Monday, 24 November 2025

" चिख़ुरी कुछ नया लिखा क्या "

रिपोर्ताज 

"चिख़ुरी कुछ नया लिखा क्या "

        अचानक फ़ोन की टुन्न टूनिया बज उठी। दूसरी तरफ़ गुरुग्राम से डॉक्टर प्रवीण शर्मा थी, उन्होंने राधे राधे कहा और हमने जय श्रीराम यानि उन्होंने द्वापर का प्रतिनिधित्व किया और हमने त्रेता का 😄 प्रवीण जी ने आग्रह किया कि उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर ABS4 "प्रज्ञान विश्वम" का विशेषांक निकाल रही है अतएव आपसे प्रार्थना है कि आप इसमें अपना सहयोग अवश्य दें। सहयोग से कुछ और मतबल मत निकाल लेना पाठकों🤔😎😎 यहाँ सहयोग का तात्पर्य आलेख से था, पईसे से बिलकुल भी नी, हाँ नई तो। ख़ैर हाँ भर दी।

तो भैय्या 19th नवम्बर को रेपिडो फिर रैपिड मेट्रो नमो भारत का आनन्द लेते हुए जा पहुँचे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया वो भी 10:10 पर। यूँ प्रश्न वाचक दृष्टि से मती देखो 👀👀👀👀 टेम से पहुँचने की अच्छी वाली आदत है म्हारी समझे के नाही।👑👑👑 तो बस म्हारे से पहले कौन होगा वहाँ सोचो सोचो,सही पकड़े हैं 😺😺😺😺 शर्मा फैमिली। भाई साहब कित्ता भी समझा लो पर सबको यही ग़लत वाली फैमिली है कि वो मुन्शी प्रेमचंद और दिनकर से भी बड़े साहित्यकार हैं 😡😡😡😡

         ख़ैर सवा ग्यारह बजे गायत्री मंत्र से प्रोग्राम की शुरूआत हुई। मुख्य,विशिष्ट और अतिविशिष्ट कौन था राम जाने पर हम थे न मात्र अतिथि सो नीरव जी के आग्रह पर लगे हाथ कइयों को सम्मानित कर डाला।😍😝😍😝😍😛 अब चूँकि प्रोग्राम तो डॉक्टर प्रवीण शर्मा, गुरुग्राम की अभी तक की शैक्षणिक, सामाजिक एवं साहित्यिक यात्रा को स्मरण करने का था सो इस कार्य हेतु साहित्य एवं राजभाषा हिन्दी की अलख जगाती संस्था अखिल भारतीय सर्वभाषा, संस्कृति समन्वय समिति ने डॉक्टर प्रवीण शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर "प्रज्ञान विश्वम" का विशेषांक निकालने का निर्णय लिया। निश्चित ही ये कार्य साहित्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे साहित्यकारों के लिए विशेष जड़ी बुटी देने का कार्य कर रहा है जिसके लिए सुरेश नीरव जी बधाई के पात्र हैं।

" साहित्यिक यज्ञ की गिलहरी "

         मेरा मानना है कि आप किसी भी क्षेत्र से संबंध रखते हो यदि आपको अपने जीवन के शुरु में मध्य में या रिटायरमेंट के बाद साहित्य का कीड़ा काट ले तो आपके सोचने समझने के तरीके में बदलाव आ जाता है। जहां तक संपूर्ण जीवन का प्रश्न है वो भी माया काया के फेर से द्वंद करते हुए अंततोगत्वा साहित्य में अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है ऐसा इसलिए भी कि युवावस्था में जहां लेखक प्यार व्यार में अपनी लेखनी को ज़्यादा सक्रिय रखता है वहीं शादी का लड्डू खाने के कुछ महीनों या वर्षों के बाद उसे जीवन के धरातल के अनुभव होते हैं तब उसकी लेखनी कम किंतु अनुभव आधारित लिखने लगती है। यूं तो मनुष्य जिम्मेदारियों से कभी भी पीछा नही छुड़ा पाता किंतु जिम्मेदारियों के पूर्ण होने पर उसकी कलम सत्य लिखने का साहस कर पाती है वैसे ऐसा सबके साथ नही भी हो पाता किंतु जो लेखक इन अनुभवों को जीते हैं वे जानते हैं कि सत्य कहने और लिखने में यक़ीन रखते हैं उन्हें ज्ञात होता है कि वे किन परिस्थितियों से होकर इस लक्ष्य तक पहुँच पाए हैं।

         9 फ़रवरी 2025 को प्रेस क्लब में हुई पहली मुलाक़ात से लेकर 19 नवंबर तक के सफर में मैं जितना उन्हें जान पाया,समझ पाया उन्हें शब्दों में बांधकर उनके लिए कुछ लिखकर मैंने भी प्रवीण जी की साहित्यिक यात्रा के हवन में अपने हिस्से की आहूति डाल दी। प्रवीण जी में नया और वो भी कुछ अलग करने की इच्छा ज़बरदस्त है। अच्छी बात ये रही कि ये शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी रही हैं जहां सदैव कुछ अलग करने की संभावनाएं सदा मौजूद रहती हैं। उन्हीं संभावनाओं को टटोलती उनकी दृष्टि सदैव कुछ नया पा ही जाती है। हरियाणा जो कि उनकी जन्मभूमि भी है और कर्मभूमि भी में संतुलन साधते साधते प्रवीण जी धीरे धीरे साहित्य की ओर आकर्षित हो गईं और साहित्य तो प्रेम की वह अविरल धार है जिसमें से जिसे जो चाहिए वह निश्चित ही पा जाता है। अच्छी बात ये रही कि अपनी शैक्षणिक यात्रा के दौरान इन्हें दिल्ली हरियाणा की जर्नी में इन्हें कई ऐसे किस्से मिले जिसे इन्होंने अपनी लेखकीय यात्रा में इस्तेमाल किया है।

        जहां तक प्रवीण जी की कविताओं का प्रश्न है उनमें मन में त्वरित उपजे भावों की अभिव्यक्ति नज़र आती है। उनकी कविताई प्रकृति, मानव पीड़ा, श्रृंगार के इर्द गिर्द बुनी लगती है, एक बानगी देखिए:

  
राम जो तुम आ जाते एक बार 
तो बेड़ा सबका हो जाता पार 
हम नव दीप जलाते,
उपवन में फूल खिल जाते।
संसार सुखी हो जाता 
राज विद्या बुद्धि का होता 
दुःखी न रहता कोई,
धन्य धान से वंचित रहता न कोई 
राम जो तुम आ जाते एक बार 
आ कर कुछ तो करते जतन 
आकर धर्म का रोकते पतन।

होती पितृ भक्ति की जय जय कार 
होता भरत लक्ष्मण भाई सा प्यार 
राम जो तुम आ जाते एक बार 

         सवा बजे कार्यक्रम सम्पन्न हुआ और फिर लंच। सो भैय्या आदत अनुसार दो पीस गुलाम जामुन पेट में डालकर ब्राह्मण कुल में जन्म होने का कर्तव्य पूरा किया 😍😍😍😍 फिर थोड़ा सा ये थोड़ा सा वो और निकल पड़े वाया मेरठ वाया दिल्ली विश्वविद्यालय होते हुए 🍩🍩🍩🍩एक बालक को जन्मदिन की शुभकामनायें देते हुए। क्यूँ अच्छा किया न महाराज 

प्रदीप डीएस भट्ट - 25112025

Friday, 21 November 2025

हरबे हरबे -- जितबे कब

"हरबे हरबे जीतबे कब" 

सन् राइज के चक्कर में सन सेट करा बैठे 
"गिरे तो भी टांग ऊपर"

         अपना भारत देश भी जो है न भाईसाहब पूरा गजबई से भरा हुआ देश है। यहाँ कौन क्या और कब कुछ ऐसा कर देता है जिसे समझने में ही लोगों के पांच सात साल निकल जाते हैं। बात अगर गांव की करें तो अलग ही कहानी चल रही होती है। वहां खाता न बही, जो प्रधान जी ने कही बस वही सही। आजकल जिसे देखो एस आर आई ,एस आर आई खेलने पे लगा हुआ है। वोटर कार्ड तो अपना भी है लेकिन मुम्बई का। अब भैय्या फार्म नम्बर छः भरकर ऑनलाइन ऑफलाइन दोनों तरह से दे दिया है लेकिन सूचना अब तक भी न प्राप्त हुई। अब चूंकि हम अभी यहाँ नए हैं तो आस पड़ोस से पूछताछ की तो पता चला सबके वोट गांव के है हमने पूछा ऐसा काहे महराज बोला हमारे वोट की कीमत शहर में नहीं है जनाब लेकिन गांव में भरपूर है। गांव में चुनाव चाहे प्रधानी का हो या विधायक का या फ़िर लोकसभा का ग्राम प्रधान महीने भर पहले से दे फ़ोन दे फोन करके कन्फर्म करता रहता है कि कहीं हम टपक तो नहीं गए। हमारे एक वोट से गाँव की प्रधानी जा भी सकती है और मिल भी सकती है और खातिर दारी के तो क्या ही कहने। भाई साहब हमें पहली बार अपने वोट की क़ीमत का पता चला साथ में बड़े वाला दुःख भी हुआ कि हम गांव से छिटके क्यूँ और ख़ुद छिटके तो ठीक वोट काहे छिटकवा दिए बे। फिर भारत तो उत्सवों का देश तो हइए ही चुनावों का भी देश है इसलिए हलवाईयों की दुकान भी चलती रहती है। चुनाव के बाद वोटरों की लड्डू खाने की डिमांड जो रहते हैं।

         खैर एक बात तो पक्की है कि नेता चाहे छुटभैय्ए हो बढ़ैया उनका जीत से बड़ा कोई नशा नहीं होता वरना क्या कारण है कि ग्राम प्रधानी या ब्लॉक के चुनाव जीतने के लिए क्या क्या और कैसे कैसे जुगाड/जतन नहीं किए जाते हैं। जुगाड/जतन से मतबल खून खच्चर से है मियां। पहले विरोधी लाठी डंडों से निबटाए जाते थे अब तमंचा काम में लिया जाता है। देसी तमंचे से काम चला तो ठीक वरना विलायती वाला बस काम होना चाहिए। मजाल है कि पुलिस चू चपड़ करे आख़िर आधी पुलिस भी तो गांव को ही बिलांग करती है जी। और भैय्या भगवान से पहले मुंह गांव वालों को दिखाना ज़रूरी जो है। ख़ास बात ये है कि विलायती तमंचे से जो विरोधियों को निपटा देता है उसकी धाक तो गांव में वैसे ही बन जाती है। गांव खेड़े में बात पैसे की कभी नहीं होती, होती है तो बस मूंछों की। दुई की जगह चार किल्ला जमीन बिक जाए लेकिन मूंछ नीचे नहीं होनी चाहिए। चुनाव जीतने के बाद नए प्रधान जी चौपाल में कुछ लठैत, कुछ चमचे और सरकंडों से बनी प्रधान जी बड्डी वाली कुर्सी। रोज़ शाम यहीं नज़ारा देखने गाँव का गांव आ धमकता है प्रधान जी के किस्से कहानियां सुनो और आधी परात पूरी सब्जी पेट में उतार लो फिर बड़ी वाली डकार मार कर घर वापिस। अगर मूड हुआ तो दीन दुनिया की ख़बरों पर तब्सिरा अलग से लेकिन गांव की हद में। ट्रंप रूस को धकियाए या चीन को या फिर ईरान को प्रधान जी ट्रंप में ख़ुद को और कभी कभी ख़ुद में ट्रंप को देखते हुए चूल्हे पर पकती काढ़ा हुई जा रही चाय के साथ पारले जी के पांच रुपए वाले बिस्किट को भिगोकर खाते हुए अपनी विशेष टिप्पणी देते और सभा बर्खास्त। लेकिन लेकिन लेकिन!!!!

         कैसा लगता होगा जब कोई चुनाव सिर्फ़ इसलिए लड़े कि उसे चुनाव हारना है तो। न न न आप ग़लती से सही समझ रिए हो मियां । मैंने कहा था न अपने देश में एक से एक लक़ड़ बग्घे पड़े हैं जो गांधी जी कि आत्मा को शान्ति दिलवाकर ही मरना चाहते हैं वरना क्या कारण है कि छियानवे हारों के बाद भी बंदा हारों की सेंचुरी पूरी करने के लिए कमर कसे बैठा है। भई उसपे तो फ़र्क न पड़ रहा है लेकिन छियानवे हारों से पार्टी की नींव जरूर भुरभुरी हो गई है। इस पार्टी की इमारत लखोड़ी ईंटों से बनी इमारत है जो एक सौ इकतालीस साल से जैसे तैसे सब कुछ झेल रही है। अच्छी बात ये है कि इस इमारत की नींव रखने वाले ए ए ह्यूम एक अंग्रेज थे अगर कहीं ये मिंग शिंग़ झे होते तो चांद तो छोड़ो ये इमारत शाम से पहले ही अपनी मिट्टी पलीत करवा लेती। मिलेगा मुकद्दर की तर्ज़ पर आशान्वित होना बुरा नहीं है लेकिन भाई ईश्वर ने हर चीज़ की एक्सपायरी निश्चित की हुई है। जनसंघ विलुप्त हुआ तो भाजपा का सूर्य सिर्फ़ उदय ही नहीं हुआ वरन चमका भी और खूब जोर से चमक रहा है और क्या चमक रहा है जी। सीटों में फर्क आया है लेकिन नीयत में कतई नहीं। जिन विचारों को लेकर जनसंघ चला उन्हीं विचारों के साथ पार्टी तो आगे बढ़ ही रही है साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रेटिंग डेटिंग दोनों भी बढ़िया चल रही है। ऐसा इसलिए भी कि भाजपा के शीर्ष को ये मालूम है कि "जिन्दगी की यही रीत है, हार के बाद ही जीत है " इसके उलट विपक्षी अपना गढ़ बचाने में ही सारी ऊर्जा स्वाहा किए जा रहे हैं। अब आप इस बात को इस उदाहरण से समझेंगे। अब भैय्या हम उदाहरण दे रहे हैं समझना न समझना आपके ऊपर है।

         अपने छोटे से शहर के बड़े वाले चौधरी साहब जनाब रौला सिंह। हटी इतने कि राज हट,बाल हट और स्त्री हट भी उनके हटी पन के आगे पानी मांगने लगे जी। राजनीति का चस्का इतना कि 56 वसन्त देख चुके हैं लेकिन राजनीति का ऐसा पैशन कि कि छोटे बड़े कुल मिलाकर 96 चुनावों में हार का मुंह देख चुके हैं लेकिन जनाब बात बात में अपनी जवानी की कसम खाने वाले रौला सिंह जी की सेहत पर रत्ती भर भी फ़र्क न पड़ रहा है और पड़ेगा भी क्यूँ भई उन्होंने छोटी सी जिन्दगी में एक ही तो शौक पाला है और वो है राजनीति का और मान लो वो 96 हार से घबराकर राजनीति से संन्यास लेने की सोच भी लें तो क्या गारंटी है राजनीति उन्हें छोड़ देगी। आख़िर उनकी 96 हारों से पता नहीं कितने घरों के चूल्हे जल रहे हैं। आख़िर दादा लाई 200 एकड़ खेती की ज़मीन में से अभी भी 52 एकड़ जमीन उन्हें कभी न कभी तो जीतेंगे वाली आस का दिलासा देती रहती है। जमीन चाहे पूरी बिक जाए लेकिन बस एक बार मैं जीत जाऊं इसी आस पर रौला सिंह के जीतने की घास लहलहा रही है। उस लहलहाती घास में कुछ लोग पानी डाल रहे हैं कुछ मदिरा और कुछ जले भुने लोग मट्ठा। अब रौला सिंह को कौन समझाए कि पानी मदिरा तक तो ठीक है लेकिन मट्ठा डालने वालों पर तो लगाम कसें या उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएं लेकिन जब मन हो पाजी तो क्या करेगा काज़ी। उन मट्ठा डालने वालों ने मट्ठे की बोतल पर हिमायनी पानी का लेबल लगा रक्खा है और रौला सिंह लेबल उतारकर सच्चाई देखना नही चाहते तो फिर तो जैसे गड्डी चल रही है चलने दो। अगले मार्च तक रौला सिंह अपनी सेंचुरी भी पूरी कर लेंगे और सो कॉल्ड महात्मा की आत्मा को शान्ति भी प्रदान कर देंगे। महात्मा जी की अंतिम इच्छा तो याद है अगर नहीं तो गूगल में उगल कर लो।

         अब ऐसा तो है नहीं कि वो इस तरह की महत्वाकांक्षा पालने वाले पहले व्यक्ति हैं उनसे पहले भी जाने कितने आए और जाने कितने गए लेकिन उनकी महत्वकांक्षा मरते दम तक उनके साथ चिपकी रही। आपको याद होगा धरती पकड़ अजी हाँ वही काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ बरेली वाले अजी वही उत्तर प्रदेश का जिला बरेली जहाँ 1966 में मेरा साया फ़िल्म की नायिका साधना का झूमका गिरा था। एक सच्ची बात और जान लो भैय्या कि 1941 में हरिवंश राय बच्चन की पत्नि तेजी बच्चन का सोने का झूमका वास्तव ? में बरेली में गिर गया था ,राजा मेंहदी अली खान ने इस घटना को गाने में पिरो दिया और भैय्या गाना भी सुपर डूपर हिट हो गया। 2020 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 200 किलो का झुमका बरेली चौक में स्थापित करवा दिया। एक गाने ने कमाल कर दिया न। तो भैय्या वही काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ ( जो व्यक्ति किसी कार्य हेतु उम्र भर उस कार्य से चिपका रहे जैसे काका जोगिंदर सिंह) ने कुल छत्तीस बरस में 350 से ज़्यादा चुनाव लड़े और सगरे के सगरे हारे ही एक्को बार भी जीत न मिली। वो खुदई वोटरों से कहते थे भैय्या मैंने वोट मति देना। इसके अलावा भी कानपुर के भगवती प्रसाद घोड़े वाला और ग्वालियर के मदन लाल। ये सभी चुनाव लड़े ही इसलिए कि चुनाव हार जाएं। काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ के अलावा तमिलनाडु के मैतुर्र शहर के पद्माराजन चिरस्थाई चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति हैं ये महराज अभी तक 238 चुनाव हार चुके हैं । इन्हें भले ही जोगिंदर सिंह की तरह इलेक्शन किन्ग की तरह याद न किया जाता हो किन्तु इनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में जरूर दर्ज़ किया गया है। 

         और लो जी बात करते करते इलेक्शन कमीशन ने पांच राज्यों में चुनाव भी घोषित कर दिये। असम केरल पुद्दुचेरी तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल अप्रैल में चुनाव होने निश्चित हुए हैं। रिज़ल्ट 4 मई को घोषित होगा। बंगाल में जहां धूम धड़ाका शुरू हो चुका है वहीं आसाम में सरमा जी आसाम की सपाट पिच पर अपनी धाकड़ बल्लेबाजी से छुटकू वैभव सूर्यवंशी को चैलेंज देते प्रतीत हो रहे हैं। अब मसला तो ये है कि जनाब रौला सिंह के चुनाव का ऊंट जिस करवट बैठना होगा बैठ जाएगा लेकिन ज्यूडिशियल ऑफिसर्स ( दूसरे राज्यों के एस आई आर अधिकारियों) को नौ घंटे बंधक बनाने पर सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च न्यायाधीश सूर्यकांत जी भयंकर गुस्सा गए हैं भई । अब पता नहीं बंगाल का ऊंट राष्ट्रपति शासन लगवाकर ही मानेगा क्या। इस बात पर किसी को कुछ लेने देने की भी न पड़ी है लेकिन जिस तरह से राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के नेता रूपी पंछी फुदक फुदक कर बड्डी वाली पार्टी का बाजरा चुग रहे हैं तो लगता है परिणाम ढाक के तीन पात ही रहने वाला है। लोग सेंचुरी सेंचुरी कर रहे हैं पर मैंनु ऐ लगदा है बंदा 96+4=101 का शगुन डाल कर ही मानेगा। चलो कोई तो है जो गांधी जी की आत्मा की तसल्ली के लिए कुछ योगदान दे रहा है। वरना धरती पकड़ हो या घोड़े वाला या कोई और उनका योगदान सिर्फ इतना था कि ख़ुद के लिए लड़े ख़ुद ही हारे लेकिन हंसते हुए क्यों कि वो चुनाव लड़ ही हारने के लिए रहे थे लेकिन ये बंदा पांच राज्यों में हारेगा और ख़ुश रहेगा। अजब ये होगा कि हार के लिए फिर कोई बकरा तलाश जाएगा और सारा दोष उस पर मढ़ दिया जाएगा और ये बंदा फिर निकल लेगा विदेश यात्रा पर अगले चुनाव में हार का गणित समझने और हार का अंतर ज़्यादा करने के लिए कोई प्रमेय सिद्ध कर लेगा, फिर कुछ दिनों बाद शान से सीना चौड़ा करके लौटेगा ये बताने के लिए कि मैं हारा नहीं हराया गया हूँ यानि गिरे तो भी टांग ऊपर।


प्रदीप भट्ट 
व्यंग्यकार,मेरठ
02042026
 

Wednesday, 12 November 2025

"काँपे टांग जाएंगी"

रिपोर्ताज 

        "कांपे टांग जाएंगी"

         इश्क़ भी अजब चीज़ है मियां कब किससे कहां और कितना हो जाए भाई साहब मैनू कि पता😻😻😻 किसी और नू पता होए तो मैन्नू भी दसना। अब आप भी सोच रिए होंगे ए कि गल्ल कित्ती तो भाई साहब पिछले तीन चार दशक में जोर जबरदस्ती से ही सही हम मंच शेयर कर ही रहे हैं 🤓🤓🤓🤓 लेकिन एक बात तो सच्ची सच्ची बता रिया हूं उर्दू फ़ारसी अरबी के बड़े बड़े लच्छेदार शब्दों के घाल मेल से महफ़िल सजती भी देखी है और भैय्या उजड़ती भी। दिल्ली मुम्बई हैदराबाद लखनऊ और छोटे मोटे का तो ज़िक्र ही क्या करना हुज़ूर😊😊 हमने ऐसी ऐसी नशिस्त देखी हैं जहाँ सुनने वाले और सुनाने वाले सब के सब अंतर्राष्ट्रीय😛😛😛😛😛😛 कोई भी ससुरा वॉकल फॉर लोकल ना हो रिया 👺👺बस बजट के चक्कर में भारत में आयोजन करके अंतरराष्ट्रीय होने का सुख प्राप्त कर रहे हैं। करो करो मैंनूं की लोड।

         सो महाराज जब भारत सरकार की सेवा से निवृत हुए तो मेरठ को अपना ठिकाना बना लिया। वो स्लोगन आपने सुना है न "जिन्दगी के साथ भी जिन्दगी के बाद भी" तो बस मेरठ में रहकर दिल्ली गुड़गांव गाजियाबाद में सुबह निकलकर साहित्यिक समारोहों में अपनी हाजिरी दर्ज कर आते हैं।👁️👁️👁️👁️ इसी क्रम में कथा रंग और "महफ़िल ए बारादरी" से जुड़ाव हुआ और वो भी सच्चा वाला। इसे ही शास्त्रों में सच्चे वाला इश्क़ कहते हैं हुज़ूर। महफ़िल ए बारादरी की सबसे बड़ी खासियत ये है यहाँ सिर्फ़ पढ़ने वाले ही नही अपितु श्रवण सुख प्राप्त करने वाले भी अपनी हाज़िरी लगाते हैं। बढ़िया वाले वैन्यू के साथ बढ़िया वाला मैन्यू भी ब्राह्मण का इसके बिना गुजारा न है जी 😛😛😛😛और शायरी UPSC क्रैक करके क्लॉस वन अधिकारी वाली। नवागंतुको के लिए  एकदम परफैक्ट पाठशाला। अब इत्ती सारी खूबियां हों तो इश्क़ तो होवे ही होवे, तो महाराज हमें भी हो गया। निश्चित इसके लिए डॉक्टर माला कपूर गौहर और रियल संयोजक के साथ एंकर भी  की तरह महफ़िल ए बारादरी नामक जहाज को संभाल कर रखने वाले आलोक यात्री जी। मैंने कुछ ज़्यादा तारीफ़ तो नी कर दी। अब कर दी तो कर दी भाया 🤠🤠🤠🤠🤠🤠🤠🤣 बुरा लगे तो हैप्पी 🫟।

         9 नवंबर को रैपिड 🚇 का आनन्द लेते हुए मेरठ से गाजियाबाद और फिर  रैपिडो का साथ,लो जी जा पहुंचे सिल्वर लाइन प्रेस्टिज स्कूल वो भी टैम से पहले। ठीक सवा तीन बजे आलोक जी ने माइक संभाला, दीप प्रज्ज्ववलन के बाद मित्र इंद्रजीत सुकुमार द्वारा सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की गई फिर माइक संभाला तरुणा मिश्र जी ने और लो जी कार्यक्रम विधिवत शुरू हो गया। इस बार की महफ़िल गज़लों के उस्ताद शायर कृष्ण बिहारी ''नूर'' की जन्मशताब्दी के अवसर पर विशेष आयोजन के तहत रखी गई।  मुख्य अतिथि नीना सहर,  गोविन्द गुलशन, डॉक्टर सुधीर  त्यागी जिन्हें इस बार "बारादरी जीवन पर्यन्त साहित्य सृजन सम्मान" से नवाजा गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इरफ़ान आज़मी जी ने की। सुरेन्द्र सिंहल जी, इंद्रजीत, दीपक श्रीवास्तव, बी के शर्मा जैदी, जगदीश पंकज, सुधा गोयल, वेद प्रकाश, रवि पाराशर, विपिन जैन, तारा गुप्ता, अनिमेष शर्मा, ईश्वर सिंह तेवतिया, ताबिश खैराबादी, असलम राशिद, डॉक्टर रणवीर सिंह परमार, संजीव शर्मा, संजीव निगम, नरेंद्र शर्मा, शोभना श्याम, राजेश श्रीवास्तव, सोनम यादव, मनीषा जोशी, उषा श्रीवास्तव, विनोद तोमर, पवन तोमर, सुभाष चंदर,विवेक वशिष्ठ, कपिल खंडेलवाल, तूलिका सेठ और भैय्या मित्र विनय के साथ विक्रम और विक्रम के साथ सिंह साहब दी ग्रेट,। देख लो जी कितने पॉवर फूल मित्र मण्डली है हमारी💪🏼💪🏼💪🏼👊🏼। अब इतने सारे महानुभावों के बीच हम भी जींस के ऊपर बाटीक प्रिंट वाला खादी का कुर्ता पहने ख़ुद को तुर्रम खां समझ रिए थे। भाई साहब अपनी भी बारी आई और भैय्या कोई सत्रह अठारह बरस पहले की ताज़ी ताज़ी ग़ज़ल लपेट दी। ग़लती से अच्छी बात ये रही दोस्तों ने वाह वाह भी कर दी मतबल पप्पू पास हो गया 🤩😝😝😝🤪🤪🤪🤪🤪 हेल्लो हेल्लो ऐ जी क्या कै रिए हो आपको भी पढ़नी है तो लो जी पढ़ लो बधाई अगली बार दे देना 😅😅😅😂

माया काया फेर में पड़कर, उलझे जाने कितने लोग 
दूर तमाशा देख रहे थे, हम जैसे अंजाने लोग 

ठगनी माया कब ठहरी है, एक जगह तू सोच ज़रा 
बौराए से फिरते रहते ,कुछ जाने पहचाने लोग 

बाहर से काला कोई, अन्दर से काला होता है 
भेद समझ न पाए अब तक, कैसे हैं बचकाने लोग 

हंसना रोना खोना पाना,जीवन के हैं रंग कई 
दुःख से भागे मयखाने में, पैमाने पी जाते लोग 

जिसकी गाड़ी ने कल बदला, इंसानों को लाशों में 
उसके दर पे कब से बैठे, मांग रहे हर्जाने लोग 

इसकी उसकी तेरी मेरी, फ़िक्र करी है कब ख़ुद की 
बस छोटी मुस्कान की खातिर, लूट जाते दीवाने लोग 

कितना समझाया लोगों ने, नहीं समझ पर कुछ आया 
हंसते हंसते जान गवा दें, कैसे हैं 
मरजाने लोग 

मैंने तो दस्तूर निभाया, हंस कर उनसे बातें की 
बिला वज़ह गढ़ने लगते हैं, कितने ही अफसाने लोग 

ऊंची ऊंची बातें करना जिनकी फ़ितरत होती है 
उतने ज़्यादा घर में गहरे रखते हैं तैयखाने लोग 

आंधी और तूफ़ानों से ये, दीप नहीं' बुझने वाला 
धरती पर दो चार बचे हैं, हम जैसे परवाने लोग 

--प्रदीप -- 08082008 (मीठी बाई कॉलेज, मुम्बई)

मुक्तक 
 भले दूरी नहीं कुछ भी, मगर दूरी सी लगती है।
अधूरी हैं कई ईप्साएँ, पर पूरी सी लगती हैं।
तुम्हीं बतलाओ इन सबसे, मैं बाहर आऊँ अब कैसे,
करूं न कुछ अगरचे मैं, तो मजबूरी सी लगती है।।
प्रदीप डीएस भट्ट-1572025

         और अंत में भाई साहब जब पढ़ने वाले चालीस पचास हों और एंकर एक तो तकलीफ़ तो होती है वो भी बड़ी वाली। सब कवियों/ शायरों की शान में एक डेढ़ शेर तो पढ़ना ही पड़ेगा न तो अगर 50 कवि हुए तो कम से कम 100 मिनिट फिर बार बार उठना बैठना वो भी चेहरे पर डेढ़ इंच मुस्कान लिए और फिर अपना नम्बर आने पर कविता भी पढ़नी। महाराज चार साल 2003-7 में करके देख चुके हैं। जल्दी समझ में आ गया मियां ये रोग हमारे बस का न है। सो भैय्या प्रवचन कर्ता थोड़ी ठंड रक्खा करें एंकरिंग कोई मूंग की दाल का हलवा नही है बल्कि उड़द की दाल का हलवा है खाना आसान है पचाना मुश्किल। यकीं नई तो एक बार ट्राई करके देख लो मियां और मियन। वरना बकौल पाकिस्तानी एंकर" काँपे टांग जाएंगी" 😻😻😻😻😻🙆‍♂️🙆‍♂️🙆‍♂️
जय श्रीराम 

प्रदीप डीएस भट्ट - 1211025

Wednesday, 15 October 2025

जबरा मारे रोने न दे ( बुलडोजर बाबा से पंगा)


"जबरा मारे रोने न दे "
(बुलडोजर बाबा से पंगा) 

रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पाताल,
आप कह भीतर भई, जूती खाए कपाल। 

         आज से करीब 969 बरस पहले जब रहीम दास जी ने इस दोहे की रचना की होगी तो उन्हें थोड़े ही पता था कि 2014 में भाजपा जब केंद्र की सत्ता में आयेगी और तीन बरस बाद उत्तर प्रदेश में 2017 में योगी आदित्यनाथ उर्फ़ बुलडोजर बाबा सत्ता संभालेंगे तब इस दोहे को दो चार लमढींग पूरा पूरा मान सम्मान देंगे और बदले में पता नही अपना क्या क्या लाल करवाएंगे और सिर्फ़ अपना नही अपने रिश्ते नाते दारों का भी। वो क्या है न जब योगी बाबा जी किसी का इलाज़ करते हैं तो वो गर्म तवे पर आस पड़ोस, रिश्तेदारों और ऐसे लमढींगो के हम दर्दों का भी इलाज़ कर देते हैं ताकि न रहे बांस न बजे बासुंरी। तुम्हें मेरी सच्ची वाली मुहब्बत की कसम यकीन कर लो सच कै रिया हूं इसी में भलाई है महाराज। जिसे भी लगता हो योगी जी उसके साथ ज्यादती कर रहे हैं वो एक बार इनके फेरे में पड़कर देख लो भाई इलाज़ के पहले चरण में ही पांच वक्त का नमाजी भी सु प्रभात और शुभ संध्या कहने लगता है। अगर कोई ज़्यादा ही ढीठ हुआ तो उसका इलाज़ जैसे जैसे अंतिम चरण में पहुंचता है उसे अपनी आठवीं पीढ़ी सनातनी नज़र आने लगती है और फिर वो योगी जी के चरणों में लोट पोट होकर जय श्री राम राधे राधे कहता हुआ इलाज़ को रोकने की मिन्नतें करने लगता है। 

         आपको याद होगा सम्भल वाले बर्क मियां, अरे महाराज नाराज़ काहे होते हो 2011 में भीमनगर बनाया था मायावती ने नमाजवादी ने 2012 में फ़िर से सम्भल कर दिया। वैसे भाई साहब शास्त्रों के हिसाब से सतयुग में सम्भल का नाम सत्यव्रत , त्रेता में  महदगिरि और द्वापर में पिंगल  वैसे कलयुग में नागभट्ट द्वितीय के लिखे ताम्र शिला लेखों में इसका नाम शम्भुपल्लिक है । पता नी किसने इसका नाम सम्भल कर दिया। हां तो महाराज सीनियर वाले बर्क मियां अजी वही नमाजवादी पार्टी के बड़डे वाले नेता जी भाई साहब जब भी मुंह खोलते थे ऊटपटांग ही बोलते थे। शफ़्फाक दाढ़ी और कपड़ों में लिपटे डेढ़ सौ ग्राम के मियां बर्क योगी बाबा के प्रकोप से जैसे तैसे बच गए इसलिए पहली फुर्सत में निकल लिए लेकिन जूनियर बर्क की एक ग़लती देखो क्या करा गई अभी तक कसमसा रहा है। योगी जी टैम टैम पर मुग़ली घुट्टी 555 की डॉज देते रहते हैं।  कुछ ऐसा ही दुस्साहस इलाहाबादी माफिया का हुआ अजी क्या नाम था उसका हां हां हां याद आया अतीक अहमद उर्फ़ अतीकवा याद आया न कोर्ट में किसी ने अतिकवा कहा तो भड़क गया था। योगी जी पूरे प्राण जाए पर वचन न जाए की तर्ज पर शोले के गब्बर की तरह विधानसभा में दहाड़े मिट्टी में मिला देंगे और भाई साहब कोर्ट से निकलते ही अतिकवा के साथ उसका सगे वाला भाई अशरफ़ का भी हैप्पी वाला बर्थडे। उसके बाद वो मूंछों पर ताव देते एक और माफिया मुख़्तार अंसारी भाई साहब क्या तूती बोलती थी, योगी जी की वक्र दृष्टि पड़ी और उसका भी जेल में ही जय श्रीराम।

         रामपुर के चौधरी आज़म ख़ान जो अपने आप को आबे जम जम खान समझने की भूल में थे, पहले कोंग्रेस ने सहारा दिया और फिर नमाजवादी पार्टी ने सीधे सर पर बिठा लिया। जरा सोचिए 2012-2017 में जनाब के क्या जलवा ए जलाल थे। एक मुख्यमंत्री अखिलेश एक आज़म ख़ान और आधे बाक़ी यादव यानि कुल जमा ढाई मुख्यमंत्रियों की बारात लेकिन आज़म ख़ान का जलवा बस पूछो मति। जब आदमी पॉवर में होता है तो आएं बाएं शाएं कुछ भी बोल देता है बस ग़लती से मिस्टेक इन्होंने भी कर दी और लोकसभा में अपने टर्म में बोलते बोलते कुछ ज्यादा ही जौहर दिखा गई और भैय्या बोल गए राष्ट्रपति भवन से ज़्यादा बेहतर तो जौहर यूनिवर्सिटी है। बस उस दिन से उनका सितारा ऐसा गर्दिश में आया है कि अभी अभी जेल से बाहर आ पाए हैं। इल्ज़ाम भी कैसे कैसे, भैंस चोर, जमीन चोरी मतबल कुल मिलाकर मुकदमों की सैंचुरी हो गई है। बुरे वक्त में नमाजवादी पार्टी ने भी मियां साहब की खूब फिरकी ली। अब जेल से बाहर आएं हैं तो अपने आपको सनातनी घोषित करने में लगे हैं और बात बात में भगवान राम और कृष्ण का गुणगान अलग से। लेकिन एक और कहावत है क़िस्मत में हों ककंर, तो क्या करेंगे शंकर सो भैय्या अभी आज़म ठीक से स्वांस भी नहीं ले पाए थे कोर्ट ने फर्जी पैनकार्ड मामले में बाप बेटे को सात सात साल की सजा मुकर्रर हुई है। पचास हज़ार का जुर्माना अलग से।

         अब आप खुदई सोचो बाबा जी की वक्र दृष्टि से ऐसे ऐसे तीस मार खां न बचे तो फिर तौक़ीर रजा किस खेत की मूली है। ऐं जी कौन तौकीर रजा अरे भाई बरेली वाले अहमद रज़ा खान बरेली आंदोलन के जनक ये कलमुंहा उन्हीं का परपोता है। कहने को तो इस्लामी धर्म गुरु हैं  बरेली मसलक के धार्मिक नेता और राजनैतिक दल इत्तेहाद ए मिल्लत परिषद् के संस्थापक भी। अब धर्म नीति में पिछवाड़े से राजनीति भी करनी है सो पड़ोसी रामपुर जिले के आज़म खान और सम्भल के बड़े वाले बर्क मियां की तरह इन्हें भी अनाप शनाप बोलने की सुरसुरी उठी। अब सुरसुरी उठी तो उठी। मौक़ा कोई भी हो दस्तूर कोई भी हो तौक़ीर मियां को तो बोलना ही बोलना है सो समजवदिया पार्टी की शय पाकर देश के ख़िलाफ़ बोलने के इस बंदे ने सारे रिकॉर्ड ही तोड़ डाले। जितना ज़्यादा कड़वा बोले उससे ज़्यादा सरकारी ग़ैर सरकारी सम्पत्ति पर कब्जा करते रहे। न कोई रोकने वाला न कोई टोकने वाला। किसी ने ज़्यादा चू चपड़ की तो एक आवाज़ पे हज़ारों लोग सड़को पर। जिले की क्या औकात जब तौकीर के तार लखनऊ और दिल्ली से जुड़े हों। लखनऊ में समजवदिया पार्टी और केंद्र में पापिन कॉन्ग्रेस। कोई करे भी तो क्या करे। 2010 का दंगा इस बात का जीता जागता उदाहरण है जी। लेकिन तब मुख्यमंत्री थीं मायावती तौक़ीर की मुश्कें बंधवाकर लखनऊ मंगवा लिया पर कर कुछ न सकी। ऊपर से दबाव और तौक़ीर शान से बिना मूंछों के होते हुए भी ताव देता हुआ वापिस बरेली वो भी पूरी शान ओ शौकत से वो भी ये कहते हुए की बरेली का झुमका हूं बरेली में ही सजूंगा।

         लेकिन कहते हैं न "समय समय की बात है समय बड़ा बलवान, खड़ी गोपियां लुट गईं वही अर्जुन वही बाण " तो भैय्या 2017 में उत्तर प्रदेश में आ गए बाबा जी वो भी लठ्ठ लेकर और मुनादी करा दी "गुंडन गुंडई छोड़ दें या उत्तर प्रदेश" वरना हम छुड़वा देंगे और महाराज उसके बाद जो गुंडन और माफिया की डेटिंग पेंटिंग,धुलाई रंगाई पुताई होनी शुरू हुई वो बदस्तूर जारी है।  जो प्रेम से माना उसे लड्डू जो नहीं माना उसे लठ्ठ और जो ख़ुद को ख़ुदा समझने के फेर में था उसकी बत्ती जड़ से गुल। इधर इस चौराहे पर लड़की पर फब्ती कसी उधर अगले चौराहे पर यमदूत तैयार। कुछ जड़ बुद्धि फिर भी नहीं माने तो बाबा जी ने पहली फुर्सत में ऑपरेशन लंगड़ा लॉन्च कर दिया। हर दूसरे दिन पैर में गोली लगे लंगड़ाते हुए तीन चार छुटभैय्ए नेता और कुछ टुच्चे से टट पुंजीए। तो हुआ यूं कि बरेली वाले तौक़ीर मियां की जीभ को फिर खुजली हो गई कि कुछ अनाप शनाप भौं भौं शुरू कर दी। लोगों ने बहुत समझाया मियां बाबा जी की दृष्टि आपके कुकर्मों पर पहले से ही और पंगा मति लो पर तौक़ीर कहां मानने वाला था सो आई लव मुहम्मद पर 25 सितम्बर को आएं बाएं शाय बोल गया। प्रशासन सख़्त हुआ तो इसने अगले दिन 26 को शुक्रवार को हजारों की भीड़ इक्ट्ठी करके प्रशासन को चुनौती दे डाली। बात बाबा जी तक पहुंची, तौक़ीर का रसूख दादागिरी और बहन मायावती जैसी सख़्त प्रशासक के बावजूद उसकी दबंगई की चर्चा हुई। बाबा जी ने सख़्त आदेश दे डाला बाबा जी की ओर से खर्चा पानी दे दो साथ में बहन मायावती की जो किरकिरी हुई थी उसका भी हिसाब किताब करो। अब ये बंदा मुगालते में था बाबा जी मेरा क्या ही उखाड़ लेंगे हम तौक़ीर हैं हमने तो समजवदिया और बसपा प्रमुख को भी घुटनों पर ला दिया तो योगी जी किस खेत की मूली हैं। ये सुनकर इधर बाबा जी धीरे से मुस्कुराए और उधर बरेली में लठ्ठ चालू और अगले तीन चार दिन में बाबा जी ने तौक़ीर समेत कइयों को समझा दिया बाबा जी ख़ेत की मूली नहीं बड़े वाले मठ के मूला हैं। लठ कहां से घुसेगा और कहां से निकलेगा ख़ुद बाबा जी को भी न पता हां नई तो। 

         अब तोकीर रजा अब गिड़गिड़ा रहा है जुगाड लगा रहा है कह रहा है कि योगी जी कसम से पूरी जिंगदी किसी मंदिर में भजन कीर्तन सत्संग करके काट लूंगा बस बख़्श दो।दंगा फसाद आगजनी तोड़फोड़ तो दूर मुंह भी नहीं खोलूंगा बस बख़्श दो लेकिन महाराज योगी आदित्यनाथ नाथ तो ठहरे पक्के वाले बाबा जी पहली फुर्सत में तौक़ीर को फतेहगढ़ जेल भेजा दस बीस मुक़दमे दर्ज, अगली पिछली कई पीढ़ियों की जन्मकुंडली खंगाली गई फिर शुरू हुआ बरेली में स्वच्छ भारत अभियान का श्रीगणेश। तौक़ीरवा के दूर के पास के सभी रिश्तेदारों पर योगी जी का नजला गिर रहा है। ऐंठन बैठन, हेकड़ी वेकड़ी रंगबाजी छिनैति गिरी सब हवा। इतना बड़ा एक्शन लिया है बाबा जी ने कि तौक़ीर के रिश्तेदार ही उसके जानी दुश्मन बन गए हैं। जब तौक़ीर के कारण कब्ज़ा कर रहे थे तो सब अच्छा था लेकिन अब छिन गया तो आप समझ रिए हो न मैं क्या कै रिया हूं। नाते रिश्तेदारों की तौक़ीर से इस कदर नाराज़गी बढ़ गई है कि दूर के सूत्रों से ये ख़बर मिली है कि कुछ लौंडे लपाडो को तौक़ीर के साथ वही करने के लिए कहा गया है जो पाकिस्तान में इमरान खान के साथ जेल में हुआ है। सच्ची कै रिया हूं ये सजा कुछ ज़्यादा न हुई मियां पर भाई जान से बढ़कर कुछ थोड़े है सो जान बची तो.......।


प्रदीप डीएस भट्ट - 20112025
व्यंग्यकार मेरठ 



Friday, 12 September 2025

"आँख बन्द डिब्बा गायब"

"आँख बन्द डिब्बा गायब" 

         तो हुआ यूं कि टीवी पर वोट चोर गद्दी छोड़ का नारा सुनते सुनते ससुरे कानों ने अपनी जगह से लगभग उखड़ते हुए बिल्कुल दोनों दीदो के बीच आकर कहा अबे सुनो राहुल गाँधी की नौटंकी से हमारे यानि कानों के सिर में दर्द हो रहा है। आख़िर हम भी एक हद तक ही डेसिबल डेसिबल झेल सकते हैं। बड़े व्यंग्यकार बने फिरते हो सुनो हमें अभी अभी गुप्त सूचना प्राप्त हुई है कल राहुलवा हाइड्रोजन बम फोड़ने वाला है हम पे रहम करो और वहां ले चलो ज़रा प्रत्यक्ष देख सुन लें।कानों के रौद्र रूप को देखते हुए हम अगले दिन कोटला जा पहुंचे वो भी 9 बजे 10 बजे हाइड्रोजन बम फटने का समय जो निश्चित था पहुंचें तो पता चला बम फूटने का समय 10 की जगह 11 हो गया है। बस फिर क्या था हमने कांग्रेस मुख्यालय के हॉल में टहलना शुरु कर दिया  तभी हॉल में टंगी एक फोटो ने हमें खोपचे में आने का इशारा किया। हमने इधर उधर देखा तो फुटवा बोली वोट चोरी का हाइड्रोजन बम फूटता देखने आए हो बे हमने हां में मुंडी हिलाई और परिचय जानना चाहा तो तस्वीर ने नाम पट्टिका से धूल हटाने को कहा, हमने धूल हटाई तो मटमैले कलर में "एलन ऑक्टेवियन ह्यूम" लिखा दिखा। हमने मस्ती में पूछा तुम यहां काहे टंगे हो बे। तस्वीर फिर बोली मैं एक ब्रिटिश सिविल सेवी, एक पक्षी विज्ञानी और वनस्पति विज्ञानी था। मति मारी गई थी मेरी जो मैंने भारतीयों और ब्रिटिशस के मध्य एक सेफ़्टी वाल्व के रूप में कार्य करने के लिए 28 दिसम्बर 1885 में 72 लोगों (भाई साहब आप 72 हूरें न पढ़ लेना, हां नई तो) के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कर डाली । 

         तस्वीर ने एक लम्बा पॉज लिया फिर बोली कांग्रेस पार्टी के उद्भव से लेकर आज तक न जाने कितने अध्यक्ष बने या बनाए गए कभी चोरी से कभी सीना जोरी से लेकिन मजाल है किसी दूसरे कॉन्ग्रेसी नेता ने चूं चपड़ की हो और करते भी कैसे कुछ दिनों या महीनों में ही चूं चपड़ करने वाले का नाम," राम नाम सत्य" में जो विलीन हो जाने का ख़तरा जो रहता था। कभी ट्रक के नीचे कभी होटल के कमरे में खूबसूरत लाश के रूप में तो कभी हवाई जहाज़ में उल्टे लटके हुए। वैसे कुछ भी कहो हवाई जहाज़ में मरने का अलग ही मज़ा है लेकिन इसके लिए आपके पास कुछ ख़ुफ़िया राज होने चाहिए ऐसे ही कोई इत्ते महंगे हवाई जहाज़ की बली थोड़े दी जाएगी भाई साहब किसी ऐरे गेरे के लिए। इसके लिए ऐसे वैसे और न जाने कैसे कर्म कुकर्मों की आह लेनी पड़ती है जी। वैसे ख़तरा मतलब वो जो सफ़ेद बोर्ड पर एक नरमुंड पर लाल रंग से क्रॉस निशान, अबे बात समझ में आई या नहीं। अब भला किसको शौक होगा जो उस नरमुंड की जगह अपना मुंड लटकता देखना चाहेगा।  ख़ैर असली वोट चोरी या तुम उसे डकैती कहना चाहो या लूट कह लो। मैं तुम्हें आंकड़े देता हूं लेकिन शर्त इत्ती सी है तुम जाते जाते मुझे यहां से चुरा कर ले जाना। मैंने हां में फिर से मुंडी हिलाई तो तस्वीर बड़बड़ाते हुए बोली चलो  कागज़ पेंसिल उठाओ और लिखना शुरू करो। 

       👉  एक *  देखो भैय्या आज़ाद भारत में वोट चोरी नहीं बल्कि वोट डकैती डाली गई थी। 1946 में 15 कॉंग्रेस प्रान्तीय समितियों को कॉंग्रेस अध्यक्ष का चुनाव करना था 15 में से 12 ने सरदार पटेल को वोट दिया 3 ने बहिष्कार किया और नेहरू को वोट की जगह मिला बाबा जी का ठुल्लू लेकिन अध्यक्ष कौन बना नेहरू। इससे सिद्ध होता है खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान।  👉  दो ** 1951 में जम्मू कश्मीर में चुनाव डिक्लेयर हुए । नेहरू शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। सीट बंटवारे में कश्मीर घाटी को 43 जम्मू रीजन को 30 और लद्दाख को केवल 2 सीट दी गईं। कॉन्ग्रेस ने चुनाव न लड़ने का फैसला किया ताकि नेशनल कॉन्ग्रेस आसानी से चुनाव जीत जाए। तीसरी पार्टी थी प्रजा परिषद् चूंकि उसका घाटी में कोई आधार नहीं था इसलिए प्रजा परिषद् ने  जम्मू रीज़न में चुनाव लड़ने का फैसला किया लेकिन कॉन्ग्रेस की दख़ल पर तत्कालीन चुनाव आयुक्त ने  नॉमिनेश में 13 उम्मीदवारों के पर्चे ख़ारिज कर दिए इस पर प्रजा परिषद् ने पहले जम्मू कश्मीर में फिर दिल्ली में प्रोटेस्ट किया और नेहरू को इस गड़बड़ी की चिट्ठी लिखी लेकिन जब कोई एक्शन नहीं हुआ तो प्रजा परिषद् ने चुनाव बहिष्कार की घोषणा कर दी। 👉  चार ** बाबा साहब अम्बेडकर नॉर्थ बम्बई से 1952 में 14  हज़ार वोटों से हारे और वोट कैंसिल हुए 78000। जय प्रकाश नारायण जी ने भी कहा कुछ नही बहुत बड़ी गड़बड़ है।अब तनिक आप ही सोचो "दया कुछ गड़बड़ है " से पहले भी कांग्रेस कुछ गड़बड़ है वामपंथियों कुछ गड़बड़ है चल रहा था। इसलिए डंके की चोट पर अम्बेडकर जी ने कोर्ट में केस फाइल किया और कांग्रेस और वामपंथियों को कटघरे में खड़ा किया।

         👉 पांच ** 1952 में रामपुर में मौलाना आज़ाद चुनाव लड़े मगर बीस हज़ार वोटों से हार गए, रिटर्निंग ऑफिसर ने रिज़ल्ट भी डिक्लेयर कर दिया तभी नेहरू जी ने गोविन्द वल्लभ पंत को फोन कर कहा कि मौलाना आज़ाद चुनाव नही हारने चाहिए। पंत जी बोले महाराज डीएम रिजल्ट डिक्लेयर कर चुका है तो नेहरू जी ने तुरन्त धमकी दी अगर मौलाना की शिकस्त हुई तो तुम्हारी कुर्सी गई। पंत जी ने आनन फानन में डीएम को फोन लगाया और बोला अगर मौलाना हारा तो हम दोनों की कुर्सी जाना तय है कुछ करो, फिर डीएम जीते हुए उम्मीदवार के बक्से से वोट निकालकर मौलाना के बक्से में डाले और लो जी मौलाना जीत गए जी। गांधी जी की किताब सत्य के प्रयोग का सबसे उम्दा उदाहरण। प्वाइंट नम्बर छः ** कैलाश नाथ वाँचू जिनके पास नॉर्मल लॉ की डिग्री भी नही थी कॉन्ग्रेस ने 24 अप्रैल 1967 में उन्हें चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया बना दिया। भाई साहब खुदई सोचो ऐसे ऐसे काम कांग्रेस के अलावा और कोई कर सके है। अब इसे वोट चोरी तो नहीं संवैधानिक लूट कह सकते हैं। प्वाइंट नम्बर सात** रायबरेली चुनाव में सो कॉल्ड आयरन लेडी ने वोट की चोरी नही की वरन डकैती डाली, उत्तर प्रदेश के हाई कोर्ट ने 1975 में राज नारायण की याचिका पर 1971 के चुनाव का संज्ञान लिया और परिणाम रद्द कर दिया। बस आयरन लेडी को गुस्सा आ गया 25 जून को आपातकाल लगा दिया। 👉 ** गोपाल स्वामी मुख्य चुनाव आयुक्त ने नवीन चावला की लिखित शिकायत दर्ज कराई कि चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण सूचनाएं चावला द्वारा कांग्रेस को लीक की जा रही हैं। कांग्रेस ने कहा चावला हमारा बच्चा है ये तो यूं ही दुग्ध पीएगा। मतलब वोट चोरी चुनाव आयोग के एक लपाड़े के द्वारा नही बल्कि आधा चुनाव आयोग ही चोरी हो गया।

         👉 ** जस्टिस बहरुल इस्लाम आसाम हाई कोर्ट के जज पहले इस्तीफा देते हैं फिर कांग्रेस के टिकिट पर चुनाव लड़ते हैं, लोकसभा चुनाव कैंसिल हो जाता है तो फिर उन्हें राज्य सभा भेजा जाता है बाद में इस्लाम मियां इस्तीफा देते हैं फिर उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया जाता है। अब लगाते रहो हिसाब ये चोरी है,लूट है या डकैती। 👉 ** जब 21 मई 1991 में राजीव गाँधी की हत्या हो गई तो चुनाव आयोग ने राजीव गाँधी की सीट कैंसिल नहीं की वरन पूरे देश के चुनाव को 21,22 दिन आगे बढ़ा दिया ताकि कॉन्ग्रेस राजीव गाँधी की अस्थियों को देश में लेकर घूम सके। अब खुदई सोचो जो पार्टी चुनाव आयोग को जेब में रखकर चलती थी आज वो चुनाव आयोग के पीछे हाथ धोकर पड़ी है। 👉 ** अधीर रंजन चौधरी जो कॉन्ग्रेस के पिछले लोप ( लीडर ऑफ ऑप्जिशन) रह चुके हैं खुदई कॉन्ग्रेस से अलग होकर बनी TMC यानि तुड़ी मुड़ी कांग्रेस पर आरोप लगा रहे हैं कि ममता नामक दीदी खुदई 35,40 लाख फर्जी वोट लिए घूम रही है।
👉 ** के एन राजन्ना कांग्रेस लीडर ने राहुल गांधी के वोट चोरी के आरोप पर उल्टा सवाल दागते हुए कहा कि कर्नाटक में यदि वोट चोरी हुई है तो कांग्रेस कर्नाटक में कैसे जीती। बस तुरन्त दिल्ली से फोन खड़क गया और परिणाम बेचारे राजन्ना की बलि से खत्म हुआ।

आँख बंद डिब्बा गायब
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👉** चारा चोर का टाइटल गले में लटकाए घूम रहे ललुआ जी से जब बीबीसी एक पत्रकार पूछे कि बालू जी जहां आप जीतने की स्थिति में होते हैं वहां आप जीतते हैं कोई बात नही लेकिन जहां सबको पता है आप हारेंगे वहां कैसे जीतते हो ललुआ जी, तो भैय्या जी ललुवा जी बोले "आँख बन्द डिब्बा गायब " 👉 ** राहुल गाँधी ने वोट चोरी नामक वाहियात इल्ज़ाम चुनाव आयोग एवम् वर्तमान सरकार पर लगाया और उस पर बाकायदा PPt प्रेजेंटेशन तैयार कर कुछ सो कॉल्ड पत्रकारों एवम् स्टूडेंट्स के सामने प्रेजेंट किया। अब भईया जब उस प्रेजेंटेशन को अपलोड करने का रियल टाइम चैक किया गया तो पता चला ये तो म्यांमार से अपलोड किया गया है। मतलब आंकड़ा खुद का चोरी हुआ अब कै रिए हैं हाइड्रोजन बम फोड़ूगा। अब उनकी ही बाल्टी के लोग हाथ जोड़कर कह रहे हैं रहने दे भाई तेरे से न होगा। क्यूँ बेइज्जती में दाग लगवाने पर तुला है,चल हवा आने दे । 👉** राहुल गाँधी के वोट चोरी के आरोपों के बहकावे में आकर पता नही कॉन्ग्रेस के किस भक्त ने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका लगा दी साथ ही कोर्ट को चुनाव आयोग को दिशा निर्देश देने के लिए कहा। अब भाई साहब पहले चौकीदार चोर पे सुप्रीम हंटर खाकर भी ये लकड़बग्घे सुधरे नही तो कोर्ट है वो भी हाई वाली आ गया गुस्सा वो भी हाई वाला, पहले तो याचिका कर्ता को ढंग से रगड़ा फिर एक लाख का अर्थ दण्ड लगा दिया । अब वो बंदा सोच रहा है नमाज़ बख्शवाने गया था ई ससुरा तो रोज़ा ही गले पड़ गया जी। 👉 
** एक सो कॉल्ड सोफिलोजीस्ट संजय कुमार जिनके ट्वीट से ही कॉन्ग्रेस ने वोट चोरी का फंडा विकसित किया। अब जब संजय कुमार कह चुके हैं माफी मांग चुके हैं कि ये एक टाइपिंग एरर था तो सवाल ये है कि इतना लम्बा एरर हुआ कैसे और हुआ तो पढ़ा कैसे और पढ़ा तो किसने इसे समझा कैसे मतलब संजय कुमार महाभारत के संजय बनने की कोशिश में संजय एरर बन गए। सच्चाई ये है कि ये सारी कारगुज़ारी कॉन्ग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए थी लेकिन कॉन्ग्रेस के राजकुमार कभी हाइड्रोजन कभी नाइट्रोजन बम को फुस्सी बम बनाकर फोड़ रहे हैं जिससे कांग्रेस परमानेंट कोमा में चली जाए। 👉** निशित कटारिया को हरियाणा युवा कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया। भाई साहब कमाल तो ये है नीतीश पुत्र राजकुमार निषेध पुत्र सुखबीर बन गया और सुखबीर की पत्नी और पता नी कौन कौन रिश्तेदार के फर्जी डॉक्यूमेंट के आधार पर घने सारे फर्जी वोट ठोक दिए। मजे की बात जे है कि अकेले गुरुग्राम में इस बंदे पे सौ से ज्यादा केस विचाराधीन।

        और भैय्या अंत में वोट चोरी के अलावा कॉन्ग्रेस पार्टी जाति चोरी में भी बड़ी माहिर है। अब देखो ने जवाहर लाल कौल ( इससे पहले के इतिहास में जाऊंगा तो कोई अब्दुल निकलेगा ये विषय अलग है कि उस अब्दुल के दादा किशन लाल ही होंगे) जवाहर लाल नेहरू हो गए, किसी ने पूछा क्या कैसे?, फिरोज ghandy फिरोज गाँधी हो गए। एंटोनियो माइनो सोनिया गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा हो गईं लेकिन भाई साहब गाँधी सरनेम को पकड़ के रक्खा हुआ है आखिर भविष्य वाड्रा में थोड़े ही है ghandy में भी नहीं अगर भविष्य है तो वो है गाँधी में। गाँधी जी भी सोच रहे होंगे, अमा क्या सोच रहे होंगे अपना सिर धुन रिए होंगे, हां नई तो।

प्रदीप भट्ट - व्यंग्यकार 22.09.2025

Tuesday, 9 September 2025

"बेचारा गांधी "

        "बेचारा गांधी"
 
          अँधेरी रेलवे स्टेशन से निकलकर बाहर आया तो देखा दूर-दूर तक न कोई ऑटो न टैक्सी अलबत्ता पानी ज़रूर भरा हुआ मिला जिसमें छप छपाक की इक्का दुक्का आवाज़ें गूंजती मिली। नीचे भी तीन फुट पानी और ऊपर से राम जी का पानी और वो भी रात के सवा दो  बजे। थोड़ी देर संशय के सागर में गोते लगाते हुए  तय किया कि पैदल ही चले चलते हैं। पिट्ठू को पीठ पर लादा और सीधे एस वी रोड़ क्रॉस करके जुहू गली की तरफ़ मुड़ गया। पानी में छप छपाक की आवाज़ लगातर हुए जा रही थी तभी लाठी की ठक् ठक सुनाई पड़ी। पीछे मुड़कर देखा तो बिलकुल गांधी जी वाले गैटअप में लम्बी लम्बी डग भरते हुए एक कृष काय काया फासला कम करती हुई मुझसे आ लगी। मैंने ने यूं ही पूछ लिया चच्चा इत्ती रात में किधर टहल रिए हो, एक क्षण के पॉज के बाद आवाज़ आई चच्चा नही बप्पा मैंने हँसते हुए कहा उन्हें तो 6 सितम्बर को विसर्जित कर दिया।चश्मे पे पानी की बूँदों को झटकटते हुए वो कृष काया में फिर कंपन हुई और इस ज़रा सख्त आवाज़ आई तो फिर बापू कहो मैं मोहन दास करम चन्द गांधी उर्फ़ महात्मा गाँधी उर्फ़ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी। मैंने फिर मज़ाक किया ये क्या चचा भारत वर्ष, हिंदुस्तान और इंडिया की तर्ज़ पर अपना गुणगान कर रिये हो। इस बार कोई प्रतिक्रिया न आई तो मुझे लगा इस बहरूपिये ने गांधी जी की किताब "मौन सर्वार्थ साधकम" का पालन किया है।थोड़ी देर बस छप छाप की आवाज़ ही गूंजती रही।

          जुहू सर्कल से मुड़ते हुए मैंने उस कृष काय काया को फिर से देखा और उल्टा सवाल दाग दिया लगता है चच्चा लगे रहो मुन्ना भाई के किरदार में अभी तक धंसे हुए हो मैं संजय दत्त नहीं प्रखर दत्त हूं और हां ये तीन फुट भरे पानी में तुम्हारी लाठी की आवाज़ कैसे क़ायम है। वो कृष काया बोली देख भाई प्रखर दत्त पहले मेरी बात ध्यान से सुन मुझमें पहले दम था पर अब न है। अगर ये लाठी न हो तो तो मुझे कोई पहचाने भी न।  पता नहीं मेरे कैसे कैसे और किस किस रंग रूप के स्क्रपचलर बना दिए जा रहे हैं जिसमें मैं न मोहन दास लगता हूं, न करम चन्द और महात्मा तो बिल्कुल नहीं लेकिन लोग उस स्क्रपचलर के हाथ में लाठी देखकर समझ लेते हैं कि यही होगा वो जिसने सो कॉल्ड चरखे से आज़ादी दिलाई पर सच्ची बात तो ये है उस चरखे से इत्ता सुत भी न कता जिससे मैं अपनी दो चार धोती बना लेता। खैर देख भाई तू मेरा एक काम कर मुझे परसों सुबह तक अपने घर में छिपा के रख ले। तेरा घर तो यहीं जुहू में ही है न और हां मेरी लाठी मेरी धोती में फंसी हुई है जिससे तीन फुट पानी में भी लाठी आवाज़ पैदा कर रही है। मैंने पहली बार महसूस किया कि ये कृष काया वास्तव में वास्तव वाले गांधी जी हैं बिलकुल 30 जनवरी 1948 वाले दिन की तरह बस फ़र्क इत्ता था कि उनके दोनों कंधे पकड़कर चलने वाली सहायिका गायब थीं। असलियत से सामना होते ही मेरी टांगे कांप गई लेकिन "सूं सां मानस गंध" हम दोनों के अलावा तीसरा कोई था भी नही इसलिए मुंह से इत्ता ही फूटा जैसी आपकी इच्छा बापू।

         बात करते करते हम दोनों मेरे फ्लैट तक आ पहुंचे थे। मैंने बापू को अन्दर आने का इशारा किया और खादी का तौलिया उनकी ओर बढ़ा दिया । खादी का तौलिया देखते ही बापू बोले बस अब दो अक्टूबर को ही मेरी ज़रूरत रह गई है, वो भी पहले रिबेट के लिए और अब..... फिर कुछ सोचते हुए बोले नाथू राम गोड़से ने तो तीन गोली मारकर मुझे ठंडा कर दिया लेकिन यहाँ के नेताओं ने मुझे अभी भी गर्म रक्खा हुआ है, देखो न भगवान जी से सेटिंग कर रक्खी है। हर साल एक अक्तुबर को भगवान जी मुझे ऊपर से यहां टपका देते हैं कभी दिल्ली कभी वर्धा कभी बिहार कभी झारखण्ड। इस साल मुम्बई टपका दिया है। मैं तो उकता गया हूं इस ढोंग से। इसलिए 1.40 की लास्ट लोकल से अंधेरी उतरा था कि चलो विरार जाकर कहीं लेट जाऊंगा लेकिन इस राम जी की बरसात ने उधम उतार रक्खा है ऐसा लगता है बादलों में छेद हो गया है। मैंने पहली बार बापू की दयनीय स्थिति को देखते हुए पूछा बापू सच्ची सच्ची बताओ तुम वास्तव में भारत की आज़ादी के लिए लड़ रहे थे या । मेरे इस प्रश्न से बापू कुछ अचकचाए फिर बोले "सत्य के प्रयोग" पर किताब लिखना अलग बात है स्वीकारना अलग। फिर बुदबुदाए ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गए और कैसे कैसे ऐसे वैसे हो गए। बापू को गर्म चाय पिलाई फिर थपकी देकर बापू को सुला दिया। मुझे अब समझ आया बापू 2 अक्तूबर के पाखण्ड से बस ख़ुद को बचाने की चेष्टा क्यूँ कर रहे थे। सच बोल रिया हूँ गांधी जी को मैं कुछ ख़ास पसन्द नहीं करता लेकिन पहली बार लगा मोहन दास करम चंद गांधी उर्फ़ महात्मा गांधी उर्फ़ सो कॉल्ड राष्ट्रपिता बेचारा गांधी भी हो सकता है।

प्रदीप डीएस भट्ट 
मेरठ 
तीन काव्य संग्रह व एक कहानी संग्रह प्रकाशित 
उत्तरांचल दीप पत्रिका में नियमित आलेख 

Tuesday, 2 September 2025

"नदी चली मायके "

रिपोर्ताज 

     "नदी चली मायके"

         यूं तो दो बरस हो गए हैदराबाद को छोड़े लेकिन आँख🥸 बंद करो तो साढ़े चार साल के हैदराबाद प्रवास की यादें आंखो के आगे चित्र की भांति अब भी यूं गुजर जाती है जैसे बरसात के दिनों में नदी नाले उफान मार जाएं। अब आप सोच रिए होंगे जे क्या उदाहरण हुआ जी तो भैय्यू इस बार गर्मी तो जितनी पढ़नी थी पड़ ली लेकिन बरसतिया 🌧 बुआ छप्पर फाड़ के सूखी जमीन का गला तर करने पर तुली हुई हैं। अब करें भी क्यूँ न गंगा मैय्या हों या जमुना, राप्ती हों या झेलम या फिर इनकी चचेरी ममेरी तहेरी बहनें, बहुत दिनों से वो अपने ससुराल की जमीन पर बहे जा रहीं थीं बहे जा रही थीं अब वो का है न ससुराल में कुछ ज़्यादा ही प्यार जो मिल रिया था हुज़ूर सो अब भैय्या ससुराल का मामला है कौन किसको क्या कहे बरसों बरस हो गए बहते हुए किसकी हिम्मत जो मइया जी को टोक दे कि बुआ तनिक भाई भतीजों का भी हाल चाल 👍 मालूम कर लो, तो हुआ यूं के म्हारे बार बार गिड़गिड़ाने पर जून में सभी बुआओं ने एक मीटिंग कर डाली और तय किया कि चलो इस बार मायके चलते हैं देखें भैय्या भाभी भतीजा भतीजी कैसे हैं ,  राम राम भी हो जाएगी और मायके घूम भी आयेंगे, पर भैय्या आयेंगे कहां से जहां ये सारी नदिया बहती थीं वहां तो क्या माननीय सांसद क्या विधायक, क्या कॉर्पोरेटर क्या मुखिया सब ससुरों ने बड्डी बड्डी बिल्डिंग 👷‍♀️ 🏢 🏗 डाली रही सही कसर भाई भतीजों ने पूरी कर दी और लो जी भैया जो थोड़ी भोत धार चल री थी या बची हुई थी वहां किनारे पर अपने अपने घर बना डाले। अब जब सभी बुआओं ने मायके जाने के लिए बड्डी वाली बरसतिया 🌧 🌦 बुआ के साथ मायके जाने का रस्ता पकड़ा तो उन्हें रस्ता न मिल के दिया जब घणी परेशान हो गई तो अपने बादल ☁️ 😶‍🌫️ मित्र को बुलावा भेज दिया कि तनिक ऊपर से देखकर बताओ हमारा मायका कहां है। 

         अब बादल मित्र भी क्या करते बिन पानी उड़ान भरते भरते उन्होंने HD फ़ोटो  खींची और सारी नदियों को व्हाट्सअप कर दिया। फ़ोटो देखते देखते वॉयरल भी हो गई। अब तो फ़ोटो देखते ही सारी बुआओं को घणा गुस्सा आ गया अबे ये हमारा मायका था इसे क्या तुम सबने सरकारी ज़मीन समझकर ग़ैर क़ानूनी कब्ज़ा कर लिया बे, हमारी पूजा भी करोगे और हमीं पे कब्ज़ा। सजा मिलेगी बरोबर मिलेगी और उन्होंने सावन के पावन महीने में भोले नाथ को फुनवा लगा दिया उधर भोले नाथ भी तनिक गुस्से में बैठे थे वो इसलिए कि धरती पे जितने भी सो कॉल्ड भक्त हैं सब ससुरे सुबह देखें न शाम दिन देखें न रात उनकी पिंडी पे लोटा से ड्रम से (नीला 🛢️ नी महाराज) भर भर के दे जल दे जल। अरे भैय्या माना वो भोले नाथ हैं पर नेचर कॉल तो उन्हें भी निपटानी पड़ती है न। बस फिर क्या था नदी बुआ ने जैसे ही अपना दुखड़ा सुनाया भोले नाथ ने नन्नक सी अपनी तीसरी आँख खोलकर बादलों ☁️ को इशारा कर दिया। अब बादल तो बादल ठहरे नदियों के दोस्त और भोले का इशारा बस भक्तों ने जितना जल पिंडी पे उड़ेला था उसका लाख गुना पानी छलनी की जगह अपनी पेंदी में छेद करके बरसा दिया अब आप उसे बादल फटना कहो या चखना बादल नू कि फ़र्क पैंदा है जी। अब आप खुदई देख लो शेर सिंह के ढाबे का अगड़ा हिस्सा चमक रिया है पिछले का तो हैप्पी बड्डे हो भी गया। जिधर देखो त्राहिमाम त्राहिमाम। कहां तो पाकिस्तान एक एक बूंद पानी के लिए तरस रिया था और धमकी अलग से दे रिया था पानी 💧 नी मिला ते अपन भारत की सांसे बंद कर दांगे, खून बहा दांगे। एक तो मुझे समझ नी आंदा ऐ पाकिस्तान उर्दू विच क्यूँ नी बोलदा खैर मैनू की लोड़। अब पानी चड्ड दीत्ता ती कै रिया है इत्ता पानी काय नू चड्ड दित्ता । ओ लो जी मैंनु भी पंजाबी बोलन दी आदत पड़ गी सी। मैनू ऐसा लग रिया है कि नदियों ने कब्ज़ा करने वालों पर ट्रंप डैडी की तरह 5000 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है। जय भोले नाथ की।

         हां तो हम कहां थे जी ओह याद आया नदियों की लीला से त्रसित मानव त्राहिमाम त्राहिमाम कर ही रहा था तभी हमें हैदराबाद से एक ठो सूचना मिली काव्य धारा प्रकाशन इन्दौर में एक दिनी कार्यक्रम आयोजित कर रहा है उसमें हमें भी आमंत्रण दिया गया। भाई इन्दौर को मिनी मुम्बई😎 भी कहा जाता है सो सबसे पहले मित्र दिनेश दवे जी को सूचित किया कि हम 23 अगस्त को इन्दौर पधार रहे हैं सो स्वच्छ  इन्दौर को हमारे स्वागत के लिए और स्वच्छ करवा दिया जाए। दवे जी भी उस्ताद निकले तुरन्त बोले तथास्तु🥳 साथ ही सूचना दी कि इन्दौर से इंद्र देवता रूठे हुए हैं उतनी नहीं हुई जितनी होनी चाहिए। हमने ठहाका मारते हुए पूछा अभी तक उतनी क्या नहीं हुई माहराज इससे पहले वो बोलते हम खुदई बोल पड़े आमदनी क्या अब ठहाका उधर से आया फिर बोले गुरु तबियत से बारिश 🌧 🌦 न हुई अब तक। हमने अपने बनियान के कॉलर ऊंचे करते हुए कहा इन्द्र देव से बात हो गई है दवे जी हम 23 अगस्त को प्रातः 6.05 पर ट्रेन से उतरेंगे और उतरते ही स्वच्छ इन्दौर को पानी पानी कर देंगे। 

         अब कह दी तो कह दी। खैर 22 अगस्त को 11.40 पर हल्की बूंदा बांदी के बीच हमने जैसे ही ऋषिकेश इन्दौर एक्सप्रेस के B1 के कंपार्टमेंट में एंट्री मारी तो घुसते ही 12 नम्बर सीट पर आराम फरमाते हुए एक ठो लड़की 👦 मिली, सामान रक्खा और सामने वाले से बोले दो मिनिट में फ्रेश होकर आते हैं, रेस्ट रुम गए,जुल्फें करीने से सेट की और वापिस सीट पर लैदर बैग को सीट के नीचे सरकाया खाने का झोला सामने टांगा तो सामने से आवाज़ आई कहां तक जाएंगे हमने अपनी जुल्फें पीछे की तरफ़ धकेली और बोले बस थोड़ी दूर तक हुज़ूर। उन सज्जन ने एक गहरी सांस ली और हमारी सीट पर भगवान विष्णु की तरह शेष शैय्या की मुद्रा में लेटी हुई लड़की 👧 को रिलेक्स का इशारा किया। हम भी थोड़ा रिलेक्स हुए फिर उन साहब से पूछा आप कहां तक तो बोले आखिरी स्टेशन तक यानि इन्दौर ये कल सुबह पहुंचेगी। हमने हां में मुंडी हिलाई तो फिर पूछ बैठे वैसे आप क्या दिल्ली तक या मथुरा, हमने फिर जुल्फों को झटका देते हुए कहा बस इन्दौर तक। एक बारगी तो वहां बैठे सब गड़बड़ा गए जब हमने दोबारा दोहराया तो बोले मान गए पक्के ह्यूमरिस्ट हो हमने उनकी आंखों में झांकते हुए पूछा शक्ल से या... उन्होंने दोनों हाथ पकड़ते हुए बोला मजा आ गया इन्दौर तक अच्छा रास्ता कटेगा तब तक वो लड़की उठ कर बैठने की चेष्टा कर रही थी। हमने सर पे हाथ रखते हुए कहा तत्काल प्रभाव से ये सीट आपकी हुई बच्चा वैसे एक बात बताओ एक्सीडेंट में चोट ही खानी थी तो लेफ्ट में खाते राइट में क्यूँ प्लास्टर चढ़ा रखा है उसने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा अंकल स्कूटी स्किड हो गई सड़क पर और.... हमने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा क्या सड़क को भी प्लास्टर चढ़ा है। अब ये सुनते ही उस बच्चे के चेहरे पर जो हंसी आई है बस पूछो मति मज़ा आ गया। दिन 🌞 कैसे निकला पता ही नही चला रात 🌙 आई और बीच वाली सीट में किसी तरह खुद को फंसा कर सो गए। सुबह 🌄 चार बजे उज्जैन आँख खुली तो हमने सीट से बाहर निकलकर ट्रेन से महाकाल को प्रणाम किया लेकिन ये क्या बूंदा बांदी शुरु हम कुछ समझ पाते तभी कानों में सुरसुराहट हुई बेटा प्रदीप भट्ट तू भी तो घर में रखी पिंडी पर मुझे तीन बूंद जल रोज़ाना उड़ेलता है तो ले बेटे थोड़ी मौज तू भी ले ले।

         म्हारी क़िस्मत भी न गज़ब की है जी ठीक ठाक बारिश में 🚂 ने भी हमें 6.05 की जगह 5.35 पर इन्दौर स्टेशन का पटका। सह यात्रियों से राम राम की और एक छज्जे के नीचे दुड़की लगा दी बस सर ही गिला हुआ तभी मुबलिया🤗 घनघना उठा उधर डॉक्टर खामोश भागिया जी अजीब इत्तेफ़ाक है जनाब उनकी ट्रेन 🚆 भी आधे घंटे पहले ही अहमदाबाद से इंदौर जंक्शन पर आ धमकी खैर तय हुआ 🏨 में मिलते हैं और लीजिए हुज़ूर बारिश में ही पंद्रह मिनिट में वो उधर से हम इधर से सीधे 🏨 और बरखा रुक गई। गले मिले फिर रिसेप्शन वाले ने बताया गया कि रुम जल्दी से जल्दी भी करेंगे तो रूम दस बजे मिलेगा फ़िलहाल आपको फ्रेश होने के लिए दूसरा रुम दिए देते हैं। Thx बोलकर हम दोनों बाहर आए और बूंदा बांदी शुरू ख़ैर स्वच्छ इन्दौर में सुबह सुबह कूड़ा करकट देखा फिर दोनों ने चाय 🍵 भी और भागिया जी ने एक सिगरेट सुलगा ली फिर गम को हंसी में उड़ाते हुए दो दीवाने शहर में कूड़ा करकट देखते हुए वापिस 🏨। 9.00 रुम लिया फ्रेश हुए फिर पूरी, करेला, आंवला और हां कृष्णाष्टमी की बची हुई पंजीरी से नाश्ता किया फिर अन्य आए हुए अन्य मित्रों से मुलाक़ात की। शाम को मित्र दिनेश दवे आ पहुंचे हमने भी जी भर कर उनका आथित्य स्वीकारा, यकीं नहीं तो कटोरियां 🥣 गिन लो जी। अगले दिन नाश्ता किया और साढ़े दस बजे सबों के साथ हम भी श्री मध्य भारत हिन्दी सेवा समिति के प्रांगण में जो 🏨 से बा मुश्किल पांच मिनिट की दूरी पर था में प्रवेश कर गए। खूबसूरत हॉल जहां चारों ओर एक से बढ़कर दिवंगत साहित्यकारों के चित्र। सबसे अच्छी बात सब A 4 साइज़ के फ्रेम में जड़े हुए। मतलब समझ गए न आप जिंदा रहते सब के सब अपनी मैं में तने हुए मैं ये मैं वो करने वाले यहाँ सब एक साइज़ में चलो यहाँ आकर तो इंसाफ़ हुआ।

         11.30 पर दीप प्रज्ज्वलन से कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत हुई राजस्थान से आईं पायल शर्मा और रश्मि शर्मा ने सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम का शुभारंभ किया। मंच पर प्रोफ़ेसर राजीव शर्मा जिन्होंने दुष्यन्त पर पी एच डी की है, हरे राम बाजपेई, सत्य प्रसन्न जी, डॉक्टर ख़ामोश भागिया, काव्य धारा प्रकाशन की सुनीता लुल्ला, ब्रजेश शर्मा, बागड़ी जी और नोएडा से पधारे बढ़िया वाले विज्ञान व्रत जी उपस्थित रहे। समारोह में कुल दस पुस्तकों 📖 📕 📘 का लोकार्पण हुआ जिसमें 8 एकल व 2 साझा संकलन  किसलय और मनीषा। पहले सत्र में यही सब कुछ होता है पुस्तक लोकार्पण, सम्मान समारोह यहां भी यही हुआ फिर लंच और भैय्या फिर दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन जिसमें कोई पांच मिनिट पढ़ेगा फिर भी टोका टाकी होगी और किसी को जब तक वो चाहे। हर कार्यक्रम का यही ढर्रा है इसलिए किसी एक को दोष देना ठीक नहीं। मंच पर पहले और दूसरे सत्र में लगभग एक जैसी मूर्तियां जे बात ठीक न है जी 2021 में इससे बेहतर व्यवस्था थी।दूसरी बात आधे पौने घण्टे में 10 पुस्तकों 📖 📕 📘 का लोकार्पण, किसी एक पुस्तक पर भी चर्चा न होना दिखाता है कि सब के सब भेड़ चाल में व्यस्त हैं। बस पुस्तक छपवा लो फिर पुस्तक का फ़ोटो सेशन करवा लो फिर जय हिंद जय भारत। ये सोचने का विषय है कि क्वांटिटी नहीं क्वालिटी की बात तो सब करते हैं लेकिन मानता कोई नहीं। और भी बहुत कुछ लेकिन छड़ो भी। बुरा मान जाएंगे मैं तो कहता हूं बुरा मान के भी देख ले शायद साहित्य का कुछ भला हो जाए। अब हमें भी पढ़ना था सो पढ़ दिया आप भी पढ़कर धन्य हो जाओ जी।

“दरगाहों पर जाना क्यूँ है”

दरगाहों पर जाना क्यूँ है,  मन अपना बहलाना क्यूँ है
धर्म सनातन सर्वश्रेष्ठ फिर, दर दूजा खटकाना क्यूँ है

जो भी जीव धरा पर आये,ब्रह्मा जी ने उन्हें बनाया   
बच्चे की फिर चाह में मत्था, हर दर पर टिकवाना क्यूँ है

चींटी को कण हाथी को मन,तोल सभी को विष्णु देते
आँखे नीची करके अपनी, हाथ सदा फैलाना क्यूँ है

बिन इच्छा के महादेव की, बाल भी बाँका हो न पाए 
झाड फूँक करने वालों को, डर अपना दिखलाना क्यूँ है

धन की देवी मात वैष्णवी, हर इच्छा पूरण करती हैं
साँझ सवेरे करो अर्चना,पीरों के दर जाना क्यूँ है

संकट हरणी मात शांभवी, दुर्जन निकट नहीं आ पाता 
दुर्गा काली अरि अवरोधी, कृष्ण तिलक लगवाना क्यूँ है

नाम से जिनके भूत भी काँपे, वो बजरंग बली हैं भैय्या
खली फली के डर से बोलो, फिर तुमको घबराना क्यूँ है

राम नाम में इतनी ताकत, पत्थर भी तैरे जाते हैं
क्रोध दिला श्रीराम से तुमको, सागर को सूखवाना क्युँ है

कृष्ण की लीला कृष्ण ही जाने, और दूजा न जाने कोई 
बार बार कनकी उँगली फिर, गोवर्धन उठवाना क्यूँ है
   
                                                                                                                                                                                                                                                दिया ईश ने जन्म जहाँ तुम, बस उसका सम्मान करो जी 
धर्म बदल कर कोख को अपनी, नालायक कहलाना क्यूँ है

जाने कितने धर्म हैं उपजे, इसी सनातन पारावर से
बार बार चमडे का सिक्का, फिर तुमको चलवाना क्यूँ है

रहो चैन से खुद भी और तुम, दूजे को भी रहने दो न
बात बात पे रार बढाकर, आपस में टकराना क्यूँ है

छोडो भी जाने दो बातें , कहाँ कोई है सुनने वाला
वक्त से पहले चित्र पे अपनी, माला को चढ़वाना क्यूँ है

समय शेष है 'दीप' चेताओ, अब सब अपने मुख को खोलें 
मौन की अग्नि से फिर वर्ना, देश  नया जन्मवाना क्यूँ है 

© प्रदीप देवीशरण भट्ट -24:02:2021

         दवे जी से फिर से बात हुई और तय हुआ वो शाम चार बजे 🏨 आएंगे, अपुन सामान सहित उनकी गाड़ी में जा ठूंसेगे घूमेंगे और बाद में नौ साढ़े नौ बजे वे हमें टेशन छोड़ देंगे। हमने सोची जे भी ठीक है, बस गणेश भगवान का छजराना मंदिर 🛕 🕍 🛕 🕍 🛕 देख लें तो काफी है सो जैसे ही जाम से जूझते हुए दवे जी छः बजे पहुंचे हम उनकी गड्डी में सामान सहित जा गिरे एक बात जो मैने नोट की वह ये कि मैं और भागिया जी जितनी बार होटल 🏨 से निकले इंद्र देवता कुनन मिनन करते मिले भाई साहब इस चक्कर में इन्दौर घूमने का प्रोग्राम चौपट अब 25 की रात्रि ट्रेन 🚆 🚉 🚄 और इंद्र महाराज हैं कि ऐंठे हुए हैं हमने पूछा काहे दुर्वासा हुए जा रहे हो तो बोले बेटे भोले नाथ से पंगे लोगे तो तुमही तो भुगतोगे। भोले बाबा 22 को ही बोल दिए थे ई ससुरा प्रदीपवा बहुत बड़ा फेंकोलिजवा है जहां तहां फेंक देता है, ट्रेन में फेंक दिया कि इन्दौर पहुंचते ही बादल बरसेंगे और इसका फेंका हुआ लपेटना हमें पड़ता है। क्या करें सच्चे वाला भगत है इसकी बात तो माननी ही पड़ेगी।तो बस भैय्या हम तो उनका आदेश मान रिए हैं जब तक तुम इन्दौर की स्वच्छ धरती पर हो हम तुम्हें कतई सूखने न देंगे ज़ालिमलोशन। बारिश और जाम को देखते हुए दवे जी सीधे अपने घर ले गए रास्ते में भगवान गणेश जी का छजाराना मन्दिर की चोटी के दर्शन किए, गाड़ी में बैठे बैठे ही गणेश जी को नमस्ते की तभी फिर कान में सुरसुराहट हुई गणेश जी कह रहे थे क्यूँ बेटा बाप को नाराज़ करके बेटे के दर्शन करेगा फिर हँसते हुए बोले चल कोई गल्ल नी नेक्स्ट टाइम श्योर। दवे जी के यहाँ उपमा खाया, चाय पी फिर सीधे इन्दौर जंक्शन, प्लेटफॉर्म नंबर 2 से भागिया जी शान्ति एक्सप्रेस पकड़ी और आधे घंटे बाद प्लेटफॉर्म नम्बर 4 से हमने फिर अगले दिन वाया दिल्ली होते हुए सीधे मेरठ लेकिन लेकिन लेकिन बारिश अभी भी चालू आहे, अब बस भी करो भोले नाथ। 🙏 रिपोर्ताज लिखने दोगे की नाही, हां नई तो।

प्रदीप डीएस भट्ट -01092025