Tuesday, 10 February 2026

रिपोर्ताज 

"चरसी यार किसके दम लगाए खिसके"

         न न न आप ग़लती से गलत सोच रिये हो मियां। ये जो कहावतें है न हमारे जीवन में ऐसे रच बस गई हैं जैसे कि आटे में नमक या पानी। अब भैय्या रोटी खानी हैं तो पहले गेंहू पीसो फिर आटा गूंथो तब रोटियां खाने को मिलती है। कहने का लब्बोलुआब ये है कि हर घर में कहावतें कहने वाला कोई न कोई दादा दादी, नाना नानी मिल ही जाएगा जो बच्चों को कहावतों के माध्यम से जीवन का दर्शन समझाने की कोशिश करता है। पर ये पुनीत कार्य करने वाले हमारे बड़े भी निपट से लिए हैं या निपटने वालों की कतार में खाट डालकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं क्यूँ कि अब सब कुछ मुबलिया में जो सिमट कर रह गया है। अब जिस जेन जी को उन्हतर (६९-69) उन्नासी(७९-79) और नवासी (८९-89) का न पता है वो कहावतें क्या ख़ाक समझेंगे जी। ख़ैर हम खुशनसीब हैं कि हमारे पास भी अनुभव से लबाबल भरी हुई हमारी 83 बसंत देख चुकी और 84 वें बसंत की ओर अग्रसर हमारी प्यारी वाली अम्मा है जिनके पास कहावतों का खज़ाना है इसलिए मैं उन्हें सन्तोष भट्ट उर्फ़ कहावती देवी कहता हूं तो वो प्यार से झिड़क देती हैं, भई उन्हें कित्ती कहावतें ये तो उन्हें भी न पता बस मौक़ा मिल जाए बात से बात बात निकलते ही तुरन्त ताज़ी ताज़ी कहावत ठोक देती हैं। कुछ तो ऐसी हैं भाई साहब जिन्हें समझने में हमें भी पसीने छूट जावें हैं जी। अच्छी वाली बात ये है कि उनका जन्म 9अगस्त -1942 का है और हमारा 27 फ़रवरी (देखा हम kitteee 🤓 स्मार्ट हैं अपना अवतरण दिवस बता दिया है दोस्तों खाली शुभकामनाएं मति देना कछु गिफ्ट विफ़ट भी भिजवाओ भाई साहब) यानि हम अपनी मां के बेटे पक्के वाले 9 नम्बरी बेटा हैं। इसलिए उनकी कहावत कहने की कला हममें आनी स्वाभाविक प्रक्रिया का अंग है सो ये कला हमें भी आ गई है। आख़िर हमारे पास मां भी है और ढेर सारी कहावतें अलग से सो असर तो आना ही है। सो ऊपर जो कहावत हमने कोट की है ये उन्होंने ही हमें कभी सुनाई होगी बस इस बार का रिपोर्ताज लिखने बैठा तो रिपोर्ताज का यही विषय ठीक लगा। अब जिसे पसन्द आए तो ठीक नहीं तो अपने हिसाब से एडजस्ट कर लो  भाई म्हारे पास और भी काम हैं जी।

         सो हुआ यूँ कि जब हमें आदरणीय गोविन्द गुलशन जी की तबियत नासाज़ होने का समाचार मिला तो हम मथुरा कार्यक्रम में थे 30 की शाम तक घर आए और तय किया कि एक दो दिन में मिज़ाज पुर्सी के लिए होकर आते हैं लेकिन लेकिन लेकिन आंग्ल वर्ष के प्रथम दिन ही दुखद सूचना प्राप्त हो गई। खैर तेरहवीं में रामलीला ग्राउंड में आयोजित शोकसभा में हाज़िरी लगाई। मुम्बई ग़ज़ल कुम्भ-२०२३ में पांच सात मिनिट की मुलाक़ात वो ट्रेन पकड़ने के लिए निकल रहे थे दो चार शेर उन्होंने कहे दो चार हमनें फिर वो निकल लिए उसके बाद हम भी हैदराबाद छोड़कर मेरठ आ बसे फिर "महफ़िल ए बारादरी" में मुलाक़ात हुई और फिर ये मनहूस ख़बर। अब जब मित्र आलोक यात्री जी ने 7 फ़रवरी - गुलशन जी के अवतरण दिवस पर उनकी पुस्तक के विमोचन का आमंत्रण भेजा तो हाज़िरी न देने का तो प्रश्न ही नही था सो मेरठ स्थित गढ़ रोड़, दिल्ली रोड़ की सड़कों के गड्ढे गिनते गिनते ठीक अपरान्ह 2.30 पर हाज़िरी लगा दी। मौसम भी रंग ऐसे बदल रहा है जैसे गिरगिट या उधार लेकर उधारी वाला उधारी लौटाने के नाम पर रंग बदलता है। लेकिन इस बार इस 🍺 हमने ठंड से कोई पंगा न लेने की कसम जो खा रक्खी है सो अपनी गात पर कई लेयर लपेट ली।

         पूर्व की भांति द्वार पर यात्री जी ने स्वागत किया, चाय बिस्किट और भी कुछ था याद नी, बस बढ़िया वाली चाय की चुस्कियों के बीच दो तीन जन से गप्पीयाए और पहली फुर्सत में दूसरी पंक्ति की प्रथम सीट 🪑 लपक ली।

No comments:

Post a Comment