Thursday, 17 October 2024

" हम जैसों से बच के रहिओ "

रिपोर्ताज 

"हम जैसों से बच के रहियो"

         आलोक यात्री जी द्वारा आमंत्रण प्राप्त होने पर हम "मैं जिंदगी का गीत गाते हुए महफ़िल ए बारादरी का हिस्सा बनने "सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल"  नेहरू नगर गाज़ियाबाद जा पहुँचे। अब रविवार का दिन हो तो मन तो यही करता है कि घर पर शेष शैय्या पर विराजे विराजे बस आर्डर देते रहो और अपने कुक्ष को भरते रहो। ये विषय अलग है कि हम जैसे ज्ञानी ध्यानी श्री श्री 1008 'स्वामी प्रदीपानंद' महाराज जी छ: दिन रात का खाना छोड़ने का ढिंढोरा पिटते रहें और रविवार को पूरे दिन चरते रहें 😝😝😝। 

         ख़ैर "हुआ यूँ के" वैसे तो ये टाइटल आलोक जी के नाम रजिस्टर्ड है किन्तु अनुज होने का फ़ायदा उठाते हुए मैंने झाँसी प्रवास का रिपोर्ताज इसी शीर्षक से  फ़ेसबुक पर पोस्ट भी कर दिया था🌹🙏🏾🙏🏾 हास्य व्यंग्य का आनन्द भी तभी आता है जब आप निष्पक्ष रूप से अपने ऊपर भी उसे लागू करें। मिथ्या तो यही है कि मेरा प्रयास यही रहता है 😹 । मैं इससे पूर्व भी महफिल ए बारादरी का एक कार्यक्रम यहीं एवं दूसरा भव्य पुस्तक लोकार्पण समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुका हूँ किन्तु अपनी आदत के अनुसार मैं पहले दो तीन कार्यक्रम सिर्फ़ देखने एवं समझने के लिए अटेंड करता हूँ उसके बाद ही अपनी क़लम सत्य निष्ठा के अनुसार चलती है।😇

        सो हुआ यूँ के 13 अक्टूबर को 11 बजे जैसे ही स्कूटी स्टार्ट की तो उसका डिजिटल मीटर गुस्से 😡से उबलते हुए बोला अबे कित्ते आलसी हो बे🙃 साल होने को आया हमें कब ठीक करवाओगे अगर आज नहीं तो फिर छोटी आँख करके हममे झाँक कर मति देखना कि कित्ता तेल बचा है, कसम से हम दिखते को भी छुपा लेंगे फिर किसी दिन 2,4 किलोमीटर घसिटवायेंगे तब हमारी क़ीमत पता चलेगी। हमने हाथ जोड़कर कहा प्रभु ये जुल्म कतई न करियो हम आज ही आपकी इच्छा पूर्ति किये देते हैं सो पहले भूरा मिस्त्री ढूंढा। अजब तमाशा है नाम भूरा रंग काला देखते ही बोला 950 हमने कहा न भाई अब तो 11.30 हो रहे हैं। वो मुस्कराते😊 हुए बोला जनाब मैंने नए मीटर के रेट बताएं हैं टाईम नहीं मैंने भी कहा कदी  हँस भी लिया करो। खैर मामला 850 में निपटा। मीटर चेंज करके बोला कौन सा मॉडल है हमने कहा 2014 तो हूं करके बोला अभी तक 12023  किलोमीटर ही चली है। अब मुझे बारादरी में पहुँचने की जल्दी थी सो पेमेंट किया और सीधे बस स्टैंड, स्कूटी पार्क की 12.40  की बस ली और लो जी ठीक 14.45 पर हम सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में, इस बार भी प्रथम दर्शन आलोक जी के ही हुए। अब भैय्या संयोजक हैं तो जिम्मेदारी भी है और जो उसे निभा ले जाए उसी का नाम आलोक यात्री है। फ्रेश होने आरामगाह गए तो ख्याल आया कि अगर मीटर नया है तो रीडिंग पुरानी कैसे इसका मतलब... बस पूछो मत 😊 धीरे धीरे महफिल सजने लगी और 15:00 की जगह ठीक 16:00 बजे सभा शुरू हो गई। लोगोँ को समय की क़ीमत कब समझ आएगी। इस बार मंच मूर्ति के रूप में आदरणीय सुरेंद्र सिंघल जी ने अध्यक्ष का भार अपने कंधो पर वहन करने की अनुमति प्रदान की। गोविंद गुलशन जी, डॉक्टर माला कपूर गौहर ,उर्वशी अग्रवाल, कथा रंग के अध्यक्ष शिवराज जी, नेशनल बुक के लालित्य ललित एवं वैंकूवर कनाडा से पधारी प्राची चतुर्वेदी रंधावा ,अन्य के अतिरिक्त हम तो थे ही भैय्या 😎

        आशीष द्वारा प्रस्तुत सुन्दर सरस्वती वंदना के अतिरिक्त एक से बढ़कर एक क़लाम पेश किए गए हमने भी अपनी गज़ल प्रस्तुत की। 


नमक दरिया में थोड़ा सा मिला दूँ 
मैं अपनी आँख का आँसू गिरा दूँ 

ग़मों के साए में जीना है मुश्किल 
ख़ुशी के वास्ते तुमको भूला दूँ 

जो समझा ही नहीं अश्कों की क़ीमत 
तुम्हीं बोलो उसे मैं क्या सिला दूँ 

जहाँ भी जाऊँगी वो ढूँढ लेगा 
तुम्हीं बोलो कहाँ ख़ुद को छुपा दूँ 

जहाँ के सारे ग़म मेरा मुकद्दर 
इन्हें ले जाके किस जगह बिठा दूँ 

बड़ी बा बातेँ वो सबसे कर रहा है 
कहो तो मैं भी कुछ तेवर दिखा दूँ

मकर भर के पड़ा है जाने कब से 
औ तुम कहते कि मैं इसको जगा दूँ 

कि कब से सीना जोरी कर रहा है 
कहो तो 'दीप' मैं उसको डरा दूँ

         हमसे पहले भी और हमारे बाद भी वास्तव में कुछ अच्छी रचनाएँ पढ़ी गईं। गोविंद गुलशन, मासूम गाज़ियाबादी, सुरेंद्र जी, माला कपूर उर्वशी अग्रवाल के अतिरिक्त भी कानों को बहुत दिन बाद कुछ अच्छा सुनने को मिला।
पिछले दो बार की बनिस्पत मैं इस बार अंत तक डटा रहा, अच्छी बात ये रही कि कार्यक्रम 8.15 पर समाप्त हो गया जिससे  मुझे 8.40 की मेरठ की बस मिल गई और मैं ठीक 22:45 पर घर। बस से उतरकर स्कूटी से घर के रास्ते में ठंडी हवा ने कानों में सरगोशी की कि हुजूर अगले प्रोग्राम में कुर्ता पायजामा नहीं 🙂‍↔ नई तो प्यार हो जाएगा 🤪🤪🤪

प्रदीप डीएस भट्ट-161024

" ये नया भारत है मिस्टर ट्रूडो "

    
" ये नया भारत है मिस्टर ट्रूडो "

    एक कहावत है जब गीदड़ की मौत आती है तो वह शहर की तरफ़ भागता है। आजकल ऐसा ही कुछ अंतरराष्ट्रीय पटल पर देखने को मिलता है। जिस भी देश के नेता को अपने देश में अपनी गिरती साख बचानी हो या विपक्ष से ध्यान हटवाना हो तो वह भारत से उलझ जाता है या कुछ गलत टीका टिप्पणी कर देता है। देर सवेर ही सही भारत उसको ऐसी धोबी पछाड़ मारता है कि उस देश का नेता अच्छी भली सत्ता गवां देता है या अर्थ दण्ड का ऐसा झटका लगता है जिससे वह भारत के सामने सरेंडर या दण्डवत कर अपनी जान बचाता है। अगर यक़ी नहीं हो तो पाकिस्तान और मालदीव की हालात देख लें। जहाँ तक पाकिस्तान का प्रश्न है तो उसकी स्थिति तो और भी ज्यादा विकट है या कहें कि साँप छछूंदर वाली है। ffta की ग्रे लिस्ट से निकलने के लिए वह अरसे तक हाथ पाँव मारता रहा लेकिन हर बार हताशा ही हाथ लगी। बैक डोर से हाथ पाँव जोड़े तब जाकर भारत ने उसे ग्रे लिस्ट से निकालने के लिए ftta को इशारा किया लेकिन पाकिस्तान तो पाकिस्तान ठहरा वो तो सुधरने से तो रहा और वैसे भी जो सुधर जाए उसे पाकिस्तान थोड़े ही कहते हैं।

        9,10 सितम्बर-2023 को जब भारत ने भव्य G20 का आयोजन किया था तब उसका थीम था "वसुधैव कुटुम्बकम" यानि पूरा विश्व एक परिवार है। इस सम्मेलन में उपस्थिति दर्ज कराने पहुँचे विश्व के 20 पावर फुल देशों के प्रतिनिधियों ने भारत की उत्कृष्टता के दर्शन भी किए । चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एवं रूस के राष्ट्रपति अपरिहार्य कारणों से इस सम्मेलन में उपस्थित नहीं हुए थे किन्तु उनके प्रतिनिधि अवश्य उपस्थित रहे। विदाई के समय कनाडा के राष्ट्रपति जनाब जस्टिन ट्रूडो विमान की खराबी के कारण तय समय के बाद भी भारत में रुके ही रहे। ऐसी स्थिति में मेजबान होने के बावजूद भारत ने उनके लिए समान्य से अधिक की सहायता नहीं की कारण मिस्टर ट्रूडो कनाडा में रह रहे सिख अलगाववादी नेताओं का पक्ष लेना माना गया। भारत ने ट्रूडो को उनके अवांछनीय व्यवहार के लिए कनाडा में भी धोया और भारत में भी। पंजाब में रह रहे पंजाबियों की सबसे बड़ी इच्छा यही रहती है कि मुंडा़ कनाडा सैटल हो जाए या रैपर बन जाए। ख़ैर कुछ दिनों पहले जस्टिन ट्रूडो को फ़िर खुजली मची और उन्होंने कनाडा में अपनी गिरती साख को बचाने के लिए भारत पर फिर से बे सिर पैर के आरोप लगा दिए जैसे कि निज्जर की हत्या में भारत की खुफ़िया ऐजेंसी RAW के एक्स एजेंट शामिल हैं और हत्या भारत के लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने की है जिसे सूचनाएँ RAW ने मुहैय्या कराई हैं। मिस्टर ट्रूडो  यहीं नहीं रुके वरन भारत के राजदूत सहित छ: राजनयिकों को कनाडा से ओटोया ( कनाडा की राजधानी) से जाने के लिए कह दिया। भारत ने इस बार तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कनाडा में अपने राजदूत संजय वर्मा को भारत वापिस बुलाने का आदेश तो दिया ही  साथ ही भारत में कनाडा के छ: राजनयिकों को 19 अक्तुबर तक भारत छोड़ने का फरमान भी जारी कर दिया। निश्चित रूप से कनाडा ने भारत से इस प्रकार के व्यवहार की उम्मीद सपने में भी नहीं की थी सो जस्टिन ट्रूडो इस खबर से पूरी तरह बौरा गए। जल्द ही कनाडा में चुनाव होने वाले हैं और वर्तमान रेटिंग के अनुसार ट्रूडो की रेटिंग रसातल की ओर अग्रसर है! कोढ़ में खाज वाली स्थिति तब पैदा हो गई जब लिबरल पार्टी ऑफ कैनेडा के प्रमुख ने ट्रूडो को स्वयं 28 अक्तुबर तक त्यागपत्र देने के लिए कह दिया। ट्रूडो  को ये झटका कुछ ज्यादा ही जोर से लगा है।

        जस्टिन ट्रूडो ने ऐसा पहली बार नहीं किया है जब पिछले साल जून-2023 में कनाडा ने निज्जर जो कि कनाडाई नागरिक है की हत्या पर भारत पर आरोप लगाए थे तब भी अंतर्राष्ट्रीय पटल पर काफ़ी हो हल्ला मचा था। ये विषय अलग है कि कनाडा स्वयं भी निज्जर को एक आतंकवादी मानता रहा है वरना क्या कारण रहे जो कनाडा ने उसकी हवाई यात्राओं पर प्रतिबंध लगा रक्खा था। चूँकि बात चुनाव में वोटों की है तो जस्टिन ट्रूडो  को कनाडा में रह रहे लगभग 2.1 सिखों के वोटों की दरकार है जब कि सिखों से ज्यादा वहाँ अन्य भारतीय बसते हैं जिनका वोट प्रतिशत सिखों से ज्यादा है किन्तु कनाडा भी तुष्टीकरण की राजनीति ही करता नजर आता है। जस्टिन ट्रूडो की स्थिति तब और खराब हो गई जब न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता जगमीत सिंह ने 2022 में जस्टिन ट्रूडो को दिया गया राजनैतिक समर्थन यह कहते हुए वापिस ले लिया कि वह य़ह समझौता तोड़ रहे हैं क्यूँ कि ट्रूडो बेहद कमजोर, स्वार्थी और एक महा भ्रष्ट नेता हैं। इसका कारण भी बड़ा ही हास्यास्पद कम दयनीय ज्यादा लगता है, वोट की खातिर ट्रूडो कनाडा के हर छोटे बड़े गुरुद्वारे में सरापा प्राप्त कर रहे हैं।आख़िर क्यूँ?  जगमीत सिंह चाहते हैं कि ट्रूडो निज्जर की हत्या में भारत को घेरे लेकिन ट्रूडो आज तक निज्जर की हत्या में कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सके यहाँ तक कि निज्जर का मृत्यु प्रमाण पत्र भी। जस्टिन ट्रूडो की दोगली नीति का एक उदाहरण और है।  कनाडा में पाकिस्तानी कट्टरपंथीयों द्वारा हिंसक वारदातें की जाती हैं 2020 में एक बलूच महिला करीमा बलूच की हत्या कर दी गई। इसी कनाडाई पुलिस की रिपोर्ट है कि करीमा डूब कर मरी, इसी प्रकार एक बलूच पत्रकार की भी पाकिस्तानियों द्वारा हत्या कर दी और उसे भी कनाडाई पुलिस ने.............।

          भारत ने स्वतंत्रता के पश्चात्य जब अपना संविधान तैयार किया तो उसमें ये वाक्य कनाडा के संविधान से लिया गया। " संघवाद के केन्द्र प्रसारक रूप जिसमें संविधान में केंद्र राज्यों से मजबूत होता है " कनाडा की कुल आबदी 39,854,546 है यानि दुनिया की आबादी का लगभग 0.49 प्रतिशत। इसमें 15 लाख भारतीय हैं जिनमें सिखों की जनसंख्या 7,70 हजार है। जनसंख्या के हिसाब से कनाडा विश्व का 38वां देश है जहाँ तक घनत्व का प्रश्न है यह प्रत्येक 4 पर 1 किलोमीटर है। लगभग 80 % लोग शहरों में रहते हैं।भारत की IT कंपनियों में से इन्फोसिस, टी सी एस, विप्रो,  एच सी एल टेक्नोलॉजी एवं टेक् महिंद्रा कनाडा में अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। जहाँ तक भारत से कनाडा के निर्यात का प्रश्न है तो भारत से फार्मास्यूटिकल उत्पाद, बहुमूल्य पत्थर,इस्पात की वस्तुएं, मोती, विद्युत उपकरण, कार्बनिक रसायन, रबड़,  प्लास्टिक, चाय, कॉफ़ी, ऑप्टिकल फाइबर, चिकित्सा उपकरण के साथ ही डेयरी उत्पाद भी शामिल हैं वहीं कनाडा से भारत दाल,वुड्स पल्प, न्यूजप्रिंट,पोटाश, aisbestas, आइरन, स्क्रैप, कॉपर खनिज व केमिकल आयात करता है। दोनों देशों के बीच 2023-24 में 8.4 अरब डॉलर का व्यापार हुआ है। आज जब युद्द से ज्यादा व्यापार महत्वपूर्ण है तब कनाडा क्यूँ अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने पर उतारू है। भारत तो कनाडा की जगह कोई और देश से व्यापार बढ़ा लेगा लेकिन क्या कनाडा भारत से ये सब अफोर्ड कर सकता है.  1.45 करोड़ की जनसंख्या वाले देश की कितनी खपत है वो सभी देश भली भांति समझते हैं किन्तु कनाडा फ़िर भी खां म खां पंगा ले रहा है। 

       अब जब भारत ने हरदीप सिंह निज्जर मुद्दे पर कनाडा को धोबी पछाड़ दिया तो वह रोता हुआ "फाइव आइज " ( अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड और कनाडा का गुप्तचर गठबंधन है) से भी शिकायत की कि मोदी काका ने ज्यादा जोर से मारा है। बाकी देश तो शांत रहे किन्तु अमेरिका ने जरूर पन्ननू के विषय में थोड़ा बहुत हो हल्ला मचाया कि CRPF का एक अफ़सर पन्ननू की हत्या करवाने की साज़िश में शामिल है। पहले तो ये एक साज़िश है जो पूरी नहीं हुई।भारत सरकार ने इस विषय में आवश्यक जानकारी अमेरिका के साझा भी की लेकिन इसी बीच ये मसला सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और फिर उस अफ़सर के फेवर में जिस तरह की मुहिम चली उससे भारत सरकार भी अचंभित रह गई। अब कनाडा को बिल्कुल भी समझ नहीं आ रहा कि वो भारत से कैसे पेश आए जिससे बिगड़ी बात बन जाए।  भारत की कूटनीति की चर्चा आजकल विश्व पटल पर एक नजीर बनती जा रही है। इजराइल -फ़िलीस्तीन -हमास  युद्द हो या रूस यूक्रेन युद्ध सभी को लगता है कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी एक मात्र नेता हैं जो इन युद्धों को रुकवाने में सक्षम है। भारत किसी एक पक्ष में कभी नहीं रहा 2014  के बाद जिस तेजी से स्थितियों ने करवट ली है उस स्थिति में भारत अब राष्ट्र सर्वोपरि के सिद्धांत का अक्षरशः पालन करता है। एक तरफ वह अमेरिका आस्ट्रेलिया जापान के साथ मिलकर क्वाड समूह बनाता है जिसका उद्देश्य चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता है। क्वाड का गठन चीन की बढ़ती विस्तारवादी नीतियों को रोकने के उद्देश्य से किया गया है। वहीं भारत ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है जिसमें ब्राजील, रूस, चीन, भारत के अतिरिक्त साऊथ अफ्रीका है। इन चार देशों की जीडीपी का विश्व में हिस्सा 43% है। विश्व के तेजी से बदलते पॉवर ऑर्डर को देखते हुए हर देश इसमें शामिल होकर अपने को सुरक्षित करना चाहता है। पाकिस्तान इसका सदस्य बनने के लिए छटपटा रहा है किन्तु उसे अभी तक कामयाबी हाथ नहीं लगी है।

         कनाडा में अगले अक्तुबर यानि 2025 में चुनाव होने वाले हैं।जिस तरह से ट्रूडो की लोकप्रियता घट रही है उससे उन्हें आभास हो गया है कि वो अगले चुनाव में सत्ता से बाहर होने वाले हैं अगर उससे पहले वे इस्तीफा न दे दें। ख़ैर मसला ये है कि ट्रूडो ऐसा कर क्यूँ रहे हैं। आखिर कनाडा एक बड़ा देश है उसे ये कतई शोभा नहीं देता कि वो किसी भी देश पर अनाप शनाप आरोप लगा दे उसे ऐसा करने से पहले दस बार सोचना चाहिए।  ज़रा सी लापरवाही भरी टिप्पणी से अंतरराष्ट्रीय सम्बन्ध बिगड़ जाते हैं जिन्हें पटरी पर लाने में कई बार दशकों लग जाते हैं।ताज़ा उदाहरण भारत चीन सीमा विवाद को लेकर समझा जा सकता है जहाँ चीन की एक ग़लती से जून 2020 जारी तनाव अब जाकर थोड़ा घटना शुरू हुआ है। जहाँ तक कनाडा का मसला है मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि जब से ट्रूडो सत्ता में आए हैं उनके बयानों से भारत ही नहीं वरन अमेरिका चीन के अतिरिक्त कई अन्य शक्तिशाली देश भी असहज हुए हैं या परेशान हुए हैं। ये विषय अलग है कि बिना अमेरिका की सहमति के ट्रूडो कुछ भी कर पाने की स्थिति में हैं।  अमेरिका सबका है और किसी का नहीं। आजकल अमेरिका गाता फिरता है कि भारत - अमेरिका संबंध हिमालय की ऊंचाई की तरफ बढ़ रहे हैं जब कि अभी सितंबर में जब प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका गए तो इसी अमेरिका के उकसावे पर गुरुवंत सिंह पन्ननू ने अमेरिका जिला न्यायालय में एक याचिका दायर की जिसमें उसने बताया कि भारत सरकार उसे मरवाना चाहती है इसलिए उसने न्यायालय से गुहार लगाई की  न्यायालय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सहित भारत को समन जारी करे।  कनाडा की पुलिस भी ट्रूडो से परेशान नज़र आती है वर्ना क्या कारण है कि निज्जर की हत्या के विषय में वो जो भी टिप्पणी करती है उसमें विरोधाभास नज़र आता है। कनाडाई पुलिस अपनी भद्द कैसे पिटवा रही है उसका उदाहरण एक और है इसी साल जून में कनाडाई पुलिस ने एक दावा नहीं नहीं नहीं रहस्योद्घाटन किया कि वे 1985 में हुए बम विस्फोट जिसमें एयर इंडिया का विमान कनिष्क हादसे का शिकार हो गया था और उसमें 300 लोग मारे गए थे जिसकी जाँच कनाडाई पुलिस अब भी कर रही है। निश्चित रूप से ये हास्यास्पद है कि कनाडाई पुलिस 39 वर्ष बीतने पर भी अंतरराष्ट्रीय हादसे की जाँच करने में नाकाम रही है अब ये जाँच कब तक चलती रहेगी इसका कोई उत्तर कनाडाई पुलिस के पास नहीं है। अब जब कनाडाई पुलिस 39 साल में एक जाँच न कर पाई हो तो उसने 1 वर्ष में कैसे पता लगा लिया कि निज्जर की हत्या में भारत, RAW विश्नोई गैंग शामिल है। हद तो तब हो गई जब ट्रूडो ने कनाडाई संसद में निज्जर की हत्या पर एक मिनट का मौन रखने का ऐलान कर दिया जब उनकी ही सरकार के सम्मानित सदस्यों ने विरोध किया तो कार्यक्रम कैंसिल कर दिया। भई या तो आप पहले ग़लत थे या अब। अब इस बात की समझ आ जाए तो उसे ट्रूडो थोड़े ही कहेंगे। भाई पिछले सात साल में उत्तर प्रदेश पुलिस से ही कुछ सीख लेते या भारत सरकार को रिक्वेस्ट करके उत्तर प्रदेश पुलिस से एक टीम बुला लेते वो कनिष्क और निज्जर दोनों ही जाँचों को निश्चित 39 दिनों में ही निपटा देती, सबूत के तौर पर दोनों हादसों के षड्यंत्र में शामिल लोगों के पैरों पर गोली मारती और कनाडाई पुलिस को सौंप देती हाँ अगर कोई साज़िश कर्ता ज्यादा ची चपड़ करता तो उसका राम नाम सत्य भी कर देती। सीखो कुछ उत्तर प्रदेश पुलिस से कनाडाई पुलिस। वैसे भी भारत की नज़र में मिस्टर टेढ़ा ट्रूडो एक जोकर से ज्यादा कुछ नहीं हैं जो समय समय पर विश्व पटल पर अपनी जोकराना हरकतों से सबका मनोरंजन करता नज़र आते हैं।

फाइव आइस बनाम थ्री आइस 
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         मैं पहले ही ऊपर बता चुका हूँ कि अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा ने फाइव आइस नामक ग्रुप बना रक्खा है जिसका काम दूसरे देशों में जासूसी कर उसकी सूचना आपस में शेयर की जाती है। ये विषय अलग है कि ये एक दूसरे को काटने का भी प्रयास करते रहते हैं।अब भारत, चीन, ब्राजील रूस और अब साउथ अफ्रीका भी भारत रूस चीन की तिकड़ी के साथ आन मिला है तो जो काम फाइव आइस करती है। वही अब त्रिनेत्र करेगा।भारत की तरफ से कनाडा को कुल 26 अपराधियों के प्रत्यर्पण के लिए अनुरोध किया गया है किन्तु कनाडा ने अभी तक मात्र 5 अनुरोध ही स्वीकार किए हैं। गुरजीत सिंह,  गुरजिदर सिंह, गुरप्रीत सिंह, अर्शदीप सिंह एवं लखविदर सिंह लांडा़ सहित कईं आतंकियों के प्रत्यार्पण के केस पिछले दस सालों से भी ज्यादा पेंडिंग हैं, कनाडा उन पर कब सुध लेगा कोई नहीं जानता। भारत जहाँ अपने पड़ोसियों से मधुर संबन्धों का हामी है वहीं पड़ोसियों को है कि भारत की तरक्की से जलने से ही फुर्सत नहीं है फिर भी भारत के प्रयास जारी हैं। पाकिस्तान का ध्येय वाक्य ही है कि हम नहीं सुधरेंगे, पाकिस्तान जहाँ भारत का बच्चा है वहीं बांग्लादेश भारत का पोता हुआ न पर ससुरा पूरा अपने बाप पर गया है। कितना भी अच्छा कर लो गद्दारी करेगा ही आप इसे यूँ समझ सकते हैं जैसे कि भारत एक हार्ड वेयर है जिसके अंदर सनातन का सॉफ्टवेयर inbuilt होकर ऊपर से ही आया है जब कि बाकी जबरदस्ती उस सॉफ्टवेयर को uninstal कर अपने बनाए सॉफ्टवेयर डाल रहे हैं और परिणाम सामने है इसलिए भारत की आवश्यकता है कि वह अन्य देशों के साथ गठजोड़ कर अंदर बाहर सब कुछ साधने की कोशिश करता रहे। हाँ अगर कनाडा को ये मुट्ठीभर चरमपंथी ज्यादा भाते हैं तो बेहतर हो जस्टिन ट्रूडो  कनाडा के एक हिस्से को खालिस्तान घोषित कर दें।

         जस्टिन ट्रूडो की गलतियों का पिटारा जिसमें से न जाने कब कौन सा कबूतर निकल आए जो रायता फैला दे। पिछले वर्ष यू ए ई के खिलाफ कनाडा ने कुछ आपत्ति जनक कह दिया परिणामस्वरुप उन्होंने कनाडा में पढ़ने वाले अपने विद्यार्थियों को वापिस बुला लिया जिससे कनाडा की जी डी पी को क्षति उठानी पडी । 2024 के आंकड़ों के अनुसार 13 लाख भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए जिसमें से 3.37 लाख अमेरिका एवं 4.27 कनाडा गए। अब सोचिए अगर भारत अपने 4.27 लाख छात्रों को वापिस बुला ले तो क्या होगा। ये बात हमें समझ आती हैं किन्तु टेढ़े ट्रूडो को नहीं तो फिर ऐसे शख्स का पद पर रहने का क्या औचित्य है इसलिए उनकी पार्टी उनसे सख्त नाराज है। वैसे अभी हाल ही में ट्रूडो ने  स्वयं माना कि उन्होंने निज्जर हत्याकांड पर जो आरोप लगाए हैं उनके सबूत के तौर पर उनके पास कोई ठोस सबूत नहीं है।  बकौल भारतीय उच्चायुक्त वर्मा जी के अनुसार हर वर्ष सुनहरे भविष्य के लिए भारतीय छात्रों का उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना आम बात है किन्तु शिक्षा पूरी होने पर नौकरी न मिल पाने पर छात्र चाय समोसे, पकौड़े बेच रहा है। ऐसा इसलिए भी कि वहाँ के विद्यालयों में अमूमन हफ्ते में एक दिन क्लास लगती है तो छात्र पार्ट टाईम काम करते हैं किन्तु जब शिक्षा पूरे होने पर भी कुछ नहीं हो पाता तो बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं। 2022 से ओहोयो में पदस्थ उच्चायुक्त वर्मा जी बताते हैं कि हर हफ़्ते दो बच्चों के शव भारत भेजे जाते रहे हैं।निश्चित रूप ये एक गंभीर विषय है जिस पर भारतीय माता पिता को चिंता करने की आवश्यकता है। बेहतर होगा वे बच्चों की हायार एजूकेशन के साथ ये भी सुनिश्चित करें कि बच्चे जिंदा भी रहें. इस विषय में मोदी सरकार को भी चिंता के साथ साथ चिंतन की आवश्यकता है 

         आज भारत जिस तेजी से प्रगति पथ पर अग्रसर है उस अनुपात में उसके दुश्मनों की संख्या बढ़नी भी तय है जो सामने तो भारत का गुणगान करते हैं किन्तु पीठ पीछे प्रगति पथ में बाधा खड़ी करने में लगे रहते हैं। खैर मेरी छटी इंद्री मुझे सचेत कर रही है और एक सम्भावना भी बता रही है कि हो सकता है निज्जर की हत्या पाकिस्तान की बदनाम इंटेलिजेंट ऐजेंसी ISI द्वारा की गई हो और हो सकता है इसका इशारा अमेरिका ने दिया है क्यूँ कि अमेरिका भविष्य में  चीन, रूस भारत की तिकड़ी के साथ आने से अपने आपको असहज महसूस कर रहा है। तो हो सकता है मेरा अंदाज़ा सही हो। वैसे भी एक पुरानी कहावत है कि पानी में आग लगा कर जमालो दूर खड़ी तमाशा देखे। भारत कनाडा एक दूसरे का सिर फोड़ने में व्यस्त रहें और अमेरिका पाकिस्तान को मोहरा बना अपना उल्लू सीधा करते रहे।

         और अंत में अब जब 5 नवंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव का परिणाम घोषित हुआ तो जैसी उम्मीद थी कमला हैरिस कहें या कमला हारी आख़िरकार चुनाव हार गई और डोनाल्ड अमेरिकी राजनीति में अपनी जिजीविषा के दम पर पुनः ट्रम्प साबित हुए। अगर आप अमेरिकी राजनीति पर एक दृष्टि डालें तो पाएंगे कि ऐसा पहली बार हुआ जब कोई राष्ट्रपति गैप देकर विजयी हुआ। इन चार वर्षों में डोनाल्ड पर असीमित आरोप प्रत्यारोपों का दौर चला उन पर अत्याचारों की सभी सीमाएं लांघ दी गई किन्तु डोनाल्ड तो डोनाल्ड ठहरे आख़िर जीत कर ही माने। डोनाल्ड की जीत के लिए जितने यज्ञ अनुष्ठान भारत में हुए उससे डोनाल्ड की भारत में लोकप्रिता को देखकर कोई भी नेता रश्क कर सकता है। वैसे इसका कारण भी है अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में बांग्लादेश में हिन्दुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ जो वीभत्सता हुई उस पर जिस तरह से डोनाल्ड ट्रम्प ने खुलकर विरोध व्यक्त किया उससे अमेरिका में रह रहे भारतवंशियों में एक क्लियर कट संदेश गया कि  डोनाल्ड ट्रम्प का जीतना ही भारत के हित में है न कि कमला हैरिस का। वैसे भी अमेरिकी उपराष्ट्रपति के रूप में कमला हैरिस का कार्यकाल ऐसा नहीं रहा जिससे भारतीय समुदाय उनकी तरफ़ आकर्षित होता। डोनाल्ड ट्रम्प जनवरी 2025 में जैसे ही सत्ता नशी होंगे कई देशों की आफ़त आनी तय है इसका नमूना उन्होंने तुलसी गेबार्ड को राष्ट्रीय खुफ़िया विभाग का प्रमुख नियुक्त किया है। ट्रम्प के राष्ट्रपति का चुनाव जीतते ही चीन कनाडा पाकिस्तान सब जगह शोक व्याप्त हो गया था रही सही कसर तुलसी, रामास्वामी की नियुक्ति से कनाडा एकदम बैकफुट पर आ गया। जस्टिन trudo हैरान परेशान हैं इसलिए भारत के साथ हुए विवाद को कवर करने के उद्देश्य से 10 नवंबर को अर्श दीप उर्फ़ अर्श दीप डल्ला को आनन फानन में गिरफ्तार कर लिया गया। Brampton के हिन्दू मन्दिर में हुए खालिस्तनियो के हमले में शामिल कट्टरपंथी इंद्रजीत गोसाल  को भी गिरफ्तार किया किन्तु बाद में छोड़ भी दिया। भारत ने भी तुरन्त देरी किए बिना अर्श दीप के प्रत्यर्पण की मांग कर जस्टिन को असहज कर दिया। इसी के साथ जब कि 31 अक्तूबर को ही कनाडा की जासूसी ऐजेंसी CEC ( कम्युनिकेशन सिक्योरिटी ऐशबलिशमेंट) विभाग द्वारा एक लिस्ट जारी की गई थी जिसमें चीन, रूस ईरान और उत्तर कोरिया के अतिरिक्त भारत को भी इस सूची में रक्खा गया था जिनसे कनाडा को ख़तरे की बात कही गई थी। जहाँ तक भारत का प्रश्न है तो ये कहने में कोई संकोच नहीं कि मोदी ट्रम्प की दोस्ती 2029 तक किस किस को पानी पिलाने वाली है कोई नहीं जानता बस अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मैं भी लगा रहा हूँ आप भी लगाईये ।

प्रदीप डीएस भट्ट-271124
कवि/लेखक 

         

Monday, 7 October 2024

"हुआ यूँ के "



 रिपोर्ताज 
              "हुआ यूँ के"
 
         हुआ यूँ के हिन्दी साहित्य भारती की उत्तर प्रदेश राज्य इकाई की सभा का आयोजन झाँसी में 29 सितंबर को होना निश्चित हुआ तो संस्था के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रविन्द्र शुक्ल जी से हमें भी आमंत्रण प्राप्त हुआ। चूँकि इस संस्था से जुड़ाव हैदराबाद प्रवास के दौरान हुआ था तो हमने शुक्ल जी को अपनी दुविधा 😇बताई कि भैय्या हम तो तेलंगाना से जुड़े थे फिर हमें काहे आमंत्रण? शुक्ल जी बोले भैय्या जी अब आप मेरठ में निवास कर रहे हैं जो उत्तर प्रदेश में आता है और हम उत्तर प्रदेश में दो बार के मंत्री रह चुके हैं 😀 और ध्यान से सुनें हम झाँसी में विराजते हैं और झाँसी बुंदेलखंड में!समझ गए या कुछ और परिचय देंवे। आमंत्रण भेज दिया है आप अवश्य पधारें।🤗 अब सोचने की बारी हमारी थी हम मन ही मन बुदबुदाए बेटा तुम्हारा हैदराबाद से पत्ता साफ़ और उत्तर प्रदेश में हाफ ये विषय अलग है कि मेरठ दिल्ली NCR का भी हिस्सा है और भारत की प्रथम रीजनल ट्रेन मार्च तक मेरठ से दिल्ली तक पूर्ण रूपेण शुरू भी हो जाएगी। ख़ैर ट्रेन की खोजबीन शुरू हुई तो मेरठ से कोई भी ट्रेन हमें ले जाने के लिए तैय्यार ही न हुई (टिकिट ही  available न hue) तो क्या करते सो दिल्ली से दक्षिण express की कंफर्म टिकिट बुक की और वापसी की ltt to हरिद्वार की waiting ले ली।इसी बीच कथा रंग की सूचना मिली तो विनय सहित क्षमा मांग ली। क्यूँ  कि भैय्या कमिटमेंट है तो है!

         29 की सुबह ब्ला ब्ला ली और सीधे I P extension वहाँ से एक काम निपटाया और सीधे निर्माण विहार 😀अब ये मति पूछो काहे महाराज मित्रता भी कुछ होती है सो मिले फिर दिल्ली खादी भवन, शाम तक वहीं आनन्द के गोते लगाए फिर निर्माण विहार वाले मित्र के साथ कनाट प्लेस में मस्ती की फिर खरामा खरामा निजामुद्दीन स्टेशन।  इधर 22.50 पर ट्रेन ने सीटी दी और उधर हम नींद के आगोश में। 29 की सुबह सुबह 5.15 झाँसी पहुँचे बारिश हमारे स्वागत में बिछी बिछी जा रही थी  ख़ैर भीगते हुए ही ऑटो पकड़ा। बारिश के जोर के कारण रास्ता भूलना लाज़िम था अब अलसुबह 5.30 पर कौन रास्ता बताता है भाई सो तुरन्त होटल marvelous फोन किया तो फोन उठाया रविन्द्र शुक्ल जी ने थोड़ा अचकचा कर समस्या बताई तो उन्होंने ऑटो ड्राईवर का मार्ग दर्शन किया जिससे बारिश का आनन्द लेते हुए हम होटल पहुँच ही गए। 

        आश्चर्य इतनी सुबह सुबह 3,4 लोग रिसेप्शन पर स्वागत करते मिले, परिचय उपरांत हमें कन्नौज से पधारे डॉक्टर अमरनाथ दुबे जी के रूम में शिफ्ट कर दिया गया। अब सुबह सुबह यदि कोई  किसी को सोते से जगाए तो.......  खैर हमने अभयदान देते हुए कहा हुजूर आप सोए रहें हम एडजस्ट कर लेंगे तभी हमारे मोबाईल का 6.03 का अलार्म बज गया। हमने उसे चुप कराया और फ्रेश होने सीधे आरामगाह जा पहुँचे। तैय्यार हुए और सीधे रिसेप्शन पर! वहाँ कई लोगों से मिलना हो गया।

         9 बजे नाश्ता किया फिर ठीक 10 बजे राष्ट्रीय गीत से कार्यक्रम की शुरुआत हुई।  उत्तर प्रदेश राज्य के वर्तमान अध्यक्ष डॉक्टर वागिश दिनकर के स्थान पर प्रह्लाद बाजपेई जी को नया अध्यक्ष मनोनीत किया गया जब कि महामन्त्री अक्षय प्रताप सिंह के स्थान पर मेरे रूम मेट डॉक्टर अमरनाथ दुबे को सर्वसम्मति से महामन्त्री घोषित किया गया।सर्वसम्मति अर्थात उपस्थित जन समुह से दोनों हाथ ऊपर उठाकर ओम की ध्वनि करना। पूरा कार्यक्रम बिलकुल आरएएस पैटर्न पर। सच कहूँ आनन्द आ गया। इतने सारे लोगों में से एक मात्र परिचित के रूप में वागीश शर्मा (कथा रंग)जी से मिलकर आनन्द आ गया। सांय 6.30 तक कार्यक्रम चला बीच बीच में निश्चित अन्तराल पर  स्वादिष्ट  खाने पीने का कार्यक्रम अलग से अब चूँकि हम रात का खाना छोड़ चुके हैं अतएव संगी साथियों के आग्रह पर थोड़ी खिचड़ी लेकर खाना पूर्ति कर ली।लेकिन लेकिन लेकिन...

         अगले दिन नाश्ता करने के बाद टैक्सी के लिए रिसेप्शन पर रिक्वेस्ट की पता नहीं कहाँ गड़बड़ हुई एक घण्टे बाद एक बड़े वाला ऑटो हाज़िर, हम जैसे ही बाहर निकले ऑटो देखकर माथा ठनका हमने कारण पूछा तो ड्राईवर बोला हमसे तो यही मँगवाया है ख़ैर बेकार बहस में न पड़कर हमने पुनः बात कर टैक्सी मंगवाई और चल पड़े ओरछा मन्दिर दर्शन के लिए।लेकिन ये क्या ऑटो टैक्सी के चक्कर में ध्यान नहीं दिया कि मन्दिर 1 बजे बंद हो जाता है ख़ैर   बाहर से ही ईश्वर के दर्शन कर मुड़े ही थे कि देखा मन्दिर का द्वार खुला और भोग का एक थाल लेकर पुजारी जी ने एक व्यक्ति को दिया साथ में आई उनकी धर्म पत्नि मन्दिर के बंद दरवाज़े पर ही बड़ी श्रद्धा से साष्टांग कर रही थीं। मैंने पूछा तो रोहित सोनी नामक सज्जन ने बताया सर यहाँ प्रसाद के लिए काफ़ी लम्बी प्रतीक्षा करनी होती है हमारा नंबर भी सवा महीने के बाद आया है ,तब तक उनकी पत्नि भी हाज़िर हो गई दो तीन मिनट बात करने के बाद मैंने कहा यदि आप दोनों को आपत्ति न हो तो मुझे इस भोग का प्रसाद दे दें। उन्होंने नाम पूछा फिर पूछा कहाँ से आए हैं मैंने पूर्ण परिचय दिया तो दोनों ने प्रणाम किया फिर ये कहते हुए प्रसाद दे दिया कि भगवान ने  स्वयं प्रसाद के दूसरे कौर के लिए आपका चयन किया है। निश्चित उस समय मैं भाव विभोर हो गया। उनसे विदा ली और सीधे ओरछा फोर्ट। भले ही काफ़ी समय बीत गया है किन्तु विरासत तो विरासत है। मध्य प्रदेश शासन देखभाल कर रहा है सोचा कुछ खा लिया जाए सो काफ़ी कुछ नकारने के बाद दही खिचड़ी का ऑर्डर दे दिया। रात में भी और अब लंच में भी खिचड़ी प्रदीप बाबू बढ़िया है 😆😆😆😆


         बेतवा नदी पर दो चार फोटो खिंची ,जब जिंदगी ख़ुद ही भूलभुलैया बनी हुई हो तो भूलभुलैया देखकर क्या करेंगे सो ड्राईवर से कहा भैय्या लक्ष्मी मन्दिर चलो फिर सीधे झाँसी लोकल। ओरछा का लक्ष्मी मन्दिर देखा और सीधे रानी झाँसी के किले के बाहर से ही दर्शन किए दो चार फोटू फिर झाँसी शहर का एक चक्कर लगाया और सीधे होटल आकर कमरे में अब आप कहोगे  ये क्या बात हुई तो भैय्या 29 सितम्बर को बारिश  ने स्वागत किया था हम खुश थे तो झाँसी शहर ने अगले दिन जलती तपती गर्मी के भी दर्शन करा दिये।अब ऐसी गर्मी में फोर्ट की दीवारें भी तपती💥🔥 हुई मिली सो सब कुछ देखना डॉप कर दिया।

         शाम को कुछ ठंडक हुई तो जान में जान आई। चूँकि लंच में दही खिचड़ी खाई थी तो 8 बजे कुछ भूख महसूस हुई। डिनर में फिर वही पकवान देखकर वापिस कमरे में आए दही खिचड़ी खाई फिर आराम किया और रात 12 बजे स्टेशन। 1.10 पर ट्रेन आई और सुबह 9 बजे मेरठ। एक अच्छा कार्यक्रम, दो अच्छे दिन बिताकर वापिस मेरठ आकर लगा भैय्या जो आनन्द घर में है वो और कहाँ 💓सो खाया पीया और चादर तानकर नींद के आगोश में, अब महराज ट्रेन कित्ती भी अच्छी हो ससुरी नींद ठीक से आती न है तो हुआ यूँ के!!!!!!!


प्रदीप डीएस भट्ट-101024

Tuesday, 24 September 2024

"पर्यावरण के दुश्मन"

  
      "पर्यावरण के दुश्मन"
 
         जब पूरा विश्व केवल इज़राइल- फ़िलीस्तीन, रूस और यूक्रेन युद्ध पर ही परेशान हो रहा है, बताता चलूं कि ग्लोबल पीस इंडेक्स की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार इस वक्त पूरे विश्व में कुल 56 युद्ध और गृह युद्ध चल रहे हैं। 1970 के दशक में 23 प्रतिशत युद्धों का अंत अंततः शांति वार्ता के जरिए ही हुआ इसमें भारत पाकिस्तान युद्ध भी शामिल है जब कि इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में ये आंकड़ा घटकर केवल 4 प्रतिशत रह गया है जो किसी भी दृष्टि से अच्छा नहीं है। ये तथ्य महत्वपूर्ण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका द्वारा जापान पर 6 व 9 अगस्त 1945 को हिरोशिमा एवं नागासाकी पर परमाणु बम का प्रयोग किया गया था किन्तु आज लगभग 79 वर्ष बीतने के बाद 7 देश परमाणु सम्पन्न हो गए हैं। इन देशों के पास हजारों की संख्या में परमाणु हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि भविष्य की स्थिति कितनी विकट होगी। एक तरफ हम पर्यावरण की रक्षा की अहद लेते हैं  पेड़ काटे जाने पर जमीन आसमान एक कर देते हैं और दूसरी तरफ़ लम्बे लम्बे युद्धों में शामिल देशों को रोक नहीं पाते। पेड़ तो छोड़िए कुछ सनकी लोग अपनी 'मैं' के  चलते  पूरी धरती को बर्बाद कर देना चाहते हैं। फिर ये पर्यावरण बचाओ का खोखला नारा किसके लिए और क्यूँ ?

        यूक्रेन जिसका  पुराना नाम कीवियन रूस है और जो नवीं शताब्दी में एक बड़ा एवं शक्तिशाली देश था किन्तु 12 वीं शताब्दी तक आते  आते यह देश क्षेत्रीय शक्तियों में विभाजित हो गया। 24 फ़रवरी  2022 को रूस ने यूक्रेन पर युद्ध थोप दिया। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्यों कि सोवियत संघ के विघटन के बाद 15 अलग अलग देश अस्तित्व में आए जिसमें से यूक्रेन भी एक अलग स्वतन्त्र देश बना।  अन्य छुटपुट कारणों के अतिरिक्त जैसे ही यूक्रेन ने नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) में शामिल होने का फैसला किया वैसे ही रूस की द्रष्टि यूक्रेन की तरफ वक्र हो गई। इसका सीधा सा कारण है यदि यूक्रेन नाटो की गोद में बैठता है तो रूस की सुरक्षा compromise होती है।नाटो की सेनाएं और रूस के मध्य में यूक्रेन है अगर यूक्रेन नाटो में शामिल होता है तो नाटो की सेनाओं की सीमा सीधे सोवियत रूस से लग जाएंगी। बस रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन इसी बात से असहज हो गये। रूठने से लेकर मनाने तक के जब सभी जतन बेकार हुए तो 24 फ़रवरी को रूस ने यूक्रेन पर सीधे हमला कर दिया। इसकी आशंका पूरे विश्व को पहले से थी किन्तु इसमें अमेरिका अपने हित देख रहा था और यूरोपीय देश अपने। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन जहाँ kjb से हैं वहीं यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की पहचान एक कॉमेडियन की रही है। दुनिया के सभी देशों को विश्वास था कि यूक्रेन 10-15 दिन में निपट जाएगा या सरेंडर कर देगा किन्तु ढाई वर्ष बीतने के बाद भी दोनों देश अपनी अपनी ताकत दिखाने में लगे हैं।

        इस युद्ध से निश्चित सोवियत रूस एवं यूक्रेन का भारी नहीं वरन भारी भरकम नुकसान हुआ है। यूक्रेन अपनी जिद छोड़ने के लिए तैय्यार नहीं है और सोवियत रूस अपनी। खामियाज़ा दोनों देशों की जनता भुगत रही है। इस युद्द में निश्चित नुकसान का आकलन करना तो मुश्किल है किन्तु इस युद्द से किस देश ने कितना प्रॉफिट अर्न किया है उसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। अमेरिका यूरोपीय यूनियन एवं कई अन्य देशों ने अपने कचरा बन गए हथियारों को यूक्रेन को बेच दिया। एक खबर काफी प्रचलित रही की अमेरिका ने अपने F16 बम वर्षक विमान यूक्रेन को दे दिए किन्तु वो विमान पुरानी पीढ़ी के निकले। अगर व्यापारिक द्रष्टि से देखें तो अमेरिका ने अपना कबाड़ यूक्रेन को बेचकर अपनी चांदी कर ली किन्तु वो सारा कबाड़ सोवियत रूस की स्मार्ट टेक्नोलॉजी के आगे धराशायी हो गया। जब ढाई साल से लगातार युद्ध चल रहा है तो मिसाइल हो या रॉकेट या फिर टैंक गोला बारूद खत्म तो होना ही है सो यूक्रेन की मदद जहाँ अमेरिका एवं यूरोपियन डेनमार्क नार्वे नीदरलैंड के अतिरिक्त पाकिस्तान ने भी करने की कोशिश। वहीं सोवियत रूस को भी हथियारों की सप्लाई चीन एवं तुर्की जैसे देश कर रहे थे। इन देशों ने भी हथियारों की सप्लाई कर चांदी काटने की कोशिश की । चीन तुर्की को तो कुछ कामयाबी मिली भी किन्तु पाकिस्तान के साथ "ना ख़ुदा ही मिला न विसाल ए सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे" वाली कहावत चरितार्थ हो गई।  पाकिस्तान भारत की तरह रूस से कच्चा तेल लेना चाहता था किन्तु जब रूस को जानकारी हुई कि पाकिस्तान यूक्रेन को हथियार सप्लाई कर रहा है तो बात कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई। एक अनुमान के अनुसार 24 फ़रवरी 2022 से अभी तक इस युद्द में यूक्रेन को 55 बिलियन डॉलर का नुक़सान हुआ है।

         उपरोक्त के अतिरिक्त एक विशेष बात का ज़िक्र करना लाज़िमी है। 2011 में प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री निर्माता मैक्स वेक्स्टर ने एक फ़िल्म बनाने का निर्णय लिया कारण वे बढ़ती उम्र के बदलावों से परेशान थे। फ़िल्म का नाम था  "How to live for ever" मैक्स ने बढ़ती उम्र के कईं लोगों से बात की और जानने की कोशिश की कि वे अपने जीवन में सबसे ज्यादा कब खुश हुए थे। एक सौ वर्ष पार कर चुके व्यक्ति का उत्तर सबसे बेहतरीन एवं उत्साह वर्धक था। उसने कहा 11 नवंबर 1918 का दिन जिस दिन जब उत्तर फ्रांस के क़स्बे 
कॉपिगने में युद्ध समाप्ति पर हस्ताक्षर हुए थे। यहाँ य़ह उधृत करना भी जरूरी है कि 1914 से 1918 तक चले प्रथम विश्वयुद्ध में 2 करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए थे घायलों की गिनती का तो अंदाज़ा ही नहीं है और माल असबाब के नुक़सान की भरपाई तो की ही नहीं जा सकती। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूक्रेन स्वतन्त्र देश की हैसियत में आ गया। जार शासन को सत्ता से बेदखल कर ब्लादिमीर के volsheviko ने सत्ता हथिया कर यूक्रेन को खत्म करने पर ध्यान केंद्रित किया और अंततः यूक्रेन के हिस्से में हार आई। 1921 तक आते आते यूक्रेन सोवियत रिपब्लिक का हिस्सा बन गया। ब्लादिमीर से लेकर जोसेफ स्टालिन की फाईवे स्टेक्स ऑफ ग्रेन की नीति के कारण यूक्रेन की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो गई। भुखमरी के कारण हालात काबू से बाहर हो गए इन्हीं सब के बीच लोग घास कुत्ते बिल्ली खाने पर मजबूर हुए। 1932 से 1933 तक होल्डडॉमोर में 39 लाख लोग मारे गए या शासन द्वारा नरसंहार किया गया। पिछले ढाई साल के युद्ध में अभी तक ये स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है लेकिन लोग तो लगातर मारे जा रहे हैं न।

        अब बात करते हैं इजराइल और फिलिस्तीन के झगडे की। दोनों के बीच इनके झगड़े की शुरुआत 1917 से शुरू हुई। जब तत्कालीन ब्रिटिश विदेश सचिव ऑर्थर जेम्स बेल्फॉर ने बेल्लफॉर घोषणा के तहत फ़िलीस्तीन में यहूदियों के लिए नेशनल होम के लिए ब्रिटिश राज्य की तरफ से आधिकारिक समर्थन व्यक्त किया गया। 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध (28 जुलाई-1914 से 11 नवंबर-1918 ) की शुरुआत हो चुकी थी ब्रिटिश आर्मी भी युद्द में मसरूफ थी नाजियों द्वारा यहूदियों पर चरम सीमा पर अत्याचार किए जा रहे थे तभी बेल्फोर्ड डिक्लेरेशन की घोषणा हो गई जिसके बाद यहूदियों ने फ़िलीस्तीन में व्यापक पैमाने पर जमीन खरीदना शुरू कर दिया।  सच पूछा जाए तो अंग्रेजों ने 1947 में जो भारत के साथ किया उसका एक्सपेरिमेंट उन्होंने 30 वर्ष पहले यहूदियों और इजराइल के साथ कर दिया था। इज़राइल और फिलिस्तीन का झगड़ा एक अनिवार्य फ़िलीस्तीन के संघर्ष और आत्म निर्णय के अधिकार को लेकर सैन्य और राजनैतिक संघर्ष है। संघर्ष के मेन मुद्दों में वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी  पर इज़राइल का कब्जा, यरुशलम की स्थिति, इजराइली बस्तियां, सीमा निर्धारण, जल अधिकार परमिट व्यवस्था, फिलिस्तीन आन्दोलन फिलिस्तीन वापसी का अधिकार वगैरह वगैरह।

 1917 से लेकर 7 अक्तुबर 2021 तक इज़राइल ने न जाने कितने छुटपुट युद्द किए हैं। किन्तु 7 अक्टूबर 2023 को फ़िलीस्तीनी हमलावरों द्वारा हमास के संरक्षण में दक्षिणी इज़राइल पर बड़े पैमाने पर हमला किया गया यहां ये उल्लेखनीय है कि जिस दिन ये हमला किया गया उस दिन यहूदी पूरा दिन शान्ति प्रार्थना में बिताते हैं हथियार रखना या चलाना एक तरह से वर्जित है। इस हमले से इज़राइल सकते में आ गया जवाबी कार्यवाही शुरू हुई और फ़िर विश्व ने इज़राइल का वो रूप देखा जिसे आज तक किस्सों कहानियों में यदा कदा सुना जाता था। गाजा पट्टी में फिलिस्तीनियो ने हमास द्वारा बिछाए गए सुरंगों के जाल से इज़राइल को बहुत परेशान किया किन्तु टेक्नोलॉजी के बूते इज़राइल इन सब संकटो पर पूर्व की तरह भारी ही पड़ रहा है।  इज़राइल की आक्रमकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शुरुआती झटकों से उबरकर गाजा पट्टी में छ: दिनों में लगभग छ: हजार बम गिराए तत्पश्चात सम्पूर्ण गाजा पट्टी की नाकाबंदी कर गाजा पट्टी पर कब्जा करने के लिए पैदल सेना उतार दी। लगभग दस महीने की लड़ाई में एक तरफ़ इज़राइल अर्जुन की तरह अकेला खड़ा है उसका अगर कोई सहायक है तो वो अमेरिका है। भारत तठस्त की भूमिका में है। इन्हीं सब के बीच ईरान ने इज़राइल के खिलाफ़ कुछ उल्टा सीधा करने की कोशिश की तो इज़राइल के एक ही वार से उसके राष्ट्रपति जन्नत सिधार गए ,के अतिरिक्त भी ईरान को काफ़ी हानि उठानी पड़ी है। विश्व के सभी देश भली भाँति जानते हैं कि फ़िलीस्तीन लेबनान के आतंकी गुटों को परोक्ष रूप से ईरान ही पोषित कर रहा है अन्यथा क्या कारण है कि हिज्बुल्ला की अपनी एक अलग घातक आर्मी बन गई। ताजातरीन घटना पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि इज़राइल समय से 2 से 4 साल आगे की सोच कर चलता है।  सितम्बर 2024 में हुए पेजर धमाके फिर वाकी टॉकी धमाके इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि कैसे इज़राइल ने इसके ऊपर 2022 से ही कार्य शुरू कर दिया था जिसका परिणाम हिज्बुला के कोर कमांडर को मार कर उसने पूरा कर दिया। आश्चर्य की बात ये है कि रूस जो शेष विश्व के देशों के लिए स्वयं यूक्रेन युद्ध का खलनायक है वह मास्को में बैठकर इज़राइल फ़िलीस्तीन पर विशेष टिप्पणी दे रहा है जरा बानगी देखिए:-

"चिंगारी भड़काना आसान है,  बहुत आसान है। वहाँ जो घटनाएँ हो रही हैं, उन्हें देखते हुए करना आसान है।जब आप पीड़ित और खून से लथपथ बच्चों को देखते हैं तो आपकी मुट्ठीयां भीच जाती हैं और आँखों में आँसू आ जाते हैं। यह किसी भी समान्य व्यक्ति की प्रतिक्रिया है। अगर ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं है तो उस व्यक्ति के पास दिल नहीं है वह पत्थर का बना हुआ है।" 

         उपरोक्त पंक्तियों को पढ़कर मुझे सिर्फ़ हँसी आती है। जो व्यक्ति स्वयं पिछले ढाई वर्ष से यूक्रेन से "युद्धम शरणम गच्छामी" खेल रहा हो वह फ़िलीस्तीन का पक्ष लेकर इज़राइल पर दोषारोपण कैसे कर सकता है।  जितनी जाने इज़राइल फ़िलीस्तीन हमास हिज्बुला में गई हैं उससे सैकड़ों गुना जाने रूस यूक्रेन युद्ध में अब तक जा चुकी हैं। यहाँ सिर्फ़ जान के नुक़सान का आकलन है माल  असबाब का आकलन सम्भव ही नहीं।  रूस यूक्रेन युद्ध से पूरा विश्व पहले जहाँ चटकारे लेकर खबरें परोस रहा था अब वह भी इन खबरों को परोस कर 
फेडअप हो चुका है। खबर कोई भी हो ज्यादा दिन तक खबर में रहे तो वह खबर नहीं रहती। रूस यूक्रेन युद्ध की खबरों का हाल कुछ ऐसा ही हो चुका है। इन खबरों का कोई खरीदार ही नहीं। दोनों देशों के असहले खत्म हो चुके हैं उधार के हथियारों से तो युद्ध जीते नहीं जा सकते अलबत्ता दोनों देशों की अर्थव्यवस्था अवश्य रसातल में पहुँच गई है। कुछ दिनों में इज़राइल फिलिस्तीन हिज्बुल को भी समझ आ ही जाएगा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। यूरोपियन देशों एवं अमेरिका को रूस ही गैस एवं तेल सप्लाई कर रहा था। रूस द्वारा प्रतिकार स्वरुप गैस सप्लाई बाधित कर दी गई तो पिछली दो सर्दियों में यूरोप कितना परेशान हुआ है ये जग जाहिर है। अटल जी की पँक्ति याद आ गई "चिंगारी का खेल बुरा होता है"  

         अब अमेरिका यूरोप सहित संयुक्त राष्ट्र के पावरफूल देश चाहते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी इस युद्ध को रुकवाएं क्यों कि उन्हें पता है कि आज विश्व पटल पर अगर कोई एक शक्तिशाली नेता है तो वो मोदी ही हैं जिनकी स्वीकार्यता यूक्रेन और रूस के नेताओं में बराबर है। इसका प्रमाण भी पूरी दुनिया देख चुकी है जब भारत ने युद्धरत रूस यूक्रेन के नेताओं से बात कर निश्चित समय के लिए युद्ध रुकवाकर भारत के नागरिकों के साथ साथ अन्य देशों के नागरिकों को भी भारतीय तिरंगे की छत्रछाया में सकुशल घर पहुंचवाया था। अमेरिका एवं अन्य यूरोपीय देश स्वयं इज़राइल एवं हिज्बुला के मध्य जारी युद्ध रुकवाने की कोशिश नाम मात्र भी नहीं कर रहे हैं। आखिर ये दोहरी नीति क्यूँ? क्यूँ बार बार ये सुनने और पढ़ने में आता है कि अमेरिका हो या फिर यूरोपीय देश ये सिर्फ़ युद्ध भड़काना जानते हैं समेटना नहीं। अपने फायदे के लिए ये देश किसी भी सीमा तक चले जाते हैं फिर चाहे इसके लिए इन्हें तख्ता पलट ही क्यूँ न करना पड़े। अभी हाल ही में दो छोटे अफ्रीकी देशों ने उन देशों के साथ हो रहे इस प्रकार की घटनाओं का जिक्र किया है। सबसे ताजातरीन मामला बांग्लादेश का निकल कर सामने आ गया है। बांग्लादेश की कामचलाऊ सरकार के मुखिया संयुक्तराष्ट्र की सभा में जाते हैं तो स्वीकार करते हैं कि शेख हसीना के खिलाफ़ जबरदस्त साज़िश रची गई। ये खबर भी निकल कर आई कि अमेरिका बांग्लादेश में सैनिक अड्डा स्थापित करना चाहता था जब वह सफल नहीं हुआ तो उसने बांग्लादेश में तख्ता पलट करा दिया।अमेरिका तो कामयाब हो गया किन्तु उसमें पिसा और प्रताड़ित हुआ केवल हिन्दू।

         ताजा खबर के अनुसार अमेरिका और यूरोपियन यूनियन इज़राइल और लेबनान हिज्बुलाह के बीच 21 दिन का युद्ध विराम चाहती है किन्तु बेंजामिन नेतनयाहू ने इसके लिए साफ साफ इंकार कर दिया। इज़राइल का इतिहास रहा है कि वह अपने दुश्मनों के प्रति निर्मम रहा है इसलिए ये कहना जल्दबाज़ी होगी इज़राइल अपनी संप्रभुता के साथ कोई समझोता कर लेगा क्यों कि ये उसका स्टाईल नहीं है। जब तक वह हिज्बुलाह को समाप्त नहीं कर देता तब तक इज़राइल इस युद्ध में कोई युद्द विराम लागू नहीं होने देगा। इस स्थिति को देखते हुए भारत ने लेबनान में रहने वाले भारतीयों को एडवायजरी जारी कर दी है कि वे जल्द से जल्द लेबनान छोड़ दें। हम जैसे पर्यावरण प्रेमी सिर्फ़ प्रार्थना ही कर सकते हैं कि ईश्वर हमें इन पर्यावरण के दुश्मनों से बचाए !


प्रदीप डीएस भट्ट 
लेखक-9410677280


Friday, 13 September 2024

हिन्दी की है आस बनेगी एक दिन ख़ास यानि लिंगवा फ्रांका

“हिंदी की है आस, बनेगी एक दिन खास, यानि ‘लिंग्वा फ्रांका’”

         हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी 14 सितम्बर को “हिंदी दिवस” के रुप में  मनाया जाएगा। मुझे उम्मीद है कुछ मंत्रालयों में इस विषय में पत्रावलियाँ अंग्रेजी में ही प्रस्तुत की जाएगीं। हम जैसे हिंदी प्रेमियों को इससे कितना कष्ट होता है उनकी बला से। किंतु कहीं न कहीं दिल में ये आस अवश्य है कि एक न एक दिन हमारी हिंदी भाषा भी ‘लिंग्वा फ्रांका’ (प्रयोग में ली जाने वाली वह प्रभावशाली भाषा जो प्रयोग में लेने वालों की मातृ भाषा न हो) बनेगी) 

मैं हिंदवी क़ी हिंदी हूँ
राष्ट्र भाल क़ी बिंदी हूँ
अंग्रेजी भाषा के समक्ष मैं
मात्र अब भी किंचित हूँ
हाँ मैं हिन्दी हूँ ...

         विश्व परिदृश्य पर पिछले तीन हजार वर्ष के इतिहास में देखें तो ग्रीक, लैटिन, पॉर्च्युगीज, स्पैनिश, फ्रेंच और अंग्रेजी एथेंस की ग्रीक भाषा अलग-अलग दौर में प्रभावशाली रही हैं। 18वीं सदी के मध्य में फ्रांस के विद्वान वॉल्टेयर ने ‘फिलॉसफी ऑफ हिस्ट्री’ लिखी। इसका विषय संपूर्ण मानव जाति का इतिहास था। अध्ययन में यह तथ्य निकलकर आया कि ईसा पूर्व नौवीं सदी से लेकर चौथी सदी तक यूरोप, शहर रूपी कई साम्राज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से एथेंस व्यापार और सैन्य ताकत बनकर उभरा। इसलिए प्रभावशाली एथेंस की ग्रीक भाषा यूरोप की लिंग्वा फ्रांका बनी। ईसा पूर्व 201 से आने वाले 600 वर्षों तक एथेंस यूरोप का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बना रहा। लिहाजा कैथोलिक चर्च की ताकत बढ़ी और रोमन भाषा लैटिन लिंग्वा फ्रांका बन गई। लेकिन लैटिन लिंग्वा फ्रांका बनी रही क्यों कि आने वाले एक हजार साल तक कोई नई वैश्विक शक्ति नहीं उभरी।

         1492 में कोलंबस ने अमेरिका की खोज की और छह वर्ष बाद वास्कोडिगामा ने भारत में कदम रखा। ये दोनों यात्राएं पुर्तगाल के खर्चे पर हुई और इस तरह से पुर्तगाल साम्राज्य शक्तिशाली होने लगा। पुर्तगाल की देखा-देखी स्पेन और फ्रांस भी उप-निवेशवाद में कूदे। इस दौरान पॉर्च्युगीज, स्पेनिश और फ्रेंच भषा लिंग्वा फ्रांका की दौड़ में रहीं। इंग्लैंड में स्थिति ऐसी थी कि राजघराने में जो शिक्षा ली जाती थी उसका माध्यम फ्रेंच भाषा होती थी न कि अंग्रेगी। उस समय के सभ्य समाज में अंग्रेजी गरीबों की भाषा और दरिद्रता की निशानी मानी जाती थी। 
वर्तमान में अंग्रेजी भाषा को ‘लिंग्वा फ्रांका’ का दर्जा प्राप्त है। ऐसा इसलिए कि पिछ्ले लगभग 600 वर्षो से  ब्रिटेन आर्थिक, सामजिक,राजनैतिक बाजारी कारण व सैनिक शक्ति के लिहाज से विश्व के उन पाँच महत्वपूर्ण देशों में स्थान रखता है जो कि सीधे सीधे शेष विश्व पर अपना प्रभाव रखते हैं। चूँकि अमेरिका के अतिरिक्त विश्व में प्रमुख 7 देशों में अंग्रेजी ही बोली जाती है इसलिए वर्तमान दौर में अंग्रेजी ही लिंग्वा फ्रांका बनी हुई है। जहाँ तक अंग्रेगी का ताल्लुक है इसे प्रथम अंतर्राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है। चूँकि ये एक पश्चिम जर्मेनिक भाषा है जिसकी उत्पती एंग्लो-सेक्सन इंग्लैंड में हुई। चूँकि ब्रिटिश हुकूमत कई देशों पर रही है अतएव जैसे जैसे अंग्रेगी का प्रचलन बढा ये उन देशों में भी ज्यादा बोले जाने लगी जहाँ उस देश की अपनी भाषा पहले से ही मौजूद थी। ऐसा इसलिए भी हुआ क्यों कि ब्रिटिश लोगों ने 18,19 एवम 20वीं शताब्दी में  सैन्य, राजनितिक, आर्थिक, वैज्ञानिक एवम सांस्कृती पर अपनी पकड बनाने के उद्देश्य से अंग्रेगी भाषा के प्रयोग पर अधिक बल दिया जिससे इसे छटी भाषा के रुप में लिंग्वा फ्रांका होने का गौरव प्राप्त हुआ। कुछ देश ऐसे भी रहे जिन्होंने इसे अपनी मातृ भाषा के बाद दूसरी भाषा के रुप में मान्यता प्रदान की। अगर मैं इसे इस तरह पारिभाषित करूँ या कहूँ  कि अंग्रेगी भाषा का उत्थान चौथी या शायद पाँचवी शताब्दी के मध्य में इंग्लैंड में एंग्लो- सेक्सन लोगों द्वारा शुरु हुआ तो ज्यादा बेहतर होगा। एंग्लो सेक्सन लोग कई तरह की बोलियों/ भाषाओं को बोलते थे,यहाँ यह कथन स्प्ष्ट है कि वाइकिंग हमलावरों द्वारा अपनाई गई प्राचीन नोर्स भाषा का प्रभाव वर्तमान अंग्रेगी भाषा पर ज्यादा है। ये विषय अलग है कि अंग्रेजी भाषा लगातार अपना विकास करती रही और अन्य देशों में बोले जाने वाली भाषा के शब्दों को स्वंय में समाहित करती रही जिससे इसकी ताकत में ज्यादा वृद्धि हुई। वर्तमान में जो हम अंग्रेजी बोलते हैं उसमें नोर्मन शब्दावली और वर्तनी के नियमों का भारी संख्या में उपयोग हुआ है। वर्तमान अंग्रेजी भाषा में प्राचीन ग्रीक और लैटिन का अत्याधिक प्रभाव दिखायी पडता है। अंग्रेजी बोलने वाले लगभग 53 प्रमुख देश हैं जिनमें संयुक्त राष्ट्र, यूरोपियन संघ,राष्ट्रमण्डल, नाटो देश व नाफ्टा के देश शामिल हैं। एक सर्वे के अनुसार पूरे विश्व में अंग्रेजी बोलने वाले देशों के क्रम में अमेरिका प्रथम स्थान भारत दूसरे स्थान पर ,नाइजिरिया तीसरे स्थान पर और आश्चर्यजनक रुप से ब्रिटेन चौथे स्थान पर आता है। इसके बाद फिलिपिंस कनाडा और आस्ट्रेलिया का नम्बर आता है। मतलब जिस अंग्रेजी भाषा की उतपत्ती ब्रिटेन में हुई वही देश अंग्रेजी बोलने वाले देशों में चौथे नम्बर पर है मतलब उसने अपना आधिपत्य जमाने के उद्देश्य से अंग्रेजी भाषा को इतना ताकतवर बना दिया कि समूचा विश्व बिना अंग्रेजी भाषा के चल नही सकता। किंतु हर जगह अपवाद होते हैं, जो यहाँ भी है। चीन में मंदारिन भाषा सबसे ज्यादा बोली जाती है किंतु चीन के बाहर न के बराबर किंतु चीन ने आज जो मुकाम हासिल किया है वह मंदारिन की बदौलत ही किया है। अंग्रेजी का उपयोग उतना ही किया गया जितना आव्श्यक था।
जहाँ तक हिंदी भाषा का प्रश्न है तो विश्व में अंग्रेजी, मंदारिन के बाद इसका स्थान तीसरा है। भारत में हिंदी के बाद सबसे अधिक बंगाली भाषा ( लगभग 30 करोड) बोली जाती है। जिस प्रकार आज अंग्रेजी वैश्विक भाषा के रुप में विश्व में प्रतिष्ठित है उसी प्रकार आने वाले समय में हिंदी भी वैश्विक भाषा के रुप में निश्चित अपना स्थान बनाएगी। हिंदी भारत के अतिरिक्त नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, तिब्बत, अफगानिस्तान, श्रीलंका इत्यादि  देशों में प्रमुख रुप से बोली और समझी जाती है।पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दी धीरे धीरे सम्पर्क भाषा के रुप में अपना स्थान निश्चित करती जा रही है । भारत में इस समय कुल छ: कास्मोपोटिन शहर हैं जिनमें चेन्नई को छोडकर आपको हिंदी भाषा बोलने वाले समझने वाले देल्ही,मुम्बई, बंगलौर,कोलकत्ता और हैदराबाद में आसानी से मिल जायेंगे। चेन्नई में भी हिन्दी बोलने वाले मिलेंगे लेकिन वे तमिलियन न होकर हिन्दी बेल्ट से आकर बसे हिन्दी भाषी लोग हैं। एक सत्य और है कि व्यापार के सिलसिले में राजस्थान से बाहर निकले लोग भले ही घर में मारवाडी में बातचीत करते हैं किंतु अपनी व्यापारिक गतिविधियों में वे हिन्दी भाषा का ही प्रयोग करते हैं। इसका अनुभव मुझे अगस्त -2022 माह में अपने तीन दिवसीय साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान देखने को मिला। एक कहावत प्रसिद्ध है “जहाँ न पहुँचे बैलगाडी वहाँ पहुँचे मारवाडी” ये सुखद अनुभव मुझे नेपाल में भी देखने को मिला और भूटान में भी। यहाँ तक कि पश्चिम बंगाल एवम नोर्थ ईस्ट के आठों राज्यों में भी।

         भारत की संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को इसे राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया जिससे इसका प्रयोग और चौतरफा विकास हुआ। जैसे बंगला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि को क्रमश: बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल आदि की राजभाषा (मुख्य प्रांतीय भाषा) बनाया गया है। ऐसा करने से किसी भी भाषा का महत्व कम नही हुआ है? निश्चित रुप से नही। बल्कि इससे उन सभी भाषाओं का उत्तरदायित्व और प्रयोग क्षेत्र पहले से अधिक बढ़ गया है। जहाँ पहले केवल परस्पर बोलचाल में ही इनका प्रयोग होता था या उसमें साहित्य की रचना होती थी, वहीं अब प्रशासनिक कार्य भी हो रहे हैं। यही स्थिति हिन्दी की भी है। इस प्रकार हिन्दी सम्पर्क और राष्ट्रभाषा तो है ही, राजभाषा बनाकर इसे अतिरिक्त सम्मान प्रदान किया गया है।द्वितीय महायुद्द की समाप्ति पर 1945 में जब सन्युक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी तो उसकी आधिकारिक भाषा के रुप में अंग्रेजी रशियन, फ्रेंच एवम मंदारिन को ही आधिकारिक भाषा के रुप में मान्यता मिली थी। हम भारतीयों के लिए 1991 में सन्युक्त राष्ट्र में स्व0 अटल बिहारी बाजपई जी द्वारा दिया गया भाषण ही एक मात्र गौरव का क्षण रहा है अन्यथा आज तक किसी अन्य नेता ने कभी सन्युक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देना तो दूर “नमस्ते” भी कहना उचित नहीं समझा । फिर हिन्दी को सन्युक्त राष्ट्र की भाषा में सम्मलित कराने की बात तो दूर की कौडी ही रही। बिना किसी संकोच के कहा जा सकता है कि 2014 के बाद से स्थिति बहुत तेजी से बदली और 2018 में भारत सरकार की ओर से सन्युकत राष्ट्र संघ  के वैश्विक संचार विभाग के साथ साझेदारी की गई । आज भारत सन्युकत राष्ट्र संघ   के समाचार और मल्टी मीडिया के लिए फण्ड भी दे रहा है और परिणाम सामने है। जून-2022 में सन्युकत राष्ट्र संघ द्वारा जारी होने वाले सभी कागज़ातों को अन्य मान्य भाषाओं के अतिरिक्त हिन्दी में जारी करने की घोषणा की। निश्चित रुप से भारत के लिए ये गर्व का विषय है हिन्दी के अतिरिक्त बांग्ला एवम उर्दु भाषा को भी सन्युक्त राष्ट्र ने अपनी सहमती प्रदान की है।  इसी क्रम में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कुछ माह पूर्व घोषणा की है कि उसके द्वारा दिये गये सभी निर्णयों का अनुवाद हिन्दी भाषा में किया जाएगा ताकि वादी को समझने में आसानी हो।   

"सात कोस पर पानी बदले चार कोस पर भाषा जी 
विश्व पटल पर छा जाएगी इक दिन हिन्दी भाषा जी "

         आज का युवा निश्चित रुप से अंग्रेगी के साथ हिंदी भाषा को भी महत्व देने लगा है उसे अच्छी तरह से पता है कि विकास का पहिया केवल अंग्रेजी या प्रांतीय भाषा के सहारे नही घूम सकता। पिछ्ले कुछ वर्षो में देश में ही नही वरन विदेशों में हिंदी और संस्कृत भाषा सीखने की एक होड सी मची हुई है।  मल्टीनेशनल कम्पनियाँ अच्छी तरह से जानती है कि भारत एक बहुत बडा बाज़ार है, अगर उन्हें अपना माल बेचना है तो उन्हें भारत की मुख्य भाषा हिन्दी को स्वीकार करना ही होगा, साथ ही इसी बहाने प्रांतीय भाषाओं का भी विकास हो रहा है। कुछ वर्ष पूर्ण एक आर्टिकल पढा था जिसमें बताया गया था कि दक्षिण कोरिया की कम्पनी जब किसी को भारत में अपना प्रतिनिधी बनाकर भेजती हैं तो वे एक शार्ट टर्म हिन्दी सेशन रखती हैं ताकि वे हिन्दी भाषा के कुछ शब्द वाक्य समझ व बोल सके ताकि कम्पनी को भारत में प्रतिनिधि के तौर पर यहाँ की बोल चाल को समझने में आसानी हो, लोगों से घुलने मिलने में आसानी हो, उनका उद्देश्य सिर्फ भारत में  सिर्फ माल बेचने का ही नही वरन उनका उद्देश्य भारतीय समाज से जुडने का ज़ियादा रहता है। आज सिर्फ हिन्दी फिल्म उद्योग ही वरन प्रादेशिक फिल्म उद्योग भी अपनी सभी फिल्मों, वेब सीरिज़ को हिंदी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में डब कराके प्रदर्शित करता है ताकि ज्यादा से ज्याद लोगों तक उसकी पहुँच सुनिश्चित हो। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। 

         भारत का संविधान कुल 22 भारतीय भाषाओं को आधारिक भाषा का दर्ज़ा देता है. इन 22 भाषाओं में शामिल है :- हिंदी, तमिल, तेलुगु, मराठी, असमिया, बोडो, कन्नड़, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, गुजराती, बांग्ला, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, डोगरी, संथाली, मैथिली, नेपाली, कोंकणी एवम उर्दू। किंतु हिंदी लगभग सब जगह बोली जाती है और यह सबसे अधिक तेजी से बढ़ भी रही है।  पढाई का माध्यम भी धीरे धीरे हिंदी ,अंग्रेजी व एक प्रांतीय भाषा के इर्द गिर्द ही सिमटता जा रहा है जो कि एक अच्छा संकेत है। इस विषय में भारत सरकार द्वारा भी विभिन्न स्तरों पर प्रोत्साहन प्रदान किये जा रहे हैं साथ ही नई शिक्षा नीति भी इसमें एक कारगर भूमिका निभा रही है। पिछले दिनों विज्ञान पत्रिका  करंट साइंस में प्रकाशित एक अनुसंधान में मस्तिष्क विशेषज्ञों का कहना है कि अंग्रेजी पढते समय हमारे दिमाग का केवल बाँया हिस्सा ही सक्रिय रहता है जब कि हिन्दी या संस्कृत पढते समय मस्तिष्क का दायाँ और बाँया दोनों हिस्से सक्रिय हो जाते हैं। इससे दिमाग की कसरत ज्यादा होती है और दिमाग ज्यादा तरोताज़ा रहता है। राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र की भविष्य में अन्य भारतीय भाषाओं के प्रभाव पर भी अध्य्यन करने की योजना है। अध्यान की प्रक्रिया के दौरान छात्रों को पहले चरण में जोर जोर से अंग्रेजी भाषा पढने के लिए कहा गया उसके पश्चात  हिन्दी भाषा। इस समूची प्रक्रिया में दिमाग का एम आर आई किया गया तब उप्रोक्त रिजल्ट सामने आया। इसका कारण निश्चित रुप से हिन्दी बोलते समय मात्राओं के कारण दिमाग की सक्रियता ज्यादा होना था जब कि अंग्रेजी बोलते समय सीधा सीधा छब्बीस अल्फाबेट का रीपिटिशन ही रहा होगा। एक और अच्छी पहल हुई है वो ये कि   इंजीनियरिंग एवं मेडिकल की पढ़ाई भी हिन्दी माध्यम से करायी जाने लगी है जो कि भारतीय शिक्षा के लिए एक शुभ संदेश है l मुझे विश्वास है 2040 तक हिन्दी अगली (सातवीं) लिंग्वा फ्रांका का होने का दर्जा अवश्य प्राप्त कर लेगी।

© प्रदीप देवीशरण भट्ट - 01:09:2024

Wednesday, 4 September 2024

"ज़रूरी नहीं कवि ही बनो "


         रिपोर्ताज 

        "ज़रूरी नहीं कवि ही बनो"  

        दादा 1 सितंबर को राब्ता प्राईम का कार्यक्रम रक्खा है। अब शिवम का फोन आया तो मना करने का प्रश्न ही नहीं फिर भी मैंने हँसते हुए पूछ ही लिया बालक वेन्यू तो पालम ही होगा मगर मेन्यू, अब 😁खिलखिलाने की बारी शिवम की थी बोला दादा मेन्यू बढ़िया ही होगा। शायद उसे भी समझ आ गया था कि भूखे पेट तो कविता पढ़ी न जाएगी। शाम को फिर मुबलिया घनघना उठा, दुष्यंत जी के अवतरण दिवस पर कार्यक्रम का निमन्त्रण था चूँकि समय मैच  नहीं हो  रहा था इसलिए विनम्रता से मना कर दिया। अपनी आदत अनुसार हम सुबह 6:15 एक गिलास दुग्ध और जन्माष्टमी के बचे लड्डू का भोग लगाकर निकल पड़े। 8 बजे की ब्ला ब्ला ली और सीधे आई पी एक्सटेंशन दिल्ली वहां से पिंक लाईन ली और दिल्ली कैंट 🤤 बस पूछो मति हुजूर भयंकर वाली गलती हो गई  होज ख़ास से मेट्रो चेंज करनी थी लेकिन.... अब दिल्ली कैंट से राजौरी गार्डन से पालम समय 11:15 यानि 15 मिनिट लेट 😱। अच्छी बात ये हुई कि कार्यक्रम भी 11 की जगह 11.30 हो गया इज्ज़त में दाग लगने से बच गया। ख़ैर हमने हॉल में अपने चरण रक्खे तो प्रिय  शिवम ने स्वागत किया साथ में नीलम 'बावरा मन' ज़ी से परिचय हुआ अलग से। 🫠

       पाँच मिनिट पाँच करते करते आख़िरकार 12:10 पर प्रिय शिवम ने माइक संभाला और पहला धमाका किया कि आज सूत्रधार की भूमिका मैं स्वयं वहन करूँगा तालियों की ध्वनि से अंदाज़ा हो गया कि उपस्थित सभी प्राईम मेंबर ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है।  धीरे धीरे हॉल अपना आकार लेने लगा। शिवम ने राब्ता की अभी तक की जर्नी के विषय में बताया फिर उन चुनिंदा नामों जिक्र किया जो विपरित परिस्थितियों में भी शिवम के साथ खड़े रहे। निश्चित ये एक अच्छा अनुभव रहा। कार्यक्रम शुरू हुआ फिर धीरे धीरे लय पकड़ने लगा।एक के बाद एक बेहतरीन प्रस्तुतियां। लेकिन लेकिन लेकिन सिर्फ़ एक मोहतरमा की प्रस्तुति ने ये संदेश भी दिया कि लोग अभी भी उसी बने बनाए ढर्रे पर चल रहे हैं जहाँ किसी भी फिल्मी गाने पर अपने बेतुके शब्दों को चिपका दो फिर प्रोफेशनल गायक की तरह माइक पकड़ कर सारी गायिकी श्रोताओं पर उल्ट दो। निश्चित इससे कार्यक्रम की गरिमा के साथ साथ राब्ता की गरिमा भी kampromaiz 😡होती है। इसी तरह एक मोहतरमा बंगाल की बेटी पर एक लम्बी कविता पढ़ गईं । पढ़ी तो कोई बात नहीं लेकिन उस डॉक्टर बेटी का नाम लेने की क्या जरूरत थी उन्हें मालूम है कि सब रिकार्ड हो रहा है उनके खिलाफ़ एक्शन भी हो सकता है किन्तु ......। भविष्य में इस पर ध्यान दिये जाने की ज़रूरत है। वैसे भी ज़रूरी नहीं आप कवि ही बने कुछ और भी बनकर देख लो भाई !

        विवेक जी, राधा कौशिक अर्चना झा,अमृता अमृत, नवीन bagga,गोल्डी गीतकार, खुर्रम नूर, सुधा बसोर,दीपिका,पूनम सिंह, लीजा खान, प्रभा झा, नलिनी राज, स्नेह लता पाण्डेय, रंजना मजूमदार, एन सी खण्डेलवाल, प्रेम चौधरी, गुरमीत सिंह ढोट, अरुण श्रीवास्तव, रघुवर आनन्द, कुरुक्षेत्र हरियाणा से पधारे डॉक्टर सुभाष गर्ग और मेरठ से तशरीफ का टोकरा ले जाने वाले हम😝 तो bhaiyya सर्व प्रथम स्मरण कराया कि आज दुष्यंत जी का जन्म दिन है फिर उन्हीं को समर्पित अपनी ग़ज़ल की प्रस्तुति दी। आप यूँ न  कहो की झूठ बोल रिया हूं तो भैय्या जी पढ़ लो:-

ग़ज़ल 
1222   1222  1222 1222 

 " वो बरगद का शज़र देखो "

लिखा ज्यादा नहीं लेकिन, किया दिल पर असर देखो
कि हमसे भी जियादा, पारखी उनकी नजर देखो

वही चंदा वही तारे, नजारे भी वही लेकिन 
ग़ज़ल उसने कही सब पर,जिधर चाहे उधर देखो  

वो अपनी मौज़ का मालिक, धुआँ सब फ़िक्र कर डाला  
चुनी उसने अलग सबसे,वही तुम भी डगर देखो 

गरीबी में पला लेकिन, ठसक राजा के जैसी थी 
कि घर कवि राज का कैसा, ज़रा जाकर वो घर देखो 

रियाया दर्द को शब्दों में जिसने, ढाल कर रक्खा 
सियासत ने उन्हीं लफ़्ज़ों में देखा, अपना डर देखो 

ग़ज़ल कहते सभी लेकिन, अलग थी बात कुछ उसमें
वो गजलो का बना कैसे, ज़रा तुम चारागर देखो

अगर अब भी तुम्हें शक है, तो दूजा ढूंढ़ कर लाओ
वगरना बंद आंखें कर,जिगर उसके उतर देखो 

सभी कुछ ठीक था लेकिन,चली जाने हवा कैसी
कि उस मनहूस दिन हमको मिली, कैसी ख़बर देखो  

कहां आसान इतना 'दीप' है, 'दुष्यंत' हो जाना
कि हम सब पेड़ हैं केवल, वो बरगद का शज़र देखो

-प्रदीप देवीशरण भट्ट -9923

        लगभग साढ़े बजे सम्मान समारोह के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ और उसके बाद गर्मा गर्म भोजन। बस भैय्या आनन्द आ गया। पाँच बजे नीलम जी के साथ टैक्सी से निकले उन्होंने दिल्ली कैंट ड्रॉप किया हमने मेट्रो पकडी और सीधे आनन्द विहार वहाँ से मेरठ और फिर दस बजे घर। तो लो जी मना लिया अपने प्रिय कवि का जन्मदिन।


Wednesday, 28 August 2024

कहानी दिमाग़ में जितना पकेगी उतना निखरेगी

रिपोतार्ज 
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"कहानी दिमाग़ में जितना पकेगी उतना निखरेगी" 

 "आया हूं तो कुछ लेकर जाऊंगा"
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       कुछ याद आया हुज़ूर!!!!😊 जी सही पकड़े हैं ये डायलॉग "अंदाज़ अंदाज़ अपना अपना" फिल्म का ही है। अगर इस फिल्म में से शक्ति कपूर का स्पेशल अपीरियंस वाला किरदार हटा दिया जाए तो ये फिल्म एक औसत फिल्म बनकर ही रह जाती इसलिए राज कुमार संतोषी ने इस क़िरदार को जीवंत बनाने के लिए शक्ति कपूर के गेटअप पर भी भरपूर मेहनत की। कुछ ऐसा ही अंदाज़ "कथा रंग"  का भी है जिससे जुड़े मुझे मात्र चार  माह ही हुए हैं किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि चार बरस हो गए हैं। हर बार एक नया अनुभव होता लेकर घर लौटता हूँ। 😆हर मीटिंग के उपरांत जब मैं गाजियाबाद से वापिस मेरठ की यात्रा में होता हूं तो मेरे दिमाग़ में (वैसे सच तो ये है अपना ऊपर वाला माला खाली है) रिपोर्ताज की डार्क व पंच लाइन आकार ले लेती हैं किंतु मैं कम से कम 48 घंटे इसे दिमाग़ में ही सुरक्षित रख पकने देता हूं । वो सुना है न "Hurry will spoiled the carry"🌶️

       तो लब्बो लुआब ये है कि अगस्त के प्रथम सप्ताह में ही आलोक यात्री जी का आमंत्रण/निमंत्रण प्राप्त हो गया कि 25 अगस्त को कथा रंग की सभा होनी है आप तिथि रिज़र्व कर लें। ये एक बेहतरीन व्यवस्था है जिसका अनुपालन अन्य संस्थाओं को भी करना चाहिए। तो हुज़ूर हमने भी ये सुनिश्चित किया कि अन्य किसी कार्यक्रम की सहभागिता से बचा जा सके। आख़िर कमिटमेंट भी कोई चीज़ है प्रदीप बाबू। 😉

         पूरे भारत में बदरा सिर्फ़ गरज ही नहीं रहे बल्कि पूरे जोश-ओ - ख़रोश के साथ बरस भी रहे हैं सच कहूँ तो कुछ ज़्यादा ही बरस रहे हैं।  नदी हो या नाले सभी फूलम फुल,पर पता नहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश से और वो भी विशेष रूप से मेरठ से न जाने इंद्र देवता को क्या नाराज़गी हो गई है भैय्या बरस ही न रहे। अगर ग़लती से बरसने आ भी गए तो पवन महाराज साथ में उड़ाकर पता नहीं कहां ले जा रहे हैं। ख़ैर जलती भुनती गर्मी में 25 अगस्त को ग्यारह बजे निकले रास्ते में एक काम निपटाया और ठीक 2.30 होटल रेडबरी के सामने ऑटो से शाही सवारी उतरी। कार्यक्रम में समय से पहुंचना अपनी आदत में शुरु से शुमार रहा है सो 2.35 मीटिंग हॉल में पहुंचा तो बस हम ही हम तभी एक कुर्सी खिसकते हुए एक दम नज़दीक आकर बोली 'वेल्ले हो' हम समझे हमारा नाम पूछ रही है सो तुरन्त स्टाइल से बोले नहीं प्रदीप भट्ट हैं मेरठ से आ रहे हैं। अब कुर्सी को ताव आ गया बोली टाइम पे आना अच्छी बात है लेकिन इतनी जल्दी भी आना अच्छी बात नहीं।  लोग वेल्ला समझते हैं। सच कहें इतनी बढ़िया वाली बेइज्जती आज तक न हुई थी इसलिए खींसे निपोर कर बेइज्जती कम महसूस करने की कोशिश की किंतु जल्दी समझ में आ गया कि अगर और कटा जला नहीं सुनना चाहते तो बेटा वॉशरूम का बहाना करके खिसक लो, लेकिन अफ़सोस दिल गड्ढे में। बाथरूम में अलीगढ़ी ताला हमारा मुँह चिढ़ा रहा था😄 ख़ैर बाहर निकले दरयाफ़्त की फिर पुनः हॉल में आ लौटे।लौट के बुद्धू घऱ को आए वाली स्थिति में 🤣। 

         थोड़ी देर में प्रिय उत्कर्ष साथ में एक मोहतरमा हॉल में दाख़िल हुई ज़बरदस्त ड्रेस सेंस। थोड़ी देर में सुभाष जी शक़ील अहमद जी,रिंकल जी तेज सिंह जी रूबी भूषण जी, डॉक्टर देवेंद्र देवेश जी वगैरह वगैरह। अपरिहार्य कारणों से कार्यक्रम अध्यक्ष डॉक्टर शिव नारायण वरिष्ठ लेखक एवम संपादक "नई धारा"  डॉक्टर बलराम जी  वरिष्ठ लेखक एवम संपादक "समकालीन भारतीय साहित्य" देर से उपस्थित होने वाले थे। समय का सदुपयोग करते हुए प्रिय रिंकल ने माइक संभाला🙋‍♀️ और घोषणा की कि जब तक कार्यक्रम का शुभारंभ हो तब तक क्यों न सभी का एक दूसरे से परिचय हो जाएं। हाजरी के क्रम  संख्या के हिसाब से मैं क्रम संख्या 36 पर अंकित था सो आख़िरी में हमारा भी नंबर आ गया अभी हम हमने परिचय देकर माइक नीचे रक्खा ही था कि तभी आकाशवाणी हुई "मैं आलोक यात्री" पूरे हॉल में उपस्थित लोगों के होठों पर स्मित उभर आई। अगले दस मिनिट में हॉल लगभग पूरा भर चुका था। अध्यक्ष की बाट जोहते हुए कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ और कहानी की पाठशाला/ कार्यशाला में मीना पाण्डेय जी की कहानी "आराम कुर्सी " 🦽से वाचन प्रारम्भ हुआ। मैं उन्हें पिछ्ले कार्यक्रम में सुन चुका हूँ । पढ़ने का अंदाज़ अंदाज़ है। बेहतरीन कहानी पर ज़बरदस्त टीका टिप्पणी हुई । हर व्यक्ति की अपनी दृष्टि है मुझे उनकी कहानी का अंत सिर्फ़ इसलिए पसंद आया क्यों कि उन्होंने बेलाग अंदाज़ में वही परोसा जो हमारे समाज में व्याप्त है। माता या पिता की लीगेसी कोई भी आगे बढ़कर लेना नहीं चाहता सभी जल्द से जल्द मुक्ति चाहते हैं किंतु माता पिता द्वारा अर्जित एसेट नहीं छोड़ना चाहते। 🏡कहानी को दर्शकों का अच्छा प्रसाद मिला। मंजू मन द्वारा प्रस्तुत कहानी "ड्रॉपर" सुधी पाठकों को रास नहीं आई। मुझे स्वयं भी सबसे ज़्यादा आपत्ति इसके शीर्षक को लेकर थी जो एक औसत कहानी को और ज़्यादा औसत बना रहा थी। लेखिका मंजू मोहन को आलोचनाओं से इतर भी सोचना होगा। तीसरी कहानी "सफ़ेद आकृति" जिसे संस्था के अध्यक्ष शिवराज जी ने रचा और मंच पर प्रस्तुत वागीश शर्मा ने किया। इस कहानी पर कोई भी टिप्पणी न करना इसलिए आवश्यक नहीं क्यूं कि हम बाहर जाकर फ़ुनवा सुनने में व्यस्त रहे जब अन्दर आए तो..... चौथी कहानी "बुधिया की दिहाड़ी"🧍‍♀️ जिसे विनय विक्रम सिंह जी ने न केवल बुना बल्कि बढ़िया बुना। सबसे ज़्यादा प्रसाद इसी कहानी को मिला। कहानी सुनना शुरु किया तो मुझे स्वयं रचित लघु कथा "दिहाड़ी" की याद हो आई जिसे मैं आगामी कहानी संग्रह में स्थान दूंगा। मैंने ईमानदारी से इस बात को विनय जी से स्वीकारा कि काश मैं अपनी कहानी को आपकी कहानी जैसा विस्तृत विस्तार दे पाता। ओ भैय्या इत्ती देर हो गईं बकर बकर करते 😹 हमारी ईमानदारी टिप्पणी पर ताली तो बजाओ। 👏

         कार्यक्रम के अंतिम सत्र में रूबी भूषण जी की पुस्तक "टेम्स नदी बहती रही" एवम आगरा से पधारे युवा लेखक संजय दत्त शर्मा की पुस्तक "कस्बा" का लोकार्पण भी मंचासीन विभूतियों द्वारा संपन्न हुआ। अपने उद्बोधनों में डॉक्टर बलराम जी की नसीहत "झूठ और सच को जानना ही लेखकीय कौशल है" डॉक्टर शिवनारायण" कहानी द्वंद से ही बनती है " डॉक्टर देवेश ने अपने उद्बोधन में " लेखक के झूठ से ही समाज का सच उजगार होता है" से अपने अनुभव साझा किए। डॉक्टर रूबी भूषण की  यह स्वीरोक्ति कि वे "कथा रंग में आकर अभिभूत हुई" कथा रंग परिवार के लिए किसी मेडल से कम नहीं है।  आलोक यात्री जी हों या सुभाष चंदर जी या अन्य सभी ने कहानी लिखने और कहने पर पर अपने अपने मत प्रस्तुत किए। डॉक्टर स्वाति चौधरी का यह कथन कि चूँकि वे एक संपादक हैं तो कहानियों पर  टिप्पणी में सम्पादकता का पुट आना स्वाभाविक है। उन्होंने खुलकर कहा भी कि मैं एक श्रोता के साथ एक लेखक भी हूँ और एक लेखक के साथ साथ  एक सम्पादक भी इसलिए चाहकर भी सिर्फ़ अच्छी टिप्पणी ही देना सम्भव नहीं है। उनकी ईमानदार टिप्पणी के लिए उनको साधुवाद।  जहां तक मेरा स्वयं का प्रश्न है "कहानी जितना दिमाग़ में पकेगी वो उतनी ज़्यादा निखरेगी"। कहानी लिखना अलग बात है उसे प्रस्तुत करना अलग है। कई बार सारा खेल "कहन" पर आकर सिमट जाता है। कई मर्तबा कमज़ोर कहानी भी 'कहन' से लोगों पर अपना असर छोड़ जाती है। मीना पाण्डेय और विनय विक्रम सिंह इस बात को बेहतर जानते प्रतीत होते हैं। 

         और अब अंत में हर माह कथा रंग की मीटिंग होनी ही है। मीटिंग होनी है तो कोई न कोई कार्यक्रम अध्यक्ष विशेष अतिथि होंगे ही। उन सभी को कार्यक्रम एवम कहानियों पर टिप्पणी देनी ही होगी। टिप्पणियां कभी गुड़ की तरह मीठी होंगी कभी नीम सी कड़वी। अब उन टिप्पणियों को लेखक कैसे लेता है ये उस पर निर्भर करता है। आख़िर अनुभव की कुछ तो क़ीमत होती है। ज़रूरी नहीं हर लेखक उसे सकारात्मक रूप में स्वीकर करे कुछ लोगों की प्रवृति ही नकारात्मकता को धारण करने में ज़्यादा होती है। ख़ैर अब हमें ये लेखक के विवेक पर छोड़ देना चाहिए कि वो क्या स्वीकर करता है। मुझे ये रिपोर्ताज लिखते हुए 2019 का एक किस्सा याद हो आया। कादम्बिनी क्लब हैदराबाद द्वारा हर माह काव्य गोष्ठी आयोजित होती है, पैटर्न के अनुसार प्रथम सत्र में किसी प्रसिद्ध लेखक की लेखकीय यात्रा पर चुनिंदा लोगों द्वारा विचार प्रकट किये जाते हैं फिर द्वितीय सत्र में कवि गोष्ठी। शायद माह अक्टूबर 2019 की बात है उस मीटिंग में शिवानी की लिखी कहानियों उपन्यासों में से किसी एक का चुनाव कर उस पर अपने विचार प्रकट करने थे सो जैसे ही ये सूचना प्राप्त हुई मैंने तुरन्त गोरा पंत उर्फ़ शिवानी की  "कृष्णकली" उपन्यास के लिए अपनी सहमति दे दी क्यों कि मैंने उसे पहली बार धर्मयुग में किस्तों में पढ़ा था। लेकिन बोलने के लिए बुलेट पॉइंट्स बनाने बैठा तो सब गड्ढामड हो गया पर चूंकि मैं ऑफिस में हिन्दी प्रकोष्ठ का प्रभारी भी था तो तुरन्त सहायक की मदद से भारती जी ( हैदराबाद में हिन्दी पुस्तकों के एक मात्र विक्रेता) से सम्पर्क किया और अगले दिन पुस्तक हाज़िर हो गई । पुस्तक को दो बार पढ़ा तब जाकर दस मिनिट कुछ बोल पाने का अच्छा मैटेरियल तैय्यार कर पाया। कुल जमा 50,55 लोगों की उपस्थिति में जब वाचन हुआ तो सिर्फ़ कृष्कली पर ही नहीं वरन धर्मयुग में किस्तों में प्रकाशन का पूरा ब्यौरा भी मैंने अपने उद्बोधन में समेट लिया साथ ही एक विशेष घटना का भी ज़िक्र किय़ा जिससे उपस्थिति लोगों में कृष्णकली पढ़ने की उत्कंठा उत्पन्न हुईं। शायद यही है 'कहन'  रिजल्ट आशा से अधिक रहा। ये किस्सा बयां करने का कारण भी यही है कि "कहन" से पहले दिमाग़ में उसका खाका तैयार होना ज़रूरी है। फ़िर भी यदि "कहन" के दौरान कुछ इधर उधर हो जाए तो वरिष्ठ लेखक हों या श्रोता समझ जाते हैं कि बंदे ने मेहनत तो पूरी की है लेकिन..... 🍁🌹🍁🌹🍁🌹🍁🌹


प्रदीप डीएस भट्ट -28824