सन् राइज के चक्कर में सन सेट करा बैठे
"गिरे तो भी टांग ऊपर"
अपना भारत देश भी जो है न भाईसाहब पूरा गजबई से भरा हुआ देश है। यहाँ कौन क्या और कब कुछ ऐसा कर देता है जिसे समझने में ही लोगों के पांच सात साल निकल जाते हैं। बात अगर गांव की करें तो अलग ही कहानी चल रही होती है। वहां खाता न बही, जो प्रधान जी ने कही बस वही सही। आजकल जिसे देखो एस आर आई ,एस आर आई खेलने पे लगा हुआ है। वोटर कार्ड तो अपना भी है लेकिन मुम्बई का। अब भैय्या फार्म नम्बर छः भरकर ऑनलाइन ऑफलाइन दोनों तरह से दे दिया है लेकिन सूचना अब तक भी न प्राप्त हुई। अब चूंकि हम अभी यहाँ नए हैं तो आस पड़ोस से पूछताछ की तो पता चला सबके वोट गांव के है हमने पूछा ऐसा काहे महराज बोला हमारे वोट की कीमत शहर में नहीं है जनाब लेकिन गांव में भरपूर है। गांव में चुनाव चाहे प्रधानी का हो या विधायक का या फ़िर लोकसभा का ग्राम प्रधान महीने भर पहले से दे फ़ोन दे फोन करके कन्फर्म करता रहता है कि कहीं हम टपक तो नहीं गए। हमारे एक वोट से गाँव की प्रधानी जा भी सकती है और मिल भी सकती है और खातिर दारी के तो क्या ही कहने। भाई साहब हमें पहली बार अपने वोट की क़ीमत का पता चला साथ में बड़े वाला दुःख भी हुआ कि हम गांव से छिटके क्यूँ और ख़ुद छिटके तो ठीक वोट काहे छिटकवा दिए बे। फिर भारत तो उत्सवों का देश तो हइए ही चुनावों का भी देश है इसलिए हलवाईयों की दुकान भी चलती रहती है। चुनाव के बाद वोटरों की लड्डू खाने की डिमांड जो रहते हैं।
खैर एक बात तो पक्की है कि नेता चाहे छुटभैय्ए हो बढ़ैया उनका जीत से बड़ा कोई नशा नहीं होता वरना क्या कारण है कि ग्राम प्रधानी या ब्लॉक के चुनाव जीतने के लिए क्या क्या और कैसे कैसे जुगाड/जतन नहीं किए जाते हैं। जुगाड/जतन से मतबल खून खच्चर से है मियां। पहले विरोधी लाठी डंडों से निबटाए जाते थे अब तमंचा काम में लिया जाता है। देसी तमंचे से काम चला तो ठीक वरना विलायती वाला बस काम होना चाहिए। मजाल है कि पुलिस चू चपड़ करे आख़िर आधी पुलिस भी तो गांव को ही बिलांग करती है जी। और भैय्या भगवान से पहले मुंह गांव वालों को दिखाना ज़रूरी जो है। ख़ास बात ये है कि विलायती तमंचे से जो विरोधियों को निपटा देता है उसकी धाक तो गांव में वैसे ही बन जाती है। गांव खेड़े में बात पैसे की कभी नहीं होती, होती है तो बस मूंछों की। दुई की जगह चार किल्ला जमीन बिक जाए लेकिन मूंछ नीचे नहीं होनी चाहिए। चुनाव जीतने के बाद नए प्रधान जी चौपाल में कुछ लठैत, कुछ चमचे और सरकंडों से बनी प्रधान जी बड्डी वाली कुर्सी। रोज़ शाम यहीं नज़ारा देखने गाँव का गांव आ धमकता है प्रधान जी के किस्से कहानियां सुनो और आधी परात पूरी सब्जी पेट में उतार लो फिर बड़ी वाली डकार मार कर घर वापिस। अगर मूड हुआ तो दीन दुनिया की ख़बरों पर तब्सिरा अलग से लेकिन गांव की हद में। ट्रंप रूस को धकियाए या चीन को या फिर ईरान को प्रधान जी ट्रंप में ख़ुद को और कभी कभी ख़ुद में ट्रंप को देखते हुए चूल्हे पर पकती काढ़ा हुई जा रही चाय के साथ पारले जी के पांच रुपए वाले बिस्किट को भिगोकर खाते हुए अपनी विशेष टिप्पणी देते और सभा बर्खास्त। लेकिन लेकिन लेकिन!!!!
कैसा लगता होगा जब कोई चुनाव सिर्फ़ इसलिए लड़े कि उसे चुनाव हारना है तो। न न न आप ग़लती से सही समझ रिए हो मियां । मैंने कहा था न अपने देश में एक से एक लक़ड़ बग्घे पड़े हैं जो गांधी जी कि आत्मा को शान्ति दिलवाकर ही मरना चाहते हैं वरना क्या कारण है कि छियानवे हारों के बाद भी बंदा हारों की सेंचुरी पूरी करने के लिए कमर कसे बैठा है। भई उसपे तो फ़र्क न पड़ रहा है लेकिन छियानवे हारों से पार्टी की नींव जरूर भुरभुरी हो गई है। इस पार्टी की इमारत लखोड़ी ईंटों से बनी इमारत है जो एक सौ इकतालीस साल से जैसे तैसे सब कुछ झेल रही है। अच्छी बात ये है कि इस इमारत की नींव रखने वाले ए ए ह्यूम एक अंग्रेज थे अगर कहीं ये मिंग शिंग़ झे होते तो चांद तो छोड़ो ये इमारत शाम से पहले ही अपनी मिट्टी पलीत करवा लेती। मिलेगा मुकद्दर की तर्ज़ पर आशान्वित होना बुरा नहीं है लेकिन भाई ईश्वर ने हर चीज़ की एक्सपायरी निश्चित की हुई है। जनसंघ विलुप्त हुआ तो भाजपा का सूर्य सिर्फ़ उदय ही नहीं हुआ वरन चमका भी और खूब जोर से चमक रहा है और क्या चमक रहा है जी। सीटों में फर्क आया है लेकिन नीयत में कतई नहीं। जिन विचारों को लेकर जनसंघ चला उन्हीं विचारों के साथ पार्टी तो आगे बढ़ ही रही है साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रेटिंग डेटिंग दोनों भी बढ़िया चल रही है। ऐसा इसलिए भी कि भाजपा के शीर्ष को ये मालूम है कि "जिन्दगी की यही रीत है, हार के बाद ही जीत है " इसके उलट विपक्षी अपना गढ़ बचाने में ही सारी ऊर्जा स्वाहा किए जा रहे हैं। अब आप इस बात को इस उदाहरण से समझेंगे। अब भैय्या हम उदाहरण दे रहे हैं समझना न समझना आपके ऊपर है।
अपने छोटे से शहर के बड़े वाले चौधरी साहब जनाब रौला सिंह। हटी इतने कि राज हट,बाल हट और स्त्री हट भी उनके हटी पन के आगे पानी मांगने लगे जी। राजनीति का चस्का इतना कि 56 वसन्त देख चुके हैं लेकिन राजनीति का ऐसा पैशन कि कि छोटे बड़े कुल मिलाकर 96 चुनावों में हार का मुंह देख चुके हैं लेकिन जनाब बात बात में अपनी जवानी की कसम खाने वाले रौला सिंह जी की सेहत पर रत्ती भर भी फ़र्क न पड़ रहा है और पड़ेगा भी क्यूँ भई उन्होंने छोटी सी जिन्दगी में एक ही तो शौक पाला है और वो है राजनीति का और मान लो वो 96 हार से घबराकर राजनीति से संन्यास लेने की सोच भी लें तो क्या गारंटी है राजनीति उन्हें छोड़ देगी। आख़िर उनकी 96 हारों से पता नहीं कितने घरों के चूल्हे जल रहे हैं। आख़िर दादा लाई 200 एकड़ खेती की ज़मीन में से अभी भी 52 एकड़ जमीन उन्हें कभी न कभी तो जीतेंगे वाली आस का दिलासा देती रहती है। जमीन चाहे पूरी बिक जाए लेकिन बस एक बार मैं जीत जाऊं इसी आस पर रौला सिंह के जीतने की घास लहलहा रही है। उस लहलहाती घास में कुछ लोग पानी डाल रहे हैं कुछ मदिरा और कुछ जले भुने लोग मट्ठा। अब रौला सिंह को कौन समझाए कि पानी मदिरा तक तो ठीक है लेकिन मट्ठा डालने वालों पर तो लगाम कसें या उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएं लेकिन जब मन हो पाजी तो क्या करेगा काज़ी। उन मट्ठा डालने वालों ने मट्ठे की बोतल पर हिमायनी पानी का लेबल लगा रक्खा है और रौला सिंह लेबल उतारकर सच्चाई देखना नही चाहते तो फिर तो जैसे गड्डी चल रही है चलने दो। अगले मार्च तक रौला सिंह अपनी सेंचुरी भी पूरी कर लेंगे और सो कॉल्ड महात्मा की आत्मा को शान्ति भी प्रदान कर देंगे। महात्मा जी की अंतिम इच्छा तो याद है अगर नहीं तो गूगल में उगल कर लो।
अब ऐसा तो है नहीं कि वो इस तरह की महत्वाकांक्षा पालने वाले पहले व्यक्ति हैं उनसे पहले भी जाने कितने आए और जाने कितने गए लेकिन उनकी महत्वकांक्षा मरते दम तक उनके साथ चिपकी रही। आपको याद होगा धरती पकड़ अजी हाँ वही काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ बरेली वाले अजी वही उत्तर प्रदेश का जिला बरेली जहाँ 1966 में मेरा साया फ़िल्म की नायिका साधना का झूमका गिरा था। एक सच्ची बात और जान लो भैय्या कि 1941 में हरिवंश राय बच्चन की पत्नि तेजी बच्चन का सोने का झूमका वास्तव ? में बरेली में गिर गया था ,राजा मेंहदी अली खान ने इस घटना को गाने में पिरो दिया और भैय्या गाना भी सुपर डूपर हिट हो गया। 2020 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 200 किलो का झुमका बरेली चौक में स्थापित करवा दिया। एक गाने ने कमाल कर दिया न। तो भैय्या वही काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ ( जो व्यक्ति किसी कार्य हेतु उम्र भर उस कार्य से चिपका रहे जैसे काका जोगिंदर सिंह) ने कुल छत्तीस बरस में 350 से ज़्यादा चुनाव लड़े और सगरे के सगरे हारे ही एक्को बार भी जीत न मिली। वो खुदई वोटरों से कहते थे भैय्या मैंने वोट मति देना। इसके अलावा भी कानपुर के भगवती प्रसाद घोड़े वाला और ग्वालियर के मदन लाल। ये सभी चुनाव लड़े ही इसलिए कि चुनाव हार जाएं। काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ के अलावा तमिलनाडु के मैतुर्र शहर के पद्माराजन चिरस्थाई चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति हैं ये महराज अभी तक 238 चुनाव हार चुके हैं । इन्हें भले ही जोगिंदर सिंह की तरह इलेक्शन किन्ग की तरह याद न किया जाता हो किन्तु इनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में जरूर दर्ज़ किया गया है।
और लो जी बात करते करते इलेक्शन कमीशन ने पांच राज्यों में चुनाव भी घोषित कर दिये। असम केरल पुद्दुचेरी तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल अप्रैल में चुनाव होने निश्चित हुए हैं। रिज़ल्ट 4 मई को घोषित होगा। अब मसला ये है कि तो जनाब रौला सिंह के चुनाव का ऊंट जिस करवट बैठना होगा बैठ जाएगा। इस बात पर किसी को कुछ लेने देने की भी न पड़ी है लेकिन जिस तरह से राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के नेता रूपी पंछी फुदक फुदक कर बड्डी वाली पार्टी का बाजरा चुग रहे हैं तो लगता है परिणाम ढाक के तीन पात ही रहने वाला है। लोग सेंचुरी सेंचुरी कर रहे हैं पर मैंनु ऐ लगदा है बंदा 96+4=101 का शगुन डाल कर ही मानेगा। चलो कोई तो है जो गांधी जी की आत्मा की तसल्ली के लिए कुछ योगदान दे रहा है। वरना धरती पकड़ हो या घोड़े वाला या कोई और उनका योगदान सिर्फ इतना था कि ख़ुद के लिए लड़े ख़ुद ही हारे लेकिन हंसते हुए क्यों कि वो चुनाव लड़ ही हारने के लिए रहे थे लेकिन ये बंदा पांच राज्यों में हारेगा और ख़ुश रहेगा। अजब ये होगा कि हार के लिए फिर कोई बकरा तलाश जाएगा और सारा दोष उस पर मढ़ दिया जाएगा और ये बंदा फिर निकल लेगा विदेश यात्रा पर अगले चुनाव में हार का गणित समझने और हार का अंतर ज़्यादा करने के लिए कोई प्रमेय सिद्ध कर लेगा, फिर कुछ दिनों बाद शान से सीना चौड़ा करके लौटेगा ये बताने के लिए कि मैं हारा नहीं हराया गया हूँ यानि गिरे तो भी टांग ऊपर।
प्रदीप भट्ट
व्यंग्यकार,मेरठ
22032026
No comments:
Post a Comment