Tuesday, 27 September 2022

"सब कुछ ठीक नहीं है"

 








रिपोतार्ज़

सब कुछ ठीक नहीं है”

 

फेस बुक फेस बुक भी है फेक बुक भी है, जिन्होने भुगता है वो जानते हैं। अपने अपने फालोवर बढाने की एक अंधी दौड में लगे हुए हैं कुछ पुरुष मित्रों को तो नहीं अपितु महिला मित्रों से ये बात अवश्य साझा की व आगाह किया कि सिर्फ अपने परिचित की फोटो देखकर ही फ्रेंड रिक्वेस्ट न स्वीकारें। कुछ फेक चेहरे लगाकर भी फेस बुक पर एक्टिव हैं। पता नहीं उन्होंने मेरी बात को कितनी गम्भीरता से लिया है या नहीं भी। जाने अंजाने में बिना खोज बीन के मैं रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नही करता हूँ फिर भी गलती है हमसे भी हो जाती है और फिर कुछ दिनों बाद उन सज्जन या सज्जनी को ब्लॉक ही करना पडता है। कुछ लोग मेसेंजर पर शिकायत भी करते हैं “आप अपने आप को क्या समझते हैं ........... ......वगैरह वगैरह” अब उन्हें कौन बताए भैय्या फेस बुक की निर्धारित लिमिट से आगे जाया नहीं जा सकता। और कुछ बंदे या बंदी तो औसतन माह में चार पाँच सीधे मेसेंजर कॉल ठोक देते हैं। शुरु में उठाया फिर जब शिकायत का सिलसिला चल निकला तो हमने बताया फेस बुक की लिमिट हमारे हाथ में नहीं है तो तुरंत सुझाव आप किसी को अन फोलो कर दीजीए हमें जोड लीजिए। न तो स्वंय किसी रिश्ते में गम्भीर हैं न चाहते और कोई रहे, आज अगर मैं किसी और को निकाल कर उन्हें एड कर लूँ तो कल उन्हें भी तो निकाल सकता हूँ, लोग समझते ही नहीं, माना ये आभासी दुनियाँ है किंतु रिश्ते तो रिश्ते हैं। ऐसा कई बार हो चुका है इसलिए मेसेंजर कॉल उठाना ही बंद कर दिया है। लेकिन ऐसी स्थिति आने पर एक बार गलतफहमी होनी स्वाभाविक है “ कहीं अपुन भगवान तो नहीं हो गये” खैर जोक सपाट्। इस आभासी दुनियाँ के कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी हैं जो हमें झेलने ही पडेगें। अब फिर वो चाहे फेसबुक हो अन्य सोशल मीडिया के फन्ने खाँ। खैर अब असली मुद्दा।

 

 

अप्रैल माह में नेपाल जाने से पूर्व राजपाल जी से उनके गुङगाँव स्थित आवास पर मिलना हुआ। उन्होंने दो आग्रह किये कि आप नीरव जी से अवश्य मिले जिसे मैंने नेपाल के साहित्यिक प्रवास के बाद पूरा किया और दूसरा आग्रह आगमन से जुडने का। मैं काफी मंचो से जुडा हूँ और आगमन से जुडने का प्रस्ताव मुझे 2020 में मेरी एक साहित्यक मित्र ने दिया था जिसे मैंने अपनी व्यस्तता का हवाला देते हुए क्षमा माँगते हुए मना कर दिया। किंतु अब लगभग दो वर्ष बाद फिर आग्रह। खैर एक दिन पवन जैन जी का फोन आया और जब उनका परिचय प्राप्त हुआ तो मैंने तुरंत हाँ कर दी। कुछ दिनों बाद पवन जी ने सूचना दी कि 18 सितम्बर-2022 को देल्ही में आगमन के दसवें स्थापना दिवस पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं अगर आप विशिष्ट अतिथि के तौर पर कार्यक्रम में शिरकत करें तो प्रसन्नता होगी। मैंने अपने परिचितों से फोन कर पूछा तो एक को छोडकर सबने कहा देखेंगें । वास्तव में बच्चे के Exam छोडकर उन एक मात्र मित्र का इस कार्यक्रम में सम्म्लित होना ठीक भी नहीं था। खैंर 17 सितम्बर की सुबह 07:15 की हैदराबाद से राजधानी पकडी और नाश्ता करके बी पी की गोली खाई और सो गये ।सामान्यत: मैं दिन में कभी नहीं सोता चूँकि पूरी रात प्रवचन सुनते बीती तो सो गये। उठे तो पाया मोबालिया को चार्जिंग पे लगाया, फ्रेश होने गये, खाना खाया तब तक 2:20 हो गये थे, बस यूँ ही कवि कैफे ग्रुप में नागपुर की साहित्यिक मित्र को उनकी पोस्ट की कमेंट के साथ लिख मारा “ नागपुर के थाने दार साहब हम नागपुर से गुजरने वाले हैं” इधर मेसैज उधर फोन, और फिर उनका आने के लिए कहना, हमने कहा 5 मिनिट्स के लिए 15-16 किलोमीटर से चलकर आना किंतु साहब थानेदार तो थानेदार ठहरे इधर 15:20 पर गाडी ने प्लेट्फॉर्म को छुआ और थानेदार साहब गेट के सामने। उलाहना बनता था सो उन्होंने दिया। थोडी देर बार दूसरा मोबाईल चेक किया तो पायावो खास बन गया है जो महफिल में आम है” की मिस कॉल है वापिस किया तो ....... अब मन पूरी तरह और ज्यादा खिन्न हो गया था ऐसा पहली बार हुआ जब मैंने 21 घंटे के सफर में किसी सह यात्री से बात नहीं की दो तीन ने कुछ पूछा भी तो सलेक्टिड उत्तर देकर इति श्री कर ली। मन खिन्न होने के कारणमौन सर्वार्थ साधकम” अपना लिया।

खैर अगले दिन सुबह 05:34 पर ट्रेन निज़ामुद्दीन स्टेशन पहुँच गई, ऑटो लिया और सीधे पवन गोयल साहब के दर पर (देल्ही छोडे सोलह बरस हो गये, पहले मुम्बई से आते या जाते हुए हॉल्ट अब हैदराबाद से, 42 बरस का याराना है) फ्रेश हुए और 10:10 पर सीधे चौथे माले स्थित आगमन के कार्यक्रम मे।पवन जी मुलाकात हुई, लखनऊ से पधारी रेखा वोरा को देखना सुखद रहा उनसे जनवरी-2020 के कार्यक्रम में जयपुर में मुलाकत हुई थी। धीरे धीरे लोग आते रहे तभी थपियाल जी से मुलाकात हुई उनसे भी गोवा के कार्यक्रम में मुलाकत हो चुकी थी, नईम जी नेपाल के महोत्सव में मिल चुके थे, निशा माथुर जयपुर, और भी कई लोग जो मुझे पहचान रहे थे किंतु मैं उन्हें पहचान नहीं पा रहा था। खैर 11 बजे शालिनी अगम द्वारा प्रथम सत्र का संचालन सँभाला गया। माँ सरस्वती के चरण स्पर्श व ‘प्रदीप’ प्रज्व्व्लित करने का सौभाग्य पाण्डेय जी व तुषा शर्मा के साथ मुझे भी मिला। प्रथम सत्र में जहाँ कार्यक्रम में पधारे मुख्य व विशिष्ट अतिथियों को सम्मानित किया गया वहीं वागीश्वरी पत्रिका का विमोचन भी किया गया। दूसरे सत्र की अध्यक्षता श्रीमती व श्री लक्ष्मी शंकर बाजपई द्वारा की गई। सभी ने अपनी अपनी रचनाओं से समां बाँधा। मैंने भी अपना एक गीत “ आज से मन ये मेरा तुम्हारा हुआ” पढी। कार्यक्रम का समापन राष्ट्र गान से हुआ। दूसरे सत्र का संचालन अनुराधा पाण्डेय व मानसी जोशी ने सन्युक्त रुप से किया। कार्यक्रम के बाद प्रिय पंकज चावला का बर्थडे मनाना यादगार रहा। एक बात जिसका ध्यान मैं सदैव रखता हूँ कि जब भी स्टेज पर जाओ नंगे पैर ही जाओ।

 

अगले दिन एक विशेष कार्य का निपटान करना था सो सुबह 11 बजे से रात 9 बजे तक बढिया वाली धूप में सिकते हुए उस कार्य को पूर्ण किया। ये एक नया अनुभव था जिससे मैं पहली बार दो चार हुआ किंतु संतोष की बात ये कि मैं अपने मिशन में कामयाब होकर लौटा। अगले दिन मेरठ और इंद्र देवता ने मेरे पहुँचते ही सारी टोंटी खोल डाली, पानी रे पानी तेरा रंग कैसा की तर्ज़ पर्। एक दिन में तीन लोगों से मिलना वो भी बारिश की छपाक के साथ्। इसका अलग ही आनंद है। अगले दिन की दो मीटिंग्स बारिश की भेंट चढ गई। मुरादाबाद का कार्यक्रम भी इसी क्रम में रह गया। इंद्र देवता के तेवर कम होने का नाम नहीं ले रहे थे, एक मित्र के आग्र्ह पर शनिवार 4 बजे देह्ली में एक मीटिंग रखी चूँकि ट्रेन 19:50 की थी सो एक बजे मेरठ से बस पकडी, अंदाज़ा था 15:30 आई टी ओ पहुँच जायेंगे किंतु बारिश की गति को देखते हुए मित्र को मना करना पडा और हम 16:00 बजे ही निज़ामुद्दीन स्टेशन पहुँच गये। लगभग 4 घंटे स्टेशन पर बारिश अपने पूरे रौ में बरस रही थी। खैर ट्रेन पकडी खाना खाया और सो गये फिर अगले दिन फिर वही मौन इख्तियार कर लिया, मन को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था सो अगले दिन हैदराबाद ।काम करने थे किये किंतुकोई मन का अगर न मिले जीस्त में, बात करने से भी मन उचट जाता है “ संतोष इस बात का रहा ट्रेन में एक छोटी सी बच्ची बार बार अंकल अंकल कहकर अपनी तोतली भाषा में कुछ समझाती रही शायद मैं भी उसकी बात समझ पा रहा था, बच्चे में भगवान जो बसते हैं। जय श्री राम

 

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-27:09:2022

 


Thursday, 18 August 2022

"चेन्नई आ रहा हूँ मैं"

 



कार्यक्रम पूर्व रिपोतार्ज़

प्रदीप बाबू बढिया है!!!


                                             "चेन्नई आ रहा हूँ मैं"

“आजादी का अमृत महोत्सव”

यानि

शब्दाक्षर साहित्यिक महोत्सव, चेन्नई"

 

सामान्यत: मैं किसी भी इवेंट के समपन्न होने के पश्चात ही रिपोतार्ज लिखता हूँ। मुझे ये लिखने में कोई संकोच नहीं कि जितनी तारीफ मुझे गीत गज़ल कविता या आर्टिकल के लिए मिलती है उससे कहीं ज़ियादा मेरे रिपोतार्ज के लिए मिलती है। (कभी कभी आलोचना भी कि यार इस गीत/गज़ल /कविता या आर्टिकल में मज़ा नही आया। किंतु संतोष की बात ये है कि रिपोतार्ज के विषय में आज तक कोई आलोचना नहीं हुई वरन कुछ मित्र तो फोन करके पूछते हैं “अबे अगला कब लिख रिया है” (मित्र ऐसे ही बात करते हैं, कमीने कहीं के) खैर  पिछले वर्ष सितम्बर माह में ज्योति नारायण जी का फोन आया नमस्कार चमत्कार के बाद बोलीं “ आप अपना एक चित्र व परिचय मुझे तुरंत भेज दें। पिछले साढे तीन वर्ष के हैदराबाद प्रवास में काफी सारे साहित्यिक मित्रों से मिला हूँ ज्योति जी का सद व्यव्हार काबिले तारीफ है। इसलिए बिना किसी ना नुकुर के तुरंत ही दोनों चीज़े भेज दी गईं। कुछ दिनों बाद ही उनका फोन आया कि 29 सितम्बर-2021 को शब्दाक्षर की मीटिंग घर पर ही रखी है आपको संगठन मंत्री बनाया गया है। कैलेंडर पर निगाह दौडाई तो पाया बुद्द्वार है किंतु आदेश की अवहेलना तो अपने बस की बात न थी सो एक ठो सी एल ली और पहुँच गये। बढिया माहौल में सरस्वती वंदना के साथ मीटींग शुरु हुई और रुचिकर रात के खाने के साथ सम्पन्न ( अब हैदराबाद में देल्ही स्टाइल का खाना मिल जाए तो बल्ले बल्ले होनी स्वाभाविक है)

तभी कोरोना ने देश के दरवाजे पर पुन: दस्तक दी तो मीटिंग्स का सिलसिला वर्चुअल हो गया किंतु मीटिंग रुकी नहीं। मुझे याद है 15 मार्च की मीटिंग्स, जिसमें मुझे अध्यक्ष का दायित्य सौंपा गया। सांय 7 बजे से रात्रि 11.30 बजे तक मैराथन मीटिंग चली किंतु अच्छी बात यह है कि सभी ने साहित्यिकआन्नद की अनुभूति प्राप्त की।  अप्रैल के अंतिम सप्ताह में मैं नेपाल एक साहित्यिक कार्यक्रम में सम्म्लित होने के लिए गया था। देल्ही वापिस आने पर  सूचना मिली कि चेन्नई में अगस्त के प्रथम सप्ताह में “शब्दाक्षर साहित्य महोसव” का भव्य आयोजन किया जा रहा है। सहभागिता हेतु निमंत्रण भी था। सो हैदराबाद आने के बाद सबसे पहले जो काम किया वो था टिकिट बुकिंग का। चूँकि शुक्रवार होने के कारण अवकाश लेना सम्भव नहीं था सो  5 अगस्त की सांय छ: बजे का टिकिट किया और वापिसी का नौ अगस्त का।

अब बात करते हैं इस आयोजन की जिस प्रकार से शब्दाक्षर के कर्मठ पदाधिकारी निस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएँ दे रहे हैं वो काबिले तारीफ है प्रिय सागर शर्मा हों या निशांत सिंह गुलशन’ (उपनाम के अनुरुप) केवल कोठारी जी हों या रवि प्रताप सिंह जी या फिर ज्योति नारायण जी या फिर अन्य वो मित्र जो किसी न किसी रुप में इस साहित्यिक महोत्सव में अपना सहयोग दे रहे हैं ( जैसे रामसेतु के निर्माण में नर हो या वानर या हम जैसी चिखूरी) वह अनुकरणीय है।

 अंत में इस वर्ष भारत अपनी स्वतंत्रता के 75 वर्ष मना रहा है। तो फिर हम क्यूँ पीछे रहें, सो हम यानी शब्दाक्षर के सभी मित्र गण शब्दाक्षर के “चेन्नई-साहित्यिक महोत्सव” को “आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत” अभूतपूर्व बनाने का अवश्य प्रयत्न करेंगे।

तो आईये मिलते हैं चेन्नई के लश गार्डन रिसोर्ट, में 6 7 व 8 अगस्त-2022 को और मचाते हैं धमाल।

जय श्री राम!!!!!

 

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-03.08.2022

उपाध्यक्ष, “शब्दाक्षर”, तेलांगना ईकाइ, हैदराबाद


 


"चेन्नई जा रहा हूँ मैं"

 



रिपोतार्ज़

 

“चेन्नई जा रहा हूँ मैं”

-खुबसूरत यादों और अहसासों को समेटे-

 

5 अगस्त को चारमीनार एक्स्प्रेस से हैदराबाद डेक्कन रेलवे स्टेशन से सायं 6 बजे प्रस्थान कर बिना किसी विघ्न बाधा के चेन्नई के ताम्बरम रेलवे स्टेशन सुबह 8:10 पहुँच गये। वहाँ पहले से ही गोवा की टीम प्रतीक्षारत्त थी । टैक्सी की व्यवस्था कोठारी जी द्वारा पहले से ही कर दी गई थी सो लगभग एक घंटे बाद लश गार्डन जो कि चेन्नई सेंट्रल से लगभग 40 किलोमीटर है पहुँच गये। रुम अलॉट्मेंट के बाद पता चला कि एक रुम में तीन लोगों की व्यव्स्था की गई।  मेरे रुम पार्टनर में एक सज्जन कानपुर व दूसरे सज्जन राजस्थान से, दोनों लगभग 25 बरस के रहे होंगे।  नमस्कार के उपरांत मैं फ्रेश होकर कार्यक्रम स्थल पहुँचा तो बताया गया हुज़ूर पहले पहले पेट पूजा (नाश्ता) कर लें। जब नाश्ते में छ: सात: आइटम हों तो सोचिए लंच और डिनर में कितने होंगे। सो पेट पूजा के पश्चात मीटिंग हाल में पहुँचा, कुछ ही देर में सरस्वती वंदना से कार्यक्रम की शुरुआत हो गई। पहला सत्र सम्मान समारोह में गुजरा तत्पश्चात लंच के बाद दूसरा सत्र लगभग 3 बजे प्रारम्भ हुआ। गज़ल सत्र में औरों के अतिरिक्त हमने भी अपनी एक गज़ल “संग संग तेरे चलना चाहूँ, चल न पाऊँ, क्या बोलूँ” पढी।  दूसरा सत्र सांय को लगभग 9:30 बजे समाप्त हुआ। घोषणा हुई डिनर के बाद मीटींग हाल के सामने वाले हाल में फिर महफिल जमेगी, सो 11 बजे महफिल फिर जमी, उस महफिल का अध्यक्ष हमें बना दिया गया। लगभग ढाई बजे अध्यक्षीय टिप्प्णी के बाद हमने अपने लिखी गज़ल “ बेवजह खुर्शीद पर उँगली उठाया मत करो, खाक हो जाओगे तुम नज़रें मिलाया मत करो” पढकर महफिल की बर्खास्तगी की घोषणा की फिर उन्नीदें से होकर हम अपने रुम की ओर चल पडे, नॉक किया राजस्थानी मित्र ने दरवाजा खोला, दोनों ही मित्र आराम से बेड पर सोये हुए थे मेरी उपस्थिति से दूसरा मित्र भी जाग गया। इससे पहले कि वो कुछ कहते मैंने स्थिति को भाँपते हुए कहा “ आप दोनों ऊपर पलंग पर ही सोयेंगे और मैंने तुरंत कपडें चेंज करते हुए गद्दा बिछाया और ये लो जी पाँच मिनिट में ही निंद्रा रानी की गोद में सर रखकर सपनों में खो गये।

 

अगली सुबह दोनों मित्रों के चेहरों पर कुछ उलझन के भाग देखे तो पूछा तबियत किसकी गडबड है, कानपुर वाले मित्र बोले, सर हमें कल से बुखार हैहमने ठीक है, यहाँ से प्रस्थान तक आप पलंग पर ही सोयेंगे, फिर कुछ और बातों का सिलसिला चल निकला, या यूँ कहूँ कि वरिष्ठ होने के नाते उन्हें कुछ समझाया भी ताकि उनकी हिचकिचाहत दूर की जा सके। थोडी देर में ही दोनों मुस्कुराते हुए जवाब देने लगे। ये एक शुभ संकेत था। फ्रेश हुए नाश्ता किया और पहुँच गये कार्यक्रम स्थल दूसरा तीसरा सत्र गीत सत्र था जिसमें से हमने स्वंय ही नाम वापिस ले लिया। ऐसा करके हम किसी पर अहसान नही जताना चाहते थे बल्कि हमारा मानना है कि ये क्या ज़रुरी है कि हर कवि हर सत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए ही। ऐसे कितने ही कवि हैं जिन्हें यदा कदा ही मंच मिलता है तो उन्हें मौका मिलना चाहिए था किंतु अफसोस दिल गड्डे में। दो चार को छोड दें तो ऐसा प्रतीत होता हुआ जैसे

सबके पेट मेंंअफारा हो रहा था। बस एक ही लगन ज्यादा से ज्यादा कविताएं सुना डालो। खैर जैसी प्रभु की इच्छा। लंच के बाद दो खूबसूरत सत्र एक छंद/दोहे/मुक्तक का जिसमें मुझे अतिथि के तौर पर मंच पर सम्मान दिया गया किंतु मैंने यहाँ भी कार्यक्रम अध्यक्ष श्री भदोरिया से स्वंय कुछ भी प्रस्तुत न करने के लिए माफी माँग ली। अगला सत्र छंद मुक्त कविताओं/अतुकांत कविताओं का था जिसका मैंने भरपूर आंनद लिया।एक से बढकर एक प्रस्तुति।  ऐसी कविता जो किसी बंधन की मोहताज़ नहीं । कविता दिल से लिखी, दिल से पढी, और दिल तक जा पहुँची। यही तो कविता का धर्म है। अंतिम सत्र चूँकि कवि सम्मेलन का था इसलिए देर होती देख तय किया गया कि ये सत्र डिनर के बाद कल वाली जगह पर आयोजित होगा। ये सत्र 8 अगस्त की सुबह लगभग तीन बजे तक चला।

 

फ्रेश हुए नाश्ता किया और 11 बजे के लगभत दो बसों में सवार होकर शब्दाक्षर परिवार महाबलीपुरम के लिए प्रस्थान किया, पौराणिक काल के मंदिर देखे,कोवलम बीच पर मस्ती की और सांय 8 बजे के लगभग बैक टू दी पैविलियं। डिनर के बाद महफिल फिर जमी और लीजिए हुज़ुर 8 अगस्त की रात्रि 11 बजे से 9 अगस्त की प्रात: तक जोरदार कवि सम्मेलन हुआ। कुछ लोग तो फ्रेश हुए उड लिए एअर पोर्ट के लिए। मैं भी लगभग 9 बजे फ्रेश होकर उसी स्थान पर मय सामान के हाज़िर हो गया। आदेश ऐसा ही था कि सुबह फ्रेश होकर मय सामान के नियत स्थान पर सभी हाज़िर रहें, गाडियों की व्यव्स्था पहले ही की जा चुकी थी। नाश्ता से फ्री होकर फिर से महफिल जम गई इस बार संचालन मेरे हाथ में था। लोग आते गये कवि कारवाँ जमता गया। राऊंड द क्लॉक की तर्ज़ पर मैंने संचालन सँभाला एक के बाद एक कवि पढते गये। तभी रवि प्रताप सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष भी पधार गये। महफिल आगे बढी, किन्हीं सज्जन ने दखलंदाज़ी की तो मैंने उन्हें विनम्र्ता से समझा दिया “ देखिए हुज़ुर इस अनौपचारिक सत्र का संचालन मैं कर रहा हूँ। बारी आने पर ही कविता पढनी होगी इससे पूर्व कदापि नहीं। कृपया मर्यादा का पालन करना सीखें। शायद उन्हें अच्छा न लगा हो किंतु मैं चाहता हूँ कि कुछ लोगों को ऐसे आयोजन से कुछ तो सीखना चाहिए। देश के लगभग हर कोने से लोग पधारें हैं अब अगर हर व्यक्ति इस प्रकार का व्यवहार करेगा तो कैसे होगा। 6,7,8 व नौ अगस्त तक का आधा दिन गीत, गज़ल,मुक्तक, छंद की प्रस्तुति व व्याख्या साथ ही हल्की फुल्की चुहल बाजियों में निकल गया। हमने भी 1:45 बजे सामान लपेटा और एक अन्य साथी के साथ चेन्नई सेंट्रल के लिए निकल पडें। समय से काफी पहले पहुँच भी गये।

 

अंतिम पैरा लिखने से पूर्व अगर मैं चंद खूबसूरत लोगों के विषय में कुछ न कहूँ तो मेरी कलम का कोई फायदा नहीं। रवि प्रताप सिंह जो शब्दाक्षर के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, उनकी कविताएँ माशा अल्लाह, संचालन बेहद उम्दा, दोनों में ही गाँव की महक के दर्शन कराने का उनमें उत्तम गुण है। दयाशंकर मिश्र जी, राष्ट्रीप कोषाध्यक्ष, सौम्य हैं सरल हैं, कविताओं पर अच्छी पकड है। केवल कोठारी जी जो शब्दाक्षर के तमिलनाडू के प्रांतीय अध्यक्ष हैं, इनके बारे में क्या कहूँ। सभी उनका गुणगान कर रहे हैं। गुस्से को गुस्सा आता है किंतु कोठारी जी को नहीं। सहृदय, एकला चलो का पाठ पढाते हुए। बचपन से सुनते आ रहे हैं अकेला चना भाड नही फोड सकता , लेकिन मुझे शब्दाक्षर के इस कार्यक्रम के विषय में यह कहने में कोई संकोच नही कि कोठारी जी नामक चने ने अपना सब कुछ झोंक दिया। मैं हमेशा कहता हूँ अगर बडे हो तो बडे के जैसे काम भी करने चाहिए” कोठारी जी इस उक्ति पर सौ फीसदी खरे उतरते हैं। मैंने अपने अभी तक के जीवन में 2-3 लोगों में ऐसी कर्मठता देखी है।है। केवल अर्थात मात्र/शुद्ध्। मुझे आपका सानिध्य मिला मैं इससे अभिभूत हूँ। ज्योति नारायण जो तेलांगना प्रदेश की अध्यक्ष है, मैं उनसे पिछ्ले तीन वर्षो  से परिचित हूँ।सौम्य, मृदु भाषी, बच्चों जैसी खिलखिलाहट की स्वामिनी।  प्रिय अजय श्रीवास्तव, विश्वजीत शर्मा जी, प्रिय शिल्पी या सुनीता जी प्रिय वंदना, वर्षा, दत्ता प्रसाद जोग,रीटा सहगल,उमेश सहगल, प्रिय रुहानी, कुसुम, अंजु छारिया जी, श्रीमती त्रिवेदी, सी0 ए0 ,अमन शुक्ला, महावीर सिन्ह वीर, कनक लता तिवारी जी, अन्नपूर्णा,आलोक जायसवाल,राज कुमार महोबिया,श्यामल मजुमदार दादा,सुबोध मिश्र, कुछ और मित्र भी जिनका नाम स्मरण नहीं हो पा रहा है।( अभी इन तीनों ने पूरी तरह पिंड नहीं छोडा है शायद इसलिए) प्रिय सागर एवम निशांत की मेहनत के बिना ये महोत्सव महोत्सव जैसा नही होता, नई पीढी के बच्चे हैं। तकनीक का सुंदर प्रयोग जानते हैं। इन दोनों को विशेष स्नेह्। एक सुंदर आयोजन के लिए सभी का सह्योग रहा।  सिर्फ कविता पढना या सुनना आवश्यक नहीं है वरन इस तरह के आयोजन से हम उन लोगों से मिलते हैं जिन्हें वर्चुअल के माध्यम से पहचानते हैं या नहीं भी। इस महोत्सव की एक बडी उपल्ब्धि या ये कहूँ तो ज्यादा श्रेयस्कर होगा कि विशेष उपल्ब्धि ये रही की शब्दाक्षर ने नई पीढी के लिए मंच प्रदान किया जो साहित्य के लिए शुभ संकेत है।

 

थ्रोट इंफेक्शन बुख़ार बॉडी पेन जाने कब से घात लगाए बैठे थे ,या यूँ कहूँ तो ज़ियादा बेहतर होगा कि मैं इन्हें appointment नहीं दे रहा सो ये तीनों गुस्से में थे। तीन दिवसीय साहित्य महोत्सव में तो इन तीनों क़ी हिम्मत नहीं हुई शायद भीड़ देखकर घबरा गए हों या डर रहा हो अगर इस बंदे को छेड़ा तो 72 कवि अपनी कविताएं सुनाकर उन्हें ही न बीमार कर दें।एक क़े हिस्से में लगभग 25 कवि 😜किंतु परसों जैसे ही मैं रेलवे स्टेशन पहुँचा तीनों घेर लिए बहुत अनुनय विनय क़ी पर ससुरे माने नहीं रात भर बहुत तंग किया वो तो भला हो हमने हैदराबाद प्रस्थान से पूर्व ही डोलो क़ी ठो गोली रख ली थीं सो सात बजे ही निगल ली और कंबल खींचकर सोने का प्रयास किया किंतु अफ़सोस दिल गड्ढे में। राम राम करते सुबह ट्रेन ने 05:35 पर हैदराबाद डेक्कन का प्लेटफार्म छुआ तो जान में जान आई। जैसे ही प्लेट्फार्म पर कदम रखा तो ठंटी बयार ने जोरदार स्वागत किया, अनुमानत: 35-40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफतार रही होगी। वो तो भला हो हमारे बैग का जिसका वजन हमें हमें सँभाले रखा वरना बिना ऑटो के ही घर पहुँच जाते।ख़ैर अब घऱ पर आराम फरमा रहें है। थोड़ा आराम है किंतु जब खाँसी आती है तो पूरी बॉडी कभी शेर कभी मुक्तक कभी कविता कभी ग़ज़ल क़ी तरह पटक पटक क़े प्यार देती है।

 

कित्ता आनंद आ रहा है 😜😜😜

 

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-12.08.2022

उपाध्यक्ष, “शब्दाक्षर”, तेलांगना ईकाइ, हैदराबाद

Wednesday, 27 July 2022

" एक ख़ूबसूरत भीगी भीगी शाम "

“एक खूबसूरत भिगी भिगी शाम”

पिछले 10 दिनों से हैदराबाद शहर को वर्षा रानी ने  तर- ब -तर किया हुआ है। आप कहीं अन्यत्र घूमने जाना भी चाहें तो जा नहीं सकते सो हम भी सिवाय भारत सरकार क़ी ड्यूटी बजाने क़े अतिरिक्त अगर कुछ कर पा रहे थे तो वो था घऱ में भरपूर आराम, उमड़ते घुमड़ते बादलों को बरसते देखना,कुछ देर उनका रुकना (शायद बादल पानी भरने गये होंगे - बचपन में हम यही अंदाज़ा लगाते थे) फ़िर पहले से भी ज्य़ादा ज़ोर से गर्जना और बरसना। इसके अतिरिक्त अगर कुछ था तो वो वर्चुअल मीटिंग अटेंड करना (मैं तो बुरी तरह पक गया हूँ।) किंतु कुछ नियर व डियर मित्रों का आग्रह टालना संभव नहीं होता। 
मैं सोमवार 18:07:2022 को अभी ऑफिस पहुँचा ही था तभी एक परिचित क़ी फ़ोन कॉल आई। दूसरी ओर गोविंद मिश्र जी थे नमस्कार चमत्कार के उपरांत उन्होंने सूचित किया क़ी शुक्रवार दिनांक :22:07:2022 को होटेल प्लेटिमा हिमायत नगर में उनक़े ग़ज़ल संग्रह “ जलती आँते “    का विमोचन है, अनुरोध है आप ज़रूर पधारें।मैंने कहा अवश्य गोविंद जी आप अग्रज हैं, मैं अवश्य उपस्थित रहूँगा। दो दिनों बाद उन्होंने फ़िर स्मरण कराने हेतु सूचित किया साथ ही सुहास भटनागर का दूरभाष भी माँगा  साथ ही प्रार्थना क़ी कि आप उन्हें भी लेकर आवें ,वे आपके अच्छे मित्र हैं आपको तो मना नहीं करेंगे। मैंने नंबर देने के उपरांत उन्हें विश्वास दिलाया कि मैं उन्हें ले आऊँगा। शुक्रवार सुबह फ़िर उन्होंने स्मरण कराया और बताया कि सुहास जी ने आने में असमर्थता प्रकट क़ी है क्यों कि उन्हें किसी अन्य कार्यक्रम में जाना है। मैंने कहा जी उन्होंने मुझे भी इस बारे में सूचित किया है किंतु मैंने आपसे वादा किया है तो आप निश्चिंत रहें मैं अवश्य आऊँगा। गोविंद जी ने बोले कल रात से जिस हिसाब से बारिश हो रही है तो मुझे लगा आप भी कुछ लोगों क़ी तरह आने में असमर्थता व्यक्त कर पल्ला झाड़ लेंगे। मैंने कहा मिश्र जी हैदराबाद मैं  पिछले साढ़े तीन साल से हूँ और मैं आज पहली बार घऱ से छाता लेकर आया हूँ। निश्चिंत रहिए कोई पहुँचे न पहुँचे मैं अवश्य पहुँचूंगा।   
बारिश तो बारिश ठहरी वो भी आज हमारी परीक्षा लेने पर तुली थी। ख़ैर ऑफीस से निकले मेट्रो स्टेशन तक पैदल फ़िर मेट्रो ली अमिर पेट चेंज क़ी असेंबली उतरे ऑटो लिया और लीजिए हुज़ूर लेफ़्ट साइड से पूरे भीगते हुए 18:40 होटेल पहुँच गये। चौथी मंज़िल क़े हॉल में कार्यक्रम का इंतेजामात किया गया था। कुछ परिचित चेहरे देखकर दुआ सलाम हुई।गोविंद जी देखते ही आत्म विभोर हो गये मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर काफ़ी देर तक शुक्रिया अदा करते रहे। तदुपरांत सुनीता लुल्ला जी ,प्रिय संतोष पाण्डेय प्रिय विनोद से मुलाक़ात हुई।मुझे मिलाकर कुल ग्यारह लोग। हॉल क़ी क्षमता लगभग 70-80 बाहर वर्षा रानी झूम झूम कर हवा संग नाच रही हैं। तभी हॉल में वर्षा शर्मा जी ने प्रवेश किया। कुछ देर बात फ़ुर्सत मिलने पर उनसे मुलाक़ात हुई तो हमने थोड़ा हास्य बिखेरते हुए कह दिया 'बाहर भी आप अंदर भी आप' रब मेहर करें।
कोरोना काल में वर्चुअल माध्यम से जिनसे परिचय हुआ है वर्षा शर्मा उनमें से एक हैं। लगभग साढ़े सात बजे कार्यक्रम जैसे तैसे शुरू हुआ। प्रिय संतोष पाण्डेय ने संचालन संभाला (जिनको करना था शायद उन्हें अन्य क़े साथ वर्षा रानी ने आने न दिया हो) थोड़ी बहुत परेशानी क़े बाद संतोष ने अच्छी तरह मंच संभाल लिया ये और बात क़े कुछ लोगों क़े नाम वे भूल गये या गलत नामों से सम्बोधित कर बैठे। 😜ऐसा होता है मुझे 2001 में आंध्र भवन में अपनी पहली एंकरिंग याद हो आई।मंच पर ओम प्रकाश आदित्य, अशोक चक्रधर जी के साथ दो तीन कवि और थे। सरला माहेश्वरी जो कि दूरदर्शन में हिंदी की न्यूज़ रीडर थी हमारे (खादी और ग्रामोद्योग आयोग) सभी कार्यक्रमों का संचालन वे ही करती थीं, भयंकर बारिश होने के कारण नहीं आ सकी और हमारे डायरेक्टर साहब ने बुलाया और आदेश हो गया कि चूँकि तुम भी कवि हो (उस कार्यक्रम में नही था) तो संचालन तुम ही करो। मैंने जब सारी वस्तु स्थिति अशोक जी को बताई और ये भी बताया कि मैंने इससे पहले कभी किसी भी कार्यक्रम का संचालन नहीं किया है इस कारण दुविधा में हूँ तो अशोक जी ने पीठ थपथपाते हुए कहा, कोई बात नही कुछ इधर उधर होगा तो हम सम्भाल लेंगे आप शुरु करें। निश्चित उनका वो स्नेह और आत्मीय व्यव्हार मेरे मन को छू गया। शुरु में कुछ गडबड हुई किंतु फिर जो मैंने लय पकडी तो बाद में ओम प्रकाश आदित्य बोले और कितना अच्छा संचालन करना चाह्ते हो। खैर कार्यक्रम के बाद मैंने संतोष को वही घटना सुनाई और वही व्यव्हार उन्हें दिया जो अशोक जी और ओम प्रकाश जी ने मुझे दिया था। 
कार्यक्रम के प्रथम भाग में मंच पर आसीन सभी लोगों का बारी बारी से सम्मान किया गया । ततपश्चात गोविंद मिश्र जी की पुस्तक “ जलती आँते “ का लोकार्पण हम सभी मंचासीन लोगों द्वारा किया गया। कार्यक्रम के दूसरे भाग में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें उमा सोनी, विनोद, प्रिय संतोष पाण्डेय, वर्षा शर्मा, सुनीता लूल्ला, गोविंद मिश्र और मैंने भी अपना एक गीत प्रस्तुत किया। अच्छी बात ये रही कि दूसरे सत्र में काफी लोग भीगते भागते कार्यक्रम में आ पहुँचे थे जिससे हाल भर सा ही गया। मुझे यह कहने में कोई संकोच नही कि सबसे अच्छी प्रस्तुति वर्षा शर्मा की रही। उन्होंने गीत में जिस प्रकार से विशुद्ध हिंदी भाषा को प्रयोग किया वह सराहनीय है। उनकी आवाज़ काफी अच्छी है। माँ सरस्वती की उन पर कृपा है । मैंने कार्यक्रम के अंत में उनको सलाह भी दी कि यदि वे थोडा सा प्रयास करें तो वे अच्छी संचालिका हो सकती हैं। वर्षा रानी बाहर अब भी गाजे बाजे के साथ बरस रही थीं। खैर “भूखे भजन न होय गोपाला” साढे नौ बजते बजते खाना शुरु और तृप्त होकर हम निकल पडे घर की ओर लेकिन ये क्या  बूंदा बांदी अभी भी चालू थी। आटो वालों को हाथ दो तो वो हमारी तरफ देखे बिना ही भागे जा रहे थे। इंतेज़ार करते करते साढे दस और हमने सोचा और इंतेज़ार करने से बेहतर है पैदल ही चलते हैं। सो छ्तरी के नीचे किशोर दा का गाना “ तूने हमें क्या दिया री ज़िंदगी” गुनगुनाते हुए टूम्बक टू टूम्बक टू लिबर्टी चौक तक आ पहुँचे। तभी एक ऑटो ने पूछा कहाँ जाना है हमने कहा नामपल्ली छोड दोगे, इससे पहले कि वो पैसे बताता हमने कहा चलो, उसने पीछे मुडकर हमें देखा तो हम छतरी बंद कर मुस्कुराते हुए नज़र आए। वो भी मुस्कुराया और पंद्रह मिनिट के बाद हम नामपल्ली, गाँधी भवन मेट्रो छोड दिया। हमने उतरते हुए पूछा क्या सेवा करें हुज़ूर, शायद उसे ऐसे सम्बोधन की अपेक्षा न थी सो हाथ जोडकर बोला जो आप ठीक समझें, हमने कहा फिर भी, तो बोला अस्सी रुपये हमने मुस्कुराते हुए उसके हाथ में सौ का नोट धर दिया, इससे पहले कि वो पैसे वापिस देता हमने कहा अस्सी आपके और बाकी आपकी मुस्कुराहट के। हम भी खरामा खरामा घर की ओर एक खूबसूरत शाम की यादों के संग चल दिये।

-प्रदीप देवीशरण भट्ट- 27.07.2022

Friday, 24 June 2022

"“मिस्टर XYZ” (शर्म इनको मगर नहीं आती)"

 


“मिस्टर XYZ

(शर्म इनको मगर नहीं आती)


घोंघे तो आप सबने देखें ही होंगे कुछ लोग इन घोंघे जैसे ही होते हैं या शायद इनसे भी दस बीस कदम आगे। अब आप सोच रहे होंगे ये भट्ट साहब आज घोंघे का जिक्र क्यूँ कर रहें हैं या आप ये भी सोचें आज कुछ लम्बा स्यापा होने वाला है। हाँ दोस्तों काफी दिनों से एक विषय पर लिखने की सोच रहा था किंतु सुसरा मूड ही न बन रहा था, अब भैय्या बिना मूड के तो कुछ हो नही सकता और वो भी लेखन! तो जो इस प्रजाति के हैं उन्हें ये अच्छी तरह से पता होगा कि लेखक प्रजाति में सनकी होने को थोडा मक्खन लगा कर फिलोस्फर कहा जाता है। अब फिलोस्फर में तो पहला शब्द ही फिल है तो सोचिए जिसके दिमाग में कछु होय्ये न करी वो फिल का करेगा ऐं।  खैर जोक सपाट। बात आगे बढाते हैं। पिछ्ले वर्ष दिसम्बर-2021 में मैं एक कार्यक्रम के सिलसिले में भोपाल गया हुआ था। कार्यक्रम चूँकि हिंदी भवन में रखा गया था और संस्था द्वारा सभी के रहने के लिए भी हिंदी भवन में ही  इंतज़ाम किया गया था सो ट्रेन से उतकर पहुँच गये सीधे हिंदी भवन, ‘महादेवी वर्माहॉल जिसमें कार्यक्रम तो कुल मिलाकर ठीक ही था किंतु अतिथि गृह के कमरे में प्रवेश करते ही आभास हो गया कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा हिंदी भवन के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। खैर सोचा फिलहाल फ्रेश हो जाते हैं फिर दूसरी व्यवस्था देखेंगे किंतु बॉथरुम में घुसना और निकलने में मात्र दस सेकेंड लगे। ऐसा नही सिर्फ हमारा ही ये हाल था वरन जितने भी लोग अब तक पहुँचे हुए थे सब की राय एक थी कि हमसे न हो पाएगा सो एक मित्र को साथ लेकर निकल पडे अच्छे होटेल की तलाश में ये तलाश ख्तम हुई एम पी नगर के  होटेल निसर्ग पर। अच्छा होटेल सबसे अच्छी बात वहाँ की सर्विस जिसनें हम सभी को प्रभावित किया।

 

खैर अगले दिन हिंदी भवन के प्रोग्राम को अटेंड किया शाम को एक दुसरे कार्यक्रम के लिए निकल ही रहा था कि कुछ लोकन न्यूज़ वालों ने घेर लिया और बाइट की माँग की मैंने बडी सहजता से बाइट दे दी फिर एक लडके ने कहा सर हम पाँच लोग हैं देर से आए थे तो खाना भी नही खाया अगर आप ठीक समझें तो कुछ दें दे ताकि हम कुछ खा पी लें। चूँकि बात खाने की थी सो मैंने अपनी ओर से पाँच सौ रुपये दे दिये। तीसरे दिन जब हम ट्रेन से वापिस जा रहे थे तो मेरे मित्र का फोन आया चूँकि वो अपने गंतव्य पहुँच चुके थे तो हमारे बारे में जानने के उत्सुक थे, यहाँ वहाँ की बातें हुई फिर बातों बातों में उस सो कॉल्ड मीडिया टीम का जिक्र हो आया, जानकारी लेते लेते जानकर आश्चर्य हुआ कि वो लोग दस-ग्यारह हजार रुपये बटले कर ले गये थे, फिर मित्र ने पूछा तुमने भी दिया क्या ? हमने पूरी स्थित बयाँ कर दी तो हँसते हुए कहने लगे पंडित जी आप भी न, एक तो आप पंडित दूसरे कवि, कहीं पंडितों से कोई पैसे लेता है क्या और चलो जमाना बदल गया है लेकिन कवियों से न बाबा न, कवि और पुलिस वाले पैसे देते नही लेते हैं। हमने एक लम्बी श्वाँस भरते हुए कहा अगर वस्तु स्थिति पता होती तो उसे एक हज़ार की ऑफर करते लेकिन एक शर्त के साथ कि भैय्या दो ठो कविता सुननी पडेगी, वो हाँ भरता फिर हम चार पाँच कविताएँ मिलाकर उसे पहले एक कविता सुनाते, उसे सुनते सुनते वो आधा टेढा हो जाता फिर जैसे ही दूसरी सुनाने लगते वो निश्चित दो हजार हमें उल्टे देकर जाता और पैर अलग छुता। खैर आगे सावधान रहेंगे। अब ये किस्सा यहीं समाप्त किंतु इस घटना को हमने अपने स्मृति पटल से कभी ओझल नही होने दिया।

 

दिसम्बर के बाद काफी प्रोग्राम अटेंड किये कुछ अच्छी कुछ अच्छी यादों के साथ हम नेपाल के चार दिन के प्रवास होकर आए तो एक मित्र ने हमें एक संस्था से जोड दिया वहाँ काफी नये लोगों से परिचय हुआ कुछ पुराने हमें देखकर हर्षित भी हुए। कुछ दिनों बाद उसी संस्था से जुडे एक सज्जन मेरे द्वारा पोस्टिड कविताओं/गज़लों पर अपनी राय जाहिर करने लगे फिर कुछ दिनों बाद  मेसेंजर पर मेसेज किया कि सर आप अपना मोबाइल नम्बर दे दें आपसे बात करनी है। मैंने इसे नोर्मल मानते हुए नम्बर दे दिया। तीन चार दिन बाद ही उनका फोन आ गया। इधर उधर की बात करते हुए मेरी प्रोफाइल, कविताओं इत्यादि की काफी तारीफ की मैंने भी प्रत्युत्तर में कहा, ऐसा कुछ भी नही है हुज़ूर सब माँ सरस्वती की कृपा है, वो चाहती हैं तो लिखा जाता है वरना हम क्या हैं कुछ भी तो नहीं। खैर उन्होंने तुरंत बताया कि सर मैं एक न्यूज़ पेपर का एडिटर हूँ , इससे पहले मैंने ये किया वो किया, पता नही क्या किया फिर अंत में बोले मैं नये लेखकों की कविताएँ छापता हूँ ताकि उन्हें भी एक्सपोज़र मिले,आप जैसे बडे लोगों की रचनाएँ भी उन्हें पढनी चाहिए इसलिए मैंने आपसे सम्पर्क किया है कृपया आप अपनी 8-10 रचनाएँ, प्रोफाइल व एक फोटो दे दें। मैंने कहा मिस्टर XYZ बेहतर होगा आप और किसी से ले लें काफी मैं तो काफी छप लिया हूँ और  काफी खप भी लिया हूँ और कितना और कब तक्। मैं तो मंचो पर कविताएँ पढकर ही खुश हूँ। किंतु मिस्टर XYZ बिलकुल भी हार मानने के मूड में नही थे तुरंत कहने लगे सर आप नाराज़ न हों (मैने स्वंय से प्रश्न किया ऐं मैं भला मिस्टर XYZ से क्यूँ कर नाराज़ होने लगा) जब काफी देर तक ये प्रपंच चलता रहा तो हारकर मैंने कहा ठीक है मिस्टर XYZ मैं आपको pdf फाईल भेज देता हूँ आपको जो भी ठीक लगे छाप दें। धन्यवाद कहते हुए मिस्टर XYZ ने विदा ली। कुछ देर बाद मैं अपने मित्र सुहास भटनागर के साथ व्यस्त हो गया वो बेचारे मुझसे मिलने आए थे और इस इंतेज़ार में थे कि कब मुबलिया से सम्पर्क कटे ताकि हम गुफ्तगू कर सकें, अभी आधा घंटा ही बीता था कि मोबाईल की घंटी ने फिर तंद्रा भंग कर दी। देखा तो वही मिस्टर XYZ,मैने कहा क्या कुछ रह गया हुज़ूर, उधर से बडी धीमी आवाज़ में सर एक मदद चाहिए, कल बिटिया की फीस जमा करनी है और मैं पिछले कुछ दिनों से आर्थिक रुप से तंग हूँ, अगर आप 2000/- फोन पे या पेटिम कर दें दे तो मेहरबानी होगी। मैं अगले हफ्ते लौटा दूँगा। अचानक दिसम्बर की घटना मेरी स्मृति पटल पर ताजा हो उठी, किंतु फिर भी मैंने कहा देखिए मिस्टर XYZ मैं अभी कई प्रोग्राम अटेंड करके आया हूँ। इस समय तो आपकी मदद नही कर पाउँगा हाँ अगर आप अपना एकाउंट नम्बर दें दे तो मैं अगले हफ्ते ट्रांसफर किये देता हूँ। काफी देर तक सन्नाटा भांय भांय करता रहा फिर अचानक फोन कटने की आवाज़ से मुझे अंदाज़ा हो गया कि मिस्टर XYZ नम्बर एक के घोंघे हैं। सुहास भटनाग़र जो अब तक सारा माज़रा समझ चुके थे कातिल मुस्कान के साथ बोले बच गये गुरु। मैंने कहा नही मित्र बात दो हज़ार की नही है मिस्टर XYZ ने जो लूम लपेटा किया है मैं उससे व्यथित हुआ हूँ। ये कोई साहित्य की सेवा नही कर रहा वरन जो बच्चे लिख रहे हैं उन्हें मंच प्रदान करने के नाम पर पैसे ऐंठ रहा है। चाहे कोई अच्छा लिखे या कम अच्छा वो ये ज़रुर चाहता है कि उसका नाम अखबार में आए किंतु ये तो............। मेरा मन थोडा खिन्न हो गया था, सुहास जी मेरी मनोस्थिति को समझ चुके थे अतएव तुरंत किचन की ओर दौड लिए और दो कॉफी बनाकर ले आए। जब तक कॉफी बनी कई विचार मेरे दिमाग में इधर से उधर गुजर गये एक विचार ये भी कि जिस संस्था से ये मिस्टर XYZ जुडे हैं उनके सर्वेसर्वा को ये बात बता देता हुँ ताकि मिस्टर XYZ अपनी हरकतों से बाज़ आ जाएँ किंतु जाने क्या सोचकर मैंने चुप्पी साध लेना ही बेहतर समझा।किंतु मैं उस संस्था के पेज पर जाकर ये चैक अवश्य करता रहा कि आज बकरा कौन बना है, कुछ को मैं जानता था किंतु उनकी रचना नही छ्पी थी जिन्हें मैं जानता नही था और जिनकी रचनाएँ लगातार मेरा मुँह चिडा रही थी उनका दूरभाष नही था सो मैंने जैसी प्रभु की मर्ज़ी कहकर छोड दिया।

 

कुछ दिनों बात मेरी एक मित्र ने मुझे रात्रि में लगभग 11 बजे फोन किया कुछ आवश्यक कार्य था तभी उनके दूसरे फोन पर घंटी बजी, फिर बजी, फिर बजी ,फिर जब चौथी बार बजी तो मैंने ने कहा कौन है ये अतृप्त आत्मा पह्ले इसकी आत्मा तृप्त करो। उन्होनें बताया मिस्टर XYZ हैं कई दिनों से पीछे पडे हैं,जिद कर रहे थे कविताएँ छपवाने की, जिस पेपर से वो जुडे हैं मुझे तो वो कुछ खास नज़र नही आ रहा किंतु मान नही रहे थे तो मैंने दे दी, देने के बात कुछ मदद माँग रहे थे तो मैंने 501/- फोन पे कर दिये अब 2000/- माँग रहे हैं। अनायास ही मेरे मुँह से निकला आज रज़िया गुंडो में फँस गई। उधर से आवाज़ आई क्या मतलब तो मैंने पूरी कहानी बयाँ कर दी, पहले तो उन्हें विश्वास ही नही हुआ फिर बोली अब मैं क्या करुँ, मैंने भी मज़ाक में कह दिया “ एक पेन जॉन ले लो” खैर मैंने कहा जो दे दिया, दे दिया अब कुछ मत देना और हाँ कोई और भी अगर तुम्हारे सम्पर्क में है तो उन्हें इत्तेला कर दो कि मिस्टर XYZ से  सावधान रहे।  खैर उन मोहतरमा की कविताएँ तो छप गई और वो ये सोचकर खुश कि 1500 सौ बचे। कुछ दिन बीतते बीतते दो तीन किस्से और मिले सबको पैसे ऐठने के नाम पर अलग अलग कहानियाँ सुनाई गईं। कल लंच टाइम में अक्स्मात फोन की घंटी बज उठी लंच ख्त्म कर कॉल बैक किया फिर एक परिचित मोहतरमा थीं किसी विषय को लेकर चर्चा करनी थी, चर्चा के दौरान बातों बातों में उन्होंने भी मिस्टर XYZ के विषय में बताया, ये जानकर आश्चर्य हुआ कि उन्होंने 2000/- दे भी दिये और शायद दो तीन दिन बाद कविताएँ छप भी जाएँ, मैंने उन्हें टोकते हुए सारी वस्तु स्थिति बयाँ करने के लिए कहा तो उन्होंने बताया आप तो मुझे जानते हैं, मैं महीने में वैसे भी चार पाँच बार अखबारों में छप ही जाती हूँ किंतु मिस्टर XYZ उनके ऑफिस में काम करने वाले एक लडके की मदद माँग रहे थे जिसके पैर में काफी गहरी चोट लगी है और उसका ऑपरेशन होना है इसलिए मैंने भी 2000/- की मदद कर दी, इस मदद का कविताएँ छपने से कोई लेना देना नही है वैसे भी जिस दिन उन्होंने पैसे माँगे मेरे पति की बरसी थी इसलिए मैंने मना करना उचित नही समझा। ये सब सुनकर मुझे उस दुष्ट घोंघे पर भयंकर क्रोध आने लगा था। मैंने एक ही श्वांस में पिछली घटनाएँ बताई और ताकीद की कि ये बेवकूफी आगे नही करनी है, अपनी स्वंय की गरिमा का और अपनी कलम की गरिमा का ध्यान रखो। अब मेरे सब्र का बाँध टूटने की कगार पर आ गया था अतएव कल सोचा और आज कलम उठा ही ली। कलम इसलिए नही उठाई कि मिस्टर XYZ को एस्स्पोज़ करना है वरन इन जैसे घोंघो के कारण पूरा मीडिया बदनाम हो जाता है। जिस भी अखबार से वे जुडे हैं आखिर कुछ तो मिलता ही होगा या अखबार के मालिक ने छूट दे रखी है कि लो अखबार का एक पेज तुम्हारे नाम जाओ साहित्य के नाम पर लोगों को ठगो, अगर ऐसा है तो वो मालिक महोदय भी कटघरे में हैं। मैं अपने इस लेख की प्रति उन तक पोस्ट द्वारा भिजवाउँगा ज़रुर्। ताकि सच्चाई का कुछ तो पता चले वैसे भी मिस्टर XYZ जिस शहर से ताल्लुक रखते हैं वहाँ कुछ कुछ लोगों से मैं भी परिचित हूँ। कुछ मीडिया के मित्र भी हैं। हो सकता है कुछ लोगों को ये बात बुरी लगे और मिस्टर XYZ को भी पर मैं चाहता हूँ उन्हें बुरे लगे इसलिए तो मैंने लिखा है बाकी जय श्रीराम!

 

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-24.06.2022


Wednesday, 25 May 2022

" बस यूँ ही "

 


रिपोतार्ज़

                                            

                                     “बस यूँ ही”




 

कभी कभी आप कुछ करके या लिखकर भूल जाते हैं और ऐसा अकेले मेरे साथ ही होता हो ना जी ना ऐसा कभी न कभी सबके साथ होता है। खैर किस्सा कुछ यूँ है कि मैं 30 नवम्बर-2018 को मुम्बई से रिलीव हुआ और 12 दिसम्बर-2018 को मैंने अपने चरण कमल हैदराबाद में रख दिये। कादम्बिनी क्ल्ब, साहित्य सेवा समिति काव्य धारा, काव्य सरोवर, कहानीवाला, सूत्रधार न जाने कितन ग्रुप्स से जुडाव हुआ। “ यहाँ यह सनद रहे कि हैदराबाद ऑफिस में मैं अकेला देहली वाला (हिन्दी भाषी) बाकी सब तेलगू, दो कन्नड वाले। वो बोलते और मैं सुनता रहता किन्तु अच्छी बात यह थी कि ऑफिस में एक मात्र हिंदी समाचार पत्र “डेली हिन्दी मिलाप” मेरी सीट पर मेरे आने से पहले ही रखा हुआ होता। मैं भी खुश कि चलो कोई तो है जो दोस्ती निभा रहा है। मेरा अपना मानना रहा कि छ्पना और खपना मेरे बस की बात नही किंतु यहाँ यानि हैदराबाद में आकर कुछ मित्रों की सलाह को खारिज़ न कर सका और अंतोगत्वा 29 फरवरी-2020 को मेरा पहला काव्य संग्रह दरिया सूखकर सहरा हुआ है” उर्दु हॉल, हिमायत नगर में विमोचित हो गया।  फिर एक लम्बा समय कोरोना भाई साहब खा गये (अभी भी बीच बीच में अपनी उपस्थिति जताने से नही चूकते) इसी बीच निमंत्रण आते रहे और कोरोना भाई साहब को छ्काते हुए कुछ समय चुराते हुए विभिन्न शहरों के कवि सम्मेलन वगैरह में अपनी शिरकत करते रहे।

 

14 फरवरी-2022 जब हम ऑफिस पहुँचे तो टेबल पर रखे “डेली हिंदी मिलाप” रखा था, फ्रेश होकर पन्ने पलटने शुरु किया तभी होली पर्व पर प्रतियोगिता के विषय में पढा।जो कि युद्द्वीर फांऊडेशन करा था। कुछ देर सोचा और अगले ही दिन फॉर्म वगैरह भरकर कविता, फ़ोटो स्कैन की और भेज दिया।  इस बीच हम ऑफिस व्यक्तिगत कार्यों में व्यस्त हो गये। इसी बीच 15,16 अप्रैल गोवा में व 29,30 अप्रैल व 1 मई नेपाल के सम्मेलनों में व्यस्त हो गये। फुर्सत मिली तो कुछ और कार्यो में मन लगाकर बैठ गये ( हम सच्ची कह रहे हैं कार्यो में न कि किसी नाज़नीन से) लगभ 15-20 दिनों तक मेल भी खोलने की जहमत नही उठाई और उठाते भी क्यों अवकाश पर जो थे। घूमफिर कर 16 मई को हैदराबाद पहुँचे फिर 17 को ऑफिस्। एक लम्बे सफर के बाद थकावट भी आ ही जाती है ( भाई लोगों गलत न समझना-हम अभी बूढे न हुए हैं वैसे भी कवि का तन बूढा होता है कलम नही बल्कि कलम की धार तो कुछ ज़्यादा ही तेज़ हो जाती है) खैर 18 को मेल खोला तो मिलाप का मैसेज  “तनिक आप अपना दूरभाष/मोबाईल नम्बर तो देवें। मेल पढते ही हमारी बत्ती जल गई सब कुछ याद हो आया। तुरत ही अपना मोबाईल नम्बर छोड दिया, और लीजिए अगले दिन फातिमा जी का फोन आ गया। आप तो डेली हिन्दी मिलाप ऑफिस के सामने ही रहते हैं फिर आपने अपना मोबाईल नम्बर क्यूँ नही दिया। हमने बताया शायद भूल गये होंगे। फातिमा जी फिर बोली हम कब से आपसे सम्पर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं खैर कल आप ऑफिस आकर मिलें, हमने कहा सम्भव नही ऑफिस कार्यो में व्यस्त है, फुर्सत पाते ही आपके दर्शन करेंगे  सब कुछ जानते हुए भी हमने पूछा वैसे फातिमा जी मैटर क्या है। उन्होंने तुरंत ही बताया आपकी कविता को पुरुस्कार मिला है आप अपना प्रमाणपत्र यहाँ आकर प्राप्त कर लें, हमने कहा ऐं ये क्या बात हुई, फिर पूछ ही लिया क्या कोई फंक्शन नही कर रहे है उन्होंने तुरत कोरोना भाई साहब की दुहाई दे डाली। हम सोच में पड गये, कोरोना भाई साहब एक बार आये दूसरी बार आये तीसरी बार आए, अब जब कोरोना खुद को भारत में सुरक्षित महसूस नही कर रहा फिर ये इससे इतना क्यूँ डर रहे हैं, अरे भाई फंक्शन कर लेते थोडा चाय पानी का जुगाड हो जाता। खैर हमने आज यानि 23 मई को आने का वादा दिया। फातिमा जी बोली आज तो18 है हमने कहा मोहतरमा जहाँ से घर चलता है उसके प्रति भी हमारी कुछ जिम्मेदारी है ना।

 

आज लगभग 12:30 बजे हम हिंदी मिलाप के ऑफिस पहुँचे, रिसेप्शन वाले ने फातिमा जी को मैसेज छोडा और कुछ ही देर बाद फातिमा जी एक लिफाफा लेकर हमारे सम्मुख प्रकट हो गई। दुआ सलाम के बाद उन्होंने हमें प्रमाण पत्र व एक 6,000/- हजार का चैक थमा दिया और प्राप्ती के हस्ताक्षर के लिए कहा हमने भी चुपचाप अपनी फोटो के आगे ऑटोग्राफ देकर इतिश्री कर ली। हमने उन्हें धन्यवाद किया तो वो फट पडी, आप लोगों को क्या लगता है हम इसी काम के लिए बैठे हैं, हम मिलाप के स्टाफ हैं ,ये ट्रस्ट का काम हैं लेकिन हम फिर भी कर रहे हैं। मुझे लगा वे पता नही किस किस से नाराज़ होकर भरी बैठी हैं इसलिए पुन: उनका धन्यवाद किया किंतु उनकी नाराज़गी जा ही नही रही थी” आप सामने ही रहते हैं फिर भी.......... मैंने कहा मेरी कहाँ गल्ती है फातिमा जी मैं 3 हफ्ते से प्रवास पर देहली में था 16 को हैदराबाद वापिस आया हूँ, इससे पहले कि वे कुछ और कहती मैंने जय श्रीराम बोला और दरवाज़े की ओर लपक लिया।

 

ऑफिस आकर प्रमाण-पत्र चेक किया तो पाया मेरे प्रमाण-पत्र के साथ चिपक कर प्रिया जैन का प्रमाण-पत्र भी साथ ही आ गया है ( ना ना हुज़ुर सिर्फ प्रमाण-पत्र चेक वगैरह कुछ नही) आज तो सम्भव नही हाँ कल ज़रुर फातिमा जी को कष्ट दूँगा क्यों कि कल अगर प्रिया जैन अपना प्रमाण-पत्र लेने पहुँची और वो उन्हें नही मिला तो .............

 

 

जय श्रीराम

 

 

 

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-23:05:2022


" रिलीज़ "

 



                                                                                  “रिलीज़”

          प्रिया लगभग दौडती हुई पहली मंज़िल पर अपनी माँ के कमरे में पहुँच कर ठिठक गई, वह बुरी तरह हाँफ रही थी। शारदा चौधरी ने एक उचटती हुई सी निगाह उस पर डाली और बोली, क्या हुआ, अपने को संयत करते हुए प्रिया लगभग चीखती हुई बोली, माँ मैं ये क्या सुन रही हूँ ? शारदा चौधरी ने फिर एक उचटती हुई निगाह प्रिया की तरफ डाली और पूछा क्या सुन रही हो, खुलकर बोलो तो पता चले। प्रिया को शायद ऐसे किसी उत्तर की उम्मीद नही थी वह फिर बोली- माँ तुम मलिक अंकल के साथ शादी कर रही हो, बोलो माँ, शरदा चौधरी से कोई जवाब न पाकर वह फिर चिखी माँ तुम्हें शर्म नही आती इस उम्र में ये सब करते हुए तुम्हें तो सोचकर भी पाप लगना चाहिए। तुम्हारी इस हरकत से मेरे ससुराल में कितना बडा हंगामा हो गया है। तुम्हारा आठ साल का नाती है छ: साल की नातिन, वैभव भैय्या और भाभी सब टेंशन में हैं, तुम्हें ये क्या सूझी माँ, कुछ तो समाज का हमारा ख्याल करना चाहिए था ना। प्रिया एक साँस में पता नही क्या क्या कह गई। किंतु शारदा चौधरी अभी भी शांत भाव से पलंग पर ही बैठी सब कुछ सुनती रहीं। 

          तुम्हें और कुछ कहना है प्रिया या सब हो गया, एक बार फिर प्रिया को जोर का झटका जोर से लगा, वह हतप्रभ सी रह गई। माँ तुम जानती भी हो कुछ समझती भी हो या यूँ ही बैठे बिठाए मलिक की गोद में बैठने का फैसला ले लिया। वैभव की शादी पिछ्ले साल ही तो हुई है जल्दी ही तुम दादी बनने वाली हो, कुछ तो शर्म करो माँ। तुम्हारी उम्र अब 30-35 की नही रही बल्कि 53 साल की है। क्या इस उम्र में भी तुम्हें अय्याशी सूझ रही है, अब तुम्हारी उम्र नीचे से रिलीज़ होने की नही रही। तुम एक साथ चार चार घर बर्बाद करने पर तुली हो। इतना बडा मकान, दो दो गाडी, पापा का चलता हुए बिजनेस, जिसे अब तुम और वैभव सँभाल रहे हो। आखिर ऐसा निर्णय लेने से पहले तुम्हें पापा की बिलकुल भी याद नही आईं, पापा कितना प्यार करते थे तुम्हें और तुम उन्हें। फिर ये सब सब क्यूँ माँ। वैभव की तो हिम्मत ही नही हो रही तुमसे बात करने की और वो तुमसे बात भी क्या करेगा, भाभी अलग परेशान है कि उनके मैयके वाले क्या कहेंगे। तुम ऐसा कैसे कर सकती हो माँ। चीखते चीखते प्रिया रोने लगी और वहीं धम्म से ज़मीन पर बैठ गई।

          शारदा चौधरी अभी भी शांत भाव से सब कुछ सुन रही थीं, उन्होंने प्रिया से फिर पूछा कुछ और कहना सुनना है या आगे के शब्द उन्होंने जानबूझ कर हवा में तैरने के लिए छोड दिये। प्रिया ने सर उठाकर शारदा चौधरी की तरफ देखा, रो रो कर उसकी आँखे एकदम लाल हो चुकी थीं। फिर एक दम चिल्लाकर बोली हाँ मेरा हो चुका और तुम भौंको। शारदा चौधरी जानती थीं कि प्रिया अभी भी कॉफी अप्सेट है इसलिए बोलीं हाँ मैं भौकूँगीं, आज तो ज़रुर भौकूँगी फिर एकदम शांत स्वर में बोलीं  पहले तुम फ्रेश हो जाओ अगर ठीक लगे तो दो कॉफी बना लाओ फिर बैठकर बात करते हैं। मुझे उम्मीद है तुम अपनी माँ के लिए इतना तो कर सकती हो। प्रिया यंत्रवत सी खडी होकर वॉशरुम में गई फ्रेश हुई फिर किचन में जाकर दो कॉफी बनाकर माँ के पलंग के सामने कुर्सी डालकर बोली। अब बचा ही क्या है कुछ बोलने सुनने के लिए माँ फिर भी कहो मैं सुनने के लिए तैयार हूँ किंतु अंतिम बार।अगर आपने अपना फैसला नही बदला तो आज ये हमारी अंतिम मुलाकात होगी। एक फीकी सी मुस्कान के साथ शारदा चौधरी ने प्रिया के हाथ से कॉफी का मग लिया फिर न जाने क्या सोचकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली मैं इतनी भी बुरी नही प्रिया जितना तुम सोचे बैठी हो। खैर सुनो.....


          मैं जब 19 बरस की थी तब तुम्हारे पापा के साथ मेरी शादी हुई, तुम्हारे पापा का भरा पूरा परिवार था, मैं खुश थी मुझे कभी भी मायके की याद ज्यादा याद नही आई क्यों कि मुझे यहाँ पूरा मान सम्मान मिला। 21बरस की उम्र तुम आई फिर 24 की उम्र में वैभव फिर पता ही नही चला तुम दोनों की परवरिश में समय कैसे पंख लगाकर उड गया। तुम्हारा MBBS का 3rd year था और वैभव का इंजीनियरिंग में 1st year था,जब तुम्हारे पापा अचानक प्रभु के चरणों में विलीन हो गये। मैं उस समय 42 साल की थी। तुम्हारे पापा के जाने के बाद सभी ने हमसे किनारा कर लिया। सबको चिंता थी तो सिर्फ बिजनेस के अपने अपने हिस्से की, चलो शुक्र है तुम्हारे दादा जी जिंदा थे सो उन्होंने स्वंय ही बिजनेस के चार हिस्से कर सबको बराबर बाँट दिया। हमारे हिस्से में जो भी आया वो मेरे और तुम दोनों के लिए कॉफी था। मुझे जितनी समझ बूझ थी उसके अनुसार मैंने इसे आगे बढाया, ज्यादा का तो पता नही फिर भी तुम दोनों की पढाई लिखाई, शादी वगैरह में अच्छा खासा पैसा खर्च हुआ वो सब इस चलते हुए बिजनेस से ही आया। तुम्हारी शादी को भी 9 साल हो गये हैं विभू की शादी को दूसरा लग गया है, तुम दोनों अपने अपने कामों में व्यस्त हो। मुझे ये बिलकुल भी पसंद नही कि मैं अपनी मर्ज़ी किसी पर थोपूँ फिर चाहे वो मेरे अपने बच्चे ही क्यूँ न हों। कहते कहते शारदा चौधरी ने एक लम्बा पॉज़ लिया। तुम आज लगभग तैंतीस साल की हो गई हो और मैं 53 की होकर चौवन में लग गई हूँ। इसमें कोई शक नही कि तुम्हारे पापा घर का भी ख्याल रखते थे मेरा भी बच्चों का भी और बिजनेस का भी और शायद  कहते कहते शारदा चौधरी ने फिर एक लम्बा पॉज़ लिया, मुझे कोई शियाकत भी नही उनसे, हर व्यक्ति की ज़िंदगी में कुछ पल अपने लिए भी होने चाहिए जो शायद तुम्हारे पापा भी चाहते थे। पहले तुम दोनों की जिम्मेदारी, फिर तुम्हारी शादी फिर विभू की जिम्मेदारी फिर शादी। तुम दोनों अपनी अपनी फैमली में खुश हो और मैं भी तुम दोनों से कोई शिकवा शिकायत नही रखती क्यों कि समय के साथ ऐसा ही होता है और हमें इसे हँसकर स्वीकार कर लेना चाहिए न कि बच्चों को कोसते हुए ज़िंदगी गुजारनी चाहिए।

          खैर मलिक जी मेरी ज़िंदगी में 2-3 बरस पूर्व आए, हर तरह से जिंदादिल इंसान, तकलीफें हैं किंतु सिर्फ अपने लिए मानते हैं किसी को उन तकलीफों में शामिल करना पसंद नही करते। उनका मानना है लोगों को बताकर या सुनाकर क्या होगा, लोग सुनेंगें हमदर्दी जतायेंगे फिर भूल जायेंगे, कभी उनमे से किसी से मुलाकात होगी तो वो मेरी ज़िंदगी के भरे हुए पन्ने मुझे ही सुनायेंगे इसलिए किसी को कुछ न बताना है न जताना है। ईश्वर ने जो ज़िंदगी दी वो उसमें बहुत खुश हैं। उनसे जो भी मिलता है वो उन्हें उनके व्यवहार के कारण याद रखता है। तकलीफों के बीच रहकर भी कैसे खुश रहा जाता है ये मैंने उन्हीं से सीखा।  

          आज की तारिख में उनका मुझसे कैसा सम्बंध है ये तुम अभी नही समझ पाओगी। कुछ और बाल पकने दो। हाँ उनकी उम्र भी बता देती हूँ वे 58 वर्ष के हैं, एक बेटी है जिसकी शादी हो चुकी है। भारतीय जीवन बीमा निगम से स्वैछिक रिटायर्मेंट ले लिया है। पेंशन में खुश हैं। उनका वैवाहिक जीवन न के बराबर है जानती हो अच्छी बात क्या है कि इसके बावज़ूद घर की जिम्मेदारी अभी तक निभाते आ रहे हैं। मैंने एक दिन जोर देकर पूछा भी था तकलीफ नही होती जो साथ है उसके साथ बात भी नहीं तो जानती हो हँसकर बोले “ ये ज़रूरी नही उससे नफरत करुँ, दूर रहने के और भी रास्ते” और फिर जोर से बडी देर तक खिलखिलाकर हँसते रहे। अब रही तुम्हारी रिलीज़ होने वाली बात तो प्रिया- रिलीज़ होने की कोई उम्र नही होती। महत्वपूर्ण यह है कि आप रिलीज़ कहाँ से होना चाहते हैं, सिर्फ नीचे से या ऊपर से यानि दिल से भी। हम समय समय पर नीचे से रिलीज़ होते रहते कभी चाह्ते हुए भी और कभी न चाह्ते हुए भी किंतु ऊपर यानि दिल में पता नही क्या क्या भरकर बैठे रहते हैं, किसी को दिल से रिलिज़ होने का मौका मिलता है किंतु ज्यादातर को निश्चित नही और इसमें पुरुष और  स्त्रियाँ दोनों ही होती हैं। स्त्रियाँ तो कभी कभी अपनी सहेली से कह सुन भी लेती हैं किंतु ज्यादातर पुरुष स्वंय में ही घुटते रहते हैं। से याद रखो नीचे से रिलीज़ तो कुदरत भी कर देती हैं किंतु ऊपर से हमें स्वंय होना पडता है और इसके लिए एक ऐसे व्यक्ति की ज़रुरत पडती है सबके साथ तो रहे किंतु आपके साथ विशेष्। कहते हैं न ढूँढने से तो भगवान भी मिल जाते हैं सो मैं इसे ईश्वर की कृपा मानती हूँ कि जो मुझे मलिक जी टकरा गये। प्रिया तुम शायद गुस्से में कुछ ज्यादा ही तल्ख हो गई थीं इसलिए अपनी माँ पर ही तुमने ये सवाल दाग दिया। प्रिया कुछ बोलना चाहती थी किंतु शारदा चौधरी ने हाथ के इशारे से चुप रहने के लिए कह दिया और फिर प्रवाह को आगे बढाते हुए बोलीं। लडकी हो या औरत एक उम्र तक ही रिलीज़ हो पाती है मैं भी हुई और तुम अब भी हो रही हो, कभी स्वंय के द्वारा या कभी अपने साथी के द्वारा किंतु जितना जोर हम नीचे की रिलीज़ पर देते हैं या सोचते हैं क्या उतना कभी ऊपर के रिलीज़ पर देते हैं। कभी नहीं।नीचे से रिलीज़ करने वाला साथी मिल जाता है किंतु ऊपर से रिलीज़ करने वाला.... किस्मत वालों को ही मिलता है। (शारदा चौधरी प्रिया की बातों से इतनी दुखी हो गई थीं कि कई वाक्यों को उन्होंने कई बार दोहरा दिया था।) कुछ रुककर वो फिर बोलीं  खैर सुनों मैं और मलिक जी शादी नही कर रहे क्यों कि मलिक जी पहली से ही बहुत कुछ सह चुके हैं बडी मुश्किल से उन्होंने खुद को सम्भाला है और अब लोगों को कैसे सम्भ्ला जाता है सिखाते हैं। हम दोनों ने ही तय किया है कि महीने में एक या दो बार हम दोनों ही कहीं बाहर जाया करेंगे एक दूसरे को ऊपर से रिलीज़ होने में मदद करेंगे कभी ज़रुरत पडी तो नीचे से भी।और हाँ अय्याशी ही करनी होती तो मैं ग्यारह साल इंतेज़ार नही करती। किसी के साथ समय निभाने को अय्याशी नही कहा जा सकता अगली बार जब तुम ये शब्द इस्तेमाल करो तो सौ बार सोचना। एक अंतिम बात उन्हें मेरी ज़रुरत कम है मुझे उनकी ज्यादा क्यों कि उन्होंने बरसों से तकलीफों में जीना सीख लिया है और मैंने अभी शुरु ही किया है। 


-प्रदीप देवीशरण भट्ट-25:05:2022