रिपोर्ताज
"कांपे टांग जाएंगी"
इश्क़ भी अजब चीज़ है मियां कब किससे कहां और कितना हो जाए भाई साहब मैनू कि पता😻😻😻 किसी और नू पता होए तो मैन्नू भी दसना। अब आप भी सोच रिए होंगे ए कि गल्ल कित्ती तो भाई साहब पिछले तीन चार दशक में जोर जबरदस्ती से ही सही हम मंच शेयर कर ही रहे हैं 🤓🤓🤓🤓 लेकिन एक बात तो सच्ची सच्ची बता रिया हूं उर्दू फ़ारसी अरबी के बड़े बड़े लच्छेदार शब्दों के घाल मेल से महफ़िल सजती भी देखी है और भैय्या उजड़ती भी। दिल्ली मुम्बई हैदराबाद लखनऊ और छोटे मोटे का तो ज़िक्र ही क्या करना हुज़ूर😊😊 हमने ऐसी ऐसी नशिस्त देखी हैं जहाँ सुनने वाले और सुनाने वाले सब के सब अंतर्राष्ट्रीय😛😛😛😛😛😛 कोई भी ससुरा वॉकल फॉर लोकल ना हो रिया 👺👺बस बजट के चक्कर में भारत में आयोजन करके अंतरराष्ट्रीय होने का सुख प्राप्त कर रहे हैं। करो करो मैंनूं की लोड।
सो महाराज जब भारत सरकार की सेवा से निवृत हुए तो मेरठ को अपना ठिकाना बना लिया। वो स्लोगन आपने सुना है न "जिन्दगी के साथ भी जिन्दगी के बाद भी" तो बस मेरठ में रहकर दिल्ली गुड़गांव गाजियाबाद में सुबह निकलकर साहित्यिक समारोहों में अपनी हाजिरी दर्ज कर आते हैं।👁️👁️👁️👁️ इसी क्रम में कथा रंग और "महफ़िल ए बारादरी" से जुड़ाव हुआ और वो भी सच्चा वाला। इसे ही शास्त्रों में सच्चे वाला इश्क़ कहते हैं हुज़ूर। महफ़िल ए बारादरी की सबसे बड़ी खासियत ये है यहाँ सिर्फ़ पढ़ने वाले ही नही अपितु श्रवण सुख प्राप्त करने वाले भी अपनी हाज़िरी लगाते हैं। बढ़िया वाले वैन्यू के साथ बढ़िया वाला मैन्यू भी ब्राह्मण का इसके बिना गुजारा न है जी 😛😛😛😛और शायरी UPSC क्रैक करके क्लॉस वन अधिकारी वाली। नवागंतुको के लिए एकदम परफैक्ट पाठशाला। अब इत्ती सारी खूबियां हों तो इश्क़ तो होवे ही होवे, तो महाराज हमें भी हो गया। निश्चित इसके लिए डॉक्टर माला कपूर गौहर और रियल संयोजक के साथ एंकर भी की तरह महफ़िल ए बारादरी नामक जहाज को संभाल कर रखने वाले आलोक यात्री जी। मैंने कुछ ज़्यादा तारीफ़ तो नी कर दी। अब कर दी तो कर दी भाया 🤠🤠🤠🤠🤠🤠🤠🤣 बुरा लगे तो हैप्पी ।
9 नवंबर को रैपिड 🚇 का आनन्द लेते हुए मेरठ से गाजियाबाद और फिर रैपिडो का साथ,लो जी जा पहुंचे सिल्वर लाइन प्रेस्टिज स्कूल वो भी टैम से पहले। ठीक सवा तीन बजे आलोक जी ने माइक संभाला, दीप प्रज्ज्ववलन के बाद मित्र इंद्रजीत सुकुमार द्वारा सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की गई फिर माइक संभाला तरुणा मिश्र जी ने और लो जी कार्यक्रम विधिवत शुरू हो गया। इस बार की महफ़िल गज़लों के उस्ताद शायर कृष्ण बिहारी ''नूर'' की जन्मशताब्दी के अवसर पर विशेष आयोजन के तहत रखी गई। मुख्य अतिथि नीना सहर, गोविन्द गुलशन, डॉक्टर सुधीर त्यागी जिन्हें इस बार "बारादरी जीवन पर्यन्त साहित्य सृजन सम्मान" से नवाजा गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इरफ़ान आज़मी जी ने की। सुरेन्द्र सिंहल जी, इंद्रजीत, दीपक श्रीवास्तव, बी के शर्मा जैदी, जगदीश पंकज, सुधा गोयल, वेद प्रकाश, रवि पाराशर, विपिन जैन, तारा गुप्ता, अनिमेष शर्मा, ईश्वर सिंह तेवतिया, ताबिश खैराबादी, असलम राशिद, डॉक्टर रणवीर सिंह परमार, संजीव शर्मा, संजीव निगम, नरेंद्र शर्मा, शोभना श्याम, राजेश श्रीवास्तव, सोनम यादव, मनीषा जोशी, उषा श्रीवास्तव, विनोद तोमर, पवन तोमर, सुभाष चंदर,विवेक वशिष्ठ, कपिल खंडेलवाल, तूलिका सेठ और भैय्या मित्र विनय के साथ विक्रम और विक्रम के साथ सिंह साहब दी ग्रेट,। देख लो जी कितने पॉवर फूल मित्र मण्डली है हमारी💪🏼💪🏼💪🏼👊🏼। अब इतने सारे महानुभावों के बीच हम भी जींस के ऊपर बाटीक प्रिंट वाला खादी का कुर्ता पहने ख़ुद को तुर्रम खां समझ रिए थे। भाई साहब अपनी भी बारी आई और भैय्या कोई सत्रह अठारह बरस पहले की ताज़ी ताज़ी ग़ज़ल लपेट दी। ग़लती से अच्छी बात ये रही दोस्तों ने वाह वाह भी कर दी मतबल पप्पू पास हो गया 🤩😝😝😝🤪🤪🤪🤪🤪 हेल्लो हेल्लो ऐ जी क्या कै रिए हो आपको भी पढ़नी है तो लो जी पढ़ लो बधाई अगली बार दे देना 😅😅😅😂
माया काया फेर में पड़कर, उलझे जाने कितने लोग
दूर तमाशा देख रहे थे, हम जैसे अंजाने लोग
ठगनी माया कब ठहरी है, एक जगह तू सोच ज़रा
बौराए से फिरते रहते ,कुछ जाने पहचाने लोग
बाहर से काला कोई, अन्दर से काला होता है
भेद समझ न पाए अब तक, कैसे हैं बचकाने लोग
हंसना रोना खोना पाना,जीवन के हैं रंग कई
दुःख से भागे मयखाने में, पैमाने पी जाते लोग
जिसकी गाड़ी ने कल बदला, इंसानों को लाशों में
उसके दर पे कब से बैठे, मांग रहे हर्जाने लोग
इसकी उसकी तेरी मेरी, फ़िक्र करी है कब ख़ुद की
बस छोटी मुस्कान की खातिर, लूट जाते दीवाने लोग
कितना समझाया लोगों ने, नहीं समझ पर कुछ आया
हंसते हंसते जान गवा दें, कैसे हैं
मरजाने लोग
मैंने तो दस्तूर निभाया, हंस कर उनसे बातें की
बिला वज़ह गढ़ने लगते हैं, कितने ही अफसाने लोग
ऊंची ऊंची बातें करना जिनकी फ़ितरत होती है
उतने ज़्यादा घर में गहरे रखते हैं तैयखाने लोग
आंधी और तूफ़ानों से ये, दीप नहीं' बुझने वाला
धरती पर दो चार बचे हैं, हम जैसे परवाने लोग
--प्रदीप -- 08082008 (मीठी बाई कॉलेज, मुम्बई)
मुक्तक
भले दूरी नहीं कुछ भी, मगर दूरी सी लगती है।
अधूरी हैं कई ईप्साएँ, पर पूरी सी लगती हैं।
तुम्हीं बतलाओ इन सबसे, मैं बाहर आऊँ अब कैसे,
करूं न कुछ अगरचे मैं, तो मजबूरी सी लगती है।।
प्रदीप डीएस भट्ट-1572025
और अंत में भाई साहब जब पढ़ने वाले चालीस पचास हों और एंकर एक तो तकलीफ़ तो होती है वो भी बड़ी वाली। सब कवियों/ शायरों की शान में एक डेढ़ शेर तो पढ़ना ही पड़ेगा न तो अगर 50 कवि हुए तो कम से कम 100 मिनिट फिर बार बार उठना बैठना वो भी चेहरे पर डेढ़ इंच मुस्कान लिए और फिर अपना नम्बर आने पर कविता भी पढ़नी। महाराज चार साल 2003-7 में करके देख चुके हैं। जल्दी समझ में आ गया मियां ये रोग हमारे बस का न है। सो भैय्या प्रवचन कर्ता थोड़ी ठंड रक्खा करें एंकरिंग कोई मूंग की दाल का हलवा नही है बल्कि उड़द की दाल का हलवा है खाना आसान है पचाना मुश्किल। यकीं नई तो एक बार ट्राई करके देख लो मियां और मियन। वरना बकौल पाकिस्तानी एंकर" काँपे टांग जाएंगी" 😻😻😻😻😻🙆♂️🙆♂️🙆♂️
जय श्रीराम
प्रदीप डीएस भट्ट - 1211025
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