Tuesday, 6 January 2026

"रुसवा जी काहे रुसवा हो गए हमस"े

रिपोर्ताज 

😅😅😅रुसवा जी काहे रुसवा हुए हमसे 🤣🤣

"बीते साल की बातें करके क्या होगा 
 हम अच्छे तो साल नया अच्छा होगा" 

         तो हुआ यूं के सितम्बर के तृतीय सप्ताह में कोठारी दादा से बात हुई और लो जी हमने तुरन्त फोन पर ही बड़ी वाली मुंडी हिलाकर आंदोत्सव - 2025 के लिए स्वीकृति भी दे दी ये तो बाद में पता चला साहिब कि जे उत्सव तो दिसम्बर में है पर कोई गल्ल नी जी,  क़ीमत ज़ुबान की है जनाब और आजकल क़ीमत का तो पता नी पर ज़ुबान फरियाने का चलन बहुत जोर पर है😛😛😛😛। अन्तिम सप्ताह में फिर एक फोन कि 23,24,25 दिसम्बर "लेखक गांव" देहरादून में उपस्थिति चाहिए हमने बड़ी वाली विनम्रता से फिर बड़ी वाली मुंडी हिलाकर हाथ जोड़ लिए अभी सांस पूरी तरह आई भी न थी कि लखनऊ से प्रिय सौम्या मिश्रा ने सूचना दी कि दादा "काला हंस" को "साहित्य सरस्वती सम्मान" के लिए चुना गया साथ में 3100/- रोकड़ा भी😝😝😝😝। बालक को धन्यवाद दिया लेकिन तिथि फिर वही 27,28 दिसंबर वो भी गंगा मैय्या के किनारे यानी कि हरि के द्वार। भाई साहब फिर चुपचाप हाथ जोड़कर क्षमा मांग ली अब जे तो सम्भव न है न कि मैं आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का प्रयोग कर दुई तीन जगह एक साथ उपस्थित होकर बत्तीसी दिखा सकूँ 😻😻😻। 

         सो भैय्या 25 दिसम्बर को भरे कोहरे में ऐड़ी से चोटी तक कपड़ों से लदे फंदे मेरठ से हरीगढ़ और हरिगढ़ से मथुरा के बस के सफ़र में आनंदोत्सव के ख्वाबों ख्यालों में गुम ठीक 3.15 मथुरा के नए बस अड्डे वहां से मोलभाव कर अस्सी रूपये में ई रिक्शा ली जिसे पुलिस ने चेकिंग के नाम पर सीज कर दिया। पुलिस ने दूसरा ई रिक्शा करवा दिया लेकिन आधा किलोमीटर के बाद उसकी बैटरी भी टैं बोल गई । खैर दस के चार पानी पूरी का स्वाद लिया और फिर पांच रूपये देकर गोवर्धन चौक फिर पांच देकर खंडेलवाल सेवा सदन जा पहुंचे। हरिगढ़ तक जहां सर्दी का प्रकोप झेला वहीं मथुरा में जैकेटवा भी उतारनी पड़ेगी धूप थी ही इत्ती तेज़।

         अंदर के गेट पर हमें देखते ही पता नी कौन था भाई साहब शायद कवियों से उसका छत्तीस का आंकड़ा रहा होगा 🤠🤠🤠 ऊपर से नीचे तक बड़े गौर से ऐसे देखा जैसे एक्सरे करके जानना चाह रहा हो कि हमने कित्ती कविताओं की पसलियाँ तोड़ी हों बोले कवि हो, कविता पढ़ने आए हो हमने जैसे ही मुंडी हिलाई बंदे ने 🛗 लिफ्ट की तरफ़ इशारा किया और बोले दूसरी मंज़िल पहुंचो । लो जी हम लदे फदे पहुंचे और प्रिय विश्वजीत को मोबलिया घुमा दिया। इससे पहले कि प्रिय विश्वजीत कुछ कहें हमने गाना गुनगुना दिया "मैं हूं हसीना खोल दरवाज़ा दिल का आ गया दीवाना तेरा" सामने का दरवज्जा झट से खुला और प्रिय विश्वजीत और साथ में दत्ता जोग एक के ऊपर एक फ्री की तरह दूसरे गाने की पंक्ति गाते हुए बाहर "आइए आपका था हमें इंतज़ार आना था आ गए, कैसे नही आते सरकार। अब बेकार को कोई सरकार कह दे तो पपीते के झाड़ पर चढ़ने का मन कर ही आता है।🤣🤓🤣🤓। खैर रुम नम्बर 205 में डेरा जमा दिया। शाम को कोठारी दादा से मुलाकात हुई वही व्हाइट पेंट और बढ़िया वाली टीशर्ट मतबल ये कि हरिद्वार की तरह यहां भी सर्दी मैय्या को पूरा कॉम्प्लेक्स देने की तैयारी 🫣🫣 अब चूंकि दिन में लंच नहीं लिया तो रात में डिनर वो भी घर जैसा 🤞🏻 जय हो कोठारी दादा। तुसी ग्रेट हो सच्ची!

         अगले दिन यानि 26 दिसम्बर को लोग आते गए और कारवां बढ़ता गया। शाम को मधु पारख, सन्तोष संप्रति with sister और कृष्णा पुरोहित उर्फ़ छोटी बहु के साथ प्रेम मंदिर वहां भीड़ को देखते हुए इतना ही " संसार की इक शय का इतना ही फ़साना है इक भीड़ में आना है इक भीड़ में जाना है"। अब हम तो हम ठहरे जैसे तैसे उस भीड़ में घुसे भी और बाहर भी आ गए पर भाई साहब सच्ची सच्ची कै रिया हूं, भगवान के दर्शन तब करो जब तुम भी फुर्सत में हो और ऊपर वाला भी। वापिसी में ई रिक्शा ने इत्ते झटके दिए कि चूल तक हिल गई। तकलीफ़ में अच्छा बुरा सब याद आता है जी हमने मन मंदिर में प्रेम मंदिर को याद किया और पूछा जे क्या प्रभु दर्शन तो दिए नही चूल हिला दी अलग से। तभी चूल से आवाज़ आई बेटा सब कर्मों का फल है कल ई रिक्शा वाले के अस्सी रूपये मारे थे न याद है। वो तो बेचारा पुलिस के चक्कर में उलझा था तुम जल्दी जल्दी में ही सही उसके पैसे मार बैठे अब भुगतो हमने हाथ जोड़े प्रभु आपका इंसाफ़ कुछ ज़्यादा ही फास्ट न है हाँ नई तो 😹😹😹😹। हम कुछ कहते इससे पहले ही ई रिक्शा ने फिर चूल हिला दी🤕🤕🤕🤕

         27, 28 दिसम्बर में कविताओं, गीतों गज़लों की जो गंग धार बही है उससे मन तृप्त हो गया जो इससे अछूता रहा निश्चित उसके लिए यही कि भैय्या खंडेलवाल सदन में काव्यांजलि की गंगा स्वयं प्रकट हुई और श्रुति श्रोताओं को अपने रस से सराबोर कर दिया और तुमने हाथ मुंह भी नही धोए तो निश्चित मानो तुम्हारी क़िस्मत का ज्योग्राफिया ही बिगड़ा हुआ है। अनुज विश्वजीत ने सूचित किया कि 28 को प्रथम सत्र का संचालन आपके जिम्मे हमने बताया देखो डियर हम संचालन 2007 में ही छोड़ दिए हैं तो उन्होंने तुरन्त ब्रह्मास्त्र चला दिया, दादा आपके लिए कोठारी दादा का आदेश है अब कर लो क्या करो। खैर दादा का आदेश सो तैयारी की तो रात के दो बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई देखा विश्वजीत हाज़िर है किसी के साथ सीधे सीधे बोल दिया दादा इन्हें एडजस्ट करें फिर हमारे कान में बताया कि कोई मोहतरमा एंकरिंग न देने से नाराज़ हैं हमने अधमिची आंखों से तुरन्त सहमति दे दी और हम खिसक कर अन्तिम सत्र में पहुंच गए। 

         प्रिय शिल्पी जो हमारी हैदराबादी धर्म बहन हैं के साथ एक विशेष कार्य हेतु फतेहपुर सीकरी जाने का काम सुगम तरीके से निपटाया और फिर अंतिम सत्र में आदरणीय अजीत दादा, आदरणीय कोठारी दादा, आदरणीय ज्योति नारायण जी, मधु पारख,अजय श्रीवास्तव मदहोश, संचालन रुसवा जी ने संभाला, हमने जो पढ़ने की तैयारी की थी उन पर्चों को किसी की नज़र लग गई पता नहीं कहाँ  लापता हो गए ख़ैर प्लान बी के सहारे नैया पार की लेकिन रुसवा जी हमें सिर्फ़ दस मिनिट जे अच्छी बात ना है जी I किसकी शरारत थी इसमें  रुसवा जी, काहे रुसवा हो गए हमसे रुसवा जी I ख़ैर येन केन प्रकारेण अन्तिम सत्र जानदार शानदार तरीके से अपने चरम तक पहुंचा। फिर उसके बाद राष्ट्रगान और थोड़ी से कुछ ज्यादा धमाचौकड़ी के साथ दिल्ली मिलन की आशाओं के पंखों पर सवार होकर अगले दिन अपने अपने घोंसलों के लिए प्रस्थान। पहले दिन जहां सब इस बात पर परेशान थे कि इत्ते सारे गर्म कपड़े लेकर क्यूँ आए जब कि मथुरा में ठंड अजी जुल्म है ज़ुल्म कर रहे थे 28,29 के कोहरे के साथ शीत लहर ने जता दिया बेटे जो लाए हो पहन लो वरना..... आगे तो हम सभी समझदार हैं न जी 🤧🤧🤧🤧🤧🤧🤧

विशेष: केवल काव्य परिवार की टीम जिसे केवल दादा और खंडेलवाल जी ने लीड किया, अनुज विश्वजीत, दया शंकर मिश्र ,दत्ता प्रसाद जोग और अजय श्रीवास्तव ने पूरे कार्यक्रम को अपने मजबूत कंधों से संबल प्रदान किया। पुनीत अग्रवाल जी ने जहां संस्था के रजिस्ट्रेशन की जानकारी साझा की वहीं उनकी पत्नी व बिटिया ने बेहतरीन KKP गीत प्रस्तुत किया जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। लखनऊ से मेरे अग्रज मजुमदार दादा के तो क्या कहने उनकी फुलझडियां उजाले में अलग रंग भर देती हैं।अब आप पूछोगे अबे तुमने क्या किया तो भैय्या अपना पुराने वाला काम ठूस ठूस के खाया और पूरे घटनाक्रम को शब्दों में पिरोना जे काम क्या कम समझ रिए हो मियां🙆‍♂️😹🤠🤓🤓🤓😝😝😝😝😊😛। कहो कैसी रही।

प्रदीप डीएस भट्ट ---06012026

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