Tuesday, 4 July 2017

दोगले लोगों की जात न पूछो





“Not My Name, lynching”
                                           (दोगले लोगों की जात न पूछो)


पिछले कुछ दिनों से फ़िर एक सेलेक्टिव गैंग चर्चा में आना चाहता हैं इस गैंग का मकसद सिर्फ़ इतना है कि देशी में जो कुछ भी अच्छा हो रहा है उस पर मिट्टी कैसे डाली जाये इन बेहुदे लोगों का सिर्फ़ एक ही प्रयास है कि किसी भी तरह देश में कांग्रेस पार्टी अपनी सरकार बना ले ताकि ये फ़िर से अपनी कहिलियत का प्रदर्शन कर सके। इन्हें इस बात से कोई लेना देना नहीं कि देश वर्तमान सरकार के विषय में क्या सोच रहा है इन्हें बस तकलीफ़ इस बात से है कि देश के लोग वर्तमान सरकार के कार्यों से क्यूँ कर खुश हैं या ये कहूँ कि ये इस बात से ज्यादा परेशान है की भारत के लोगों की इतनी हिम्मत कि बिना कांग्रेस के भी ये खुश रह सकते हैं।जब कि ये विषय अलहदा है कि देश के काफी लोग वर्तमान सरकार से नाराज़ भी हैं लेकिन वे अच्छे कार्यों का समर्थन भी कर रहे हैं फ़िर चाहे वो नोट्बंदी हो या १ जुलाई से लागू जी एस टी। लेकिन इस गैंग के हिसाब से देश में ये सब-कुछ ठीक नहीं हो रहा है। सम्पूर्ण विपक्ष इसी उधेड़बुन में लगा हुआ है कि ऐसा क्या दांव खेला जाये जिससे वर्तमान सरकार और ज्यादा परेशान हो जाये लेकिन कहते हैं ना कि कौव्वे के कोसने से हाथी नहीं मरा करते आज वर्तमान सरकार और विपक्ष की स्थिति उस कौव्वे से ज्यादा कुछ भी नहीं है जो निरंतर कांव कांव किये जा रहा है किन्तु उसकी कांव कांव से ज्यादा लोग कोयल की कूक सुनना पसंद कर रहे हैं और यही विपक्ष की हताशा का मुख्य कारण है।

      स्वतंत्रा के बाद से जयादातर समय कांग्रेस ने ही इस देश की सत्ता का स्वाद लिया है। राष्टपति चुनाव हो या उपराष्ट्रपति चुनाव या कुछ और अहम् निर्णय कांग्रेस ने कभी भी विपक्ष को अधिक तव्वजो नहीं दी एवं सदैव अपने ही प्रत्याक्षी मैदान में उतारे और उन्हें साम दाम दण्ड तीनों तरह की नीतियों से जितवाया भी। चूँकि अब विपक्ष के पास कुछ करने को है नहीं अतएव वह इसी प्रयास में रहता है कि कैसे सत्ता पक्ष के अच्छे कार्यों में अडंगा लगाया जाये।  आप सबको याद योग 2015 में दादरी में एक घटना हुई थी जिसमें गाँव के कुछ लोगों ने बीफ़ रखने और खाने के संदेह में एक मुस्लिम परिवार अनाचार किया जिसकी विपक्ष द्वारा बड़ी तीखी प्रतिक्रिया पर्दर्शित की गई फ़िर राजस्थान में पहलूँ खां (समझ नही आता सारे के सारे खां ही क्यूँ है और भी जातियां हैं न मुस्लिम में) का मरना और अब एक नया किस्सा जिसमें बताया जा रहा है कि कुछ लोगों ने लोकल ट्रेन में कुछ लोगों ने एक सोलह साल के लड़के जुनैद को मार दिया ,अब वो लड़का चूँकि मुस्लिम है इसलिए कुछ छद्म पैरोकारों ने तुरंत प्रभाव से अपनी अपनी ढपली निकाली और लगे बजाने कि भारत में रहने वाले अल्पसंख्यों के साथ ज्यातती हो रही है। वैसे तो मुझे इस अल्पसंख्यों? पर भी आपत्ति है जिस देश में मात्र 50 लाख जैन धर्म के लोग रहते हों वहां वो अल्पसंखक नहीं है और ना ही पारसी समुदाय बस वोटों की राजनीती ने 20-22 करोड़ लोगों को अल्पसंखक का दर्जा दे डाला ताकि चुनाव में इनको बेवकूफ बनाया जा सके और ये छद्म मुस्लिम भी ऐसे हैं कि वास्तविकता को समझने का यत्न ही नहीं करते। आख़िर कब तक ये लोग राजनैतिक पार्टियों द्वारा छले जाने के लिए अभिशप्त रहेंगे।

पिछले कुछ दिनों से एक वर्ड बार बार कानों को सुनाई दे रहा है कि समाज के तबके के कुछ सेंसेटिव लोग लिंचइंग के विरोध में नोट माय नाम: के एक आडम्बर के तहत अलग अलग शहरों में मार्च निकाल रहे हैं क्यों? क्यों कि ये इस बात से आहत हैं कि इन दिनों भीड़ द्वारा लोगों को निर्मम तरीके से मारा जा रहा है और इसके शिकार ज्यादातर मुस्लिम और दलित है?  मुझे इस बात पर खीज भी आती है और हसीं भी क्यों कि ये पहली नज़र में कुछ दिग्भ्रमित लोगों द्वारा देश में फैलाये जा रहे अंट शंट  या बे सिरपैर वाली बातों का जमावड़ा ज्यादा लगता है। इनकी नियत भी साफ नहीं है ऐसा करके ये सिर्फ़ लोगों को व्यक्ति विशेष या जाति विशेष के लोगों को भड़काना मात्र चाहते हैं । इनकी मजबूर भी साफ है क्यों कि वर्तमान परिस्थिति में इनके करने के लिए कुछ बचा नहीं है। ये इनकी हताशा को ज्यादा दर्शा रहा है।

कल ही मैं बालासुब्र्ह्मन्यम जो कि टाइम्स ऑफ इंडिया के पूर्व संपादक हैं का खुला पत्र जो उन्होंने शबाना आज़मी के नाम संबोधित किया है पढ़ रहा था उसमें उन्होंने वही सब शामिल किया है जिसकी मैं स्वम भी अपने पूर्व के लेख में पहले ही लिख चुका हूँ। जब दादरी कांड होता है तो भारत के कुछ दुष्ट लोग अपना अवार्ड वापस करने का ढोंग करते हैं, जब पहलु खां के साथ राजस्थान में एक दुर्घटना होती है तब ये सब गैंग पता नहीं किस खोल से बाहर आकर अपने अवार्ड वापिस करने लगते हैं इसी प्रकार एक मोमबत्ती गैंग हैं जो डेल्ही में निर्भया के समय काफी मुखर हो जाता है और फ़िर चादर तान के सो जाता है। इस तरह के हजारों नहीं लाखों लोग हैं जो सिर्फ़ अपनी तुष्टिकरण की नीतियों के कारण ही आज तक समाज में बचे हुए हैं क्यों कि उन्हने पता है कि अगर उन्हें कोई कुछ कहेगा तो अवार्ड वापिसी गैंग, मोमबत्ती गैंग सड़कों पर उतर कर सरकार को घेरने के लिए तैयार बैठा है जैसे कि भारतीय सेना के द्वारा आतंकवादियों के विरुद्ध किया जा रहे अभियानों में काश्मीर के नामुराद और ना शुक्रे लोग उसी सेना को पत्थरों से नवाजते हैं जो उन्हें बाढ़ से बचाती है जो उन्हें उन आतंकवादियों से बचाती है जो उनके सामने ही उनकी बहु बेटियों की इज्ज़र को तार तार करते हैं।

आख़िर जो बोया है उसी को तो काटना पड़ता है 1990 के दशक के समय कैसे 5 लाख हिन्दुओं को जिनमें ज्यदातर पण्डित थे मार मार के काश्मीर से बाहर फ़ेंक दिया जाता है तब उस समय की सरकार क्या करती है ये किसी से छिपा हुआ नहीं है। इन 27 वर्षों में कश्मीरी हिन्दुओं की पूरी की पूरी पीढ़ी ही बदल गई उनमें से ज्यादातर को ये पता ही नहीं की उनकी माँ बहनों के साथ काश्मीर के मुसलमानों ने कैसा वीभत्स अत्याचार किया था उनके भाइयों,चाचा,ताऊओं और ज्यादातर के तो माँ और बाप दोनों को बड़ी बेरहमी से मार दिया गया था। उस वक्त कितने मोर्चे निकाले गए थे,उस वक्त कितने लोगों ने अपने अवार्ड वापस किये थे, कितने लोगों ने आज तक इस वाक्य का प्रयोग किया कि ये घटना देखकर मेरा खून खौल जाता है जैसा कि परसों ही प्रियंका गाँधी और राहुल गाँधी इन घटनाओं पर स्यापा कर रहे थे। जब 1984 में सिखों का सारे आम कत्ले आम हुआ तब कांग्रेस की ही सरकार थी तब किसी का ना तो खून खुला और ना ही कोई मोमबत्ती गैंग सामने आया और ना ही किसी ने अपने अवार्ड वापिस किये । आख़िर क्यों इसका जवाब किसी के पास नहीं है और कांग्रेस के पास तो बिलकुल भी नहीं,क्यों की देश की आज जो ज्वलंत समस्याएं हैं उनका बीजारोपण कांग्रेस के समय में ही हुआ था। वैसे भी ढाई साल जनता पार्टी एवं नौ साल भाजपा का शासन छोड़ भी दिया जाये तो बाकी इन 70 सालों में कांग्रेस ने ही इस देश पर शासन किया है वह यह कहकर नहीं बच सकती की कुछ हमारी भी कमियां रहीं या मजबूरियां रहीं।

पिछले दिनों ही एक विडियो वायरल हो रही थी जिसमें दिखया गया है कि कैसे कुछ मुस्लिम युवक (उनमें दो या तीन नाबालिक भी थे) कैसे दो लड़कियों के साथ वहशियाना हरकत कर रहे थे। उम्र में बड़ी लड़की दूसरी छोटी उम्र की लड़की को उन मानसिक रोगियों से बचाने का का प्रयास करती नज़र आ रही है। यह विडियो पुरे देश और शायद विदेशों में भी खूब वायरल हुआ कितने गैंग इस वहशियाना हरकत के लिए सड़कों पर आये? पश्चिम बंगाल में ट्रकों में भरकर मुस्लिम हिन्दुओं के गांवों में जाते हैं और पूरा का पूरा गाँव लूट लेते हैं या जला देते हैं किन्तु आश्चर्य देश के किसी भी हिस्से से विरोध की कोई भी आवाज नहीं आती ऐसा क्यों ? पहली बात तो पश्चिम बंगाल में वर्तमान सरकार हिन्दुओं के साथ जैसा व्यवहार कर रही है और जिस प्रकार वहां का मीडिया और देश का मुख्य मीडिया जो पक्षपात पूर्ण रवैय्या रहा है वह असहनीय है। आपको याद है पिछले साल कोलकत्ता में रिहर्सल के दौरान अभिमन्यु नाम के एक सैनिक को मुस्लिम विधायक की गाड़ी द्वारा रौंद दिया गया,बस एक खबर बस छपी और चैनल पर दिखाई दी उसके बाद क्या हुआ कोई नहीं जानता। डेल्ही में भजनपुरा की एक घटना जिसमें मुस्लिम युवक से गाड़ी के पेपर दिखाने का आग्रह करने पर पुरे झुण्ड ने कैसे उस हवालदार को धुन दिया था । राम लला के दर्शन करने जा रहे उन रामभक्तों को जब ट्रेन में जलाकर मार दिया जाता है तब और काश्मीर में जिस तरह आये दिन वहां पर हिन्दू हो या मुस्लिम या सिख जवान उनके साथ वहां के लोग कैसा बुरा बर्ताव करते हैं वो किसी से छुपा हुआ नहीं है। पहले जम्मू काश्मीर में सेना के एक लेफ्टिनेंट उमर फैय्याज मार दिया जाता कुछ समय बाद जम्मू काश्मीर में डार को मार दिया जाता है फ़िर डी एस पी अयूब पण्डित को मस्जिद के सामने ही वहशी भीड़ द्वारा मार दिया जाता है लेकिन फ़िर से आश्चर्य सिवाय नेशनल टीवी पर गर्मा गरम चर्चा के अलावा कोई कार्रवाई नहीं होती। आख़िर ऐसा सेलेक्टिवनेस कब तक चलेगी।

उपरोक्त घटनाओं पर नेशनल टीवी पर बड़े बड़े डिबेट आयोजित करते हैं जिसमें देश के जाने माने पत्रकार,नेता कुछ सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता बड़ी बड़ी बातें करते नज़र आते हैं। इस तरह की डिबेटों में शबनम लोन जो सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता कम और जम्मू और काश्मीर वर्तमान स्थिति की परोकर ज्यादा लगती हैं ऐसा ही हाल हैं इंजिनियर राशिद जो जम्मू काश्मीर से विधायक हैं? इनके अतिरिक्त और भी हैं जिन्हें शायद एजेंडा ही काश्मीर की अर्तमान स्थिति को और बिगड़ना मात्र है। रामपुर उत्तर प्रदेश से विधायक आजम खां सदैव नकारात्मक ही बोलते हैं ताज़ा उदाहरण उनका सेना पर दिए उनके बयान से ताल्लुक रखता है इसी प्रकार डेल्ही के संदीप दीक्षित है जो पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र हैं, चर्चा में बने रहने के लिए ये जनरल रावत को गुंडा तक कह देते है और पूरा देश का छद्म मीडिया बुद्धिजीवी सब सुट्टा मार कर बैठ जाते हैं। इसी प्रकार हैदराबाद से छोटे बड़े ओवेसी। भगवान जाने ये लोग क्या साबित करना चाहते हैं। इनकी हरकते देखकर मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये हिन्दुओं के नहीं वरन मुसलमानों के ज्यादा दुश्मन हैं। इनका एक मात्र उद्देश्य सत्ता में बने रहने का है। इसके लिए किसी भी हद तक अपनी ही कौम को बर्बाद करने से भी पीछे नहीं रहने वाले।

 और अंत में ये प्रश्न उन चैनल वालों से भी है कि जब उन्हें पता है कि इनकी फ़ितरत नियत सब कुछ पाकिस्तान से संचालित होती है तो ये भारत का अच्छा तो कभी सपने में भी नहीं सोचने वाले फ़िर क्यूँ इन्हें नेशनल टीवी पर पूरे देश का मूड ख़राब करने के लिए बुलाया जाता है। कहीं इसका कारण टी आर पी तो नहीं है अगर ऐसा है तो इन चैनल को डिबेट में भाषण बाजी बंद करनी चाहिए। ये लोग क्यूँ अपना और देश के देशभक्त लोगों को अपने व्यवहार से आहात करने का काम करते हैं। आवश्यकता हैं इन्हें अपने अंतर्मन में झाँकने की। देश से बढ़कर कभी भी कुछ भी नहीं हो सकता शायद ये बात कुछ नेशनल टीवी के एंकरिंग करने वालों को भी आम जन से सिखने की आवशयकता है।  

-प्रदीप भट्ट –
Tuesday, JULY 04, 2017



Tuesday, 20 June 2017

मौका गंवा दिया न




मौका मौका करते करते मौका ही गँवा दिया
चैम्पियन ट्राफी




इस बार जब बड़े जोशों खरोश से चैम्पियन ट्राफी का आगाज़ 4 जून -2017 को इंग्लैंड में हुआ तो भारत का पहला मुकाबला ही अपने चिरपरिचित प्रतिद्वंदी पाकिस्तान के साथ हुआ। इस मैच से पहले इस मैच को लेकर जितना हो हल्ला सोशल मीडिया पर हुआ और इंडिया न्यूज़ पर तो भारत-वर्ष और पाकिस्तान के मध्य बाकायदा तेज और बेमतलब की बहस छेड़ी गई जिसमें दोनों तरफ़ के कुछ कविओं तक ने अपनी अपनी टीम को न केवल चियर किया बल्कि टीम के लिए अपनी भावनाएं कविताओं और शेरों के माध्यम से व्यक्त भी की गई। इस सबका कोई नतीज़ा तो निकलने वाला नहीं था लेकिन दोनों ही तरफ़ के मीडिया हाउस अपनी टी आर पी बढ़ाने में अवश्य कामयाब हो गए और ये सिलसिला 18 जून तक हर मैच से पहले लगभग हर चैनल पर होता रहा। मेरी व्यक्तिगत राय में भारत और पाकिस्तान के मैच को इतनी तव्वकों देने की ज़रूरत नहीं थी लेकिन आदत है न जाते जाते ही जाती है ये बात और किसी विषय में भले ही लागू हो जाये लेकिन भारत-पाक क्रिकेट मैच में तो बिलकूल भी और कभी भी लागू नहीं होने वाली।


जब चैम्पियन ट्राफी की घोषणा हुई थी तब भारत अकेला देश था जिसने इस चैम्पियन ट्राफी में भेजने के लिए टीम की घोषणा ही नहीं की।  शायद बी सी सी आई भारत सरकार के रुख का इंतजार कर रहा था कि कहीं वो टीम की घोषणा करे और भारत सरकार बॉर्डर पर पाकिस्तानी बैट (बॉर्डर एक्शन टीम,टीम जिसमें ज्यादातर आतंकवादी शामिल हैं) टीम द्वारा भारत के सैनिकों के सर काटे जाने की घटना को गंभीरता से लेते हुए पाकिस्तान के साथ क्रिकेट न खेलने का फ़ैसला कर ले तब ऐसी स्थिति में बी सी सी आई की स्थिति उस सांप जैसी हो जाती जिसने छछूंदर निगलने की कोशिश की और वह उसके हलक में अटक गया था अब अगर वो छछूंदर को बाहर उगल दे तो अँधा हो जाये और अगर निगल ले तो मर जाये। खैर काफ़ी उहापोह के पश्चात् बी सी सी आई ने मई के अंतिम सप्ताह में टीम की घोषणा कर दी और उसे चैम्पियन ट्राफी के लिए लंदन रवाना भी कर दिया गया। शुरुआत में भारतीय टीम ने अपने दो प्रैक्टिस मैच भी खेले ताकि वहां के माहोल में ढला जा सके ताकि पाकिस्तानी टीम को 4 जून के मुक़ाबले में हराया भी जा सके।


अप्रत्याशित तौर पर अफ़गानिस्तान क्रिकेट टीम जो अभी अपने शैशव काल में ही है ने अधिकारिक तौर पर ये घोषणा कर दी कि चूँकि पाकिस्तान अफ़गानिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है जिससे उसे सपने देश में शांति स्थापित करने में अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पढ़ रहा है अतएव अफ़गानिस्तान की सरकार ने इन परिस्थितियों में पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने से इंकार कर दिया। है न आश्चर्य ? भारत पाकिस्तान के बीच जो तनाव चल रहा है उसकों देखते हुए लोग ये अपेक्षा कर रहे थे कि भारत देर सवेर ज़रुर ये घोषणा करेगा कि वो चैम्पियन ट्राफी में पाकिस्तान के साथ क्रिकेट नहीं खेलेगा लेकिन हुआ इसके बिलकुल विपरीत। निश्चित रूप से पैसा देश की भावनाओं पर ज्यादा भारी पड़ गया। लेकिन शायद भारत के लोग भी बॉर्डर पर जो स्थिति है उसमें भारतीय सेना द्वारा दिए जा रहे जवाब से संतुष्ट नहीं है इसलिए लोग ऐसा सोचते हैं कि क्यों न खेल के मैदान पर ही पाकिस्तान को पटकनी दे दी जाये। और ऐसा हो भी गया चैम्पियन ट्रॉफी के आगाजी मैच में ही भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह हरा दिया किन्तु अगले ही मैच में वो श्रीलंका से हार भी गया किन्तु उसका इतना हो हल्ला नहीं हुआ क्यों कि बांग्लादेश को हराकर भारत ने फाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली और इससे पहले अप्रत्याशित तौर पर पाकिस्तान ने इंग्लैंड को सेमेफिनल में हराकर फाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली और ये निश्चित हो गया कि फाइनल का मुकाबला भारत और पाकिस्तान के बीच ही होगा क्यों की बांग्लादेश को हराना भारत के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं था और ऐसा हुआ भी।


 लेकिन पाकिस्तान के हाथों इंग्लैंड की पिटाई ये किसी से हजम नहीं हो रही थी तभी पाकिस्तान के एक पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी ने घोषणा कर दी कि पाकिस्तान और इंग्लैंड के बीच खेला गया फर्स्ट सेमिफिनल फिक्स्ड था। इसके उपर हो हल्ला तो हुआ लेकिन जितना अपेक्षित था उतना नहीं किन्तु लोगों ने अपने अपने कयास लगाने शुरू कर दिए कि चूँकि आई सी सी को मालूम है कि फाइनल मुकाबला अगर और किन्हीं दो देशों के बीच खेला गया तो स्टेडियम खाली ही रहने वाला है और अगर ये मुकाबला भारत पाकिस्तान के मध्य हुआ तो पैसा कमाने के मामले में आई सी सी की बल्ले बल्ले हो जानी है। और देखिये 18 जून 2017 को पूरा का पूरा स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था अगर दोनों टीमों के सपोटर्स की बात करें तो जहाँ भारत के सपोटर्स 70-75 प्रतिशत रहे वहीँ पाकिस्तान के ज्यादा से ज्यादा 15-20 प्रतिशत। ये भी जगजाहिर है कि भारत के सपोटर्स पूरी दुनियां में फैले हुए हैं और वे महंगी से महंगी टिकेट लेकर भी दूर दूर से भारत का मैच देखने आते हैं।


18 जून 2017 को जो फाइनल हुआ उसमें भारत के टॉस जितने के बावजूद कोहली का पाकिस्तान टीम को पहले बल्लेबाजी करने का निमंत्रण देना लगभग सभी की समझ से परे था माना कि कोहली की इमेज चेज़र की है लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि परिस्थितियां सदैव आपके अनुकूल ही रहने वाली हैं। अच्छी टीम और अच्छे खिलाड़ी की पहचान तो विपरीत परिस्थितियों में भी असाधारण प्रदर्शन कर अपने देश को विजयी करवाने में है न कि परिस्थितियों के अनुकूल होने की प्रतीक्षा करने में। कई बार ज्यादा समझदार आदमी भी गलती करता है और कोहली ने उस दिन फाइनल में यही गलती की। जब आप पहले बैटिंग करते हैं तो आपके ऊपर कोई दबाव नहीं रहता है और चेज़ करने में हमेशा ये दबाव रहता है कि अब अगर रनगति नहीं बढाई तो मैच हाथ से जा सकता है। इस तरह के पल इस तरह के महत्वपूर्ण मैच में आते ही रहते हैं

बीती ताहिं बिसार दे,आगे की सुध लेअब कोहली और भारतीय टीम के लिए यही बेहतर है कि वो इस हार को एक हार की तरह लें और 23 जून से शुरू हो रहे वेस्टइंडीज़ के विरुद्ध एक दिवसीय मैचों की तरफ़ अपना ध्यान लगाये। एक मैच हारने से ज़िन्दगी ख़त्म नहीं हो जाती और एक मैच जितने भर से ज़िन्दगी सम्पूर्ण नहीं हो जाती। ये तो जीवन है और हार जीत तो लगी रहती है किन्तु महत्पूर्ण मैच हो तो अपने सभी वरिष्ठों से सलाह मश्विरा किया जा सकता है जो कि व्यक्तिगत तौर पर भले ही अच्छा ने लगे किन्तु देशहित में वो सर्वोपरि होता है।

-प्रदीप भट्ट –
Tuesday, June 20, 2017


Monday, 12 June 2017

टीम इंडस




हर इंडियन का मून शॉटयानि

टीम इंडस



हमारे देश में प्रतिभाओं की कभी कमी नहीं रही। अलबत्ता उन प्रतिभाओं को निखरने और अपनी चमक बिखेरने का मौका कम ही मिलता है शायद इसका कारण यह है कि हमारे देश में रिसर्च एंड डेवलपमेंट की भयंकर कमी है निजी कंपनीज हों या सरकार सब बस एक ही बात पर ध्यान देती हैं कि हम जो घोषणाएं करने ब्यूरोक्रेट या उन कंपनी के कर्मचारी बस उसका अक्षरश: पालन करें।उनका इस बात से कोई भी लेना देना नहीं होता कि जो चीज एक राज्य या जिले के लिए लाभकारी है वो चीज दूसरे राज्य या अन्य जिलों के लिए कैसे लाभकारी हो सकती है। किन्तु ये बात आज तक तो किसी की समझ में न आई और न जाने कब तक ऐसे ही ये सब चलता रहेगा। किन्तु उम्मीद पर दुनियां कायम है और देशी में भी कुछ नयी नयी सी हवा बहना शुरू हुई है जिसके कुछ सार्थक परिणाम भी आने शुरू हो गए हैं। ज्यादा मात्र में न सही किन्तु इक्का दुक्का प्रयास ये सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि हमारे देश में प्रतिभाओं की तो कमी नहीं हैं और कुछ कमी है तो उन्हें निखारने की या निखरने देने की। ये तो संभव नहीं है कि इस प्रकार की सभी गतिविधिओं के लिए सारे प्रयास सरकार ही करेगी कितु अगर कुछ प्रयास सरकार करे और कुछ हमारे अपने देश के ओद्योगिक घराने तो निश्चित ही सफ़लता की दर काफी हद तक बढ़ सकती है। क्या आप इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि कोई प्राइवेट एजेंसी चन्द्रमा पर अपना यान उतारे। किन्तु ऐसा होने जा रहा है और सबसे अच्छी और रोचक बात यह है कि उन चंद चयनित टीमों में भारत की भी एक टीम है जिसका नाम है टीम इंडस । पिछले दिनों मैं एक ऐसे ही प्रयास के विषय में पढ़ रहा था तो सोचा आप सबको भी इस भागीरथ प्रयास के विषय में कुछ जानकारी दे दूँ। किन्तु इससे पूर्व ये जानना जरुरी है कि कौन कौन से देश आज तक अन्तरिक्ष में अपना परचम फ़हरा चुके हैं।

चन्द्रमा पर अपने लूना-२ मिशन को सबसे पहले सोवियत संघ ने भेजा था ये सिलसिला १९७६ तक जारी रहा । इसके पश्चात् अमेरिका ने फर्स्ट चन्द्रमा रिसर्च 1964 में उसके बाद लगातार 30 मिशनों ने कामयाबी के झंडे गाड़े। अमेरिका का ये सिलसिला 1964 से 1996 तक चलता रहा ।जहाँ तक जापान का प्रश्न है तो उसने चंद्रमा की कक्षा में  अंतरिक्ष यां एवं 2009 में सेलें ऑर्बिटर/इम्पैक्टर  भेजा ,यूरोपीय अन्तरिक्ष एजेंसी ने 2006 में स्मार्ट-१ लूनर अनुसन्धान ऑर्बिटर/इम्पैक्टर भेजा। चीन 2008 में चेंज-1 ऑर्बिटर, 2013 में  चेंज लैंडर अंतरिक्ष में भेजकर तीसरा देश बना। जहाँ तक भारत का प्रश्न है भारत ने चंद्रयान-प्रथम को 8 नवम्बर,2008 को एवं 14 नवम्बर,2008 को इम्पैक्टर को चन्द्रमा पर उतारकर विश्व का पांचवा देश होने का गौरव प्राप्त किया। भारत 2018 में चंद्रयान-2 ऑर्बिटर,लैंडर और रोवर को चंद्रमा पर उतारने की तयारी कर रहा है।



2007 में गूगल और लूनर ने दुनियां भर के engineers,Industrials and new startups  को निजी क्षेत्र के आर्थिक सहयोग के सहारे रोबोट से अंतरिक्ष की सस्ते और कम लागत के द्वारा खोज की जा सके साथ ही स्थापित एजेंसी गूगल लूनर एक्स प्राइस  के हिस्सा लेने के लिए दुनियां भर के देशों की निजी कंपनीज ने कुल ३२ आवेदन भेजे थे जो चयन प्रकिया के दौरान मात्र १६ ही रह गए और अंत में गूगल लूनर की शर्तों पर केवल पांच देशों के निजी संसथान ही खरे उतरे जिनमें मून एक्सेस (अमेरिका), स्पैसेल (इसराइल),हाकुतों (जापान),सिनर्जी मून (जो कि एक अंतर्राष्ट्रीय कांसोशिर्यम या संघ)। इस प्रतियोगिता का मकसद बड़ा ही साफ सुथरा है कि विश्व में कार्य कर रहे सभी अभियंता उद्यमियों और नवोंमेशियों (स्टार्टअप) को निजी क्षेत्रों के धन एवं साधनों के द्वारा पोषित किया जाए उनकी मदद से रोबोट अन्तरिक्ष की खोज को कम लगत में तैयार करने के तरीके आजमाए जा सके। इस पुरे मिशन की एक महत्वपूर्ण शर्त सिर्फ़ यही है कि प्रतिभागी टीमों को यदि इनाम की रकम जितनी है तो उन्हें चन्द्रमा पर एक यान न केवलउतारना होगा बल्कि उसे चद्रमा की सतह पर 500 मीटर की दुरी तक चलवाना भी होगा उस यान की खिचीं हुई तस्वीरें और विडोस धरती पर वापस भी मंगवाने होंगे। साथ ही ये भी साबित करना होगा कि यान पर आने वाला 50 प्रतिशत खर्च निजी सोत्रों से जुटाया गया है। इनाम की राशी भी काफ़ी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जहाँ पहला इनाम २ लाख डॉलर का है वहीँ दूसरे इनाम की राशी 50 लाख डॉलर है। ये विषय अलग है कि टीम इंडस जो यान बना रहा है उसकी लगत लगभग 450 करोड़ रूपये बैठती है

राहुल नारायण जिन्हें बचपन में स्टार ट्रैक सीरियल ज्यादा पसंद था।1995 में IIT डेल्ही  से ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने एक सॉफ्ट वेयर कंपनी बनाई किन्तु उनके हाथ असफलता ही लगी लेकिन वे बैचेन नहीं हुए तभी उन्होंने एक लेख पढ़ा जिसमें लुनर एक्स प्राइस के बारे में था उन्हें ये पढ़कर बड़ी हैरानी हुई कि इस प्रतियोगिता में भारत की तरफ़ से कोई एंट्री क्यों नहीं कर रहा बस यहीं से उनकी ज़िंदगी ने टर्न ले लिया और उन्होंने तुरंत अपने कुछ ख़ास दोस्तों से इस विषय में बात की और तय किया कि वे इसमें हिस्सा लेंगें और कुल जमा 50,000 डॉलर यानि करीब 35 लाख रूपये एकत्र करने के बाद इस प्रतियोगिता के ऐलान के तीन साल बाद 2010 के आख़िर में टीम इंडस ने अपना नाम रजिस्टर्ड करवाया। धीरे धीरे इस प्रोजेक्ट का आकर बढ़ता गया साथ ही कुछ लोगों की सलाह से इसरों के पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर कस्तूरीरंगन को टीम इंडस का मार्गदर्शक बनने के लिए तैयार करना पड़ा। उन्हीं की सलाह के बाद इस प्रोजेक्ट को डेल्ही से बंगलौर शिफ्ट किया गया उनके प्रोजेक्ट की सहायता के लिए National Arospace Laboratory (NAL) ने अपना गेस्ट हाउस दे दिया साथ ही अन्य सहायता ही मुहैया कराई। सस्केन के अध्यक्ष राजीव मोदी ने अपना परिसर ही टीम इंडस को लीज पर नहीं दिया वरन प्रोजेक्ट में रकम भी निवेश की।इसी प्रकार Nivesh Global Mobile Adversing and tech platform inmobi के संस्थापक नवीन तिवारी और E tailer flipcart के संस्थापक सचिन और बिनी बंसल ने भी इसमें निवेश का फ़ैसला किया। टीम इंडस की ख़ुशी का तब ठिकाना नहीं रहा जब नंदन नीलकेनी और रतन टाटा ने भी इस प्रोजेक्ट में निवेश का फ़ैसला किया।

आज टीम इंडस में 100 से ज्यादा लोग कार्य कर रहे हैं जिनमें इसरों से रिटायर्ड लोग भी काम कर रहे हैं जिनकी औसत उम्र महज 26 वर्ष है। टीम इंडस से जुड़ने का उत्साह देखिये मुंबई में मैनेजमेंट कंसल्टेंट जैसा महत्वपूर्ण पद त्याग कर बंगलौर शिफ्ट करने वाली शालिका रविशंकर  जिन्होंने टीम इंडस के हर कर्मचारी और अधिकारी के लिए पोस्ट के हिसाब से स्टार वार्स किस्म के नाम सोचे जिनमें जेदी निंजा और स्क्यवाकर हैं। राहुल नारायण को फ्लीट कमांडर नाम दिया गया है। अगर इस पूरी कवायद का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि जब आप कुछ अच्छा नहीं कर रहे हों तो कुछ बेहतरीन करने की इच्छा ह्रदय में हिलोरें मारती रहती हैं। जो लोग इस दुविधा से पार पा लेते हैं वो दुनियां के लिए एक मिसाल या नजीर बन जाते हैं। टीम इंडस उसी आशा और विश्वास का एक नाम है जिसके लिए प्रत्येक भारतीय ह्रदय से यही सदिच्छा रखता है कि टीम इंडस ये प्रतियोगिता अवश्य जीते।
-प्रदीप भट्ट –

Monday, June-12-2017

Saturday, 27 May 2017

हिंदी मीडियम




“  हिंदी मीडियम




भारत विश्व में अकेला ऐसा देश है जहाँ हर वर्ष सितम्बर माह की 14 तारीख़ से प्रत्येक सरकारी कार्यालय,बैंक  में “हिंदी पखवाड़ा” मनाये जाने की परंपरा अभी तक बदस्तूर जारी है  पिछले इतने वर्षो से जारी इस परंपरा के लिए बजट आवंटित करते हुए कभी भी वित्त मंत्रालय ने कोई टिका टिप्पणी नहीं की अन्यथा हर मंत्रालय एवं उनके अंतर्गत आने वाले सभी डिपार्टमेंट को हर वर्ष टारगेट तो बढ़ा कर दिए जाते हैं किन्तु वित्त में हर वर्ष कटौती कर दी जाती है  ये बात अभी तक तो मेरी समझ में नहीं आयी कि भारत सरकार या राज्य सरकार विकास कार्य के लिए कौन सा पैमाना अपनाती है जहाँ टारगेट ज्यादा और खर्च कम में काम किया जा सकता हो यहाँ यह उल्लेख करना भी जरुरी है कि भारत विश्व में अपनी राष्ट्र भाषा और राज्य भाषा दोनों के लिए ही विरोध भी जब-तब झेलता रहता है फ़िर वो चाहे राजनैतिक ही क्यों न हों



अंग्रेजीदा लोगों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये होती है कि वे इस भाषा का इस्तेमाल ऐसे लोगों के सामने ज्यादा करते हैं जो इस भाषा से बिलकुल या अनभिग्य हैं या कामचलाऊ अंग्रेजी ही जानते हैं  ऐसे लोगों का सिर्फ़ एक ही दर्शन होता है कि सामने वाले को उसके अंग्रेजी ना जानने की सजा दी जाये उसे नीचा दिखाया जाये ताकि उसमें अंग्रेजी ना जानने के कारन हीन भावना उत्पन्न हो और वह अपना सारा काम धाम छोड़कर बस अंग्रेजी का रट्टा मारने को विवश हो जाये आज जो हम कस्बे और शहर की हर पांचवी गली में अंग्रेजी मीडियम के स्कूल देखते हैं ये उसी हीन भावना से उपजे रोष की भरपाई करते नज़र आते हैं एक आम माध्यम वर्ग और अब तो निम्न आय वर्ग का व्यक्ति भी ये सोचता है कि भले ही कुछ भी हो जाये उसे अपने बच्चे को अंग्रेजी मीडियम स्कूल में ही पढाना है ताकि वो भी अंग्रेजी में गिटर-पिटर कर सके  इसी भारतीय मानसिकता का परिणाम है कि अंग्रेजी मीडियम के स्कूल कुकुरमुत्ते की तरह उग आये हैं

जहाँ तक इन अंग्रेजी मीडियम स्चूलों के सञ्चालन का प्रश्न है तो ज्यादातर स्कूल उन  निरे निपट हिंदी मीडियम में पढ़े लिखे लोगों ने खोल रखे हैं जो अंग्रेजी भाषा के ज्यादा जानकर नहीं हैं बस उनका एक ही मकसद है कि स्वम जैसे हीन भावना से गर्सित लोगों के अन्दर पनप रहे रोष का फायदा कैसे उठाया जाये 1000 से लेकर 3000 या ज्यादा से ज्यादा 5000 हजार तक के टीचर रखकर कैसे संभव है कि उन बच्चों को अच्छी शिक्षा वो भी अंग्रेजी माध्यम से दी जा सकती है ज्यादातर स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने वाली टीचर को खुद ही प्रश्नों के उत्तर नहीं आते और जहाँ तक सामान्य ज्ञान का प्रश्न है उसकी तो बात न ही की जाये तो अच्छा है ९० प्रतिशत टीचरों को तो ये तक नहीं पता होता है कि उस राज्य की राजधानी क्या है,उस राज्य का मुख्मंत्री कौन है,राज्यपाल कौन है ये आर्टिकल लिखने का ख्याल भी इसलिए आया कि इसी सप्ताह एक खूबसूरत फिल्म हिंदी मीडियम रिलीज हुई है जो कि असली भारतीय मानसिकता का वास्तविक चित्रण करती है जो लोग खुद ज़िन्दगी भर हिंदी मीडियम में पढ़े हैं वो अपने बच्चे से ये अपेक्षा जरुर करते हैं कि वो उनके सामने और घर में आने वाले मेहमानों के सामने अंग्रेजी बोलकर उनका जीवन कतार्थ कर दे किन्तु होता ऐसा बिलकुल भी नहीं राज हट स्त्री हट और सबसे सशक्त बाल हट सबसे प्रसिद्ध है  बच्चा वही करता है जो वो करना चाहता है,इस फिल्म में बाल हट की एक ऐसी ही झलक देखने को मिलती है पूछने पर मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री और राजपाल की जगह राष्ट्रपति या इसके उल्ट भी उत्तर आपको प्राप्त हो सकते हैं ये आर्टिकल लिखने का ख्याल भी इसलिए आया कि इसी सप्ताह एक खूबसूरत फिल्म हिंदी मीडियम रिलीज हुई है जो कि असली भारतीय मानसिकता का वास्तविक चित्रण करती है जो लोग खुद ज़िन्दगी भर हिंदी मीडियम में पढ़े हैं वो अपने बच्चे से ये अपेक्षा जरुर करते हैं कि वो उनके सामने और घर में आने वाले मेहमानों के सामने अंग्रेजी बोलकर उनका जीवन कतार्थ कर दे किन्तु होता ऐसा बिलकुल भी नहीं राज हट स्त्री हट और सबसे सशक्त बाल हट सबसे प्रसिद्ध है  बच्चा वही करता है जो वो करना चाहता है,इस फिल्म में बाल हट की एक ऐसी ही झलक देखने को मिलती है

ये आर्टिकल लिखने का ख्याल भी इसलिए आया कि इसी सप्ताह एक खूबसूरत फिल्म हिंदी मीडियम रिलीज हुई है जो कि असली भारतीय मानसिकता का वास्तविक चित्रण करती है जो लोग खुद ज़िन्दगी भर हिंदी मीडियम में पढ़े हैं वो अपने बच्चे से ये अपेक्षा जरुर करते हैं कि वो उनके सामने और घर में आने वाले मेहमानों के सामने अंग्रेजी बोलकर उनका जीवन कतार्थ कर दे किन्तु होता ऐसा बिलकुल भी नहीं राज हट स्त्री हट और सबसे सशक्त बाल हट सबसे प्रसिद्ध है  बच्चा वही करता है जो वो करना चाहता है,इस फिल्म में बाल हट की एक ऐसी ही झलक देखने को मिलती है  किस प्रकार माँ बाप मेहमानों के सामने अपने बच्चों को कार्टून तक बना डालते हैं अगर वो उनकी बात न माने तो कहेंगे आज इसका मूड ठीक नहीं है वरना अपनी बुआ के आगे तो इसकी जुबान कैंची की तरह चलती है। मतलब बच्चों को बच्चों की तरह ट्रीट न करके उससे अपेक्षा करेंगे कि वह एक समझदार व्यक्ति की तरह बर्ताव करे जब कि वो खुद इसके उलट व्यव्हार कर रहे होते हैं।

हिंदी मीडियम फ़िल्म देखते हुए सहसा ही मुझे लखनऊ में बिताया अपना बचपन याद आ गया जब प्रथम कक्षा में मेरा एडमिशन करने से पूर्व मुझे 20 तक पहाड़े,100 तक गिनती (हिंदी वाली),अंग्रेजी वर्णमाला के २६ अक्षर साथ ही अंग्रेजी भाषा के छोटे छोटे शब्द जैसे CAT,  RAT, Name of colour, etc.हिंदी वर्णमाला के सभी अक्षर। किंतु आज की तारीख़ में जब बच्चा पैदा होता है तो माँ बाप उसको हिंदी की कविता याद करने के लिए नहीं कहते बल्कि उसे अंग्रेजी की पॉएम याद करने और सबको सुनाने के लिए मजबूर करते हैं और दूसरी सबसे सबसे ज्यादा टेंशन उसके पहले प्ले स्कूल फ़िर प्रेप एडमिशन को लेकर ज्यादा रहती है और जैसा कि फिल्म में दिखया गया है कि नायक और नायिका डेल्ही के सभी नामचीन स्कूल की खाक छानते फ़िर रहे हैं इस चित्रण से कम से कम मुझे तो ऐसा अहसास हुआ और महाभारत की एक कहानी याद आ गई कि जब महाभारत का युद्ध अवशम्भावी हो गया तो भगवन श्रीकृष्ण और विदुर को ये जिम्मेदारी दी गई कि वो ऐसे स्थान का चयन करे जिससे 27 अक्षोहणी सेना युद्ध कर सके और दोनों ने मिलकर कुरुक्षेत्र (हरियाणा) का चयन किया था आजकल के समय में भी हर तीसरे माँ बाप की यही समस्या है 2 से 5 साल के बच्चे के दिमाग पर इतना बोझ डाल देते हैं जैसे वो पढने नहीं बल्कि महाभारत का युद्ध लड़ने जा रहा है  

आप सब इस बात स्वम अंदाजा लगाइए जो बच्चा अभी सिर्फ़ दो या ढाई वर्ष का ही है माँ बाप उससे क्या-क्या अपेक्षाएं पाल रहे हैं वे स्वम उसे सामान्य  ज्ञान तक नहीं देना चाहते  शायद इसका कारण भी ये है कि उन्हें उनके माँ बाप ने भी सामान्य ज्ञान नहीं दिया जब कि शास्त्रों में लिखा है कि बच्चे की प्रथम गुरु माँ होती है लेकिन आजकल ज्यादातर माओं को इतनी फुर्सत कहाँ है की वो बच्चे की देखभाल पर ध्यान दे सके फ़िर प्रथम ज्ञान देने की बात तो दूसरी है जहाँ तक फिल्म हिंदी मीडियम का प्रश्न है तो मुंबई के जिस PVR में मैं फिल्म देख रहा था तो हॉल में हर पंच लाइन पर जबरदस्त तालियाँ बज रही थीं उन तालियों की गडगडाहट में मुझे तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि आज हॉल में आया प्रत्येक माँ बाप सुबह होते ही अपने बच्चे के स्कूल पहुँच जायेंगे और प्रिंसिपल से कहेंगे कि हमें नहीं पढाना तुम्हारे इस स्कूल में अपने बच्चे को। किन्तु ये कभी न हो पायेगा।

-प्रदीप भट्ट –

Satarday, May-25-2017