"अकल दाढ़ कब निकलेगी"
"नादान की दोस्ती जी का जंजाल"
क्यूँ भई ये कहावत तो आप सबने सुन ही रक्खी होगी न कि "नादान की दोस्ती जी का जंजाल"। जे क्या कह रिए हो मियां न सुनी तो भैय्ये हम सुना रिए हैं न कान में कच्ची घानी वाला सरसों का तेल जिसमें बढ़िया वाली धांस आए और हां तेल भी काली सरसों वाला पीली वाली तो कतई न। वो क्या है न पीली वाली सरसों से पूरियां तो बढ़िया वाली बन जाएंगी पर कान में डालने के लिए तो काली वाली सरसों का तेल ही चाहिए। एक बार डालो मैल निकलते ही छः महीने तक सब कुछ ऐसे सुनाई देगा जैसे कोई उधारी वाला उधार चुकता करने धीरे से आवाज़ लगाए और आपके कान फटक से उसकी आवाज़ पहचानकर झटक से अपने दरवज्जे पर पहुंच जाए कि ला भैय्या कित्ता लिया था और कित्ता देने आया है और बाक़ी कित्ता बचा और बता के जा बचा हुआ कद वापिस करेगा। मतबल नू है कि तेल एक काम अनेक आप समझ रिए हो न मैं क्या नही बताना चाहता। समझदार को इशारा जो काफ़ी है लो जी एक पैराग्राफ में दो कहावतें वो भी बढ़िया वाली चलो इसी बात पे बत्तीसी दिखाओ।
ये ऊपर जो हमने दो कहावतों का घाल मेल कर खाका खींचा है न उसकी जड़ में आजकल राहुल की हरकतें हैं मियां भई ऐसी ऐसी लंपटई बातें वो भी संसद के अंदर बाहर दोनों तरफ़ सच कै रिया हूं मियां कई बार तो यूं लगे बंदा समझदार कब होगा। अरे भाई कोई इसे समझाओ कि तुम्हारी उमरिया ढल रही है और समझदरिया घट रही है। बखत से समझ जाओ तो ठीक है वरना दो चार साल बाद कांग्रेस में ऐसा कोई न दिखेगा या समझ लो बचेगा जो तुम्हें समझा सके। आख़िर उमरिया है जब तोहार बढ़ेगी तो मियां उनकी भी तो बढ़ेगी। अगर कुछ घटेगी तो समझदारी वो तुम्हारी वाली "स-पेशल" उनका क्या है वो तो पुराने वाले कांग्रेसी चावल हैं जिस दिन उन्हें लगा कि अब यहाँ चावल क्या दाल भी न पकेगी वो भी ग़ुलाम नबी आज़ाद की तरह छेदी कांग्रेसी नाव से उतर लेंगे और चढ़ लेंगे नसीमुद्दी सिद्दीकी की तरफ़ समाजवादी पार्टी की नाव में। वैसे भी नाव तो सब पार्टियों की काठ की ही बनी हुई है बस देखना ये है छेद किसमें कम हैं। आख़िर महत्वाकांक्षी होना कोई गलत बात थोड़े है मियां।
जनरल मनोज मुकुंद नरवडे जी की किताब फोर स्टारस ✨ ऑफ डेस्टिनी की पांडुलिपि 2023 से रक्षा मंत्रालय की फ़ाइलों में यहां से वहां टहलती हुई अब तक एप्रूवल की बाट जोह रही है। अब ये भी तो नही कह सकते न कि धूल फांक रही है अब भैय्या मोदी जी के राज में एक काम तो बढ़िया हो ही गया है कि इससे पहले की बाबू अपनी बाबूगिरी दिखाकर फाइल को फ्रिज में डाल दे (आम बोलचाल की सरकारी भाषा में) वो बाबू मोशाय खुदई फ्रिज में लम लेट हो जाते हैं इसलिए सब कुछ टाइम बाउंड है इत्ते दिन इसके पास इत्ते दिन उसके पास बीच में जहां फाइल अटकी उस स्तर के बाबू की आत्मा कहां कहां भटकेकी जे तो बस मोदी जी जाने या अपने अमित भईया। लेकिन भैय्या जिस किताब के प्रकाशन से देश की सुरक्षा व्यवस्था जुड़ी हो वहां उसकी पांडुलिपि को कई कई लेंसो की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। हम सभी जानते हैं कि ये किताब 15 जून 2020 की चीन और भारत की गलवान घाटी की झड़प पर आधारित है। अब इतनी महत्वपूर्ण घटना पर आधारित क़िताब में क्या दिखाना है क्या छिपाना है ये तो सरकार ही तय करेगी न। वैसे भी महाराज फ़ौज के तीनो अंगों में एक ही चीज़ कॉमन है और वो है डिसिप्लिन बिना डिसिप्लिन किसी भी संस्था का कोई औचित्य नहीं है और ये मामला तो विशुद्ध फ़ौज का है सो दुग्ध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर ही पियेगा। पर एन्नू की लोड ऐ तो LOP हैं जी यानि आप समझ नी रिए हो मियां लोप मतबल गायब और ये महाशय तो जब तक लोप होते ही रहते हैं। "मौज आई फकीर की दिया झोपड़ा फूंक" पर अपना नहीं दूसरों का की तर्ज पर जब मन किया भारत में जब मन किया भारत से बाहर। मेरी समझ में ऐ गल्ल नी आती कि एन्नू कौन इनवाइट करदा है और काई कू। आख़िर अपनी बंदूक में कौन सी गोला बारूद लेकर आते हैं जो भारत में बोलते ही इन पर खुदई ही वो गोला बारूद फट पड़ता है और ये महाशय हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे का गीत गाते हुए कांग्रेस को दो इंच और पानी में डुबो देते हैं।
अब आप खुदई समझो जो क़िताब अभी छपी नही ये महाराज उसके विषय में लोक सभा में आएं बाएं शाएं बोलने लगे, स्पीकर ने विषय का सोर्स पूछा तो "कारवां" पत्रिका में छपे लेख का हवाला देने लगे। अब बात तो आगे बढ़नी ही थी बीजेपी ने भी पतंग आसमान में जाने से पहले ही हत्थे से काट डाली। समझदार को इशारा काफ़ी लेकिन समझदार हों तब न महाराज सो स्पीकर पर ठीकरा फोड़ दिया कि स्पीकर लोप को बोलने नहीं दे रहे और अगले दिन घोषणा कर दी कि पूरा विपक्ष स्पीकर ओम बिरला के विरुद्ध नो मोशन कॉन्फिडेंस लाएगा अगले दिन 108 संसद सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस हवा में लहरा दिया लेकिन गलतियां कांग्रेस का पीछा ही नहीं छोड़ती उस नोटिस में भी तीन जगह 2026 की जगह 2025 मेंशन था। ओम बिरला बिफर गए और घोषणा कर दी जब तक फ़ैसला नहीं होगा मैं स्पीकर की सीट पर नहीं बैठूंगा अगले दिन स्पीकर की सीट जगदंबिका पाल जी ने संभाल ली। आदत ख़राब हो जाए तो जाते जाते भी नहीं जाती सो अगले दिन फिर वही रोना धोना और कमाल देखिए अगले दिन भी स्पीकर की सीट पर थे पूर्व कांग्रेसी जगदंबिका पाल, लोप ने उनको पुराना कांग्रेसी होने के नाती नसीहत देने की कोशिश की तो जगदंबिका पाल ने अनावश्यक शोर न मचाने और उन्हें फिर से रुकने और उनकी बात सुनने के लिए कहा पर भाई लोप तो लोप ठहरे नहीं रुके और अब जब रोके से लोप रुके नही तो जगदंबिका पाल ने भी पुरानी खुन्नस में चवन्नी उछालते हुए कह दिया कि अगर आप मेरी सुनते तो विपक्ष में नहीं बैठे होते। लोकसभा में एक क्षण के लिए तो एक दम सन्नाटा पसर गया कांग्रेसियों को काटो तो खून नहीं लेकिन कुछ क्षण बाद फिर वही हो हल्ला शायद शास्त्रों में इसे ही बेशर्मी कहा गया है।
चलो यहां तक तो ठीक था लेकिन दो दिन के बाद नरवडे जी की क़िताब "फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी" की पूरी किताब ही सदन में लहरा दी लहराने वाला भी एक मात्र 'लोप ' शायद एक ही किताब छपी या छपवाई गई होगी। शानदार कवर पेज़ की हल्की मोटी सी क़िताब लेकिन उसके अन्दर क्या है ये तो 'लोप' ही जाने। जिस तरह कुछ समय पहले कांग्रेस जनों ने लोकसभा में संविधान संविधान खेला था शायद उसी तर्ज़ पर नरवडे जी की अनपब्लिश्ड किताब के साथ खेला किया गया लेकिन लेकिन लेकिन लोप और कांग्रेसियों को अंदाज़ा भी नहीं था ये खेल उन पर उल्टा पड़ने वाला है आख़िर संविधान तो पब्लिश्ड है किंतु यह क़िताब "फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी" unpublished है और सीक्रेट एक्ट के दायरे में आती है सो जब तक कांग्रेसियों के दिमाग़ की बत्ती जलती तब तक राम नाम सत्य हो चुका था। अब चर्चा चल पड़ी कि बीजेपी राहुल यानि लोप के खिलाफ प्रिविलेज मोशन यानि विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाएगी। कांग्रेस के पुराने बचे खुचे चावलों को पता है कि नरवडे जी के प्रसंग में लोप के विरुद्ध क्या क्या हो सकता है सीक्रेट एक्ट में उनको दो वर्ष की भी यदि सजा हुई तो उनकी संसद सदस्यता जा सकती है शायद लोप को समझ आया और उन्होंने तुरंत शातिराना अंदाज़ में अगले दिन किताब का मुद्दा लोप किया और भारत अमेरिका के बीच हुए करार पर कुछ न समझते हुए किसान के नुकसान का रोना लेकर बैठ गए।
किसी भी देश के लिए सत्ता पक्ष के अलावा विपक्ष का मज़बूत होना भी आवश्यक माना गया है चाणक्य नीति भी यही कहती है किंतु यहाँ चाणक्य नीति की किसे समझ है वैसे भी समझने के लिए चाणक्य नीति पढ़नी पड़ेगी और लोप के हैंच मैन तो सारे के सारे ख़ब्बाड़िया यानि लेफ्टिस्ट हैं। लेकिन यहाँ प्रश्न दूसरा है कि जनता ने आपको यानि विपक्ष को इस लायक तो रक्खा कि आप सत्ताधीशों के सामने डटकर खड़े रहें, जनता के हितों के लिए सत्ताधीशों से लड़े लेकिन ये तो खुदई आपस में एक दूसरे का सर फोड़ने पर आमादा हैं तो फिर जनता किससे उम्मीद रक्खे। जाति जाति का खेल खेलने वाले विपक्षियों के रहते जातिवादी यूजीसी बिल कैसे पास हो गया। उड़ता हुआ तीर हवा में जाने से पहले रोका जा सकता था लेकिन बात बे बात पे पोस्टर लहराओ कभी लोकसभा में तो कभी राज्यसभा में और अगर ताज़ी हवा खाने का मन करे तो गांधी जी हैं न उनके पुतले के नीचे खड़े होकर खींसे निपोरो कभी मिमिक्री करो कभी गद्दार गद्दार कहकर अपने ही पुराने साथी का अपमान करो। ये समझ से परे है कि ये अहमकाना ओछी हरकतें राजनीति शास्त्र के किस पन्ने पर लिखी गई हैं जिनका ये मुजाहिरा करते रहते हैं। जहां तक यूजीसी बिल का प्रश्न है ये उड़ता हुआ तीर बीजेपी ने चलाया है देखते हैं 19 मार्च के बाद ये तीर बीजेपी के पिछवाड़े में भी कितना धसता है।
विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र जिसकी आबादी 140 करोड़ से ज़्यादा ही है कम तो बिलकुल भी नहीं। उस देश का विपक्षी नेता जिसे LOP कहते हैं जिसकी उम्र 55 की है और दिमाग़ अभी भी बचपने की अंधी गलियों में ही भटक रहा है। कहते हैं कुर्सी जिम्मेदारी का एहसास कराती है, कराती होगी महाराज यहाँ तो दूर दूर तक उसका एक भी लक्ष्चण नज़र न आ रहा है। सदन हो या सड़क ये बंदा दिखता है एकदम कड़क लेकिन अंदाज़ ए बयां बिलकुल सड़क छाप..... आप समझ रिए हो न। कुछ लोग उम्र से बड़े हो जाते हैं…
और कुछ लोग उम्र के बाद भी टिफिन-टाइम वाली मानसिकता से बाहर नहीं आते। कुल मिलाकर जैसे क्लास के मॉनिटर ने चॉक छीन ली हो ना गंभीरता, ना स्थिरता… बस जिद और ड्रामा फुल ऑन। 55 की उम्र कैलेंडर में है, पर दिल-दिमाग अभी भी स्कूल के लास्ट बेंच पर बैठा है! सिर्फ़ महंगे कपड़े पहनना ही शालीनता का पैरामीटर नहीं हो सकता । दम बात में होता है कपड़ों में नहीं।
"कहां कब बोलना कितना, समझ में ग़र जो आ जाए
तो निश्चित मानिए साहिब, कि क़िस्मत भी बदल जाए "
लेकिन समझदारी और लोप तो दो चुंबकों की तरह नज़र आ रहे हैं जिन्हें जितना पास लाओ वो उतना सटने की जगह दूर हट रहा है। सदन या सदन के बाहर हम वही बोलेंगे जो हमारे मूड में होगा जिसे सुनना हो सुनो वरना लोप के पास एक ब्रह्मास्त्र तो है कि "तुम बीजेपी के एजेंट हो"। वैसे मैं नू कै रिया था राजनीति में सॉफ्टवेयर अपडेट की व्यवस्था नहीं है क्या अगर है तो भैय्या लोप के चाइल्ड वर्ज़न को डिलीट कर कम - स- कम यूथ वाला अपडेट ही मार दो क्यूँ कि बुढ़ापे वाला डाला तो हार्डवेयर क्रश भी हो सकता है। भैय्या एक ठो बात बताओ पचपन की उम्र में इस बंदे अक्ल दाढ़ कब निकलेगी और निकलेगी भी या नहीं।
प्रदीप भट्ट -17022026
व्यंग्यकार मेरठ
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