Sunday, 24 September 2023

कमिटमेंट है तो है

रिपोतार्ज

     "कमिटमेंट है तो है"

सृजन एजुकेशन ट्रस्ट 
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सृजन एजुकेशन ट्रस्ट यानि SET
की निदेशक/अध्यक्ष रश्मि रंजन का फ़ोन आया अत्र कुशलम तत्रास्तु के उपरांत सूचना दी कि सर set का पहला बर्थडे है,16 अक्टूबर को आपको तो आना ही पड़ेगा। अनुजो को पूरा हक है कि वे अग्रजो से बात मनवा लें 😁 ख़ैर मैंने एक सुझाव रखा कि बेहतर होगा कि यह कार्यक्रम पहले रख लिया जाए या बाद में क्यों कि १९ से २८ तक गणेशोत्सव फिर श्राद्ध पक्ष शुरू हो जाएंगे। मेरी बात को तवज्जो दी गईं और लीजिए हुज़ूर २० सितंबर फाइनल हो गया। मैंने भी टिकिट वगैरह बुक की और निवेदन किया कि मेरे लिए एक होटल की व्यवस्था कर दी जाएगी। जिसे अमान्य कर दिया गया और बताया गया कि आपको सीधे घर पहुंचना है बिना किसी अन्य को सूचना दिए।🤣 पिछला अनुभव ख़ैर जैसी प्रभु की इच्छा!

15 को भरी बारिश में पहले मेरठ से नोएडा अगली पुस्तक "उर नाद" के प्रकाशन की चर्चा हेतु फिर आदरणीय नीरव जी के साथ लंच और केरलम महोत्सव पर गहन चर्चा हुई फिर वहां से सीधे निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन। 🚂 ली और सुबह ११ बजे भोपाल। और ये क्या बारिश हमारे स्वागत के लिए पलक पांवड़े बिछाए तैय्यार जैसे कह रही हो राजा भोज की नगरी में मेहमानों का स्वागत ऐसे ही होता है। मित्र थोड़ा विलंब से पहुंचे तब तक हमने स्टेशन मैनेजर से स्टेशन पर और शौचालय में पसरी हुईं गंदगी और कुव्यवस्था पर अपनी नाराज़गी दर्ज़ करा दी।

झमाझम होती बारिश में अक्षय बंसल जी गाड़ी सहित स्टेशन पर हाज़िर। सीधे जा पहुँचे उनके इको सेंटर पर वैसे तो हम चाय नहीं पीते लेकिन मौसम को देखते हुए हाँ भर  दी। शाम को एक गोष्ठी निश्चित थी किंतु बारिश बारिश और सिर्फ़ बारिश क्या करते। जैसे तैसे नियत वैन्यु पहुँचे,थोड़ी देर इन्तेज़ार किया फ़िर मैं अक्षय जी रुपाली सक्सेना और उनके सुपुत्र अविरल जो इंदौर में रहकर B Tech कर रहे हैं एक मात्र श्रोता की उपस्थिति में कविताओं का दौर चालू हो गया। ❤️ प्रिय रुपाली उपहार स्वरूप माँ सरस्वती की मूर्ति लेकर आईं थीं जिसे लेने से मना नहीं किया जा सकता था। thx dear। पेटपूजा के बाद अक्षय जी ने रानी कमलावति  रेलवे स्टेशन ड्रॉप किया। 17 की तड़के यानि 12:40 ट्रेन ली और 11 बजे नाशिक मित्र ऋषि देव के पास। अगले दिन सुबह 5 बजे कार से पूना और उसी दिन 11 बजे वापिसी। रास्ते में  पता चला मुंबई से वडोदरा की ट्रेन ज़ियादा बारिश के कारण कैंसिल हो गईं है। बड़ी पशोपेश में पड़ गया फ़िर और कोई रास्ता न देखकर फ्लाइट की टिकिट निकाली। रश्मि से  कमेंटमेंट किया है सो पहुंचना तो है। कमिटमेंट है तो है 🤛।

19 को नाशिक से सुबह सुबह  निकले 11बजे मुंबई दोस्तों से मिले डॉक्टर नागर के साथ लंच लिया शाम को अरुण भाई से गुफ़्तगू की और सीधे एअरपोर्ट। 20 की सुबह फ्लाइट ली और सीधे वडोदरा। शाम को सृजन एजुकेशन ट्रस्ट के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित हुए। अच्छी खासी तादाद में लोकल सहित्यकारों ने अपनी  उपस्थिति दर्ज़ कराई। बढ़िया कवि गोष्ठी संपन्न हुईं। तभी गोकुल क्षत्रिय अपने मित्र के साथ बारिश से लड़ते झगड़ते कई वाहनों में सफ़र करते हुए कार्यक्रम में पहुँच ही गये। पिछले वर्ष की गोवा की यादें ताज़ा हो गईं। 

अगले दिन बंसल जी से मुलाक़ात हुईं फ़िर एक मित्र के यहाँ लंच लिया और शाम को आद्या के हाथ की बनी हुईं स्पेशल आइसक्रीम का आनंद लिया ही था कि प्रिय रंजन सिंह (रश्मि जी के पतिदेव ) ने एक थैला जिसमें फ्रूट, खाखरा नमकीन कुछ और भी साथ में था मेरे हाथ में थमा दिया। मुझे सृजन द्वारा प्रदान किये पौधे को विशेष रूप से पैक करके दिया गया ताकि घऱ तक पहुँच जाए। घऱ से कुछ पहले ऑटो में आते हुए रंबल स्ट्रीप पर खाखरा साथ में कुछ और भी थैले से निकलकर धरती मईय्या पर बिखर गये जैसे कोई लड़की मायके में आकर ख़ुशी में बिखर गईं हो ग़नीमत रही मैंने समय रहते पौधे को संभाल लिया जो आज सूर्य की रश्मि से आलोकित होकर  बॉलकनी में मुस्कुरा रहा है। 

अंत में 15 सितंबर से शुरू हुआ सफ़र 22 की सायं पर संपन्न हुआ। इन सभी दिनों में एक भी दिन ऐसा नहीं था जिस दिन मैंने यात्रा न की हो। एक यादगार प्रवास की ख़ूबसूरत यादें संजोय जब सुबह उठा तो सोचा अख़बार की सुर्ख़ियां बाद में पहले रिपोतार्ज ही बना लूँ। 🤗🤗🤗

प्रदीप DS भट्ट -23923

Tuesday, 22 August 2023

"प्रदीप बाबू बढ़िया है"

रिपोतार्ज़


            "प्रदीप बाबू बढ़िया है"

अगर मैं अपनी साहित्यिक यात्रा का पुनर्रावलोकन करने बैठूं तो इसका आगाज़ स्कूली पत्रिका संभावना में प्रकाशित मेरी पहली कविता "शहीदों का मज़ार" जिसकी अंतिम पंक्तियाँ कुछ यूँ थी:-

"तभी अनिश्चय के बादल में बिजली चमकी, 
रस्ता पाया
याद मुझे फिर ये दिन आया
दौड़ा दौड़ा गया शहीदों के मज़ार पे
इन फूलों का हार उन्हीं पर जा चढ़ाया"

निश्चित रूप से मेरी प्रथम कविता माखनलाल चतुर्वेदी की कविता सुमन की चाह से प्रभावित थी।
फिर नाटक, कहानी लिखते लिखते कविता से दिल लगा बैठा😊 ग़लत न समझें ये शब्दों वाली कविता का जिक्र है मांसल देह वाली कविता का नहीं😁 फिर आकाशवाणी में वार्ता प्रसारित हुई फ़िरनौकरी वग़ैरह वग़ैरह। दिल्ली से मेरठ से मुम्बई फिर हैदराबाद यानि साहित्यिक पारियाँ कभी exprsss ट्रेन सी कभी पैसिंजर ट्रेन से चलती रही।

       अब नौकरी है तो रिटायरमेंट भी है सो सोचा रिटायरमेंट से पहले ज़्यादा न सही कुछ शांत वातावरण में एक कुटिया या फ्लैट ले लिया जाए सो मई में मेरठ में शहर की सरहद से बाहर एक फ़्लैट ले लिया। शांत सौम्य वातावरण हरे भरे खेत, लाईट की आँख मिचौली साथ ही नेटवर्क समस्या सो अलग लेकिन अच्छी जगह एवम शांत वातावरण के सामने ये समस्या कुछ भी नहीं😃 

     अभी मेरठ के मित्रों को सूचना नहीं दी है कि "गब्बर इज़ बैक"😊  पहली बार अहसास हो रहा है फ़्लैट लेना अलग बात है और इंटीरियर के नाम पर मानसिक क्लेश किसे कहते हैं। बन्दों का काम है कि ख़त्म ही नही हो रहा ख़ैर आदरणीय नीरव जी से ज़रूर संपर्क बना रहा। 16 अगस्त को आग्रह कि आपको 20 अगस्त को गुरुग्राम के कार्यक्रम में शिरक़त करनी है। शाम को राजेश प्रभाकर जी का कॉल आ गया (मेरा राजेश से प्रथम परिचय 26 अप्रैल-2022 को राजपाल यादव जी के निवास पर हुआ था इत्तिफ़ाक़ ये कि एक ही शहर में होने के बावज़ूद राजेश जी और राजपाल जी पहली बार मिल रहे थे और मुलाक़ात का माध्यम मैं बना) सो जब राजेश जी ने स्वर साधना के कार्यक्रम में उपस्थित होने का आग्रह किया तो मैंने सहर्ष हामी भर ली।

      20 अगस्त-2023 प्रात: 4:30 के अलार्म से दिनचर्या शुरू हुई। सामान्य परस्थितियों में मुझे समय से कार्यक्रम में पहुँचने की आदत है फिर चाहे आमंत्रण अतिथि के तौर पर हो या विशिष्ट अतिथि के तौर पर हो या कि फिर कार्यक्रम अध्यक्ष के तौर पर। मुझे ख़ुशी है कि उत्तर प्रदेश से चलकर दिल्ली से हरियाणा के गुरुग्राम तक मैं 09:58 पर कार्यक्रम स्थल के प्रांगण में प्रवेश कर चुका था।स्वागत प्रिय राजेश श्रीवास्तव ने किया फिर आदरणीय नीरव जी, मधु जी,यशपाल जी राजेश प्रभाकर प्रिय अनुज अवधेश कनौजिया, कुमार राघव, कुलदीप कौर मोनिका शर्मा इत्यादि ।कुछ अपरिचित चेहरे भी थे जिनसे मेरा प्रथम बार परिचय हो रहा था। जिनमें पंकज जौहरी कृष्ण गोपाल सोलंकी सुनील शर्मा प्रेम बिहारी मिश्र इत्यादि।

  थोड़े से विलम्ब से ही सही कार्यक्रम आदरणीय नीरव जी की अध्यक्षता में प्रारम्भ हुआ। नीरव जी को जर्मनी के प्रतिष्टित मैक्स मूलर सम्मान से नवाज़ा गया है। स्वर साधना संस्था द्वारा नीरव जी की इस उपलब्धि पर ही ये विशेष कार्यक्रम माधव सेवा केंद्र में उनके सम्मानार्थ आयोजित किया गया।वरिष्ठ साहित्यकार अशोक जैन जी विजय प्रशान्त, प्रिय रमाकांत (पूरे कार्यक्रम में एक्टिव रोल निभाया) प्रिय सुनीता सिंह के मधुर स्वर में सरस्वती वंदना सुनकर 'स्वर साधना मंच" अभिभूत हुआ। "अह्म ब्रह्मास्मि" की सर्वेसर्वा दीपशिखा जी संस्था का नाम बहुत ही सुंदर रक्खा है। सभी उपस्थित कवियों ने रचना पाठ करके कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई। ये देखकर अच्छा लगा कि प्रिय मोनिका शर्मा औऱ राजेश श्रीवास्वत का इस बात पर फोकस करते रहे कि कार्यक्रम में कोई त्रुटि न रह जाए । मेरी नज़र में इस कार्यक्रम की यही उपलब्धि रही कि स्वर साधना मंच को दो कर्मठ सहयोगी मिल गए। दोनों को आशीष।

       भोजनोपरांत हम ठीक 4 बजे निकले और से:सायं ९:15 मेरठ। तो भैय्या एक यादगार यात्रा एक यादगार कार्यक्रम कुछ नये मित्रों से मुलाक़ात या यूँ कहूँ तो ज्यादा बेहतर कि कुल मिलाकर एक यादगार दिन। 
स्वर साधना मंच प्रगति पथ पर सदैव अग्रसर रहे और साहित्यिक आकाश पर अपने लिए एक विशेष स्थान बनाएं।
टीम "स्वर साधना मंच" शुभेच्छा।
राजेश प्रभाकर जी को विशेष🌹🌹

Monday, 14 August 2023

मानवाधिकार की धज्जियाँ उड़ाता पाकिस्तान




“मानवाधिकार की धज्जियां उड़ाता पाकिस्तान और बांग्लादेश 
और वहाँ अपना अस्तीत्व तलाशते हिन्दू”


      पिछले कुछ समय से देश मे हिन्दू-मुस्लिम और बीफ विविद की चर्चा ज़ोरों पर है। अब हम सभी इन बे-सिर पैर की बातों मे उलझकर रह गए हैं। हाँ इतना ज़रूर हुआ की कुछ छद्म साहित्यकारों ने अपने अवार्ड वापिस करने की एक मुहिम चलाई जिसकी शुरुआत तो उदय प्रकाश ने की लेकिन अवार्ड वापिस किया काफी देर से । खैर इस विषय पर मै पहले ही काफी कुछ लिख चुका हूँ। आज हम पाकिस्तान और बांग्लादेश मे हिन्दुओ कि दुर्दशा पर चर्चा करेंगे ।

      पिछले दिनों पाकिस्तान और बांग्लादेश मे हिन्दुओ की स्थिति पर पढ़ने सुनने और समझने का मौका मिला और ये जानकार आश्चर्य हुआ की भारत मे लगभग 18-20 करोड़ मुस्लिम इन दोनों देशो के मुक़ाबले कितने सुखी और सुरक्षित हैं। आइये एक बानगी देखते हैं।

      1947 मे जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान नामक देश अस्तीतव  मे आया उस समय पाकिस्तान मे हिन्दुओ की जनसंख्या लगभग 15% थी जो की 1981 आते-आते घटकर 5% रह गई। और अब हिन्दू और सिखों को मिलकर तो ये मात्र 1.6% रह गई है।




  1986-90 तक हिन्दू परिवारों के साथ हुआ जो हुआ  वो कितना  वीभत्सकारी था इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की आज कश्मीर मे कुल 808 हिन्दू परिवार बचे हैं। उस दौर मे कश्मीरी पंडितो के साथ जो कुछ किया गया क्या वो मानवता के ऊपर कलंक नही था। लाखो हिन्दुओ को बेरहमी से मारा गया उनकी बहू -बेटियो की इज्ज़त लूट ली गई पुरुषो और बच्चों का बेदर्दी से कत्ल कर दिया गया। पाँच लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडितओ को दर-बदर होना पड़ा अलग से । मुझे याद नहीं पड़ता कि बुद्धिजीवी ने इस पर उफ भी हो यहाँ तक आज जो पुरुसकर वापिसी का नाटक चलाया जा रहा है तब किसी ने भी ऐसा कोई कदम उठाने का साहस क्यों नहीं किया। मेरी समझ से ये बात सिरे से समझ मे नहीं आई कि इस विषय पर पहले और आज तक भारत सरकार का रुख स्पष्ट क्यों नहीं रहा। क्यों नहीं मानवाधिकार आयोग खामोश क्यों है। जिन छोटे –छोटे मुद्दो पर राजनीति की जा रही है क्या कश्मीरी पंडितो का मुद्दा उनसे भी छोटा है ?



      अब बात करते हैं बांग्लादेश की जिसका जन्म ही भारत की बदोलत 1971 हुआ अन्यथा क्रूर पाकिस्तानी आर्मी ने जितना ज़ुल्म पश्चमी पाकिस्तानी प्रांत पर कर रखा था उससे ऐसा प्रतीत होता था कि पश्चिमी पाकिस्तान जल्द ही नर विहीन हो जाएगा। ये तो भला हो तत्कालीन  भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरागांधी का जिनहोने समय रहते व  सही निर्णय लेते हुए जनरल मानेकशा को भारतीय सेनाओ को दखल देने के लिए कहा। किन्तु भारत के रहमो करम से मिली आज़ादी के बाद बांग्लादेश मे किस तरह हिन्दुओ का उत्पीड़न हो रहा है। वहाँ हिन्दुओ को दोयम दर्जे का नागरिक भी नहीं माना जाता क्यो ? वहाँ पर भी हिन्दुओ कि बहू-बेटियो के साथ बलात्कार करना तो आम बात है। बांग्लादेश मे हिन्दुओ कि गति क्या है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1947 मे वहाँ कि कुल आबादी मे हिन्दुओ कि संख्या 28% थी जो 1981 आते आते सिर्फ 8.5%  रह गई। 1971 कि लड़ाई मे पाकिस्तानी सेना ने हिन्दुओ पर जो अमानवीय अतयाचर किए उससे 1971 से 1981 आते बांग्लादेश से लगभग 10 लाख हिन्दू गायब हो गये। 25 वर्षो मे कुल लगभग 53 लाख हिन्दुओ ने बांग्लादेश से पलायन किया। अगर 1947 से अभी तक कि स्थिति पर द्र्ष्टिपात किया जाए तो ये जानकार आश्चर्य होगा कि पूर्व मे पश्चिमी पाकिस्तान और 1971 मे बने  बांग्लादेश से लगभल 5 करोड़ हिन्दुओ का कुछ अता-पता नही है या ये कहना ज्यादा श्रेयस्कर होगा कि पिछले 60-65 वर्षो मे 5 करोड़ हिन्दू गायब हो गये हैं।



      कुछ इसी तरह कि नितियाँ पश्चिमी बंगाल और उत्तर प्रदेश मे आज भी जारी हैं। पश्चिमी बंगाल के मुर्शिदाबाद मे तो 23 दुर्गा पंडालो मे आग लगाई गई। कोलकाता मे प्रशासन द्वारा  माँ दुर्गा का विसर्जन इसलिए टालने का निर्णय लिया गया क्यो कि 22 अक्तुबर को गुरुवार होने के कारण विसर्जन नहीं किया जाता 23 को शुक्रवार होने के कारण 24 को मुहर्रम होने के कारण मतलब साफ है। यहाँ प्रश्न यही है कि क्या प्रशासन अर्धसैनिक बलों कि मदद लेने का निर्णय नही ले सकता था जिससे दोनों धर्मो के लोगो कि भावनाओ कि रक्षा होती ।  उत्तर प्रदेश मे तो सरकार सरे आम हर विभाग मे जाति और धर्म के चश्मे से सब कुछ देखना पसंद करती है। भारत मे सरकार कोई भी हो उन्हे धर्म विशेष कि भावनाओ कि चिंता ज्यादा रहती है किन्तु यही भावनाएँ बांग्लादेश या पाकिस्तान मे तो हर्गिज नहीं दिखाई पड़ती ।

      विश्व मे भारतवर्ष ही अकेला ऐसा देश है जहां हर धर्म को अपने सरोकारों/ मान्यताओ के साथ जीने की सहूलियत है। इक्का दुक्का घटनाओ से इन सरोकारों/ मान्यताओ की जड़ो को कोई  चाहकर भी नहीं हिला सकता। इस प्रकार के प्रयास चंद फिरकपरस्तों द्वारा पहले भी किए जाते रहे हैं। किन्तु जिस प्रकार सूर्य की प्रथम किरण के साथ अँधियारा छट जाता है उसी प्रकार इस प्रकार की घटनाओ के पश्चात धीरे धीरे सब कुछ स्वत: ठीक होने लगता है।



Monday, 12 June 2023

"पाला बदल कर देख लो"

“पाला बदल कर देख लो “

जब भी चाहो ज़िंदगी का, रुख बदल कर देख लो
पार क्या है आसमाँ के, बस उछल कर देख लो

माना तेरी ताब से, पत्थर पिघल सकता मगर
हम भी तो कुछ कम नहीं, पाला बदल कर देख लो

एक गुब्बारे की जिद फिर, फैलना बाज़ार में
एक बच्चे की तरह तुम भी मचल कर देख लो

दोस्त या दुश्मन हो पहला, वार मैं करता नहीं
आज़माना जब भी चाहो, मुझको छल कर देख लो

जिस पे बीते वो ही जाने, तुम भी जानोगे कभी
पैर नंगे शूल पथ पे, तुम भी चल कर देख लो

प्रेम तो जल की तरह निर्मल ही रहता है ‘प्रदीप’
गर यकीं तुमको नहीं तो, मुझमें ढल कर देख लो

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-15.05.2023

Sunday, 21 May 2023

"हगने के दस मूतने के पाँच"

रिपोतार्ज़
                “हगने के दस 
                 मूतने के पाँच”

क्यों चौंक गये ना, 😆जी मुझे भी लगा क्या ये शीर्शक ठीक रहेगा फिर लगा हम आम दिनों में एक दूसरे से कभी गुस्से में कभी व्यंग्य स्वरुप और कभी यूँ ही (दिल्ली वाले जो ठहरे) किन किन विशेषणों से युक्त भाषा का प्रयोग करते हैं तो फिर पक्का हो गया जी इस रिपोतार्ज़ का शीर्शक तो यही रहेगा( मतलब खटोला यहीं बिछेगा की तर्ज़ पर)। 🤓 दिल्ली छोडे हमें 16 साल हो गये लेकिन दिल्ली ने हमें न छोडा है चाहे मुम्बई रहे हो या अब हैदराबाद आना जाना लगा ही रहता है। मुझे आवश्यक कार्य से 3 मई को मेरठ पहुँचना था इसलिए मैंने समय रहते 30 अप्रैल की एस सी टू टायर की (दुरंतो- सिकंदराबाद-निज़ामुद्दीन) में प्रतीक्षा सूची में टिकिट आरक्षित करवा लिया। ऐसा इसलिए कि बंगलौर-दिल्ली राजधानी में काफी लम्बी प्रतीक्षा सूचि थी। मैं निश्चिंत भी था क्यों कि हैदराबाद के पिछले लगभग साढे चार वर्ष के प्रवास में कभी ऐसा नहीं हुआ था कि मुझे स्टेशन से वापिस आना पडा हो। जब हम ज्यादा निश्चिंत हो जाते हैं तभी गडबड हो जाती है। तो लीजीए हुज़ूर हम गुसलखाने की ओर जाना ही चाहते थे कि मोबाइल में मैसेज आ गया कि आप प्रतीक्षा सूचि-1 पर आकर अटक गये हैं हमसे न हो पाएगा 🙃अपना दूसरा इंतेज़ाम कर लो भैय्या।  मतलब हो गया ना हैप्पी बड्डे! स्नान ध्यान तो छूट गया हम लग गये फ्लाइट के चक्कर में शायद रेलवे वालों ने एअर वालों से सैटिंग कर रक्खी है। हैदराबाद- दिल्ली का किराया 16500/- , 1 मई का ट्राई किया तो 13,500/- फिर मुँह लटकाए लटकाए हमने 2 मई ट्राई किया तो सिर्फ आकाशा (राकेश झुंझुनवाला- शेयर मार्किट टाइकून) की फ्लाइट में शाम की एक टिकिट मिली वो भी 9500/-। हमने सोचा तुरंत बुक करो बे🥱 कहीं सोचते रह गये तो इसके भी रेट बढ जाएंगे। अब सोचिए शनिवार, रविवार, सोमवार और मंगलवाल मिलाकर चार दिन खराब हो गये।  मतलब दोनों तरफ से जय सियाराम्। खैर हैदराबाद से दिल्ली और दिल्ली से मेरठ पहुँचने में रात काली हो गई। 

सुबह उठे और लग गये अपना ज़रुरी काम निपटाने में ,शाम तक उससे जब काम से फारिग होकर घर आए तो दोनों भाईयों के बच्चे बोले क्या ठाकुर 🦜खाली हाथ, सजा मिलेगी बरोबर मिलेगी। हमने भी उनके सुर में सुर मिला दिया हुकूम करें जनाब ए आली तो  बोले सभी बच्चा लोगों को भयंकर वाली  पार्टी मांगता है। हमने कहा कुछ खास है क्या छुटकी बोली खास क्या ठाकुर “असलियत में चाँद मेरे पास है” का लोकार्पण गुजरात के होटेल में किया था न, तो हमें भी बढिया वाले होटेल में हमारी पसंद की पार्टी और हाँ इस बार आर्डर सिर्फ हमारा चलेगा यानी बच्चों का बच्चे जो आर्डर करेंगे वो बडो को भी खाना पडेगा, ये नहीं कि दाल रोटी दाल रोटी, वो तो रोज़ घर में भी खाते हो भई। हमने मन ही मन कहा “रज़िया फिर से गुंडो में फंस गई” (सच कहूँ तो इत्ते सोणे सोणे  गुंडे हो तो रजिया को फँसने में रोज़ मज़ा आएगा ही)। खैर साहब इस बार हमने भी ना नुकुर नहीं की और सीधे सीधे सरेंडर कर दिया। बच्चे खुश तो ईश्वर खुश्। दो तीन दिन बिताकर सीधे मुरादाबाद (बैच्चु लुलू पार्टी कहानी यहीं जनमी थी) फिर दो दिन बाद सीधे दिल्ली की बस पकडी और कौशाम्बी मेट्रो स्टेशन उतर गये। मुरादाबाद से दिल्ली भले ही ए सी बस थी किंतु सफर तो सफर है सो सोचा कि शाहदरा की मेट्रो पकडने से पहले निफराम हो लिया जाए। हम जैसे ही निफराम होने सुलभ शौचालय में घुसे तो वहाँ बैठे आदमी ने तुरंत कहा बाबू जी “हगने के दस और मूतने के पाँच” हम एक दम सन्न ठिठक गये सो अलग। उसके चेहरे की तरफ देखा तो बडा भोला भाला शायद कुछ दिनों पहले ही बिहार से आया था। हमारे चेहरे पर तुरंत एक मुस्कार तैर गई हमने भी उसी अंदाज़ में उसे जवाब दे दिया ना भैय्या हगने का प्रोग्राम ना है हमारा मूत के निकल लेंगे। वो बोला बाबू जी बुरा मत मानियो जाने से पहले बताना हमारा धरम है, कई लोग काम तो दस का करें हैं पर देंवे है पाँच रुप्प्या ही। ज्यादा कहो तो माँ बहन की गाली भी दे देंवे हैं सो हम पहले ही बता देने में अपनी और उसकी भलाई समझें हैं। खैर पाँच मिनिट में निफराम होकर हम बाहर आए उसने खुद ही उठकर हमें बैग़ थमा दिया हमने उसे पचास रुपये पकडा दिये तो बोला बाबू जी खुले दे दो, हम पे खुले ना हैं । मैंने उसके कंधे को थपथपाकर कहा हमें पैसे वापिस ना चाहिए भैय्या, बचे पैसे से बाहर जाकर छोले कुलचे हमारी तरफ से खा लेना। हमें तुम्हारी बात और अंदाज बढिया लगा।😆 इससे पहले कि वो और कुछ बोलता हमने जय सियाराम कहा और दूसरी मेट्रो लेकर निकल लिए दोस्त के घर।

अब बारी थी दिल्ली नौयडा के कार्य निपटाने की तो 11 मई को को इंडिया बुक्स (आगामी कहानी संग्रह “काला हंस” ) के सेक्टर 19 नौयडा पहुँचे। डॉक्टर संजीव से बेहतरीन मुलाकात रही। लगभग दो घंटे की मीटिंग में कविताओं के कई दौर चले, लगा ही नही कि हम लोग पहली बार मिल रहे हैं। 🌹वहीं पर ही जसविंदर कौर बिंद्रा जी से भी मुलाकात हुई। पंजाबी हिंदी अंग्रेजी भाषा में पूर्ण रुपेण पकड, रिटायर्ड हैं किंतु जबरदस्त जोश से भरपूर। उनके साथ स्ट्रीट लंच लिया फिर पहुँचे आदरणीय और प्रिय प्रिय प्रिय सुरेश नीरव जी नये आशियाने पर्। उन्होंने गाज़ियाबाद से दो तीन दिन पूर्व ही शिफ्ट किया है, मैं साहित्यिक दृष्टी से प्रथम व्यक्ति रहा जिसने उनके द्वार पर प्रथम अतिथि के रुप में दस्तक दी। कुछ देर बाद मधु मिश्रा जी भी पुराने निवास स्थान से कुछ सामान लेकर लौटी फिर महफिल जम गई जो सांय 7:15 तक चलती रही। खाने के आग्रह के बावजूद मैंने जाने की आज्ञा माँगी ताकि समय से मित्र के घर पहुँच सकूँ। रास्ते भर मैं अब से तीस पैतीस बरस पहले के नौयडा को याद करने की कोशिश कर रहा था जिसमें अट्टा मोड की धूल विशेष रही। 
अब दिल्ली जाओ और दोस्तों से न मिलो ऐसा तो हो ही नहीं सकता न सो अगले दिन फोन मिला दिया, उधर से आवाज़ में कुछ कम्पन लग रहा था मालूम हुआ पति देव का बॉयपास हुआ है और छुट्टी लेकर घर जा रहे हैं बस हमने भी तुरंत मेट्रो पकडी और पहुँच गये मिज़ाज़पुर्सी को। अगले दिन का कार्यक्रम निश्चित था, पहले एक छोटे से कार्यक्रम में भागीदारी फिर मित्र के साथ लंच फिर शाम को बंगलौर राजधानी। जब ये सब पूर्ण कर हम निज़ामुद्दीन स्टेशन जा रहे थे तो अहसास हुआ कि परसों और कल के मुकाबले आज तबियत कुछ ज्यादा नासाज़ सी लग रही है। जैसे दिल्ली की लू कह रही हो अरे ओ साम्भा 😡कित्ते दिन हो गये लू खाए हुए बे ,हम बोले पूरम पट्ट सोलह बरस तो लू ने कहा इस बार तो तुमसे चिपकर ही रहेेंगे बचकर दिखाओ। खैर जैसे तैसे स्टेशन पहुँचे, A-5-29 पर जाकर बैठ गये। पिछले कई बरस हो गये ठंडा पानी पीए किंतु आज सादे पानी से प्यास न बुझी और प्यास ने ज्यादा हलकान कर दिया तो पी लिया ठंडा ठंडा कूल कूल जैसे तैसे कुछ संयत हुए, ट्रेन चली तो सहयात्रियों से परिचय हुआ। ऐं पर ये क्या, 🙃जो भी अपना नाम बतावें सबका प्र से यानी श्रीमति एवम श्री प्रिया मुखर्जी बच्चे का नाम भी प्र से , दूसरी जोडी प्रियंका और रोहित की,और हम तो हैं ही प्रदीप्। अचानक अप्रैल-मई-2022 की याद हो आई जब हम गोवा और नेपाल के साहित्यिक प्रवास पर थे कुल 14 लोगों में से 11 महिलाएँ सभी का नाम र से शुरु सिर्फ हम और एक और सज्जन थे जो अलग अक्षर से नाम रखते थे। कभी कभी ऐसा होता है जो अच्छा भी लगता है। पिछ्ले एक सप्ताह से इलेक्ट्रोल, ग्लूकोन सी जैसी चीज़ों का सेवन कर उबरने की कोशिश कर रहे हैं। आज कुछ आराम सा आया तो एक ठो शेर याद हो आया। वैसे तबियत के बारे में अभी तक पूछा तो किसी ने नहीं। फिर भी शेर ठोकने में क्या हर्ज है जी 😆😆😆😆

“अब पडा तबियत में कुछ आराम सा
  तुमने जब पूछा कि कैसे हो ‘प्रदीप’”

प्रदीप देवीशरण भट्ट-
20.05.2023

Saturday, 8 April 2023

एक ख़ूबसूरत दिन की मधुर स्मृतियाँ

रिपोतार्ज़

“ एक खूबसूरत दिन की मधुर स्मृतियाँ”
(इंजीनियर स्टॉफ कॉलिज ऑफ इंडिया,गच्ची बॉली)

पिछले वर्ष तीन दिवसीय नेपाल-भारत साहित्यिक महोत्सव में सम्मलित होने के लिए मैं 28 अप्रैल-2022 की सांय को को नेपाल की राजधानी काठमांडू पहुँचा। दिल्ली एअरपोर्ट पर लखनऊ से पधारे पत्रकार व लेखक प्रिय मनीष शुक्ला से भेंट हुई। उन्हीं से ज्ञात हुआ कि सेम फ्लाइट में बिजनौर से गिरिश त्यागी एवम प्रयागराज से डॉक्टर मोहिका महेरोत्रा भी यात्रा कर रही हैं । भारत के विभिन्न प्रदेशों से साहित्यकार इस साहित्यिक यज्ञ में अपनी आहुति देने काठमांडू पहुँच रहे थे। ये पहला अवसर था जब किसी साहित्यिक आयोजन में सम्मलित होने वाले किसी भी साहित्य्कार से मेरा परिचय नहीं था। जो एक मात्र परिचय हुआ वह भी एअर पोर्ट पर मनीष के रुप में। खैर 29,30 31 मार्च को साहित्यिक चर्चाओं में बहुत आनंद आया साथ ही विभिन्न स्थानों की सैर साथ में एक से बढकर एक साहित्यिक विभूतियाँ। प्रदीप बाबू इससे बढिया और क्या चाहिए। इसी आयोजन में साहित्य की धरती बिहार से पधारे कई मित्रों से मुलाकात हुई। डॉक्टर राशि सिन्हा, अजय श्रीवास्तव, नूतन सिन्हा और हाँ विभा रानी श्रीवास्तव (दीदी) उनसे प्रथम मुलाकात में मैंने उन्हें इसी सम्बोधन से सम्बोधित किया। सौम्य सहज और अपनी बात को बडे ही सहज तरीके से रखने की अदभुत कला। चार पाँच दिन कैसे गुजर गये पता ही नही चला था। इस साहित्यिक प्रवास में डॉक्टर राशि की बिटिया अद्रिका कुमार (बबुआ)पहले दिन तो थोडा सकुचाई किंतु अगले दिन से बबुआ मेरी बढिया वाली दोस्त बन गईं।  अब आप सोच रहे होंगे कि इस आयोजन को तो लगभग एक वर्ष हो गया फिर काहे को रिपोतार्ज़ तो भईय्या इस बार ये आयोजन नेपाल के बीरागंज में 17,19 19 मार्च को आयोजित हुआ। कम्पीटेंड ऑथारिटी की स्वीकृति के अभाव में इस बार हम सम्म्लित होने से चुक गये। 

मार्च के प्रथम सप्ताह में अचानक विभा दीदी दूरभाष यंत्र पर दस्तक दी तो हमें सुखद अनुभूति हुई। राम राम शाम शाम के बाद उन्होंने बताया कि वे 25 मार्च को हैदराबाद प्रधार रही हैं साथ ही पूछ भी लिये कि इससे पहले तो हम नेपाल में मिल ही लेंगे लेकिन हम एड्वांस में टिकिट भेजकर बता रहे हैं कि 25,26,27 मार्च को खाली रहियेगा। हम तो खुशम खुश हो गये। इसी बीच उन्होंने बताया कि राशि से भी बात हो गई है (डॉक्टर राशि के पति देव का ट्रांसफर छ: माह पूर हैदराबाद हो गया है) हमने उन्हें आश्वत किया कि आप बेफिक होकर हैदराबाद पधारिये। बातों ही बातों में विभा दि ने बताया कि यहाँ हैदराबाद में कोई मीनाक्षी श्रीवास्तव हैं जो कि कहानियाँ लिखती है उन्होंने अपनी पुस्तक किसी सज्जन के हाथ उन तक पहुँचवाई है। हमने कहा पिछले चार वर्षो से हैदराबाद के साहित्यिक जगत में हमारी पैठ है हम तो इस नाम की महिला को नहीं जानते। खैर जब विभा दीदी ने क्षमा माँगते हुए सो कॉल्ड मीनाक्षी श्रीवास्तव का मोबाइल नम्बर भेजा और बताया कि उनका नाम प्रेमलता श्रीवास्तव है तो हमने बताया हाँ इन्हें तो बहुत अच्छी तरह जानते हैं। चूकि विभा दीदी के पति अरुण ईंजीनियर स्टॉफ कॉलिज ऑफ इंडिया के कॉन्सिल सदस्य हैं इसी के दो दिवसीय सम्मेलन के लिए वे हैदराबाद पधार रहे थे। डॉक्टर प्रेमलता एबिड्स में रहती हैं और विभा दीदी को खैरताबाद में रुकना था सो अगले शनिवार को डॉक्टर प्रेमलता श्रीवास्तव से मिलकर हमने कार्यक्रम की पूरी रुपरेखा बनाई और उनके ही घर पर एक गोष्ठी के आयोजन का फैसला किया। 
वित्तीय वर्ष की क्लोज़िंग का समय चल रहा है सो हम भी शनिवार को ऑफिस में थे। लगभग 1 बजे दीदी का फोन आया कि हम हैदराबाद एअरपोर्ट पहुँच गये हैं और गाडी द्वारा नियत स्थान पर पहुँचकर बताते हैं। लगभग 2:30 विभा दीदी ने जो एडरैस हमें व्हाट्सप किया वो खैराताबाद का न होकर गच्चीबॉली का निकला। हम सोच ही रहे थे कि ये क्या हुआ तभी फोन घनघना उठा उधर दीदी थी बताया कि खैरताबाद में कमरे कम होने के कारण सम्मेलन का स्थान बदल दिया गया है। हमने कहा फिकर नॉट दी हम एक घंटे में पहुँच रहे हैं। तुरंत सुहास भटनागर को फोन मिलाया उन्होंने कहा आधे घंटे में पहुँचते हैं। हैदराबाद की तेज धूप में सुहास जी हमारे यूसुफगुडा का पता भूल गये और मुड गये दूसरी तरफ अब किसे देखकर किसके पीछे मुडे ये बात यहीं छोड देते हैं ( कदि हँस भी लिया करो बादशाहो) सवा तीन पहुँचे पानी शानी पिया और चल दिये मेट्रो की सवारी का आनंद लेने के लिए रायदुर्ग मेट्रो (ब्लू लाईन का अंतिम स्टेशन) पहुँचे और टैक्सी लेकर सीधे इंजीनियर स्टॉफ कॉलिज ऑफ इंडिया कॉवेरी ब्लॉक- डी-4 में सीधे एंट्री। अगले दो घंटो तक भूली बिसरी यादों को समेटते हुए  विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। सुहास जी को एक कार्यक्र्म में जाना था वो साढे पाँच निकल लिए। इसी दौरान डॉक्टर राशि से बातचीत में पता चला कि बबुआ को 103 बुखार है और राशि जी की स्वंय भी तबियत गडबड है सो उन्होंने रविवारीय गोष्ठी में आने में असमर्थना व्यक्त की। ऐसा ही दो तीन और महानुभावों ने अपनी अपनी व्यस्ताओं का हवाला देते हुए आने में असमर्थता जताई तो डॉक्टर प्रेमलता श्रीवास्तव से बात कर तय किया गया कि मैं स्वंय, डॉक्टर प्रेमलता श्रीवास्तव एवम सुहास भटनागर कल साढे ग्यारह बजे विभा दीदी के रुम में ही गोष्ठी करेंगे। ये सब तय हो जाने के बाद विभा दीदी ने अपनी साहित्यिक संस्था  “लेख मंजूषा” को लाइव कर दिया जिसमें मैंने अपनी दो कविताएँ प्रस्तुत की। 

अगले दिन नियत समय यानि साढे ग्यारह बजे हम फिर हाज़िर थे। यूँ तो इंजीनियर स्टॉफ कॉलिज ऑफ इंडिया का प्राँगण काफी बडा भी है और हरियाली से युक्त भी है किंतु तेज धूप इस बात की इज़ाज़त कतई नहीं दे रही थी कि हम अपनी गोष्ठी खुले मैदान या पार्क में करने का साहस भी करें। एक ख्याल आया और हम डायनिंग में चले भी गये किंतु जल्द ही अहसास हो गया कि हमारी आवाज़ से ज्यादा आवाज तो बर्तनों के खडकने की आ रही थी। बेसाख्ता बचपन में सुनी चंद लाईन याद हो आईं। 
खडक सिंह के खडकने से खडकती हैं खिडकियाँ
खिडकियों के खडकने से खडकता है खडक सिंह

 सो विचार त्याग दिया और उल्टे पैरों चल पडे जहाँ कमरे के वातानुकूलित वातावरण में अरुण श्रीवास्तव जी हमारा बडी बेसब्री से इंतेज़ार कर रहे थे।  सबसे पह्ले अरुण श्रीवास्तव का सत्कार किया फिर विभा दीदी ने “लेख मंजूषा” को फेसबुक लाइव कर दिया। सुहास भटनागर, डॉक्टर प्रेमलता श्रीवास्तव और मैंने भी अपनी दो रचनाएँ प्रस्तुत कर दीं। बहुत आग्रह पर विभा दीदी ने नेपाल सम्मेलन में पढी अपनी लघु कथा हम सब को सुनाई। और इस तरह रविवारीय गोष्ठी का प्रथम सत्र 1 बजे सम्पन्न हो गया। लंच का समय हो गया था तभी विभा दीदी ने कहा कुछ और चर्चा करें या भोजन? हम सब ने एक दूसरे की तरफ देखा और मैंने तुरंत दीदी को देखते हुए कहा दी “भूखे भजन न होय गोपाला पकड ये अपनी कंठी माला” फिर सभी खिलखिला कर हँस पडे। प्रथम सत्र की उपलब्धि ये रही कि अरुण श्रीवास्तव जी भी पूरी तन्मयता के साथ एक अच्छे श्रोता के रुप में गोष्ठी में उपस्थित ही नहीं रहे वरन वाह वाह भी करते रहे। कवि हो या लेखक उसे और क्या चाहिए  अच्छा भोजन और अच्छी सी वाह्।
बढिया भोजन ग्रहण करने के बाद थोडी देर तो कमरे में आराम फरमाया फिर विभा दीदी ने बताया कि आज महादेवी वर्मा जी का अवतरण दिवस है सो हम दूसरे सत्र में दो विषयों पर लाइव चर्चा करेंगे फिर कविता पाठ फिर साढे चार बजे टी ब्रेक्। सब खुश थे। 3:15 पर दूसरा सत्र शुरु हुआ । सबसे पहले दी को हैदराबाद स्टाइल में सम्मानित किया गया। फिर विषय: ज्ञानपीठ, पद्म पुरुस्कर, आधुनिक मीरा...... क्या महादेवी जी भी परिचय की मोहताज़ हैं? एवम “ संस्मरण- साहित्य अवसर महान लोगों से संबंधित होते हैं, अब चाहे वे महान लोग द्वारा रचित हो या फिर साधारण लोगों ने महान लोगों से संबंद्ध अपने  संस्मरण प्रस्तुत किये हों। मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि इन दोनों विषयों पर चर्चा करने के लिए पहले विषयों को समझना आवश्यक था जो मेरे कुछ भी पल्ले नहीं पडा न सुहास जी को और न डॉक्टर प्रेमलता को। मैंने दी से पूछा दी क्या ये विषय आपने चुने हैं उनके मना करने पर मैंने हाथ जोडते हुए कहा अपने अल्प ज्ञान के कारण मैं इस चर्चा से दूर ही रहना पसंद करुँगा किंतु दी का आदेश खैर्। जो थोडा बहुत दिमाग काम करता है उससे पूरा जोर लगाया और अपने साथियों के संग इस पर जैसे तैसे चर्चा की अब ये तो लाइव देख रहे मित्र गण ही बेहतर बता सकते हैं कि पास हुए या फेल्। खैर कविताओं का दौर फिर चल पडा इस बार सबने दो की जगह तीन तीन कविताएँ पढकर अपनी अपनी कविताओं की भूख शांत की। साढे चार बजे कॉफी का दौर चला फिर इंजीनियर स्टॉफ कॉलिज ऑफ इंडिया के खूबसूरत प्रांगण की तस्वीरें अपने मोबाईल में कैद की। हम अभी फोटोग्राफी में व्यस्त ही थे कि तभी हमारा राष्ट्रिय पक्षी मोर एक बडी चट्टान पर पेडों के झुरमुट में आकर बैठ गया। हम तो हम ठहरे पूछ ही लिया क्यों पक्षी राज हमारी कविताएँ सुनकर हमसे मिलने आए हो।शायद वो मोरनी से झगडकर आया था सो बोला तुम्हारी कविताओं से बेहतर तो मोरनी की बक बक ही सही है। तुम्हारी कविताएँ तुम्हें ही मुबारक लो भईय्या हम तो चले, देर हुई तो मोरनी रात का डीनर कैंसिल कर देगी। इससे पहले हम और कुछ पूछते वो तो उड लिया भईय्या।

कॉफी विद विभा दी के बाद हमने दी से प्रस्थान की अनुमती माँगी। दी की बिलकुल भी इच्छा नहीं थी कि वे हमें छोडे। डॉक्टर प्रेम लता श्रीवास्तव और सुहास भटनागर से वे पहली बार ही मिली थी किंतु ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम चारों बरसों से एक दूसरे को जानते हों। इसी बीच सुहास जी ने टैक्सी बुक कर ली तो दी ने कहा इसे कैंसिल कर दीजिए। रात के डिनर के बाद जाईएगा। सुहास जी ने बताया उन्हें अपनी बेटी के यहाँ जाना है तो दी ने कहा तो कुछ नहीं किंतु उनकी आँखे हल्की सी नम अवश्य हो गईं। लगबग साढे पाँच के करीब हमने दी से विदा ली। एक खूबसूरत दिन की मधुर स्मृतियों को सजोएँ हम तीनों चल पडे। 


-प्रदीप देवीशरण भट्ट-27.03.2023

Tuesday, 28 March 2023

"कभी कभी बेमन भी करना पड़ता है "

रिपोतार्ज़

“कभी कभी बेमन भी करना पडता है”

16 मार्च को हैदराबाद की वरिष्ठ साहित्य्कार एवम कादम्बिनी क्ल्ब की सर्वेसर्वा अहिल्या मिश्रा जी का फोन आया आया। अत्र कुशलम तत्रास्तु के उपरांत उहोंने नव निर्मित मकान के गृह प्रवेश के लिए सादर आमंत्रित किया साथ ही बताया कि कादम्बिनी क्ल्ब अब तीसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है इसलिए अपनी परम्परा तो तोडते हुए क्ल्ब की 368वीं सभा का आयोजन 19 मार्च-2023 को उनके नवनिर्मित घर में साहित्यिक मनिषियों के सानिध्य में समप्न्न होगा। मेरा मानना है कि वरिष्ठों का आग्रह भी आदेश के बराबर होता है। अपनी आदतानुसार मैं निर्धारित समय से कुछ मिनिट पूर्व ही मधुरा नगर स्थित उनके आवास पहुँच गया। निश्चित रुप  से नव निर्मित गृह का निर्माण बडे ही मनोयोग से किया गया है। अतिथियों के स्वागत में वे स्वयं भूतल स्थित सभा गृह में उपस्थित थीं। अपनी निगरानी में वे प्रत्येक कार्य का निरीक्षण स्वंय ही कर रही थी। मेरे पहुँचते ही उन्होंने आग्रह किया कि मैं पहले नव निर्मित गृह का अवलोकन कर अपना आशीर्वाद प्रिय मानवेंद्र, डॉक्टर आशा मिश्र ‘मुक्ता’ एवम दोनों प्रिय पोतियों को दूँ। यही घर के बडो का काम है जिसे वे पूरी तन्मयता से पूर्ण करने का प्र्यास कर रही हैं। मेरा मानना है कि “बडा वही जो बडो जैसे काम करे”। इसी वर्ष अहिल्या जी अपने जीवन के 75 वर्ष भी पूरे कर रहीं हैं। मतलब एक साथ तीन शुभ कार्य- नव निर्मित गृह प्रवेश, कादम्बिनी क्ल्ब की 368वीं सभा का आयोजन एवम सोने पे सुहागे स्वरुप अहिल्या जी का 75वां जन्मदिन!!!


धीरे धीरे सभा सजने लगी । स्वादिष्ट एवम सुगंधित भोजनोपरांत अहिल्या जी के अतिरिक्त वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर प्रोफेसर ऋषभ देव शर्मा जी, वरिष्ठ साहित्यकार वेणु गोपाल भट्ट्ड जी, वरिष्ठ साहित्य्कार अजीत गुप्ता जी, केंद्रिय हिंदी संस्थान के निदेशक डॉक्टर गंगाधर वानोडे जी,सुमन मलिक एवम मदन देवी पोकरणा जी मंचासीन हुए। जहाँ प्रथम सत्र में  शुभ्रा मोहंतो एवम उनकी टीम ने होली के रंगो की बौछार अपने गीतों द्वारा की वहीं दूसरे सत्र में उपस्थित कवियों ने अपने अपने रचना पाठ से सबका मन मोह लिया। दर्शन सिंह, सुहास भटनागर, श्रीमती एवम श्री सोनी, सुनीता लुल्ला, मोहिनी गुप्ता, मायला जी, धानुका जी, भगवती अग्रवाल, रवि वैद्य , अद्रिका कुमार,डॉक्टर राशि सिन्हा, डॉक्टर राजीव सिंहनितेश सागर, विनोद अनोखा, सीताराम माने, अजय पाण्डेय, संगीता शर्मा, किरण सिंह, तृप्ती मिश्र, विनीता शर्मा, सिवांगी गुप्ता, तरुणा मन्ना, सरिता सुराणा, आर्या झा, मोहित ओझा, रंजीता, पूनम जोधपुरी, सत्य नारायण काकडा, जी पर्मेश्वर, डॉक्टर कृष्णा सिंह, दीपक दिक्षित, इंदु सिंह, डॉक्टर पूर्णिमा शर्मा,  सुनिला सूद, मीना मूथा, शिल्पी भटनागर, मंचासीन सभी वरिष्ठ साहित्यकारों  ने अपनी अपनी रचनाओं से होली मिलन कार्यक्रम में भरपूरि समां बाँधा। मैंने भी अपनी दो रचनाओं से उपस्थित जन समूह का अपनी ओर ध्यान आकृष्ट किया।

“रंगो की बौछार, प्यार की होली में
तन मन भीगा जाए, प्यार की होली में
जल सरंक्षण पर तुम हमको, लेक्चर दो
अब अपनी सरकार, प्यार की होली में”

“तुलसी सूख जाएगी”

“वो बच्चों की तरह भोली है, हरदम मुस्कुराएगी
अगर अपनी कसम दे दूँ, मुझे आँखे दिखाएगी
करुँ मैं लाख कोशिश पर, शहर बिलकूल न आएगी
मेरी माँ को यही डर है, के तुलसी सूख जाएगी”


मुझे प्रसन्न्ता है कि मेरी दूसरी रचना “ तुसली सूख जाएगी” को उपस्थित जन समूह द्वारा खडे होकर सराहा गया। हैदराबाद में ये दूसरा मौका था जब मुझे ये सम्मान मिला। लगभग साढे छ: बजे कार्यक्रम का समापन हुआ। एक बात जो हमें खल रही थी कि संतोष पाण्डेय उर्फ संतोष रजा जो अच्छे गज़ल कार हैं क्यूँ नहीं आए। विनोद अनोखा जी से ज्ञान हुआ कि उनकी तबियत ठीक नहीं है इसलिए उन्हें हॉस्पिटल के आई सी यू में एडमिट किया गया है। हम सभी उनकी सेहत के लिए प्रार्थना कर ही रहे थे कि कार्यक्रम खत्म होते होते दु:खद सूचना प्राप्त हुई कि प्रिय संतोष हमारे बीच नहीं रहे। ये हम सभी के लिए जबरदस्त झटका था। पिछले वर्ष ही उनकी धर्मपत्नि का देहांत हुआ था और इस वर्ष...... ये अपूर्णीय क्षति है। मुझे भी दो तीन लगे इससे उबरने में लेकिन आश्चर्यजनक रुप से कल प्रथम नवरात्र के दिन प्रिय संतोष मुझे स्वपन्न में दिखायी दिये। अजीब बात ये है कि वो किसी दवाई और वैद्य का जिक्र रहे थे । सायं सुहास भटनागर से मुलाकात के दौरान मैंने उनसे ये बात साझा की। ये ठीक है जो इस संसार में आया है वो जाएगा ही किंतु....... कुछ का जाना अचम्भित कर जाता है।14  जून-2020 में सुशांत का जाना भी कुछ ऐसा ही था तब मैंने सुबह कुछ पंक्तियाँ लिखी थी और दोपहर होते होते वो मनहूस खबर आ गई थी। 

“जाने का तेरे गम भी है, अफसोस भी मगर
इतना मलाल है तू, बता कर नहीं गया”

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-23.03.2023