Saturday, 22 March 2025

"भ्रष्टाचार के भंवर में न्यायपालिका "

" भ्रष्टाचार के भंवर में या न्यायपालिका "

          बचपन से एक कहावत सुनते आ रहे हैं कि "justice delayed is justice denied" । यदा कदा ऐसा देखने सुनने में भी आ जाता था किंतु पिछले हफ़्ते अख़बार के प्रथम पृष्ठ पर जब सुबह-सुबह यह खबर " दिहुली नरसंहार: 44 वर्ष बाद इन्साफ़, 24 दलितों की हत्या में तीन को फांसी की सज़ा।" पढ़ने को मिली तो पूरी खबर पढ़ने पर मन अवसाद से भर गया। इस जघन्य नरसंहार की कहानी कुछ यूँ है कि 18 नवंबर-1981 को मैनपुरी जिला ( अब फिरोजाबाद जिला ) की जसराना तहसील के दिहुली गाँव में संतोष और राधे डाकू के गिरोहों ने मिलकर 24 दलित लोगों की हत्या कर दी थी। इस हत्याकांड में कई महिलाओं के अलावा दो बच्चे भी शामिल थे। इस हत्याकांड का कारण सिर्फ़ इतना था कि दोनों गिरोह के लोगों को शक था कि पुलिस से उन दोनों गिरोहों की मुखबिरी करने में दिहुली गाँव के लोगों का हाथ था। कुल 23 लोग गोली लगने से घटनास्थल पर ही काल का ग्रास बन गए थे। एक कि मृत्यु अस्पताल ले जाते समय रास्ते में हुई के अतिरिक्त 9 लोग गोली लगने से घायल भी हो गए थे। जब संतोष और राधे के गिरोहों ने दिहुली गाँव की बस्ती में हमला किया था उस समय सरस्वती देवी ने अपने पति कुमार प्रसाद को भूस के अंदर छुपा दिया था किन्तु स्वयं सीने में गोली खा बैठीं, गोली तो निकल गई किन्तु उसके छर्रे अभी भी उनके कन्धे में धंसे हुए हैं जो रह रह कर 19 नवंबर 1981 के ज़ख्मों की याद दिला जाते हैं।

अभिजात्यता हत्याकांड पर हावी 
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         इस जघन्य नरसंहार की गूंज उस समय देश भर में टॉप पर थी। जो हुआ उस पर राजनीति भी जमकर हुई। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह इस जघन्य नरसंहार में भी अपनी फर वाली टोपी लगाना नहीं भूले साथ में उत्तर प्रदेश की गृहमंत्री स्वरुप कुमारी बख़्शी भी संग थीं। उस वक्त के गृहमंत्री ज्ञानी जैल सिंह जब पीड़ितों से मिलने हेलिकॉप्टर से दिहुली पहुँचे तो पीड़ितों से मिलकर स्तब्ध थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे कैसे पीड़ितों को ढांडस बधाएं। बकौल शंभू नाथ शुक्ला जिन्होंने दिहुली नरसंहार को कवर किया था बताते हैं कि जब जैल सिंह को कुछ न सूझा तो वे एक पीड़ित परिवार के घर की दहलीज पर बैठ गए और उन्होंने स्वरूप कुमारी को पानी लाने के लिए कहा तो आर्डर मैनपुरी के एसएसपी कर्मवीर सिंह से होता हुआ सिपाही दुबे तक आ पहुँचा। दुबे ने मुरादाबादी लौटे को घिसकर साफ़ किया फिर उसे ऑर्डर से होता हुआ वह पानी ज्ञानी जैल सिंह तक पहुँचा। तब तक उस  अनुसूचित जाति की स्त्री ने अल्यूमीनियम के बर्तन में काई लगे घड़े से पानी उड़ेल कर गृहमंत्री की सेवा में प्रस्तुत कर दिया। गृहमंत्री जैल सिंह ने पानी पी लिया फिर विश्वनाथ प्रताप सिंह से पूछा पानी पियेंगे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने तब मुंडी हिलाकर मना कर दिया किन्तु जब दुबे द्वारा लाए गए कुंए के जल को करमवीर ने प्रस्तुत किया तो मुख्यमंत्री महोदया बिना संकोच के उस पानी को उदरस्थ कर लिया। जहाँ ज्ञानी जैल सिंह पीड़ितों को एक सकारात्मक संदेश देने में सफ़ल रहे वही विश्वनाथ प्रताप सिंह फ़र वाली टोपी को ही उच्चता का पैमाना बताने में व्यस्त रहे। पानी तो बस पानी ठहरा प्यास दोनों ने बुझाई लेकिन पानी पीने वालों की क्लास से हार गया। 

         इस जघन्य हत्याकांड में सरस्वती देवी ने अपने जेठ, जेठानी, देवर, देवरानी, ननद,ननदोई, पुत्र और भतीजे सभी मारे गए। बचा तो सिर्फ पति जिसको तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के निर्देश जिंदा बचे लोगों को प्रशिक्षण एवं सेवा योजन निदेशालय में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी प्रदान करने के निर्देश दिए थे। इस हत्याकांड की गम्भीरता का अंदाज़ा इसी बात से होता है कि पीड़ित परिवारों से मिलने तात्कालिक प्रधानमन्त्री इंदिरा गाँधी को जाना पड़ा वरन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी बाजपेई जी ने इस हत्याकांड के विरोध में पद यात्रा तक की थी। इस हत्याकांड के कुल 20 आरोपियों में 13 की मृत्यु हो चुकी है,  चार आरोपी लापता हैं। जीवित बचे कप्तान सिंह, राम सेवक एवं रामपाल को अपर जिला जज (एडीजे)इन्दिरा सिंह की अदालत ( विशेष डकैती ) ने अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद उपरोक्त तीनों अभियुक्तों को फांसी की सजा सुनाई और जुर्माना अलग से लगाया है । इस फांसी के खिलाफ़ 30 दिनों के अंदर उच्च न्यायालय में अपील दायर की जा सकती है। बकौल शासकीय अधिवक्ता रोहित शुक्ला " चार दशक बादपीड़ित परिवारों को इन्साफ मिला है।इस ऐतिहासिक फ़ैसले से संदेश जाएगा कि कोई भी अपराधी कानून से ऊपर नहीं है"। मुझे तो ये टिप्पणी गंभीर तो कतई नहीं  हाँ हास्यास्पद जरूर लगती है।

कॉलोजियम सिस्टम ही भ्रष्ट्राचार की जड़ 
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         अब बात करते हैं न्यायालयों व्याप्त भ्रष्टाचार की तो 14 मार्च ( होली ) जिस दिन पूरे देश में रंगोत्सव की धूम थी उसी दिन दिल्ली हाईकोर्ट में पदस्थ जस्टिस यशवंत वर्मा के नई दिल्ली स्थित सरकारी आवास में अचानक आग लग गई। फायर डिपार्टमेंट की टीम आई, आग बुझाई साथ ही दिल्ली पुलिस भी आई उसने मौक़ा- ए- वारदात पर पांच बोरों में जले हुए नोट देखे उसकी वीडियो बनाई और सीबीआई को जानकारी देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ ली। कायदे से दिल्ली पुलिस को उस स्थान को जहाँ आग लगी और जहाँ पाँच बोरों में जले हुए नोट पाए गए थे उसको सील करना चाहिए था किन्तु इस पूरे प्रकरण में दिल्ली पुलिस ऐसा कुछ करना भूल गई या जानबूझ कर ये होने दिया गया। दिल्ली पुलिस से ये ग़लती अंजाने में हुई या किसी मजबूत व्यक्ति या संस्था का दबाव रहा। सामन्यतः ऐसा कई बार होता है कि जजिस पोलिस के अधिकारियों को अपने केबिन में बुलाकर धमकाते रहते हैं वैसे भी पुलिस और न्यायपालिका का चोली दामन का साथ रहता है।पुलिस अपराधियों को पकड़ती है और जजिस पुलिस को अपराधियों और जनता की निगाह में बकरा बनाकर माल कूट लेते हैं वरना पाँच बोरों में पन्द्रह करोड़ की राशि कहाँ से आई। यशवंत वर्मा 14 तारीख को भोपाल में थे वे पंद्रह या सोलह को दिल्ली वापिस लौटते हैं क्यों? जिसके घर में आग लगी हो वो तुरत फुरत भागेगा फ्लाईट, ट्रेन या सड़क द्वारा न कि आराम से सोच विचार कर आएगा। मजे की बात ये रही कि इस अग्नि दुर्घटना की जानकारी मीडिया में 22 मार्च को आई क्यूँ? फायर डिपार्टमेंट पहले कहता हैं हाँ जले नोट मिले फिर किसके दबाव में लिखित में कहता है कि उसे वहाँ कुछ नहीं मिला किन्तु बुराई बाहर आने का रास्ता ढूँढ ही लेती है सो जब सड़क की सफाई करने वालों को सड़क पर यशवंत वर्मा के घर के बाहर जले हुए नोट मिलते हैं और अखबारों में फ़ोटो छप जाती है तो उच्च न्यायालय के चीफ़ जस्टिस अपने सेक्रेट्री को यशवंत के घर भेजते हैं और खबर आती है कि यशवंत वर्मा के घर जले हुए नोट नहीं मिले साथ ही उच्च न्यायालय के चीफ़ जस्टिस एक कमेटी बनाकर पूरे प्रकरण की जाँच का आदेश देते हैं । दिल्ली उच्च न्यायालय के सुर में सुर मिलाते हुए सर्वोच्च न्यायालय भी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय की अध्यक्षता में जस्टिस वर्मा प्रकरण की जाँच की पुष्टि करता है। प्रश्न फिर वही है कि ये जाँच क्यूँ?

इलाहाबाद हाईकोर्ट कोई डस्टबीन नहीं 
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          अभी ये सब चल ही रहा होता है तभी खबर आती है कि जस्टिस वर्मा का तबादला इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कर दिया गया है। खबर आग की तरह फैलती है और सामने आता है कि जस्टिस वर्मा उन्नाव रेप की भी जाँच कर रहे थे सो अगले ही दिन प्रयाग राज के वकील इसका विरोध करते हुए सम्पूर्ण न्यायिक व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए जस्टिस वर्मा के तबादले का विरोध प्रकट  करते हुए कहते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट कोई डस्टबीन नहीं है जो दागी वर्मा को यहाँ टिकने देंगे। शाम  होते होते खबर आती है कि ऐसा कोई निर्णय नहीं हुआ है फिर पर्दे के पीछे से कॉलो- जियम सिस्टम जस्टिस वर्मा को पाक साफ़ दिखाने की कोशिश करता है किन्तु अगले  ही दिन पुलिस द्वारा जले हुए नोटों की वीडियो वायरल हो जाती है और मामला पूरी तरह से उजागर हो जाता है कि 14 मार्च को जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगी थी और जले हुए नोट भी मिले थे। ये सब यहीं नहीं रुकता सर्वोच्च न्यायालय के देश की सबसे बड़ी पंचायत यानि संसद भवन भी इस प्रकरण पर अपना रोष प्रकट करती है,  विपक्ष के नेताओं के अतिरिक्त उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड भी इसको लेकर अपनी चिंता प्रकट करते हैं। इन सबके बीच सर्वोच्च न्यायालय का रवैय्या देखकर लगता है कि वो अपने आपको भारत की सभी संस्थाओं से ऊपर समझ रहा है। निश्चित ही ये किसी भी देश की न्यायिक व्यवस्था की अराजकता का नमूना प्रतीत होता है। अन्यथा क्या कारण है कि ओपन एंड shat केस में भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इतनी माथा पच्ची। पहली बात तो सर्वोच्च न्यायालय के चीफ़ जस्टिस किस कानून के तहत तीन सदस्यों की कमेटी बनाकर एक आपराधिक कृत्य की जाँच करा सकते हैं बाकी बातों को छोड़ भी दें तो क्या उन तीन सदस्यों में से कोई एक फॉरेंसिक एक्सपर्ट है फिर दस दिन बीतने के बाद उन पाँच बोरों के जले हुए नोट कहाँ गए उनकी रिकवरी कैसे होगी। अगर जजिस ही पुलिस का काम करेगी तो जजिस कमेटी द्वारा लिए गए निर्णयों की अनुपालना कौन सी संस्था कराएगी? अब जरा कोर्टों में लम्बित मुकदमों पर और इन न्यायधीशों को मिलने वाली तनख्वाह और पर्क पर भी नज़र डाल लें:-

पेंडिंग केस 
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1. सुप्रीम कोर्ट- 81,598 केस 
2. हाई कोर्ट   - 62,50,367 केस 
3. लोअर कोर्ट- 4 करोड़ 55 लाख लगभग 

 चीफ जस्टिस                                जस्टिस
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1. सुप्रीम कोर्ट जज-2,80,000        2,50,000
2. हाई कोर्ट- जज  -2,50,000        2,25,000

         आज़ादी के 78 वर्षों में अभी तक एक भी ऐसा मौका नहीं आया जब किसी ज़ज को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेज दिया गया हो। किसी भी लोकतांत्रिक देश में देश को सुचारू रूप से चलाने के लिए मुख्य चार स्तम्भ  होते हैं जो अपनी ईमानदारी एवं कर्तव्य परायणता के लिए जाने जाते हैं। कार्यपालिका जिसका काम है देश के अंदर एवं बाहर देश हित के कार्य करना, विधायिका जिसका कार्य देश के लोगों के क्या सही है क्या गलत है तय कर नियम कानून बनाना तीसरा है न्यायपालिका जिसका काम है कार्यपालिका और विधायिका के नियमों के तहत सभी आम या ख़ास को न्याय प्रदान करना चौथे और अंतिम स्तम्भ मीडिया का कार्य है इन तीनों की कमियों को उजागर करना किन्तु ऐसा होता दिखता नहीं है जिसका स्पष्ट कारण है भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार और सिर्फ़ भ्रष्टाचार। सन 2000 में शमित मुखर्जी केस याद होना चाहिए जिसमें जस्टिस शमित मुखर्जी ने भ्रष्टाचार की सभी हदें पार करते हुए भ्रष्टाचार करने के लिए कोड नेम रखे हुए थे पैसे और जमीन जायदाद की बात छोड़ भी दें तो लड़की सप्लाई करने के लिए कोड था जापानी समोसा। अब आप स्वयं ही सोचें ऐसे जस्टिस किसी अबला की आबरू लूटने वाले को क्या सज़ा देते होंगे जो स्वयं इसमें शामिल हों।इसी प्रकार 2008 में पंजाब उच्च न्यायालय में तीन लाख की रिश्वत का मामला था जिस ज़ज् को रिश्वत दी जानी थी उसका नाम था निर्मल यादव किन्तु जो तीन लोग जज साहिबा को रिश्वत के 15 लाख रुपये देने गए थे वे ग़लती से दूसरी जज निर्मल कौर के घर पहुंच गए।निर्मल कौर ने पुलिस बुलाकर तीनों को अरेस्ट करा दिया।अरेस्ट के बाद मामला खुला कि ग़लती से कहाँ मिस्टेक हो गई थी। झारखण्ड नोट लेकर वोट का मामला हो या अन्य इसी तरह के केस सबके केस बस अनंत काल से चले जा रहे हैं शामित मुखर्जी के केस को 25 साल हो गए और निर्मल यादव के केस को 17 साल। अब ये कैसे संभव है कि जजिस ईमानदारी का ढोल पीटकर लोगों को गुमराह करते रहें।

एक मात्र विकल्प N J A C
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       चलते चलते NJAC आयोग की स्थापना भारत के संविधान में 2014 के 99 संशोधन के माध्यम से 13 अगस्त लोकसभा एवं 14 अगस्त 2014 को राज्यसभा से पारित कराकर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना करके पहला पड़ाव पार कर लिया। बीजेपी शुरू से ही कॉलोजियम सिस्टम के विरुद्ध है ऐसा इसलिए भी है कि इस क्लोजियम सिस्टम में जज की नियुक्ति जज ही करते हैं इस प्रक्रिया में भाई भतीजावाद की सौ प्रतिशत संभावना रहती है वैसे भी मुझे तो ये एक तरह का डीप स्टेट का मामला लगता है।

 "मुंसिफ ही मुंसिफ तय करेगा अगर, 
  तो क़ातिल को फिर कौर रोकेगा दीप "

निश्चित रूप से बीजेपी की नीयत इस विषय में ठीक थी तभी तो सर्वसम्मति से पास इस बिल को 2015 में इसे क्लोजियम कमेटी को भेजा गया किन्तु क्लोजियम सिस्टम को इसमें अपनी हार दिखाई दी और क्लोजि- यम ने इसे 4-1 से नामंजूर कर दिया और सरकार ने भी इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जिससे क्लोजियम सिस्टम की तो निकल पड़ी और वो पूर्व की भांति आधी रात को जघन्य अपराधियों ही नहीं  वरनन आतंकवादियों के लिए भी कोर्ट के दरवाज़े खोलने लगा क्या किसी की स्मृति में है कि किसी बलात्कार पीड़िता या किसी देशभक्त के लिए सर्वोच्च ने अपने दरवाज़े खोलें हों! चुनावी बॉन्ड पर स्यापा करने वाली सर्वोच्च अदालत ख़ुद ही जेम्स बॉन्ड समझने लगे तो फिर क्यूँ और कैसे लोग न्यायालय को न्याय का मन्दिर कहें या माने।

- प्रदीप डीएस भट्ट-25032025



Friday, 28 February 2025

" पुरुषों की भी सोचो "

        
          "पुरुषों की भी सोचो कोई "

         अब जब एक जन्म का रिश्ता बनने से पहले ही रिश्ते की चुनरिया तार तार हुई जा रही है तो उस सूरत में सात जन्मों के साथ की बात कौन करे। कल जब आगरा के मानव शर्मा के सुसाइड के विषय में समाचार सुना तो बेसाख्ता कुछ दिनों पूर्व बंगलूरू के अतुल सुभाष जो बिहार का रहने वाला था और महिंद्रा एंड महिंद्रा कम्पनी में AI और ML में डिप्टी जनरल मैनेजर था की आत्म हत्या का समाचार आँखों के आगे चल चित्र की भांति तैर गया। जहाँ अतुल सुभाष और उनकी पत्नि निकिता सिंघानिया में पहले प्यार हुआ फिर शादी फिर बाद में मन मुटाव बड़े झगड़े में परिवर्तित हो गया बात तलाक तक जा पहुंची। जौनपुर फैमिली कोर्ट में मुकदमा भी दर्ज हुआ। आरोप ये भी था कि निकिता ने 3 करोड़ की डिमांड की थी,  न मानने पर घरेलु हिंसा और दहेज़ के मुकदमे में फंसाने की धमकी दी और सिर्फ़ धमकी दी ही नहीं वरन अतुल पर उसकी ससुराल वालों की तरफ़ से कुल नौ केस उस पर दायर भी कर दिए। ऐसी विकट परिस्थिति में किसी का भी मानसिक संतुलन बिगड़ सकता है और नतीजतन दिसंबर-2024 को इस प्रकरण की परिणति अतुल की आत्महत्या के रूप में सामने आई।  पुलिस ने आत्महत्या के लिए उकसाने के केस में निकिता उसकी माँ निशा और साले अनुराग सिंघानिया को अरेस्ट किया किन्तु कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा तीनों को ही जनवरी-2025 में जमानत दे दी गई। अब इस केस में आगे क्या होगा भगवान ही जाने। अभी पूरी तरह लोग इस दुःखद समाचार से उबरे भी नहीं थे कि TCS में मैनेजर मानव शर्मा ने 6:57 मिनिट का वीडियो बनाकर अपनी व्यथा घर वालों से और आम जन से शेयर की और साड़ी का फंदा गले में डालकर अपनी इह लीला समाप्त कर ली। पहली नजर में  दोनों ही केसों में एक जैसे हालात दिखाई दे रहे हैं। आख़िर क्यूँ और कैसे ये रोग हमारे भारतीय समाज में फैलता जा रहा है। जिसे रोकने की कोशिश करता फ़िलहाल तो कोई दिखाई नहीं दे रहा। न ही समाज के किसी हिस्से से न ही न्यायालयों से  कोई एक PIL ही दायर कर दो भई!

        सुबह का समाचार पत्र खोलते ही लगभग हर पृष्ठ पर इस तरह के समाचार दिखाई पड़ेगे कि पत्नि ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी, बेटे ने नशे के लिए पैसे न देने पर माँ या पिता को दादी या दादा को गंडासे से काट डाला।  जीजा ने साली के लिए पत्नि को चाकू घोंपा, बलात्कार की घटनाएँ तो ऐसे छपती हैं जैसे इसके बिना समाचार पत्र समाचार पत्र ही न कहलायेंगे। सच तो ये भी है कि ये सब हमारे समाज में घट भी रहा है और जो घट रहा है उसको रोकने की पहल कौन करे । अदालतें ऐसे केसों से पटी पडी हैं।  जहाँ तक भारतीय संविधान का प्रश्न है तो वह महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार प्रदान करता है किन्तु वास्तविकता इससे कोसों दूर नजर आती है जिस प्रकार SC ST एक्ट का दुरुपयोग धड़ल्ले से होता है उसी प्रकार महिलाओं द्वारा पुरुषों को कितना और किस रूप में प्रताड़ित किया जाता है इसकी बस कल्पना भर ही की जा सकती है। एक्सर हम सिर्फ़ पुरुषों द्वारा महिलाओं के शोषण की बात सुनते हैं किन्तु इसका एक दूसरा पहलू भी होता है महिलाओं द्वारा भी पुरुषों का शोषण होता है और कुछ ज्यादा ही और ऐसा सिर्फ घर में ही नहीं होता वरन कार्य स्थल पर भी होता है! महिला काम नहीं करती है जब पुरुष अधिकारी टोकता है या काम को सुचारू रूप से करने के विषय में बार बार चेतावनी देता है या अपने आचरण में सुधार न लाने पर सेवा पुस्तिका में विपरित प्रविष्टि की चेतावनी देता है तो वह महिला आसान हथियार का उपयोग करते हुए उस पुरुष अधिकारी पर शोषण का आरोप लगा देती है और कई बार एक या दो नहीं महिलाओं का पूरा गैंग इस तरह के खेल रच देता है उसके बाद पुरुष प्रताड़ना का कभी ख़त्म न होने वाला सिलसिला चल निकलता है इसका जीता जागता उदाहरण अभी CRPF में तैनात महिला अधिकारी का अपने sabordinet के साथ किया गया व्यवहार अखबारों की सुर्खियों में रहा।  प्रताड़ना जब हद से ज्यादा बढ़ी तो उसने पूरे परिवार के साथ जहर खा लिया. पति पत्नि तो चल बसे किन्तु समय रहते इलाज मिलने से बेटी बच गई।

         मुझे याद है कुछ सालों पहले एक समाचार प्रकाशित हुआ था जिसका लब्बोलुआब यह था कि जबलपुर क्षेत्र से 4500 के लगभग लोग गायब हो गए पुलिस ने खोजबीन शुरू की तो कईयों को मथुरा वृन्दावन में ढूँढ लिया गया जब उनसे घर छोड़ने का कारण पूछा तो उत्तर ने सभी को चौंका दिया।  उनका कहना था कि पत्नियों के अत्याचार इतने बढ़ गए थे कि जिंदगी जीना दुरूह जान पड़ा । चूँकि वे आत्महत्या करने का साहस नहीं जुटा पाए तो उन्होंने गृहस्थ जीवन त्याग कर साधु बनना ज्यादा उचित समझा। लगभग एक वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश शासन में उच्च पदस्थ अधिकारी के घर की एक वीडियो फुटेज वायरल हुई थी जिसमें पत्नि पत्नि पति को कभी झाड़ू कभी बेलन कभी चिमटे से उन अधिकारी पर प्रहार करती दिखाई देती है, बच्चा भी पिता की हालत देखकर स्वयं को बचाने का प्रयास करता दिखाई देता है । अब आप स्वयं सोचिए डिजिटल युग चल रहा है तो सामने आ भी गया वरना कौन मानेगा कि पत्नि इतनी बेरहम भी हो सकती है। जहाँ तक विवाहित पुरुषों के अधिकारों का प्रश्न है तो कानून कुछ यूं है,  पर वास्तव में है क्य़ा?

     i) मानसिक उत्पीड़न की शिकायत 
    ii) पत्नि द्वारा की गई हिंसा और उत्पीड़न के 
        खिलाफ़ शिकायत 
   iii) दहेज़ के झूठे केस की शिकायत 
   iv)  गाली गलौज और धमकियों की शिकायत 
    v) मायके में ज्यादा दिनों तक रहने की शिकायत 
   vi) शारीरिक हिंसा की शिकायत 
  vii) पत्नि के किसी और से अफेयर की शिकायत 
  viii) तलाक के लिए याचिका 
  IX) स्वयं द्वारा अर्जित संपत्ति पर अधिकार 
  X) अगर पति बेरोजगार है तो मैंटीनेंस अधिकार 

         आखिर पुरुष इतना कठोर फैसला कर क्यूँ रहे हैं वैसे जिस तरह के दोनों केस हैं मैं उन्हें पूर्ण पुरुष की श्रेणी में नहीं रखना चाहूँगा ऐसा इसलिए भी कि बिहार का अतुल सुभाष हो या आगरा का मानव शर्मा दोनों की इतनी उम्र नहीं है जो इस तरह के मानसिक दबाव को झेल सकें। लड़की हो या लड़का विवाह इसलिए नहीं होते कि महत्वाकांक्षाओं के पर्वत के नीचे दबकर प्राणों को त्याग दिया जाए. बड़े परिवारों में चाचा चाची, ताऊ ताई, मामा मामी नाना नानी मौसा मौसी, तहेरे चचेरे ममेरे फुफेरे इतने भाई बहन होते थे कि बच्चे इससे नहीं तो उससे अपने दिल की बात कहकर दिल को हल्का कर लेते थे किंतु न्यूक्लियर फैमिली ने बहुत कुछ के अलावा बच्चों के इन रिश्तों को  हमसे छिन लिया है । जिस कारण लोगों के दिल बहुत भारी हो गए हैं उन्हें दिल हल्का करने का कोई साधन या उपाय नज़र नहीं आता.  आज डिजिटल युग का ज़माना है लोग एक लाख डेढ़ लाख का फोन रखकर समझते हैं कि कोई न होगा तो दिल इससे बहल जाएगा किन्तु दिल इससे बहलता नहीं वरन और अकेला हो रहा है।

         उपरोक्त के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है किन्तु अगर प्रेक्टिकली देखें तो महिलाओं और उसके घरवालों के दबाव में पुलिस भी बेबस ही दिखाई देती है। परिणाम स्वरूप 99 प्रतिशत मामलों में पुरुष उस घुटन से बाहर आ ही नहीं पाता। इससे भी बुरी स्थिति तब बनती है जब बच्चे मम्मा को पिता से ज्यादा तरजीह देने लगते हैं और परिणाम और ज्यादा भयानक हो जाते हैं. पुरुष जो पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित कर देता है स्वयं घर ऑफिस के मध्य खटता रहता है ताकि बच्चे कुछ बन सकें। महानगरों में रहने वाले पिताओं का पूरा जीवन ठण्डी रोटी खाते खाते बीत जाता है ताकि उसकी पत्नि और बच्चों को ताजी रोटी नसीब हो वही पत्नि जब बच्चों के बड़े होने पर बच्चों की गैंग लीडर बन जाती है तब वो पिता अपने ही घर में उपेक्षित हो जाता है।  घर में कोई भी कार्य हो उससे सलाह-मशविरा की जरुरत भी नहीं समझी जाती बस ऑफिस नोटिस की तरह उसे बात बता दी जाती है और वह पिता, पति या वह अभागा पुरुष घर की मान मर्यादा अपने झोले में सम्भाले हुए रोज मर्रा के कामों में मसरूफ हो जाता है। ऐसा नहीं कि वह विरोध नहीं कर सकता बस अपना बड़प्पन बचाने की कोशिश में लगा रहता है। महिलाओं महिलाओं और सिर्फ महिलाओं के अधिकारों का रोना रोने वाले कब जानेंगे कि पुरुष को भी पीड़ा से गुजरना पड़ता है औ उनकी सुनवाई कहीं नहीं होता., अब समय आ गया है जब लिखा जाए ।

प्रदीप डीएस भट्ट-01032025


Saturday, 15 February 2025

Master of All के बाद Master of Non

रिपोतार्ज

"Master of all के बाद Master of Non "

         कभी कभी यूँ भी होता है कि आप किसी कार्यक्रम में सहभागिता की स्वीकृति तो प्रदान कर देते हैं किंतु तभी समय का अह्म जाग जाता है और वो आँखों को गोल गोल😵‍💫 घुमाते हुए बुदबुदाता है अच्छा बेटा हमसे ही पंगे। हमें ही चेलेंज कर रहे हो और हम तुरन्त समय की शरण में लोट पोट होते हुए घिघियाते हैं🙏🏾 न माहराज न म्हारा जे मतबल कतई न था किंतु समय तो समय ठहरा दिल है कि मानता नहीं कि तर्ज़ पर झटका दिए बिना मानता ही नहीं😇। हमने विश्व पुस्तक मेले में 8 फ़रवरी को अपनी सहभागिता की स्वीकृति मित्र मण्डली को दे दी साथ ही 9 फ़रवरी को डॉक्टर श्वेता सिंह उमा पर निकल रहे प्रज्ञान विश्वम के विशेषांक में हाज़िर रहने की भी स्वीकृति प्रदान कर दी, लेकिन जे क्या एक दुःखद ख़बर और.....😢 आगे क्या बताना मियां जानते तो तुम भी हो ख़ैर वहाँ से निपटकर थोड़ा संयत हुए तो महफ़िल ए बारादरी का आमंत्रण प्राप्त हो गया अब चूँकि हम तो हम ठहरे पक्के वाले वफ़ाउद्दीन😘 जहाँ से पहला आमंत्रण मिला वहीं उपस्थित रहने का निर्णय किया।

         सो पहली फ़ुर्सत में 9 की सुबह 7.45 की ब्ला ब्ला बुक करके निफ़राम हो गए,अंदाज़ा ये था कि बन्दा हमें 9.30 तक तो सुप्रीम🙏🏾 कोर्ट पहुंचा ही देगा वहाँ से तीन पहिए अरे भाई चौकिऐं मत मतबल ऑटो से ही है किन्तु किस्मत में हों तो कंकर क्या करेंगे शंकर की तर्ज़ पर बन्दे ने राइड कैंसिल कर दि बस फिर क्या था भगियाते भगियाते 🦨 भैंसाली अड्डे से कश्मीरी गेट की बस पकड़ी लेकिन जब बस आनन्द विहार मेट्रो रुकी तो मेट्रो की आवाज़ हमारे कानों में गूँजने लगी जैसे कहना चाह रही हो अबे जित्ती देर में तू कश्मीरी गेट पहुँचेगा उत्ती देर में तो हम तुझको सेंट्रल सेक्ट्रेट फ़ेंक देंगे बे बस हमने तुरन्त बस से छलाँग लगाई पीछे से कंडक्टर की आवाज़ सुनाई दे रही थी सर जी आपका टिकिट तो कश्मीरी गेट का है लेकिन हमें सुनाई दे रहा था जैसे कह रहा हो कि किसकी जेब काट ली बे जो इत्ती तेज दुड़की लगा रिया है 😅। दौडते भागते हमने ख़ुद को मेट्रो में धकेल दिया फिर श्वांस पर थोड़ा काबू पाया और फिर मंडी हाऊस से चेंज कर सीधे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया वो भी 10.35 पर इज्ज़त बच गई रे बाबा🤣🤪🤪🤪🤪

         थोड़े से व्यवधान के बाद ठीक 11 बजे कार्यक्रम शुरू हो गया। डॉक्टर श्वेता सिंह उमा पूर्व की भाँति गज़ब ढा रही थीं, सदा की तरह हँसता मुस्कुराता चेहरा उमंग सरीन जी का, वीणा अग्रवाल, ओम्कारेश्वर पाण्डेय, राजेश रघुबर, आस्ट्रेलिया से पधारे कुँवर बैचेन के पुत्र प्रगीत कुँवर एवम भावना कुँवर, मात्र अस्सी वर्षीय खुशमिजाज शख्सियत मंजू गुप्ता जो फूलों पर कविताई रचती हैं,🌹🌹🌹 मधु मिश्रा जी और चौहान दम्पत्ति जो हमारे साथ नागालैंड प्रवास पर भी साथ थे और भी कुछ लोग पर नाम न याद आरिया है भैय्या। अभी पण्डित सुरेश नीरव जी ने कार्यक्रम में समा बाँधा ही था तभी हास्य सम्राट सुरेंद्र शर्मा जी ने घूँघट के पट खोल की तर्ज़ पर मीटिंग हॉल के पट खोलकर सभागृह में प्रवेश किया, सभी की निगाहें उनकी तरफ़ उठनी लाज़मी थीं सो निगाहें उठी, चेहरों पर हल्की सी स्मित लिए सुरेन्द जी ने भी सभी का अभिवादन स्वीकार किया। कार्यक्रम ने पुनः अपनी  रवानी पकड़ी और डॉक्टर श्वेता सिंह उमा के व्यक्तित्व एवम कृतित्व पर उपस्थित सुधीजनों ने प्रकाश डाला।🦥 डॉक्टर श्वेता से मेरी पहली मुलाक़ात 2022 में मेरठ मेरठ लिटरेरी फ़ेस्टिवल में हुई थी फिर पुनः दिसम्बर 2023 में केरल में एबीएस 4 के कार्यक्रम के दौरान हमने मंच साझा किया था सो जो देखा समझा जाना कि तर्ज़ एक शेर

"पढ़ लिया देख लिया समझ लिया
बासी अख़बार हुई ज़िन्दगी" 

न जी न श्वेता जी के विषय में बासी का कोई सीन ही नहीं है जब भी मिलोताज़ा बिलकुल ताज़ा ताज़ा रेड roz। सो कुल जमा तीन मुलाकातों के निचोड़ स्वरूप पहले तो उनकी आँखों की तबियत पूछी अब उनकी आँखे हैं ही इत्ती सुन्दर क्या बोले जी हम तो बस... अजी पूछो मति 🤓 फिर जो सच था कह दिया बिलकुल शफ्फाक सच की तरह, झूठी तारीफ़ हमसे होने की भी न है। अजी ब्लड में ही न है तो क्या करें😎 सुरेंद्र जी ने अपने उदबोधन की शुरुआत Masters of all के बाद Master of Non से की जिसको हमने रिपोर्ताज का शीर्षक बना दिया, permissions है न सुरेंद्र जी 🌹🌹🌹🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾

गर्मा गर्म भोजन की खुशबु तो भैय्या पेट पूजा की और ऑटो लेकर निकल लिए पुस्तक मेले की ओर,  

       पुस्तक मेले में पिछले वर्ष दीक्षित दनकौरी जी एवम अन्य के साथ काफ़ी सैर सपाटा किया था। आज चूँकि अंतिम दिन था तो भीड़ भी कुछ हॉल में ज़्यादा थी और कुछ में इतनी कि बच्चे हॉल क्रिकेट तो नहीं वरन यहाँ वहाँ बैठकर लूडो साँप सीढ़ी या फिर शतरंज़ जरूर खेल सकते थे।  एक सरसरी सी निग़ाह हर स्टॉल पर डालते हुए कुछ को हमने और कुछ ने हमें अभिवादन किया। इंडिया नेटबुक पर संजीव जी से मुलाक़ात हुई साथ ही विनय से भी। चूँकि अंतिम ठिकाने के तौर पर अद्विक पब्लिकेशन में स्वाति चौधरी जी से मिलने का प्लान था किंतु हॉल नम्बर 2 के अलावा स्टॉल नंबर याद नहीं था सो ढूंढ़ते रहे। तभी 30 - 35 वर्ष की महिला ने टोका सर आप प्रदीप देवीशरण भट्ट हैं। मुझे मेरे पूरे साहित्यिक नाम से पुकारने वाली देवी जी कौन हैं मैंने घूमकर उन्हें ऊपर से नीचे गौर से देखा एक सम्भ्रांत महिला साथ में 7,8 बरस की लड़की मैंने हाँ भरी तो बोली मैंने आपका कहानी संग्रह "काला हंस"  पढ़ा है। उसमें कई कहानी अच्छी लगी लेकिन लेकिन लेकिन काला हंस और ड्रग डे सबसे बढ़िया लगीं। मैंने हाथ जोड़कर धन्यवाद कहा फिर उनकी इच्छा का मान रखते हुए बेटी सहित एक सेल्फ़ी ली फिर बताया कि काला हंस को लखनऊ की संस्था द्वारा पुरस्कृत भी किया जा रहा है। अपनी आदत अनुसार मैंने उनकी बिटिया को दो बच्चों की पुस्तकें ख़रीदकर दी उन्हें संकोच में देखकर कहा देवी जी सिर्फ़ आपकी नहीं हम लेखकों की भी ज़िम्मेदारी है कि बच्चों को कहानियां पढ़ने के लिए प्रेरित करें।

         आख़िर मेहनत सफ़ल हुई सामने से आवाज़ आई मिल गई फ़ुर्सत? देखा तो मुस्कुराते हुए डॉक्टर स्वाति चौधरी थीं, कभी इस स्टॉल पर कभी उस स्टॉल पर पुस्तकों को उलटते पलटते कब 6 बज गए पता ही नहीं चला इसी मध्य नेशलन ट्रस्ट बुक के लालित्य ललित जी, आचार्य राजेश जी, शिवराज जी संग दो तीन पुस्तकों के लोकार्पण में भी सहभगिता हो गई डॉक्टर स्वाति चौधरी तो थीं ही हुज़ूर। बडे पाव की दावत के मध्य एक बेटी अपनी माँ से कहती हुई नज़र आई कि ममा हिन्दी पढ़ते हुए मुझे नींद आती है🤓🤓 फिर उसने मेरी तरफ़ देखा तो sry बोला मैंने मुस्कुराते हुए कहा बेटा क़ुसूर आपका नहीं है बल्कि तभी मां की आवाज़ आई सर इन बच्चों का नहीं हमारा क़ुसूर है। बात सीधी सपाट थीं किन्तु कहीं न कहीं उस लड़की की माँ की आवाज़ के दर्द को मैंने अपने भीतर भी महसूस किया। 🥹🥹 शिवराज जी ने सिटी सेंटर नोएडा छोड़ा वहाँ से बस और खरामा खरामा ऑटो बदलते हुए 9.45 घर। न्यूज़ देखी औऱ फिर हम और हमारा बजाज की तर्ज़ पर हम और हमारा बैडवा😝😝😝😝


प्रदीप डीएस भट्ट-13225

Friday, 24 January 2025

" नज़्म ग़ज़ल का कॉकटेल"

रिपोर्ताज 

          "नज़्म ग़ज़ल का कॉकटेल" 

         आजकल प्रयागराज में महाकुंभ चल रहा है। 144 वर्ष के बाद पुनः महाकुंभ का संयोग बनेगा तब तक गंगा यमुना और सरस्वती में कितना जल बह जाएगा किसी को नहीं पता। लगभग 40,45 करोड़ भक्तों के स्नान की संभावनाएं जताई जा रही हैं। मैंने अभी तक मात्र नाशिक के कुम्भ में ही स्नान का पुण्य प्राप्त किया है वो भी अंतिम दिन जब गोदावरी मैय्या आराम के मूड में थीं मुझे याद है हमने जैसे ही गोदावरी में स्नान हेतु प्रवेश किया तो तुरन्त नदी से आवाज़ आई "अबे आलसी आज आखिरी दिन तो मुझमें पाप मत छोड़" मैंने इधर उधर देखा तो आवाज़ पुनः गूंजी अबे नदीवाणी हूं कोई आकाशवाणी नहीं जो इधर उधर देख रहा है, चल जल्दी से बाहर निकल।  तेरे स्नान का तुझे मैं तुझे कितना पुण्य दे पाऊंगी ये तो पता नहीं लेकिन बेटा ज़्यादा डुबकियां मारने के चक्कर में कहीं तू औरों के छोड़े हुए पापों के साथ घर पहुंच जाइयो। मैं तो नदी हूं मेरा सीधा फंडा है पुण्य हो या पाप मैं तो अपने फुफेरे भाई समुद्र को अर्पण कर देती हूं। समझा या नहीं पगले चल बाहर निकल अब मुझे आराम करने दे। हम धीरे से बाहर आए पेट पूजा की और शाम की ट्रेनवा पकड़क सीधे मुंबई। रास्ते भर यही सोचते रहे 2025 के महाकुंभ में जाएंगे कि नहीं अलबत्ता 2024 के "ग़ज़ल कुम्भ" जो कि संन्यास आश्रम मुम्बई में आयोजित हुआ था में हमने साहित्यिक डुबकी अवश्य लगाई थी। 

         ख़ैर प्रयागराज का महाकुंभ तो फरवरी तक है कभी भी जा सकते हैं इसलिए गत वर्ष की भांति ही इस वर्ष भी हरिद्वार में आयोजित होने वाले सोहलवें ग़ज़ल कुम्भ में हमने साहित्यिक डुबकी लगाने का प्रण किया और 18 जनवरी की सुबह दो ब्ला ब्ला की बुकिंग कैंसिल होने के बावजूद जोश कम न हुआ और अपनी पुरानी साथी रोड़वेज बस की सवारी का आनंद लेते हुए 10.30 बजे निष्काम सेवा ट्रस्ट भूपतवाला में एंट्री कर ली। दीक्षित जी से सामना हुआ आंखों आंखों में बात हुई और पहले से ही इंतज़ार कर रहे राम देव छाता वाले के साथ हमने तुम नम्बर 21 में प्रवेश किया हमारे पीछे पीछे सत्य त्यागी मेरठ और कृष्ण गौतम ने भी। दस मिनिट के लिए महफ़िल जमी एक दूसरे का परिचय हुआ और आदतानुसार हमने हवा में दो चार शेर उछाल दिए फ़िर बर्फ़ में जमे जैसे हाथों को गर्म करने के लिए निष्काम के सामने वाले टी स्टॉल पर चाय की चुस्की ली पैसे पूछे तो टी स्टॉल वाला इशारे से बतियाने लगा हमें लगा मुंह में कुछ दबाए हुए होगा बाद में पता चला........ ख़ैर वापिस रूम में पहुंचे, फ्रेश हुए और फिर महफ़िल जम गई। अब ससुरा दूसरा कोई काम भी तो न था इसलिए सुबह 5.30 की दो पूरियों के सहारे फिर से शेर ओ शायरी। 12.30 लंच किया और मीटिंग हॉल में जैसे कि हर कार्यक्रम में होता है तो यहां भी थोड़ी देर यानि 2.00 बजे विधिवत कार्यक्रम शुरु। दीक्षित जी जो मुंबई बताए थे यहां भी बता रहे थे Do's & Don't  but but but साहिब सुनता कौन है?  करेंगे वही जो इन शायरों ? को करना है भले ही आपका पैर तारों में उलझकर आपको बढ़िया वाला शेर सुनाकर धड़ाम से गिरा दे लेकिन हम न सुधरेंगे कि तर्ज़ पर बेजा हरकतें जारी रहेंगी। लेकिन ये भी ठीक नहीं कि जब दीक्षित जी पटल पर सख़्ती से लिख चुके थे कि पहले हमें पढ़वाईए की कोई भी रट ने लगाए फ़िर बाद में स्वयं ही लिख दिया जिसे जल्दी जाना है वे अपना नाम XYZ को लिखवा दें। मर्यादा का पालन सभी को करना चाहिए। एक सज्जन परेशान कि मुझे कल एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में शिरकत करनी है हमने पूछा तो बताया दिल्ली में दिल्ली में ....... शिरक़त करने जाना आवश्यक है। हमने उन्हें नीचे से ऊपर घूरा तो उन्हें 377 का डर लगा हमने कहा न हुज़ूर न हमें ऐसा वैसा न समझें हम बड़े काम की चीज़, फ़िर बताया देखिए आपने निश्चित अपने बच्चों को दो नावों की सवारी के लिए मना किया होगा उन्होंने हां में मुंडी हिलाई अब हम फट पड़े अबे कभी ख़ुद पे भी तो अमल किया करो मियां हमें भी बुलाया है पर हमने साफ़ मना कर दिया।

         अतिथियों में अशोक मिज़ाज बद्र अम्बर खरबंदा, उषा उपाध्याय, इम्तियाज वफ़ा, ऊर्दू अकादमी नेपाल, राजेंद जैन, शलभ, महेंद्र सिंह होश जी डॉक्टर इरशाद अहमद शरर, विज्ञान व्रत एवं प्रतापगढ़ से पधारी नाम भूल गया....कार्यक्रम की शुरुआत हो चुकी थी अल्का शरर जी ने माइक संभाला और एक एक कर शायरों को अदब से दावत ए सुखन पेश करने लगीं ये उनका अंदाज़ है। पहले शायर वो ही थे जिन्हें अगले दिन महत्वपूर्ण कार्यक्रम में पहुंचना था अब वो क्या पढ़ कर गए वो तो अल्का जी बेहतर जान सकती हैं। मुम्बई कार्यक्रम में एक मोहतरमा नज़्म पढ़ गई थीं और ये साहब ग़ज़ल नज़्म की कॉकटेल। नेपाल से पधारे उद्योगपति शायर और एक अच्छे इंसान बसंत चौधरी जी के अतिरिक्त कुछ और भी अतिथि नेपाल से पधारे जिनका यथोचित सम्मान दीक्षित जी के द्वारा किया गया। बसंत चौधरी जी ने अपने व्यवहार और सादगी ये एक मैसेज छोड़ा कि इंसान को डाउन टू अर्थ ही होना चाहिए वरना तो.... कुछ सो कॉल्ड शायर दो दिवसीय 16 वें ग़ज़ल कुम्भ में ऐसा प्रदर्शित कर रहे थे वे बहुते ज़्यादा व्यस्त हैं उनके हाव भाव से ऐसा प्रतीत होता लगा जैसे कहना चाह रहे हों कि ग़ज़ल पढ़कर वे ग़ज़ल कुम्भ पर अहसान कर रहे हैं, भैय्या जी में तो आया कि उनकी..........

"पंजों के बल पर खड़े हो गए 
वो कहते हैं हम भी बड़े हो गए "

         ये सिलसिला यूं ही चलता रहा 5 बजे ☕ फिर 7 बजे डिनर 8 बजे दूसरा सत्र 11 बजे फिर 🍵 साथ में गर्मा गरम दुग्ध। अब ये वो समय होता है जब ज़्यादातर लोग बिस्तरों में होते हैं यहां भी इंतजाम था न दोनों तरफ़ 5,5 कुर्सियां बीच में कालीन पर मसनद तकिए और रजाई। 1 बजते लोगों ने कुर्सियां छोड़ी और सीधे तकिए को तकिया मसनद को भी तकिए में तब्दील किया और आधे लेटे आधे बैठे कुछ देर बाद पूरे लेटम लेट। शरीर है भई इतना माल मसाला खाने के बाद यही हाल होना था सो जनाब अपना नंबर आया 19 की प्रातः 3 बजे जब कि लिस्ट में हमने 18 जनवरी लिखवाया था। बेसाख्ता याद आया मियां शादी में भी तो यही होता है न शादी 18 की फिक्स होती है लेकिन फेरे 19 में पड़ते हैं सो राम का नाम लेकर अपने तेवर वाला कलाम पेश कर दिया वो भी तीन मिनिट से भी कम समय में। वैसे अंतिम शायर ने अपना कलाम 4 बजे के लगभग पढ़ा। वैसे असर जी की ग़ज़ल कई लोगों पर असर कर गई जहां तक मंच सञ्चालन का प्रश्न है तो अल्का शरर के अतिरिक्त दीक्षित दनकौरी जी, निरुपमा चतुर्वेदी, फरीद आलम कादरी एवम् अली अब्बास। नौगांवी जी ने इसे बेहतरीन तरीके से अंजाम दिया।, बसंत चौधरी की दो पुस्तकों का लोकार्पण भी इस मौके पर हुआ साथ ही ग़ज़ल :

"सामने सबके न बोलेंगे हमारा क्या है 
 छुप के तन्हाई में रो लेंगे हमारा क्या है "

और हमारे तेवर की ग़ज़ल ये रही 

“ ऐसा फायर समझो “ 

हम सहिष्णु हैं, अर्थ नहीं तुम, कायर समझो 
भस्म करे जो पल में, ऐसा फायर समझो

अंतिम पल तक रण भूमि में कहर मचाये
रण बाँकुर तुम राजपूत वो, नायर समझो

इश्क़ विश्क के गीत नहीं मैं, लिख सकता सुन  
देश प्रेम की अलख जगे , वो शायर समझो

मीठी मिसरी सी बातों से मन भरमाए 
ऐसे हरिक शख़्स को निश्चित,लायर समझो

बूढों, बच्चों, पर हर्गिज़ हम  वार न करते
उस जल्लाद के जैसा मत तुम , डायर समझो

आग का हम इक दरिया हमसे, बच के रहना
नही पतंग में उलझा कोई तुम वायर समझो

साँसों का व्यापार कभी भी, हम न करते 
गैरों की खुशियों का लेकिन, बायर समझो

मैं ही केवल सच्चा, बाक़ी सब झूठे हैं 
ख़ुद पर इसको तीखा, एक सटायर समझो 

तुमने बात अगर अपनी ये , ‘दीप’ न मानी  
खुद के ऊपर  एक मुकदमा, दायर समझो

© प्रदीप देवीशरण भट्ट -                                       

         4.30 सोए फिर 8 बजे उठे फ्रेश हुए और ये लीजिए हुज़ूर 9 बजे नाश्ते की टेबिल पर हाज़िर। जैसे ही प्लेट उठाई तो वहां करीने से सजे दोने से आवाज़ आई अरे ओ भुक्कड़ प्लेट नहीं हमें उठाओ कचौरी तोड़ो फिर उसमें आलू की सब्ज़ी या छोले गिराओ और फिर मजे लेकर खाओ। क्षुधा शांत हुई तो थोड़ी मटर ग़श्ती कर डाली साथ में दो चार लोगों से परिचय भी मस्त मौला डॉक्टर मनीषा मनी, संजीव जैन, राघव, अनुश्री, पूजा अरोड़ा, अम्बर खरबंदा, संगीता शर्मा कुंद्रा, मनोरमा, अनिल शर्मा,गार्गी कौशिक और एक नाम जो भूल गया अब क्या करें दो कचौरी में तो इत्ता ही याद रहने वाला है बाबू। 12 बजे लंच लिया और फ़िर एक ठो टैक्सी जिसे 16.30 आना था। प्रोग्राम अटेंड किया और तभी मुबलिया बजा उधर टैक्सी वाला था sry सर कहकर उसने तो पिण्ड छुड़ा लिया पर अब हम क्या करें तभी अनिल शर्मा से बात हुई जो मनोरमा जी व संगीता जी के साथ चंडीगढ़ जा रहे थे तो बस कुल्हड़ वाली चाय पी और निकल लिए। तय हुआ कि वे सहारनपुर ड्रॉप कर देंगे लेकिन लेकिन लेकिन। मंदसौर से यू टर्न लिया और शायद झबरेड़ा निकला ही था नथुनों में अजीब सी महक भर गई बाक़ी ने भी इसे महसूस किया तभी देखा बाईं ओर लाइन से क्रेशर चल रहे थे गुड़ राब आह वाह करते झटपट 🚗 रोकी और जा पहुंचे, कुछ खाया कुछ खरीदा और चल पड़े आगे हमने भी एक किलो गुड़ खरीदकर सभी को जता दिया कि हमारी परचेसिंग पॉवर कितनी है।  सहारनपुर से आठ किलोमिटर पहले हाइवे आया तो हम उतर गए लेकिन ये क्या पान वाले ने बताया हुज़ूर आप गलत उतर गए हैं आठ KM तो टपरी जंक्शन है हम भीतर ही भीतर ख़ूब मुस्कुराए ऑटो लिया टपरी फिर सहारनपुर फिर बस सेमुजफ्फर नगर फिर टैक्सी से मेरठ और रात्रि मात्र 12 बजे घर। अब आप सोच रहे होंगे ये तो बेवकूफी थीं जी नहीं हुज़ूर ईश्वर सब सोच समझकर करता है। अब आप खुदई सोचिए उस गुड़ वाले को 50 रुपए देने थे तो थे पिछले जन्म का उधार होगा भई ऑटो वाले को, बस वाले को और फिर टैक्सी वाले को । अब ज़्यादा दिमाग़ मत लगाइए मियां " मन चाहा होता नहीं प्रभु चाहें तत्काल" समझे के नाही। 

विशेष: अगर मंच पर आमंत्रित अतिथि यदि किसी कारणवश न आएं हों तो औरों को भी मौका दीजिए हुज़ूर आख़िर ग़ज़ल कुम्भ में आने वाले क्या इत्ते गए बीते हैं कि उन्हें मंच पर भी आमंत्रित भी न किया जा सके। दो सत्रों के बाद वही मंच वही चेहरे जे अच्छी बात न है जी कुछ जम भी न रिया है।
तनिक सोचिए ज़रूर हुज़ूर 

प्रदीप डीएस भट्ट:27012025





                                                                                                                                                                               




         

         

Sunday, 19 January 2025

" प्रधानमंत्री ने शेर पढ़ा है भई "

लघुकथा 
          
          "प्रधानमंत्रीे ने शेर पढ़ा है भई"

         प्रदेश सरकार की साहित्य अकादमी द्वारा साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले कवियों,लेखकों, शायरों हेतु विभिन्न श्रेणियों के लिए पुरूस्कार घोषित किए जा चुके थे। यूँ तो प्रविष्टियां हर साल मंगवाई जा रही थीं किन्तु मुख्यमंत्री कार्यालय अगले साल अगले साल कहकर पत्रावली विभाग को वापिस लौटा देता था। चूँकि इस साल चुनाव होने थे तो पिछले पाँच सालों के लिए एक साथ प्रविष्टियां मंगवाई गईं और आनन फानन में पुरुस्कारों की घोषणा भी कर दी गई। पुरस्कृत होने वालों की सूची प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में आते ही चर्चाओं का केंद्र बन चुकी थीं । पुरूस्कार प्राप्त करने वाले सभी के मोबाईल पर बधाइयों का तांता लगा हुआ था। कुछ साहित्यकार इस सम्मान से फूले नहीं समा रहे थे तो कुछ पुरुस्कार न मिलने की पीड़ा से व्यथित हुए जा रहे थे। कुछ ऐसे भी थे जिनका सूची में नाम आ चुका था किन्तु वे दूसरे की सम्मान राशि को लेकर दुःखी थे कि हाय हमें इतनी और उसे उतनी क्यूँ मिली। चूँकि प्रदेश में कुछ ही दिनों में चुनावों की तारीखों का ऐलान होने वाले था अतएव मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से प्राप्त संदेश के दबाव में प्रदेश साहित्य अकादमी ने घोषणा के एक हफ़्ते के भीतर ही सम्मान समारोह की घोषणा भी कर दी।

         आख़िर वो दिन भी आ पहुँचा जब प्रदेश की राजधानी के प्रतिष्ठित गाँधी सदन में पुरूस्कार समारोह  आयोजित हुआ। सभी लेखक शायर कवि विभिन्न वेशभूषाओं से सुसज्जित साथ में थोड़ी सी ठसक के साथ में हॉल में प्रवेश करते जा रहे थे। कार्यक्रम शुरु होने के कुछ देर बाद ही मुख्यमंत्री ने एक एक करके सभी काव्य मनीषियों को सम्मानित किया। अब बारी थी मीडिया से मुखातिब होने की। प्रश्नों की बौछारों के बीच एक पत्रकार ने पूछ ही लिया एक साथ पाँच सालों के पुरूस्कार घोषित करने का मतलब कहीं राजनैतिक फायदा उठाना तो नहीं मुख्यमंत्री महोदय । प्रश्न सुनकर मुख्यमंत्री महोदय थोड़ा मुस्कुराए फिर पलटवार बोले चुनाव भी तो पाँच सालों के लिए होते हैं बन्धु! अभी मुख्यमंत्री महोदय अपनी मुस्कुराहट समेट भी नहीं पाए थे तभी एक गुगली प्रश्न ने मुख्यमंत्री को विचलित कर दिया। प्रश्न था "शहबाज़ सिद्दीकी जिनकी अभी सिर्फ़ एक पुस्तक आई है उनका चयन किस आधार पर किया गया जब कि साहित्य के लिए अपना जीवन खपा देने वालों की एक लम्बी फ़ेहरिस्त है बता सकते हैं कि कुल जमा तीन सालों में उन्होंने ऐसा क्या कारनामा किया है वरिष्ठों को छोड़कर उन्हें चुना गया है"। आख़िर पुरस्कारों की बंदर बांट के निर्धारण का कोई तो मापदण्ड होगा।संयत होते हुए मुख्यमंत्री महोदय ने फिर अपनी कुटिल मुस्कान को समेटा और बोले क्या आपको पता नहीं कि "शहबाज़ सिद्दीकी का शेर माननीय प्रधानमंत्री जी ने सदन में पढ़ा है इससे ज्यादा बड़ा और क्या मापदंड होगा बताइए, बोलिए!!!!! सभी को अवाक स्थिति में छोड़कर मुख्यमंत्री विजयी मुस्कान बिखेरते हुए बाहर की ओर इस डर के साथ खिसक लिए कि कहीं कोई पत्रकार हरभजन की तरह सवालों का "दूसरा" डालकर उनके विकेट के तीनों डंडे ही न उखाड़ दे।

प्रदीप डीएस भट्ट-21012025

Friday, 17 January 2025

पाठ

            पाठ 

         सोफिया स्कूल का हॉल खचाखच भरा हुआ था.
शिरीष जो कि एक मौसम विज्ञानी था और ग्लोबल वार्मिंग पर अब तक उसकी चार किताबें आ चुकी थीं महीने में एक दो नेशनल या इंटरनेशनल सेमिनार अटेंड करने उसे यहाँ वहाँ जाना पड़ता रहता था इसलिए पेरेंट्स मीटिंग में ज्यादातर पत्नि मोनिका ही स्कूल आती थी किन्तु आज चूँकि स्कूल में ग्लोबल वार्निंग को लेकर शिरीष का लेक्चर था तो उसने सोचा लेक्चर के साथ साथ आज तथागत की ये शिकायत भी ख़त्म हो जाएगी कि पापा पेरेंट्स डे पर क्यूँ अनुपस्थित रहते हैं. वो मन ही मन बुदबुदाया बच्चों को क्या पता कि काम का दबाव क्या होता है, बुदबुदाते हुए उसने मोनिका को पेरेंट्स रो में बैठने का इशारा किया और स्वयं प्रथम पँक्ति में जा बैठा. 

Wednesday, 15 January 2025

कहानी ग्लोबल वार्निंग

" ग्लोबल वार्निंग "

         शिरीष ने गाड़ी पार्क कर जैसे ही घर में कदम रक्खा सुधा तुरन्त पानी का ग्लास लेकर ड्राइंग रूम में उपस्थित हो गई. गिरीश ने सुधा को ऊपर से नीचे की ओर देखा फिर बोला कुछ बात है सुधा,  सुधा ने एक दम अचकचा कर कहा नहीं ऐसा कुछ भी नहीं बस तुम पहले फ्रेश हो जाओ फिर बात करते हैं.  ठीक है कहकर शिरीष ने पानी का ग्लास टेबिल पर रखा और फ्रेश होने चला गया.  सुधा ने खाली ग्लास उठाया तो वो एक दम जैसे नींद से जागी फिर ख़ुद को कोसते हुए बोली ये क्या किया आज मैंने शिरीष को खाली पानी दे दिया.शादी के चौदह सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ था जब शिरीष ऑफिस या टूर से घर आया हो और सुधा ने उसे खाली पानी दिया हो.  शिरीष की बचपन से आदत थी कि वह जब भी स्कूल या कॉलेज से घर आता था पानी और गुड़ का सेवन करता था .सुधा जब इस घर में ब्याह कर आयी थी तो सासू माँ ने उसे पहले दिन ही ये हिदायत दी थी कि शिरीष की इस आदत का वो जरूर सम्मान करे और उसने आज तक इस आदत का पूरा सम्मान किया था किन्तु आज.  वो चुपचाप किचन में गई,  शिरीष और अपने लिए मसाले वाली चाय बनाई फिर दो तीन तरह के बिस्किट प्लेट में रखकर वह वापिस ड्राइंग रूम में आ बैठी.  थोड़ी देर में शिरीष सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहने ड्राइंग रूम में पहुँचा शिरीष को देखते ही सुधा उठी और कुछ कहने के लिए उसने जैसे ही मुँह खोला शिरीष ने हाथ के इशारे से उसे बैठने के लिए कहा जब सुधा बैठ गई तो शिरीष बोला जरूर कोई ऐसी बात है जिसने तुम्हें इतना विचलित कर दिया जिससे तुम पानी के साथ गुड़ देना भूल गईं.  आराम से बैठो एक लम्बी श्वांस लो फिर बताओ क्या हुआ .