Saturday, 4 November 2023

मज़ा जीने का तुम जो चाहो

रिपोतार्ज

मज़ा जीने का तुम जो चाहो तो दून चले आओ जी दून चले आओ


मज़ा जीने का गर जो चाहो तो अंदर चले आओ जी अंदर चले आओ। ये फिल्म का गाना है जो आज यूं ही याद आ गया तो मैंने इसे कुछ यूं कर दिया मज़ा जीने का तुम जो चाहो दून चले आओ जी दून चले आओ। कारण बना अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका प्रज्ञान विश्वम के पांचवे अंक के लोकार्पण का जो की देहरादून के सुभाष सैनी जी पर केंद्रित था। आदरणीय नीरव जी ने सूचना दी कि ये प्रज्ञान विश्वम का विषेष अंक सुभाष सैनी जी पर है आप लोकार्पण का हिस्सा बनने के लिए तैय्यार रहिए। दो तीन दिन के बाद अग्रज सैनी जी का फ़ोन आ गया कि आपको आना ही पड़ेगा, अब अग्रज के आदेश को टालने की हिम्मत कौन करेगा। हमने सहर्ष अपनी सहमति प्रदान कर दी। 🙏🏾

हमारे अतिरिक्त गुरुग्राम हरियाणा से निगम दम्पत्ति ,( राजेंद्र निगम एवम इंदु निगम जी) एवम राजेश प्रभाकर भी लोकार्पण का हिस्सा बनने के लिए देहरादून पहुंच रहे थे । सो 29 अक्तूबर को हम भी पहुंच गए देहरादून पिछले 43 बरस की यादों को संजोए। सैनी जी ने होटल हिल व्यू में रहने की व्यवस्था की हुई थी। लगभग 2 बजे होटल पहुंचा तो राजेश प्रभाकर पहले ही वहां विराजे मिले। नमस्कार चमत्कार, (बस यूं ही लिख दिया चमत्कार होना भी क्या था) राजेश जी ने कहा पहले खाना खा लें, मैं तो खा चुका हूं मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा आज दिन के खाने की छुट्टी। सैनी जी ने प्रोग्राम के बाद घर पर डिनर  रक्खा हुआ है सो......🤝

उत्तराखंड के शिक्षा विभाग के सहस्र धारा स्थित डायट के सभागार में नियत समय पर कार्यक्रम शुरु हो गया। मै स्वयं समय का पाबंद हूं इसलिए मुझे नीरव जी की यही बात पसंद आती है कि वे सामान्यत कार्यक्रम समय से शुरु कर देते हैं । यहां भी ऐसा ही हुआ। टैक्सी ड्राइवर ने होटल से डायट पहुंचने में कुछ ज्यादा ही समय लिया ख़ैर फिर भी हम 3.50 पर पहुंच गए। अध्यक्षता एम एम घिड़ल्याल जी ने की।दीप प्रज्ज्वल के पश्चात् सुमन सैनी जी द्वारा सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की। थोड़ी देर बाद ही वह शुभ समय आ गया जब प्रज्ञान विश्वम के विषेष अंक का लोकार्पण समृद्ध मंच द्वारा सम्पूर्ण हुआ। उसके बाद आदरणीय नीरव जी के सधे हुए संचालन में कविता पाठ प्रारम्भ हुआ। एक से बढ़कर एक कवि कोई श्रृंगार पर पढ़ रहा था तो कोई व्यंग्य पर कोई ओज पर तो कोई हास्य पर। कुल मिलाकर बेहद उम्दा कवि सम्मेलन संपन्न हुआ। मैंने भी अपनी एक रचना प्रस्तुत की।

नमक दरिया में थोड़ा सा मिला दूं
मैं अपनी आंख का आंसू गिरा दूं
     के अतिरिक्त

पानी ऊपर पानी लिक्खूं या फिर कोई कहानी लिकखूं 
ख़ुद को बतलाऊँ मैं राजा और तुम्हें क्या रानी लिक्खूं 

प्रोग्राम के बाद सैनी जी के घर जमी महफ़िल ने पुराने दिनों की याद ताज़ा कर दी जब रात में देर तलक कवि गोष्ठी में ऊंघते रहते थे लेकिन बैठे रहते थे क्या पता अपना नंबर आने वाला हो और हमें सोता समझकर कोई दूसरा अपनी कविता न चेप दे। ब्राह्मण को यदि बढ़िया खाना खाने को मिल जाए तो बल्ले बल्ले। रात बारह बजे होटल वापिसी। सुबह सात बजे सहस्र धारा पहुंच गए फिर से यादें ताज़ा करने। लेकिन 20=22 बरस पहले की अपेक्षा सहस्र धारा थोड़ा नहीं काफ़ी बदल गया हमने एक को रोककर पूछा तो बोला हुज़ूर ये सब चेंच 2014 के बाद ही आया चिकनी चिकनी 🛣️ सड़के इलैक्ट्रिक बस electrik 🚌 वगैरह फिर जय श्री राम कहते हुए निकल लिया भाई। हमने भी जय श्री राम बोलते हुए सहस्र धारा में नहाने का लुत्फ उठाया फिर वापिस होटल। नाश्ते के बाद सामान समेटा और राजेश जी को एयरपोर्ट रवाना कर हम भी प्रेमनगर पहुुंच गए। 1 नवंबर की सुबह 5 बजे की ट्रेन छुट गई सो बस से वापिस मेरठ सुनहरी यादों के संग।

एक अच्छे और सुनियोजित कार्यक्रम के लिए नीरव जी सैनी जी को हार्दिक शुभेच्छा ।
सैनी जी बेहतरीन आवभगत के लिए हृदय से धन्यवाद।


प्रदीप DS भट्ट 41123

Wednesday, 25 October 2023

हीरो हो तो लगो भी मियां वरना.....


रिपोतार्ज़

"सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है"

आप सोच रहे होंगे आज रिपोतार्ज़ का शीर्षक कुछ अज़ीब सा क्यूँ है। भैइय्य्या जब ससुरी ज़िंदगी में तूफ़ान ही तूफ़ान हों तो कोई क्या करे।बचपन से एक उक्ति सुनते आ रहे हैं कि:😉

"क़िस्मत में हों कंकर, तो क्या करेंगे शंकर"

अब ऐसा लगता है कि ये उक्ति विशेष तौर पर मेरे लिए ही लिखी गईं है। जीवन के तीसरे प्रहर में लकड़ी वाले से, पेंट वाले से प्लम्बर इत्यादि से इतना अत्याचार होना लिखा था सो भईय्या भोग रहे हैं।😔 काफी नुक़सान झेलकर एक सीख मिली कि बेटा ज़रूरत से ज़ियादा दरियादिल भी अच्छी नहीं होती। कुछ प्रजाति ऐसी होती हैं जिनकी पूँछ कभी सीधी नहीं होती अलबत्ता ये प्रजाति नलकी टेढ़ी करने में दक्ष होते हैं। प्रणाम है ऐसी प्रजाति को !🐶

ख़ैर इसी ऊहापोह में के मध्य नौयडा से आदरणीय नीरव की फ़ोन पर मधुर वाणी सुनी। आग्रह था 13 अक्टूबर को हिन्दी भवन में हाज़िर होना है। जीवन में कुछ लोग ऐसे भी होने चाहिए जिनका आग्रह आदेश के बराबर हो सो नीरव जी उन्हीं चंद विभूतियों में से एक हैं।🔱 एक दिन पूर्व ही प्रिय राजेश प्रभाकर जी गुरुग्राम से भी आमंत्रण/निवेदन प्राप्त हो गया। हमने भी सोचा प्रोग्राम तो सायं 4 बजे से है तो क्यूँ न प्रकशाधीन पुस्तक " उरनाद  " का हाल चाल ले लिया जाए सो पहुँच गये सेक्टर 19 स्थित इंडिया बुक के ऑफिस में। इंडिया बुक के सर्वेसर्वा डॉक्टर संजीव एक बेहतरीन इंसान हैं।बिना लाग लपेट के बात करना पसंद करते हैं। बेहतरीन ☕काफ़ी के साथ लगभग डेढ़ घण्टे की गुफ़्तगू के बाद उनसे विदा ली।

मुझे लगा सेक्टर 19 से हिन्दी भवन (ITO) एक डेढ़ घंटा तो लगेगा किंतु मैं लगभग 45 मिनिट बाद ही हिन्दी भवन के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा था "मैं हूँ हसीना खोल दरवाज़ा दिल का, आ गया दीवाना तेरा" की तर्ज़ पर। हॉल में एंट्री की तो सामने कुसुम सिंह 'अविचल' कानपुर के दर्शन हो गए। हम दोनों ही एक दूसरे को देखकर चौंक गए क्यूँ कि अभी 30 सितंबर को ही मैं उनकी पुस्तक के विमोचन में लखनऊ में उपस्थित था। काफ़ी देर तक बात चलती रही फ़िर स्वरूप किशन जी कि एंट्री हुईं जो इस कार्यक्रम के मुख्य आतिथि थे। इनसे पिछले वर्ष नवंबर में मेरठ लिटरेरी फेस्टिवल में मुलाक़ात हुईं थी। धीरे धीरे हॉल भरने लगा। बहुत सारे चिरपरिचत चेहरे मुस्कान बिखेरते हुए मिल रहे थे तभी राजेश प्रभाकर जिनकी शान में ये कार्यक्रम रखा गया था। चौंकिये मत राजेश प्रभाकर जी का 13 अक्टूबर को अवतरण दिवस था। लोग 13 तारीख़ को अच्छा नहीं मानते किंतु हम सब की तो निकल पड़ी। थोड़ी देर में नीरव जी मधु जी के साथ उपस्थित हुए। मैं सोच रहा था अवतरण दिवस किसका है राजेश प्रभाकर या नीरव जी का। भईय्या हीरो तो वही लग रहे थे न👩‍❤️‍👨।अच्छी बात ये रही कार्यक्रम समय से शुरू हो गया। 

सायं 4 बजे से लगभग 10 बजे (सूत्रों से मिली सूचना के आधार पर) चलता रहा। कुछ आत्ममुग्धता के शिकार लोगों को ये समझना होगा कि वे कार्यक्रम की शालीनता को बनाए रखने में यदि सहयोग नहीं करते तो एक न एक दिन मुझ जैसे सिरफ़िरे से उलझना पड़ सकता है। मैं और स्वरूप किशन जी 8:50 पर विदा लेकर मेरठ के लिए निकल लिए और रात्रि 11:15 घऱ वापिस।Thx स्वरूप किशन जी।

-प्रदीप DS भट्ट-19102023

Sunday, 24 September 2023

कमिटमेंट है तो है

रिपोतार्ज

     "कमिटमेंट है तो है"

सृजन एजुकेशन ट्रस्ट 
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सृजन एजुकेशन ट्रस्ट यानि SET
की निदेशक/अध्यक्ष रश्मि रंजन का फ़ोन आया अत्र कुशलम तत्रास्तु के उपरांत सूचना दी कि सर set का पहला बर्थडे है,16 अक्टूबर को आपको तो आना ही पड़ेगा। अनुजो को पूरा हक है कि वे अग्रजो से बात मनवा लें 😁 ख़ैर मैंने एक सुझाव रखा कि बेहतर होगा कि यह कार्यक्रम पहले रख लिया जाए या बाद में क्यों कि १९ से २८ तक गणेशोत्सव फिर श्राद्ध पक्ष शुरू हो जाएंगे। मेरी बात को तवज्जो दी गईं और लीजिए हुज़ूर २० सितंबर फाइनल हो गया। मैंने भी टिकिट वगैरह बुक की और निवेदन किया कि मेरे लिए एक होटल की व्यवस्था कर दी जाएगी। जिसे अमान्य कर दिया गया और बताया गया कि आपको सीधे घर पहुंचना है बिना किसी अन्य को सूचना दिए।🤣 पिछला अनुभव ख़ैर जैसी प्रभु की इच्छा!

15 को भरी बारिश में पहले मेरठ से नोएडा अगली पुस्तक "उर नाद" के प्रकाशन की चर्चा हेतु फिर आदरणीय नीरव जी के साथ लंच और केरलम महोत्सव पर गहन चर्चा हुई फिर वहां से सीधे निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन। 🚂 ली और सुबह ११ बजे भोपाल। और ये क्या बारिश हमारे स्वागत के लिए पलक पांवड़े बिछाए तैय्यार जैसे कह रही हो राजा भोज की नगरी में मेहमानों का स्वागत ऐसे ही होता है। मित्र थोड़ा विलंब से पहुंचे तब तक हमने स्टेशन मैनेजर से स्टेशन पर और शौचालय में पसरी हुईं गंदगी और कुव्यवस्था पर अपनी नाराज़गी दर्ज़ करा दी।

झमाझम होती बारिश में अक्षय बंसल जी गाड़ी सहित स्टेशन पर हाज़िर। सीधे जा पहुँचे उनके इको सेंटर पर वैसे तो हम चाय नहीं पीते लेकिन मौसम को देखते हुए हाँ भर  दी। शाम को एक गोष्ठी निश्चित थी किंतु बारिश बारिश और सिर्फ़ बारिश क्या करते। जैसे तैसे नियत वैन्यु पहुँचे,थोड़ी देर इन्तेज़ार किया फ़िर मैं अक्षय जी रुपाली सक्सेना और उनके सुपुत्र अविरल जो इंदौर में रहकर B Tech कर रहे हैं एक मात्र श्रोता की उपस्थिति में कविताओं का दौर चालू हो गया। ❤️ प्रिय रुपाली उपहार स्वरूप माँ सरस्वती की मूर्ति लेकर आईं थीं जिसे लेने से मना नहीं किया जा सकता था। thx dear। पेटपूजा के बाद अक्षय जी ने रानी कमलावति  रेलवे स्टेशन ड्रॉप किया। 17 की तड़के यानि 12:40 ट्रेन ली और 11 बजे नाशिक मित्र ऋषि देव के पास। अगले दिन सुबह 5 बजे कार से पूना और उसी दिन 11 बजे वापिसी। रास्ते में  पता चला मुंबई से वडोदरा की ट्रेन ज़ियादा बारिश के कारण कैंसिल हो गईं है। बड़ी पशोपेश में पड़ गया फ़िर और कोई रास्ता न देखकर फ्लाइट की टिकिट निकाली। रश्मि से  कमेंटमेंट किया है सो पहुंचना तो है। कमिटमेंट है तो है 🤛।

19 को नाशिक से सुबह सुबह  निकले 11बजे मुंबई दोस्तों से मिले डॉक्टर नागर के साथ लंच लिया शाम को अरुण भाई से गुफ़्तगू की और सीधे एअरपोर्ट। 20 की सुबह फ्लाइट ली और सीधे वडोदरा। शाम को सृजन एजुकेशन ट्रस्ट के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित हुए। अच्छी खासी तादाद में लोकल सहित्यकारों ने अपनी  उपस्थिति दर्ज़ कराई। बढ़िया कवि गोष्ठी संपन्न हुईं। तभी गोकुल क्षत्रिय अपने मित्र के साथ बारिश से लड़ते झगड़ते कई वाहनों में सफ़र करते हुए कार्यक्रम में पहुँच ही गये। पिछले वर्ष की गोवा की यादें ताज़ा हो गईं। 

अगले दिन बंसल जी से मुलाक़ात हुईं फ़िर एक मित्र के यहाँ लंच लिया और शाम को आद्या के हाथ की बनी हुईं स्पेशल आइसक्रीम का आनंद लिया ही था कि प्रिय रंजन सिंह (रश्मि जी के पतिदेव ) ने एक थैला जिसमें फ्रूट, खाखरा नमकीन कुछ और भी साथ में था मेरे हाथ में थमा दिया। मुझे सृजन द्वारा प्रदान किये पौधे को विशेष रूप से पैक करके दिया गया ताकि घऱ तक पहुँच जाए। घऱ से कुछ पहले ऑटो में आते हुए रंबल स्ट्रीप पर खाखरा साथ में कुछ और भी थैले से निकलकर धरती मईय्या पर बिखर गये जैसे कोई लड़की मायके में आकर ख़ुशी में बिखर गईं हो ग़नीमत रही मैंने समय रहते पौधे को संभाल लिया जो आज सूर्य की रश्मि से आलोकित होकर  बॉलकनी में मुस्कुरा रहा है। 

अंत में 15 सितंबर से शुरू हुआ सफ़र 22 की सायं पर संपन्न हुआ। इन सभी दिनों में एक भी दिन ऐसा नहीं था जिस दिन मैंने यात्रा न की हो। एक यादगार प्रवास की ख़ूबसूरत यादें संजोय जब सुबह उठा तो सोचा अख़बार की सुर्ख़ियां बाद में पहले रिपोतार्ज ही बना लूँ। 🤗🤗🤗

प्रदीप DS भट्ट -23923

Tuesday, 22 August 2023

"प्रदीप बाबू बढ़िया है"

रिपोतार्ज़


            "प्रदीप बाबू बढ़िया है"

अगर मैं अपनी साहित्यिक यात्रा का पुनर्रावलोकन करने बैठूं तो इसका आगाज़ स्कूली पत्रिका संभावना में प्रकाशित मेरी पहली कविता "शहीदों का मज़ार" जिसकी अंतिम पंक्तियाँ कुछ यूँ थी:-

"तभी अनिश्चय के बादल में बिजली चमकी, 
रस्ता पाया
याद मुझे फिर ये दिन आया
दौड़ा दौड़ा गया शहीदों के मज़ार पे
इन फूलों का हार उन्हीं पर जा चढ़ाया"

निश्चित रूप से मेरी प्रथम कविता माखनलाल चतुर्वेदी की कविता सुमन की चाह से प्रभावित थी।
फिर नाटक, कहानी लिखते लिखते कविता से दिल लगा बैठा😊 ग़लत न समझें ये शब्दों वाली कविता का जिक्र है मांसल देह वाली कविता का नहीं😁 फिर आकाशवाणी में वार्ता प्रसारित हुई फ़िरनौकरी वग़ैरह वग़ैरह। दिल्ली से मेरठ से मुम्बई फिर हैदराबाद यानि साहित्यिक पारियाँ कभी exprsss ट्रेन सी कभी पैसिंजर ट्रेन से चलती रही।

       अब नौकरी है तो रिटायरमेंट भी है सो सोचा रिटायरमेंट से पहले ज़्यादा न सही कुछ शांत वातावरण में एक कुटिया या फ्लैट ले लिया जाए सो मई में मेरठ में शहर की सरहद से बाहर एक फ़्लैट ले लिया। शांत सौम्य वातावरण हरे भरे खेत, लाईट की आँख मिचौली साथ ही नेटवर्क समस्या सो अलग लेकिन अच्छी जगह एवम शांत वातावरण के सामने ये समस्या कुछ भी नहीं😃 

     अभी मेरठ के मित्रों को सूचना नहीं दी है कि "गब्बर इज़ बैक"😊  पहली बार अहसास हो रहा है फ़्लैट लेना अलग बात है और इंटीरियर के नाम पर मानसिक क्लेश किसे कहते हैं। बन्दों का काम है कि ख़त्म ही नही हो रहा ख़ैर आदरणीय नीरव जी से ज़रूर संपर्क बना रहा। 16 अगस्त को आग्रह कि आपको 20 अगस्त को गुरुग्राम के कार्यक्रम में शिरक़त करनी है। शाम को राजेश प्रभाकर जी का कॉल आ गया (मेरा राजेश से प्रथम परिचय 26 अप्रैल-2022 को राजपाल यादव जी के निवास पर हुआ था इत्तिफ़ाक़ ये कि एक ही शहर में होने के बावज़ूद राजेश जी और राजपाल जी पहली बार मिल रहे थे और मुलाक़ात का माध्यम मैं बना) सो जब राजेश जी ने स्वर साधना के कार्यक्रम में उपस्थित होने का आग्रह किया तो मैंने सहर्ष हामी भर ली।

      20 अगस्त-2023 प्रात: 4:30 के अलार्म से दिनचर्या शुरू हुई। सामान्य परस्थितियों में मुझे समय से कार्यक्रम में पहुँचने की आदत है फिर चाहे आमंत्रण अतिथि के तौर पर हो या विशिष्ट अतिथि के तौर पर हो या कि फिर कार्यक्रम अध्यक्ष के तौर पर। मुझे ख़ुशी है कि उत्तर प्रदेश से चलकर दिल्ली से हरियाणा के गुरुग्राम तक मैं 09:58 पर कार्यक्रम स्थल के प्रांगण में प्रवेश कर चुका था।स्वागत प्रिय राजेश श्रीवास्तव ने किया फिर आदरणीय नीरव जी, मधु जी,यशपाल जी राजेश प्रभाकर प्रिय अनुज अवधेश कनौजिया, कुमार राघव, कुलदीप कौर मोनिका शर्मा इत्यादि ।कुछ अपरिचित चेहरे भी थे जिनसे मेरा प्रथम बार परिचय हो रहा था। जिनमें पंकज जौहरी कृष्ण गोपाल सोलंकी सुनील शर्मा प्रेम बिहारी मिश्र इत्यादि।

  थोड़े से विलम्ब से ही सही कार्यक्रम आदरणीय नीरव जी की अध्यक्षता में प्रारम्भ हुआ। नीरव जी को जर्मनी के प्रतिष्टित मैक्स मूलर सम्मान से नवाज़ा गया है। स्वर साधना संस्था द्वारा नीरव जी की इस उपलब्धि पर ही ये विशेष कार्यक्रम माधव सेवा केंद्र में उनके सम्मानार्थ आयोजित किया गया।वरिष्ठ साहित्यकार अशोक जैन जी विजय प्रशान्त, प्रिय रमाकांत (पूरे कार्यक्रम में एक्टिव रोल निभाया) प्रिय सुनीता सिंह के मधुर स्वर में सरस्वती वंदना सुनकर 'स्वर साधना मंच" अभिभूत हुआ। "अह्म ब्रह्मास्मि" की सर्वेसर्वा दीपशिखा जी संस्था का नाम बहुत ही सुंदर रक्खा है। सभी उपस्थित कवियों ने रचना पाठ करके कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई। ये देखकर अच्छा लगा कि प्रिय मोनिका शर्मा औऱ राजेश श्रीवास्वत का इस बात पर फोकस करते रहे कि कार्यक्रम में कोई त्रुटि न रह जाए । मेरी नज़र में इस कार्यक्रम की यही उपलब्धि रही कि स्वर साधना मंच को दो कर्मठ सहयोगी मिल गए। दोनों को आशीष।

       भोजनोपरांत हम ठीक 4 बजे निकले और से:सायं ९:15 मेरठ। तो भैय्या एक यादगार यात्रा एक यादगार कार्यक्रम कुछ नये मित्रों से मुलाक़ात या यूँ कहूँ तो ज्यादा बेहतर कि कुल मिलाकर एक यादगार दिन। 
स्वर साधना मंच प्रगति पथ पर सदैव अग्रसर रहे और साहित्यिक आकाश पर अपने लिए एक विशेष स्थान बनाएं।
टीम "स्वर साधना मंच" शुभेच्छा।
राजेश प्रभाकर जी को विशेष🌹🌹

Monday, 14 August 2023

मानवाधिकार की धज्जियाँ उड़ाता पाकिस्तान




“मानवाधिकार की धज्जियां उड़ाता पाकिस्तान और बांग्लादेश 
और वहाँ अपना अस्तीत्व तलाशते हिन्दू”


      पिछले कुछ समय से देश मे हिन्दू-मुस्लिम और बीफ विविद की चर्चा ज़ोरों पर है। अब हम सभी इन बे-सिर पैर की बातों मे उलझकर रह गए हैं। हाँ इतना ज़रूर हुआ की कुछ छद्म साहित्यकारों ने अपने अवार्ड वापिस करने की एक मुहिम चलाई जिसकी शुरुआत तो उदय प्रकाश ने की लेकिन अवार्ड वापिस किया काफी देर से । खैर इस विषय पर मै पहले ही काफी कुछ लिख चुका हूँ। आज हम पाकिस्तान और बांग्लादेश मे हिन्दुओ कि दुर्दशा पर चर्चा करेंगे ।

      पिछले दिनों पाकिस्तान और बांग्लादेश मे हिन्दुओ की स्थिति पर पढ़ने सुनने और समझने का मौका मिला और ये जानकार आश्चर्य हुआ की भारत मे लगभग 18-20 करोड़ मुस्लिम इन दोनों देशो के मुक़ाबले कितने सुखी और सुरक्षित हैं। आइये एक बानगी देखते हैं।

      1947 मे जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान नामक देश अस्तीतव  मे आया उस समय पाकिस्तान मे हिन्दुओ की जनसंख्या लगभग 15% थी जो की 1981 आते-आते घटकर 5% रह गई। और अब हिन्दू और सिखों को मिलकर तो ये मात्र 1.6% रह गई है।




  1986-90 तक हिन्दू परिवारों के साथ हुआ जो हुआ  वो कितना  वीभत्सकारी था इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की आज कश्मीर मे कुल 808 हिन्दू परिवार बचे हैं। उस दौर मे कश्मीरी पंडितो के साथ जो कुछ किया गया क्या वो मानवता के ऊपर कलंक नही था। लाखो हिन्दुओ को बेरहमी से मारा गया उनकी बहू -बेटियो की इज्ज़त लूट ली गई पुरुषो और बच्चों का बेदर्दी से कत्ल कर दिया गया। पाँच लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितओ को दर-बदर होना पड़ा अलग से । मुझे याद नहीं पड़ता कि बुद्धिजीवी ने इस पर उफ भी हो यहाँ तक आज जो पुरुसकर वापिसी का नाटक चलाया जा रहा है तब किसी ने भी ऐसा कोई कदम उठाने का साहस क्यों नहीं किया। मेरी समझ से ये बात सिरे से समझ मे नहीं आई कि इस विषय पर पहले और आज तक भारत सरकार का रुख स्पष्ट क्यों नहीं रहा। क्यों नहीं मानवाधिकार आयोग खामोश क्यों है। जिन छोटे –छोटे मुद्दो पर राजनीति की जा रही है क्या कश्मीरी पंडितो का मुद्दा उनसे भी छोटा है ?



      अब बात करते हैं बांग्लादेश की जिसका जन्म ही भारत की बदोलत 1971 हुआ अन्यथा क्रूर पाकिस्तानी आर्मी ने जितना ज़ुल्म पश्चमी पाकिस्तानी प्रांत पर कर रखा था उससे ऐसा प्रतीत होता था कि पश्चिमी पाकिस्तान जल्द ही नर विहीन हो जाएगा। ये तो भला हो तत्कालीन  भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरागांधी का जिनहोने समय रहते व  सही निर्णय लेते हुए जनरल मानेकशा को भारतीय सेनाओ को दखल देने के लिए कहा। किन्तु भारत के रहमो करम से मिली आज़ादी के बाद बांग्लादेश मे किस तरह हिन्दुओ का उत्पीड़न हो रहा है। वहाँ हिन्दुओ को दोयम दर्जे का नागरिक भी नहीं माना जाता क्यो ? वहाँ पर भी हिन्दुओ कि बहू-बेटियो के साथ बलात्कार करना तो आम बात है। बांग्लादेश मे हिन्दुओ कि गति क्या है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1947 मे वहाँ कि कुल आबादी मे हिन्दुओ कि संख्या 28% थी जो 1981 आते आते सिर्फ 8.5%  रह गई। 1971 कि लड़ाई मे पाकिस्तानी सेना ने हिन्दुओ पर जो अमानवीय अतयाचर किए उससे 1971 से 1981 आते बांग्लादेश से लगभग 10 लाख हिन्दू गायब हो गये। 25 वर्षो मे कुल लगभग 53 लाख हिन्दुओ ने बांग्लादेश से पलायन किया। अगर 1947 से अभी तक कि स्थिति पर द्र्ष्टिपात किया जाए तो ये जानकार आश्चर्य होगा कि पूर्व मे पश्चिमी पाकिस्तान और 1971 मे बने  बांग्लादेश से लगभल 5 करोड़ हिन्दुओ का कुछ अता-पता नही है या ये कहना ज्यादा श्रेयस्कर होगा कि पिछले 60-65 वर्षो मे 5 करोड़ हिन्दू गायब हो गये हैं।



      कुछ इसी तरह कि नितियाँ पश्चिमी बंगाल और उत्तर प्रदेश मे आज भी जारी हैं। पश्चिमी बंगाल के मुर्शिदाबाद मे तो 23 दुर्गा पंडालो मे आग लगाई गई। कोलकाता मे प्रशासन द्वारा  माँ दुर्गा का विसर्जन इसलिए टालने का निर्णय लिया गया क्यो कि 22 अक्तुबर को गुरुवार होने के कारण विसर्जन नहीं किया जाता 23 को शुक्रवार होने के कारण 24 को मुहर्रम होने के कारण मतलब साफ है। यहाँ प्रश्न यही है कि क्या प्रशासन अर्धसैनिक बलों कि मदद लेने का निर्णय नही ले सकता था जिससे दोनों धर्मो के लोगो कि भावनाओ कि रक्षा होती ।  उत्तर प्रदेश मे तो सरकार सरे आम हर विभाग मे जाति और धर्म के चश्मे से सब कुछ देखना पसंद करती है। भारत मे सरकार कोई भी हो उन्हे धर्म विशेष कि भावनाओ कि चिंता ज्यादा रहती है किन्तु यही भावनाएँ बांग्लादेश या पाकिस्तान मे तो हर्गिज नहीं दिखाई पड़ती ।

      विश्व मे भारतवर्ष ही अकेला ऐसा देश है जहां हर धर्म को अपने सरोकारों/ मान्यताओ के साथ जीने की सहूलियत है। इक्का दुक्का घटनाओ से इन सरोकारों/ मान्यताओ की जड़ो को कोई  चाहकर भी नहीं हिला सकता। इस प्रकार के प्रयास चंद फिरकपरस्तों द्वारा पहले भी किए जाते रहे हैं। किन्तु जिस प्रकार सूर्य की प्रथम किरण के साथ अँधियारा छट जाता है उसी प्रकार इस प्रकार की घटनाओ के पश्चात धीरे धीरे सब कुछ स्वत: ठीक होने लगता है।



Monday, 12 June 2023

"पाला बदल कर देख लो"

“पाला बदल कर देख लो “

जब भी चाहो ज़िंदगी का, रुख बदल कर देख लो
पार क्या है आसमाँ के, बस उछल कर देख लो

माना तेरी ताब से, पत्थर पिघल सकता मगर
हम भी तो कुछ कम नहीं, पाला बदल कर देख लो

एक गुब्बारे की जिद फिर, फैलना बाज़ार में
एक बच्चे की तरह तुम भी मचल कर देख लो

दोस्त या दुश्मन हो पहला, वार मैं करता नहीं
आज़माना जब भी चाहो, मुझको छल कर देख लो

जिस पे बीते वो ही जाने, तुम भी जानोगे कभी
पैर नंगे शूल पथ पे, तुम भी चल कर देख लो

प्रेम तो जल की तरह निर्मल ही रहता है ‘प्रदीप’
गर यकीं तुमको नहीं तो, मुझमें ढल कर देख लो

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-15.05.2023

Sunday, 21 May 2023

"हगने के दस मूतने के पाँच"

रिपोतार्ज़
                “हगने के दस 
                 मूतने के पाँच”

क्यों चौंक गये ना, 😆जी मुझे भी लगा क्या ये शीर्शक ठीक रहेगा फिर लगा हम आम दिनों में एक दूसरे से कभी गुस्से में कभी व्यंग्य स्वरुप और कभी यूँ ही (दिल्ली वाले जो ठहरे) किन किन विशेषणों से युक्त भाषा का प्रयोग करते हैं तो फिर पक्का हो गया जी इस रिपोतार्ज़ का शीर्शक तो यही रहेगा( मतलब खटोला यहीं बिछेगा की तर्ज़ पर)। 🤓 दिल्ली छोडे हमें 16 साल हो गये लेकिन दिल्ली ने हमें न छोडा है चाहे मुम्बई रहे हो या अब हैदराबाद आना जाना लगा ही रहता है। मुझे आवश्यक कार्य से 3 मई को मेरठ पहुँचना था इसलिए मैंने समय रहते 30 अप्रैल की एस सी टू टायर की (दुरंतो- सिकंदराबाद-निज़ामुद्दीन) में प्रतीक्षा सूची में टिकिट आरक्षित करवा लिया। ऐसा इसलिए कि बंगलौर-दिल्ली राजधानी में काफी लम्बी प्रतीक्षा सूचि थी। मैं निश्चिंत भी था क्यों कि हैदराबाद के पिछले लगभग साढे चार वर्ष के प्रवास में कभी ऐसा नहीं हुआ था कि मुझे स्टेशन से वापिस आना पडा हो। जब हम ज्यादा निश्चिंत हो जाते हैं तभी गडबड हो जाती है। तो लीजीए हुज़ूर हम गुसलखाने की ओर जाना ही चाहते थे कि मोबाइल में मैसेज आ गया कि आप प्रतीक्षा सूचि-1 पर आकर अटक गये हैं हमसे न हो पाएगा 🙃अपना दूसरा इंतेज़ाम कर लो भैय्या।  मतलब हो गया ना हैप्पी बड्डे! स्नान ध्यान तो छूट गया हम लग गये फ्लाइट के चक्कर में शायद रेलवे वालों ने एअर वालों से सैटिंग कर रक्खी है। हैदराबाद- दिल्ली का किराया 16500/- , 1 मई का ट्राई किया तो 13,500/- फिर मुँह लटकाए लटकाए हमने 2 मई ट्राई किया तो सिर्फ आकाशा (राकेश झुंझुनवाला- शेयर मार्किट टाइकून) की फ्लाइट में शाम की एक टिकिट मिली वो भी 9500/-। हमने सोचा तुरंत बुक करो बे🥱 कहीं सोचते रह गये तो इसके भी रेट बढ जाएंगे। अब सोचिए शनिवार, रविवार, सोमवार और मंगलवाल मिलाकर चार दिन खराब हो गये।  मतलब दोनों तरफ से जय सियाराम्। खैर हैदराबाद से दिल्ली और दिल्ली से मेरठ पहुँचने में रात काली हो गई। 

सुबह उठे और लग गये अपना ज़रुरी काम निपटाने में ,शाम तक उससे जब काम से फारिग होकर घर आए तो दोनों भाईयों के बच्चे बोले क्या ठाकुर 🦜खाली हाथ, सजा मिलेगी बरोबर मिलेगी। हमने भी उनके सुर में सुर मिला दिया हुकूम करें जनाब ए आली तो  बोले सभी बच्चा लोगों को भयंकर वाली  पार्टी मांगता है। हमने कहा कुछ खास है क्या छुटकी बोली खास क्या ठाकुर “असलियत में चाँद मेरे पास है” का लोकार्पण गुजरात के होटेल में किया था न, तो हमें भी बढिया वाले होटेल में हमारी पसंद की पार्टी और हाँ इस बार आर्डर सिर्फ हमारा चलेगा यानी बच्चों का बच्चे जो आर्डर करेंगे वो बडो को भी खाना पडेगा, ये नहीं कि दाल रोटी दाल रोटी, वो तो रोज़ घर में भी खाते हो भई। हमने मन ही मन कहा “रज़िया फिर से गुंडो में फंस गई” (सच कहूँ तो इत्ते सोणे सोणे  गुंडे हो तो रजिया को फँसने में रोज़ मज़ा आएगा ही)। खैर साहब इस बार हमने भी ना नुकुर नहीं की और सीधे सीधे सरेंडर कर दिया। बच्चे खुश तो ईश्वर खुश्। दो तीन दिन बिताकर सीधे मुरादाबाद (बैच्चु लुलू पार्टी कहानी यहीं जनमी थी) फिर दो दिन बाद सीधे दिल्ली की बस पकडी और कौशाम्बी मेट्रो स्टेशन उतर गये। मुरादाबाद से दिल्ली भले ही ए सी बस थी किंतु सफर तो सफर है सो सोचा कि शाहदरा की मेट्रो पकडने से पहले निफराम हो लिया जाए। हम जैसे ही निफराम होने सुलभ शौचालय में घुसे तो वहाँ बैठे आदमी ने तुरंत कहा बाबू जी “हगने के दस और मूतने के पाँच” हम एक दम सन्न ठिठक गये सो अलग। उसके चेहरे की तरफ देखा तो बडा भोला भाला शायद कुछ दिनों पहले ही बिहार से आया था। हमारे चेहरे पर तुरंत एक मुस्कार तैर गई हमने भी उसी अंदाज़ में उसे जवाब दे दिया ना भैय्या हगने का प्रोग्राम ना है हमारा मूत के निकल लेंगे। वो बोला बाबू जी बुरा मत मानियो जाने से पहले बताना हमारा धरम है, कई लोग काम तो दस का करें हैं पर देंवे है पाँच रुप्प्या ही। ज्यादा कहो तो माँ बहन की गाली भी दे देंवे हैं सो हम पहले ही बता देने में अपनी और उसकी भलाई समझें हैं। खैर पाँच मिनिट में निफराम होकर हम बाहर आए उसने खुद ही उठकर हमें बैग़ थमा दिया हमने उसे पचास रुपये पकडा दिये तो बोला बाबू जी खुले दे दो, हम पे खुले ना हैं । मैंने उसके कंधे को थपथपाकर कहा हमें पैसे वापिस ना चाहिए भैय्या, बचे पैसे से बाहर जाकर छोले कुलचे हमारी तरफ से खा लेना। हमें तुम्हारी बात और अंदाज बढिया लगा।😆 इससे पहले कि वो और कुछ बोलता हमने जय सियाराम कहा और दूसरी मेट्रो लेकर निकल लिए दोस्त के घर।

अब बारी थी दिल्ली नौयडा के कार्य निपटाने की तो 11 मई को को इंडिया बुक्स (आगामी कहानी संग्रह “काला हंस” ) के सेक्टर 19 नौयडा पहुँचे। डॉक्टर संजीव से बेहतरीन मुलाकात रही। लगभग दो घंटे की मीटिंग में कविताओं के कई दौर चले, लगा ही नही कि हम लोग पहली बार मिल रहे हैं। 🌹वहीं पर ही जसविंदर कौर बिंद्रा जी से भी मुलाकात हुई। पंजाबी हिंदी अंग्रेजी भाषा में पूर्ण रुपेण पकड, रिटायर्ड हैं किंतु जबरदस्त जोश से भरपूर। उनके साथ स्ट्रीट लंच लिया फिर पहुँचे आदरणीय और प्रिय प्रिय प्रिय सुरेश नीरव जी नये आशियाने पर्। उन्होंने गाज़ियाबाद से दो तीन दिन पूर्व ही शिफ्ट किया है, मैं साहित्यिक दृष्टी से प्रथम व्यक्ति रहा जिसने उनके द्वार पर प्रथम अतिथि के रुप में दस्तक दी। कुछ देर बाद मधु मिश्रा जी भी पुराने निवास स्थान से कुछ सामान लेकर लौटी फिर महफिल जम गई जो सांय 7:15 तक चलती रही। खाने के आग्रह के बावजूद मैंने जाने की आज्ञा माँगी ताकि समय से मित्र के घर पहुँच सकूँ। रास्ते भर मैं अब से तीस पैतीस बरस पहले के नौयडा को याद करने की कोशिश कर रहा था जिसमें अट्टा मोड की धूल विशेष रही। 
अब दिल्ली जाओ और दोस्तों से न मिलो ऐसा तो हो ही नहीं सकता न सो अगले दिन फोन मिला दिया, उधर से आवाज़ में कुछ कम्पन लग रहा था मालूम हुआ पति देव का बॉयपास हुआ है और छुट्टी लेकर घर जा रहे हैं बस हमने भी तुरंत मेट्रो पकडी और पहुँच गये मिज़ाज़पुर्सी को। अगले दिन का कार्यक्रम निश्चित था, पहले एक छोटे से कार्यक्रम में भागीदारी फिर मित्र के साथ लंच फिर शाम को बंगलौर राजधानी। जब ये सब पूर्ण कर हम निज़ामुद्दीन स्टेशन जा रहे थे तो अहसास हुआ कि परसों और कल के मुकाबले आज तबियत कुछ ज्यादा नासाज़ सी लग रही है। जैसे दिल्ली की लू कह रही हो अरे ओ साम्भा 😡कित्ते दिन हो गये लू खाए हुए बे ,हम बोले पूरम पट्ट सोलह बरस तो लू ने कहा इस बार तो तुमसे चिपकर ही रहेेंगे बचकर दिखाओ। खैर जैसे तैसे स्टेशन पहुँचे, A-5-29 पर जाकर बैठ गये। पिछले कई बरस हो गये ठंडा पानी पीए किंतु आज सादे पानी से प्यास न बुझी और प्यास ने ज्यादा हलकान कर दिया तो पी लिया ठंडा ठंडा कूल कूल जैसे तैसे कुछ संयत हुए, ट्रेन चली तो सहयात्रियों से परिचय हुआ। ऐं पर ये क्या, 🙃जो भी अपना नाम बतावें सबका प्र से यानी श्रीमति एवम श्री प्रिया मुखर्जी बच्चे का नाम भी प्र से , दूसरी जोडी प्रियंका और रोहित की,और हम तो हैं ही प्रदीप्। अचानक अप्रैल-मई-2022 की याद हो आई जब हम गोवा और नेपाल के साहित्यिक प्रवास पर थे कुल 14 लोगों में से 11 महिलाएँ सभी का नाम र से शुरु सिर्फ हम और एक और सज्जन थे जो अलग अक्षर से नाम रखते थे। कभी कभी ऐसा होता है जो अच्छा भी लगता है। पिछ्ले एक सप्ताह से इलेक्ट्रोल, ग्लूकोन सी जैसी चीज़ों का सेवन कर उबरने की कोशिश कर रहे हैं। आज कुछ आराम सा आया तो एक ठो शेर याद हो आया। वैसे तबियत के बारे में अभी तक पूछा तो किसी ने नहीं। फिर भी शेर ठोकने में क्या हर्ज है जी 😆😆😆😆

“अब पडा तबियत में कुछ आराम सा
  तुमने जब पूछा कि कैसे हो ‘प्रदीप’”

प्रदीप देवीशरण भट्ट-
20.05.2023