Saturday, 17 February 2018

बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ कौमार्य परिक्षण भी करवाओ

““बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ और कौमार्य परिक्षण कराओ “

पिछले दिनों समाचार पत्र में “कौमार्य परिक्षण” से सम्बंधित ख़बर पढ़ी। निश्चित रूप से एक बारगी तो ज़ोर का झटका ज़ोर से ही लगा। एक तरफ़ हम बड़े फ़र्क के साथ ये बताने में हर्ष महसूस करते हैं कि  हम 21वीं सदी में प्रवेश कर कर गये हैं ,विश्व बिरादरी में भारत में पांचवें सबसे ज्यादा रिचेस्ट पर्सन रहते हैं ,भारत विश्व पटल पर सबसे ज्यादा युवाओं का देश है और दूसरी तरफ़ आज भी हम ऐसी सड़ी-गली मानसिकता में जी रहे हैं कि पूरा का पूरा गाँव विवाह से पूर्व लड़कियों का कौमार्य परिक्षण करवाता है और ये उनकी चॉइस नहीं है वरन ज़रूरी प्रथा है। 
भारत के महाराष्ट्र के पुणे शहर एवं उसके आसपास रहने वाले कंजरभाट समुदाय में ये प्रथा जाने कब से चली आ रही है जहाँ विवाह के उपरांत लड़के एवं लड़की जब सुहागरात मनाते हैं तो अगले दिन उस बिस्तर पर बिछी हुई सफेद रंग की चादर (सुहागरात में सफेद चादर बिछाने का नियम ही है) पर जब तक घर के बड़े बुजुर्ग, गाँव के लोग और गाँव के पंच खून के धब्बे ना देख लें तक चैन की साँस नहीं लेते। अगर खून के धब्बे नहीं मिलते हैं तो मान लिया जाता है कि लड़की वर्जिन नहीं है और फ़िर उसके साथ मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का वो दौर शुरू होता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती । किन्तु एक हास्यस्पद बात भी है कि कौमार्य परिक्षण में फेल लड़की को तो प्रताडन झेलनी ही पड़ती है साथ ही उसके घर वालों को और कभी कभी तो गाँव तो प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। मामले का निपटारा भी बड़े ही हास्यस्पद तरीके से किया जाता है अगर लड़की वाला इस शादी को तोडना नहीं चाहता है तो उन पर जुल्मों सितम की इंतेहा के बाद आर्थिक जुर्माना भी लगाया जाता है और ये जुर्माना भरने के पश्चात् ही इस शादी को को मान्य किया जाता है। मतलब जो लड़का, उसके घर वाले और गाँव वाले जिनमें पांच भी शामिल थे कौमार्य परिक्षण में फेल लड़की को रखने के लिए सिर्फ़ इसलिए हामी भर लेते हैं ताकि उन्हें लड़की वालों की तरफ़ से जबर्दस्त आर्थिक अनुदान दिया जाता है ?
भारत में जब किसी लड़की का बलात्कार होता है तो पुलिस सबसे पहले उस लड़की को लेकर हॉस्पिटल जाती है और सबसे पहले उसका कौमार्य परिक्षण करने पर ज्यादा ज़ोर दिया जाता है ताकि ये पता चल सके कि लड़की बलात्कार से पहले सेक्स की आदी तो नहीं थी इससे पुलिस को एक मौका मिल जाता है दूसरी पार्टी से सौदेबाजी करने का। जहाँ तक कौमार्य परिक्षण का प्रश्न है तो भारत में आज भी टू फिंगर टेस्ट ज्यादा प्रचलित है। जिस पर सर्वोच्च न्यायालय कई बार अपनी तीखी टिपण्णी भी दे चुका है । किन्तु इस विषय में आज तक ज्यादा कुछ नहीं किया गया है। जस्टिस जे एस वर्मा समिति ने भी इसकी तीखी आलोचना की है।  समिति ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर आपराधिक कानूनों के आलोक में २३ जनवरी २०१३ को सरकार को अपनी रिपोर्ट सौपीं थी जिसमें सेक्स को अपराध का विषय बताया गया है ना की मेडिका डायग्नोसिस का । रिपोर्ट में बताया गया है कि महिला की वजैना के लचीलेपन का बलात्कार जैसे घर्णित अपराध से कोई लेना देना नहीं है । इसी कानून में टू फिंगर टेस्ट को बैन करने की भी सलाह सरकार को दी गई थी । इसी रिपोर्ट में डॉक्टरों को यह पता लगाने से रोकने का प्रावधान करने की सिफारिश की गई थी जिसमें पीडिता के यौन संबधों में सक्रिय होने या नहीं होने की जानकरी सार्वजानिक दी जाती है। 

आख़िर ये इसमें टू फिंगर टेस्ट है क्या? फ़्रांसीसी मेडिकल विधिवात्ता एल थोइनन्त ने 1898 के लगभग नकली और असली कुंवारी लड़कियों में फ़र्क करने के लिए  ही इस प्रकार का टेस्ट इज़ाद किया था क्यों कि  यह भी प्रचलित है कि कुछ महिला /लड़कियां किसी भी प्रकार की परेशानी से बचने के लिए विज्ञान का सहारा लेती है एवं नकली झिल्ली लगवा लेती हैं।  ऐसा माना जाता है कि महिला के योनिद्वार में जो झिल्ली (योनिच्छद/Hymen) होती है वह केवल संभोग क्रिया के दौरान ही फटती है इसलिए जब भी कभी किसी महिला का टू फिंगर टेस्ट किया जाता है तो उसका मूल कारण सिर्फ़ यही होता है कि वह महिला या लड़की कुंवारी है या नहीं । नकली कुंवारी उस महिला को कहा जाता है जिसकी हैमन लचीलेपन के कारण सेक्स के बाद भी नहीं टूट पाती । भारत में मेडिकल विधिशास्त्र की लगभग हर पुस्तक में TFT को बढ़ावा दिया जाता है । इस विषय में जयसिंह पी मोदी की पुस्तक  “A Text book of medical jurisprudence & technology”  भी शामिल है।  देश में प्रचलित दो ऊँगली टेस्ट से बलात्कार पीड़ित महिला की वजैना के लचीलेपन की जाँच की जाती है । उँगलियों को वजाइना के अन्दर डालकर ये मालूम किया जाता है कि लड़की कुंवारी है या नहीं अगर दो से अधिक ऊँगली वजाइना  के अन्दर प्रवेश करती हैं तो लड़की कुंवारी नहीं है मान लिया जाता है भारत में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो डॉक्टरों को ऐसा करने के लिए कहता है।किन्तु फ़िर भी ये प्रक्रिया धडल्ले से भारत भर में जारी है। 
ऐसा नहीं है कि कौमार्य परिक्षण सिर्फ़ भारत में ही कराये जाते हैं  पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रहे जर्फिया में भी इस प्रकार की प्रथा रही है जिस्मने दुल्हन को कौमार्य परीक्षण से गुजरना पड़ता है। ये विषय अगर है की वहां पर इस परिक्षण की फ़ीस कुछ ज्यादा ही ज्यादा है एक टेस्ट की कीमत लगभग 6 से 7 हजार बैठती है वहीँ अगर इस टेस्ट को जल्दी करवाना है तो ये फेस लगभग दोगुनी होती है। प्राचीन काल में अफ्रीकी देशों में कौमार्य परीक्षण के लिये यह परीक्षण महिलाओं द्वारा किया जाता था। कई देशों में जहां वर्जिनिटी टेस्ट आम बात है, इसी टेस्ट से वर्जिनिटी टेस्ट किया जाता है।2014 में हुमर राइट्स वाच ने एक रिपोर्ट जारी कर ये बताया था कि इंडोनेशिया में महिलाओं को पुलिस प्रवेश से पूर्व अपना कौमार्य परिक्षण करवाना ही पड़ता है । इसी प्रकार जुलू सभ्यत में एक उम्र की लड़कियों को राजा के समने नृत्य करना पड़ता है।लेकिन उन नृत्यांगनों के लिए पहली शर्त  टू फिंगर टेस्ट ही होती है अगर उसका कौमार्य सुरक्ष‍ित पाया गया, तो उसे सम्मानित किया जाता है, लेकिन अगर कौमार्य भंग हो गया है, तो पिता पर जुर्माना ठोका जाता है।

अब आते हैं महाराष्ट्र के पुणे के उस युवक के विद्रोह पर जिसने इस घिनौनी प्रथा पर चोट करने की पहल की है इस युवक का नाम है विवेक तमिचकर  जिसने अपनी शादी तय होने पर ये घोषणा कर दी कि वो इस घिनौनी प्रथा का पालन करने के लिए अपनी होने वाली पत्नी को नहीं कहेगा । उसके इस  दुस्साहस के लिए उसे अपने घरवालों गाँव वालों और गाँव के पंचों तक से लोहा लेना पड़ा लेकिन वो अपनी इस प्रतिज्ञा पर अडिग रहा ।विवेक की शादी मई में होनी है किन्तु उसने जो भीष्म प्रतिज्ञा कर ली है उसका पालन वह हर हाल में करना चाहता है । इस घिनौनी प्रथा को जड़ से समाप्त करने के लिए विवेक ने “STOP THE RICHUALS” नामक एक व्हाट्स-अप ग्रुप भी बनाया है । शुरू शुरू में तो इसमें कुछ दिनों में मात्र 10 ही लोग जुड़े किन्तु धीरे धीरे ये संख्या अब 50 पार कर चुकी है।एक अच्छी बात यह भी है कि इस ग्रुप में 15 लड़कियां भी शामिल हो गई हैं जो इस प्रथा के विरुद्ध खड़ी  हैं। ये ग्रुप सिर्फ़ यहीं तक सिमित नहीं रहा इसने कुछ शादियों में इस प्रथा के विरुद्ध पुलिस में भी शिकायत दर्ज करायी किन्तु पुलिस का उचित सहयोग नहीं मिल पाया है । इसी ग्रुप के एक सदस्य प्रशांत की शादी भी अप्रैल में हैं और वो भी इस गली सड़ी प्रथा के विरोध में खड़े हो गए हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव भी उनके परिवार पर पड़ रहा है किन्तु वे टस से मस होने को तैयार नहीं दीखते। प्रशांत बताते हैं कि महाराष्ट्र सरकार के कानून के मुताबिक पंच कोई भी फ़ैसला नहीं कर सकते और ना ही उनके द्वारा दिए गए किसी फ़ैसले को मानने के लिए कोई बाध्य है यहाँ तक कि उस फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है किन्तु इन सब के बावजूद अभी तक ये प्रथा जारी है। एक तरफ़ सरकार बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ के अभियान में दम ख़म ठोक रही है वहीँ इस तरह की घटनाएँ पुरे देश को शर्मिंदा कर रहीं हैं ।

  
   -प्रदीप भट्ट-  शनिवार ,फ़रवरी 17,2018-

Tuesday, 6 February 2018

अंकित सक्सैना हत्याकांड

“मरता है कोई तो मर जाए हम अपना निशाना क्यूँ छोड़े”
(अंकित सक्सेना जघन्य हत्याकांड)

अंकित सक्सेना जिसकी उम्र मात्र 23 वर्ष थी और उसका कुसूर मात्र इतना कि वो एक मुस्लिम लड़की सलीमा  से प्यार करता था और ये प्यार एक तरफ़ा तो बिलकुल भी नहीं था। प्रेम का अंकुर दोनों के दिलों में ही अंकुरित हुआ। दोनों ने निश्चित ही प्यार में साथ जीने और मरने की क़समें भी खायी होंगी । किंतु फ़िर वही ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हुई और 1 फ़रवरी -2018 को सरेआम सलीमा के माँ ,बाप,मामा और उसके अंडर एज भाई ने मिलकर डेल्ही के ख़याला गाँव में सारे आम उसकी निर्मम हत्या कर दी और वहां उपस्थित भीड़ सिर्फ़ तमाशबीन बनी रही?  आख़िर ऐसा क्यों और कब तक ?
अब हम बात करते हैं बड़े-बड़े शब्दों का इस्तेमाल करने वाले और सेकुलरिस्म - सेकुलरिस्म  खेलने वाले लोगों की। जिनमें डेल्ही के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी शामिल हैं। कोई भी ऐसी घटना जिसमें व्यक्ति विशेष या समुदाय विशेष के साथ कोई दुर्घटना होती है तो उस व्यक्ति का घर, घर ना होकर एक तीर्थस्थल  में तब्दील कर दिया जाता है  और वहां पर अपना मत्था टेकने की होड़ सी लग जाती है । इन सबका एक ही उद्देश्य होता है कि आम जन देखें और महसूस करें कि हम मुस्लिमों/दलितों के प्रति कितनी सहृदयता रखते हैं अगर इनमें से किसी को भी एक खरोच आ जाए तो ये सभी विपक्षी नेता विक्षप्त हो जाते हैं और लगते हैं प्रलाप करने। अब एक और होड़ मच जाती है कि उन्हें किस तरह सहायता दी जाए ताकि समाज में हमारी वाह वाही हो ,ये सहायता 5 लाख से शरू होते हुए 1 करोड़ तक पहुँच जाती है एक ही विशेष परिवार को 4-4 फ्लैट तक उपहार में दे दिए जाते हैं।और ये बड़े बड़े सो कॉल्ड नेता अभिनेता लिँचिँग गैंग, ,मुशायरा गैंग,अवार्ड वापसी गैंग और शोभा डे जैसी शख्सियत जिनका एक मात्र बोलने का उद्देश्य ही यही होता है कि लोग उनकी बातें सुने और उस पर अपनी प्रतिक्रिया दें।किंतु ऐसा भी केवल व्यक्ति विशेष या समुदाय विशेष के प्रति ही अन्यथा ये लोग किसी खोह में जाकर बैठ जाते हैं।
•अगर किसी हिंदू की हत्या हो तो ज़ोर ज़ोर से चिल्लाओं हम तो बरसों से  गंगा जमुना संस्कृति के वाहक रहे हैं ।
•हत्या किसी मुस्लिम की हो तो ज़ोर ज़ोर से चिल्लाओं कि देश का लोकतंत्र ख़तरे में है।
•किसी हिंदू की हत्या हो तो उसे जाति में विभाजित कर दो कि ये तो दलित था या महादलित था। सार ये कि वो ये साबित करने का आख़िरी समय तक प्रयास करते रहते हैं    कि  वो एक हिंदू  नहीं था वरन फलां जाति से था  जिसके ऊपर सदियों से बड़ी जातियों ने अत्याचार किये हैं।
•इनकी नजर में हिंदू तो  विभिन्न जातियों के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है।

मैं यहाँ केरल,पश्चिम बंगाल और कर्नाटक  में हो रही राजनैतिक हत्याओं को बीच में नहीं लाना चाहता किन्तु ये भी तो सत्य है कि हैदराबाद में रमेश को  तड़पा तड़पा कर मार दिया जाता है,मंजुनाथ  की बंगलोर में गला काटकर हत्या कर दी जाती है,संतोष की भी बंगलौर में गोली मरकर हत्या कर दी जाती है आख़िर ये सब हत्याएं क्या बयां करती हैं। किन्तु भारत में जितने भी सो कॉल्ड सेकुलर गैंग अपनी रोजी रोटी चला रहे रहें उन्हें इन हत्याओं से कुछ लेना देना नहीं हैं। किन्तु अगर हत्या या हत्या का प्रयास किसी मुस्लिम या दलित के विरुद्ध किया गया हो तो फ़िर आप कल्पना भी नहीं कर सकते ये सारे गैंग कैसे समूचे भारत को बंधक तक बनाने से बाज़ नहीं आते।  उस समय ऐसा लगता है कि इस एक हत्या या उसके प्रयास भर से भारत का मजबूत लोकतंत्र तुरंत खतरे में आ जाता है ये ख़तरा कुछ कुछ ऐसा दर्शाया जाता है जैसे कि बात बात में मुस्लिम संगठन इस्लाम को ख़तरे में आया बताने लगते हैं। आख़िर ऐसे लोगों या गैंग से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है जिनका नज़रिया ही सेलेक्टिव हो।
आजकर इस गैंग ने एक नया पैतरा लागू किया है हिंदू की हत्या हो तो उसे दलित या महादलित के नाम से संबोधित करों ताकि हिन्दुओं का जाति आधारित विभाजन किया जा सके।उत्तर प्रदेश के कासगंज में 17 वर्ष के चन्दन की हत्या 26 जनवरी को तिरंगा यात्रा के दौरान कर दी गई। क्रोध तब आता है जब लोग बेसिरपैर के बयान देने लगते हैं कि “ तिरंगा यात्रा के लिए पुलिस से पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी ,अरे भैय्या कौन सी दुनियां में रहते हो क्या भारत में गणतंत्र दिवस के मौके पर भी तिरंगा यात्रा के पुलिस से अनुमति लेनी पड़ेगी ?हम लोकतंत्रन्तिक देश में रहते हैं जहाँ तिरंगा फ़हराने के किसी की भी अनुमति लेनी आवशयक है और स्वत्रन्त्र दिवस और गणतंत्र दिवस पर तो बिलकुल भी नहीं । उपरोक्त सभी गैंग इस बात से ज्यादा खुश होते हैं कि भारत में रहने वाले समस्त हिन्दुओं पर दमनात्मक कार्रवाई होती रहे  जिनमें दलित भी शामिल हों किन्तु  मुस्लिम को छोड़ दिया जाए।  अगर किसी मुस्लिम पर कार्यवाही होगी तो ये अपना गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाना शुरू कर देंगे फ़िर वो लेफ्ट हों या राइट।
अंत में मुझे एक गीत की दो पक्तियां याद आ गई “मरता है कोई तो मर जाए हम अपना निशाना क्यूँ छोड़े”  और इनका निशाना वर्तमान बी जे पी सरकार है ये इतना हो हल्ला मचाएंगे जैसे 1947 से 2014 तक भारत में राम राज्य था यहाँ दुध घी की नदियाँ बह रहीं थीं “अत्र कुशलम तत्रास्तु “ हम कुशल से हैं आशा हैं आप भी कुशल से होंगे की तर्ज पर किन्तु सत्यता इसके बिलकुल उलट है।पिछले लगभग चार वर्षों में भारत राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितना मजबूत हैं उतना पहले कभी नहीं था। अंकित सक्सेना की हत्या ने लोगों के दिलों में इतना रोष भर दिया है कि विपक्षी पार्टियाँ सहम सी गई हैं और बी जे पी हो या कांग्रेस या फ़िर डेल्ही पर राज कर रही “आप” सबको डर सताने लगा है कि अगर वे सेलेक्टिवेनेस दिखाएंगी तो अगले चुनाव में उनका सुपडा साफ़ भी हो सकता है।  और एक यक्ष प्रश्न यह भी है कि किसी भी राज्य में संसद सदस्य से लेकर कार्पोरेटर तक का चुनाव जनता क्यों करती हैं इसलिए कि वे सेलेक्टिव्नेस दिखाएँ इंसान इंसान में फ़र्क दिखाएँ अगर सरकारें ही पक्ष-पात करेंगी तो आम-जन क्या करेगा उसे तो संस्कृत का वही श्लोक याद आएगा ना कि “यथा राजा तथा प्रजा” तो फ़िर इसके बाद की स्थिति की भयावता का अंदाज आप स्वंय लगा लें।
-प्रदीप भट्ट-  मंगलवार,फ़रवरी 06,2018

Friday, 5 January 2018

मियां की जूती मियां के सिर




मियां की जूती मियां के सर



पिछले काफ़ी समय से अमेरिका और भारतीय राजनीती और मीडिया में ये चर्चा आम रही कि पाकिस्तान को बार बार समझाने के बावजूद भी वो अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा,लगता है इसका कुछ ठोस इलाज़ करना ही पड़ेगा ? अब मुझे कोई ये बताए कि पाकिस्तान ने आज तक किस बंदे की मानी है और तो और जिस अमेरिका से वह अपने देश का समस्त खर्च चलाने के लिए जन्म से ही भीख लेता रहा है  वह उसकी भी कहाँ सुनता है अब इसके कारण तो बहुत सारे हो सकते हैं किन्तु 70 के दशक में वह जहाँ अमेरिका का ही गुणगान करता रहा था वहीँ 1989 में सोवियत संघ की फ़ौज के पलायन के बाद उसका झुकाव जबरदस्त तौर पर चीन की ओर अधिक हो गया और उसने अपने फायदे के लिए अमेरिका और चीन दोनों को ही उलझाए रखने में अपनी भलाई समझी। बहुत पुरानी कहावत है कि दो नावों की सवारी ज्यादा दिन तक टिकती नहीं है । अब पाकिस्तान के साथ कुछ ऐसी ही स्थिति बनती नजर आ रही है। वह दोनों को खुश रखना चाहता है किंतु धीरे धीरे अमेरिका को ये बात समझ में आ रही है कि उसने पाकिस्तान पर 1947 के बाद से जो भरोसा किया था वह ग़लत था


1989 में जब सोवियत संघ ने अमेरिका के बढ़ते दबाव के आगे जब अफ़गानिस्तान छोड़ा तो वो अपने साथ अपना पूरा इंफ़्रास्ट्रक्चर नहीं ले जाए पाए इसी के साथ उन्होंने अपने बहुत से हथियार भी वहीँ पर तैनात रहने दिए क्यों की उनको वहां से उन्हें ले जाने में और सोवियत संघ लेकर जाने में और वहां पर असेम्बल करने में अधिक खर्च आ रहा था साथ ही मैनपावर की बचत अलग से हो रही थी। इन्हीं सब बातों के मद्दे नज़र सोवियत सेना अपने ज्यादातर हथियार अफ़गानिस्तान में ही छोड़ कर वापिस लौट गई सुनने में तो ऐसा भी आया कि सोवियत सेना जो हथियार अफ़गानिस्तान के सेना के लिए छोड़कर गई थी उन हथियारों को पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी के माध्यम से तालिबान ने चुरा लिया या हथिया लिया और इस सब के बूते ही तालिबान इतना अधिक मजबूत हो गया कि उसने पूरे अफ़गानिस्तान में अपना कब्ज़ा जमा लिया और चुन चुन कर बौद्ध और हिंदू मंदिरों को तोप के गोलों से उडवा दियायहाँ ये बात भी स्पष्ट है कि सोवियत सेनाओं का मुक़ाबला करने के लिए अमेरिका ने ही तालिबान को शय दी ताकि रोज़ रोज़ की लड़ाई से तंग आकर सोवियत संघ अफ़गानिस्तान छोड़ दे ।

सोवियत सेनाओं की वापसी के बाद अपने आप को मुसलमानों का  हितैषी बताने वाले तालिबान लड़ाकों ने पूरे अफ़गानिस्तान में इस्लाम और शरिया कानून  की अपनी व्याख्या से आम मुसलमानों तक का जीना हराम कर दिया था । शुरू शुरू में तो अफ़गानिस्तान के मुसलमान ख़ुशी ख़ुशी इन सब को आत्मसात करते रहे किन्तु शनैः शनैः उन्हें भी इस बात का अहसास हो गया कि वे कुंएं से तो निकले नहीं अलबत्ता वे अब कुएं और खाई के बीच में फंसकर रह गये हैंक्यों कि अफ़गानिस्तान पर सोवियत संघ के आक्रमण के समय सभी अफगानिस्तानी चाहते थे कि सोवियत संघ जल्द से जल्द अफ़गानिस्तान छोड़ दे ताकि वहां पर अफ़गानिस्तान की वास्तविक सरकार अपना शासन स्थापित कर सके किन्तु होनी को भला कौन टाल सका है । वही हुआ जिसका डर पूरे दक्षिण एशिया को ही नहीं वरन विश्व के सभी देशों को था। सोवियत फ़ौजें  तो अपने लाव लश्कर के साथ सोवियत संघ कूच कर गई लेकिन जाते जाते वो ऐसा भयानक मंजर पीछे छोड़ गई जिसकी कल्पना कोई दुश्मन भी नहीं करता है।
तालिबान को पालने पोसने में जहाँ अमेरिका के अपने हित थे वहीँ पाकिस्तान और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI  को भारत से 1948,1965 और 1971 में मिली  हार को गले से नहीं उतार पाई थी और चाहती थी कि वो तालिबान की मदद से भारत में तोड़ फोड़ की कार्रवाई को अंजाम देना चाहती थी। उसकी ये रणनीति काश्मीर और पंजाब में एक साथ करने की थी किन्तु किन्हीं कारणों से उसने इसे पहले पंजाब में खालिस्तान की मांग उठवाकर उग्रवाद को पाला पोसा अपनी इस चाल में पाकिस्तान किसी हद तक वो कामयाब भी रहा  किन्तु 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद स्थिति तेजी से बदली और के पी एस गिल के नेतृत्व में पंजाब से उग्रवाद का सम्पूर्ण सफाया हो गया।  किन्तु पाकिस्तान ने भारत से अपनी दुश्मनी निकालने की की अपनी जिद के चलते  काश्मीर में आतंकवाद को प्रश्रय देना शुरू किया और उसकी परिणिति स्वरूप  1990 के दौरान लगभग पांच लाख हिन्दुओं को जिनमें बड़ी संख्यां में कश्मीरी पण्डित थे को काश्मीर छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया उनकी बहु बेटियों की सरे आम इज्जत लुटी गई बूढों जवानों और बच्चों तलक को सरे आम मार या जला दिया गया जिससे आज़िज़ आकर कश्मीरी पंडितों ने काश्मीर से पलायन करना ही उचित समझाआप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उस समय की तात्कालिक सरकार ने ये सब होने दिया और किसी भी संगठन ने उनके प्रति दया भाव नहीं दिखाया,कोई मोमबत्ती गैंग नहीं कोई अवार्ड वापसी गैंग नहीं और ना ही संयुक्त राष्ट्र संघ जो छोटी छोटी बातों में अपनी उपस्थिति दर्ज करता है उन निरीह पंडितों के पक्ष में खड़े नहीं हुए और विश्व में पहली बार अपने ही देश में पांच लाख लोग बेघर हो गए।यही वो समय था जब दक्षिण एशिया में आतंकवाद ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिए थे और इस आतंकवाद के जनक के तौर पर सोवियत सेनाओं द्वारा छोड़े गए हथियारों के बल पर तालिबान और पाकिस्तान ने अपने आप को मजबूत किया और भारत के खिलाफ़ छद्म युद्ध छेड़ दिया जो बद-दस्तूर आज भी जारी है।
भारतीय जनता पार्टी की पिछली सरकार जहाँ 24 दलों के गठजोड़ से जैसे तैसे अपना कार्यकाल पूरा करने में सफ़ल रही किन्तु वो कोई ठोस कदम उठाने में असमर्थ रही। किन्तु 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत से बनी सरकार ने पिछली सरकारों के निर्णयों का पूरा पोस्ट मार्टम किया और उस तरह की समस्याओं को पनपने से पहले ही दबा दिया गया या कुचल दिया गया निश्चित रूप से ये सब देश हित में ही हुआ है । इस सरकार की विदेश निति का ही कमाल है कि भारत अपनी आजादी के बाद से पहली बार विश्व स्तर की राजनीती का केंद्र बन पाने में सफ़ल हुआ है। पूर्व की भांति सिर्फ़ पाकिस्तान से ही अपनी तुलना न करके वर्तमान सरकार ने चीन को भी आड़े हाथों लेकर विश्व पटल पर ये सन्देश देने की सफ़ल कोशिश की है कि हम अपनी संप्रभुता से कतई समझौता नहीं करने वाले। चीन को जहाँ डोकलाम पर पीछे हटने को मजबूर कर दिया वहीँ पाकिस्तान को जाधव केस में अंतर्राष्टीय अदालत में पटकनी देकर ये साबित कर दिया कि वर्तमान भारतीय सरकार अपने नागरिकों के प्रति काफ़ी संवेदनशील है व उसके अधिकारों की रक्षा के लिए वो किसी भी हद तक जा सकती है।

इस वर्ष की शुरुआत सोमवार से हुई है जो कि भगवन शिव को समर्पित दिन है। 2018 के प्रथम दिन ही अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा पाकिस्तान को गरिया दिए जाने से विश्व पटल पर जहाँ पाकिस्तान की छिछालेदर हुई है वहीँ ये मेसेज भी गया है की भारत अमेरिका को पाकिस्तान को गरियाने के लिए राजी करने में सफ़ल हुआ है । इसे ही सफ़ल विदेश निति कहा जाता है। इसी निति के तहत अगले ही दिन संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की राजदूत निक्की हेली ने पाकिस्तान को आतंकवादियों के विरुद्ध कार्यवाही न करने  पर लताड़ा और पिछले 15 वर्षों में अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी गई 33 अरब डॉलर की सहायता राशी के बदले अमेरिका को धोखा दिए जाने का आक्षेप लगाया और यहाँ तक कह दिया कि अमेरिका ने  पाकिस्तान पर  1947 से जो भरोसा किया है वह उसके लायक ही नहीं है साथ ही पाकिस्तान को अमेरिका द्वारा दी जा रही सहायता रोकने के लिए अपनी प्रतिबद्धता भी जताई। निक्की हैली इतने गुस्से में थीं कि उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि पाकिस्तान एक ही समय में अमेरिका के साथ दोस्ती का ढोंग करता है और दूसरी तरफ़ वह आतंक को पनाह भी देता है और वही आतंकवादी अफ़गानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की हत्या कर रहे हैं।

आख़िर पाकिस्तान चाहता क्या है उसकी कथनी और करनी में इतना अंतर क्यों है इसका सीधा सा कारण है कि वहां पर कठमुल्लों और सेना की चलती है आम आदमी कैसे जी रहा है इससे उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता । उनकी पूरी ज़िन्दगी उधार का घी पीने में निकल गई।1947 से अमेरिका उनको भीख देता रहा है जिस पर पूरा पाकिस्तान पलता रहा है लेकिन ये लोग अपनी आदत से मजबूर हैं इसलिए जिसका खाते हैं उसी को धोखा देते हैं। पिछले कुछ वर्षों से उन्होंने अपने लिए एक नया दोस्त पाल लिया है जो की चीन है लेकिन पाकिस्तान मुगालते में हैं कि अमेरिका नहीं तो चीन उसकों घी पिलाता रहेगा। चीन पाकिस्तान से भी बड़ा धोखेबाज है और धूर्त भी। वो जो भी कुछ करता है उसका एक ही मकसद है कि वो चाइना को कैसे मजबूत बनाए। उसके अपने नियम कायदे हैं जो उन पर खरा उतरता है वो उनकी मदद करने का नाटक करता है किन्तु मकसद सिर्फ़ सिर्फ़ चीन को और विस्तारवादी और मजबूत बनाना। चीन जनता है कि विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जो उसे प्रतिपल चुनौती दे सकता है इसलिए वो हर उस देश को भीख देकर अपना गुलाम बनाना चाहता है जो भारत को रोकने में उसका मददगार हो सके । लेकिन ऐसा होगा कभी नहीं।
-प्रदीप भट्ट-

                                 Friday, January-05, 2018

Saturday, 25 November 2017

फ़तवों का चक्रव्यूह





“फ़तवों का चक्रव्यूह “

दारुल उलूम देववृंद

आज जब चारों ओर संजय लीला भंसाली की फ़िल्म पद्मावती की चर्चा ज़ोरों पर है और राजपूत अपनी आन बान और शान के लिए अड़े हुए हैं और किसी भी कीमत पर फ़िल्म को रिलीज़ नहीं होने देना चाहतेतब य़क-बा-यक़  मुझे फ़तवों की याद आ गईमैं सोचने लगा कि क्या मुगलों से पहले या  बाद में भी फ़तवे देने की परम्परा थी और यदि थी तो किस रूप में और आख़िर कोई धर्म का अघोषित ठेकेदार कैसे अपने ही लोगों पर हास्यास्पद फ़तवे ठोक सकता है। आख़िर इन फ़तवों का क्या महत्त्व है और क्यूँ दिए जाते हैं? अपने आप को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने की होड़ ही इसकी जड़ है मुझे याद नहीं पड़ता इस तरह दूसरों के अधिकारों में दख़ल देने का फ़ैसला क्यूँ और किसने शुरू किया और उस काल खंड में इसकी क्या आवश्यकता थी।खैर एक बात जो मेरी छोटी सी  समझ में आ गई है वो यह है कि इंसान की जन्मजात फ़ितरत ही ऐसी है कि वो सामान्यता: अपने आप को दुसरे से ऊँचा कहें या श्रेष्ठ कहलाने या दिखलाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। और ये किसी एक धर्म में नहीं होता वरन ये हर धर्म में धर्म के ठेकेदारों में पाया जाने वाला वायरस हैजिसकी आमद निश्चित रूप से इस्लाम से ही हुई है। जहाँ और धर्मों में इसका प्रतिशत ना के बराबर है वहीँ इस्लाम में तो ये अपनी सारें हदें पार करता नज़र आता है और इसका कारण मुस्लिम्स का ज्यादातर पढाई लिखाई पर ध्यान ना दिया जाना हैमहत्वपूर्ण ये नहीं कि ये अशिक्षित हैं बल्क़ि ज्यादातर मुसलमान अपने बच्चों को शिक्षित करना भी नहीं चाहते इसका कारण जहाँ एक तरफ़ ग़रीबी है वहीँ दूसरी ओर ये अति के पिछड़ेपन के शिकार हैंबस जो मदरसों में पढ़ा दिया वही इनके लिए काफ़ी है  और यही कारण है कि आज भारतवर्ष और पूरा विश्वसमुदाय आतंकवाद की जिस विभीषिका से दो चार हो रहा है उसके बहुत सारे कारणों में से मदरसा कल्चर का मुस्लिम समुदाय पर हावी होना भी हैइस  मदरसा कल्चर में वहाबी विचारधारा के चलते ज्यादातर मदरसों ने लाखों की तादाद में आतंकवादी बनाए और उन्हें एक्सपोर्ट तक कर दिया जिसका खामियाज़ा आज पूरा विश्व भुगत रहा है

विश्व में जहाँ भी मुसलमान बसते हैं वे देववृंद विचारधारा को मानते हैं। दारुल उलूम फ़तवों को जारी करने के लिए प्रसिद्ध है इसके लिए यहाँ एक अलग विभाग भी है जिसका नाम दारुल इफ्ता है।100 से भी ज्यादा वर्षों से यहाँ से फ़तवे जारी किये जा रहे हैं। लोग अपनी शंका समाधान के लिए यहाँ से हर विषय ( सामाजिक मसले हलाल व् हराम शादी या अन्य )पर सवाल करते हैं यहाँ से हर वर्ष लगभग 1500 फ़तवे यहाँ से जारी किये जाते हैं। दारुल उलूम देववृंद की स्थापना 1866 और इफ्ता की स्थापना 1892 में हुई।अजिजुर्र्ह्मन दारुल इफ्ता के प्रथम मुफ़्ती के रूप में नियुक्त हुए थे। यहाँ से जो भी फ़तवे जारी किये जाते हैं उनका रिकॉर्ड रखने का चलन 1990 से शुरू हुआ ।1976 तक यहाँ से लगभग 4,50,000 फ़तवे जारी किये जा चुके हैं। जहाँ 2002 से ईमेल का इस्तेमाल शुरू हुआ वहीँ 2007 से उर्दू और अंग्रेजी में वेबसाइट शुरू की जा चुकी है। आइये कुछ महत्वपूर्ण फ़तवों पर नज़र डालते हैं जिनके कारण इस्लाम ख़तरे में आ जाता है

  • ·        मुस्लिम औरतों का बाल कटवाना और आइब्रो बनवाना इस्लाम और शरियत के अनुसार ग़लत है ।


  • ·        अगर कोई व्यक्ति अपनी या अपने परिवार की फोटों फ़ेस बुक,ट्विट्टर इनस्टाग्राम पर डालना हराम माना गया है। जब कि फ़तवा देने वाले दारुल उलूम देववृंद के मौलाना स्वंय ये सब कार्य बड़े ज़ोर शोर से कर  रहे हैं साथ ही एक से बढ़िया एक स्मार्ट फोन का भी लगातार इस्तेमाल कर रहे हैं? 


  • ·        ओरल सेक्स के लिए पूर्णतया मनाही का फ़तवा जारी किया गया है


  • ·        होम्योपथिक दवाइयों में पड़ने वाले अल्कोहल को हराम बताया गया है।


  • ·        पुरुष शेविंग और उनिसेक्स सैलून का धंधा नहीं कर सकते क्यों कि इस्लाम में ये हराम है।
  • ·        सरकार के आबकारी विभाग का मंत्री बनना और यहाँ तक की नौकरी के लिए भी इस्लाम अनुसार मनाही है।


  • ·        किसी भी प्रकार के डिजिटल लेन दें को गैर इस्लामी घोषित किया गया है।


  • ·        पुरुष और औरतें हस्तमैथुन नहीं कर सकती इसे इस्लाम में गुनाह-ए-अजीम माना गया है।


  • ·        मुस्लिम महिलाऐं नौकरी नहीं कर सकती साथ ही राजनीती में आना भी उनके लिए गैर इस्लामी है।


  • ·        आप किसी भी कारण से खून की अदला बदली तो कर सकते हैं किन्तु अपने शरीर का अंगदान नहीं कर सकते क्यों कि ये गैर इस्लामी है।


  • ·        नसबंदी नाजायज लेकिन अगर महिला की जान खतरे में हो तो जायज ?


  • ·        करगिल युद्ध के दौरान लापता मान लिए गए आरिफ़ को जब 2003 में पाकिस्तानी जेल से मुक्ति मिली तो उसकी बीवी का निकाह हो चुका था।सुझाव माँगा गया और सुझाव आया कि वह पहले पति के पास लौट जाए अन्यथा उसकी शादी अवैध मानी जाएगी।


  • ·        2005 में इमराना के ससुर ने उसके साथ बलात्कार किया,पंचायत हुई और फ़ैसला आया कि इमराना अपने शौहर मुहम्मद अली  को अपना बेटा माने।इस फ़ैसले पर दारुल उलूम देववृंद ने भी पंचायत के फ़ैसले पर मोहर लगाई ?


फ़तवा अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका तात्पर्य है सुझाव जो मांगने वाले और देने वाले के मध्य का मसला है किन्तु ये आवशयक नहीं कि जिसने मुफ़्ती से प्रश्न किया है वह मुफ़्ती द्वारा दिए गए उत्तर या सुझाव से सहमत भी हों अतएव ये प्रश्न पूछने वाले के विवेक पर निर्भर है कि वह मुफ़्ती द्वारा दिए गए उत्तर से यदि संतुष्ट है तो उसे माने या ना माने ऐसा भी नहीं कि दारुल उलम ने जितने भी फ़तवे दिए वो सभी विवादित फ़तवे ही   जारी किये गए होंअंग्रेजों की दासता के खिलाफ़ भी स्वतंत्रता आंदोंलन के दौरान तरके ए मवालात यानि आर्थिक बहिष्कार और 2008 में आतंकवाद को लेकर जिसमें कहा गया कि “किसी बेगुनाह की जान लेना हराम है और ये इस्लाम के सख्त विरुद्ध है


मेरी समझ में ये बात आज तक नहीं आई कि छोटी छोटी बातों पर इस्लाम खतरे में कैसे आ जाता है क्या उपरोक्त बातें ये साबित नहीं करती कि बेवजह मुस्लिम पुरषों ने मुस्लिम महिलाओं को शोषित श्रेणी में रखने के लिए ही ये फ़तवे का चक्कर नहीं चलाया। अन्यथा क्या कारण है कि ऐसे बहुत सारे फ़तवे दिए गए जिनको किसी भी एंगल से जायज नहीं ठहराया जा सकता ,वो दिए ही सिर्फ़ इसलिए गए कि महिलाऐं घरों में बंद रहे। खाना बनाएं,बेहिसाब बच्चे पैदा करें और अपने शौहर की जब तब जूतियाँ खाती रहें अगर कोई दूसरी औरत या लड़की पसंद आ जाए तो अपनी बीवी को बिना किसी वजह के तलाक दे दिया जाए ताकि वह एक और घर बर्बाद कर सके और ये सिलसिला बेरोकटोक चार शादियों तक चलता रहता है क्यों कि इस्लाम में इसे जायज ठहरा दिया गया है (वास्तविकता किसी को पता नहीं)। इस्लाम में हलाला एक ऐसी प्रथा है जिस पर स्वर्गीय मीना कुमारी ने कहा था कि ये प्रथा एक भली स्त्री को वैश्या में तब्दील कर देता है।

अंत में आख़िर क्या कारण है कि मुस्लिम समुदाय अपने धर्म में पल रही कुरीतियों को समाप्त करने का कोई प्रयास क्यों नहीं करता जब कि अन्य धर्मों में समय समय पर इस प्रकार की कुरीतियों को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए लोग आगे आते रहे हैं इनमें प्रथम नाम राजा राम मोहन रॉय का है जिन्होंने सती प्रथा के ख़िलाफ़ न केवल अपनी आवाज को बुलंद किया बल्कि इस जन मानस तक को जोड़ दिया जिसका परिणाम भी सबके सामने है कि भारत वर्ष से सती प्रथा अब लुप्तप्राय हो गई। राजा राम मोहन रॉय ने केवल सती प्रथा का ही विरोध नहीं किया वरन विधवा विवाह पर भी बहुत कार्य किया । आज पूरा भारतीय समाज उनका ऋणी है । ऐसा ही कोई आन्दोलन मुस्लिम समुदाय से क्यों नहीं निकलता ताकि मुस्लिम महिलाओं को गुलामी से आजादी मिले वे भी मुख्यधारा से अपने आप को जोड़ सके ,अपने बच्चों को पढाई लिखाई पर ध्यान दे सकें उनको अपने पैरों पर खड़े होने में संबल प्रदान कर सके । आतंकवाद के विरोध मुस्लिम समाज द्वारा  आन्दोलन क्यों नहीं किये जाते, मुस्लिम महिलाओं को तलाक/हलाला के भंवर जाल से मुक्ति के लिए कोई आन्दोलन क्यों नहीं निकलता,क्यों नहीं इस्लामिक विद्वान देश में बढती जनसँख्या पर रोक लगाने के लिए आगे आते। ये सब कार्य हो सकते हैं अगर हमारे दिल साफ़ हों, हम वास्तव में सबको एक नजर से देखने का नज़रिया रखना शुरू करें तो कुछ भी असम्भव नहीं। बस ज़रूरत है तो शुद्ध और व्यापक सोच की ।
                                                                                                (courtesy IT)

                                                                   -प्रदीप भट्ट-

                                 Satarday, November 25, 2017