Sunday, 21 December 2025

अंग्रेज़ी साहित्य 400/ per KG

रिपोर्ताज 

        " अँग्रेजी साहित्य 400/- per KG "

         उत्तर भारत में ठण्ड के प्रकोप के बीच कंबल का बुक्कल मार कर घूमते हुए अचानक फ़ेसबुक पर फ़्लैश होती खबर कि होटल सम्राट हैवंस,मेरठ में 19,20,21 दिसम्बर में तीन दिनी पुस्तक प्रदर्शनी है ।हमने भी सोचा दिल्ली में तो विश्व पुस्तक मेला 10 जनवरी से 18 जनवरी तक आयोजित होना है तो क्यूँ न एक दिन मेरठ की पुस्तक प्रदर्शनी को भी अपने दर्शनी दे ही आवें क्या पता कुछ हमारे मतबल का भी हो सो भैय्या कल बढ़िया से तैय्यार हुए और जा पहुँचे 🏨 सम्राट हैवंस।


         अभी अपनी स्कूटी को ठीक से खड़ा भी नहीं किया था कि निगाह पड़ी शकरकंदी का ठेला लगाए हुए चचा पर जो बड़े जतन से ठेले को व्यवस्थित कर रहे थे।पेट भरा हुआ था पर ससुरी नीयत का क्या करें। ठेले पर अंगार में भुनती हुई शकरकंदी पर हमने भी सोचा प्रदीप बाबू प्रदर्शनी तो बाद में भी देखी जाएगी पहले एक ठो प्लेट शकरकंदी का मजा ले लिया जाए सो महराज भैय्या धनिये की चटनी में लिपटी हुई भुनी हुई शकरकंदी के टुकड़े और उस पर घर का बना मसाला बुरकते हुए हाथ बस चटखारे लेकर खाते हुए असली वाला आनन्द आ गया।

        शकरकंदी के स्वाद का मजा लेते हुए जा पहुँचे पुस्तक प्रदर्शनी में शुरुआत में हिन्दी की पुस्तकों ने स्वागत किया दूसरी पँक्ति में अँग्रेजी की पुस्तकें 400/- per KG, भाई साहब देखते ही दिमाग़ चकरघिन्नी खा गया। आगे बढ़ा तो यही हाल गनीमत रही कि ये क़हर हिन्दी पुस्तकों पर लागू नहीं था। कुल 14 पन्क्तियों में सजी हुई पुस्तकों में से 8 में अँग्रेजी पुस्तकों पर यही टैग 400/-पर KG. शुक्र है शेष 4 में हिन्दी पुस्तकों पर 30 प्रतिशत छुट का टैग था। सच कै रिया हूँ संतोष तो था लेकिन भले ही अँग्रेजी पुस्तकों पर ही 400/- पर KG का टैग देख कर कुछ अच्छा नहीं लगा।

        अच्छी बात ये रही कि पुस्तक प्रदर्शनी की शुरुआत में रखी पुस्तक "बेगम का तकिया" जिसके लेखक पंडित आनंद कुमार हैं। बेसाख्ता मुझे आकाशवाणी से हवामहल में प्रसारित इसका नाट्य रूपांतरण सुनने का मौका मिला है। इसमें दो भाइयों के मध्य एक संवाद है I 
पहला:एक बात कहना चाहता हूँ 
दूसरा: बोलो 
पहला:तो दूसरी बात ये है 
पहला: अरे पहले पहली तो कह 

        ख़ैर बेगम का तकिया के अतिरिक्त जॉन एलिया की "यानी"  मोमिन, जॉक, मंटो की लोकप्रिय कहानियाँ के दो पार्ट ख़रीद लिए सच कह रहा हूँ मन को बड़ा संतोष मिला। ज्यादा कुछ था भी नही देखने और समझने को,पुस्तकें भी लिमिटेड और खरीदने वाले भी सो ये सोचकर बाहर आ गये कि 20 दिन बाद अगला पड़ाव विश्व पुस्तक मेला होगा अगले बरस 2026 में क्यूँ ठीक कै रिया हूँ न।

-प्रदीप डीएसभट्ट-21122025

Friday, 12 December 2025

भौं-- भौं भौं-- भौं

भौं --भौं भौं-- भौं 

         अभी हमने अंगड़ाई लेते हुए सुबह की चाय को होठों से छुआ ही था कि हमारे प्यारे मित्र लमन्डेस जी आ धमके। राम राम के बाद बोले गुरु वो है न रेणुका चौधरी? हमने अधमिची आंखों से उंघते हुए पूछा कौन रेणुका चौधरी बे तो वो एक दम से तैश में आ गए फिर बिफरते हुए बोले अरे वही रेणुका चौधरी जिसकी हंसी सुनकर मोदी जी ने स्पीकर को कहा था जनाब इनकी हंसी सुनकर रामायण की एक पात्र की याद ताज़ा हो गई। अब भैय्या रामायण में बड़े बड़े करेक्टर हुए हैं लेकिन लेकिन लेकिन हंसी तो ताड़का ताई की ही फेमस थी शायद प्रधान सेवक का इशारा उसी ओर था खैर जैसे ही लमन्डेस जी ने रामायण का ज़िक्र किया हमारे चक्षु बिना चाय पिए ही बड़मंटे से खुल गए। हम सीधे होते हुए बोले क्या हुआ लमन्डेस तनिक जल्दी बताओ और हां पहले ये बतावा अपनी प्यारी भौजाई लम्न्डिरी कैसी हैं।  लमन्डेस जी सुनते ही बिदक गए अरे यार हम यहाँ सस्पेंसफुल ख़बर देने आए हैं तुमको और तुम हो कि हुड़कचूल्लू की तरह लमनडीरी के पीछे पड़े हो। अबे हम अगर यहां है तो वो भी अच्छे से होगी ही वो भी अपने घर में टांग पे टांग चढ़ाए। हमने तुरत हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी तब जाकर  लमन्डेस जी शांत हुए। फिर एकदम दार्शनिक अंदाज़ में बोले अबे कल रेणुका चौधरी उर्फ़..... अपनी गाड़ी में पति को न लाकर एक ठो आवारा कुत्ते को लेकर आई। पत्रकारों ने पूछा तो जवाब में भौं -- भौं भौं --भौं बोलकर लोकसभा में घुस गई। एक बात पल्ले न पड़ी वो आवारा कुत्ता गाड़ी की ठंडी हवा में इतना मस्त क्यूँ था कि भौंकना ही भूल गया वो आवारा था या पालतू खैर लौटते हुए पत्रकारों ने फिर टोका तो बोली संसद में भी तो हैं अब भैय्या पता नही वो अपनी पार्टी के माननीयों के लिए बोल रही थीं या.. आगे की बात लमन्डेस जी ने भी अधूरी प्रेम कहानी की तरह हवा में ही अधूरी छोड़ दी।

         बाक़ी सब बातें तो हमने बिना डकार लिए हज़म कर लीं लेकिन कुत्ता भौंका नही बस अपने सोचने की सुईं यहीं पे आकर अटक गई। हमने ध्यान से लमन्डेस जी को देखा फिर पूछा कुत्ता देखने में कैसा था। लमन्डेस जी ने अपनी आधी मुंडी हवा में आसमान की ओर की मतबल वो जताना चाह रहे थे कि उनके सोचने में भगवान जी के सैटेलाइट का हाथ हो फ़िर खोपड़िया पर अपनी उंगलियों से तबला बजाते हुए बोले बस छोटे से कद का होगा भूरे रंग का, माथे पे सफ़ेद सी लकीर थी और भी कुछ था पर याद नही बस इतना याद है कुत्ता भौंका पता नहीं क्यूँ पर ससुरा भौंका नही गुरु। कुत्ता दो काम ज़रूर करता है टांग उठाकर मूतेगा भी और भौंकेगा भी काटे न काटे ये उसकी मर्ज़ी या यूं कह लो गुरु कंडीशन अप्लाई। हमने अपनी बरबंटे जैसी आंखों को थोड़ा और चौड़ा किया फिर लमन्डेस से बोले सुनो बे हम आज तुम्हें कुत्ते की एक ऐसी प्रजाति के बारे में ज्ञान देंगे जिसे आज तक किसी ने किसी को न तो दिया और आगे भी न देगा। लमन्डेस थोड़ा और नज़दीक को खिसक कर बैठ गया फिर बोला जैसा भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिया था कुरुक्षेत्र में कुछ वैसा वाला गुरु। हमने न में मुंडी हिलाई तो लमन्डेस हल्के से गुर्राते हुए बोला अबे सीधे सीधे बोलो हमें बेकार में ज्ञान मत पेलो बे हम बनारस से हैं दूसरों को ज्ञान पेलते हैं। हमने लमन्डेस को घुरकर देखा फिर बोले अफ्रीका में बेसेंजी प्रजाति बार्कलेस डॉग यानि बिना भौंकने वाला कुत्ता पाया जाता है। उसके न भौंकने का कारण जानते हो उसके गले की संरचना यानी लेरिंक्स सामान्य कुत्तों से अलग होती है यानि थोड़ी पतली और चपटी बस यही कारण है वो जोर से भौं भौं नहीं कर पाता। बेसेंजी अलग तरह की आवाज़ निकालता है जिसे योडल या बरु कहते हैं। ये कुछ ज्यादा तेज़ और फुर्तीला होता है। शिकारियों के लिए बेमिसाल कुत्ता, शिकार देखकर यूडली यूडली करता है जिससे शिकार को पंछी होने का भ्रम हो जाता है। बेसेंजी अपने मालिक से प्यार तो करता है लेकिन हर वक्त उसके नाम की माला नहीं जपता जहां कोई यूडली दिखाई दी तुरन्त दुड़की लगा लेता है आख़िर आज़ादी भी कोई चीज़ होती है भाई साहब। लमन्डेस ने व्यंग्यात्मक लहज़े में पूछा और कोई खासियत हो तो भी बतावें हुज़ूर। हमने दोनों हाथ सर के पीछे करते हुए ज्ञान की आखिरी पंक्ति भी मुखारबिंद से उड़ेल दी। देखो मियां ये बहुत बड़े वाला सफ़ाई पसंद कुत्ता है यानि स्वच्छ भारत अभियान का छोटे वाला ब्रांड एंबेसेडर। 

          लमन्डेस जी बिफरते हुए बोले अरे यार हम रेणुका चौधरी द्वारा लाए कुत्ते की बात कर रहें हैं और तुम हो कि कुत्ता ज्ञान बघारे जा रहे हो। हमने वक्त की नब्ज़ पकड़ी और कमर को सीधा करते हुए बोले देखो लमन्डेस मियां तुम्हें वो अतिकवा याद है न इलाहाबाद का गुंडा हां वही जिसके घर नेता जी यानि मुल्ला मुलायम गए तो सार्वजनिक तौर पर अतिकवा के कुत्ते से हाथ मिलाया ताकि अतिकवा से दोस्ती बनी रहे, दोस्ती बनी रहेगी तो मुस्लिम वोट बने रहेंगे और ये दोनों बने रहेंगे तो नोट तो खुदई बने रहेंगे न और उन नोटों पर नमाजवादी का कब्ज़ा। इसलिए कुत्तों से प्यार करो फिर जो चाहोगे मिलेगा। इससे पहले कि लमन्डेस हमारे ज्ञान के बीच में फिर अपना ज्ञान बघारते हमने ज़रा रुको का इशारा करते हुए एक खट्टी डकार ली जिससे लमन्डेस और हम ख़ुद भी थोड़ा अटपटा गए लेकिन चारपाई से उतरकर गुजरे जमाने की आराम कुर्सी पर पसरते हुए शुरू हो गए।

         देखो मियां लमन्डेस कुत्तों से प्यार करना तो पाप न है लेकिन हर जीव जंतु की अपनी जगह होती है। पहली रोटी गाय की और आखिरी रोटी कुत्ते की ही क्यूँ बनती है सोचा है कभी? लमन्डेस बोले सुने हैं बे वो भी बचपन से पचपन तक। हमने लमन्डेस की ओर आँखें घूमाते हुए पूछा जाने कितनी तस्वीरें इंद्रजाल पर मौजूद हैं जहां राहुल गाँधी विभिन्न मुद्राओं में कुत्ते के साथ फुटवा में मौजूद हैं। करनाल में भारत जोड़ो यात्रा में सफ़ेद रंग का श्वान उनके साथ साथ चल रहा था मजे कि बात पट्टा कुत्ते के गले में और चेन राहुल के हाथ में।
अगर कोई पत्रकार उस धौले रंग वाले कुत्ते का इंटरव्यू ले लेता तो निश्चित वो कुत्ता बड़ी शान से कहता अगर मैं न साथ चलूं तो भारत जोड़ो यात्रा भारत तोड़ो यात्रा में तब्दील हो जाती। अब भैय्या अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर राहुल गाँधी ने सेना के कुत्तों के साथ योग करते हुए तस्वीर पोस्ट की थी तब सच बता रिया हूं सेना के कुत्तों ने राहुल को कॉम्प्लेक्स दे दिया था। और तो और राहुल का पर्सनल कुत्ता जिसका नाम pidi पीडी है से घने से अच्छा वाला प्रेम करते हैं।  शायद ये गुण उनको उनकी चाची से मिला है वो भी 🐕 प्रेमी हैं। लमन्डेस जी रोकते हुए बोले ये तो ठीक है लेकिन वो किस्सा याद है न जहां कांग्रेसी राहुल के घर मीटिंग में व्यस्त हैं और राहुल का प्रिय pidi भी एक कुर्सी पर विराजमान है। भाई साहब कुछ भी कहो राहुल की निगाह में सब एक समान है फिर वो pidi कुत्ता हो या कॉन्ग्रेसी। जिस प्लेट से राहुल pidi को बिस्कुट खिला रहे हैं उसी प्लेट से कांग्रेसी भी बड़े चाव से बिस्किट गटक रहे हैं, मज़बूरी है लेकिन क्या करें राहुल बाबा नाराज़ हो गए तो न प्लेट नसीब होगी न बिस्किट। बस एक नासमझ कांग्रेसी उस मीटिंग में था वो क्या नाम है उसका हेमंत बिस्वा शर्मा। कित्ता नासमझ है शर्मा बताओ जी ज़मीर न बेचकर भाजपा की तरफ़ दुड़की लगा दी। भाई खा लेते pidi की प्लेट से एक बिस्कुट कम से कम आज मजे से ठाली रहता घर में और यहाँ वहां घूमकर राहुल को कोसता कि भैय्या हम भी जवान और राहुल भी जवान लेकिन दोनों को कुछ न मिला काम। अब कोई पूछे उस हेमंतवा से भाजपा में जाकर क्या मिला उसे कुछ भी तो नहीं, बस असम का मुख्यमंत्री और पूरे पूरा नॉर्थ ईस्ट का इंचार्ज और हां मां के साथ भारत मां भी सेवा कर रहा है। भले ही हेमन्ता ने कांग्रेस छोड़ दिया लेकिन इससे कांग्रेस के कुत्ता-नेता साम्य भाव पर कुछ फ़र्क पड़ा क्या कुछो भी तो फ़र्क नहीं पड़ा। 

         जहां तक राहुल गाँधी की इस टिप्पणी का प्रश्न है कि संसद के अंदर भी पालतू बैठे हैं तो भाजपा को इसमें कतई बुरा नहीं मानना चाहिए। शायद वो भी तो अपने सांसदों के बारे मे बता रहे थे या उन्हें शब्दों के बूस्ट से नहला रहे थे। और भाई साहब जहां तक रेणुका चौधरी की बात है कि वे संसद के प्रांगण में कुत्ता लेकर क्यूँ आईं तो सोचो भाई उन्होंने एक संदेश दिया है कांग्रेस साफ़ दिल की पार्टी है वो सांसदों और कुत्तों में तनिक भी भेदभाव नहीं करती हो सकता है बंगाल चुनाव में कॉन्ग्रेस किसी देसी विदेशी नस्ल के कुत्ते को खड़ा कर दे और कोई बड़ी बात नही कि वो कुत्ता एम एल ए भी बन जाए और क़िस्मत ठीक रही तो मंत्री भी। अब इससे एक पंथ दो काज हो गए न जीवों पर दया भी, चुनाव में जीत भी और भैय्या परिवारवाद का आरोप भी गायब। हो तो ये भी सकता है कि वे उस कुत्ते को कांग्रेस की सदस्यता दिलवाने लाई हों, क्योंकि वोट चोरी के मुद्दे तो फ्लॉप हो गए फिर भी कॉन्ग्रेस है कि वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा लगातार हफ़्ते भर कढ़ाई में पड़े हुए सडेले रिफाइंड में इस नारे से दस बीस भटूरे और तल लेना चाहती हो लेकिन उन भट्टूरों को जनता क्या ख़ुद उनकी पार्टी के नेता भी सूंघने को भी तैयार नहीं। और मैं तो नू कै रिया हूं कि लोकसभा राज्य सभा में जितने भी कांग्रेसी हैं सब 19 दिसंबर से पहले एक एक देसी या विदेशी कुत्ता संसद प्रांगड़ में लाकर कुत्ता जिंदाबाद का नारा लगवा दें इसी बहाने राहुल गाँधी को ख़ुश करने का मौक़ा भी मिल जाएगा और हो सकता है इसी बहाने राहुल गाँधी कुत्तों के लोकतंत्रिक अधिकार की लड़ाई लड़ने वाले वड़े वाले नेता बन जाएं। वे कुत्तों को वोटिंग का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कांग्रेस के नेताओं से अधिक वफादार कुत्ते ही होते हैं। 

         लमन्डेस जी ने शायद इससे पहले इत्ता कुत्तों पर इत्ता सारा ज्ञान आज तक लपेटा न था सो वो औकते हुए उठे और मेरे द्वारा दिए गए दिव्य ज्ञान को वॉश बेसन में उल्टियाए। अलप सलप करके लमन्डेस जी फिर बाजू में आ बैठे और लगे हमारे कुत्तई ज्ञान की प्रशंसा करने। हमने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया तो बोले गुरु ये रेणुका चौधरी का गली का आवारा सा कुत्ता बढ़िया वाली बड़ी सी गाड़ी में! साले ने क्या क़िस्मत पाई है सच कै रिया हूं हम तो बस सोचने के लिए बने हैं एसी गाड़ी में तो कुत्ते पहले से घूम रहे हैं लेकिन लोकसभा का प्रांगण न न न। हम साले चालीस साल से दिल्ली में झक मरा रिए है बस टी वी पर लोकसभा देखकर खुश हो रहे हैं और एक ये है आवारा गली का कुत्ता जिसकी किस्मत का ताला रेणुका ताई ने खोल दिया। चलो आज संध्या वंदन में भगवान जी से अगले जनम मुझे कुत्ता बनाईयो की गुहार लगाते हैं वैसे गुरु तुम्हारी ज्ञान गंगा भी गज़ब की है तभी तो हम तुम्हें अपना बड़े वाला गुरु मानते हैं लेकिन एक बात तो बताओ तुम कुत्तों पे इत्ता ज्ञान कहां से पाए हो बे कहीं तुम पिछले जन्म में......... आगे के शब्द लमन्डेस जी ने हवा में फिर तैरने के लिए छोड़ दिए। 

प्रदीप भट्ट 
व्यंग्यकार, मेरठ 

Saturday, 6 December 2025

परफेक्शन

                "परफेक्शन"

         गाँव का चौकीदार भुवन भागता हुआ चौपाल पर पहुंचा और हांफते हुए चौपाल का आंगन लीप रही धनवंती से बोला प्रधान जी कहां हैं। धनवंती ने ख़ुद को सीधा किया फिर बोली छत पे कसरत कर रे हैं वैसे चौपाल तो दस बजे सजेगी अभी तो आठ भी न बजे और तू हांफ क्यूँ रहा है क्या बात हुई बता। धनवंती की बात का जवाब दिए बिना दीनानाथ छत की ओर लपक लिया। प्रधान जी प्रधान जी कालीदीन के खेत पर एक लाश पड़ी है। प्रधान जी सीधे होते हुए बोले थानेदार को बताया। कालीदीन ने हां में मुंडी हिलाई तो प्रधान जी धोती लपेटते हुए बोले पता लगा लाश किसकी है। कालिदीन ने फिर ना में मुंडी हिलाई तो प्रधान जी बोले पूरे गांव को बुला ला और हां उन चारों को भी। ठीक है कहता हुआ कालिदीन सीढ़ी से नीचे उतर गया।

        दरोगा जी दो सिपाहियों के साथ कालिदीन के खेत में पड़ी लाश को बांस की खपच्चियों से घेरे हुए खड़े थे साथ में गांव प्रधान शंकर विश्नोई भी। लोग आते दूर से लाश को देखते और पहचानने से इंकार कर देते। दरोगा जी प्रधान से बोले पूरा गांव ना में मुंडी हिला रहा है अरे कोई तो कुछ बताओ आख़िर ये लाश किसकी है। प्रधान जी ने पूरब दिशा से आ रहे चार लोगों की तरफ़ इशारा किया। चारों पास आए तो प्रधान जी बोले आप चारों भी लाश देख लो और दरोगा जी को कुछ सुराग दो। पण्डित रामलुभवन मिश्र जी गए लाश के चारों ओर चक्कर लगाया फिर दरोगा से बोले लाश के शरीर पर जनेऊ है, ललाट पर तिलक आधा मिट गया है शिखा में गांठ भी लगी है मरने वाला पक्का ब्राह्मण है। दरोगा बोला ये मुझे भी पता है तो इसमें नया क्या है? फिर श्रीधर गुप्ता को इशारा किया, श्रीधर गए चक्कर लगाया और लौटकर दरोगा से बोला लाश के पास एक थैला है उसमें से हिसाब की बही झांक रही है साथ में कलम नत्थी है मानो न मानो मरने वाला बनिया है। दरोगा ने घूर कर श्रीधर को देखा फिर तीसरे राम सिंह को इशारा किया, राम सिंह ने भी लाश का चक्कर लगाया और लौटकर बताया कि लाश के शरीर पर तलवार के कई घाव है उसके हाथ में भी तलवार का मूठ है जो दर्शाता है कि वो लड़ते लड़ते मरा। निश्चित ये क्षत्रिय होगा। अब दरोगा ने खीजते हुए चौथे को जाने का इशारा किया चौथा जो चर्मकार था ने भी लाश का चक्कर लगाया फिर लौटकर दरोगा से बोला साहब मैं इनके जीत्ता परफेक्ट विद्वान तो न हूं पर एक बात पक्की इस लाश के पैर में दस नम्बर की जूती ही आएगी, बाक़ी आप देख लो।


प्रदीप भट्ट -- 06122025

Monday, 24 November 2025

" चिख़ुरी कुछ नया लिखा क्या "

रिपोर्ताज 

"चिख़ुरी कुछ नया लिखा क्या "

        अचानक फ़ोन की टुन्न टूनिया बज उठी। दूसरी तरफ़ गुरुग्राम से डॉक्टर प्रवीण शर्मा थी, उन्होंने राधे राधे कहा और हमने जय श्रीराम यानि उन्होंने द्वापर का प्रतिनिधित्व किया और हमने त्रेता का 😄 प्रवीण जी ने आग्रह किया कि उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर ABS4 "प्रज्ञान विश्वम" का विशेषांक निकाल रही है अतएव आपसे प्रार्थना है कि आप इसमें अपना सहयोग अवश्य दें। सहयोग से कुछ और मतबल मत निकाल लेना पाठकों🤔😎😎 यहाँ सहयोग का तात्पर्य आलेख से था, पईसे से बिलकुल भी नी, हाँ नई तो। ख़ैर हाँ भर दी।

तो भैय्या 19th नवम्बर को रेपिडो फिर रैपिड मेट्रो नमो भारत का आनन्द लेते हुए जा पहुँचे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया वो भी 10:10 पर। यूँ प्रश्न वाचक दृष्टि से मती देखो 👀👀👀👀 टेम से पहुँचने की अच्छी वाली आदत है म्हारी समझे के नाही।👑👑👑 तो बस म्हारे से पहले कौन होगा वहाँ सोचो सोचो,सही पकड़े हैं 😺😺😺😺 शर्मा फैमिली। भाई साहब कित्ता भी समझा लो पर सबको यही ग़लत वाली फैमिली है कि वो मुन्शी प्रेमचंद और दिनकर से भी बड़े साहित्यकार हैं 😡😡😡😡

         ख़ैर सवा ग्यारह बजे गायत्री मंत्र से प्रोग्राम की शुरूआत हुई। मुख्य,विशिष्ट और अतिविशिष्ट कौन था राम जाने पर हम थे न मात्र अतिथि सो नीरव जी के आग्रह पर लगे हाथ कइयों को सम्मानित कर डाला।😍😝😍😝😍😛 अब चूँकि प्रोग्राम तो डॉक्टर प्रवीण शर्मा, गुरुग्राम की अभी तक की शैक्षणिक, सामाजिक एवं साहित्यिक यात्रा को स्मरण करने का था सो इस कार्य हेतु साहित्य एवं राजभाषा हिन्दी की अलख जगाती संस्था अखिल भारतीय सर्वभाषा, संस्कृति समन्वय समिति ने डॉक्टर प्रवीण शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर "प्रज्ञान विश्वम" का विशेषांक निकालने का निर्णय लिया। निश्चित ही ये कार्य साहित्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे साहित्यकारों के लिए विशेष जड़ी बुटी देने का कार्य कर रहा है जिसके लिए सुरेश नीरव जी बधाई के पात्र हैं।

" साहित्यिक यज्ञ की गिलहरी "

         मेरा मानना है कि आप किसी भी क्षेत्र से संबंध रखते हो यदि आपको अपने जीवन के शुरु में मध्य में या रिटायरमेंट के बाद साहित्य का कीड़ा काट ले तो आपके सोचने समझने के तरीके में बदलाव आ जाता है। जहां तक संपूर्ण जीवन का प्रश्न है वो भी माया काया के फेर से द्वंद करते हुए अंततोगत्वा साहित्य में अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है ऐसा इसलिए भी कि युवावस्था में जहां लेखक प्यार व्यार में अपनी लेखनी को ज़्यादा सक्रिय रखता है वहीं शादी का लड्डू खाने के कुछ महीनों या वर्षों के बाद उसे जीवन के धरातल के अनुभव होते हैं तब उसकी लेखनी कम किंतु अनुभव आधारित लिखने लगती है। यूं तो मनुष्य जिम्मेदारियों से कभी भी पीछा नही छुड़ा पाता किंतु जिम्मेदारियों के पूर्ण होने पर उसकी कलम सत्य लिखने का साहस कर पाती है वैसे ऐसा सबके साथ नही भी हो पाता किंतु जो लेखक इन अनुभवों को जीते हैं वे जानते हैं कि सत्य कहने और लिखने में यक़ीन रखते हैं उन्हें ज्ञात होता है कि वे किन परिस्थितियों से होकर इस लक्ष्य तक पहुँच पाए हैं।

         9 फ़रवरी 2025 को प्रेस क्लब में हुई पहली मुलाक़ात से लेकर 19 नवंबर तक के सफर में मैं जितना उन्हें जान पाया,समझ पाया उन्हें शब्दों में बांधकर उनके लिए कुछ लिखकर मैंने भी प्रवीण जी की साहित्यिक यात्रा के हवन में अपने हिस्से की आहूति डाल दी। प्रवीण जी में नया और वो भी कुछ अलग करने की इच्छा ज़बरदस्त है। अच्छी बात ये रही कि ये शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी रही हैं जहां सदैव कुछ अलग करने की संभावनाएं सदा मौजूद रहती हैं। उन्हीं संभावनाओं को टटोलती उनकी दृष्टि सदैव कुछ नया पा ही जाती है। हरियाणा जो कि उनकी जन्मभूमि भी है और कर्मभूमि भी में संतुलन साधते साधते प्रवीण जी धीरे धीरे साहित्य की ओर आकर्षित हो गईं और साहित्य तो प्रेम की वह अविरल धार है जिसमें से जिसे जो चाहिए वह निश्चित ही पा जाता है। अच्छी बात ये रही कि अपनी शैक्षणिक यात्रा के दौरान इन्हें दिल्ली हरियाणा की जर्नी में इन्हें कई ऐसे किस्से मिले जिसे इन्होंने अपनी लेखकीय यात्रा में इस्तेमाल किया है।

        जहां तक प्रवीण जी की कविताओं का प्रश्न है उनमें मन में त्वरित उपजे भावों की अभिव्यक्ति नज़र आती है। उनकी कविताई प्रकृति, मानव पीड़ा, श्रृंगार के इर्द गिर्द बुनी लगती है, एक बानगी देखिए:

  
राम जो तुम आ जाते एक बार 
तो बेड़ा सबका हो जाता पार 
हम नव दीप जलाते,
उपवन में फूल खिल जाते।
संसार सुखी हो जाता 
राज विद्या बुद्धि का होता 
दुःखी न रहता कोई,
धन्य धान से वंचित रहता न कोई 
राम जो तुम आ जाते एक बार 
आ कर कुछ तो करते जतन 
आकर धर्म का रोकते पतन।

होती पितृ भक्ति की जय जय कार 
होता भरत लक्ष्मण भाई सा प्यार 
राम जो तुम आ जाते एक बार 

         सवा बजे कार्यक्रम सम्पन्न हुआ और फिर लंच। सो भैय्या आदत अनुसार दो पीस गुलाम जामुन पेट में डालकर ब्राह्मण कुल में जन्म होने का कर्तव्य पूरा किया 😍😍😍😍 फिर थोड़ा सा ये थोड़ा सा वो और निकल पड़े वाया मेरठ वाया दिल्ली विश्वविद्यालय होते हुए 🍩🍩🍩🍩एक बालक को जन्मदिन की शुभकामनायें देते हुए। क्यूँ अच्छा किया न महाराज 

प्रदीप डीएस भट्ट - 25112025

Friday, 21 November 2025

हरबे हरबे -- जितबे कब

"हरबे हरबे जीतबे कब" 

सन् राइज के चक्कर में सन सेट करा बैठे 
"गिरे तो भी टांग ऊपर"

         अपना भारत देश भी जो है न भाईसाहब पूरा गजबई से भरा हुआ देश है। यहाँ कौन क्या और कब कुछ ऐसा कर देता है जिसे समझने में ही लोगों के पांच सात साल निकल जाते हैं। बात अगर गांव की करें तो अलग ही कहानी चल रही होती है। वहां खाता न बही, जो प्रधान जी ने कही बस वही सही। आजकल जिसे देखो एस आर आई ,एस आर आई खेलने पे लगा हुआ है। वोटर कार्ड तो अपना भी है लेकिन मुम्बई का। अब भैय्या फार्म नम्बर छः भरकर ऑनलाइन ऑफलाइन दोनों तरह से दे दिया है लेकिन सूचना अब तक भी न प्राप्त हुई। अब चूंकि हम अभी यहाँ नए हैं तो आस पड़ोस से पूछताछ की तो पता चला सबके वोट गांव के है हमने पूछा ऐसा काहे महराज बोला हमारे वोट की कीमत शहर में नहीं है जनाब लेकिन गांव में भरपूर है। गांव में चुनाव चाहे प्रधानी का हो या विधायक का या फ़िर लोकसभा का ग्राम प्रधान महीने भर पहले से दे फ़ोन दे फोन करके कन्फर्म करता रहता है कि कहीं हम टपक तो नहीं गए। हमारे एक वोट से गाँव की प्रधानी जा भी सकती है और मिल भी सकती है और खातिर दारी के तो क्या ही कहने। भाई साहब हमें पहली बार अपने वोट की क़ीमत का पता चला साथ में बड़े वाला दुःख भी हुआ कि हम गांव से छिटके क्यूँ और ख़ुद छिटके तो ठीक वोट काहे छिटकवा दिए बे। फिर भारत तो उत्सवों का देश तो हइए ही चुनावों का भी देश है इसलिए हलवाईयों की दुकान भी चलती रहती है। चुनाव के बाद वोटरों की लड्डू खाने की डिमांड जो रहते हैं।

         खैर एक बात तो पक्की है कि नेता चाहे छुटभैय्ए हो बढ़ैया उनका जीत से बड़ा कोई नशा नहीं होता वरना क्या कारण है कि ग्राम प्रधानी या ब्लॉक के चुनाव जीतने के लिए क्या क्या और कैसे कैसे जुगाड/जतन नहीं किए जाते हैं। जुगाड/जतन से मतबल खून खच्चर से है मियां। पहले विरोधी लाठी डंडों से निबटाए जाते थे अब तमंचा काम में लिया जाता है। देसी तमंचे से काम चला तो ठीक वरना विलायती वाला बस काम होना चाहिए। मजाल है कि पुलिस चू चपड़ करे आख़िर आधी पुलिस भी तो गांव को ही बिलांग करती है जी। और भैय्या भगवान से पहले मुंह गांव वालों को दिखाना ज़रूरी जो है। ख़ास बात ये है कि विलायती तमंचे से जो विरोधियों को निपटा देता है उसकी धाक तो गांव में वैसे ही बन जाती है। गांव खेड़े में बात पैसे की कभी नहीं होती, होती है तो बस मूंछों की। दुई की जगह चार किल्ला जमीन बिक जाए लेकिन मूंछ नीचे नहीं होनी चाहिए। चुनाव जीतने के बाद नए प्रधान जी चौपाल में कुछ लठैत, कुछ चमचे और सरकंडों से बनी प्रधान जी बड्डी वाली कुर्सी। रोज़ शाम यहीं नज़ारा देखने गाँव का गांव आ धमकता है प्रधान जी के किस्से कहानियां सुनो और आधी परात पूरी सब्जी पेट में उतार लो फिर बड़ी वाली डकार मार कर घर वापिस। अगर मूड हुआ तो दीन दुनिया की ख़बरों पर तब्सिरा अलग से लेकिन गांव की हद में। ट्रंप रूस को धकियाए या चीन को या फिर ईरान को प्रधान जी ट्रंप में ख़ुद को और कभी कभी ख़ुद में ट्रंप को देखते हुए चूल्हे पर पकती काढ़ा हुई जा रही चाय के साथ पारले जी के पांच रुपए वाले बिस्किट को भिगोकर खाते हुए अपनी विशेष टिप्पणी देते और सभा बर्खास्त। लेकिन लेकिन लेकिन!!!!

         कैसा लगता होगा जब कोई चुनाव सिर्फ़ इसलिए लड़े कि उसे चुनाव हारना है तो। न न न आप ग़लती से सही समझ रिए हो मियां । मैंने कहा था न अपने देश में एक से एक लक़ड़ बग्घे पड़े हैं जो गांधी जी कि आत्मा को शान्ति दिलवाकर ही मरना चाहते हैं वरना क्या कारण है कि छियानवे हारों के बाद भी बंदा हारों की सेंचुरी पूरी करने के लिए कमर कसे बैठा है। भई उसपे तो फ़र्क न पड़ रहा है लेकिन छियानवे हारों से पार्टी की नींव जरूर भुरभुरी हो गई है। इस पार्टी की इमारत लखोड़ी ईंटों से बनी इमारत है जो एक सौ इकतालीस साल से जैसे तैसे सब कुछ झेल रही है। अच्छी बात ये है कि इस इमारत की नींव रखने वाले ए ए ह्यूम एक अंग्रेज थे अगर कहीं ये मिंग शिंग़ झे होते तो चांद तो छोड़ो ये इमारत शाम से पहले ही अपनी मिट्टी पलीत करवा लेती। मिलेगा मुकद्दर की तर्ज़ पर आशान्वित होना बुरा नहीं है लेकिन भाई ईश्वर ने हर चीज़ की एक्सपायरी निश्चित की हुई है। जनसंघ विलुप्त हुआ तो भाजपा का सूर्य सिर्फ़ उदय ही नहीं हुआ वरन चमका भी और खूब जोर से चमक रहा है और क्या चमक रहा है जी। सीटों में फर्क आया है लेकिन नीयत में कतई नहीं। जिन विचारों को लेकर जनसंघ चला उन्हीं विचारों के साथ पार्टी तो आगे बढ़ ही रही है साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रेटिंग डेटिंग दोनों भी बढ़िया चल रही है। ऐसा इसलिए भी कि भाजपा के शीर्ष को ये मालूम है कि "जिन्दगी की यही रीत है, हार के बाद ही जीत है " इसके उलट विपक्षी अपना गढ़ बचाने में ही सारी ऊर्जा स्वाहा किए जा रहे हैं। अब आप इस बात को इस उदाहरण से समझेंगे। अब भैय्या हम उदाहरण दे रहे हैं समझना न समझना आपके ऊपर है।

         अपने छोटे से शहर के बड़े वाले चौधरी साहब जनाब रौला सिंह। हटी इतने कि राज हट,बाल हट और स्त्री हट भी उनके हटी पन के आगे पानी मांगने लगे जी। राजनीति का चस्का इतना कि 56 वसन्त देख चुके हैं लेकिन राजनीति का ऐसा पैशन कि कि छोटे बड़े कुल मिलाकर 96 चुनावों में हार का मुंह देख चुके हैं लेकिन जनाब बात बात में अपनी जवानी की कसम खाने वाले रौला सिंह जी की सेहत पर रत्ती भर भी फ़र्क न पड़ रहा है और पड़ेगा भी क्यूँ भई उन्होंने छोटी सी जिन्दगी में एक ही तो शौक पाला है और वो है राजनीति का और मान लो वो 96 हार से घबराकर राजनीति से संन्यास लेने की सोच भी लें तो क्या गारंटी है राजनीति उन्हें छोड़ देगी। आख़िर उनकी 96 हारों से पता नहीं कितने घरों के चूल्हे जल रहे हैं। आख़िर दादा लाई 200 एकड़ खेती की ज़मीन में से अभी भी 52 एकड़ जमीन उन्हें कभी न कभी तो जीतेंगे वाली आस का दिलासा देती रहती है। जमीन चाहे पूरी बिक जाए लेकिन बस एक बार मैं जीत जाऊं इसी आस पर रौला सिंह के जीतने की घास लहलहा रही है। उस लहलहाती घास में कुछ लोग पानी डाल रहे हैं कुछ मदिरा और कुछ जले भुने लोग मट्ठा। अब रौला सिंह को कौन समझाए कि पानी मदिरा तक तो ठीक है लेकिन मट्ठा डालने वालों पर तो लगाम कसें या उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएं लेकिन जब मन हो पाजी तो क्या करेगा काज़ी। उन मट्ठा डालने वालों ने मट्ठे की बोतल पर हिमायनी पानी का लेबल लगा रक्खा है और रौला सिंह लेबल उतारकर सच्चाई देखना नही चाहते तो फिर तो जैसे गड्डी चल रही है चलने दो। अगले मार्च तक रौला सिंह अपनी सेंचुरी भी पूरी कर लेंगे और सो कॉल्ड महात्मा की आत्मा को शान्ति भी प्रदान कर देंगे। महात्मा जी की अंतिम इच्छा तो याद है अगर नहीं तो गूगल में उगल कर लो।

         अब ऐसा तो है नहीं कि वो इस तरह की महत्वाकांक्षा पालने वाले पहले व्यक्ति हैं उनसे पहले भी जाने कितने आए और जाने कितने गए लेकिन उनकी महत्वकांक्षा मरते दम तक उनके साथ चिपकी रही। आपको याद होगा धरती पकड़ अजी हाँ वही काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ बरेली वाले अजी वही उत्तर प्रदेश का जिला बरेली जहाँ 1966 में मेरा साया फ़िल्म की नायिका साधना का झूमका गिरा था। एक सच्ची बात और जान लो भैय्या कि 1941 में हरिवंश राय बच्चन की पत्नि तेजी बच्चन का सोने का झूमका वास्तव ? में बरेली में गिर गया था ,राजा मेंहदी अली खान ने इस घटना को गाने में पिरो दिया और भैय्या गाना भी सुपर डूपर हिट हो गया। 2020 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 200 किलो का झुमका बरेली चौक में स्थापित करवा दिया। एक गाने ने कमाल कर दिया न। तो भैय्या वही काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ ( जो व्यक्ति किसी कार्य हेतु उम्र भर उस कार्य से चिपका रहे जैसे काका जोगिंदर सिंह) ने कुल छत्तीस बरस में 350 से ज़्यादा चुनाव लड़े और सगरे के सगरे हारे ही एक्को बार भी जीत न मिली। वो खुदई वोटरों से कहते थे भैय्या मैंने वोट मति देना। इसके अलावा भी कानपुर के भगवती प्रसाद घोड़े वाला और ग्वालियर के मदन लाल। ये सभी चुनाव लड़े ही इसलिए कि चुनाव हार जाएं। काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ के अलावा तमिलनाडु के मैतुर्र शहर के पद्माराजन चिरस्थाई चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति हैं ये महराज अभी तक 238 चुनाव हार चुके हैं । इन्हें भले ही जोगिंदर सिंह की तरह इलेक्शन किन्ग की तरह याद न किया जाता हो किन्तु इनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में जरूर दर्ज़ किया गया है। 

         और लो जी बात करते करते इलेक्शन कमीशन ने पांच राज्यों में चुनाव भी घोषित कर दिये। असम केरल पुद्दुचेरी तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल अप्रैल में चुनाव होने निश्चित हुए हैं। रिज़ल्ट 4 मई को घोषित होगा। बंगाल में जहां धूम धड़ाका शुरू हो चुका है वहीं आसाम में सरमा जी आसाम की सपाट पिच पर अपनी धाकड़ बल्लेबाजी से छुटकू वैभव सूर्यवंशी को चैलेंज देते प्रतीत हो रहे हैं। अब मसला तो ये है कि जनाब रौला सिंह के चुनाव का ऊंट जिस करवट बैठना होगा बैठ जाएगा लेकिन ज्यूडिशियल ऑफिसर्स ( दूसरे राज्यों के एस आई आर अधिकारियों) को नौ घंटे बंधक बनाने पर सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च न्यायाधीश सूर्यकांत जी भयंकर गुस्सा गए हैं भई । अब पता नहीं बंगाल का ऊंट राष्ट्रपति शासन लगवाकर ही मानेगा क्या। इस बात पर किसी को कुछ लेने देने की भी न पड़ी है लेकिन जिस तरह से राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के नेता रूपी पंछी फुदक फुदक कर बड्डी वाली पार्टी का बाजरा चुग रहे हैं तो लगता है परिणाम ढाक के तीन पात ही रहने वाला है। लोग सेंचुरी सेंचुरी कर रहे हैं पर मैंनु ऐ लगदा है बंदा 96+4=101 का शगुन डाल कर ही मानेगा। चलो कोई तो है जो गांधी जी की आत्मा की तसल्ली के लिए कुछ योगदान दे रहा है। वरना धरती पकड़ हो या घोड़े वाला या कोई और उनका योगदान सिर्फ इतना था कि ख़ुद के लिए लड़े ख़ुद ही हारे लेकिन हंसते हुए क्यों कि वो चुनाव लड़ ही हारने के लिए रहे थे लेकिन ये बंदा पांच राज्यों में हारेगा और ख़ुश रहेगा। अजब ये होगा कि हार के लिए फिर कोई बकरा तलाश जाएगा और सारा दोष उस पर मढ़ दिया जाएगा और ये बंदा फिर निकल लेगा विदेश यात्रा पर अगले चुनाव में हार का गणित समझने और हार का अंतर ज़्यादा करने के लिए कोई प्रमेय सिद्ध कर लेगा, फिर कुछ दिनों बाद शान से सीना चौड़ा करके लौटेगा ये बताने के लिए कि मैं हारा नहीं हराया गया हूँ यानि गिरे तो भी टांग ऊपर।


प्रदीप भट्ट 
व्यंग्यकार,मेरठ
02042026
 

Wednesday, 12 November 2025

"काँपे टांग जाएंगी"

रिपोर्ताज 

        "कांपे टांग जाएंगी"

         इश्क़ भी अजब चीज़ है मियां कब किससे कहां और कितना हो जाए भाई साहब मैनू कि पता😻😻😻 किसी और नू पता होए तो मैन्नू भी दसना। अब आप भी सोच रिए होंगे ए कि गल्ल कित्ती तो भाई साहब पिछले तीन चार दशक में जोर जबरदस्ती से ही सही हम मंच शेयर कर ही रहे हैं 🤓🤓🤓🤓 लेकिन एक बात तो सच्ची सच्ची बता रिया हूं उर्दू फ़ारसी अरबी के बड़े बड़े लच्छेदार शब्दों के घाल मेल से महफ़िल सजती भी देखी है और भैय्या उजड़ती भी। दिल्ली मुम्बई हैदराबाद लखनऊ और छोटे मोटे का तो ज़िक्र ही क्या करना हुज़ूर😊😊 हमने ऐसी ऐसी नशिस्त देखी हैं जहाँ सुनने वाले और सुनाने वाले सब के सब अंतर्राष्ट्रीय😛😛😛😛😛😛 कोई भी ससुरा वॉकल फॉर लोकल ना हो रिया 👺👺बस बजट के चक्कर में भारत में आयोजन करके अंतरराष्ट्रीय होने का सुख प्राप्त कर रहे हैं। करो करो मैंनूं की लोड।

         सो महाराज जब भारत सरकार की सेवा से निवृत हुए तो मेरठ को अपना ठिकाना बना लिया। वो स्लोगन आपने सुना है न "जिन्दगी के साथ भी जिन्दगी के बाद भी" तो बस मेरठ में रहकर दिल्ली गुड़गांव गाजियाबाद में सुबह निकलकर साहित्यिक समारोहों में अपनी हाजिरी दर्ज कर आते हैं।👁️👁️👁️👁️ इसी क्रम में कथा रंग और "महफ़िल ए बारादरी" से जुड़ाव हुआ और वो भी सच्चा वाला। इसे ही शास्त्रों में सच्चे वाला इश्क़ कहते हैं हुज़ूर। महफ़िल ए बारादरी की सबसे बड़ी खासियत ये है यहाँ सिर्फ़ पढ़ने वाले ही नही अपितु श्रवण सुख प्राप्त करने वाले भी अपनी हाज़िरी लगाते हैं। बढ़िया वाले वैन्यू के साथ बढ़िया वाला मैन्यू भी ब्राह्मण का इसके बिना गुजारा न है जी 😛😛😛😛और शायरी UPSC क्रैक करके क्लॉस वन अधिकारी वाली। नवागंतुको के लिए  एकदम परफैक्ट पाठशाला। अब इत्ती सारी खूबियां हों तो इश्क़ तो होवे ही होवे, तो महाराज हमें भी हो गया। निश्चित इसके लिए डॉक्टर माला कपूर गौहर और रियल संयोजक के साथ एंकर भी  की तरह महफ़िल ए बारादरी नामक जहाज को संभाल कर रखने वाले आलोक यात्री जी। मैंने कुछ ज़्यादा तारीफ़ तो नी कर दी। अब कर दी तो कर दी भाया 🤠🤠🤠🤠🤠🤠🤠🤣 बुरा लगे तो हैप्पी 🫟।

         9 नवंबर को रैपिड 🚇 का आनन्द लेते हुए मेरठ से गाजियाबाद और फिर  रैपिडो का साथ,लो जी जा पहुंचे सिल्वर लाइन प्रेस्टिज स्कूल वो भी टैम से पहले। ठीक सवा तीन बजे आलोक जी ने माइक संभाला, दीप प्रज्ज्ववलन के बाद मित्र इंद्रजीत सुकुमार द्वारा सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की गई फिर माइक संभाला तरुणा मिश्र जी ने और लो जी कार्यक्रम विधिवत शुरू हो गया। इस बार की महफ़िल गज़लों के उस्ताद शायर कृष्ण बिहारी ''नूर'' की जन्मशताब्दी के अवसर पर विशेष आयोजन के तहत रखी गई।  मुख्य अतिथि नीना सहर,  गोविन्द गुलशन, डॉक्टर सुधीर  त्यागी जिन्हें इस बार "बारादरी जीवन पर्यन्त साहित्य सृजन सम्मान" से नवाजा गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इरफ़ान आज़मी जी ने की। सुरेन्द्र सिंहल जी, इंद्रजीत, दीपक श्रीवास्तव, बी के शर्मा जैदी, जगदीश पंकज, सुधा गोयल, वेद प्रकाश, रवि पाराशर, विपिन जैन, तारा गुप्ता, अनिमेष शर्मा, ईश्वर सिंह तेवतिया, ताबिश खैराबादी, असलम राशिद, डॉक्टर रणवीर सिंह परमार, संजीव शर्मा, संजीव निगम, नरेंद्र शर्मा, शोभना श्याम, राजेश श्रीवास्तव, सोनम यादव, मनीषा जोशी, उषा श्रीवास्तव, विनोद तोमर, पवन तोमर, सुभाष चंदर,विवेक वशिष्ठ, कपिल खंडेलवाल, तूलिका सेठ और भैय्या मित्र विनय के साथ विक्रम और विक्रम के साथ सिंह साहब दी ग्रेट,। देख लो जी कितने पॉवर फूल मित्र मण्डली है हमारी💪🏼💪🏼💪🏼👊🏼। अब इतने सारे महानुभावों के बीच हम भी जींस के ऊपर बाटीक प्रिंट वाला खादी का कुर्ता पहने ख़ुद को तुर्रम खां समझ रिए थे। भाई साहब अपनी भी बारी आई और भैय्या कोई सत्रह अठारह बरस पहले की ताज़ी ताज़ी ग़ज़ल लपेट दी। ग़लती से अच्छी बात ये रही दोस्तों ने वाह वाह भी कर दी मतबल पप्पू पास हो गया 🤩😝😝😝🤪🤪🤪🤪🤪 हेल्लो हेल्लो ऐ जी क्या कै रिए हो आपको भी पढ़नी है तो लो जी पढ़ लो बधाई अगली बार दे देना 😅😅😅😂

माया काया फेर में पड़कर, उलझे जाने कितने लोग 
दूर तमाशा देख रहे थे, हम जैसे अंजाने लोग 

ठगनी माया कब ठहरी है, एक जगह तू सोच ज़रा 
बौराए से फिरते रहते ,कुछ जाने पहचाने लोग 

बाहर से काला कोई, अन्दर से काला होता है 
भेद समझ न पाए अब तक, कैसे हैं बचकाने लोग 

हंसना रोना खोना पाना,जीवन के हैं रंग कई 
दुःख से भागे मयखाने में, पैमाने पी जाते लोग 

जिसकी गाड़ी ने कल बदला, इंसानों को लाशों में 
उसके दर पे कब से बैठे, मांग रहे हर्जाने लोग 

इसकी उसकी तेरी मेरी, फ़िक्र करी है कब ख़ुद की 
बस छोटी मुस्कान की खातिर, लूट जाते दीवाने लोग 

कितना समझाया लोगों ने, नहीं समझ पर कुछ आया 
हंसते हंसते जान गवा दें, कैसे हैं 
मरजाने लोग 

मैंने तो दस्तूर निभाया, हंस कर उनसे बातें की 
बिला वज़ह गढ़ने लगते हैं, कितने ही अफसाने लोग 

ऊंची ऊंची बातें करना जिनकी फ़ितरत होती है 
उतने ज़्यादा घर में गहरे रखते हैं तैयखाने लोग 

आंधी और तूफ़ानों से ये, दीप नहीं' बुझने वाला 
धरती पर दो चार बचे हैं, हम जैसे परवाने लोग 

--प्रदीप -- 08082008 (मीठी बाई कॉलेज, मुम्बई)

मुक्तक 
 भले दूरी नहीं कुछ भी, मगर दूरी सी लगती है।
अधूरी हैं कई ईप्साएँ, पर पूरी सी लगती हैं।
तुम्हीं बतलाओ इन सबसे, मैं बाहर आऊँ अब कैसे,
करूं न कुछ अगरचे मैं, तो मजबूरी सी लगती है।।
प्रदीप डीएस भट्ट-1572025

         और अंत में भाई साहब जब पढ़ने वाले चालीस पचास हों और एंकर एक तो तकलीफ़ तो होती है वो भी बड़ी वाली। सब कवियों/ शायरों की शान में एक डेढ़ शेर तो पढ़ना ही पड़ेगा न तो अगर 50 कवि हुए तो कम से कम 100 मिनिट फिर बार बार उठना बैठना वो भी चेहरे पर डेढ़ इंच मुस्कान लिए और फिर अपना नम्बर आने पर कविता भी पढ़नी। महाराज चार साल 2003-7 में करके देख चुके हैं। जल्दी समझ में आ गया मियां ये रोग हमारे बस का न है। सो भैय्या प्रवचन कर्ता थोड़ी ठंड रक्खा करें एंकरिंग कोई मूंग की दाल का हलवा नही है बल्कि उड़द की दाल का हलवा है खाना आसान है पचाना मुश्किल। यकीं नई तो एक बार ट्राई करके देख लो मियां और मियन। वरना बकौल पाकिस्तानी एंकर" काँपे टांग जाएंगी" 😻😻😻😻😻🙆‍♂️🙆‍♂️🙆‍♂️
जय श्रीराम 

प्रदीप डीएस भट्ट - 1211025

Wednesday, 15 October 2025

जबरा मारे रोने न दे ( बुलडोजर बाबा से पंगा)


"जबरा मारे रोने न दे "
(बुलडोजर बाबा से पंगा) 

रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पाताल,
आप कह भीतर भई, जूती खाए कपाल। 

         आज से करीब 969 बरस पहले जब रहीम दास जी ने इस दोहे की रचना की होगी तो उन्हें थोड़े ही पता था कि 2014 में भाजपा जब केंद्र की सत्ता में आयेगी और तीन बरस बाद उत्तर प्रदेश में 2017 में योगी आदित्यनाथ उर्फ़ बुलडोजर बाबा सत्ता संभालेंगे तब इस दोहे को दो चार लमढींग पूरा पूरा मान सम्मान देंगे और बदले में पता नही अपना क्या क्या लाल करवाएंगे और सिर्फ़ अपना नही अपने रिश्ते नाते दारों का भी। वो क्या है न जब योगी बाबा जी किसी का इलाज़ करते हैं तो वो गर्म तवे पर आस पड़ोस, रिश्तेदारों और ऐसे लमढींगो के हम दर्दों का भी इलाज़ कर देते हैं ताकि न रहे बांस न बजे बासुंरी। तुम्हें मेरी सच्ची वाली मुहब्बत की कसम यकीन कर लो सच कै रिया हूं इसी में भलाई है महाराज। जिसे भी लगता हो योगी जी उसके साथ ज्यादती कर रहे हैं वो एक बार इनके फेरे में पड़कर देख लो भाई इलाज़ के पहले चरण में ही पांच वक्त का नमाजी भी सु प्रभात और शुभ संध्या कहने लगता है। अगर कोई ज़्यादा ही ढीठ हुआ तो उसका इलाज़ जैसे जैसे अंतिम चरण में पहुंचता है उसे अपनी आठवीं पीढ़ी सनातनी नज़र आने लगती है और फिर वो योगी जी के चरणों में लोट पोट होकर जय श्री राम राधे राधे कहता हुआ इलाज़ को रोकने की मिन्नतें करने लगता है। 

         आपको याद होगा सम्भल वाले बर्क मियां, अरे महाराज नाराज़ काहे होते हो 2011 में भीमनगर बनाया था मायावती ने नमाजवादी ने 2012 में फ़िर से सम्भल कर दिया। वैसे भाई साहब शास्त्रों के हिसाब से सतयुग में सम्भल का नाम सत्यव्रत , त्रेता में  महदगिरि और द्वापर में पिंगल  वैसे कलयुग में नागभट्ट द्वितीय के लिखे ताम्र शिला लेखों में इसका नाम शम्भुपल्लिक है । पता नी किसने इसका नाम सम्भल कर दिया। हां तो महाराज सीनियर वाले बर्क मियां अजी वही नमाजवादी पार्टी के बड़डे वाले नेता जी भाई साहब जब भी मुंह खोलते थे ऊटपटांग ही बोलते थे। शफ़्फाक दाढ़ी और कपड़ों में लिपटे डेढ़ सौ ग्राम के मियां बर्क योगी बाबा के प्रकोप से जैसे तैसे बच गए इसलिए पहली फुर्सत में निकल लिए लेकिन जूनियर बर्क की एक ग़लती देखो क्या करा गई अभी तक कसमसा रहा है। योगी जी टैम टैम पर मुग़ली घुट्टी 555 की डॉज देते रहते हैं।  कुछ ऐसा ही दुस्साहस इलाहाबादी माफिया का हुआ अजी क्या नाम था उसका हां हां हां याद आया अतीक अहमद उर्फ़ अतीकवा याद आया न कोर्ट में किसी ने अतिकवा कहा तो भड़क गया था। योगी जी पूरे प्राण जाए पर वचन न जाए की तर्ज पर शोले के गब्बर की तरह विधानसभा में दहाड़े मिट्टी में मिला देंगे और भाई साहब कोर्ट से निकलते ही अतिकवा के साथ उसका सगे वाला भाई अशरफ़ का भी हैप्पी वाला बर्थडे। उसके बाद वो मूंछों पर ताव देते एक और माफिया मुख़्तार अंसारी भाई साहब क्या तूती बोलती थी, योगी जी की वक्र दृष्टि पड़ी और उसका भी जेल में ही जय श्रीराम।

         रामपुर के चौधरी आज़म ख़ान जो अपने आप को आबे जम जम खान समझने की भूल में थे, पहले कोंग्रेस ने सहारा दिया और फिर नमाजवादी पार्टी ने सीधे सर पर बिठा लिया। जरा सोचिए 2012-2017 में जनाब के क्या जलवा ए जलाल थे। एक मुख्यमंत्री अखिलेश एक आज़म ख़ान और आधे बाक़ी यादव यानि कुल जमा ढाई मुख्यमंत्रियों की बारात लेकिन आज़म ख़ान का जलवा बस पूछो मति। जब आदमी पॉवर में होता है तो आएं बाएं शाएं कुछ भी बोल देता है बस ग़लती से मिस्टेक इन्होंने भी कर दी और लोकसभा में अपने टर्म में बोलते बोलते कुछ ज्यादा ही जौहर दिखा गई और भैय्या बोल गए राष्ट्रपति भवन से ज़्यादा बेहतर तो जौहर यूनिवर्सिटी है। बस उस दिन से उनका सितारा ऐसा गर्दिश में आया है कि अभी अभी जेल से बाहर आ पाए हैं। इल्ज़ाम भी कैसे कैसे, भैंस चोर, जमीन चोरी मतबल कुल मिलाकर मुकदमों की सैंचुरी हो गई है। बुरे वक्त में नमाजवादी पार्टी ने भी मियां साहब की खूब फिरकी ली। अब जेल से बाहर आएं हैं तो अपने आपको सनातनी घोषित करने में लगे हैं और बात बात में भगवान राम और कृष्ण का गुणगान अलग से। लेकिन एक और कहावत है क़िस्मत में हों ककंर, तो क्या करेंगे शंकर सो भैय्या अभी आज़म ठीक से स्वांस भी नहीं ले पाए थे कोर्ट ने फर्जी पैनकार्ड मामले में बाप बेटे को सात सात साल की सजा मुकर्रर हुई है। पचास हज़ार का जुर्माना अलग से।

         अब आप खुदई सोचो बाबा जी की वक्र दृष्टि से ऐसे ऐसे तीस मार खां न बचे तो फिर तौक़ीर रजा किस खेत की मूली है। ऐं जी कौन तौकीर रजा अरे भाई बरेली वाले अहमद रज़ा खान बरेली आंदोलन के जनक ये कलमुंहा उन्हीं का परपोता है। कहने को तो इस्लामी धर्म गुरु हैं  बरेली मसलक के धार्मिक नेता और राजनैतिक दल इत्तेहाद ए मिल्लत परिषद् के संस्थापक भी। अब धर्म नीति में पिछवाड़े से राजनीति भी करनी है सो पड़ोसी रामपुर जिले के आज़म खान और सम्भल के बड़े वाले बर्क मियां की तरह इन्हें भी अनाप शनाप बोलने की सुरसुरी उठी। अब सुरसुरी उठी तो उठी। मौक़ा कोई भी हो दस्तूर कोई भी हो तौक़ीर मियां को तो बोलना ही बोलना है सो समजवदिया पार्टी की शय पाकर देश के ख़िलाफ़ बोलने के इस बंदे ने सारे रिकॉर्ड ही तोड़ डाले। जितना ज़्यादा कड़वा बोले उससे ज़्यादा सरकारी ग़ैर सरकारी सम्पत्ति पर कब्जा करते रहे। न कोई रोकने वाला न कोई टोकने वाला। किसी ने ज़्यादा चू चपड़ की तो एक आवाज़ पे हज़ारों लोग सड़को पर। जिले की क्या औकात जब तौकीर के तार लखनऊ और दिल्ली से जुड़े हों। लखनऊ में समजवदिया पार्टी और केंद्र में पापिन कॉन्ग्रेस। कोई करे भी तो क्या करे। 2010 का दंगा इस बात का जीता जागता उदाहरण है जी। लेकिन तब मुख्यमंत्री थीं मायावती तौक़ीर की मुश्कें बंधवाकर लखनऊ मंगवा लिया पर कर कुछ न सकी। ऊपर से दबाव और तौक़ीर शान से बिना मूंछों के होते हुए भी ताव देता हुआ वापिस बरेली वो भी पूरी शान ओ शौकत से वो भी ये कहते हुए की बरेली का झुमका हूं बरेली में ही सजूंगा।

         लेकिन कहते हैं न "समय समय की बात है समय बड़ा बलवान, खड़ी गोपियां लुट गईं वही अर्जुन वही बाण " तो भैय्या 2017 में उत्तर प्रदेश में आ गए बाबा जी वो भी लठ्ठ लेकर और मुनादी करा दी "गुंडन गुंडई छोड़ दें या उत्तर प्रदेश" वरना हम छुड़वा देंगे और महाराज उसके बाद जो गुंडन और माफिया की डेटिंग पेंटिंग,धुलाई रंगाई पुताई होनी शुरू हुई वो बदस्तूर जारी है।  जो प्रेम से माना उसे लड्डू जो नहीं माना उसे लठ्ठ और जो ख़ुद को ख़ुदा समझने के फेर में था उसकी बत्ती जड़ से गुल। इधर इस चौराहे पर लड़की पर फब्ती कसी उधर अगले चौराहे पर यमदूत तैयार। कुछ जड़ बुद्धि फिर भी नहीं माने तो बाबा जी ने पहली फुर्सत में ऑपरेशन लंगड़ा लॉन्च कर दिया। हर दूसरे दिन पैर में गोली लगे लंगड़ाते हुए तीन चार छुटभैय्ए नेता और कुछ टुच्चे से टट पुंजीए। तो हुआ यूं कि बरेली वाले तौक़ीर मियां की जीभ को फिर खुजली हो गई कि कुछ अनाप शनाप भौं भौं शुरू कर दी। लोगों ने बहुत समझाया मियां बाबा जी की दृष्टि आपके कुकर्मों पर पहले से ही और पंगा मति लो पर तौक़ीर कहां मानने वाला था सो आई लव मुहम्मद पर 25 सितम्बर को आएं बाएं शाय बोल गया। प्रशासन सख़्त हुआ तो इसने अगले दिन 26 को शुक्रवार को हजारों की भीड़ इक्ट्ठी करके प्रशासन को चुनौती दे डाली। बात बाबा जी तक पहुंची, तौक़ीर का रसूख दादागिरी और बहन मायावती जैसी सख़्त प्रशासक के बावजूद उसकी दबंगई की चर्चा हुई। बाबा जी ने सख़्त आदेश दे डाला बाबा जी की ओर से खर्चा पानी दे दो साथ में बहन मायावती की जो किरकिरी हुई थी उसका भी हिसाब किताब करो। अब ये बंदा मुगालते में था बाबा जी मेरा क्या ही उखाड़ लेंगे हम तौक़ीर हैं हमने तो समजवदिया और बसपा प्रमुख को भी घुटनों पर ला दिया तो योगी जी किस खेत की मूली हैं। ये सुनकर इधर बाबा जी धीरे से मुस्कुराए और उधर बरेली में लठ्ठ चालू और अगले तीन चार दिन में बाबा जी ने तौक़ीर समेत कइयों को समझा दिया बाबा जी ख़ेत की मूली नहीं बड़े वाले मठ के मूला हैं। लठ कहां से घुसेगा और कहां से निकलेगा ख़ुद बाबा जी को भी न पता हां नई तो। 

         अब तोकीर रजा अब गिड़गिड़ा रहा है जुगाड लगा रहा है कह रहा है कि योगी जी कसम से पूरी जिंगदी किसी मंदिर में भजन कीर्तन सत्संग करके काट लूंगा बस बख़्श दो।दंगा फसाद आगजनी तोड़फोड़ तो दूर मुंह भी नहीं खोलूंगा बस बख़्श दो लेकिन महाराज योगी आदित्यनाथ नाथ तो ठहरे पक्के वाले बाबा जी पहली फुर्सत में तौक़ीर को फतेहगढ़ जेल भेजा दस बीस मुक़दमे दर्ज, अगली पिछली कई पीढ़ियों की जन्मकुंडली खंगाली गई फिर शुरू हुआ बरेली में स्वच्छ भारत अभियान का श्रीगणेश। तौक़ीरवा के दूर के पास के सभी रिश्तेदारों पर योगी जी का नजला गिर रहा है। ऐंठन बैठन, हेकड़ी वेकड़ी रंगबाजी छिनैति गिरी सब हवा। इतना बड़ा एक्शन लिया है बाबा जी ने कि तौक़ीर के रिश्तेदार ही उसके जानी दुश्मन बन गए हैं। जब तौक़ीर के कारण कब्ज़ा कर रहे थे तो सब अच्छा था लेकिन अब छिन गया तो आप समझ रिए हो न मैं क्या कै रिया हूं। नाते रिश्तेदारों की तौक़ीर से इस कदर नाराज़गी बढ़ गई है कि दूर के सूत्रों से ये ख़बर मिली है कि कुछ लौंडे लपाडो को तौक़ीर के साथ वही करने के लिए कहा गया है जो पाकिस्तान में इमरान खान के साथ जेल में हुआ है। सच्ची कै रिया हूं ये सजा कुछ ज़्यादा न हुई मियां पर भाई जान से बढ़कर कुछ थोड़े है सो जान बची तो.......।


प्रदीप डीएस भट्ट - 20112025
व्यंग्यकार मेरठ