Tuesday, 14 May 2024

"तौबा तौबा ऐसे वैन्यू से"

रिपोतार्ज 

     "तौबा तौबा ऐसे वैन्यू से"

         शनिवार 11 मई को अंतर्राष्ट्रीय काव्य मंच का आमंत्रण मिला जो कि नई दिल्ली म्यूनिस्पिल कॉर्पोरेशन के कन्वेंशन हॉल में वो भी सुबह 10 बजे से 5 या 6 सायं तक और फिर शाम 4 बजे से गालिब अकादमी के कार्यक्रम में उपस्थिति भी दर्ज़ करनी थीं। सो भैय्या दिल्ली लोकल में कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने में ही पसीने छूट जाते हैं फिर भैय्या मेरठ से और वो भी मेरठ के दूसरे छोर से🥹 लेकिन लेकिन लेकिन कमिटमेंट है तो है कह दिया हाज़िर होंगे तो फिर होना ही है।टाइम मैनेजमेंट में हो हम "सुनील बाबू की तरह ही बढ़िया है" 🤝तो भईया लगा दिया 5:04 का ⏰ अलार्म। उठे, तैय्यार हुए स्कूटी उठाई और 06:55 बस स्टैंड पर स्कूटी जमा की, हाइवे वाली बस पकड़ी और 08:40 आनंद विहार 🚇 मेट्रो पकड़ी और ठीक 09:10 कनॉट प्लेस ( आज भी राजीव चौक मुंह से निकलता ही नहीं, वैसे भी कनॉट प्लेस के लिए राजीव गांधी या इंदिरा गांधी का क्या योगदान है, कुछ भी तो नहीं फिर तख्ती बदलने से ही क्या होगा) दिल्ली में रहते हुए कभी एनडीएमसी बिल्डिंग नहीं गया (काम ही नहीं पड़ा) 🙃 रिवोली सिनेमा के पीछे से होते हुए होटल पार्क को हाय हेलो कहते हुए ठीक 09:20 पर गेट नंबर 3 स्थित कन्वेंशन हॉल जा पहुंचे। इसी बीच मित्र संतोष संप्रिति से मुबलिया से भी टच में रहे।

         हॉल में प्रवेश करते ही कुछ जाने पहचाने कुछ अंजाने चेहरों ने स्वागत किया। 😊डॉक्टर ममता सैनी डॉक्टर रमा सिंह दीदी से राम राम हुई फिर कुछ अन्य मित्रों ने जो फेसबुक पर मुझसे जुड़े हुए हैं ने बड़ी आत्मियता से हाय हेलो की सच कहूं एक मोहतरमा के अतिरिक्त मैं किसी को पहचान नहीं पाया। 👏मैंने ईमानदारी से उन सभी से ये बात साझा करने में कोई कोताही नहीं बरती। अच्छा ये लगा जब सभी ने इसे अन्यथा में नहीं लिया वरन हाथ जोड़ते हुए कहा सर फ़ेसबुक पर इतने सारे मित्र गण हैं सभी को पहचानने में तकलीफ़ तो होगी ही। अभी बात चल ही रही थी तभी एक और सज्जन ने प्यार से गले लगा लिया बोले भट्ट साहब कितने दिनों बाद मुलाकात हुईं है। शक्ल पहचान गया किन्तु नाम.... जय श्रीराम तभी बोले अरे भट्ट साहब भोपाल में मिले थे और लीजिए एक दम मुंह से निकला विजय बागड़ी जी। बस यूं ही मिलते मिलाते ब्रेकफस्ट 🥞 किया और साढ़े दस बजे अपनी सीट पकड़ ली। मुख्य अतिथि आर एस एस के इंद्रेश जी, अपनी चार लाइनों से प्रसिद्धि पा चुके सुरेंद शर्मा जी मंच की शोभा बढ़ा रहे थे। विश्व कीर्तिमान से अलंकृत "भारत को जाने" ग्रंथ का भव्य लोकार्पण इस कार्यक्रम की विशिष्टता रही। सोने पे सुहागा था आदरणीय इंद्रेश जी का संबोधन। सपना सक्सेना द्वारा प्रस्तुत स्वरचित सरस्वती वंदना बेहद उम्दा रही। राँची से रजनी शर्मा को देखकर लगा कहीं देखा है बाद में पता चला हम दोनों ही साहित्योदय मंच से जुड़े हुए हैं।🤝 चूंकि शाम को गालिब अकादमी के कार्यक्रम में पहुंचना था सो डॉक्टर ममता सैनी जी से इजाज़त ली और चल पड़े निजामुद्दीन स्थित गालिब एकेडमी।

         मैं संतोष संप्रिती, रजनी शर्मा और एक स्टूडेंट नाम शायद नीटू किसी एक ऑटो में किसी तरह ठुसकर बैठ गए। संतोष जी ने चालक के बाजू में सीट पर कब्ज़ा करते हुए ऑटो चालक को आश्वत किया कि पुलिस रोकेगी तो साहब भुगत लेंगे। 😹मरता क्या न करता कि तर्ज़ पर ऑटो वाले ने निजामुद्दीन छोड़ा। निजामुद्दीन की तंग गलियों से गुजरते हुए बेसाख्ता पुरानी दिल्ली लखनऊ हैदराबाद और साउथ मुंबई की याद ताज़ा हो गई। गली में प्रवेश से गालिब एकेडमी तक लगभग हर दुकान पर चिकन मटन की जबरदस्त दुर्गन्ध नथुने फाड़ देते को तैय्यार थी। दिल्ली में दो दशक से ज्यादा रहा लेकिन कभी इस ओर आना नहीं हुआ। आज मजबूरी थी जो शायद आखरी भी होगी। चार की जगह साढ़े कार्यक्रम शुरू हुआ। पता नहीं क्यूं हर शायर/शायरा तरन्नुम में ग़ज़ल पढ़ने के पीछे क्यूं पड़ा है। भई तहत में ग़ज़ल पढ़िए अलग आनंद प्राप्त होगा। कुछ ने तो हदें ही लांघ दी तरन्नुम में ग़ज़ल पढ़ते हुए कव्वाली का अहसास करा गए। चाय नाश्ता ऑफर किया गया किंतु हमने विनम्रता से मना कर दिया। सायं 7 बजे फारिग हुए। फिर वही दुहराव यानि अनचाही दुर्गन्ध भीड़ का बेतरतीब जमावड़ा। मुझे लगा भारतीय फिल्मों में पाकिस्तानी इलाका दिखाने के लिए निजामुद्दीन सही लोकेशन है। तीन चार माध्यम चेंज करते हुए रात्रि 11.30 बजे मेरठ वापिसी। सोते समय एक खुशी थी कि कल गाजियाबाद में कथा रंग की मीटिंग हैं जहां वैन्यू,मैन्यू एण्ड जेंट्री तीनों ही बढ़िया मिलेंगी।

         तो भैय्या सुबह आराम से उठे 11 बजे घर से सीधे AC वाले को खड़खड़ाते हुए कि हुज़ूर सोमवार को इंस्टालेशन वाला भिजवा दें ताकि गर्मी में हम भी कुछ सर्दी का अहसास कर सकें। बस स्टैंड पर स्कूटी जमा की और मोहन नगर की बस पकड़ी लेकिन ये क्या मोदी नगर में जाम ? मालूम पड़ा परशुराम जयंती का जुलूस हैं हमने सोचा ऐं जे क्या माजरा है भाया परशुराम जयंती तो परसों हो चुकी फिर ये क्यूं तभी बाजू में बैठा कंडक्टर बोला बेरोजगार हैं ससुरे सब। हमने सोचा ई ससुर को कईसन पता फिर कुछ सोचकर "मौन सर्वार्थ साधकम" का फार्मूला अपना लिया। ढाई बजे मोहन नगर उतरे फिर ऑटो लिया और ढूंढते ढांढते आज के कथा संवाद के मेज़बान बत्रा जी के निवास स्थान D 83,,"अमित्र थियेटर", न्यू पटेल नगर पहुंच ही गए। अच्छा वैन्यू, 🛗 लिफ्ट से द्वितीय तल पहुंचे, यात्री जी, अल्का सिन्हा जी सुभाष चंद्र जी टेक सिंह और स्नेही रिंकल शर्मा ने स्वागत किया। रिंकल को विवाह के अट्ठारह वर्ष पूर्ण करने पर बधाई प्रेषित की साथ ही वायदे के मुताबिक़ कहानी संग्रह "काला हंस" की एक प्रति एवम केरल से लाए गए शंख को भेंट स्वरूप प्रदान किया। धीरे धीरे लोग आते गए और कारवां बन ही गया। आज़ के कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉक्टर अल्का सिन्हा जी ने कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हिन्दी अकादमी के उप सचिव श्री ऋषि कुमार शर्मा रहे।

         'अमित्र थियेटर' में आयोजित कथा संवाद में डॉ. बीना शर्मा की कहानी 'सवाल', मीना पांडेय की 'जालीदार दरवाज़ों के फ्रेम',  पूनम मटिया की "विज्ञापन : नन्हे नन्हे चमकीले तारे", शिवराज सिंह की "इकलौती'', मनु लक्ष्मी मिश्र  की ''ट्रांसफर'', सुधा गोयल की ''मां'', रश्मि वर्मा की कहानी ''ढ़ोलकी'' और टेकचंद ने संभावित कथानक पर अपना ब्रीफ प्रस्तुत किया। दर्शकों की ओर से हुए विमर्श में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार व आलोचक सुभाष चंदर, डॉक्टर अशोक मैत्रेय,आलोक यात्री, सुभाष अखिल, अवधेश श्रीवास्तव, डॉ. रक्षंदा रूही मेहदी, सुरेन्द्र सिंघल, अनिमेष शर्मा, डॉ. वंदना कुंअर रायजादा, डॉ. कुलदीप कुमार पुष्पाकर, विनय विक्रम सिंह व सुनित अग्निहोत्री ने अपने विचार व्यक्त किए। मैंने पूर्व मीटिंग की भांति आज़ भी मौन रहना ही श्रेयस्कर समझा। बस टेकचंद की प्रस्तुति पश्चात एक शेर जरूर पढ़ दिया!
"कहना पड़े जो दोस्त से फिर दोस्ती कैसी 
बरबाद न हों इश्क में फिर आशिक़ी कैसी "

अगली मीटिंग में शायद हम कुछ बोलने लायक हो जाएं। 👂🏻

         कार्यक्रम में कहानी वाचन के अतिरिक्त सुधी पाठक गण भी जिनमें" झा, डॉ. अजय गोयल, मनोज कुमार सिन्हा, डॉ. वीना मित्तल, नूतन यादव, डॉ. राजीव पांडेय, प्रेम किशोर शर्मा, सुमित्रा शर्मा, प्रताप सिंह, ओंकार सिंह, सुखबीर जैन,राधारमण, शकील अहमद सैफ, सुषमा गोयल, तिलकराज अरोड़ा, अरुण कुमार यादव, अरुण अग्रवाल, विजयलक्ष्मी, डॉ. प्रीति कौशिक, संजीव शर्मा, प्रभात चौधरी, देवव्रत चौधरी, अजय मित्तल, उत्कर्ष गर्ग, हेमलता गुप्ता, अनिल शर्मा, अभिषेक कौशिक, सिमरन व कविता" उपस्थित रहे।

विषेष: 
        बीना शर्मा जी ने बिना पढ़े कहानी वाचन किया जिसकी सभी ने भूरी भूरी प्रशंसा की। ऋषि जी ने कहा कि लेखक को ऐसा ही होना चाहिए। कैसे संभव है ऋषि जी। कवि हो शायर हो लेखक हो वो अपनी सभी रचनाएं कैसे याद रख सकता है। हां प्रतिनिधि रचनाएं याद रखना संभव है जिसको हमने 25,30 प्रोग्रमों में बार बार पढ़ा हो।  ख़ैर अपना अपना दृष्टिकोण है हुज़ूर।😊

एक बेहतरीन कार्यक्रम बेहतरीन मेज़बानी और आशानुरूप खूबसूरत संचालन जो कि निश्चित कथा रंग की यू एस पी है । पुन: टीम कथा रंग को खूबसूरत आयोजन के लिए बधाई।🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

प्रदीप डी एस भट्ट 14524

Wednesday, 8 May 2024

बुरे नहीं अच्छे फंसे

पुस्तक समीक्षा 

"बुरे नहीं अच्छे फंसे"

"कथा रंग" नाम पढ़ते ही तिरोहित होने का अहसास हुआ। आमंत्रण मिला तो जा पहुंचे शंभू दयाल कॉलिज गाजियाबाद वो भी "गर्मी में गर्मी का अहसास लिए"😆।  बेहतरीन कार्यक्रम का साक्षी होना भी अपने आप में अलग बात है। किसी भी कार्यक्रम की सफ़लता का दारोमदार संचालन पर निर्भर करता है संचालन के साथ यदि अपनी पुस्तक का प्रमोशन भी किया जाए तो 😊 सुनील बाबू कुछ ज्यादा ही बढ़िया है।इस विषय में रिंकल शर्मा को 10/8.5 नंबर दिए ही जाने चाहिए। 8 नंबर संचालन के लिए और 0.5 बुरे फंसे का बढ़िया प्रमोशन के लिए।

         कार्यक्रम के समापन के पश्चात रिंकल जी ने अपनी पुस्तक "बुरे फंसे" जो की एक नाटक है मुझे सप्रेम भेंट की। अब पुस्तक लेकर उसे सिर्फ़ शेल्फ में नहीं सजा कर नहीं छोड़ा जाना चाहिए अपितु पहली फुर्सत में पढ़ने के पश्चात  अपना मंतव्य भी लेखक को प्रकट/अग्रसारित किए जाने की आवश्यकता होती है। मैं व्यक्तिगत रूप से इस धर्म का पालन करता हुं वो भी पूरी ईमानदारी के साथ।

"बुरे फंसे"
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         इससे पहले कि "बुरे फंसे" के विषय में कुछ लिखूं ये शेर आप सबकी सेवा में कारण "बुरे फंसे" नाटक जेठ की तपती जलती गर्मी से तन पर पड़ी हास्य की हल्की पुहार का अहसास कराता है। इसके लिए रिंकल शर्मा जी को हृदय तल से बधाई तो बनती है न जी।

"गम से आख़िर कब तलक यूं मुंह छुपाना चाहिए
 रोज़ थोड़ी देर ही पर मुस्कुराना चाहिए" 

बचपन से काका हाथरसी, शैल चतुर्वेदी,सुरेंद शर्मा, व्यंग्य गद्य लेखनी के सिरमौर भारतेंदु हरिश्चंद्र,हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और मेरे पसंदीदा के पी सक्सेना । एक लंबे अरसे से देख रहा हूं कि हास्य व्यंग्य के नाम पर दर्शकों को कुछ भी परोस दिया जा रहा है। मुंबई में रहते हुए फिल्म राइटर एसोसिएशन की मीटिंग अटेंड करते हुए और डिस्कशन के दौरान ये पाया कि उपस्थित लोग हास्य के नाम पर लोग दादा कोंडके की पुहड़ कॉमेडी को पसंद करते हैं या प्रभावित हैं। चूंकि इस विधा में मेरा हाथ जरूरत से ज्यादा तंग है अतएव मैं मौन रहना ही पसंद करता हुए।

         बुरे फंसे में रिंकल जी ने कुछ पात्रों का जमावड़ा किया  है फिर हर पात्र की विशेषता दर्शाते हुए उसे एक मुकाम तक पहुंचाने में मदद की है। फिर वह कल्लन हो या दादी, छज्जू हो या शबनम, रहमत हो या फिर दुबे जी या अन्य क़िरदार। पूरे नाटक में सिर्फ़ एक क़िरदार है जो अपने चुटीले संवादो से पूरे नाटक में छाया रहता है और वह है ब्रजभूमि की महारानी चम्पा। नाटक का 70 प्रतिशत हास्य वहीं से उपजता है जब दरवाज़े पर दस्तक होती है तो सामने वाला पूछता है रहमत शेख घर पर हैं तो चंपा उत्तर देती है ।
"हां हते"। अंदर आ जाओ। 

         ऐसा कई मर्तबा होता है किन्तु पृष्ठ संख्या 142 पर जब फोटोग्राफर आता है तो चम्पा "हां हते" न कहकर बोलती है 
"हां हैं"। अंदर आ जाओ

         पढ़ने में तल्लीन पाठक तुरंत पकड़ लेता है और ख़ुद से पूछता है 
"जे के भयो भैय्या"

"चम्पा का क़िरदार जिस तरह से बुना गया है मुझे बेसाख्ता संसार फिल्म में अरुणा ईरानी के क़िरदार की याद हो आईं "

         नेहरू जैकेट 1947 से पूर्व लोकप्रिय नहीं थी वरन 60 के दशक में 70 लोकप्रिय करवाई गई या हुई।

         मेरा मानना है कि जब लेखक के दिमाग़ में कोई विषय उपजता है तब वह कहानी हो या नाटक या फिर उपन्यास वह स्वेटर बुनने की प्रक्रिया से होकर गुजरता है। कभी दो फंदे सीधे कभी दो फंदे उल्टे। इसलिए मैं कहानी बुनने का पक्षघर रहा हूं। इतने सारे किरदारों को लेकर उसके हर क़िरदार के साथ न्याय करना लेखक के लिए चुनौती पूर्ण काम होता है। रिंकल शर्मा इसमें खरा उतरने का पूरा प्रयास करती नज़र आती हैं।

         रिंकल जी का नाटक "बुरे फंसे" पढ़कर एक बात तो निश्चित कह सकता हूं कि उन्होंने इसे तह दर तह बुना है और वे एक विशुद्ध हास्य नाटक लिखने में कामयाब हुई हैं। रिंकल जी अपना काम ईमानदारी से कर चुकी हैं। अब बारी इसके सटीक मंचन की है। 

         ढेरों शुभकामनाओं के साथ 

प्रदीप डी एस भट्ट.9524

Saturday, 20 April 2024

प्रोफेसर मां के लाल

सत्य कहने का नहीं, साहस अगर तुममें "प्रदीप"
यूं करो कि हाथ पकड़ी, कलम तत्क्षण तोड़ दो 

         गोरखपुर का कार्यक्रम अटेंड करके लखनऊ वो भी बस द्वारा बस पूछो मति। लखनऊ आएं और मित्रों से ना मिले तब तो ये अन्याय ही होगा न लेकिन 5 घण्टे में सबसे मिलना मुनासिब नहीं था सो अवध बस स्टेंड उतरकर ऑटो किया और सीधे आलमबाग स्थित प्रिय मनीष के निवास स्थान। लगभग एक घण्टे की मुलाकात में प्रथम स्वागत दो प्यारे श्वानों ने किया। इत्तेफ़ाक देखिए मेरे और डॉक्टर दोनों के कदम साथ साथ ही घर की दहलीज पर पड़े। डॉक्टर दोनों श्वान को इंजेक्शन देने जो आए थे। बेसाख्ता अप्रैल 2022 की नेपाल यात्रा की स्मृतियां उभर आईं। चूंकि मुझे 6 बजे हज़रत गंज स्थित केरल रेस्टोरेंट में मित्र दर्शन बेजार जी की पुस्तक लोकार्पण में सम्मिलित होना था सो मनीष से विदा ली तो मनीष ने अपनी पुस्तक "प्रोफेसर मां के लाल" सप्रेम भेंट की। मैने वायदा किया की पहली फुर्सत में इसकी समीक्षा कर अपने ब्लॉग और फेसबुक पर पोस्ट करूंगा। समीक्षा लिखूं उससे पहले यह स्पष्ट कर दूं कि हर लेखक का नज़रिया अलग अलग होता है। मेरे समीक्षा लिखने को लेकर भी इसी बात को दृष्टीगत रक्खा जाना चाहिए।

अनंत समीक्षा
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33 पृष्ठों में शब्दों के उठान गिरान, अनंत समीक्षा की कहानी एक बलखाती खाती नदी की तरह पहाड़ो से उतरकर जंगलों और मैदानों में अपना वजूद तलाशती अंतत: सागर से जा मिलती है एक वाक्य या संवाद असरदार है।"समीक्षा भले ही आत्मनिर्भर और आत्मविश्वास से भरी महिला हो लेकिन अनंत की मौजूदगी में समीक्षा को स्त्रीत्व का अहसास होता था"

रियूनियन 
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एक युनिवर्सिटी में साथ पढ़े फिर अपने अपने काम में मशगूल हो गए कुछ दोस्तों कहानी है जो एक लम्बे अंतराल के बाद मिलते हैं। युनिवर्सिटी में सिर्फ़ पढ़ाई नहीं होते वरन वहां रिश्ते पनपते भी हैं, हदें पार भी करते है। कुछ अटकाव कुछ भटकाव का बोध कराती अच्छी कहानी किन्तु अंत में सस्पेंस जैसा कुछ भी नहीं।

उत्तराधिकार
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एक ऐसे गांव की कल्पना जो हमें अधिकतर दक्षिण भारत की फिल्मों में ही देखने को मिलते हैं। कहानी कहीं कहीं विरासत फिल्म के सीन क्रिएट करने की भरकस कोशिश करती नजर आती है। 

प्रोफेसर मां के लाल
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पूरी कहानी lost & found पर आधारित है। कुछ नाटकीय घटनाक्रम है। कहानी पढ़ते हुए जैसे जैसे पृष्ठ बदलते हैं कहानी का अगला सीन स्वत: सामने आ खड़ा होता है।  अब इस तरह की कहानियों पर यदा कदा ही फिल्में बनती हैं। ममता दीक्षित अगर ममता दीक्षित ही हैं तो अनिल दीक्षित अनिल कैडी कैसे हो गए। समझ से परे की बात है।

मां की दिशा
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एक अच्छी कहानी अगर इसे थोड़ा और शिंक्र कर दिया जाए तो एक अच्छी लघु कथा हो सकती है।

उम्मीदों का चौका
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एक और उम्दा कहानी। जो लोग हर जगह जेंडर ढूंढते उनके लिए अच्छी नसीहत।

बदल दी तकदीर
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अंतिम कहानी में फिर वही जेंडर की असमानता का मुद्दा उठाया गया है। बेटे बेटी में भेद विभेद। अपनी ही लिखी पंक्तियां याद हो आईं।

"जन मानस का ये ही मत है
 औरत की दुश्मन औरत है "

प्रदीप डीएस भट्ट 25424







Thursday, 18 April 2024

"लोकतंत्र की अलख जगाती आंग सान सू "

      "लोकतंत्र की अलख जगाती आंग सान सू"

         दैनिक अख़बार के बारहवें प्रष्ठ के एक कोने में एक समाचार कि म्यांमार में प्रचंड लू के कारण आंग सान सू  को जेल से नज़रबंद करने का फ़ैसला लिया। आज जब ये ख़बर ट्रेंड कर रही है कि 15,16,17 अप्रैल को दुबई में हुईं लगभग 120 सेंटीमीटर बारिश ने पूरे दुबई की हालात ख़राब कर दी है। बाढ़ के हालात से निपटने के लिए वहाँ का प्रशासन जहाँ एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहा है वहीं म्यांमार में भयंकर लू का चलना एकदम विपरीत ख़बर है। आगे बढ़ने से पहले थोड़ा म्यांमार के इतिहास के विषय में कुछ जानकारी।

        9वीं शताब्दी में बामर लोगों द्वारा इरावदी घाटी में प्रवेश फ़िर1050 बुत परस्त समाज की स्थापना थेरवा बौद्ध धर्म फ़िर मंगोलों द्वारा बुतपरस्ती की खिलावत, 16वीं सदी में ताउन्ग राजवंश द्वारा बर्मा को पुनः एक छातरी के नीचे लाना।19वीं सदी में कोनबांग शासन का आना।19वीं सदी में ही एंग्लो बर्मी युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा म्यांमार पर कब्ज़ा किया गया। 1937 में अंग्रेजों द्वारा बर्मा को भारत से अलग कर दिया। दूसरे विश्वयुद्ध के मध्य जापानी कब्ज़े के बाद 4 जनवरी-1948 को म्यांमार ने आजा़दी -1947 अधिनिमय के तहत आजा़दी का ऐलान कर दिया।1962 में तख़्ता पलट के बाद सैन्य शासन फ़िर 1988 के सैन्य शासन के विद्रोह के दो वर्ष बाद सैन्य परिषद ने सत्ता छोड़ने से इंकार।2011 के आम चुनाव के बाद सैन्य जुंटा को भंग कर दिया गया। इसी दौरान आंग सान सू को भी अन्य राजनैतिक कैदियों के साथ रिहा कर दिया गया।2015 में आम चुनाव हुए।इस दौरान बौद्ध और रोहिंग्या संघर्ष हुआ।2020 में फ़िर आम चुनाव है जिसमें आंग सान सू की पार्टी ने दोनों सदनों में बहुमत प्राप्त किया किंतु बर्मी सेना (टाटमाडॉ) ने तख्ता पलट कर दिया। इस तख़्ता पलट की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख़ूब आलोचना हुईं। तख़्ता पलट से अब तलक लगभग 6 लाख लोग विस्थापित हुए हैं। आंग सान सू को फ़िर से जेल भेज दिया गया। वो तो भला हो म्यांमार में चलने वाली प्रचंड लू का जिसने अन्य कैदियों के अतिरिक्त राजनैतिक क़ैदी के तौर पर बंद आंग सान सू को जेल से नज़रबंदी में शिफ़्ट किया गया है।

आंग सान सू सिर्फ़ एक राजनेता ही नहीं हैं वरन बल्कि वे राजनयिक भी हैं और साथ ही लेखक भी हैं। 79 वर्षीय आंग सान सू को नॉर्वेजियननोबेल समिति द्वारा 1991 में लोकतंत्र एवम् मानवाधिकारों के लिए सततअहिंसक संघर्ष के लिए नोबेल पुरुस्कार प्रदान किया गया है।

         आंग सान सू का (आंग सान उनके पिता का नाम, सू उनकी दादी का नाम व की उनकी माँ खिन की) जन्म 19 जून-1945 को बर्मा की राजधानी रंगून में हुआ था। कालांतर में इनके पिता को ही इंग्लैंड से बर्मा की आजा़दी के विषय में बात चीत का श्रेय जाता है। इनके पिता द्वारा ही आधुनिक बर्मी सेना की स्थापना की थी। यहाँ ये उल्लेखनीय है कि म्यांमार का पुराना नाम बर्मा (Burma) है जिसकी राजधानी यांगून थी किंतु 1989 में तात्कालिक जुंटा सरकार द्वारा लोकतंत्र समर्थकों को बेरहमी से कुचल दिया गया और अगले ही वर्ष बर्मा का नाम बदलकर म्यांमार कर दिया गया।आंग सान सू म्यांमार में लोकतंत्र स्थापित करने के लिए जहां कटिबद्ध हैं वहीं सैनिक सरकार अपनी सरकार बरकरार रखना चाहती है। इसी लिए आंग सान सू को बार बार जेल में बंद कर दिया जाता है।

         अंत में विश्व में लगभग 40 प्रतिशत देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारत विश्व में सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। भारत को मदर ऑफ़ डेमोक्रसी भी कहा जाता है। पिछले कुछ वर्षो में भारत विश्व पटल पर इस स्थिति में आ गया है जहाँ वह अन्य देशों को विदेश निति के तहत प्रभावित कर रहा है। अमेरिका को विश्व का दूसरे सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का तमग़ा मिला हुआ है तो फ़िर क्या कारण है कि पड़ोसी देश में एक राजनेता को जो कि स्त्री है को लोकतंत्र की अलख जगाने के लिए बार बार जेल में ठूस दिया जाता है और दुनिया की दो शक्तियां अपना प्रभाव डालने में असफ़ल रही हैं।अमेरिका जोअपने को दुनिया का थानेदार बताने का कोई मौक़ा नहीं चूकता वह भी मौन धारण किए हुए है।  किसी भी देश में लोकतंत्र होना अच्छा है किंतु लोकतांत्रिक देशों की यह भी ज़िम्मेदारी है कि वे इस लोकतंत्र को अपने पड़ोस में भी पनपनेदें। उम्मीद है भारत और अमेरिका चुनाव के बाद इस पर ध्यान देंगे।

-प्रदीप डीएस भट्ट-19424
लेखक,कवि, ब्लॉगर,स्तंभकार

Wednesday, 17 April 2024

"नाम में क्या रक्खा है"

रिपोर्ताज

    "नाम में क्या रक्खा है"
          कथा रंग का आठवां रंग


अरे भाया नाम में ही तो सब कुछ रक्खा है। अगर अमिताभ का नाम बलराम या ऊदल सिंह होता या नरेंद्र मोदी का नाम प्रणीत राणा होता या अरविंद केजरीवाल का नाम बिंदु मल्होत्रा होता या या या।😁 बच्चा अपनी मां को बाप को दादा दादी को चाचा मामा को अगर इन संबोधनों से न पहचानकर किसी ऐसे रिश्ते से पहचाने जो समाज को स्वीकार न हो। या फिर हमें ही रुचिकर न लगे तो सोचिए क्या होगा।😉 मैं जिस डिपार्टमेंट में था वहां एक अधिकारी महोदया निश्चित रूप से बेहतरीन पेंटिग करती थीं और हम ठहरे शब्दों के बाजीगर तो एक बार चर्चा में उन्होंने कहा कि अपने मन की प्रसन्नता या अप्रसन्नता को अभिव्यक्त करने में चित्रकारी के द्वारा जो इंपैक्ट पड़ता है वह किसी अन्य माध्यम से नहीं। महत्त्वपूर्ण दर्द है खुशी है उसे किसने तूलिका के माध्यम से कैनवास पर उकेरा महत्त्वपूर्ण नहीं है।  हमने कहा आप अपना नाम तो नीचे लिखती हैं एग्जिबिशन में भी अपने नाम का उपयोग करती हैं। उन्होनें बताया मजबूरी है। हमने भी चुटकी लेते हुए कहा मैम ऑफिस की गैलरी में जो चित्र लगे हैं उन्हें मालती महुआ ने बनाया है वास्तव में सुन्दर चित्र हैं। वे एकदम चमक कर बोलीं🤣 वे चित्र मेरे द्वारा बनाए हुए हैं नीचे नहीं देखा मेरा नाम भी लिखा है। मैं सिर्फ़ मुस्कुरा दिया तो उनको बात चुभ गई वे समझ चुकी थीं मैंने उनकी फिलासफी की हवा निकाल दी थी। ख़ैर अब आते हैं असली मुद्दे पर ये तो रिपोतार्ज का स्टार्टर था मेन कोर्स अभी बाक़ी है।

         हैदराबाद से मेरठ आए हुए लगभग 9 महीने होने को आए हैं। हैदराबाद और मुंबई प्रवास के दौरान देश के कई शहरों में प्रस्तुति दी। हैदराबाद में साढ़े चार वर्ष के प्रवास में मैंने और सुहास भटनागर जी ने मिलकर "कहानीवाला" के लिए काफ़ी काम किया और कोशिश की कि लीक से हटकर कुछ किया जाए।💪 निश्चित रूप से हमें कामयाबी मिली भी। सिर्फ़ गीत गजल ही नहीं वरन छोटी छोटी कहानियों का प्रस्तुतिकरण भी किया गया। किस्सो कहानियों के लिए मुझे इसके अतिरिक्त और कोई मंच नहीं दिखाई दिया। दिल्ली, गुरुग्राम केरल, लखनऊ, वड़ोदरा, जयपुर,नासिक मुंबई एवम नागपुर की अपनी साहित्यिक यात्राओं के सिलसिले में कई बेहद उम्दा लोगों से मिलना जुलना हुआ। कई संस्थानों द्वारा आमंत्रित किया गया था। गोरखपुर को छोड़ दूं तो सभी अनुभव बेहतरीन रहे। 😏किंतु कहानी कहने सुनने समझने और सीखने की लिए कोई मंच नहीं। तभी फ़ेसबुक पर रिंकल शर्मा जी 🌹ने एक लिंक साझा किया। जुड़ा तो देखा "कथा रंग" सच कहूं तो मुझे इसके नाम ने ज्यादा आकर्षित किया बिल्कुल यूनिक। सो दरियाफ़्त की और जुड़ गए। अब प्रतीक्षा थी प्रथम मीटिंग में उपस्थिति दर्ज़ करवाने की सो मौका मिला 13 अप्रैल को एस डी कॉलेज गाजियाबाद में। अब समस्या आन पड़ी कि एक दिन में दो मीटिंग कैसे अटेंड की जाए। रामगोपाल भारतीय जी ने एक माह पूर्व ही आमंत्रित किया हुआ था सो सुबह 10 से 1.40 तक वहां उपस्थिति दर्ज़ कराई फिर आज्ञा ली और 3.40 पर गाजियाबाद स्थिति शंभू दयाल इंटर कॉलेज जा पहुंचे।


के पी सक्सेना जी के अवतरण दिवस पर इससे अच्छा और क्या हो सकता है की कथा रंग की मीटिंग में लेखकों द्वारा दर्शकों को सभी नौ रसों का रसास्वादन कराया जाए। के पी सक्सेना मेरे पसंदीदा रहे हैं उनका गद्य को पढ़ने का स्टाइल गज़ब गज़ब और गज़ब !

         बेहतरीन माहौल में तीसरी पंक्ति में सीट पकड़ी और संयत होकर सांय 7.40 उपस्थिति बरक़रार रक्खी। कुछ ही देर में एक सज्जन ने रजिस्टर आगे कर दिया हमने नाम वगैरह दर्ज़ कराए फिर एक एक कर श्रोताओं में से कहानीकार मंच पर अपनी कहानी पढ़ते गए और श्रोताओं में बैठे अन्य कहानी कार उनकी कहानियों पर टिप्पणी देते। फिर उस कहानीकार से उन टिप्पणियों पर टिप्पणी देने को कहा जाता। कुछ कहानियों पर हुए पोस्टमार्टम से असहज भी दिखे। ये दौर लगभग 7.15 तक चला जब तक मंचासीन अतिथियों को अपने विचार रखने हेतु आमंत्रित नहीं किया गया। एक लड़की ने शायद पहली बार कहानी पढ़ी जिस कारण वो थोड़ा घबरा रही थी शायद कांप भी रही थी। नवोदित के साथ ऐसा होता है। जिसका आभास रिंकल शर्मा जी को हुआ और उन्होनें संचालक का महत्त्वपूर्ण कर्तव्य निभाते हुए उन्हें सांत्वना दी। 🌷🌷एक अच्छा साइन। चूंकि एक दो को छोड़कर मेरे लिए सभी नए चेहरे थे इसलिए मैं पीछे की पंक्ति में आ बैठा ताकि पूर्ण आनंद ले सकूं। मैं पानी पीने के लिए बाहर आया तो एक सज्जन को देखकर सहसा चौंक गया उनका काफ़ी कुछ चेहरा स्वर्गीय के पी सक्सेना जी से मिलता जुलता मिला (मुझे तो मुंबई में नेपाल में दिल्ली में भी और अभी गोरखपुर में जगजीत सिंह का भाई समझ लिया गया) ख़ैर उनसे परिचय हुआ तो उन्होनें शायद सुभाष चंद्र नाम बताया जिनकी अब तक , 53 पुस्तकें आ चुकी हैं। उनसे काफ़ी देर गुफ्तगू होती रही। दूसरी बार पानी पीने उठा तो यात्री जी से परिचय हुआ।  एक मोहतरमा नाम याद नहीं अपनी कहानी की समीक्षा से थोड़ा असहज हो गई थीं किंतु उनको दूसरों की कहानियों पर टिप्पणी करते देख मन बड़ा आनंदित हो गया ? शायद वो जैसे को तैसा फिल्म से प्रभावित थीं। 🙆‍♂️मेरे बराबर में एक सज्जन ने मुझसे मेरा परिचय पूछा तो मैंने बताया तो कहने लगे सर आपको भी कहानियों पर समीक्षा करनी चाहिए। हमने हाथ जोड़ते हुए उत्तर दिया हुज़ूर अभी हम इस लायक नहीं। वैसे भी कथा रंग के कई रंग हैं इसलिए कम से कम आज तो हमें सिर्फ श्रोता बने रहने दीजिए।
फिर उन्होंने एक मोहतरमा की तरफ इशारा कर पूछा इन्हें जानते हैं। हमनें ह्यूमर का प्रयोग करते हुए कहा जी बहुत बड़ी व प्रसिद्ध लेखिका हैं। इनके बस्ते लगभग 7,8 कहानियां जमा हो चुकी हैं ।😵 उन्होंने हमारी तरफ देखते हुए कहा काफ़ी गुरू टाइप के व्यक्ति हो आप। मैंने कहा ना जी ना ऐसा कुछ भी नहीं है हुजूर उन्होनें केला और खरबूजों के कुछ टुकड़ों को खाते हुए हमे अपना यही परिचय दिया है। वो फिर मुस्कुराए और हाथ जोड़ दिए।

अब कार्यक्रम समाप्त हो चुका था हमने जाने से पहले रिंकल जी से मिलना मुनासिब समझा। मिले परिचय हुआ तो उन्होंने भेंट स्वरूप अपनी पुस्तक बुरे फंसे की एक प्रति हमे दे दी। फिर यात्री जी से थोड़ा और गुफ्तगू की। एक बात जो आज की सभा में अच्छी लगी वो ये थी कि किसी को जाने की जल्दी नहीं सभी ने अपना पूरा समय दिया (2,4 को छोड़कर)। मैं इस बात पुनः दोहरा रहा हूं साहित्य से सिर्फ़ लेना नहीं उसे देना भी सीखिए। कम से कम समय तो दीजिए !!!! 

कथा रंग और टीम को सुन्दर संचालन के लिए, अच्छी व्यव्स्था के लिए ढेरों बधाई।।।🌷🌷🌹🌹🍁🍁🍁🍁

प्रदीप डी एस भट्ट -17424

Sunday, 14 April 2024

" थोड़े लिखे को ज्यादा समझना"

रिपोतार्ज

"थोड़े लिखे को ज्यादा समझना"


      आप भी सोच रहे होंगे ये क्या शीर्षक हुआ। 🙃ना ना भैया मैं तो सोशल मीडिया के उद्भव से पूर्व जब खुशी हो या गम बस एक ही जरिया था अपनी बात एक दूसरे तक पहुंचाने का और वो था पत्र/पाती/रुक्का/चिट्ठी/ चिट्ठिया या अंग्रेज़ी में लेटर। गांव में जिसने चार अक्षर अंग्रेज़ी के पढ़ लिए वो पूरे पत्र में कहीं न कहीं अंग्रेज़ी की टांग ज़रूर तोड़ता था। 😊इधर डाकिए की साईकिल की घंटी की आवाज़ और उधर लगभग पूरा मोहल्ला इस आस में कि शायद हमारी भी चिठिया हो दरवज्जे पर आ खड़ा हो जाता था और जब डाकिया हाथ के इशारे से बताता तोहार लेटरवा नहीं है तो मन मायूस होकर कोने में दुबक जाता था। ऐसा लगता था जैसे सब कुछ लुट गया हो और पार्श्व में किशोर दा का गाना कानों में गूंजने लगता था।😌

          कोई हमदम न रहा कोई हमारा न रहा 
          हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा ।

और अब आते हैं शीर्षक पर तो भैय्या पत्र की शुरुआत कुछ यूं हुआ करती थी। अत्र कुशलाम तत्रास्तु तदुपरांत समाचार यह है कि......घर परिवार की सुखद दुःखद घटनाओं का विवरण इसकी उसकी चुगली वगैरह😝 वगैरह और अगर प्रेम पत्र होता था तो लड़का हो या लड़की जान छोड़कर सब कुछ पत्र में उडेल देते थे फिर भी लगता था पत्र में कुछ कमी रह गई और अंत में एक पंक्ति चिपका देते थे। "कम लिखे को ज्यादा समझना" 🤝
और उस ज़माने में पोस्ट कार्ड, नीले रंग का इनलैंड लेटर या फिर लिफाफा। जिसमें प्रेम पत्र लिखने वाले कॉपी के पन्ने ठूस ठूस कर भर देते थे। जब प्रेमी या प्रेमिका को पत्र मिलता डाकिया कहता लाओ भैय्या इतने वजन के इतने एक्स्ट्रा पैसे दो तब प्रेम पाती मिलेगी। जिन्हें सब खुशी खुशी चुका भी देते थे किन्तु एक आध केस में जिसे समंध विच्छेद करना होता था वो पत्र वापिस उसी पते पर और भैय्या गजब तो तब होता जब डाकिया वो पत्र मां बाप को दे देता था। आप खुदई कल्पना कर लो तब क्या सीन होता होगा।😆🥹

तो हुआ यूं कि लखनऊ से मित्र ने फुनवे पर बताया कि गोरखपुर में एक कार्यक्रम है आ जाओ एक पंथ दो काज हो जायेंगे गोरखपुर भी घूम लेना और कार्यक्रम भी अटेंड कर लेना। म्ंबई के 12 बरस के प्रवास के दौरान जब हमने 2016 में ब्लॉग लिखना शुरु किया तो पहला ब्लॉग गोरखपुर पर "जाग मछिंदर गोरख आया" शीर्षक से लिखा था सो मन में प्रबल इच्छा थी कि गोरखपुर घूमेंगे सो प्रस्ताव मुफीद लगा और हमने तुरंत टिकिट कटवा ली। लेकीन दो दिन पहले ही मित्र ने अन्यत्र कारणों से आने में असमर्थता प्रकट कर दी। 😂लेकिन हम तो हम ठहरे सोच लिया जाएंगे तो 6 अप्रैल को सुबह दिल्ली पहुंच गए। हमारी मित्र स्कूल निबाटकर हमें लेने गाड़ी सहित लाजपत नगर पहुंच गई। वहां से मण्डी हाउस में पूर्व निर्धारित मीटिंग अटेंड की फिर थोड़ी सी पेटपूजा साथ में आवारागर्दी फिर सीधे मेट्रो द्धारा आनंद विहार और लीजिए हुज़ूर अगले दिन सुबह 9.30, गोरखपुर की पावन धरती को नमस्कार किया। ये सोचकर कि क्या पता संस्था ने रहने का इंतज़ाम कैसा किया हो ऑनलाइन होटल बुकिंग टटोली फिर वही दूसरी यूनिवर्सिटी में कार्यरत्त Mr XYZ से बात की उन्होंने अगले दिन स्टेशन पर लेने आने का आश्वासन दिया। और वादे के मुताबिक़ वे हाज़िर भी हुए। रहने की व्यवस्था अच्छी नहीं जानकर उनकी बाइक पर बैठकर दो तीन होटलों की ख़ाक छानी तो पता चला ऑनलाइन में जितने अच्छे वास्तविकता में उतने ही भद्दे। ख़ैर होटल पार्क रीजेंसी में डेरा डाला फ्रेश हुए और सीधे गोरखपुर यूनिवर्सिटी जहां प्रोग्राम था। रास्ते में Mr XYZ जनाब ने अपनी कई गजले कविता सुनाई। हमने कहा हुज़ूर "भूखे भजन न होई गोपाला पकड़ ये अपनी कंठी माला " कुछ नाश्ता हो तो इस ब्राह्मण की जान में जान आए। ख़ैर माफ़ी मांगते हुए उन्होंने यूनिवर्सिटी गेट पर ही नाश्ता करने में सहयोग दिया ।🥘🫕🍰🌶️

      मीटिंग हॉल में पहुंचते ही वही चिर परिचित नज़ारा महिला मित्रों का फोटो सेशन। राम राम श्याम श्याम के बाद सूचना मिली कि कार्यक्रम के अध्यक्ष अतिथि वगैरह अभी तक नहीं आए हैं । 11.30 जैसे तैसे बिना सरस्वती वन्दना के कार्यक्रम शुरु हुआ। मंच पर 9 कुर्सियां बैनर पर रवि शुक्ला, सांसद का फ़ोटो साथ में कुछ अन्य का भी। तभी वे दो भद्र महिलाएं जो कार्यक्रम संचालित करने का असफल प्रयास कर रही थी उनमें से एक ने आकर निवेदन किया आप काव्य पाठ के लिए तैयार रहें। मैंने अचकचा कर उन्हें निहारा फिर कहा मंच खाली पड़ा है मैम आप मुझे बख्श दें। 🙊उन्होंने पुन: आग्रह किया तो मैंने पुन: विनम्रता से उन्हें मना कर दिया। डेढ़ घंटे बाद दो तीन अतिथि आए, कार्यक्रम अध्यक्ष पैर फैलाकर पसर गए जैसे फिल्मी नेता जी। सच कहूं तो पूरे दिन कार्यक्रम में अराजकता फैली रही कोई कहीं भी आ जा रहा था। मंच पर अतिथि आए और गए और दर्शक दीर्घा से लोग उठे मंच पर बैठे फ़ोटो खिंचवाए फिर कोई और फिर कोई और शानदार लगातार अराजक माहौल। बार बार आग्रह पर हमने भी प्रस्तुति दे दी और Mr XYZ ने भी। मेरी प्रस्तुति छोड़िए हुज़ूर Mr XYZ पर ध्यान दें। सुबह से कई कविताओं का डोज पिलाने वाले Mr XYZ ने 1996 में आई दो कैसेटों में गजलों "सजदा" की एक गजल
हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही भीड़ का ख़ुद मकाम आदमी
😈
भई Mr XYZ का कॉन्फिडेंस देखकर जगजीत भी बंदे के पैर छू लेते। मुझे सहसा जनवरी 2024 में मुंबई में आयोजित गज़ल कुंभ याद हो आया जहां दो दिनों में 150 से अधिक लोगों ने गज़लें पढ़ी। एक मोहतरमा नज़्म पढ़ गई। दीक्षित दनकौरी जी जो मेरे पास ही बैठे थे, टोका तो बोली ये गज़ल ही है। कॉन्फिडेंस है भई कॉन्फिडेंस। मैं जहां स्तब्ध था वहीं ये देखकर और स्तब्ध हो गया कि क्या दर्शक क्या संचालिकाएं क्या सो कोल्ड जाजिस किसी को पता ही नहीं बंदा क्या पढ़ रहा है। मेरे बाजू में एक मोहतरमा ने मुझे कहा सर क्या हुआ आपने माथे पर क्यूं हाथ मारा तो मैंने कारण बताया, बोली अच्छा सर ऐसा है क्या वैसे ये जगजीत क्या गाने लिखते हैं।😡 अब सहन करना मुश्किल हो रहा था। सो Mr XYZ को बाहर ले जाकर जब अवगत कराया कि आपने जगजीत सिंह की गज़ल पढ़ी है तो तुरन्त बोले ये मैने लिखी है ये देखिए और उन्होंने मुझे तीन चार सादे कागज़ों में तरतीब से लिखी कई गज़लें दिखाई उनमें ये भी थी मैंने पूछा कब लिखी तो बोले ढ़ाई तीन साल पहले। भई सच कहूं मन किया सरयू में अपना तर्पण कर दें। 😢बस भैय्या अब आगे कुछ न "थोड़े लिखे को ज्यादा समझना"।

वैसे तो रिपोतार्ज को इसी नोट पर छोड़ना मुनासिब होगा किंतु पिक्चर अभी बाक़ी है मेरे दोस्त। कार्यक्रम से रूखसती लेकर गोरखपुर भ्रमण पर निकल गया। शाम को होटल पहुंचा चूंकि ट्रेन 8 की सायं 7.15, पर थी सो फ्रेश हुए और पैर फैलाकर सीधे बैड पर। अभी कमर सीधी भी नहीं की थी फ़ोन घनघना उठा। बैंगलौर से वरिष्ठ दर्शन बेज़ार जी लाइन पर थे। राम राम के बाद सूचना मिली की उनकी नई तेवरी पुस्तक " खतरे की भी आहट सुन "का लोकार्पण 18 जून=2024( रानी लक्ष्मीबाई का जन्मदिन) के स्थान पर 8 जून=2024 ( मंगल पाण्डेय की पुण्यतिथि) पर हज़रत गंज स्थित केरल रेस्टोरेंट में होगा। हमने कहा हुज़ूर हम तो गोरखपुर में हैं तो तय हुआ कि वे स्वयं मेरठ आ जाएंगे। लेकिन लेकिन लेकिन वादा तो वादा है हुजूर। जुट गए व्यस्था में और लखनऊ चंडीगढ़ एक्सप्रेस में टिकिट लेकर ही माने। अब ये और बात की कंफर्म टिकिट लखनऊ से सहारनपुर की मिली गोरखपुर से दिल्ली की ट्रेन कैंसल की। 🚂 सोचा कट फट के रेलवे जो देगी ले लेंगे। होटल तो दो दिन के पूरे 6000 पहले ही ले चुका था सो रात्रि साढ़े ग्यारह बेजार जी को सूचना दी कि कल सुबह बस से लखनऊ पहुंच रहा हूं। उन्होंने भी वही कहा जो इस स्थिति में मैं कहता कि इसकी क्या ज़रूरत है। लेकिन अपनी गज़ल का ही मतला है भई 

       खता मेरी मुझको, बतानी पड़ेगी
      अगर दोस्ती है, निभानी पड़ेगी 

सो बस में बैठे और पांच घण्टे बाद लखनऊ। आलमबाग स्थित पत्रकार मित्र मनीष शुक्ल से संक्षिप्त मुलाकात फिर मेट्रो पकड़कर सीधे केरल रेस्टोरेंट। बढ़िया प्रोग्राम एक से बढ़कर एक हस्ती। हैदराबाद प्रवास की याद ताज़ा करते हुए डिनर में डोसा फिर गुलाब जामुन खाकर आत्मा और पेट दोनों तृप्त किए। टैक्सी पकड़ी और सीधे स्टेशन। ट्रेन से गजरौला फिर बस द्वारा सीधे मेरठ।खाया पीया और जय श्रीराम। अगले दिन बेड से उठे तो उठा न जारिया। उठते बैठते लेटते कमर में आहा उह्हु क्या कहूं। बस आहा उह्हू पर ही जय श्रीराम!!!🌹🌹🌹😊

प्रदीप डी एस भट्ट=14227

Wednesday, 21 February 2024

संदेशख़ाली न जाए

"इस बार संदेश ख़ाली न जाए"

         पिछले लगभग दो माह से मीडिया में संदेशख़ाली ही संदेशख़ाली छाया हुआ है। पहले जब ED की टीम शाहजहां शेख के घऱ और अन्य परिसरों पर छापा मारने गईं तो वहाँ के स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोगों जिन्हें शाहजहाँ शेख का सरंक्षण प्राप्त है ने ED एवम् अर्ध सैनिक बलों पर जानलेवा हमला कर दिया। ED के कितनों अधिकारियों/कर्मचारियों एवम् पुलिस प्रशासन (स्थानीय नहीं ) को सर में चोटें लगी।आख़िर ED अधिकारियों को अपनी जान की सलामती के लिए वहाँ se भागना पड़ा। जब इस पर हो हल्ला हुआ तो मुख्यमंत्री एवम् उनके प्यादों ने केंद्र सरकार पर ही इसकी ज़िम्मेदारी डालते हुए ठीकरा फोड़ दिया। वामपंथियों को सत्ता से पद्चुय्त कर सत्ता में आयीं ममता बनर्जी अब वो सब तिकड़में अपना रही हैं जिससे व अनंतकाल तक सत्ता का सुख भोगती रहें। किंतु क्या ये सम्भव है। सनातनी होकर सनातनियों पर अत्याचार वो भी उन लोगों का पक्ष लेकर जिस जगह से डायरेक्ट एक्शन डे की शुरुआत हुईं थी। हर चीज़ की एक्सपायरी निश्चित है। और अब दूसरे पार्ट के रूप में उस बांग्लादेशी शाहजहाँ शेख द्वारा संदेशख़ाली की आदिवासी महिलाओं पर किये गये वीभत्स कृत्य। तिमिर तो छंटना ही है और नई भोर होनी भी निश्चित है। 

         पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के बशीरहाट उपखण्ड के सी डी ब्लॉक जिसका क्षेत्रफल लगभग 198 KM है जिसमें 1पंचायत समिति 8ग्राम पंचायतें 103 ग्राम संसद 24मौजा और 24 गाँव बसे हुए हैं इन्हीं में से एक गाँव है संदेशख़ाली जिसकी आबादी दो लाख के क़रीब है। यहाँ मुख्यतः बंगाली हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा बोली जाती है। यहाँ पर आदिवासी काफ़ी संख्या में रहते हैं जो मुख्यतः बांग्ला भाषी है। चूँकि गाँव में रोज़गार के ज्य़ादा साधन नहीं हैं तो ज़्यादातर घरों के पुरुष बाहर जाकर काम करने को बाध्य हैं।

         कईं महीनों से TMC के शाहजहाँ शेख और उसके गुर्गों द्वारा संदेशख़ाली की महिलाओं पर किये जा रहे अत्याचारों की की भनक जब एक पत्रकार संतू पान जो बांग्ला समाचार चैनल रिपब्लिक बांग्ला के लिए काम करता है को लगी तो वो इसे कवर करने संदेशख़ाली गया जिसकी सूचना स्थानीय TMC सो कॉल्ड नेताओं को लगी तो उसे तुरंत गिरफ़्तार कर लिया गया। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस गिरफ़्तारी पर अपनी नाराज़गी भी जताई है लेकिन ममता बनर्जी के पुलिस प्रशासन को इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ा। धीरे धीरे मामले ने ज्य़ादा ज़ोर पकड़ा तो भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने अपने सहयोगियों के साथ संदेशख़ाली जाने का निर्णय लिया तो तुरंत राज्य सरकार ने धारा 144 लगा दी एवम् पुलिस प्रशासन ने सुकांत मजूमदार के साथ अभद्र व्यवहार किया जिस कारण वे अपनी गाड़ी पर गिर पड़े और बेहोश हो गये। इस घटना से केंद्रीय सरकार राज्यपाल से रिपोर्ट तलब कर ली अपनी रिपोर्ट में राज्यपाल ने लचर कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए और संदेशख़ाली में महिलाओं पर हुए अत्याचार की विभीषिका को दृष्टिगत रखते हुए केंद्र सरकार से तुरंत दखल देने का आग्रह किया। इसी बीच राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा रेखा शर्मा अपनी टीम लेकर संदेशख़ाली पहुँच गईं। उनकी टीम द्वारा उन महिलाओं से बात की गईं। बातचीत में महिलाओं द्वारा बताया गया कि शाहजहाँ शेख के गुंडे दिन में ही किसी भी घऱ में घुस जाते हैं। घऱ के पुरुषों से घऱ की महिलाओं एवम् लड़कियों की परेड कराई जाती है। जो महिला लड़की पसंद आ जाती है वे उसे उठाकर स्थानीय TMC कार्यालय ले जाते हैं कईं बार एक रात या कईं बार कईं रातों के बाद (ज़्यादातर मामलों में लड़कियों को) उन्हें मुक्त किया जाता है। अगर पुलिस से शिक़ायत करें तो पुलिस भी उन्हें ही प्रताड़ित करती है। कईं बार TMC के गुंडे उन्हें पुलिस के सामने ही मारते हैं ऊपर शिक़ायत की बात करने पर घऱ के छोटे बच्चों पर बंदूक तानकर बोलते हैं शिक़ायत की तो सबको यहीं ढ़ेर कर देंगे। महिला आयोग के आश्वासन के बाद एक ही दिन में संदेश ख़ाली की महिलाओं द्वारा शाहजहाँ शेख और उसके गुंडों के विरुद्ध 18 FIR दर्ज़ हुईं हैं जो राज्य सरकार द्वारा अपनी अकर्मण्यता को दर्शाता है। 

         राष्ट्रीय महिला आयोग ने भारत सरकार को संदेशख़ाली से संबंधितअपनी रिपोर्ट सौंप दी है। अपनी रिपोर्ट में संदेश ख़ाली में अराजक माहौल  महिलाओं के साथ बड़े पैमाने  पर हुए अत्याचार/बलात्कार का ज़िक्र करते हुए पश्चिम बंगाल में तुरंत राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश की है। कुछ दिनों से संदेशख़ाली की घटनाओं से संबंधित एक वीडियो भी वायरल हो रहा है जिसमें शाहजहाँ शेख और उसके गुंडों द्वारा आदिवासी सनातनी महिलाओं पर किये जा रहे अत्याचारों का विवरण  पेश किया गया है। जैसे कि बताया जाता है कि अत्याचार केवल और केवल आदिवासी सनातनी स्त्रियों के साथ ही हो रहा है। अगर कोई महिला या लड़की TMC ज्वाइन करना चाहती है तो उसे पहले निवस्र होने के लिए कहा जाता है फ़िर उस पर फब्तियां कसी जाती है उसे रात में जब बुलाएं आने के लिए कहा जाता है।सुन देखकर ऐसा लगता है जैसे भारत में अभी भी कुछ राज्यों में मुगलिया सल्तनत चल रही है। 

         अंत में महिला अधिकारों का दंभ भरने वाले किसी भी विपक्षी पार्टी के नेता या नेत्री ने मणिपुर पर ख़ूब छाती पीती किंतु संदेशख़ाली पर कुछ भी न बोलने की जैसे क़सम ख़ा ली है वहाँ जाकर उन महिलाओं के ज़ख्मों पर मरहम लगाने की बात तो छोड़ ही दीजिए। इंडी की चिंदी चिंदी बिखर गईं लेकिन इन के मन में अब भी आस बाक़ी है शायद कुछ हो जाए। इस शायद कुछ हो जाए की फ़िराक में संदेशख़ाली  की महिलाएं जीते जी मरती हैं तो मरें इनकी बला से किंतु इस बार भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सोचना और समझना पड़ेगा कि वे भी इसे सिर्फ़ राजनैतिक रोटियाँ सेंकने का माध्यम न समझें वरन TMC प्रमुख को एक कड़ा संदेश दें कि भारत सरकार इस वीभत्स कांड पर मौन नहीं बैठने वाली। संदेशख़ाली की आग कईयों को जलाने को तैय्यार बैठी है इसलिए इस बार भारत सरकार की ओर से 140 करोड़ लोगों के लिए "संदेश ख़ाली" न जाए।


प्रदीप D भट्ट -21:02:2024
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