्स दोनों कामों के लिए थी। पिछले तीन दिनों की समझ के आधार पर एक बात तो निश्चित है हम दोनों ही जिन्दगी की अहमियत समझते हैं। नए वैवाहिक जीवन की शुरुआत अगर इस तरह की समझदारी से हो रही है तो शर्मा जी निश्चिंत रहें हमें कोई भूकम्प हिला भी नही पाएगा। तो चलें शर्मा जी! जिन्दगी का स्टेयरिंग एक महिला के हाथ में होने से आपको आपत्ति तो नहीं होने वाली आपको ख़ुशी होगी ऐसी आशा है।

प्रदीप डीएस भट्ट -2801202

Saturday, 17 January 2026

"ये सरकार गिरती क्यूँ नहीं है "

"ये सरकार गिरती क्यूँ नहीं है "

         आपने टीवी पर बांगर सीमेंट का एक एड देखा होगा जिसमें बोमन ईरानी कहते हैं "ये दीवार टूटती क्यूँ नहीं" तभी पार्श्व में एक आवाज़ गूंजती है "ये दीवार बांगर सीमेंट से बनी है टूटेगी कैसे" आजकल अपने देश के हालत भी कुछ कुछ ऐसे ही हैं। सभी विपच्छी (विपक्षी) पार्टियों के नेताओं के पता नहीं कहां कहां सूजन आई पड़ी है। हर दिन हर दो घंटे में कोई न कोई लपड़ियाया सा नेता घंटा बजाकर घोषणा करता है बस कल सरकार चली जाएगी या अमुक दिन तक मोदी खुदई इस्तीफ दे देंगे अब इन  घुडचंदों को कौन बताए कि मोदी और इस्तीफ़ा अजी किस जमाने के आदमी तुम हो। बेटा मोदी का बस चले तो वो तुम्हारा इस्तीफ़ा तुम्हारी घरवाली से लिखवा ले और भाई साहब वो घरवाली भी चांदी जैसे दांत चमकाती हुई जय मोदी जय मोदी करते हुए इस्तीफ़ा सोने की तश्तरी में सजाकर प्रधान सेवक के चरणों में समर्पित कर देगी यानि "तुम्हारी बिल्ली तुम्हें ही म्याऊं" और ये चले हैं जी इस्तीफ़ा इस्तीफ़ा खेलने। मियां कभी चाय पे भी चर्चा किया करो सच्ची सच्ची कै रिया हूं कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा।

         जब 2014 में बीजेपी सत्ता में आई तो विपच्छी पार्टियों को लगा कि बिल्ली के भाग से छींका टूट गया है कोई बात नही 2019 में हम इन्हें ऐसी पटकनी देंगे कि इनके सारे अंजर पंजर ढीले पड़ जाएंगे। लेकिन लेकिन लेकिन जनाब बीजेपी चाणक्य की फॉलोवर वाली पार्टी है और वो भी बड़े वाली आठ कदम पीछे रखती है फिर एकदम से एक सौ आठ कदम आगे, अब कर लो क्या करोगे। 2019 में पूरे जोर से झांसी वाली रानी की तरह लड़ी और लो जी 302 सीटें लेकर विपक्ष की कमरिया ही तोड़ ली। सरसों के झांज वाले तेल में जबरन पकाए गए नारे "चौकीदार चोर है" के नारे की सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी अम्मा बुआ की कि बाबा को माफ़ी मांग कर ही पिंड छुटा। धारा 302 तो पहले से ही फेमस है अब बीजेपी की 302 सीटों ने ऐसा कहर ढाया कि जिधर देखो उधर खलबली खलबली की वोटिंग की जगह वेटिंग मशीन लग गई। अब इसी बौड़मगिरि में विपच्छी पार्टियों के नेताओं ने अपनी बौड़मगिरि का मुज़ाहरा हर जगह पेश करना शुरू कर दिया और तो और जिसने कभी वोटिंग मशीन का बटन तक भी नहीं देखा था वो भी बहुत बड़े ज्ञानी बाबा की तरह हर चैनल पर फुदक फुदक कर ज्ञान बघारने लग गया I लेकिन नतीजा तो वही ढाक के तीन पात होना था और हुआ भी। अब कीट पतंगों की तरह विपच्छी दल भी तिलमिलाए तिलमिलाए से इधर से उधर और उधर से इधर अपना दुखड़ा सुनाते फिर रहे हैं लेकिन वे जिसे भी सुनाने जाएं उसके पास उसका ख़ुद का पर्सनल सा कुछ ज्यादा ही बड़ा दुखड़ा तैयार है अब सब अपनी सुनाना चाहते पर दूसरे की सुनने को कोई राज़ी ही नहीं। अब बेचारा करे तो क्या करे सिवाए अगले पांच बरस तक ठलुआ बैठकर इंतजार करने के।

         जो पत्रकार नेता का चोला पहनकर फोन पर ही कैबिनेट तक बना देते थे अब उनके फोन में इत्ता भी बैलेंस नही कि वो मिस कॉल भी मार सकें। यानि "ग़रीबी में आटा गीला" वाली नौबत आ गई है भाई साहब! एक बहुत पुरानी कहावत है "पहली जीत मंगाए भीख" अब ऐसे महारथियों की आत्मा दिन में तीन बार भविष्य वाणी करने को उछाले मारती है वो भविष्यवाणी कर भी देते हैं लेकिन ससुरी पूरी एक भी नी हो री। ऐसी आत्माओं में एक नाम है पुण्य प्रसून बाजपेई! भाई साहब एक ठो घटना याद आ गई जब श्रद्धेय अटल जी प्रधानमंत्री बने तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में हर चैनल का पत्रकार उनसे सवाल कर रहा था और अटल जी अपने अंदाज़ ए बयां से सबको सन्तुष्ट भी कर रहे थे कि पुण्य प्रसून खड़े हुए और जैसे ही उन्होंने अपना नाम बोला मैं पुण्य प्रसून बाजपेई फलाना से तुरन्त अटल जी ने कहा यहां एक ही बाजपेई काफ़ी है। अब तनिक सोच के देखो कित्ता बड़ा दाग़ लगा था उस दिन बेजत्ती में। तो हुज़ूर आजकल ये सरकार गिरवाने वाले नजूमियों की लिस्ट में प्रथम पायदान पर कब्ज़ा जमाए बैठे हैं।

         ये अकेले ना हैं जिन्हें सरकार गिरवाने का शौक़ हो सुधीर, आकाश, रविश कुमार, अभिसार, अजित अंजुम और हां बरखा रानी भी तो हैं ये वहीं है जिसे जनता ने कोरोना काल में लाशों पर रखने वाली लड़कियों को गिनकर पत्रकारिता का धर्म निभाते देखा था वो भी टीवी पर किसी को उस चैनल का नाम याद हो तो उसकी स्मृति को नमन वो भी दूर से। जब से बीजेपी सत्ता में आई है और मोदी प्रधानमंत्री बने हैं इनके सपनों को पंख तो क्या लगते उल्टे ये  पँख विहीन हुए घूम रहे हैं । ये सारे के सारे भविष्यवक्ता बने बैठे हैं ये और बात की इनकी एक्को भविष्यवाणी सीधी न पड़ रही है उल्टे मोदी के प्रकोप से इन सगरों की आत्मा अंधेरी काल कोठरी में चमगादड़ की मानिंद उल्टी लटकी हुई है। अरे हां एक ठो नाम तो छुट ही गया वो  लखनऊ वाले 4 पीएम वाले संजय शर्मा, अगर किसी को मोदी सरकार गिरवानी हो तो बेहद सस्ते दामों पर ये और पुण्य दोनों विशेषज्ञ सरकार गिरवा देते है। सुबह, दोपहर और शाम कभी भी सरकार गिरवा सकते है। रात में गिराने के स्पेशलिस्ट है। सरकार गिराने के लिए बहुत उम्दा थीम देते है, क़यामत की रात, क़ातिल रात। कभी कभी तो लगता है पहले रामसे ब्रदर्स की हॉरर फ़िल्में लिखते थे। रामसे ब्रदर्स से ध्यान आया जब भी उनकी हॉरर फिल्म में कोई बेहद डरावन सीन आने को होता था तो तुरंत उस डर को कम करने के लिए एक मसखरा हाज़िर हो जाता था। बस कुछ ऐसा ही हाल है इन लपड़ियाओ का। 

         वैसे ये इत्ते काबिल वाले पत्रकार हैं कि अगर किसी पार्टी के पास मुख्यमंत्री का चेहरा न हो तो ये बढ़िया वाली पत्तल चाटकर आपको दूसरे दल से मुख्यमंत्री एक्सपोर्ट भी करा देते हैं लेकिन बात अगर प्रधानमंत्री बनवाने की हो तो इनके पास एक अदद  प्रधानमंत्री भी है।आप चाहें या न चाहें लेकिन ये महाशय हर पार्टी को कन्विंस करते हैं कि पार्टी आपकी हुई तो क्या हुआ प्रधानमंत्री तो ये बंदा ही बनेगा अब इस चक्कर में इंडी गठबंधन मिन्डी ठगबंधन हुआ जा रहा है। अब इन घपड़चौथ को कौन समझाए कि भारत में गांव के प्रधान का भी एक ही सपना होता है कि कुछ जुगाड़ लगे तो वो भी प्रधानमंत्री बन जाए भले ही दो दिन के लिए और केजरू महाराज तो प्रधानमंत्री पद की हवस में पंजाब तोड़कर उसका प्रधानमंत्री बनने तक का ख़्वाब पाले बैठा था।

         भाजपाई कहते हैं कि पीएम मोदी अठारह अठारह घंटे काम करते है। विपक्षी इसे तंज में देखते है लेकिन इसके पीछे का असली सच है कि पीएम मोदी पिछले ग्यारह सालों से रात को सो नहीं पाते है क्योंकि उन्हें भय है कि पुण्य प्रसून और संजय शर्मा और इन जैसे जाने कितने लपड़ झंडीस जाने कब उनकी सरकार गिरवा दें। इसी डरावनी संभावना को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आप को चौकीदार कहकर संबोधित किया था। डर सबको लगता है जनाब पर ये डर ससुरा मोदी का कुच्छो न बिगाड़ पा रिया है। अब जिससे भय भी भयभीत हो उसी को तो मोदी कहा गया है। यकीं न आए तो कोशिश करके देख लो मियां। अगर शरीर के अंग प्रत्यंग से ढाई ढाई सौ ग्राम धुंआ न निकले तो हमसे कहना।

         अब तो हालत ये हो गई है कि चंद्र बाबू नायडू और नीतीश बाबू खुदई मोदी जी को फोन करके पूछते हैं जनाब पुण्य के पुण्य कम तो नही हो गए जो एक हफ्ते बीत जाने पर भी सरकार गिरने का दावा नही कर रहा या उस 4PM वाले संजवा का क्या हुआ लगता है उसकी आँखों का तेज़ आपने घटा दिया है।  अब मोदी तो मोदी ठहरे एक कातिल मुस्कान बिखेरते हुए कहते हैं पुण्य का तो पुण्य अभी बाक़ी है पर लगता है इस सांजवा को शर्म आ गई है वैसे सांजवा को शर्म आए ऐसा नही भी हो सकता क्यूँ कि..... तभी चंद्र बाबू नायडू बीच में टोकते हुए मोदी जी को कहते होंगे जनाब आपकी जलेबी जैसी बात म्हारे पल्ले न पड़ री है। मोदी फिर ठहाका लगाते हुए कहते होंगे मैं दिमाग़ में आने वाली चीज़ हूं समझ में आने वाली नहीं।

        
प्रदीप डीएस भट्ट-
व्यंग्यकार; मेरठ 
17012026

Thursday, 8 January 2026

"मनसा वाचा कर्मणा"

रिपोर्ताज 

    "मनसा वाचा कर्मणा" 

         मनसा अर्थात मन में शुद्ध विचार उत्पन्न करें, बुरे विचार को पनपने न दें, वाचा मतलब जो भी बोले वह सत्य हो,मधुर हो। कर्मणा यानि जो भी करें उसमें ईमानदारी और निष्ठा का समावेश हो। अब आप सोच रिए होंगे इस पण्डित को आज क्या हुआ जो चुटीले अंदाज़ में रिपोर्ताज पेश करने की जगह खाली पेट प्रवचन पेल रहा है 🤔🤔🤔तो मित्रों 😝😝😝  अजी वो वाला नहीं बे जिसको सुनकर 140 करोड़ लोगों की साँसे रुकने लग जाती हैं कि बंदा आज किसकी वाट लगाने वाला है😎😎 तो भैय्या आगमन संस्था को हम सब के बीच लाने वाले स्वर्गीय पवन जैन तो अब हमारे बीच नही रहे😌 किन्तु उनसे हुए जुड़ाव को मैं आज तक अपनी स्मृति में संजोए हुए हूँ। जब वे इस लोक को छोड़कर परलोक सिधारे तब मैं हैदराबाद में posted था। प्रिय निशांत ने उनकी विरासत को सहेजने का जो उल्लेखनीय कार्य किया है जिसके लिए उन्हें साधुवाद।💓💓💓💓💓 आज सभी माल मत्ता तो लेना चाहते हैं किन्तु जहाँ बात विरासत सहेजने की बात आती है तब एक ही वाक्य धड़ाम से माथे पे आ चिपकता है। 😍😍😍अजी छोड़ो भी कैसी कैसी बातें जी करता तुम भी 😛 तो प्रिय निशांत एक बार पुनः साधुवाद स्वीकार करें।🌹🌹🌹🌹

"बात तो कुछ भी नहीं बस, बात मर्यादा की है 
कोई पल में तोड़ देता, और कोई ख़ामोश है "

         अभी हम 29 दिसम्बर को मथुरा की ठिठुरन, गलन💨💨💨💨 और कोहरे भाई साहब❄️❄️❄️ का भरपूर साथ निभाने के बाद मेरठ की धरती पर अवतरित हुए ही थे कि याद आया हमें तो अगले बरस यानि 4 जनवरी को हिन्दी भवन दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम "आगमन वैदुर्य" में अपनी उपस्थिति भी दर्ज़ करनी है। भयंकर वाले कोहरे के साथ ठण्ड ऊपर से गलन और उसके ऊपर से पछवा हवा भाई साहब कित्ती भी लेयर☃️☃️☃️☃️☃️ से तन को ढांप लो पर ठण्डी हवा पता नहीं कहाँ से घुसकर शरीर के साथ शरारत कर ही जाती है उसके बाद आप लेयर लेयर चिल्लाते रहो पर वो हवा अहमद हुसैन महमूद हुसैन की ग़ज़ल "मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा, दश्त मेरा न चमन मेरा " गुनगुनाने हुए पता नहीं कहाँ से निकल जाती है और छोड़ जाती है एक सरसराहट🌊🌫️🌫️ भरी कुछ ज्यादा ही बड़ी सी खामोशी " वो तो अच्छा है कि हम कवि बिरादरी से हैं साथ में थोड़े से लेखक और साथ में छुटभैये वाले हास्य व्यंग्यकार🤪🤪🤪🤪 जो अपनी में मस्त रहते हुए इनका प्रकोप झेल जाते हैं वरना भाई साहब 5-10 मिनिट के गीत ग़ज़ल पढ़ने के लिए कौन खादी वाली रज़ाई का दामन छोड़ता है। पर ये जो चस्का है न कविताई का बस हम कवि बिरादरी वाले ही समझ सकते हैं। कड़कड़ाती ठण्ड💧💧💧💧 में एक हाथ से कंपकंपाते माइक को थामना और दूसरे कंपकंपाते हाथ से पर्ची नुमा मोबाईल को स्क्रॉल करते हुए कविता पढ़ना मियाँ बिलकुल सरहद पर हाथ में पकड़ी हुई AK 47 के जवान सी फिलिंग होती है I जहाँ जवान गोलियां चलाकर दुश्मनों की टैं बुलवाता है हम कवि कुल के धुरंधर अपनी कविताई के शब्दों से अपने कवि दोस्तों की टांय दांय फिस्स कर देते हैं🌛🌛🌛 और हमारे कवि कुल के गुरु भी खिजते हुए अपनी बारी के इन्तेज़ार में वाह वाह वाह वाह, क्या कहने क्या कहने की रट लगाकर चेताते रहते हैं कि बेटा जल्दी माइक छोड़ो वरना माइकल को बोलकर माइक में करंट छुड़ावा देंगे I 🌞🌞🌞

         सो जनाब मथुरा में खोए हुए कविताई के पर्चों का शोक मनाते हुए एक अलग से पर्चा तैय्यार किया और जैकेट के अंदर वाली जेब में सुरक्षित रख दिया ताकि पर्चे को ठण्डी न सताए I चूँकि प्रोग्राम 3 बजे से था तो ठण्ड की कर्मठता को देखते हुए रैपिड और रैपिडो की सवारी को दूर से ही नमस्ते की और टैक्सी की गोद में बैठकर ITO स्थित हिन्दी भवन जा पहुँचे वो भी पूरमपट्ट 2 बजे। पर जे क्या "सुं सा मानस गन्ध" 💏ऊपर गए फिर नीचे आए तो रिसेप्शन के साइड में एक ठो लड़की दिखी पूछताछ की तो बताया कि सर हम सीहोर से आएं हैं थोड़ी देर में और तीन लोग फिर पूछताछ की तो पता चला तीनों महानुभाव मेरठ से,अच्छी बात जे कि ना वो हमें जानते ना हम उन्हें तो background में हेमंत दा का गाना सुनाई देने लगा। "न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जाने, मगर लगता है कुछ ऐसा मेरा हरदम मिल गया " ख़ैर धीरे लोग आते गए और कारवां न जी न मूड बनता गया। अरे भाई इक्कीसवीं सदी है कुछ तो बदलना था सो हमने कारवां को बदलकर मूड कर दिया। बाकी तुम सब अपना अपना देख लो भाई।💁‍♂️🫄

         बढ़िया वाला रिफ्रेशमेंट अगर प्रोग्राम के शुरुआत में ही मिल जाए तो भाईसाहब.... सोने पे सुहागा इसी को कह्ते हैं मियाँ। ठीक 3.20 पर कार्यक्रम शुरू हुआ और धीरे धीरे सोपान दर सोपान चढ़ने लगा। हिन्दी भवन आज खचाखच भरा हुआ नज़र आया,जितने बैठे हुए उतने ही खड़े हुए सच कहूँ हुज़ूर मजा आ गया। आमंत्रित कवियों के अतिरिक्त नवाँकुरो के लिए आयोजित प्रतियोगिता में 500 से अधिक प्रतिभागियों की संख्या ये बताने के लिए पर्याप्त है कि संस्था अपने उद्देश्य के लिए प्रतिबद्ध है।500 में से 20 का चयन फिर 20 में से अंतिम तीन का चयन करना judges के लिए निश्चित आसान नहीं रहा होगा। सब कुछ ठीक चल रहा था तभी एक 20-25 साल के छोरे ने कविता पाठ न कराने के लिए अनाप शनाप बोल दिया यहां तक तो ठीक था फिर ये कहना कि साहित्यकार का अपमान हुआ है मैं चौंक पड़ा और फिर हमने उसे खोपचे में ले जाकर समझाया भई अपनी उम्र देख,बात करने का लहजा देख ,कविता का तो पता नहीं लेकिन तुम्हारी ये बेजा हरकत🥷🥷 बता रही है तुम....  अजी चलो हम अपनी ग़ज़ल का शेर ठोक दिए रहे हैं :-

"तुम ख़ुद से बेज़ार हुए से लगते हो 
 एक बासी अख़बार हुए से लगते हो 
कड़वे बोल कलेजा चीर के जाते हैं 
तुम चाकू की धार हुए से लगते हो "

         अभी इस पहलवान से निपटे ही थे कि एक कुछ कुछ सीनियर सिटिजन से लगने वाले हुज़ूर ए आला ने न जाने किस कारण सम्मान पत्र जमीन पे दे मारा और पता नहीं क्या क्या बड़बड़ाते हुए बाहर की ओर कट लिए। उर्ववी उदल जी अच्छी प्रस्तुति के बाद राजरानी भल्ला की बेहतरीन विशुद्ध हास्य😁😁😁😁😁 कविता ने ये सोचने पर विवश कर दिया कि लोग नाहक सड़ी हुई हास्य कविता सुनने के लिए क्यूँ विवश हों। हमने एक गहरी श्वांस ली ही थी कि हमारी बारी आ गई हमने जैकेट की जेब में हाथ डालकर पर्ची निकाली पर जे क्या ये तो खोई हुई पर्चियां सच कै रिया हूँ जोर का झटका कुछ ज्यादा ही जोर से लगा😈😈😈😈। अब ये चमत्कार कैसे हुआ इसपे चर्चा खर्चा बाद में सो भैय्या जो पढ़ा है तुम भी देख लो :

बीते साल की बातें करके क्या होगा 
हम अच्छे तो साल नया अच्छा होगा 
सुख दुःख क्या हैं एक सिक्के के दो पहलू 
आग लगेगी और फिर कहीं धुंआ होगा 
औषध सारी फेल हुए सुन चारागर 
'दीप' हुआ अच्छा तो असर दुआ होगा 

         लो जी भैंस फिर गई पानी ने एक मोहतरमा ने कविता पढ़ी निश्चित वो वर्तमान सरकार पर तंग करने का प्रयास कर रही थीं। कविता में सब कुछ सहने लायक था सिर्फ़ अंतिम पंक्ति को छोड़कर।महिलाओं की तीन पीढ़ियां वहाँ बैठी थीं वो हत्थे से उखड़ गई हमने समझाया और बताया कि यहीं हिन्दी भवन में 30 जून 2024 को जब हमारी पुस्तक "उर नाद" का लोकार्पण हुआ था तब एक सज्जन ने मर्यादा भूलकर हिन्दू मुस्लिम और धर्म पर टिप्पणी करने लगे तो लोग बहुत ज्यादा उग्र😡😡😡😡 हो गए थे तब उन्हें जैसे तैसे बाहर का रास्ता दिखाया गया था अच्छा ये था कि आज महिला ने कविता पढ़ी थी सो प्रोग्राम समापन के बाद वे तीनों भद्र महिलाएं उन कवित्रियी से फिर विरोध दर्ज कराने पहुँच गई चूँकि हम भी वहीं थे सो हमने धर्म और कर्म पर प्रवचन दे डाले पर भैय्या प्रवचन सुनता कौन है जी जो हमारी सुनता। मेरा विरोध भी अन्तिम पंक्तियाँ को लेकर ही रहा। जिन पँक्तियाँ पर राहुल गाँधी को सुप्रीम कोर्ट से माफ़ी माँगनी पड़ी हो उन पन्क्तियों को पढ़ने से बचना चाहिए।सत्ता का विरोध शालीनता के साथ भी किया जा सकता है हर समय आक्रमकता उचित नहीं। अगर अब भी बात समझ में न आए तो दुष्यंत को पढ़ लें देवी। 🙏🙏🙏🙏

         सर्दी फिर कुलबुलाने लगी थी तभी तूलिका सेठ ने कहा पति देव साथ हैं चलिए आपको गाजियाबाद रैपिड तक डॉप कर देते हैं ।भाई साहब इससे अच्छा क्या हो सकता था सो लपक लिए उनके पीछे नीचे और लो जी नीचे वही कुछ कुछ सीनियर सिटीजन अपनी दो बेटियों के साथ मिल गए हमें देखते ही बोले मैं गुस्सा नहीं करता हूँ पर पता नहीं कैसे आज.... मैंने उनके दोनों हाथ पकड़कर इतना ही कहा क्षमा मांग लें जनाब फिर दोनों लड़कियों से कहा पापा को कॉल्ड वाली कॉफ़ी पिलाओ हमारी तरफ़ से बिल अगले प्रोग्राम में हम देंगे। फिर छलांग लगाकर सेठ साहब की गाड़ी में।अब जब कवियित्री और कवि एक गाड़ी में हों तो भाई साहब सेठ साहब सोच रिए होंगे अबके तो दी आगे न दूँगा लिफ्ट कभी किसी कवि को। 😺😺😺😺😺

प्रदीप डीएस भट्ट-11012026

Tuesday, 6 January 2026

"रुसवा जी काहे रुसवा हो गए हमस"े

रिपोर्ताज 

😅😅😅रुसवा जी काहे रुसवा हुए हमसे 🤣🤣

"बीते साल की बातें करके क्या होगा 
 हम अच्छे तो साल नया अच्छा होगा" 

         तो हुआ यूं के सितम्बर के तृतीय सप्ताह में कोठारी दादा से बात हुई और लो जी हमने तुरन्त फोन पर ही बड़ी वाली मुंडी हिलाकर आंदोत्सव - 2025 के लिए स्वीकृति भी दे दी ये तो बाद में पता चला साहिब कि जे उत्सव तो दिसम्बर में है पर कोई गल्ल नी जी,  क़ीमत ज़ुबान की है जनाब और आजकल क़ीमत का तो पता नी पर ज़ुबान फरियाने का चलन बहुत जोर पर है😛😛😛😛। अन्तिम सप्ताह में फिर एक फोन कि 23,24,25 दिसम्बर "लेखक गांव" देहरादून में उपस्थिति चाहिए हमने बड़ी वाली विनम्रता से फिर बड़ी वाली मुंडी हिलाकर हाथ जोड़ लिए अभी सांस पूरी तरह आई भी न थी कि लखनऊ से प्रिय सौम्या मिश्रा ने सूचना दी कि दादा "काला हंस" को "साहित्य सरस्वती सम्मान" के लिए चुना गया साथ में 3100/- रोकड़ा भी😝😝😝😝। बालक को धन्यवाद दिया लेकिन तिथि फिर वही 27,28 दिसंबर वो भी गंगा मैय्या के किनारे यानी कि हरि के द्वार। भाई साहब फिर चुपचाप हाथ जोड़कर क्षमा मांग ली अब जे तो सम्भव न है न कि मैं आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का प्रयोग कर दुई तीन जगह एक साथ उपस्थित होकर बत्तीसी दिखा सकूँ 😻😻😻। 

         सो भैय्या 25 दिसम्बर को भरे कोहरे में ऐड़ी से चोटी तक कपड़ों से लदे फंदे मेरठ से हरीगढ़ और हरिगढ़ से मथुरा के बस के सफ़र में आनंदोत्सव के ख्वाबों ख्यालों में गुम ठीक 3.15 मथुरा के नए बस अड्डे वहां से मोलभाव कर अस्सी रूपये में ई रिक्शा ली जिसे पुलिस ने चेकिंग के नाम पर सीज कर दिया। पुलिस ने दूसरा ई रिक्शा करवा दिया लेकिन आधा किलोमीटर के बाद उसकी बैटरी भी टैं बोल गई । खैर दस के चार पानी पूरी का स्वाद लिया और फिर पांच रूपये देकर गोवर्धन चौक फिर पांच देकर खंडेलवाल सेवा सदन जा पहुंचे। हरिगढ़ तक जहां सर्दी का प्रकोप झेला वहीं मथुरा में जैकेटवा भी उतारनी पड़ेगी धूप थी ही इत्ती तेज़।

         अंदर के गेट पर हमें देखते ही पता नी कौन था भाई साहब शायद कवियों से उसका छत्तीस का आंकड़ा रहा होगा 🤠🤠🤠 ऊपर से नीचे तक बड़े गौर से ऐसे देखा जैसे एक्सरे करके जानना चाह रहा हो कि हमने कित्ती कविताओं की पसलियाँ तोड़ी हों बोले कवि हो, कविता पढ़ने आए हो हमने जैसे ही मुंडी हिलाई बंदे ने 🛗 लिफ्ट की तरफ़ इशारा किया और बोले दूसरी मंज़िल पहुंचो । लो जी हम लदे फदे पहुंचे और प्रिय विश्वजीत को मोबलिया घुमा दिया। इससे पहले कि प्रिय विश्वजीत कुछ कहें हमने गाना गुनगुना दिया "मैं हूं हसीना खोल दरवाज़ा दिल का आ गया दीवाना तेरा" सामने का दरवज्जा झट से खुला और प्रिय विश्वजीत और साथ में दत्ता जोग एक के ऊपर एक फ्री की तरह दूसरे गाने की पंक्ति गाते हुए बाहर "आइए आपका था हमें इंतज़ार आना था आ गए, कैसे नही आते सरकार। अब बेकार को कोई सरकार कह दे तो पपीते के झाड़ पर चढ़ने का मन कर ही आता है।🤣🤓🤣🤓। खैर रुम नम्बर 205 में डेरा जमा दिया। शाम को कोठारी दादा से मुलाकात हुई वही व्हाइट पेंट और बढ़िया वाली टीशर्ट मतबल ये कि हरिद्वार की तरह यहां भी सर्दी मैय्या को पूरा कॉम्प्लेक्स देने की तैयारी 🫣🫣 अब चूंकि दिन में लंच नहीं लिया तो रात में डिनर वो भी घर जैसा 🤞🏻 जय हो कोठारी दादा। तुसी ग्रेट हो सच्ची!

         अगले दिन यानि 26 दिसम्बर को लोग आते गए और कारवां बढ़ता गया। शाम को मधु पारख, सन्तोष संप्रति with sister और कृष्णा पुरोहित उर्फ़ छोटी बहु के साथ प्रेम मंदिर वहां भीड़ को देखते हुए इतना ही " संसार की इक शय का इतना ही फ़साना है इक भीड़ में आना है इक भीड़ में जाना है"। अब हम तो हम ठहरे जैसे तैसे उस भीड़ में घुसे भी और बाहर भी आ गए पर भाई साहब सच्ची सच्ची कै रिया हूं, भगवान के दर्शन तब करो जब तुम भी फुर्सत में हो और ऊपर वाला भी। वापिसी में ई रिक्शा ने इत्ते झटके दिए कि चूल तक हिल गई। तकलीफ़ में अच्छा बुरा सब याद आता है जी हमने मन मंदिर में प्रेम मंदिर को याद किया और पूछा जे क्या प्रभु दर्शन तो दिए नही चूल हिला दी अलग से। तभी चूल से आवाज़ आई बेटा सब कर्मों का फल है कल ई रिक्शा वाले के अस्सी रूपये मारे थे न याद है। वो तो बेचारा पुलिस के चक्कर में उलझा था तुम जल्दी जल्दी में ही सही उसके पैसे मार बैठे अब भुगतो हमने हाथ जोड़े प्रभु आपका इंसाफ़ कुछ ज़्यादा ही फास्ट न है हाँ नई तो 😹😹😹😹। हम कुछ कहते इससे पहले ही ई रिक्शा ने फिर चूल हिला दी🤕🤕🤕🤕

         27, 28 दिसम्बर में कविताओं, गीतों गज़लों की जो गंग धार बही है उससे मन तृप्त हो गया जो इससे अछूता रहा निश्चित उसके लिए यही कि भैय्या खंडेलवाल सदन में काव्यांजलि की गंगा स्वयं प्रकट हुई और श्रुति श्रोताओं को अपने रस से सराबोर कर दिया और तुमने हाथ मुंह भी नही धोए तो निश्चित मानो तुम्हारी क़िस्मत का ज्योग्राफिया ही बिगड़ा हुआ है। अनुज विश्वजीत ने सूचित किया कि 28 को प्रथम सत्र का संचालन आपके जिम्मे हमने बताया देखो डियर हम संचालन 2007 में ही छोड़ दिए हैं तो उन्होंने तुरन्त ब्रह्मास्त्र चला दिया, दादा आपके लिए कोठारी दादा का आदेश है अब कर लो क्या करो। खैर दादा का आदेश सो तैयारी की तो रात के दो बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई देखा विश्वजीत हाज़िर है किसी के साथ सीधे सीधे बोल दिया दादा इन्हें एडजस्ट करें फिर हमारे कान में बताया कि कोई मोहतरमा एंकरिंग न देने से नाराज़ हैं हमने अधमिची आंखों से तुरन्त सहमति दे दी और हम खिसक कर अन्तिम सत्र में पहुंच गए। 

         प्रिय शिल्पी जो हमारी हैदराबादी धर्म बहन हैं के साथ एक विशेष कार्य हेतु फतेहपुर सीकरी जाने का काम सुगम तरीके से निपटाया और फिर अंतिम सत्र में आदरणीय अजीत दादा, आदरणीय कोठारी दादा, आदरणीय ज्योति नारायण जी, मधु पारख,अजय श्रीवास्तव मदहोश, संचालन रुसवा जी ने संभाला, हमने जो पढ़ने की तैयारी की थी उन पर्चों को किसी की नज़र लग गई पता नहीं कहाँ  लापता हो गए ख़ैर प्लान बी के सहारे नैया पार की लेकिन रुसवा जी हमें सिर्फ़ दस मिनिट जे अच्छी बात ना है जी I किसकी शरारत थी इसमें  रुसवा जी, काहे रुसवा हो गए हमसे रुसवा जी I ख़ैर येन केन प्रकारेण अन्तिम सत्र जानदार शानदार तरीके से अपने चरम तक पहुंचा। फिर उसके बाद राष्ट्रगान और थोड़ी से कुछ ज्यादा धमाचौकड़ी के साथ दिल्ली मिलन की आशाओं के पंखों पर सवार होकर अगले दिन अपने अपने घोंसलों के लिए प्रस्थान। पहले दिन जहां सब इस बात पर परेशान थे कि इत्ते सारे गर्म कपड़े लेकर क्यूँ आए जब कि मथुरा में ठंड अजी जुल्म है ज़ुल्म कर रहे थे 28,29 के कोहरे के साथ शीत लहर ने जता दिया बेटे जो लाए हो पहन लो वरना..... आगे तो हम सभी समझदार हैं न जी 🤧🤧🤧🤧🤧🤧🤧

विशेष: केवल काव्य परिवार की टीम जिसे केवल दादा और खंडेलवाल जी ने लीड किया, अनुज विश्वजीत, दया शंकर मिश्र ,दत्ता प्रसाद जोग और अजय श्रीवास्तव ने पूरे कार्यक्रम को अपने मजबूत कंधों से संबल प्रदान किया। पुनीत अग्रवाल जी ने जहां संस्था के रजिस्ट्रेशन की जानकारी साझा की वहीं उनकी पत्नी व बिटिया ने बेहतरीन KKP गीत प्रस्तुत किया जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। लखनऊ से मेरे अग्रज मजुमदार दादा के तो क्या कहने उनकी फुलझडियां उजाले में अलग रंग भर देती हैं।अब आप पूछोगे अबे तुमने क्या किया तो भैय्या अपना पुराने वाला काम ठूस ठूस के खाया और पूरे घटनाक्रम को शब्दों में पिरोना जे काम क्या कम समझ रिए हो मियां🙆‍♂️😹🤠🤓🤓🤓😝😝😝😝😊😛। कहो कैसी रही।

प्रदीप डीएस भट्ट ---06012026

Sunday, 21 December 2025

अंग्रेज़ी साहित्य 400/ per KG

रिपोर्ताज 

        " अँग्रेजी साहित्य 400/- per KG "

         उत्तर भारत में ठण्ड के प्रकोप के बीच कंबल का बुक्कल मार कर घूमते हुए अचानक फ़ेसबुक पर फ़्लैश होती खबर कि होटल सम्राट हैवंस,मेरठ में 19,20,21 दिसम्बर में तीन दिनी पुस्तक प्रदर्शनी है ।हमने भी सोचा दिल्ली में तो विश्व पुस्तक मेला 10 जनवरी से 18 जनवरी तक आयोजित होना है तो क्यूँ न एक दिन मेरठ की पुस्तक प्रदर्शनी को भी अपने दर्शनी दे ही आवें क्या पता कुछ हमारे मतबल का भी हो सो भैय्या कल बढ़िया से तैय्यार हुए और जा पहुँचे 🏨 सम्राट हैवंस।


         अभी अपनी स्कूटी को ठीक से खड़ा भी नहीं किया था कि निगाह पड़ी शकरकंदी का ठेला लगाए हुए चचा पर जो बड़े जतन से ठेले को व्यवस्थित कर रहे थे।पेट भरा हुआ था पर ससुरी नीयत का क्या करें। ठेले पर अंगार में भुनती हुई शकरकंदी पर हमने भी सोचा प्रदीप बाबू प्रदर्शनी तो बाद में भी देखी जाएगी पहले एक ठो प्लेट शकरकंदी का मजा ले लिया जाए सो महराज भैय्या धनिये की चटनी में लिपटी हुई भुनी हुई शकरकंदी के टुकड़े और उस पर घर का बना मसाला बुरकते हुए हाथ बस चटखारे लेकर खाते हुए असली वाला आनन्द आ गया।

        शकरकंदी के स्वाद का मजा लेते हुए जा पहुँचे पुस्तक प्रदर्शनी में शुरुआत में हिन्दी की पुस्तकों ने स्वागत किया दूसरी पँक्ति में अँग्रेजी की पुस्तकें 400/- per KG, भाई साहब देखते ही दिमाग़ चकरघिन्नी खा गया। आगे बढ़ा तो यही हाल गनीमत रही कि ये क़हर हिन्दी पुस्तकों पर लागू नहीं था। कुल 14 पन्क्तियों में सजी हुई पुस्तकों में से 8 में अँग्रेजी पुस्तकों पर यही टैग 400/-पर KG. शुक्र है शेष 4 में हिन्दी पुस्तकों पर 30 प्रतिशत छुट का टैग था। सच कै रिया हूँ संतोष तो था लेकिन भले ही अँग्रेजी पुस्तकों पर ही 400/- पर KG का टैग देख कर कुछ अच्छा नहीं लगा।

        अच्छी बात ये रही कि पुस्तक प्रदर्शनी की शुरुआत में रखी पुस्तक "बेगम का तकिया" जिसके लेखक पंडित आनंद कुमार हैं। बेसाख्ता मुझे आकाशवाणी से हवामहल में प्रसारित इसका नाट्य रूपांतरण सुनने का मौका मिला है। इसमें दो भाइयों के मध्य एक संवाद है I 
पहला:एक बात कहना चाहता हूँ 
दूसरा: बोलो 
पहला:तो दूसरी बात ये है 
पहला: अरे पहले पहली तो कह 

        ख़ैर बेगम का तकिया के अतिरिक्त जॉन एलिया की "यानी"  मोमिन, जॉक, मंटो की लोकप्रिय कहानियाँ के दो पार्ट ख़रीद लिए सच कह रहा हूँ मन को बड़ा संतोष मिला। ज्यादा कुछ था भी नही देखने और समझने को,पुस्तकें भी लिमिटेड और खरीदने वाले भी सो ये सोचकर बाहर आ गये कि 20 दिन बाद अगला पड़ाव विश्व पुस्तक मेला होगा अगले बरस 2026 में क्यूँ ठीक कै रिया हूँ न।

-प्रदीप डीएसभट्ट-21122025

Friday, 12 December 2025

भौं-- भौं भौं-- भौं

भौं --भौं भौं-- भौं 

         अभी हमने अंगड़ाई लेते हुए सुबह की चाय को होठों से छुआ ही था कि हमारे प्यारे मित्र लमन्डेस जी आ धमके। राम राम के बाद बोले गुरु वो है न रेणुका चौधरी? हमने अधमिची आंखों से उंघते हुए पूछा कौन रेणुका चौधरी बे तो वो एक दम से तैश में आ गए फिर बिफरते हुए बोले अरे वही रेणुका चौधरी जिसकी हंसी सुनकर मोदी जी ने स्पीकर को कहा था जनाब इनकी हंसी सुनकर रामायण की एक पात्र की याद ताज़ा हो गई। अब भैय्या रामायण में बड़े बड़े करेक्टर हुए हैं लेकिन लेकिन लेकिन हंसी तो ताड़का ताई की ही फेमस थी शायद प्रधान सेवक का इशारा उसी ओर था खैर जैसे ही लमन्डेस जी ने रामायण का ज़िक्र किया हमारे चक्षु बिना चाय पिए ही बड़मंटे से खुल गए। हम सीधे होते हुए बोले क्या हुआ लमन्डेस तनिक जल्दी बताओ और हां पहले ये बतावा अपनी प्यारी भौजाई लम्न्डिरी कैसी हैं।  लमन्डेस जी सुनते ही बिदक गए अरे यार हम यहाँ सस्पेंसफुल ख़बर देने आए हैं तुमको और तुम हो कि हुड़कचूल्लू की तरह लमनडीरी के पीछे पड़े हो। अबे हम अगर यहां है तो वो भी अच्छे से होगी ही वो भी अपने घर में टांग पे टांग चढ़ाए। हमने तुरत हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी तब जाकर  लमन्डेस जी शांत हुए। फिर एकदम दार्शनिक अंदाज़ में बोले अबे कल रेणुका चौधरी उर्फ़..... अपनी गाड़ी में पति को न लाकर एक ठो आवारा कुत्ते को लेकर आई। पत्रकारों ने पूछा तो जवाब में भौं -- भौं भौं --भौं बोलकर लोकसभा में घुस गई। एक बात पल्ले न पड़ी वो आवारा कुत्ता गाड़ी की ठंडी हवा में इतना मस्त क्यूँ था कि भौंकना ही भूल गया वो आवारा था या पालतू खैर लौटते हुए पत्रकारों ने फिर टोका तो बोली संसद में भी तो हैं अब भैय्या पता नही वो अपनी पार्टी के माननीयों के लिए बोल रही थीं या.. आगे की बात लमन्डेस जी ने भी अधूरी प्रेम कहानी की तरह हवा में ही अधूरी छोड़ दी।

         बाक़ी सब बातें तो हमने बिना डकार लिए हज़म कर लीं लेकिन कुत्ता भौंका नही बस अपने सोचने की सुईं यहीं पे आकर अटक गई। हमने ध्यान से लमन्डेस जी को देखा फिर पूछा कुत्ता देखने में कैसा था। लमन्डेस जी ने अपनी आधी मुंडी हवा में आसमान की ओर की मतबल वो जताना चाह रहे थे कि उनके सोचने में भगवान जी के सैटेलाइट का हाथ हो फ़िर खोपड़िया पर अपनी उंगलियों से तबला बजाते हुए बोले बस छोटे से कद का होगा भूरे रंग का, माथे पे सफ़ेद सी लकीर थी और भी कुछ था पर याद नही बस इतना याद है कुत्ता भौंका पता नहीं क्यूँ पर ससुरा भौंका नही गुरु। कुत्ता दो काम ज़रूर करता है टांग उठाकर मूतेगा भी और भौंकेगा भी काटे न काटे ये उसकी मर्ज़ी या यूं कह लो गुरु कंडीशन अप्लाई। हमने अपनी बरबंटे जैसी आंखों को थोड़ा और चौड़ा किया फिर लमन्डेस से बोले सुनो बे हम आज तुम्हें कुत्ते की एक ऐसी प्रजाति के बारे में ज्ञान देंगे जिसे आज तक किसी ने किसी को न तो दिया और आगे भी न देगा। लमन्डेस थोड़ा और नज़दीक को खिसक कर बैठ गया फिर बोला जैसा भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था कुरुक्षेत्र में कुछ वैसा वाला गुरु। हमने न में मुंडी हिलाई तो लमन्डेस हल्के से गुर्राते हुए बोला अबे सीधे सीधे बोलो हमें बेकार में ज्ञान मत पेलो बे हम बनारस से हैं दूसरों को ज्ञान पेलते हैं। हमने लमन्डेस को घुरकर देखा फिर बोले अफ्रीका में बेसेंजी प्रजाति बार्कलेस डॉग यानि बिना भौंकने वाला कुत्ता पाया जाता है। उसके न भौंकने का कारण जानते हो उसके गले की संरचना यानी लेरिंक्स सामान्य कुत्तों से अलग होती है यानि थोड़ी पतली और चपटी बस यही कारण है वो जोर से भौं भौं नहीं कर पाता। बेसेंजी अलग तरह की आवाज़ निकालता है जिसे योडल या बरु कहते हैं। ये कुछ ज्यादा तेज़ और फुर्तीला होता है। शिकारियों के लिए बेमिसाल कुत्ता, शिकार देखकर यूडली यूडली करता है जिससे शिकार को पंछी होने का भ्रम हो जाता है। बेसेंजी अपने मालिक से प्यार तो करता है लेकिन हर वक्त उसके नाम की माला नहीं जपता जहां कोई यूडली दिखाई दी तुरन्त दुड़की लगा लेता है आख़िर आज़ादी भी कोई चीज़ होती है भाई साहब। लमन्डेस ने व्यंग्यात्मक लहज़े में पूछा और कोई खासियत हो तो भी बतावें हुज़ूर। हमने दोनों हाथ सर के पीछे करते हुए ज्ञान की आखिरी पंक्ति भी मुखारबिंद से उड़ेल दी। देखो मियां ये बहुत बड़े वाला सफ़ाई पसंद कुत्ता है यानि स्वच्छ भारत अभियान का छोटे वाला ब्रांड एंबेसेडर। 

          लमन्डेस जी बिफरते हुए बोले अरे यार हम रेणुका चौधरी द्वारा लाए कुत्ते की बात कर रहें हैं और तुम हो कि कुत्ता ज्ञान बघारे जा रहे हो। हमने वक्त की नब्ज़ पकड़ी और कमर को सीधा करते हुए बोले देखो लमन्डेस मियां तुम्हें वो अतिकवा याद है न इलाहाबाद का गुंडा हां वही जिसके घर नेता जी यानि मुल्ला मुलायम गए तो सार्वजनिक तौर पर अतिकवा के कुत्ते से हाथ मिलाया ताकि अतिकवा से दोस्ती बनी रहे, दोस्ती बनी रहेगी तो मुस्लिम वोट बने रहेंगे और ये दोनों बने रहेंगे तो नोट तो खुदई बने रहेंगे न और उन नोटों पर नमाजवादी का कब्ज़ा। इसलिए कुत्तों से प्यार करो फिर जो चाहोगे मिलेगा। इससे पहले कि लमन्डेस हमारे ज्ञान के बीच में फिर अपना ज्ञान बघारते हमने ज़रा रुको का इशारा करते हुए एक खट्टी डकार ली जिससे लमन्डेस और हम ख़ुद भी थोड़ा अटपटा गए लेकिन चारपाई से उतरकर गुजरे जमाने की आराम कुर्सी पर पसरते हुए शुरू हो गए।

         देखो मियां लमन्डेस कुत्तों से प्यार करना तो पाप न है लेकिन हर जीव जंतु की अपनी जगह होती है। पहली रोटी गाय की और आखिरी रोटी कुत्ते की ही क्यूँ बनती है सोचा है कभी? लमन्डेस बोले सुने हैं बे वो भी बचपन से पचपन तक। हमने लमन्डेस की ओर आँखें घूमाते हुए पूछा जाने कितनी तस्वीरें इंद्रजाल पर मौजूद हैं जहां राहुल गाँधी विभिन्न मुद्राओं में कुत्ते के साथ फुटवा में मौजूद हैं। करनाल में भारत जोड़ो यात्रा में सफ़ेद रंग का श्वान उनके साथ साथ चल रहा था मजे कि बात पट्टा कुत्ते के गले में और चेन राहुल के हाथ में।
अगर कोई पत्रकार उस धौले रंग वाले कुत्ते का इंटरव्यू ले लेता तो निश्चित वो कुत्ता बड़ी शान से कहता अगर मैं न साथ चलूं तो भारत जोड़ो यात्रा भारत तोड़ो यात्रा में तब्दील हो जाती। अब भैय्या अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर राहुल गाँधी ने सेना के कुत्तों के साथ योग करते हुए तस्वीर पोस्ट की थी तब सच बता रिया हूं सेना के कुत्तों ने राहुल को कॉम्प्लेक्स दे दिया था। और तो और राहुल का पर्सनल कुत्ता जिसका नाम pidi पीडी है से घने से अच्छा वाला प्रेम करते हैं।  शायद ये गुण उनको उनकी चाची से मिला है वो भी 🐕 प्रेमी हैं। लमन्डेस जी रोकते हुए बोले ये तो ठीक है लेकिन वो किस्सा याद है न जहां कांग्रेसी राहुल के घर मीटिंग में व्यस्त हैं और राहुल का प्रिय pidi भी एक कुर्सी पर विराजमान है। भाई साहब कुछ भी कहो राहुल की निगाह में सब एक समान है फिर वो pidi कुत्ता हो या कॉन्ग्रेसी। जिस प्लेट से राहुल pidi को बिस्कुट खिला रहे हैं उसी प्लेट से कांग्रेसी भी बड़े चाव से बिस्किट गटक रहे हैं, मज़बूरी है लेकिन क्या करें राहुल बाबा नाराज़ हो गए तो न प्लेट नसीब होगी न बिस्किट। बस एक नासमझ कांग्रेसी उस मीटिंग में था वो क्या नाम है उसका हेमंत बिस्वा शर्मा। कित्ता नासमझ है शर्मा बताओ जी ज़मीर न बेचकर भाजपा की तरफ़ दुड़की लगा दी। भाई खा लेते pidi की प्लेट से एक बिस्कुट कम से कम आज मजे से ठाली रहता घर में और यहाँ वहां घूमकर राहुल को कोसता कि भैय्या हम भी जवान और राहुल भी जवान लेकिन दोनों को कुछ न मिला काम। अब कोई पूछे उस हेमंतवा से भाजपा में जाकर क्या मिला उसे कुछ भी तो नहीं, बस असम का मुख्यमंत्री और पूरे पूरा नॉर्थ ईस्ट का इंचार्ज और हां मां के साथ भारत मां भी सेवा कर रहा है। भले ही हेमन्ता ने कांग्रेस छोड़ दिया लेकिन इससे कांग्रेस के कुत्ता-नेता साम्य भाव पर कुछ फ़र्क पड़ा क्या कुछो भी तो फ़र्क नहीं पड़ा। 

         जहां तक राहुल गाँधी की इस टिप्पणी का प्रश्न है कि संसद के अंदर भी पालतू बैठे हैं तो भाजपा को इसमें कतई बुरा नहीं मानना चाहिए। शायद वो भी तो अपने सांसदों के बारे मे बता रहे थे या उन्हें शब्दों के बूस्ट से नहला रहे थे। और भाई साहब जहां तक रेणुका चौधरी की बात है कि वे संसद के प्रांगण में कुत्ता लेकर क्यूँ आईं तो सोचो भाई उन्होंने एक संदेश दिया है कांग्रेस साफ़ दिल की पार्टी है वो सांसदों और कुत्तों में तनिक भी भेदभाव नहीं करती हो सकता है बंगाल चुनाव में कॉन्ग्रेस किसी देसी विदेशी नस्ल के कुत्ते को खड़ा कर दे और कोई बड़ी बात नही कि वो कुत्ता एम एल ए भी बन जाए और क़िस्मत ठीक रही तो मंत्री भी। अब इससे एक पंथ दो काज हो गए न जीवों पर दया भी, चुनाव में जीत भी और भैय्या परिवारवाद का आरोप भी गायब। हो तो ये भी सकता है कि वे उस कुत्ते को कांग्रेस की सदस्यता दिलवाने लाई हों, क्योंकि वोट चोरी के मुद्दे तो फ्लॉप हो गए फिर भी कॉन्ग्रेस है कि वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा लगातार हफ़्ते भर कढ़ाई में पड़े हुए सडेले रिफाइंड में इस नारे से दस बीस भटूरे और तल लेना चाहती हो लेकिन उन भट्टूरों को जनता क्या ख़ुद उनकी पार्टी के नेता भी सूंघने को भी तैयार नहीं। और मैं तो नू कै रिया हूं कि लोकसभा राज्य सभा में जितने भी कांग्रेसी हैं सब 19 दिसंबर से पहले एक एक देसी या विदेशी कुत्ता संसद प्रांगड़ में लाकर कुत्ता जिंदाबाद का नारा लगवा दें इसी बहाने राहुल गाँधी को ख़ुश करने का मौक़ा भी मिल जाएगा और हो सकता है इसी बहाने राहुल गाँधी कुत्तों के लोकतंत्रिक अधिकार की लड़ाई लड़ने वाले वड़े वाले नेता बन जाएं। वे कुत्तों को वोटिंग का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कांग्रेस के नेताओं से अधिक वफादार कुत्ते ही होते हैं। 

         लमन्डेस जी ने शायद इससे पहले इत्ता कुत्तों पर इत्ता सारा ज्ञान आज तक लपेटा न था सो वो औकते हुए उठे और मेरे द्वारा दिए गए दिव्य ज्ञान को वॉश बेसन में उल्टियाए। अलप सलप करके लमन्डेस जी फिर बाजू में आ बैठे और लगे हमारे कुत्तई ज्ञान की प्रशंसा करने। हमने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया तो बोले गुरु ये रेणुका चौधरी का गली का आवारा सा कुत्ता बढ़िया वाली बड़ी सी गाड़ी में! साले ने क्या क़िस्मत पाई है सच कै रिया हूं हम तो बस सोचने के लिए बने हैं एसी गाड़ी में तो कुत्ते पहले से घूम रहे हैं लेकिन लोकसभा का प्रांगण न न न। हम साले चालीस साल से दिल्ली में झक मरा रिए है बस टी वी पर लोकसभा देखकर खुश हो रहे हैं और एक ये है आवारा गली का कुत्ता जिसकी किस्मत का ताला रेणुका ताई ने खोल दिया। चलो आज संध्या वंदन में भगवान जी से अगले जनम मुझे कुत्ता बनाईयो की गुहार लगाते हैं वैसे गुरु तुम्हारी ज्ञान गंगा भी गज़ब की है तभी तो हम तुम्हें अपना बड़े वाला गुरु मानते हैं लेकिन एक बात तो बताओ तुम कुत्तों पे इत्ता ज्ञान कहां से पाए हो बे कहीं तुम पिछले जन्म में......... आगे के शब्द लमन्डेस जी ने हवा में फिर तैरने के लिए छोड़ दिए। 

प्रदीप भट्ट 
व्यंग्यकार, मेरठ