Tuesday, 9 September 2025

"बेचारा गांधी "

        "बेचारा गांधी"
 
          अँधेरी रेलवे स्टेशन से निकलकर बाहर आया तो देखा दूर-दूर तक न कोई ऑटो न टैक्सी अलबत्ता पानी ज़रूर भरा हुआ मिला जिसमें छप छपाक की इक्का दुक्का आवाज़ें गूंजती मिली। नीचे भी तीन फुट पानी और ऊपर से राम जी का पानी और वो भी रात के सवा दो  बजे। थोड़ी देर संशय के सागर में गोते लगाते हुए  तय किया कि पैदल ही चले चलते हैं। पिट्ठू को पीठ पर लादा और सीधे एस वी रोड़ क्रॉस करके जुहू गली की तरफ़ मुड़ गया। पानी में छप छपाक की आवाज़ लगातर हुए जा रही थी तभी लाठी की ठक् ठक सुनाई पड़ी। पीछे मुड़कर देखा तो बिलकुल गांधी जी वाले गैटअप में लम्बी लम्बी डग भरते हुए एक कृष काय काया फासला कम करती हुई मुझसे आ लगी। मैंने ने यूं ही पूछ लिया चच्चा इत्ती रात में किधर टहल रिए हो, एक क्षण के पॉज के बाद आवाज़ आई चच्चा नही बप्पा मैंने हँसते हुए कहा उन्हें तो 6 सितम्बर को विसर्जित कर दिया।चश्मे पे पानी की बूँदों को झटकटते हुए वो कृष काया में फिर कंपन हुई और इस ज़रा सख्त आवाज़ आई तो फिर बापू कहो मैं मोहन दास करम चन्द गांधी उर्फ़ महात्मा गाँधी उर्फ़ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी। मैंने फिर मज़ाक किया ये क्या चचा भारत वर्ष, हिंदुस्तान और इंडिया की तर्ज़ पर अपना गुणगान कर रिये हो। इस बार कोई प्रतिक्रिया न आई तो मुझे लगा इस बहरूपिये ने गांधी जी की किताब "मौन सर्वार्थ साधकम" का पालन किया है।थोड़ी देर बस छप छाप की आवाज़ ही गूंजती रही।

          जुहू सर्कल से मुड़ते हुए मैंने उस कृष काय काया को फिर से देखा और उल्टा सवाल दाग दिया लगता है चच्चा लगे रहो मुन्ना भाई के किरदार में अभी तक धंसे हुए हो मैं संजय दत्त नहीं प्रखर दत्त हूं और हां ये तीन फुट भरे पानी में तुम्हारी लाठी की आवाज़ कैसे क़ायम है। वो कृष काया बोली देख भाई प्रखर दत्त पहले मेरी बात ध्यान से सुन मुझमें पहले दम था पर अब न है। अगर ये लाठी न हो तो तो मुझे कोई पहचाने भी न।  पता नहीं मेरे कैसे कैसे और किस किस रंग रूप के स्क्रपचलर बना दिए जा रहे हैं जिसमें मैं न मोहन दास लगता हूं, न करम चन्द और महात्मा तो बिल्कुल नहीं लेकिन लोग उस स्क्रपचलर के हाथ में लाठी देखकर समझ लेते हैं कि यही होगा वो जिसने सो कॉल्ड चरखे से आज़ादी दिलाई पर सच्ची बात तो ये है उस चरखे से इत्ता सुत भी न कता जिससे मैं अपनी दो चार धोती बना लेता। खैर देख भाई तू मेरा एक काम कर मुझे परसों सुबह तक अपने घर में छिपा के रख ले। तेरा घर तो यहीं जुहू में ही है न और हां मेरी लाठी मेरी धोती में फंसी हुई है जिससे तीन फुट पानी में भी लाठी आवाज़ पैदा कर रही है। मैंने पहली बार महसूस किया कि ये कृष काया वास्तव में वास्तव वाले गांधी जी हैं बिलकुल 30 जनवरी 1948 वाले दिन की तरह बस फ़र्क इत्ता था कि उनके दोनों कंधे पकड़कर चलने वाली सहायिका गायब थीं। असलियत से सामना होते ही मेरी टांगे कांप गई लेकिन "सूं सां मानस गंध" हम दोनों के अलावा तीसरा कोई था भी नही इसलिए मुंह से इत्ता ही फूटा जैसी आपकी इच्छा बापू।

         बात करते करते हम दोनों मेरे फ्लैट तक आ पहुंचे थे। मैंने बापू को अन्दर आने का इशारा किया और खादी का तौलिया उनकी ओर बढ़ा दिया । खादी का तौलिया देखते ही बापू बोले बस अब दो अक्टूबर को ही मेरी ज़रूरत रह गई है, वो भी पहले रिबेट के लिए और अब..... फिर कुछ सोचते हुए बोले नाथू राम गोड़से ने तो तीन गोली मारकर मुझे ठंडा कर दिया लेकिन यहाँ के नेताओं ने मुझे अभी भी गर्म रक्खा हुआ है, देखो न भगवान जी से सेटिंग कर रक्खी है। हर साल एक अक्तुबर को भगवान जी मुझे ऊपर से यहां टपका देते हैं कभी दिल्ली कभी वर्धा कभी बिहार कभी झारखण्ड। इस साल मुम्बई टपका दिया है। मैं तो उकता गया हूं इस ढोंग से। इसलिए 1.40 की लास्ट लोकल से अंधेरी उतरा था कि चलो विरार जाकर कहीं लेट जाऊंगा लेकिन इस राम जी की बरसात ने उधम उतार रक्खा है ऐसा लगता है बादलों में छेद हो गया है। मैंने पहली बार बापू की दयनीय स्थिति को देखते हुए पूछा बापू सच्ची सच्ची बताओ तुम वास्तव में भारत की आज़ादी के लिए लड़ रहे थे या । मेरे इस प्रश्न से बापू कुछ अचकचाए फिर बोले "सत्य के प्रयोग" पर किताब लिखना अलग बात है स्वीकारना अलग। फिर बुदबुदाए ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गए और कैसे कैसे ऐसे वैसे हो गए। बापू को गर्म चाय पिलाई फिर थपकी देकर बापू को सुला दिया। मुझे अब समझ आया बापू 2 अक्तूबर के पाखण्ड से बस ख़ुद को बचाने की चेष्टा क्यूँ कर रहे थे। सच बोल रिया हूँ गांधी जी को मैं कुछ ख़ास पसन्द नहीं करता लेकिन पहली बार लगा मोहन दास करम चंद गांधी उर्फ़ महात्मा गांधी उर्फ़ सो कॉल्ड राष्ट्रपिता बेचारा गांधी भी हो सकता है।

प्रदीप डीएस भट्ट 
मेरठ 
तीन काव्य संग्रह व एक कहानी संग्रह प्रकाशित 
उत्तरांचल दीप पत्रिका में नियमित आलेख 

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