रिपोर्ताज
"मनसा वाचा कर्मणा"
मनसा अर्थात मन में शुद्ध विचार उत्पन्न करें, बुरे विचार को पनपने न दें, वाचा मतलब जो भी बोले वह सत्य हो,मधुर हो। कर्मणा यानि जो भी करें उसमें ईमानदारी और निष्ठा का समावेश हो। अब आप सोच रिए होंगे इस पण्डित को आज क्या हुआ जो चुटीले अंदाज़ में रिपोर्ताज पेश करने की जगह खाली पेट प्रवचन पेल रहा है 🤔🤔🤔तो मित्रों 😝😝😝 अजी वो वाला नहीं बे जिसको सुनकर 140 करोड़ लोगों की साँसे रुकने लग जाती हैं कि बंदा आज किसकी वाट लगाने वाला है😎😎 तो भैय्या आगमन संस्था को हम सब के बीच लाने वाले स्वर्गीय पवन जैन तो अब हमारे बीच नही रहे😌 किन्तु उनसे हुए जुड़ाव को मैं आज तक अपनी स्मृति में संजोए हुए हूँ। जब वे इस लोक को छोड़कर परलोक सिधारे तब मैं हैदराबाद में posted था। प्रिय निशांत ने उनकी विरासत को सहेजने का जो उल्लेखनीय कार्य किया है जिसके लिए उन्हें साधुवाद।💓💓💓💓💓 आज सभी माल मत्ता तो लेना चाहते हैं किन्तु जहाँ बात विरासत सहेजने की बात आती है तब एक ही वाक्य धड़ाम से माथे पे आ चिपकता है। 😍😍😍अजी छोड़ो भी कैसी कैसी बातें जी करता तुम भी 😛 तो प्रिय निशांत एक बार पुनः साधुवाद स्वीकार करें।🌹🌹🌹🌹
"बात तो कुछ भी नहीं बस, बात मर्यादा की है
कोई पल में तोड़ देता, और कोई ख़ामोश है "
अभी हम 29 दिसम्बर को मथुरा की ठिठुरन, गलन💨💨💨💨 और कोहरे भाई साहब❄️❄️❄️ का भरपूर साथ निभाने के बाद मेरठ की धरती पर अवतरित हुए ही थे कि याद आया हमें तो अगले बरस यानि 4 जनवरी को हिन्दी भवन दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम "आगमन वैदुर्य" में अपनी उपस्थिति भी दर्ज़ करनी है। भयंकर वाले कोहरे के साथ ठण्ड ऊपर से गलन और उसके ऊपर से पछवा हवा भाई साहब कित्ती भी लेयर☃️☃️☃️☃️☃️ से तन को ढांप लो पर ठण्डी हवा पता नहीं कहाँ से घुसकर शरीर के साथ शरारत कर ही जाती है उसके बाद आप लेयर लेयर चिल्लाते रहो पर वो हवा अहमद हुसैन महमूद हुसैन की ग़ज़ल "मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा, दश्त मेरा न चमन मेरा " गुनगुनाने हुए पता नहीं कहाँ से निकल जाती है और छोड़ जाती है एक सरसराहट🌊🌫️🌫️ भरी कुछ ज्यादा ही बड़ी सी खामोशी " वो तो अच्छा है कि हम कवि बिरादरी से हैं साथ में थोड़े से लेखक और साथ में छुटभैये वाले हास्य व्यंग्यकार🤪🤪🤪🤪 जो अपनी में मस्त रहते हुए इनका प्रकोप झेल जाते हैं वरना भाई साहब 5-10 मिनिट के गीत ग़ज़ल पढ़ने के लिए कौन खादी वाली रज़ाई का दामन छोड़ता है। पर ये जो चस्का है न कविताई का बस हम कवि बिरादरी वाले ही समझ सकते हैं। कड़कड़ाती ठण्ड💧💧💧💧 में एक हाथ से कंपकंपाते माइक को थामना और दूसरे कंपकंपाते हाथ से पर्ची नुमा मोबाईल को स्क्रॉल करते हुए कविता पढ़ना मियाँ बिलकुल सरहद पर हाथ में पकड़ी हुई AK 47 के जवान सी फिलिंग होती है I जहाँ जवान गोलियां चलाकर दुश्मनों की टैं बुलवाता है हम कवि कुल के धुरंधर अपनी कविताई के शब्दों से अपने कवि दोस्तों की टांय दांय फिस्स कर देते हैं🌛🌛🌛 और हमारे कवि कुल के गुरु भी खिजते हुए अपनी बारी के इन्तेज़ार में वाह वाह वाह वाह, क्या कहने क्या कहने की रट लगाकर चेताते रहते हैं कि बेटा जल्दी माइक छोड़ो वरना माइकल को बोलकर माइक में करंट छुड़ावा देंगे I 🌞🌞🌞
सो जनाब मथुरा में खोए हुए कविताई के पर्चों का शोक मनाते हुए एक अलग से पर्चा तैय्यार किया और जैकेट के अंदर वाली जेब में सुरक्षित रख दिया ताकि पर्चे को ठण्डी न सताए I चूँकि प्रोग्राम 3 बजे से था तो ठण्ड की कर्मठता को देखते हुए रैपिड और रैपिडो की सवारी को दूर से ही नमस्ते की और टैक्सी की गोद में बैठकर ITO स्थित हिन्दी भवन जा पहुँचे वो भी पूरमपट्ट 2 बजे। पर जे क्या "सुं सा मानस गन्ध" 💏ऊपर गए फिर नीचे आए तो रिसेप्शन के साइड में एक ठो लड़की दिखी पूछताछ की तो बताया कि सर हम सीहोर से आएं हैं थोड़ी देर में और तीन लोग फिर पूछताछ की तो पता चला तीनों महानुभाव मेरठ से,अच्छी बात जे कि ना वो हमें जानते ना हम उन्हें तो background में हेमंत दा का गाना सुनाई देने लगा। "न तुम हमें जानो न हम तुम्हें जाने, मगर लगता है कुछ ऐसा मेरा हरदम मिल गया " ख़ैर धीरे लोग आते गए और कारवां न जी न मूड बनता गया। अरे भाई इक्कीसवीं सदी है कुछ तो बदलना था सो हमने कारवां को बदलकर मूड कर दिया। बाकी तुम सब अपना अपना देख लो भाई।💁♂️🫄
बढ़िया वाला रिफ्रेशमेंट अगर प्रोग्राम के शुरुआत में ही मिल जाए तो भाईसाहब.... सोने पे सुहागा इसी को कह्ते हैं मियाँ। ठीक 3.20 पर कार्यक्रम शुरू हुआ और धीरे धीरे सोपान दर सोपान चढ़ने लगा। हिन्दी भवन आज खचाखच भरा हुआ नज़र आया,जितने बैठे हुए उतने ही खड़े हुए सच कहूँ हुज़ूर मजा आ गया। आमंत्रित कवियों के अतिरिक्त नवाँकुरो के लिए आयोजित प्रतियोगिता में 500 से अधिक प्रतिभागियों की संख्या ये बताने के लिए पर्याप्त है कि संस्था अपने उद्देश्य के लिए प्रतिबद्ध है।500 में से 20 का चयन फिर 20 में से अंतिम तीन का चयन करना judges के लिए निश्चित आसान नहीं रहा होगा। सब कुछ ठीक चल रहा था तभी एक 20-25 साल के छोरे ने कविता पाठ न कराने के लिए अनाप शनाप बोल दिया यहां तक तो ठीक था फिर ये कहना कि साहित्यकार का अपमान हुआ है मैं चौंक पड़ा और फिर हमने उसे खोपचे में ले जाकर समझाया भई अपनी उम्र देख,बात करने का लहजा देख ,कविता का तो पता नहीं लेकिन तुम्हारी ये बेजा हरकत🥷🥷 बता रही है तुम.... अजी चलो हम अपनी ग़ज़ल का शेर ठोक दिए रहे हैं :-
"तुम ख़ुद से बेज़ार हुए से लगते हो
एक बासी अख़बार हुए से लगते हो
कड़वे बोल कलेजा चीर के जाते हैं
तुम चाकू की धार हुए से लगते हो "
अभी इस पहलवान से निपटे ही थे कि एक कुछ कुछ सीनियर सिटिजन से लगने वाले हुज़ूर ए आला ने न जाने किस कारण सम्मान पत्र जमीन पे दे मारा और पता नहीं क्या क्या बड़बड़ाते हुए बाहर की ओर कट लिए। उर्ववी उदल जी अच्छी प्रस्तुति के बाद राजरानी भल्ला की बेहतरीन विशुद्ध हास्य😁😁😁😁😁 कविता ने ये सोचने पर विवश कर दिया कि लोग नाहक सड़ी हुई हास्य कविता सुनने के लिए क्यूँ विवश हों। हमने एक गहरी श्वांस ली ही थी कि हमारी बारी आ गई हमने जैकेट की जेब में हाथ डालकर पर्ची निकाली पर जे क्या ये तो खोई हुई पर्चियां सच कै रिया हूँ जोर का झटका कुछ ज्यादा ही जोर से लगा😈😈😈😈। अब ये चमत्कार कैसे हुआ इसपे चर्चा खर्चा बाद में सो भैय्या जो पढ़ा है तुम भी देख लो :
बीते साल की बातें करके क्या होगा
हम अच्छे तो साल नया अच्छा होगा
सुख दुःख क्या हैं एक सिक्के के दो पहलू
आग लगेगी और फिर कहीं धुंआ होगा
औषध सारी फेल हुए सुन चारागर
'दीप' हुआ अच्छा तो असर दुआ होगा
लो जी भैंस फिर गई पानी ने एक मोहतरमा ने कविता पढ़ी निश्चित वो वर्तमान सरकार पर तंग करने का प्रयास कर रही थीं। कविता में सब कुछ सहने लायक था सिर्फ़ अंतिम पंक्ति को छोड़कर।महिलाओं की तीन पीढ़ियां वहाँ बैठी थीं वो हत्थे से उखड़ गई हमने समझाया और बताया कि यहीं हिन्दी भवन में 30 जून 2024 को जब हमारी पुस्तक "उर नाद" का लोकार्पण हुआ था तब एक सज्जन ने मर्यादा भूलकर हिन्दू मुस्लिम और धर्म पर टिप्पणी करने लगे तो लोग बहुत ज्यादा उग्र😡😡😡😡 हो गए थे तब उन्हें जैसे तैसे बाहर का रास्ता दिखाया गया था अच्छा ये था कि आज महिला ने कविता पढ़ी थी सो प्रोग्राम समापन के बाद वे तीनों भद्र महिलाएं उन कवित्रियी से फिर विरोध दर्ज कराने पहुँच गई चूँकि हम भी वहीं थे सो हमने धर्म और कर्म पर प्रवचन दे डाले पर भैय्या प्रवचन सुनता कौन है जी जो हमारी सुनता। मेरा विरोध भी अन्तिम पंक्तियाँ को लेकर ही रहा। जिन पँक्तियाँ पर राहुल गाँधी को सुप्रीम कोर्ट से माफ़ी माँगनी पड़ी हो उन पन्क्तियों को पढ़ने से बचना चाहिए।सत्ता का विरोध शालीनता के साथ भी किया जा सकता है हर समय आक्रमकता उचित नहीं। अगर अब भी बात समझ में न आए तो दुष्यंत को पढ़ लें देवी। 🙏🙏🙏🙏
सर्दी फिर कुलबुलाने लगी थी तभी तूलिका सेठ ने कहा पति देव साथ हैं चलिए आपको गाजियाबाद रैपिड तक डॉप कर देते हैं ।भाई साहब इससे अच्छा क्या हो सकता था सो लपक लिए उनके पीछे नीचे और लो जी नीचे वही कुछ कुछ सीनियर सिटीजन अपनी दो बेटियों के साथ मिल गए हमें देखते ही बोले मैं गुस्सा नहीं करता हूँ पर पता नहीं कैसे आज.... मैंने उनके दोनों हाथ पकड़कर इतना ही कहा क्षमा मांग लें जनाब फिर दोनों लड़कियों से कहा पापा को कॉल्ड वाली कॉफ़ी पिलाओ हमारी तरफ़ से बिल अगले प्रोग्राम में हम देंगे। फिर छलांग लगाकर सेठ साहब की गाड़ी में।अब जब कवियित्री और कवि एक गाड़ी में हों तो भाई साहब सेठ साहब सोच रिए होंगे अबके तो दी आगे न दूँगा लिफ्ट कभी किसी कवि को। 😺😺😺😺😺
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