Monday, 7 October 2024

"हुआ यूँ के "



 रिपोर्ताज 
              "हुआ यूँ के"
 
         हुआ यूँ के हिन्दी साहित्य भारती की उत्तर प्रदेश राज्य इकाई की सभा का आयोजन झाँसी में 29 सितंबर को होना निश्चित हुआ तो संस्था के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रविन्द्र शुक्ल जी से हमें भी आमंत्रण प्राप्त हुआ। चूँकि इस संस्था से जुड़ाव हैदराबाद प्रवास के दौरान हुआ था तो हमने शुक्ल जी को अपनी दुविधा 😇बताई कि भैय्या हम तो तेलंगाना से जुड़े थे फिर हमें काहे आमंत्रण? शुक्ल जी बोले भैय्या जी अब आप मेरठ में निवास कर रहे हैं जो उत्तर प्रदेश में आता है और हम उत्तर प्रदेश में दो बार के मंत्री रह चुके हैं 😀 और ध्यान से सुनें हम झाँसी में विराजते हैं और झाँसी बुंदेलखंड में!समझ गए या कुछ और परिचय देंवे। आमंत्रण भेज दिया है आप अवश्य पधारें।🤗 अब सोचने की बारी हमारी थी हम मन ही मन बुदबुदाए बेटा तुम्हारा हैदराबाद से पत्ता साफ़ और उत्तर प्रदेश में हाफ ये विषय अलग है कि मेरठ दिल्ली NCR का भी हिस्सा है और भारत की प्रथम रीजनल ट्रेन मार्च तक मेरठ से दिल्ली तक पूर्ण रूपेण शुरू भी हो जाएगी। ख़ैर ट्रेन की खोजबीन शुरू हुई तो मेरठ से कोई भी ट्रेन हमें ले जाने के लिए तैय्यार ही न हुई (टिकिट ही  available न hue) तो क्या करते सो दिल्ली से दक्षिण express की कंफर्म टिकिट बुक की और वापसी की ltt to हरिद्वार की waiting ले ली।इसी बीच कथा रंग की सूचना मिली तो विनय सहित क्षमा मांग ली। क्यूँ  कि भैय्या कमिटमेंट है तो है!

         29 की सुबह ब्ला ब्ला ली और सीधे I P extension वहाँ से एक काम निपटाया और सीधे निर्माण विहार 😀अब ये मति पूछो काहे महाराज मित्रता भी कुछ होती है सो मिले फिर दिल्ली खादी भवन, शाम तक वहीं आनन्द के गोते लगाए फिर निर्माण विहार वाले मित्र के साथ कनाट प्लेस में मस्ती की फिर खरामा खरामा निजामुद्दीन स्टेशन।  इधर 22.50 पर ट्रेन ने सीटी दी और उधर हम नींद के आगोश में। 29 की सुबह सुबह 5.15 झाँसी पहुँचे बारिश हमारे स्वागत में बिछी बिछी जा रही थी  ख़ैर भीगते हुए ही ऑटो पकड़ा। बारिश के जोर के कारण रास्ता भूलना लाज़िम था अब अलसुबह 5.30 पर कौन रास्ता बताता है भाई सो तुरन्त होटल marvelous फोन किया तो फोन उठाया रविन्द्र शुक्ल जी ने थोड़ा अचकचा कर समस्या बताई तो उन्होंने ऑटो ड्राईवर का मार्ग दर्शन किया जिससे बारिश का आनन्द लेते हुए हम होटल पहुँच ही गए। 

        आश्चर्य इतनी सुबह सुबह 3,4 लोग रिसेप्शन पर स्वागत करते मिले, परिचय उपरांत हमें कन्नौज से पधारे डॉक्टर अमरनाथ दुबे जी के रूम में शिफ्ट कर दिया गया। अब सुबह सुबह यदि कोई  किसी को सोते से जगाए तो.......  खैर हमने अभयदान देते हुए कहा हुजूर आप सोए रहें हम एडजस्ट कर लेंगे तभी हमारे मोबाईल का 6.03 का अलार्म बज गया। हमने उसे चुप कराया और फ्रेश होने सीधे आरामगाह जा पहुँचे। तैय्यार हुए और सीधे रिसेप्शन पर! वहाँ कई लोगों से मिलना हो गया।

         9 बजे नाश्ता किया फिर ठीक 10 बजे राष्ट्रीय गीत से कार्यक्रम की शुरुआत हुई।  उत्तर प्रदेश राज्य के वर्तमान अध्यक्ष डॉक्टर वागिश दिनकर के स्थान पर प्रह्लाद बाजपेई जी को नया अध्यक्ष मनोनीत किया गया जब कि महामन्त्री अक्षय प्रताप सिंह के स्थान पर मेरे रूम मेट डॉक्टर अमरनाथ दुबे को सर्वसम्मति से महामन्त्री घोषित किया गया।सर्वसम्मति अर्थात उपस्थित जन समुह से दोनों हाथ ऊपर उठाकर ओम की ध्वनि करना। पूरा कार्यक्रम बिलकुल आरएएस पैटर्न पर। सच कहूँ आनन्द आ गया। इतने सारे लोगों में से एक मात्र परिचित के रूप में वागीश शर्मा (कथा रंग)जी से मिलकर आनन्द आ गया। सांय 6.30 तक कार्यक्रम चला बीच बीच में निश्चित अन्तराल पर  स्वादिष्ट  खाने पीने का कार्यक्रम अलग से अब चूँकि हम रात का खाना छोड़ चुके हैं अतएव संगी साथियों के आग्रह पर थोड़ी खिचड़ी लेकर खाना पूर्ति कर ली।लेकिन लेकिन लेकिन...

         अगले दिन नाश्ता करने के बाद टैक्सी के लिए रिसेप्शन पर रिक्वेस्ट की पता नहीं कहाँ गड़बड़ हुई एक घण्टे बाद एक बड़े वाला ऑटो हाज़िर, हम जैसे ही बाहर निकले ऑटो देखकर माथा ठनका हमने कारण पूछा तो ड्राईवर बोला हमसे तो यही मँगवाया है ख़ैर बेकार बहस में न पड़कर हमने पुनः बात कर टैक्सी मंगवाई और चल पड़े ओरछा मन्दिर दर्शन के लिए।लेकिन ये क्या ऑटो टैक्सी के चक्कर में ध्यान नहीं दिया कि मन्दिर 1 बजे बंद हो जाता है ख़ैर   बाहर से ही ईश्वर के दर्शन कर मुड़े ही थे कि देखा मन्दिर का द्वार खुला और भोग का एक थाल लेकर पुजारी जी ने एक व्यक्ति को दिया साथ में आई उनकी धर्म पत्नि मन्दिर के बंद दरवाज़े पर ही बड़ी श्रद्धा से साष्टांग कर रही थीं। मैंने पूछा तो रोहित सोनी नामक सज्जन ने बताया सर यहाँ प्रसाद के लिए काफ़ी लम्बी प्रतीक्षा करनी होती है हमारा नंबर भी सवा महीने के बाद आया है ,तब तक उनकी पत्नि भी हाज़िर हो गई दो तीन मिनट बात करने के बाद मैंने कहा यदि आप दोनों को आपत्ति न हो तो मुझे इस भोग का प्रसाद दे दें। उन्होंने नाम पूछा फिर पूछा कहाँ से आए हैं मैंने पूर्ण परिचय दिया तो दोनों ने प्रणाम किया फिर ये कहते हुए प्रसाद दे दिया कि भगवान ने  स्वयं प्रसाद के दूसरे कौर के लिए आपका चयन किया है। निश्चित उस समय मैं भाव विभोर हो गया। उनसे विदा ली और सीधे ओरछा फोर्ट। भले ही काफ़ी समय बीत गया है किन्तु विरासत तो विरासत है। मध्य प्रदेश शासन देखभाल कर रहा है सोचा कुछ खा लिया जाए सो काफ़ी कुछ नकारने के बाद दही खिचड़ी का ऑर्डर दे दिया। रात में भी और अब लंच में भी खिचड़ी प्रदीप बाबू बढ़िया है 😆😆😆😆


         बेतवा नदी पर दो चार फोटो खिंची ,जब जिंदगी ख़ुद ही भूलभुलैया बनी हुई हो तो भूलभुलैया देखकर क्या करेंगे सो ड्राईवर से कहा भैय्या लक्ष्मी मन्दिर चलो फिर सीधे झाँसी लोकल। ओरछा का लक्ष्मी मन्दिर देखा और सीधे रानी झाँसी के किले के बाहर से ही दर्शन किए दो चार फोटू फिर झाँसी शहर का एक चक्कर लगाया और सीधे होटल आकर कमरे में अब आप कहोगे  ये क्या बात हुई तो भैय्या 29 सितम्बर को बारिश  ने स्वागत किया था हम खुश थे तो झाँसी शहर ने अगले दिन जलती तपती गर्मी के भी दर्शन करा दिये।अब ऐसी गर्मी में फोर्ट की दीवारें भी तपती💥🔥 हुई मिली सो सब कुछ देखना डॉप कर दिया।

         शाम को कुछ ठंडक हुई तो जान में जान आई। चूँकि लंच में दही खिचड़ी खाई थी तो 8 बजे कुछ भूख महसूस हुई। डिनर में फिर वही पकवान देखकर वापिस कमरे में आए दही खिचड़ी खाई फिर आराम किया और रात 12 बजे स्टेशन। 1.10 पर ट्रेन आई और सुबह 9 बजे मेरठ। एक अच्छा कार्यक्रम, दो अच्छे दिन बिताकर वापिस मेरठ आकर लगा भैय्या जो आनन्द घर में है वो और कहाँ 💓सो खाया पीया और चादर तानकर नींद के आगोश में, अब महराज ट्रेन कित्ती भी अच्छी हो ससुरी नींद ठीक से आती न है तो हुआ यूँ के!!!!!!!


प्रदीप डीएस भट्ट-101024

Tuesday, 24 September 2024

"पर्यावरण के दुश्मन"

  
      "पर्यावरण के दुश्मन"
 
         जब पूरा विश्व केवल इज़राइल- फ़िलीस्तीन, रूस और यूक्रेन युद्ध पर ही परेशान हो रहा है, बताता चलूं कि ग्लोबल पीस इंडेक्स की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार इस वक्त पूरे विश्व में कुल 56 युद्ध और गृह युद्ध चल रहे हैं। 1970 के दशक में 23 प्रतिशत युद्धों का अंत अंततः शांति वार्ता के जरिए ही हुआ इसमें भारत पाकिस्तान युद्ध भी शामिल है जब कि इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक में ये आंकड़ा घटकर केवल 4 प्रतिशत रह गया है जो किसी भी दृष्टि से अच्छा नहीं है। ये तथ्य महत्वपूर्ण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका द्वारा जापान पर 6 व 9 अगस्त 1945 को हिरोशिमा एवं नागासाकी पर परमाणु बम का प्रयोग किया गया था किन्तु आज लगभग 79 वर्ष बीतने के बाद 7 देश परमाणु सम्पन्न हो गए हैं। इन देशों के पास हजारों की संख्या में परमाणु हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि भविष्य की स्थिति कितनी विकट होगी। एक तरफ हम पर्यावरण की रक्षा की अहद लेते हैं  पेड़ काटे जाने पर जमीन आसमान एक कर देते हैं और दूसरी तरफ़ लम्बे लम्बे युद्धों में शामिल देशों को रोक नहीं पाते। पेड़ तो छोड़िए कुछ सनकी लोग अपनी 'मैं' के  चलते  पूरी धरती को बर्बाद कर देना चाहते हैं। फिर ये पर्यावरण बचाओ का खोखला नारा किसके लिए और क्यूँ ?

        यूक्रेन जिसका  पुराना नाम कीवियन रूस है और जो नवीं शताब्दी में एक बड़ा एवं शक्तिशाली देश था किन्तु 12 वीं शताब्दी तक आते  आते यह देश क्षेत्रीय शक्तियों में विभाजित हो गया। 24 फ़रवरी  2022 को रूस ने यूक्रेन पर युद्ध थोप दिया। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्यों कि सोवियत संघ के विघटन के बाद 15 अलग अलग देश अस्तित्व में आए जिसमें से यूक्रेन भी एक अलग स्वतन्त्र देश बना।  अन्य छुटपुट कारणों के अतिरिक्त जैसे ही यूक्रेन ने नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) में शामिल होने का फैसला किया वैसे ही रूस की द्रष्टि यूक्रेन की तरफ वक्र हो गई। इसका सीधा सा कारण है यदि यूक्रेन नाटो की गोद में बैठता है तो रूस की सुरक्षा compromise होती है।नाटो की सेनाएं और रूस के मध्य में यूक्रेन है अगर यूक्रेन नाटो में शामिल होता है तो नाटो की सेनाओं की सीमा सीधे सोवियत रूस से लग जाएंगी। बस रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन इसी बात से असहज हो गये। रूठने से लेकर मनाने तक के जब सभी जतन बेकार हुए तो 24 फ़रवरी को रूस ने यूक्रेन पर सीधे हमला कर दिया। इसकी आशंका पूरे विश्व को पहले से थी किन्तु इसमें अमेरिका अपने हित देख रहा था और यूरोपीय देश अपने। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन जहाँ kjb से हैं वहीं यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की पहचान एक कॉमेडियन की रही है। दुनिया के सभी देशों को विश्वास था कि यूक्रेन 10-15 दिन में निपट जाएगा या सरेंडर कर देगा किन्तु ढाई वर्ष बीतने के बाद भी दोनों देश अपनी अपनी ताकत दिखाने में लगे हैं।

        इस युद्ध से निश्चित सोवियत रूस एवं यूक्रेन का भारी नहीं वरन भारी भरकम नुकसान हुआ है। यूक्रेन अपनी जिद छोड़ने के लिए तैय्यार नहीं है और सोवियत रूस अपनी। खामियाज़ा दोनों देशों की जनता भुगत रही है। इस युद्द में निश्चित नुकसान का आकलन करना तो मुश्किल है किन्तु इस युद्द से किस देश ने कितना प्रॉफिट अर्न किया है उसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। अमेरिका यूरोपीय यूनियन एवं कई अन्य देशों ने अपने कचरा बन गए हथियारों को यूक्रेन को बेच दिया। एक खबर काफी प्रचलित रही की अमेरिका ने अपने F16 बम वर्षक विमान यूक्रेन को दे दिए किन्तु वो विमान पुरानी पीढ़ी के निकले। अगर व्यापारिक द्रष्टि से देखें तो अमेरिका ने अपना कबाड़ यूक्रेन को बेचकर अपनी चांदी कर ली किन्तु वो सारा कबाड़ सोवियत रूस की स्मार्ट टेक्नोलॉजी के आगे धराशायी हो गया। जब ढाई साल से लगातार युद्ध चल रहा है तो मिसाइल हो या रॉकेट या फिर टैंक गोला बारूद खत्म तो होना ही है सो यूक्रेन की मदद जहाँ अमेरिका एवं यूरोपियन डेनमार्क नार्वे नीदरलैंड के अतिरिक्त पाकिस्तान ने भी करने की कोशिश। वहीं सोवियत रूस को भी हथियारों की सप्लाई चीन एवं तुर्की जैसे देश कर रहे थे। इन देशों ने भी हथियारों की सप्लाई कर चांदी काटने की कोशिश की । चीन तुर्की को तो कुछ कामयाबी मिली भी किन्तु पाकिस्तान के साथ "ना ख़ुदा ही मिला न विसाल ए सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे" वाली कहावत चरितार्थ हो गई।  पाकिस्तान भारत की तरह रूस से कच्चा तेल लेना चाहता था किन्तु जब रूस को जानकारी हुई कि पाकिस्तान यूक्रेन को हथियार सप्लाई कर रहा है तो बात कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई। एक अनुमान के अनुसार 24 फ़रवरी 2022 से अभी तक इस युद्द में यूक्रेन को 55 बिलियन डॉलर का नुक़सान हुआ है।

         उपरोक्त के अतिरिक्त एक विशेष बात का ज़िक्र करना लाज़िमी है। 2011 में प्रसिद्ध डॉक्यूमेंट्री निर्माता मैक्स वेक्स्टर ने एक फ़िल्म बनाने का निर्णय लिया कारण वे बढ़ती उम्र के बदलावों से परेशान थे। फ़िल्म का नाम था  "How to live for ever" मैक्स ने बढ़ती उम्र के कईं लोगों से बात की और जानने की कोशिश की कि वे अपने जीवन में सबसे ज्यादा कब खुश हुए थे। एक सौ वर्ष पार कर चुके व्यक्ति का उत्तर सबसे बेहतरीन एवं उत्साह वर्धक था। उसने कहा 11 नवंबर 1918 का दिन जिस दिन जब उत्तर फ्रांस के क़स्बे 
कॉपिगने में युद्ध समाप्ति पर हस्ताक्षर हुए थे। यहाँ य़ह उधृत करना भी जरूरी है कि 1914 से 1918 तक चले प्रथम विश्वयुद्ध में 2 करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए थे घायलों की गिनती का तो अंदाज़ा ही नहीं है और माल असबाब के नुक़सान की भरपाई तो की ही नहीं जा सकती। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूक्रेन स्वतन्त्र देश की हैसियत में आ गया। जार शासन को सत्ता से बेदखल कर ब्लादिमीर के volsheviko ने सत्ता हथिया कर यूक्रेन को खत्म करने पर ध्यान केंद्रित किया और अंततः यूक्रेन के हिस्से में हार आई। 1921 तक आते आते यूक्रेन सोवियत रिपब्लिक का हिस्सा बन गया। ब्लादिमीर से लेकर जोसेफ स्टालिन की फाईवे स्टेक्स ऑफ ग्रेन की नीति के कारण यूक्रेन की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो गई। भुखमरी के कारण हालात काबू से बाहर हो गए इन्हीं सब के बीच लोग घास कुत्ते बिल्ली खाने पर मजबूर हुए। 1932 से 1933 तक होल्डडॉमोर में 39 लाख लोग मारे गए या शासन द्वारा नरसंहार किया गया। पिछले ढाई साल के युद्ध में अभी तक ये स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है लेकिन लोग तो लगातर मारे जा रहे हैं न।

        अब बात करते हैं इजराइल और फिलिस्तीन के झगडे की। दोनों के बीच इनके झगड़े की शुरुआत 1917 से शुरू हुई। जब तत्कालीन ब्रिटिश विदेश सचिव ऑर्थर जेम्स बेल्फॉर ने बेल्लफॉर घोषणा के तहत फ़िलीस्तीन में यहूदियों के लिए नेशनल होम के लिए ब्रिटिश राज्य की तरफ से आधिकारिक समर्थन व्यक्त किया गया। 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध (28 जुलाई-1914 से 11 नवंबर-1918 ) की शुरुआत हो चुकी थी ब्रिटिश आर्मी भी युद्द में मसरूफ थी नाजियों द्वारा यहूदियों पर चरम सीमा पर अत्याचार किए जा रहे थे तभी बेल्फोर्ड डिक्लेरेशन की घोषणा हो गई जिसके बाद यहूदियों ने फ़िलीस्तीन में व्यापक पैमाने पर जमीन खरीदना शुरू कर दिया।  सच पूछा जाए तो अंग्रेजों ने 1947 में जो भारत के साथ किया उसका एक्सपेरिमेंट उन्होंने 30 वर्ष पहले यहूदियों और इजराइल के साथ कर दिया था। इज़राइल और फिलिस्तीन का झगड़ा एक अनिवार्य फ़िलीस्तीन के संघर्ष और आत्म निर्णय के अधिकार को लेकर सैन्य और राजनैतिक संघर्ष है। संघर्ष के मेन मुद्दों में वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी  पर इज़राइल का कब्जा, यरुशलम की स्थिति, इजराइली बस्तियां, सीमा निर्धारण, जल अधिकार परमिट व्यवस्था, फिलिस्तीन आन्दोलन फिलिस्तीन वापसी का अधिकार वगैरह वगैरह।

 1917 से लेकर 7 अक्तुबर 2021 तक इज़राइल ने न जाने कितने छुटपुट युद्द किए हैं। किन्तु 7 अक्टूबर 2023 को फ़िलीस्तीनी हमलावरों द्वारा हमास के संरक्षण में दक्षिणी इज़राइल पर बड़े पैमाने पर हमला किया गया यहां ये उल्लेखनीय है कि जिस दिन ये हमला किया गया उस दिन यहूदी पूरा दिन शान्ति प्रार्थना में बिताते हैं हथियार रखना या चलाना एक तरह से वर्जित है। इस हमले से इज़राइल सकते में आ गया जवाबी कार्यवाही शुरू हुई और फ़िर विश्व ने इज़राइल का वो रूप देखा जिसे आज तक किस्सों कहानियों में यदा कदा सुना जाता था। गाजा पट्टी में फिलिस्तीनियो ने हमास द्वारा बिछाए गए सुरंगों के जाल से इज़राइल को बहुत परेशान किया किन्तु टेक्नोलॉजी के बूते इज़राइल इन सब संकटो पर पूर्व की तरह भारी ही पड़ रहा है।  इज़राइल की आक्रमकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शुरुआती झटकों से उबरकर गाजा पट्टी में छ: दिनों में लगभग छ: हजार बम गिराए तत्पश्चात सम्पूर्ण गाजा पट्टी की नाकाबंदी कर गाजा पट्टी पर कब्जा करने के लिए पैदल सेना उतार दी। लगभग दस महीने की लड़ाई में एक तरफ़ इज़राइल अर्जुन की तरह अकेला खड़ा है उसका अगर कोई सहायक है तो वो अमेरिका है। भारत तठस्त की भूमिका में है। इन्हीं सब के बीच ईरान ने इज़राइल के खिलाफ़ कुछ उल्टा सीधा करने की कोशिश की तो इज़राइल के एक ही वार से उसके राष्ट्रपति जन्नत सिधार गए ,के अतिरिक्त भी ईरान को काफ़ी हानि उठानी पड़ी है। विश्व के सभी देश भली भाँति जानते हैं कि फ़िलीस्तीन लेबनान के आतंकी गुटों को परोक्ष रूप से ईरान ही पोषित कर रहा है अन्यथा क्या कारण है कि हिज्बुल्ला की अपनी एक अलग घातक आर्मी बन गई। ताजातरीन घटना पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि इज़राइल समय से 2 से 4 साल आगे की सोच कर चलता है।  सितम्बर 2024 में हुए पेजर धमाके फिर वाकी टॉकी धमाके इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि कैसे इज़राइल ने इसके ऊपर 2022 से ही कार्य शुरू कर दिया था जिसका परिणाम हिज्बुला के कोर कमांडर को मार कर उसने पूरा कर दिया। आश्चर्य की बात ये है कि रूस जो शेष विश्व के देशों के लिए स्वयं यूक्रेन युद्ध का खलनायक है वह मास्को में बैठकर इज़राइल फ़िलीस्तीन पर विशेष टिप्पणी दे रहा है जरा बानगी देखिए:-

"चिंगारी भड़काना आसान है,  बहुत आसान है। वहाँ जो घटनाएँ हो रही हैं, उन्हें देखते हुए करना आसान है।जब आप पीड़ित और खून से लथपथ बच्चों को देखते हैं तो आपकी मुट्ठीयां भीच जाती हैं और आँखों में आँसू आ जाते हैं। यह किसी भी समान्य व्यक्ति की प्रतिक्रिया है। अगर ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं है तो उस व्यक्ति के पास दिल नहीं है वह पत्थर का बना हुआ है।" 

         उपरोक्त पंक्तियों को पढ़कर मुझे सिर्फ़ हँसी आती है। जो व्यक्ति स्वयं पिछले ढाई वर्ष से यूक्रेन से "युद्धम शरणम गच्छामी" खेल रहा हो वह फ़िलीस्तीन का पक्ष लेकर इज़राइल पर दोषारोपण कैसे कर सकता है।  जितनी जाने इज़राइल फ़िलीस्तीन हमास हिज्बुला में गई हैं उससे सैकड़ों गुना जाने रूस यूक्रेन युद्ध में अब तक जा चुकी हैं। यहाँ सिर्फ़ जान के नुक़सान का आकलन है माल  असबाब का आकलन सम्भव ही नहीं।  रूस यूक्रेन युद्ध से पूरा विश्व पहले जहाँ चटकारे लेकर खबरें परोस रहा था अब वह भी इन खबरों को परोस कर 
फेडअप हो चुका है। खबर कोई भी हो ज्यादा दिन तक खबर में रहे तो वह खबर नहीं रहती। रूस यूक्रेन युद्ध की खबरों का हाल कुछ ऐसा ही हो चुका है। इन खबरों का कोई खरीदार ही नहीं। दोनों देशों के असहले खत्म हो चुके हैं उधार के हथियारों से तो युद्ध जीते नहीं जा सकते अलबत्ता दोनों देशों की अर्थव्यवस्था अवश्य रसातल में पहुँच गई है। कुछ दिनों में इज़राइल फिलिस्तीन हिज्बुल को भी समझ आ ही जाएगा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। यूरोपियन देशों एवं अमेरिका को रूस ही गैस एवं तेल सप्लाई कर रहा था। रूस द्वारा प्रतिकार स्वरुप गैस सप्लाई बाधित कर दी गई तो पिछली दो सर्दियों में यूरोप कितना परेशान हुआ है ये जग जाहिर है। अटल जी की पँक्ति याद आ गई "चिंगारी का खेल बुरा होता है"  

         अब अमेरिका यूरोप सहित संयुक्त राष्ट्र के पावरफूल देश चाहते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी इस युद्ध को रुकवाएं क्यों कि उन्हें पता है कि आज विश्व पटल पर अगर कोई एक शक्तिशाली नेता है तो वो मोदी ही हैं जिनकी स्वीकार्यता यूक्रेन और रूस के नेताओं में बराबर है। इसका प्रमाण भी पूरी दुनिया देख चुकी है जब भारत ने युद्धरत रूस यूक्रेन के नेताओं से बात कर निश्चित समय के लिए युद्ध रुकवाकर भारत के नागरिकों के साथ साथ अन्य देशों के नागरिकों को भी भारतीय तिरंगे की छत्रछाया में सकुशल घर पहुंचवाया था। अमेरिका एवं अन्य यूरोपीय देश स्वयं इज़राइल एवं हिज्बुला के मध्य जारी युद्ध रुकवाने की कोशिश नाम मात्र भी नहीं कर रहे हैं। आखिर ये दोहरी नीति क्यूँ? क्यूँ बार बार ये सुनने और पढ़ने में आता है कि अमेरिका हो या फिर यूरोपीय देश ये सिर्फ़ युद्ध भड़काना जानते हैं समेटना नहीं। अपने फायदे के लिए ये देश किसी भी सीमा तक चले जाते हैं फिर चाहे इसके लिए इन्हें तख्ता पलट ही क्यूँ न करना पड़े। अभी हाल ही में दो छोटे अफ्रीकी देशों ने उन देशों के साथ हो रहे इस प्रकार की घटनाओं का जिक्र किया है। सबसे ताजातरीन मामला बांग्लादेश का निकल कर सामने आ गया है। बांग्लादेश की कामचलाऊ सरकार के मुखिया संयुक्तराष्ट्र की सभा में जाते हैं तो स्वीकार करते हैं कि शेख हसीना के खिलाफ़ जबरदस्त साज़िश रची गई। ये खबर भी निकल कर आई कि अमेरिका बांग्लादेश में सैनिक अड्डा स्थापित करना चाहता था जब वह सफल नहीं हुआ तो उसने बांग्लादेश में तख्ता पलट करा दिया।अमेरिका तो कामयाब हो गया किन्तु उसमें पिसा और प्रताड़ित हुआ केवल हिन्दू।

         ताजा खबर के अनुसार अमेरिका और यूरोपियन यूनियन इज़राइल और लेबनान हिज्बुलाह के बीच 21 दिन का युद्ध विराम चाहती है किन्तु बेंजामिन नेतनयाहू ने इसके लिए साफ साफ इंकार कर दिया। इज़राइल का इतिहास रहा है कि वह अपने दुश्मनों के प्रति निर्मम रहा है इसलिए ये कहना जल्दबाज़ी होगी इज़राइल अपनी संप्रभुता के साथ कोई समझोता कर लेगा क्यों कि ये उसका स्टाईल नहीं है। जब तक वह हिज्बुलाह को समाप्त नहीं कर देता तब तक इज़राइल इस युद्ध में कोई युद्द विराम लागू नहीं होने देगा। इस स्थिति को देखते हुए भारत ने लेबनान में रहने वाले भारतीयों को एडवायजरी जारी कर दी है कि वे जल्द से जल्द लेबनान छोड़ दें। हम जैसे पर्यावरण प्रेमी सिर्फ़ प्रार्थना ही कर सकते हैं कि ईश्वर हमें इन पर्यावरण के दुश्मनों से बचाए !


प्रदीप डीएस भट्ट 
लेखक-9410677280


Friday, 13 September 2024

हिन्दी की है आस बनेगी एक दिन ख़ास यानि लिंगवा फ्रांका

“हिंदी की है आस, बनेगी एक दिन खास, यानि ‘लिंग्वा फ्रांका’”

         हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी 14 सितम्बर को “हिंदी दिवस” के रुप में  मनाया जाएगा। मुझे उम्मीद है कुछ मंत्रालयों में इस विषय में पत्रावलियाँ अंग्रेजी में ही प्रस्तुत की जाएगीं। हम जैसे हिंदी प्रेमियों को इससे कितना कष्ट होता है उनकी बला से। किंतु कहीं न कहीं दिल में ये आस अवश्य है कि एक न एक दिन हमारी हिंदी भाषा भी ‘लिंग्वा फ्रांका’ (प्रयोग में ली जाने वाली वह प्रभावशाली भाषा जो प्रयोग में लेने वालों की मातृ भाषा न हो) बनेगी) 

मैं हिंदवी क़ी हिंदी हूँ
राष्ट्र भाल क़ी बिंदी हूँ
अंग्रेजी भाषा के समक्ष मैं
मात्र अब भी किंचित हूँ
हाँ मैं हिन्दी हूँ ...

         विश्व परिदृश्य पर पिछले तीन हजार वर्ष के इतिहास में देखें तो ग्रीक, लैटिन, पॉर्च्युगीज, स्पैनिश, फ्रेंच और अंग्रेजी एथेंस की ग्रीक भाषा अलग-अलग दौर में प्रभावशाली रही हैं। 18वीं सदी के मध्य में फ्रांस के विद्वान वॉल्टेयर ने ‘फिलॉसफी ऑफ हिस्ट्री’ लिखी। इसका विषय संपूर्ण मानव जाति का इतिहास था। अध्ययन में यह तथ्य निकलकर आया कि ईसा पूर्व नौवीं सदी से लेकर चौथी सदी तक यूरोप, शहर रूपी कई साम्राज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से एथेंस व्यापार और सैन्य ताकत बनकर उभरा। इसलिए प्रभावशाली एथेंस की ग्रीक भाषा यूरोप की लिंग्वा फ्रांका बनी। ईसा पूर्व 201 से आने वाले 600 वर्षों तक एथेंस यूरोप का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बना रहा। लिहाजा कैथोलिक चर्च की ताकत बढ़ी और रोमन भाषा लैटिन लिंग्वा फ्रांका बन गई। लेकिन लैटिन लिंग्वा फ्रांका बनी रही क्यों कि आने वाले एक हजार साल तक कोई नई वैश्विक शक्ति नहीं उभरी।

         1492 में कोलंबस ने अमेरिका की खोज की और छह वर्ष बाद वास्कोडिगामा ने भारत में कदम रखा। ये दोनों यात्राएं पुर्तगाल के खर्चे पर हुई और इस तरह से पुर्तगाल साम्राज्य शक्तिशाली होने लगा। पुर्तगाल की देखा-देखी स्पेन और फ्रांस भी उप-निवेशवाद में कूदे। इस दौरान पॉर्च्युगीज, स्पेनिश और फ्रेंच भषा लिंग्वा फ्रांका की दौड़ में रहीं। इंग्लैंड में स्थिति ऐसी थी कि राजघराने में जो शिक्षा ली जाती थी उसका माध्यम फ्रेंच भाषा होती थी न कि अंग्रेगी। उस समय के सभ्य समाज में अंग्रेजी गरीबों की भाषा और दरिद्रता की निशानी मानी जाती थी। 
वर्तमान में अंग्रेजी भाषा को ‘लिंग्वा फ्रांका’ का दर्जा प्राप्त है। ऐसा इसलिए कि पिछ्ले लगभग 600 वर्षो से  ब्रिटेन आर्थिक, सामजिक,राजनैतिक बाजारी कारण व सैनिक शक्ति के लिहाज से विश्व के उन पाँच महत्वपूर्ण देशों में स्थान रखता है जो कि सीधे सीधे शेष विश्व पर अपना प्रभाव रखते हैं। चूँकि अमेरिका के अतिरिक्त विश्व में प्रमुख 7 देशों में अंग्रेजी ही बोली जाती है इसलिए वर्तमान दौर में अंग्रेजी ही लिंग्वा फ्रांका बनी हुई है। जहाँ तक अंग्रेगी का ताल्लुक है इसे प्रथम अंतर्राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है। चूँकि ये एक पश्चिम जर्मेनिक भाषा है जिसकी उत्पती एंग्लो-सेक्सन इंग्लैंड में हुई। चूँकि ब्रिटिश हुकूमत कई देशों पर रही है अतएव जैसे जैसे अंग्रेगी का प्रचलन बढा ये उन देशों में भी ज्यादा बोले जाने लगी जहाँ उस देश की अपनी भाषा पहले से ही मौजूद थी। ऐसा इसलिए भी हुआ क्यों कि ब्रिटिश लोगों ने 18,19 एवम 20वीं शताब्दी में  सैन्य, राजनितिक, आर्थिक, वैज्ञानिक एवम सांस्कृती पर अपनी पकड बनाने के उद्देश्य से अंग्रेगी भाषा के प्रयोग पर अधिक बल दिया जिससे इसे छटी भाषा के रुप में लिंग्वा फ्रांका होने का गौरव प्राप्त हुआ। कुछ देश ऐसे भी रहे जिन्होंने इसे अपनी मातृ भाषा के बाद दूसरी भाषा के रुप में मान्यता प्रदान की। अगर मैं इसे इस तरह पारिभाषित करूँ या कहूँ  कि अंग्रेगी भाषा का उत्थान चौथी या शायद पाँचवी शताब्दी के मध्य में इंग्लैंड में एंग्लो- सेक्सन लोगों द्वारा शुरु हुआ तो ज्यादा बेहतर होगा। एंग्लो सेक्सन लोग कई तरह की बोलियों/ भाषाओं को बोलते थे,यहाँ यह कथन स्प्ष्ट है कि वाइकिंग हमलावरों द्वारा अपनाई गई प्राचीन नोर्स भाषा का प्रभाव वर्तमान अंग्रेगी भाषा पर ज्यादा है। ये विषय अलग है कि अंग्रेजी भाषा लगातार अपना विकास करती रही और अन्य देशों में बोले जाने वाली भाषा के शब्दों को स्वंय में समाहित करती रही जिससे इसकी ताकत में ज्यादा वृद्धि हुई। वर्तमान में जो हम अंग्रेजी बोलते हैं उसमें नोर्मन शब्दावली और वर्तनी के नियमों का भारी संख्या में उपयोग हुआ है। वर्तमान अंग्रेजी भाषा में प्राचीन ग्रीक और लैटिन का अत्याधिक प्रभाव दिखायी पडता है। अंग्रेजी बोलने वाले लगभग 53 प्रमुख देश हैं जिनमें संयुक्त राष्ट्र, यूरोपियन संघ,राष्ट्रमण्डल, नाटो देश व नाफ्टा के देश शामिल हैं। एक सर्वे के अनुसार पूरे विश्व में अंग्रेजी बोलने वाले देशों के क्रम में अमेरिका प्रथम स्थान भारत दूसरे स्थान पर ,नाइजिरिया तीसरे स्थान पर और आश्चर्यजनक रुप से ब्रिटेन चौथे स्थान पर आता है। इसके बाद फिलिपिंस कनाडा और आस्ट्रेलिया का नम्बर आता है। मतलब जिस अंग्रेजी भाषा की उतपत्ती ब्रिटेन में हुई वही देश अंग्रेजी बोलने वाले देशों में चौथे नम्बर पर है मतलब उसने अपना आधिपत्य जमाने के उद्देश्य से अंग्रेजी भाषा को इतना ताकतवर बना दिया कि समूचा विश्व बिना अंग्रेजी भाषा के चल नही सकता। किंतु हर जगह अपवाद होते हैं, जो यहाँ भी है। चीन में मंदारिन भाषा सबसे ज्यादा बोली जाती है किंतु चीन के बाहर न के बराबर किंतु चीन ने आज जो मुकाम हासिल किया है वह मंदारिन की बदौलत ही किया है। अंग्रेजी का उपयोग उतना ही किया गया जितना आव्श्यक था।
जहाँ तक हिंदी भाषा का प्रश्न है तो विश्व में अंग्रेजी, मंदारिन के बाद इसका स्थान तीसरा है। भारत में हिंदी के बाद सबसे अधिक बंगाली भाषा ( लगभग 30 करोड) बोली जाती है। जिस प्रकार आज अंग्रेजी वैश्विक भाषा के रुप में विश्व में प्रतिष्ठित है उसी प्रकार आने वाले समय में हिंदी भी वैश्विक भाषा के रुप में निश्चित अपना स्थान बनाएगी। हिंदी भारत के अतिरिक्त नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, तिब्बत, अफगानिस्तान, श्रीलंका इत्यादि  देशों में प्रमुख रुप से बोली और समझी जाती है।पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दी धीरे धीरे सम्पर्क भाषा के रुप में अपना स्थान निश्चित करती जा रही है । भारत में इस समय कुल छ: कास्मोपोटिन शहर हैं जिनमें चेन्नई को छोडकर आपको हिंदी भाषा बोलने वाले समझने वाले देल्ही,मुम्बई, बंगलौर,कोलकत्ता और हैदराबाद में आसानी से मिल जायेंगे। चेन्नई में भी हिन्दी बोलने वाले मिलेंगे लेकिन वे तमिलियन न होकर हिन्दी बेल्ट से आकर बसे हिन्दी भाषी लोग हैं। एक सत्य और है कि व्यापार के सिलसिले में राजस्थान से बाहर निकले लोग भले ही घर में मारवाडी में बातचीत करते हैं किंतु अपनी व्यापारिक गतिविधियों में वे हिन्दी भाषा का ही प्रयोग करते हैं। इसका अनुभव मुझे अगस्त -2022 माह में अपने तीन दिवसीय साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान देखने को मिला। एक कहावत प्रसिद्ध है “जहाँ न पहुँचे बैलगाडी वहाँ पहुँचे मारवाडी” ये सुखद अनुभव मुझे नेपाल में भी देखने को मिला और भूटान में भी। यहाँ तक कि पश्चिम बंगाल एवम नोर्थ ईस्ट के आठों राज्यों में भी।

         भारत की संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को इसे राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया जिससे इसका प्रयोग और चौतरफा विकास हुआ। जैसे बंगला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि को क्रमश: बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल आदि की राजभाषा (मुख्य प्रांतीय भाषा) बनाया गया है। ऐसा करने से किसी भी भाषा का महत्व कम नही हुआ है? निश्चित रुप से नही। बल्कि इससे उन सभी भाषाओं का उत्तरदायित्व और प्रयोग क्षेत्र पहले से अधिक बढ़ गया है। जहाँ पहले केवल परस्पर बोलचाल में ही इनका प्रयोग होता था या उसमें साहित्य की रचना होती थी, वहीं अब प्रशासनिक कार्य भी हो रहे हैं। यही स्थिति हिन्दी की भी है। इस प्रकार हिन्दी सम्पर्क और राष्ट्रभाषा तो है ही, राजभाषा बनाकर इसे अतिरिक्त सम्मान प्रदान किया गया है।द्वितीय महायुद्द की समाप्ति पर 1945 में जब सन्युक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी तो उसकी आधिकारिक भाषा के रुप में अंग्रेजी रशियन, फ्रेंच एवम मंदारिन को ही आधिकारिक भाषा के रुप में मान्यता मिली थी। हम भारतीयों के लिए 1991 में सन्युक्त राष्ट्र में स्व0 अटल बिहारी बाजपई जी द्वारा दिया गया भाषण ही एक मात्र गौरव का क्षण रहा है अन्यथा आज तक किसी अन्य नेता ने कभी सन्युक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देना तो दूर “नमस्ते” भी कहना उचित नहीं समझा । फिर हिन्दी को सन्युक्त राष्ट्र की भाषा में सम्मलित कराने की बात तो दूर की कौडी ही रही। बिना किसी संकोच के कहा जा सकता है कि 2014 के बाद से स्थिति बहुत तेजी से बदली और 2018 में भारत सरकार की ओर से सन्युकत राष्ट्र संघ  के वैश्विक संचार विभाग के साथ साझेदारी की गई । आज भारत सन्युकत राष्ट्र संघ   के समाचार और मल्टी मीडिया के लिए फण्ड भी दे रहा है और परिणाम सामने है। जून-2022 में सन्युकत राष्ट्र संघ द्वारा जारी होने वाले सभी कागज़ातों को अन्य मान्य भाषाओं के अतिरिक्त हिन्दी में जारी करने की घोषणा की। निश्चित रुप से भारत के लिए ये गर्व का विषय है हिन्दी के अतिरिक्त बांग्ला एवम उर्दु भाषा को भी सन्युक्त राष्ट्र ने अपनी सहमती प्रदान की है।  इसी क्रम में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी कुछ माह पूर्व घोषणा की है कि उसके द्वारा दिये गये सभी निर्णयों का अनुवाद हिन्दी भाषा में किया जाएगा ताकि वादी को समझने में आसानी हो।   

"सात कोस पर पानी बदले चार कोस पर भाषा जी 
विश्व पटल पर छा जाएगी इक दिन हिन्दी भाषा जी "

         आज का युवा निश्चित रुप से अंग्रेगी के साथ हिंदी भाषा को भी महत्व देने लगा है उसे अच्छी तरह से पता है कि विकास का पहिया केवल अंग्रेजी या प्रांतीय भाषा के सहारे नही घूम सकता। पिछ्ले कुछ वर्षो में देश में ही नही वरन विदेशों में हिंदी और संस्कृत भाषा सीखने की एक होड सी मची हुई है।  मल्टीनेशनल कम्पनियाँ अच्छी तरह से जानती है कि भारत एक बहुत बडा बाज़ार है, अगर उन्हें अपना माल बेचना है तो उन्हें भारत की मुख्य भाषा हिन्दी को स्वीकार करना ही होगा, साथ ही इसी बहाने प्रांतीय भाषाओं का भी विकास हो रहा है। कुछ वर्ष पूर्ण एक आर्टिकल पढा था जिसमें बताया गया था कि दक्षिण कोरिया की कम्पनी जब किसी को भारत में अपना प्रतिनिधी बनाकर भेजती हैं तो वे एक शार्ट टर्म हिन्दी सेशन रखती हैं ताकि वे हिन्दी भाषा के कुछ शब्द वाक्य समझ व बोल सके ताकि कम्पनी को भारत में प्रतिनिधि के तौर पर यहाँ की बोल चाल को समझने में आसानी हो, लोगों से घुलने मिलने में आसानी हो, उनका उद्देश्य सिर्फ भारत में  सिर्फ माल बेचने का ही नही वरन उनका उद्देश्य भारतीय समाज से जुडने का ज़ियादा रहता है। आज सिर्फ हिन्दी फिल्म उद्योग ही वरन प्रादेशिक फिल्म उद्योग भी अपनी सभी फिल्मों, वेब सीरिज़ को हिंदी के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में डब कराके प्रदर्शित करता है ताकि ज्यादा से ज्याद लोगों तक उसकी पहुँच सुनिश्चित हो। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। 

         भारत का संविधान कुल 22 भारतीय भाषाओं को आधारिक भाषा का दर्ज़ा देता है. इन 22 भाषाओं में शामिल है :- हिंदी, तमिल, तेलुगु, मराठी, असमिया, बोडो, कन्नड़, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, गुजराती, बांग्ला, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, डोगरी, संथाली, मैथिली, नेपाली, कोंकणी एवम उर्दू। किंतु हिंदी लगभग सब जगह बोली जाती है और यह सबसे अधिक तेजी से बढ़ भी रही है।  पढाई का माध्यम भी धीरे धीरे हिंदी ,अंग्रेजी व एक प्रांतीय भाषा के इर्द गिर्द ही सिमटता जा रहा है जो कि एक अच्छा संकेत है। इस विषय में भारत सरकार द्वारा भी विभिन्न स्तरों पर प्रोत्साहन प्रदान किये जा रहे हैं साथ ही नई शिक्षा नीति भी इसमें एक कारगर भूमिका निभा रही है। पिछले दिनों विज्ञान पत्रिका  करंट साइंस में प्रकाशित एक अनुसंधान में मस्तिष्क विशेषज्ञों का कहना है कि अंग्रेजी पढते समय हमारे दिमाग का केवल बाँया हिस्सा ही सक्रिय रहता है जब कि हिन्दी या संस्कृत पढते समय मस्तिष्क का दायाँ और बाँया दोनों हिस्से सक्रिय हो जाते हैं। इससे दिमाग की कसरत ज्यादा होती है और दिमाग ज्यादा तरोताज़ा रहता है। राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र की भविष्य में अन्य भारतीय भाषाओं के प्रभाव पर भी अध्य्यन करने की योजना है। अध्यान की प्रक्रिया के दौरान छात्रों को पहले चरण में जोर जोर से अंग्रेजी भाषा पढने के लिए कहा गया उसके पश्चात  हिन्दी भाषा। इस समूची प्रक्रिया में दिमाग का एम आर आई किया गया तब उप्रोक्त रिजल्ट सामने आया। इसका कारण निश्चित रुप से हिन्दी बोलते समय मात्राओं के कारण दिमाग की सक्रियता ज्यादा होना था जब कि अंग्रेजी बोलते समय सीधा सीधा छब्बीस अल्फाबेट का रीपिटिशन ही रहा होगा। एक और अच्छी पहल हुई है वो ये कि   इंजीनियरिंग एवं मेडिकल की पढ़ाई भी हिन्दी माध्यम से करायी जाने लगी है जो कि भारतीय शिक्षा के लिए एक शुभ संदेश है l मुझे विश्वास है 2040 तक हिन्दी अगली (सातवीं) लिंग्वा फ्रांका का होने का दर्जा अवश्य प्राप्त कर लेगी।

© प्रदीप देवीशरण भट्ट - 01:09:2024

Wednesday, 4 September 2024

"ज़रूरी नहीं कवि ही बनो "


         रिपोर्ताज 

        "ज़रूरी नहीं कवि ही बनो"  

        दादा 1 सितंबर को राब्ता प्राईम का कार्यक्रम रक्खा है। अब शिवम का फोन आया तो मना करने का प्रश्न ही नहीं फिर भी मैंने हँसते हुए पूछ ही लिया बालक वेन्यू तो पालम ही होगा मगर मेन्यू, अब 😁खिलखिलाने की बारी शिवम की थी बोला दादा मेन्यू बढ़िया ही होगा। शायद उसे भी समझ आ गया था कि भूखे पेट तो कविता पढ़ी न जाएगी। शाम को फिर मुबलिया घनघना उठा, दुष्यंत जी के अवतरण दिवस पर कार्यक्रम का निमन्त्रण था चूँकि समय मैच  नहीं हो  रहा था इसलिए विनम्रता से मना कर दिया। अपनी आदत अनुसार हम सुबह 6:15 एक गिलास दुग्ध और जन्माष्टमी के बचे लड्डू का भोग लगाकर निकल पड़े। 8 बजे की ब्ला ब्ला ली और सीधे आई पी एक्सटेंशन दिल्ली वहां से पिंक लाईन ली और दिल्ली कैंट 🤤 बस पूछो मति हुजूर भयंकर वाली गलती हो गई  होज ख़ास से मेट्रो चेंज करनी थी लेकिन.... अब दिल्ली कैंट से राजौरी गार्डन से पालम समय 11:15 यानि 15 मिनिट लेट 😱। अच्छी बात ये हुई कि कार्यक्रम भी 11 की जगह 11.30 हो गया इज्ज़त में दाग लगने से बच गया। ख़ैर हमने हॉल में अपने चरण रक्खे तो प्रिय  शिवम ने स्वागत किया साथ में नीलम 'बावरा मन' ज़ी से परिचय हुआ अलग से। 🫠

       पाँच मिनिट पाँच करते करते आख़िरकार 12:10 पर प्रिय शिवम ने माइक संभाला और पहला धमाका किया कि आज सूत्रधार की भूमिका मैं स्वयं वहन करूँगा तालियों की ध्वनि से अंदाज़ा हो गया कि उपस्थित सभी प्राईम मेंबर ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है।  धीरे धीरे हॉल अपना आकार लेने लगा। शिवम ने राब्ता की अभी तक की जर्नी के विषय में बताया फिर उन चुनिंदा नामों जिक्र किया जो विपरित परिस्थितियों में भी शिवम के साथ खड़े रहे। निश्चित ये एक अच्छा अनुभव रहा। कार्यक्रम शुरू हुआ फिर धीरे धीरे लय पकड़ने लगा।एक के बाद एक बेहतरीन प्रस्तुतियां। लेकिन लेकिन लेकिन सिर्फ़ एक मोहतरमा की प्रस्तुति ने ये संदेश भी दिया कि लोग अभी भी उसी बने बनाए ढर्रे पर चल रहे हैं जहाँ किसी भी फिल्मी गाने पर अपने बेतुके शब्दों को चिपका दो फिर प्रोफेशनल गायक की तरह माइक पकड़ कर सारी गायिकी श्रोताओं पर उल्ट दो। निश्चित इससे कार्यक्रम की गरिमा के साथ साथ राब्ता की गरिमा भी kampromaiz 😡होती है। इसी तरह एक मोहतरमा बंगाल की बेटी पर एक लम्बी कविता पढ़ गईं । पढ़ी तो कोई बात नहीं लेकिन उस डॉक्टर बेटी का नाम लेने की क्या जरूरत थी उन्हें मालूम है कि सब रिकार्ड हो रहा है उनके खिलाफ़ एक्शन भी हो सकता है किन्तु ......। भविष्य में इस पर ध्यान दिये जाने की ज़रूरत है। वैसे भी ज़रूरी नहीं आप कवि ही बने कुछ और भी बनकर देख लो भाई !

        विवेक जी, राधा कौशिक अर्चना झा,अमृता अमृत, नवीन bagga,गोल्डी गीतकार, खुर्रम नूर, सुधा बसोर,दीपिका,पूनम सिंह, लीजा खान, प्रभा झा, नलिनी राज, स्नेह लता पाण्डेय, रंजना मजूमदार, एन सी खण्डेलवाल, प्रेम चौधरी, गुरमीत सिंह ढोट, अरुण श्रीवास्तव, रघुवर आनन्द, कुरुक्षेत्र हरियाणा से पधारे डॉक्टर सुभाष गर्ग और मेरठ से तशरीफ का टोकरा ले जाने वाले हम😝 तो bhaiyya सर्व प्रथम स्मरण कराया कि आज दुष्यंत जी का जन्म दिन है फिर उन्हीं को समर्पित अपनी ग़ज़ल की प्रस्तुति दी। आप यूँ न  कहो की झूठ बोल रिया हूं तो भैय्या जी पढ़ लो:-

ग़ज़ल 
1222   1222  1222 1222 

 " वो बरगद का शज़र देखो "

लिखा ज्यादा नहीं लेकिन, किया दिल पर असर देखो
कि हमसे भी जियादा, पारखी उनकी नजर देखो

वही चंदा वही तारे, नजारे भी वही लेकिन 
ग़ज़ल उसने कही सब पर,जिधर चाहे उधर देखो  

वो अपनी मौज़ का मालिक, धुआँ सब फ़िक्र कर डाला  
चुनी उसने अलग सबसे,वही तुम भी डगर देखो 

गरीबी में पला लेकिन, ठसक राजा के जैसी थी 
कि घर कवि राज का कैसा, ज़रा जाकर वो घर देखो 

रियाया दर्द को शब्दों में जिसने, ढाल कर रक्खा 
सियासत ने उन्हीं लफ़्ज़ों में देखा, अपना डर देखो 

ग़ज़ल कहते सभी लेकिन, अलग थी बात कुछ उसमें
वो गजलो का बना कैसे, ज़रा तुम चारागर देखो

अगर अब भी तुम्हें शक है, तो दूजा ढूंढ़ कर लाओ
वगरना बंद आंखें कर,जिगर उसके उतर देखो 

सभी कुछ ठीक था लेकिन,चली जाने हवा कैसी
कि उस मनहूस दिन हमको मिली, कैसी ख़बर देखो  

कहां आसान इतना 'दीप' है, 'दुष्यंत' हो जाना
कि हम सब पेड़ हैं केवल, वो बरगद का शज़र देखो

-प्रदीप देवीशरण भट्ट -9923

        लगभग साढ़े बजे सम्मान समारोह के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ और उसके बाद गर्मा गर्म भोजन। बस भैय्या आनन्द आ गया। पाँच बजे नीलम जी के साथ टैक्सी से निकले उन्होंने दिल्ली कैंट ड्रॉप किया हमने मेट्रो पकडी और सीधे आनन्द विहार वहाँ से मेरठ और फिर दस बजे घर। तो लो जी मना लिया अपने प्रिय कवि का जन्मदिन।


Wednesday, 28 August 2024

कहानी दिमाग़ में जितना पकेगी उतना निखरेगी

रिपोतार्ज 
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"कहानी दिमाग़ में जितना पकेगी उतना निखरेगी" 

 "आया हूं तो कुछ लेकर जाऊंगा"
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       कुछ याद आया हुज़ूर!!!!😊 जी सही पकड़े हैं ये डायलॉग "अंदाज़ अंदाज़ अपना अपना" फिल्म का ही है। अगर इस फिल्म में से शक्ति कपूर का स्पेशल अपीरियंस वाला किरदार हटा दिया जाए तो ये फिल्म एक औसत फिल्म बनकर ही रह जाती इसलिए राज कुमार संतोषी ने इस क़िरदार को जीवंत बनाने के लिए शक्ति कपूर के गेटअप पर भी भरपूर मेहनत की। कुछ ऐसा ही अंदाज़ "कथा रंग"  का भी है जिससे जुड़े मुझे मात्र चार  माह ही हुए हैं किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि चार बरस हो गए हैं। हर बार एक नया अनुभव होता लेकर घर लौटता हूँ। 😆हर मीटिंग के उपरांत जब मैं गाजियाबाद से वापिस मेरठ की यात्रा में होता हूं तो मेरे दिमाग़ में (वैसे सच तो ये है अपना ऊपर वाला माला खाली है) रिपोर्ताज की डार्क व पंच लाइन आकार ले लेती हैं किंतु मैं कम से कम 48 घंटे इसे दिमाग़ में ही सुरक्षित रख पकने देता हूं । वो सुना है न "Hurry will spoiled the carry"🌶️

       तो लब्बो लुआब ये है कि अगस्त के प्रथम सप्ताह में ही आलोक यात्री जी का आमंत्रण/निमंत्रण प्राप्त हो गया कि 25 अगस्त को कथा रंग की सभा होनी है आप तिथि रिज़र्व कर लें। ये एक बेहतरीन व्यवस्था है जिसका अनुपालन अन्य संस्थाओं को भी करना चाहिए। तो हुज़ूर हमने भी ये सुनिश्चित किया कि अन्य किसी कार्यक्रम की सहभागिता से बचा जा सके। आख़िर कमिटमेंट भी कोई चीज़ है प्रदीप बाबू। 😉

         पूरे भारत में बदरा सिर्फ़ गरज ही नहीं रहे बल्कि पूरे जोश-ओ - ख़रोश के साथ बरस भी रहे हैं सच कहूँ तो कुछ ज़्यादा ही बरस रहे हैं।  नदी हो या नाले सभी फूलम फुल,पर पता नहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश से और वो भी विशेष रूप से मेरठ से न जाने इंद्र देवता को क्या नाराज़गी हो गई है भैय्या बरस ही न रहे। अगर ग़लती से बरसने आ भी गए तो पवन महाराज साथ में उड़ाकर पता नहीं कहां ले जा रहे हैं। ख़ैर जलती भुनती गर्मी में 25 अगस्त को ग्यारह बजे निकले रास्ते में एक काम निपटाया और ठीक 2.30 होटल रेडबरी के सामने ऑटो से शाही सवारी उतरी। कार्यक्रम में समय से पहुंचना अपनी आदत में शुरु से शुमार रहा है सो 2.35 मीटिंग हॉल में पहुंचा तो बस हम ही हम तभी एक कुर्सी खिसकते हुए एक दम नज़दीक आकर बोली 'वेल्ले हो' हम समझे हमारा नाम पूछ रही है सो तुरन्त स्टाइल से बोले नहीं प्रदीप भट्ट हैं मेरठ से आ रहे हैं। अब कुर्सी को ताव आ गया बोली टाइम पे आना अच्छी बात है लेकिन इतनी जल्दी भी आना अच्छी बात नहीं।  लोग वेल्ला समझते हैं। सच कहें इतनी बढ़िया वाली बेइज्जती आज तक न हुई थी इसलिए खींसे निपोर कर बेइज्जती कम महसूस करने की कोशिश की किंतु जल्दी समझ में आ गया कि अगर और कटा जला नहीं सुनना चाहते तो बेटा वॉशरूम का बहाना करके खिसक लो, लेकिन अफ़सोस दिल गड्ढे में। बाथरूम में अलीगढ़ी ताला हमारा मुँह चिढ़ा रहा था😄 ख़ैर बाहर निकले दरयाफ़्त की फिर पुनः हॉल में आ लौटे।लौट के बुद्धू घऱ को आए वाली स्थिति में 🤣। 

         थोड़ी देर में प्रिय उत्कर्ष साथ में एक मोहतरमा हॉल में दाख़िल हुई ज़बरदस्त ड्रेस सेंस। थोड़ी देर में सुभाष जी शक़ील अहमद जी,रिंकल जी तेज सिंह जी रूबी भूषण जी, डॉक्टर देवेंद्र देवेश जी वगैरह वगैरह। अपरिहार्य कारणों से कार्यक्रम अध्यक्ष डॉक्टर शिव नारायण वरिष्ठ लेखक एवम संपादक "नई धारा"  डॉक्टर बलराम जी  वरिष्ठ लेखक एवम संपादक "समकालीन भारतीय साहित्य" देर से उपस्थित होने वाले थे। समय का सदुपयोग करते हुए प्रिय रिंकल ने माइक संभाला🙋‍♀️ और घोषणा की कि जब तक कार्यक्रम का शुभारंभ हो तब तक क्यों न सभी का एक दूसरे से परिचय हो जाएं। हाजरी के क्रम  संख्या के हिसाब से मैं क्रम संख्या 36 पर अंकित था सो आख़िरी में हमारा भी नंबर आ गया अभी हम हमने परिचय देकर माइक नीचे रक्खा ही था कि तभी आकाशवाणी हुई "मैं आलोक यात्री" पूरे हॉल में उपस्थित लोगों के होठों पर स्मित उभर आई। अगले दस मिनिट में हॉल लगभग पूरा भर चुका था। अध्यक्ष की बाट जोहते हुए कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ और कहानी की पाठशाला/ कार्यशाला में मीना पाण्डेय जी की कहानी "आराम कुर्सी " 🦽से वाचन प्रारम्भ हुआ। मैं उन्हें पिछ्ले कार्यक्रम में सुन चुका हूँ । पढ़ने का अंदाज़ अंदाज़ है। बेहतरीन कहानी पर ज़बरदस्त टीका टिप्पणी हुई । हर व्यक्ति की अपनी दृष्टि है मुझे उनकी कहानी का अंत सिर्फ़ इसलिए पसंद आया क्यों कि उन्होंने बेलाग अंदाज़ में वही परोसा जो हमारे समाज में व्याप्त है। माता या पिता की लीगेसी कोई भी आगे बढ़कर लेना नहीं चाहता सभी जल्द से जल्द मुक्ति चाहते हैं किंतु माता पिता द्वारा अर्जित एसेट नहीं छोड़ना चाहते। 🏡कहानी को दर्शकों का अच्छा प्रसाद मिला। मंजू मन द्वारा प्रस्तुत कहानी "ड्रॉपर" सुधी पाठकों को रास नहीं आई। मुझे स्वयं भी सबसे ज़्यादा आपत्ति इसके शीर्षक को लेकर थी जो एक औसत कहानी को और ज़्यादा औसत बना रहा थी। लेखिका मंजू मोहन को आलोचनाओं से इतर भी सोचना होगा। तीसरी कहानी "सफ़ेद आकृति" जिसे संस्था के अध्यक्ष शिवराज जी ने रचा और मंच पर प्रस्तुत वागीश शर्मा ने किया। इस कहानी पर कोई भी टिप्पणी न करना इसलिए आवश्यक नहीं क्यूं कि हम बाहर जाकर फ़ुनवा सुनने में व्यस्त रहे जब अन्दर आए तो..... चौथी कहानी "बुधिया की दिहाड़ी"🧍‍♀️ जिसे विनय विक्रम सिंह जी ने न केवल बुना बल्कि बढ़िया बुना। सबसे ज़्यादा प्रसाद इसी कहानी को मिला। कहानी सुनना शुरु किया तो मुझे स्वयं रचित लघु कथा "दिहाड़ी" की याद हो आई जिसे मैं आगामी कहानी संग्रह में स्थान दूंगा। मैंने ईमानदारी से इस बात को विनय जी से स्वीकारा कि काश मैं अपनी कहानी को आपकी कहानी जैसा विस्तृत विस्तार दे पाता। ओ भैय्या इत्ती देर हो गईं बकर बकर करते 😹 हमारी ईमानदारी टिप्पणी पर ताली तो बजाओ। 👏

         कार्यक्रम के अंतिम सत्र में रूबी भूषण जी की पुस्तक "टेम्स नदी बहती रही" एवम आगरा से पधारे युवा लेखक संजय दत्त शर्मा की पुस्तक "कस्बा" का लोकार्पण भी मंचासीन विभूतियों द्वारा संपन्न हुआ। अपने उद्बोधनों में डॉक्टर बलराम जी की नसीहत "झूठ और सच को जानना ही लेखकीय कौशल है" डॉक्टर शिवनारायण" कहानी द्वंद से ही बनती है " डॉक्टर देवेश ने अपने उद्बोधन में " लेखक के झूठ से ही समाज का सच उजगार होता है" से अपने अनुभव साझा किए। डॉक्टर रूबी भूषण की  यह स्वीरोक्ति कि वे "कथा रंग में आकर अभिभूत हुई" कथा रंग परिवार के लिए किसी मेडल से कम नहीं है।  आलोक यात्री जी हों या सुभाष चंदर जी या अन्य सभी ने कहानी लिखने और कहने पर पर अपने अपने मत प्रस्तुत किए। डॉक्टर स्वाति चौधरी का यह कथन कि चूँकि वे एक संपादक हैं तो कहानियों पर  टिप्पणी में सम्पादकता का पुट आना स्वाभाविक है। उन्होंने खुलकर कहा भी कि मैं एक श्रोता के साथ एक लेखक भी हूँ और एक लेखक के साथ साथ  एक सम्पादक भी इसलिए चाहकर भी सिर्फ़ अच्छी टिप्पणी ही देना सम्भव नहीं है। उनकी ईमानदार टिप्पणी के लिए उनको साधुवाद।  जहां तक मेरा स्वयं का प्रश्न है "कहानी जितना दिमाग़ में पकेगी वो उतनी ज़्यादा निखरेगी"। कहानी लिखना अलग बात है उसे प्रस्तुत करना अलग है। कई बार सारा खेल "कहन" पर आकर सिमट जाता है। कई मर्तबा कमज़ोर कहानी भी 'कहन' से लोगों पर अपना असर छोड़ जाती है। मीना पाण्डेय और विनय विक्रम सिंह इस बात को बेहतर जानते प्रतीत होते हैं। 

         और अब अंत में हर माह कथा रंग की मीटिंग होनी ही है। मीटिंग होनी है तो कोई न कोई कार्यक्रम अध्यक्ष विशेष अतिथि होंगे ही। उन सभी को कार्यक्रम एवम कहानियों पर टिप्पणी देनी ही होगी। टिप्पणियां कभी गुड़ की तरह मीठी होंगी कभी नीम सी कड़वी। अब उन टिप्पणियों को लेखक कैसे लेता है ये उस पर निर्भर करता है। आख़िर अनुभव की कुछ तो क़ीमत होती है। ज़रूरी नहीं हर लेखक उसे सकारात्मक रूप में स्वीकर करे कुछ लोगों की प्रवृति ही नकारात्मकता को धारण करने में ज़्यादा होती है। ख़ैर अब हमें ये लेखक के विवेक पर छोड़ देना चाहिए कि वो क्या स्वीकर करता है। मुझे ये रिपोर्ताज लिखते हुए 2019 का एक किस्सा याद हो आया। कादम्बिनी क्लब हैदराबाद द्वारा हर माह काव्य गोष्ठी आयोजित होती है, पैटर्न के अनुसार प्रथम सत्र में किसी प्रसिद्ध लेखक की लेखकीय यात्रा पर चुनिंदा लोगों द्वारा विचार प्रकट किये जाते हैं फिर द्वितीय सत्र में कवि गोष्ठी। शायद माह अक्टूबर 2019 की बात है उस मीटिंग में शिवानी की लिखी कहानियों उपन्यासों में से किसी एक का चुनाव कर उस पर अपने विचार प्रकट करने थे सो जैसे ही ये सूचना प्राप्त हुई मैंने तुरन्त गोरा पंत उर्फ़ शिवानी की  "कृष्णकली" उपन्यास के लिए अपनी सहमति दे दी क्यों कि मैंने उसे पहली बार धर्मयुग में किस्तों में पढ़ा था। लेकिन बोलने के लिए बुलेट पॉइंट्स बनाने बैठा तो सब गड्ढामड हो गया पर चूंकि मैं ऑफिस में हिन्दी प्रकोष्ठ का प्रभारी भी था तो तुरन्त सहायक की मदद से भारती जी ( हैदराबाद में हिन्दी पुस्तकों के एक मात्र विक्रेता) से सम्पर्क किया और अगले दिन पुस्तक हाज़िर हो गई । पुस्तक को दो बार पढ़ा तब जाकर दस मिनिट कुछ बोल पाने का अच्छा मैटेरियल तैय्यार कर पाया। कुल जमा 50,55 लोगों की उपस्थिति में जब वाचन हुआ तो सिर्फ़ कृष्कली पर ही नहीं वरन धर्मयुग में किस्तों में प्रकाशन का पूरा ब्यौरा भी मैंने अपने उद्बोधन में समेट लिया साथ ही एक विशेष घटना का भी ज़िक्र किय़ा जिससे उपस्थिति लोगों में कृष्णकली पढ़ने की उत्कंठा उत्पन्न हुईं। शायद यही है 'कहन'  रिजल्ट आशा से अधिक रहा। ये किस्सा बयां करने का कारण भी यही है कि "कहन" से पहले दिमाग़ में उसका खाका तैयार होना ज़रूरी है। फ़िर भी यदि "कहन" के दौरान कुछ इधर उधर हो जाए तो वरिष्ठ लेखक हों या श्रोता समझ जाते हैं कि बंदे ने मेहनत तो पूरी की है लेकिन..... 🍁🌹🍁🌹🍁🌹🍁🌹


प्रदीप डीएस भट्ट -28824

Monday, 26 August 2024

आधा सच

“आधा सच “


        अचानक किशोर की आँख खुल गई, थोडी देर तो वो अंधेरे में इधर उधर देखता रहा जैसे चाह रहा हो कि पहले उसकी आँखें अंधेरे की अभयस्त हो जाएँ फिर वो उठकर लाइट जलाएगा। कुछ देरे यूँ ही उन्नीदें से पडे रहने के बाद किशोर उठकर सीधा बॉथरुप में  घुस गया। लाइट जलाई और निवृत होने के बात उसने जैसे ही लाइट बंद करने को हाथ बढाया तो लाइट की मद्दिम सी रोशनी में उसने आर्या को सोते हुए देखा, अचानक उसके दिमाग में एक विचार कौंधा क्यूँ न आर्या को भी ट्रैकिंग पर साथ ही ले चलूँ ,एक पंथ दो काज हो जायेंगे। ये विचार आते ही किशोर के होंटो पर मुस्कान तैर गई। उसने धीरे से लाइट ऑफ की और फिर बिस्तर पर आकर धीरे से पसर गया। किशोर ने आँखे तो बंद कर ली लेकिन उसके होटों की शरारत बता रही थी कि उसके दिमाग में चल रहा है। इधर जब किशोर उठकर बॉथरुम गया तो आर्या की भी आँख खुल गई, वो ये सोचकर कि किशोर जब निफराम होकर आएगा तो वो भी निवृत होने जाएगी किंतु जब उसने बॉथरुम की लाइट में किशोर को उसकी ओर देखते हुए मंद मंद मुस्कुराते हुए देखा तो उसे अहसास हो गया था कि किशोर का यूँ मंद मंद मुस्कुराना कम से कम प्रेम तो नहीं हो सकता क्यूँ कि पिछले लगभग 2 बरसों से उनके बीच में किसी तरह का कोई रिलेशन रह ही नहीं गया था। फिर वो भी आँख बंद करके सोने का नाटक करने लगी लेकिन दिमाग़ में किशोर का बॉथरुम की लाइट में उसे देखकर मुस्कुरा उसे कुछ खटक रहा था। इस चक्कर में आर्या का निवृत होने का ख्याल न जाने कहाँ गायब हो चुका था। किशोर के दिमाग में क्या चल रहा है यही सोचते सोचते वो न जाने कब पुरानी यादों में खोती चली गई।

       लगभग बीस बरस पहले आर्या और किशोर ने प्रेम विवाह किया था। शुरु शुरु में तो सब कुछ ठीक ही चल रहा था लेकिन जैसे जैसे समय बीत रहा था प्यार कडवाहट में तब्दील होता जा रहा था। किशोर जहाँ भारतीय जीवन बीमा निगम में प्रशासनिक अधिकारी था वहीं आर्या भी स्टेट बैंक में मैनेजर थी। पहले किशोर शाहजँहापुर में पोस्टिड था तो वहीं आर्या की पोस्टिंग लखनऊ में थी। किशोर का बचपन जहाँ बनारस में ही बीता था वहीं आर्या बिहार के मधुबनी से थी। एक कहावत है कि मधुबनी  का हर दूसरा व्यक्ति झा निकलेगा । आर्या ने पटना से इंटर पास किया और बी0 कॉम/एम कॉम करने के लिए सीधे बनारस अपने मामा के घर जो कि भूतही इमली मुहल्ले में रहते थे आ गई। किशोर का तो जन्म ही बनारस में हुआ था और वो भी नाटी इमली मुहल्ले में। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एड्मिशन के बाद आर्या का पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ पढाई में केंद्रित था वो नहीं चाहती थी कि उसके किसी भी काम से मामा जी की बदनामी न हो। किशोर आर्या से एक वर्ष वरिष्ठ होने के कारण उसे हर तरह से सपोर्ट करता था। यही सपोर्ट न जाने कब दोस्ती और फिर प्यार में तब्दील होता चला गया। फिर मुलाकातों का दौर चल निकला  तो दोनों फुर्सत मिलते ही  कभी अस्सी घाट कभी दशाश्व्मेघ घाट कभी रविदास उद्यान तो कभी भारत माता मंदिर और कभी कभी फन सिटी पार्क पहुँच जाते। लोकल होने के कारण दोनों को ये डर लगा रहता था कि कहीं कोई देख न ले। वैसे भी कहावत है इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते सो एक दिन किशोर के बडे भाई विनय ने दोनों को भारत माता मंदिर के प्रांगण में देख लिया और घर आकर पिताजी को सारी बात बता दी। या कहें कि पिताजी से चुगली कर दी। शाम को जब किशोर घर पहुँचा तो उसे घर में घुसते ही अहसास हो गया कि कुछ तो गडबड हुई है। खैर खाना खाकर जब वो दो तल्ले मकान की सीढियाँ चढने लगा तो पिताजी ब्रज नाथ पाण्डेय की भारी भरकम आवाज़ सुनकर रुक गया। ब्रज नाथ ने सीधे सीधे कहा तुरत मेरे कमरे में पहुँचो। पाण्डेय जी तो कहकर अपने कमरे में चले गये इधर किशोर की सिट्टी पिट्टी गुम, पिताजी के कमरे में जाने से पहले उसने किचन में माँ से फुसफुसा कर पूछा, क्या हुआ माँ तो माँ ने मुँह पर उँगली रखकर जता दिया जैसे कहना चाह रही हों कि बेटा हमसे न पूछो बडे पाण्डेय जी ही बतायेंगे तुम किसके साथ भारत माता मंदिर में मटरगश्ती कर रहे थे। पाण्डेय जी के घर का नियम बडा सीधा साधा सा,  खाना सभी लोग किचन में दरी पर बैठकर ही खायेंगे। डायनिंग टेबिल है पर वो उन मेहमानों के लिए जिन्हें नीचे बैठने में परेशानी होती है। अभी किशोर सोच ही रहा था तभी किशोर के बडे भाई विनय ने किचन से निकलते हुए किशोर को देखकर छोटी सी इस्माइल दी तो उसकी समझ में जैसे सब कुछ आ गया। अपनी उखडी हुई साँसों को नियंत्रित करते हुए उसने ब्रज नाथ पाण्डेय के कमरे में प्रवेश किया तो देखा बडे पाण्डेय जी दीवान पर दीवार से टेक लगाए बैठे हुए हैं। बिना किसी भूमिका के ब्रजनाथ पाण्डेय जी की धीर गम्भीर आवाज़ किशोर के कानों से टकराई। कौन है वो लडकी जिसके साथ तुम भारत माता मंदिर में थे। जी वो, जी वो, किशोर बुरी तरह हडबडा गया  फिर भी उसने मैमेने की सी आवाज़ में कहा जी मेरे साथ ही हिंदू यूनिवर्सिटी में पढती है, एम0 काम कर रही है अभी पहले वर्ष में है। पाण्डेय जी की हूँ की आवाज़ आई तो किशोर फिर से सहम सा गया। वो अभी संयत होने की चेष्टा कर ही रहा था कि बडे पाण्डेय जी का दूसरा प्रश्न, कौन जात है। किशोर ने बडी मुश्किल से थूक गटका फिर बोला जी वो झा हैं मतलब उसका नाम आर्या झा है, बिहार के मधुबनी की रहने वाली है उसके पिताजी पटना में डॉक्टर हैं। इतना सुनते ही बडे पाण्डेय जी का तो जैसे पारा ही हाई हो गया। अबे हम तुम्हें पढने भेजते हैं या ये सब करने को। माँ के पेट से निकले नहीं कि आशिकी का भूत सवार हो जाता है। पहले कुछ बन तो लो, तुम अभी एम कॉम फाईनल में हो और वो क्या नाम है उस लडकी का हाँ आर्या वो पहले साल में है। जीवन के बारे में जानते ही क्या हो अभी। ये बनारस है बेटा, यहाँ जो भी कुछ होता है सब खुल्लम खुल्ला वो भी धडल्ले से बिना किसी दुराव छिपाव के और तुम हो कि पराई लडकी को लेकर इधर उधर घूम रहे हो। उसके माँ बाप ने यही सब करने के लिए उसे भेजा है क्या? अब हम तुमसे कुछ और कहेंगे तो तुम आसन पाटी लेकर बैठ जाओगे कि हम तो उसी से ब्याह करेंगे। तो हम ये टंटा ही खत्म कर देते हैं। आर्या से कहो कि अगले गुरुवार को अपने माता पिता दोनों को हमसे मिलने के लिए कहे। और हाँ ये सब तुम कल ही आर्या से कहोगे समझे और तब तक तुम्हारा उस लडकी से मिलना जुलना बंद जब तक कि ब्याह न हो जाए। तुम्हारी क्या इज़्ज़त है बनारस में वो तुम जानो लेकिन बडे पाण्डेय जी की इज़्ज़त कितनी है तुम अच्छी तरह से जानते हो। अब खडे क्या हो निकलो यहाँ से और हाँ जाते जाते अपनी माँ को बोलो विनय के साथ तुरंत कमरे में पहुँचे। किशोर को जैसे मन माँगी मुराद मिल गई हो, सर्दी के मौसम में भी उसके माथे पर पसीने की कुछ बूँदे चुहचुहा रही थीं जिसे उसने अपनी कमीज की आस्तीन से पोंछते हुए कमरे से बाहर की ओर कदम बढा दिये। किचन में माँ को बडे पाण्डेय जी का संदेश देते हुए किशोर अपनी साँसों को संयत करते हुए पहली मंजिल स्थित अपने कमरे में पहुँचा और तुरत ही अपने बैड पर पसर गया। उसे एक तरफ मँझले पाण्डेय यानि विनय पर गुस्सा आ रहा था वहीं उसे इस बात की खुशी भी थी कि चलो इसी बहाने आर्या और उसके ब्याह के विषय में बिना कुछ उट पटांग हुए ही बात आगे बढी। किशोर ने आज तक अपने और आर्या के बीच पनपे प्रेम के विषय में घर में किसी को भी अब तक इसलिए नहीं बताया था कि पहले कुछ बन जाएँ फिर बात कर लेंगे लेकिन बाबा जी (बाबा विश्वनाथ) की मर्ज़ी के आगे किसकी चली है जो किशोर की चलती सो जो हुआ वो अच्छा जानकर किशोर बिना पढे ही सो गया।

         ठीक गुरुवार के दिन आर्या के माता पिता सुबह सुबह ही पाण्डेय जी के घर पधार गये। जय भोले नाथ के उद्घोष के साथ जब पाण्डेय जी ने बैठक में प्रवेश किया तो नित्यानंद झा और सुषमा झा ने खडे होकर उन्हें प्रणाम किया। पाण्डेय जी ने हाथ जोडकर दोनों को प्रणाम का उत्तर देते हुए बैठने के लिए कहा फिर सीधे ही जोर से आवाज दी मंगला पहले झा जी और उनकी श्रीमती जी के दैनिक निवृत्ती की व्यवस्था करो भई, बातचीत तो नाश्ते के बाद भी हो जाएगी। पाण्डेय जी के ऐसे वचन सुनकर झा जी तो एकदम गदगद हो गये फिर बोले जी हम कल शाम को ही आ गये थे शायद किशोर जी ने आपको बताया नहीं कि हमारे साले साहब यही भूतही इमली मुहल्ले में रहते है , वो पी डब्लू डी में इंजीनियर हैं। आर्या  पिछले चार बरस से वहीं रहकर पढाई कर रही है। बडे पाण्डेय जी ने अच्छा अच्छा कहकर उन्हें पुन: बैठने का इशारा किया और स्वंय भी दूसरे सोफे पर पसर गये। इधर उधर की बातें करते करते मंगला ने नाश्ता लगा दिया तो पाण्डेय जी ने कहा विनय और किशोर को भी यहीं बुला लो सबके सामने बात करना ही ठीक रहेगा और हाँ तुम भी यहीं बैठो। फिर पाण्डेय जी नित्यानंद झा से बोले झा जी पहले नाश्ता कर लेते हैं फिर बात चीत करेंगे। जी जैसा आपका आदेश पाण्डेय जी कहकर नित्यानंद और सुषमा हस्त प्रच्छालन के लिए खडे हुए तो विनय ने तुरंत उन्हें बाहर की ओर लगे वॉश बेसन की तरफ इशारा कर दिया। थोडी देर के बाद जब नाश्ता समाप्त हुआ तो पाण्डेय जी बोले देखिए झा जी आपने तो सुना होगा “ब्राह्मण नहाया गज़ब ढाया” यानि ब्राह्मण को नहाने के बाद पूजा अर्चन सूझता है और फिर सीधा भोजन सूझता है। फिर मुस्कुराते हुए बोले हाँ तो झा जी कहिए आपको जो कहना है मैं तो आपके बाद ही कहूँगा हाँ अगर मेरी धर्मपत्नी या मँझले पाण्डेय (विनय) कुछ पूछना चाहें तो अलग बात है। बात शादी ब्याह की है तो सब कुछ सच सच हमारी ओर से भी और आपकी ओर से भी, किसी भी रिश्ते में ज़रा सा भी  झूठ हमसे बर्दाश्त न होगा। 

         झा जी ने हाथ जोडते हुए कहा देखिए पाण्डेय जी मेरे एक लडका है और एक लडकी। बेटा बडा है दिल्ली में रहकर एम एस कर रहा है। मैं पहले बडे बेटे की ही शादी करना चाहूँगा। पहले घर में लक्ष्मी ले आऊँ तो फिर घर की लक्ष्मी विदा करुँ ऐसी मेरी इच्छा है। वैसे भी अभी आर्या का पूरा एक वर्ष बाकी है वो एम कॉम के बाद क्या करना चाहती है अभी तक उसने कुछ बताया नहीं है।  बाकी आप जैसा कहें वैसा कर देंगे। मंगला पाण्डेय ने सुषमा झा से घर बाहर की बातें ही की तभी विनय ने नित्यानंद जी से पूछा क्या आर्या नौकरी करना चाहती है, इतना सुनना था कि बडे पाण्डेय जी तमतमा गये। अभी तुम इत्ते बडे नही हुए हो कि बडे पाण्डेय जी से ज्यादा समझदारी दिखा सको। चुपचाप अपनी जगह बैठे रहो और सिर्फ सुनो और समझो। जी पिताजी जी पिताजी बस विनय के मुँह से इतना ही निकल पाया। फिर पाण्डेय जी मुस्कुराते हुए नित्यानंद झा से बोले देखिए झा जी विनय किशोर का बडा भाई है दिल्ली सरकार में काम करता है इसकी शादी अभी दो महीने पह्ले ही दिल्ली में मिश्रा परिवार से तय हुई है लड्की रक्षा मंत्रालय में अधिकारी है, दिसम्बर में इसकी शादी है। विनय से छोटी और किशोर से बडी एक बेटी विद्या है जो सूरत में सैटल है उसके पति प्रणव द्विवेदी का अपना बिजनेस है। विनय तो ज्यादातर दिल्ली ही रहने वाला है छुट्टी वगैरह में बनारस आए तो आए। खैर अगले साल जून तक किशोर भी एम कॉम कर लेगा फिर नौकरी लगते ही हम आर्या और इसकी शादी कर देंगे जहाँ तक आर्या बिटिया की नौकरी करने की बात है वो करे या नहीं करे, ये उसकी इच्छा होगी। हम अपनी ओर से बच्चों पर कोई भी इच्छा लादना नहीं चाहेंगे। एक बात ज़रुर है कि आप झा हैं आप तो बिना मछली खाए रह नहीं सकते और हम ठहरे विशुद्ध शाकाहारी सनातनी ब्राह्मण सो शादी के बाद बिटिया मछली खाना चाहे तो बाहर खा सकती है घर में तो कदापि नहीं। दूसरी और महत्वपूर्ण बात हमारे परदादा ने दहेज लेने या देने वालों के घर रिश्ता नहीं करने की सौगंध ले रखी है तो दहेज वहेज तो भूल ही जाएगी बस 700 एक सौ लोगों का शुद्ध शाकाहारी खाने का इंतज़ाम ही काफी होगा। अगर ठीक समझें तो शादी पटना की जगह मधुबनी से ही करें।  शहर कितना भी अच्छा हो लेकिन बच्चों को गाँव की महत्ता पता होनी चाहिए।  जब तक किशोर और आर्या अपने पैरों पर खडे नहीं हो जाते मिलने जुलने पर ज्यादा फोकस न करके अपनी पढाई पर फोकस करें तो बेहतर होगा। बातचीत के सिलसिले के साथ खाना पीना भी चलता रहा फिर सांय को नित्यानंद झा और सुषमा ने पाण्डेय फैमिली से विदा ली और चल पडे भूतही इमली मुहल्ले में अपने साले के घर्।

         अगले तीन बरस देखते देखते ही निकल गये, किशोर ने एम कॉम के रिजल्ट के बाद भारतीय जीवन बीमा निगम में अप्लाई किया और सलेक्ट हो गया उसे शाहजँहापुर पोस्टिंग मिली और अगले ही बरस आर्या को भी एम कॉम करने के छ: माह के भीतर ही स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में प्रोबेशनरी अधिकारी  पद के लिए सलेक्ट हो गई और उसे लखनऊ पोस्टिंग मिल गई। अभी दोनों का प्रोबेशन पिरीयड भी पूरा नहीं हुआ था कि दोनों की शादी बडे धूमधाम से मधुबनी में सम्पन्न हो गई। बात सात एक सौ बारातियों की हुई थीं लेकिन इतने लोगों को मधुबनी लेकर जाना कहां आसान था इसलिए बड़ी मुश्किल से दो एक सौ बाराती ही जमा हो पाए। हां पांडेय जी ने बनारस में हजार लोगों को बढ़िया वाला रिसेप्शन जरूर दिया ताकि बनारस में उनके ठाठ बाट को लोग देख सकें। 

         लखनऊ से शाहजँहापुर की दूरी मात्र 180 किलोमीटर है सो किशोर हर शुक्र्वार की शाम को पाँच बजे बस पकडता और नौ दस बजे तक आर्या के पास । इसी तरह पाँच साल निकल गये। फिर अचानक जब किशोर का तबादला बनारस हुआ तो जुगाड लगाकर आर्या ने भी अपना तबादला बनारस ही करवा लिया। अब नाटी इमली मुहल्ले में पाण्डेय जी का घर जैसे फिर रोशन हो गया। विनय तो शादी के कुछ दिनों बाद ही दिल्ली शिफ्ट हो चुका था। जैसा कि भारतीय समाज में होता है जब पाँच साल तक कोई खुशखबरी की आहट नहीं सुनाई दी तो खुसर फुसर शुरू हो गई। एक आध साल तक तो मंगला पाण्डेय सभी को यह कहती रही थीं कि ये आजकल के बच्चे हैं जैसा इनके जी में आए करें। लेकिन जब किशोर और आर्या बनारस में ही तबादला लेकर आ गये तो मुहल्ले में फिर से बात चीत होने लगी कि अब तो छ बरस होने को आए छोटे पाण्डेय की बहूरिया का क्या इरादा है। एक दिन जब रविवार की छुट्टी थी तो मंगला ने कडाई से आर्या से पूछ ही लिया क्या बात है बिटिया तुम्हारी जिठानी ने तो साल भी नहीं बीतने दिया और हमें दादी बना दिया और एक तुम हो कि छ्टा बरस खत्म होने को आ रहा है और अभी तक कोई खुशखबरी नहीं। सब कुछ ठीक ठाक है न, कछु और बात हो तो बताओ किसी डॉक्टर को दिखाना है तो दिखा देते हैं वैसे तुम्हारे घर में तो दो दो डॉक्टर हैं बिटिया। आर्या ने बात को टालने के उद्देश्य से कह दिया कि अभी किशोर ही बच्चों के चक्क्कर में पडना नहीं चाहते। मंगला को जैसे जोर का झटका जोर से लगा एकदम बिफर कर बोलीं तीस बरस का हो गया है अब क्या बुढापे में बाप बनेगा। शाम को आने दो इसे आज बडे पाण्डेय जी ही इसकी खबर लेंगे। आर्या मंद मंद मुस्कुराते हुए पहली तल्ले स्थित अपने कमरे में जाकर लेट गई।
शाम को जैसे ही किशोर अपने दोस्तों से मिलकर लौटा बडे पाण्डेय जी ने सीधे सीधे उसकी क्लॉस लगा दी, क्यूँ भई क्या इरादा है छोटे पाण्डेय जी, ब्याह को छ: बरस होने को आए क्या बुढौती में बाप बनोगे, तीस बरस के तो तुम कब के हो गये हो। किशोर सिर्फ जी जी करता रहा और फिर इज़ाज़त लेकर जब अपने कमरे में पहुँचा तो आर्या ने चुटकी ले डाली क्या छोटे पाण्डेय जी आज तो बडे पाण्डेय जी ने आपकी बैंड ही बजा दी। सच काहे नही बोल दिये कि तुममे ही कुछ समस्या है जिस कारण तुम कभी बाप नहीं बन सकते। बात तो ठीक थी लेकिन आर्या ने उसे गलत समय पर कह दिया था इसलिए उस समय तो किशोर ने कुछ नहीं कहा अलबत्ता तीन महीने बीतते बीतते किशोर ने अपना तबादला बनारस से हैदराबाद करा लिया। जैसे ही सबको पता चला सब सकते में आ गये कि अभी शाहजँहापुर से आए दिन ही कितने हुए जो फिर से तबादला हो गया। किशोर ने सबसे यही कहा कि तबादला अचानक हुआ है सो जाना तो पडेगा ही। रात में जब आर्या ने सच्चाई जाननी चाही तो किशोर ने सीधे सीधे कह दिया हम कोशिश करेंगे कि तुम्हारा तबादला भी हैदराबाद हो जाए तो अच्छा है। वैसे भी सरकारी व्यवस्था तो है ही लेकिन एक बात याद रखना अगर तुम साथ रहना चाहो तो ठीक है वरना रास्ते और भी हैं। आर्या ने पूछा क्या मतलब तो किशोर ने कह दिया अब जब हम तुम्हारी नज़र में बाप बनने के लायक हैं ही नहीं तो क्या फायदा है साथ रहने का हाँ तुम माँ बन सकती हो। हम तुम्हें आज से ही फ्री किये दे रहे रहे हैं, तुम तलाक चाहोगी तो दे देंगे लेकिन आज जो आधा सच तुमने अम्मा से कहा है उसके लिए हम तुम्हें ज़िंदगी भर माफ नहीं करेंगे। एक बात और अगर तुम्हारी जगह  हमने ये बात तुम्हारे मम्मी पापा से कही होती तो तुम पर क्या बीत रही होती सोचना अगर सोच सको तो? आर्या कुछ कहना चाहती थी लेकिन किशोर ने उसे चुप रहने का इशारा कर दिया और फिर बेड के दूसरी ओर मुँह करके सोने की चेष्टा करने लगा।

         इस घटना के पंद्रह दिनों के बाद किशोर ने अपना ज़रुरी सामान पैक किया, फिर अम्मा और बडे पाण्डेय जी के चरण छूकर जाने की आज्ञा माँगी तो मंगला बोल उठी देखो छोटे पाण्डेय जी जितनी जल्दी हो सके हैदराबाद में मकान वकान ले लो फिर बहुरिया को भी भी कुछ दिनों के लिए लिवा ले जाओ, हमने बहुरिया से कह दिया है कि अपने अफसरों से बात करके जल्दी ही अपना तबादला तुम्हारे पास ही करवा ले, आखिर ऐसे कैसे चलेगा अभी गृहस्थी ठीक से जमी भी नहीं और तिबारा तबादला हो गया। किशोर ने फ्लाइट पकडी और सीधा हैदराबाद, तुरंत अमिर पेट के होट्ल में डेरा जमा दिया और अगले दिन सिकंदराबाद स्थित भारतीय जीवन बीमा निगम के ऑफिस में जाकर ड्यूटी ज्वाइन कर ली। एक हफ्ता होते होते बेगम पेट में एक फ्लैट भी ले लिया फिर देखते देखते दो महीने यूं ही बीत गये। इस दौरान वो अम्मा और बडे पाण्डेय जी से ही फोन पर बतियाता रहा आर्या से तो न के बराबर्। कभी कभी जीवन में ऐसा हो जाता है कि हाथी निकल जाता है और पूँछ फँसी रह जाती है बस कुछ ऐसा ही किशोर और आर्या के साथ हुआ। आर्या द्वारा कहे शब्दों को किशोर चाहकर भी मन से निकाल नहीं पा रहा था। एक ऐसा सच जो कि आधा सच था और जिसे आर्या ने अम्मा से बिना उसपे पूछे ही कह दिया था। आर्या की ढिढाई देखकर किशोर को कुछ ज्यादा ही तकलीफ हुई। लगभग एक वर्ष यूँ ही निकल गया। अचानक एक दिन आर्या के फोन ने उसे सोते से उठा दिया। आर्या उधर से कह रही थी हमने भी अपना तबादला हैदराबाद करवा लिया है। अगले महीने पहुँचेंगे कुछ लाना हो तो बता देना। किशोर ने नपा तुला उत्तर दिया नहीं कुछ मत लाओ सिर्फ अपने कपडे लत्ते ले आना यहाँ सर्दी नहीं होती है इसलिए गर्म कपडे वगैरह की ज़रुरत नहीं है। गृहस्थी का सभी ज़रुरी सामान हमने जमा कर लिया है कुछ और ज़रुरत लगेगी तो तुम्हारे आने के बाद ले आयेंगे। ठीक है कहकर आर्या ने फोन काट दिया। पिछले एक वर्ष में किशोर केवल एक बार ही बनारस गया था वो भी दीपावली पर तभी उसे मालूम हुआ कि आर्या उसके जाने के एक महीने बाद ही अपने मामा के यहाँ भूतही इमली मोहल्ले में शिफ्ट हो गई थी। बडे पाण्डेय जी और अम्मा ने नाराज़गी जताई तो कहने लगी हम यहाँ अकेले क्या करेंगे। आप दोनों तो खाना खाकर अपने दडबे में घुस जाते हो हम अकेले क्या करेंगे तो इससे अच्छा मामा के साथ रहेंगे कम से कम भाई बहन तो हैं बतियाने को। बस इसके बाद बडे पाण्डेय जी ने और अम्मा ने आर्या से कुछ भी कहने की जैसे कसम ही खा ली थी। हफ्ते दस दिन में जब आर्या की इच्छा होती वो सुबह सुबह ही आ जाती थी और शाम होते होते भूतही इमली मोहल्ले में वापिस।

         यूँ तो फरवरी महीने में धूप ज्यादा तेज नहीं होती लेकिन अप्रैल से जून आते आते तो उत्तर भारत की तरह हैदराबाद में भी लू के बड़े वाले थपेडे सुबह दस के बाद से आपका स्वागत करने को आतुर रहते हैं। अगर सरकारी भाषा में कहें तो किसी कर्मचारी को चेतावनी देने की जगह अगर कहा जाए “अरे ओ साँभा तूने ये गलती की है न तो अब सजा तो मिलकर रहेगी, जा तुझे चेतावनी पत्र नहीं बल्कि सजा के तौर पर 11 बजे दिन में अपना पिछवाडा धोने की सजा दी जाती है । निश्चित मानिए वो कर्मचारी यही कहेगा ना सरदार ना, चेतावनी एक की जगह दो दे दो या चाहे तो दो थप्पड मार लो पर पिछवाडा धोने की सज़ा इस मौसम में कतई ना दो” मतलब पानी किस हद तक गर्म हो जाता है वो इसी बात से समझा जा सकता है। फरवरी की पाँच तारीख को किशोर आर्या को लेने एअरपोर्ट जा पहुँचा फिर कार पार्क कर वह एग्जिट गेट पर आ खड़ा हुआ।फ्लाइट लगभग एक बजे आई जब आर्या बाहर आई तो उसे समझ में आ गया कि बनारस और हैदराबाद गर्मी के मामले में एक से हैं। किशोर ने जब उसका सामान गाडी में रक्खा तो आर्या चौंक गई, तुमने गाडी ले ली मुझे बताया भी नहीं। किशोर ने बस इतना ही कहा, अब पता चल गया ना। लगभग 45 मिनिट्स के बाद जब दोनों बेगम पेट फ्लैट में पहुँचे तो आर्या ने किशोर से कहा एअरपोर्ट तो बहुत दूर हैं । इतनी देर में तो हम बनारस से प्र्यागराज पहुँच जाएँ। किशोर ने सिर्फ़ हूँ कहकर जवाब की खाना पूर्ति की। फिर जब कार एयर पोर्ट से बाहर निकली तो किशोर ने कहा यही हाल बैंगलौर का भी है वहाँ भी एअर पोर्ट शहर से बहुत दूर हैं। आर्या ने बताया कि उसको परसों कोटी ब्राँच में ज्वाइन करना है। ठीक है परसों तुम्हें गाडी से ड्रॉप कर दूँगा, शाम को ले भी आऊँगा। जब तक तुम्हें रास्तों का ज्ञान नहीं होता तब तक के लिए ऑटो से आना जाना करो बाद में गाडी से जाया करना। आर्या के हैदराबाद आने के बाद किशोर के जीवन में अगर कुछ तब्दिली आई थी तो वे ये कि उसे अब घर के कामों से छुट्टी मिल गई थी। खाना तो आर्या ही बनाती थी अलबत्ता बाकी कामों के लिए किशोर ने बाई लगा दी थी।
 
         आर्या के जीवन में लखनऊ ऑफिस में ही काम करने वाले सुदेश तिवारी से ने अपना मकां तलाश कर लिया था। सुदेश ने न केवल आर्या का तबादला बनारस से हैदराबाद कराया वरन अपना भी तबादला लखनऊ से हैदराबाद कोटी ब्रांच में ही करा लिया था ताकि दोनों एक ही शहर में साथ साथ समय बिता सकें। आर्या अपना बाकी जीवन सुदेश के साथ बिताना चाहती थी ताकि उसे बच्चों का सुख मिल सके वहीं किशोर को शाहजहाँपुर में रहते ही आर्या और सुदेश के रिश्ते की भनक लग चुकी थी किंतु वह घर की इज़्ज़त के लिए चुप था। उसने आर्या पर ये सच्चाई कभी जाहिर नहीं होने दी कि उसे सुदेश के विषय में सब जानकारी बहुत पहले से है। किशोर की कई डिपार्टमेंट में अच्छी जानकारी थी  इसलिए वो चाहता था कि आर्या बनारस छोडकर दूसरे शहर में आ जाएगी तो शायद सब कुछ ठीक हो जाए किन्तु एक दिन राजेश चौधरी जो कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, सिकंद्राबाद ब्राँच में चीफ मैंनेजर थे ने सूचना दी कि लखनऊ से कोई सुदेश तिवारी और बनारस से भाभी जी यानी आर्या झा का तबादला हैदराबाद  की कोटी ब्राँच के लिए हुआ है तो उसका दिमाग सुन्न हो गया। किशोर ने सिर्फ इतना ही कहा थैंक्स यार । राजेश बोला मैंने तो पिछले हफ्ते ही हेड ऑफिस में भाभी जी के ट्रांसफर के लिए एप्रोच किया था लेकिन मैं ये जानकर थोड़ा चौंका कि भाभी जी का तबादला तो पंद्रह दिन पहले ही हो चुका है हाँ लिस्ट कल जारी हुई है जिनमें और भी तबादलों का जिक्र है लेकिन हैदराबाद के लिए सिर्फ दो ही नाम हैं फिर लम्बी श्वांस लेते हुए राजेश बोला चलो किशोर काम होने से मतलब है । किशोर ने फीकी सी हँसी के साथ पुन: थैंक्स कहा। शाम हुई तो किशोर सीधे घर जा पहुंचा आज उसका खाने का बिलकुल भी नहीं था इसलिए वो फ्रेश होकर सीधे बेडरूम में AC चलाकर लेट गया रह रह कर उसके दिमाग़ में राजेश के शब्द गुंज रहे थे।अब किशोर का दिमाग चकरघिन्नी बन गया था जिस बीमारी से पीछा छुडाने के लिए वो आर्या का तबादला हैदराबाद करवाना चाहता था वही बीमारी साथ साथ आ गई। यही सब सोचते सोचते न जाने कब उसे नींद आ गई और सुबह सुबह ही आर्या ने फोन पर अशुभ सूचना दे दी।  

         आर्या ने अपने और किशोर के रिश्ते को लेकर सुदेश को सब कुछ साफ साफ बता दिया था। आर्या और सब के अलावा ये बताना विशेष तौर पर नहीं भूली कि किशोर बाप नहीं बन सकता इसलिए उसे किशोर से मुक्ति चाहिए। आर्या चाहती तो बनारस से ही तलाक की कार्रवाई शुरु कर सकती थी किंतु वह अपने घर वालों को इस पचडे से दूर ही रखना चाहती थी इसलिए उसने सुदेश के साथ मिलकर ये प्लॉन बनाया कि पहले हैदराबाद तबादला लेकर चलते हैं फिर साल छ: महीने में किशोर से बात करके तलाक की प्रक्रिया शुरु करते हैं। तब तक सुदेश भी कोई फ्लैट लेकर सेट हो जाएगा। मतलब आर्या एक एक कदम बिलकुल नपा तुला रखना चाहती थी। और परिणीति स्वरूप अब वो हैदराबाद आ चुकी थी। इसी तरह जब तीन चार महीने बीत गये तो एक दिन आर्या ने किशोर से सीधे सीधे कह दिया कि अब वो उसके साथ नहीं रह सकती बेहतर होगा वो उसे तलाक दे दे। किशोर थोडी देर तो चुप रहा फिर बोला तलाक लेकर किससे ब्याह करोगी उस लखनऊ वाले सुदेश तिवारी से?  सुनते ही आर्या के पैरो के नीचे से जैसे जमीन ही निकल गई। उसका चेहरा बिलकुल कागज़ की तरह सफेद पड गया फिर उखड़ी श्वांस के बाद बस इतना ही कह पाई हाँ यही समझो। किशोर ने फिर थोडा रुककर कहा देखो आर्या मुझे चार साल से इस खिचडी की भनक थी इसलिए मैंने बनारस तबादला लिया और तुम्हारा भी करवा दिया लेकिन तुम किसी न किसी बहाने सुदेश से मिलने लखनऊ पहुँच ही जाती थीं। मुझे लगा तुम खुद ही सही गलत समझ जाओगी लेकिन तुम नहीं मानी और तुमने आधा सच अम्मा से कह दिया। मुझे पहली बात तुम्हारी बात दिल पर लगी जो अभी भी कायम है। मैंने ये सोचकर हैदराबाद तबादला लिया कि कुछ दिनों बाद तुम्हारा तबादला भी हैदराबाद करा लूँगा तो इस सुदेश नामक बीमारी से मुक्ति मिल जाएगी लेकिन मैं गलत निकला। तुमने न केवल अपना तबादला करवाया बल्कि सुदेश का भी तबादला हैदराबाद करवा लिया। तुम्हारा तबादला तो मार्च में ही हो गया था लेकिन तुम सुदेश के तबादले के लिए सिफारिश लगाती रहीं और अंततोगत्वा तुम सुदेश का तबादला करा कर ही मानी। अब ये मत पूछना कि मुझे ये सब कैसे मालूम है। थोडे बहुत सम्पर्क मेरे भी हैं। हाँ तो बात करते हैं तलाक कि अगर तुम बनारस में तलाक माँगती तो मैं तुरंत दे देता जैसा मैंने कहा भी था लेकिन अभी तुम छ: सात महीने ठहरो। मेरा प्र्मोशन ड्यू है जैसे ही प्रमोशन आर्डर आएगा उसके अगले ही महीने मैं तुम्हें आपसी सहमती से तलाक दे दूँगा। प्रमोशन आएगा तो निश्चित तबादला भी होगा ही। तब तक तुम्हारा यहाँ हैदराबाद में एक वर्ष भी पूरा हो जाएगा। तब तक तुम चाहो तो मेरे पास रहो चाहे तो सुदेश के पास मुझे कोई आपत्ती नहीं है। आज पहली बार आर्या को लगा कि वो जिस किशोर को जानती है वो ये नहीं है। वो पिछ्ले चार साल से सब कुछ जानते हुए भी अंजान बनने का नाटक कर रहा था। उसका मन तो था कि वो तुरंत कह दे आज से मेरा तुम्हारा रिश्ता खत्म लेकिन फिर जाने क्या सोचकर वो चुप ही रही कि खाँ-म-खाँ बात बढ जाएगी इसलिए उसने इतना ही कहा ठीक है अब जब तुम्हें सब कुछ पता चल चुका है तो फिर इतनी ड्रामेबाजी की क्या ज़रुरत है। ये सच है जब से डॉक्टर ने बताया कि तुम कभी बाप नहीं बन सकते हो उसके बाद से ही मुझे लगने लगा था कि इस रिश्ते का क्या मतलब। एक तरीका था कि हम दोनों  बच्चा गोद ले सकते थे किंतु मुझे अपना ही बच्चा चाहिए सो जब सुदेश ने मुझसे शादी का प्रपोजल रक्खा तो मैंने सोचने के लिए एक साल का समय माँगा लेकिन तुमने बनारस तबादला ले लिया और मेरा भी वहीं करवा लिया तो मैंने उसी दिन निश्च्य किया कि मैं इस ढोंग के साथ ज़िंदगी नहीं जी सकती इसलिए तुम्हारे हैदराबाद जाने के से पहले ही मैंने अम्मा और बडे पाण्डेय जी को पूरा सच बता दिया कि तुम कभी बाप नहीं बन सकते और फिर मैं अपने मामा के यहाँ शिफ्ट हो गई। तुम्हें बुरा लगा मानती हूँ किंतु सच को बदला तो नहीं जा सकता। अब अंतिम बात अगले रविवार को पटना से मम्मी पापा और बडे भैय्या मिलने आ रहे हैं तो जहाँ इतना सहा है तो थोडा और सह लो वो लोग एक हफ़्ते में वापिस चले जाएँगे। आर्या की बात सुनकर किशोर ने बस इतना ही कहा मुझे कोई आपत्ती नहीं है ,उनका ही घर है वे एक हफ्ते रुके या एक महीना। 

         अगले हफ्ते जब आर्या के माता पिता और भडे भाई आए तो किशोर ने एक हफ्ते की छुट्टी लेकर उन्हें पूरा हैदराबाद ही नहीं घुमाया वरन श्री शैलम (ज्योतिर्लिंग) के दर्शन भी करवा दिये। सब कुछ अच्छे से निपट गया और वे सब दस दिन के बाद पटना वापिस लौट गये। दिन तो दिन हैं कब गुजर जाते हैं पता ही नहीं चलता। किशोर का प्रमोशन आर्डर आ चुका था उसको अगले एक महीने बाद जम्मू जाकर ज्वाइन करना था। लगभग 40 दिन का समय शेष था। आर्या और किशोर ने आपसी सहमती से तलाक के लिए अप्लाई कर दिया, पहली सुनवाई के बाद तीने महीने बाद की डेट मिली। किशोर ने जम्मू जवाइन करने से पहले अकेले ही एक हफ्ते के लिए महाबलेश्वर जाने का प्लान किया था। चूँकि किशोर अपनी ही गाडी से महाबलेश्वर रहा था तो उसने आर्या से कह दिया था कि अगर वो चाहे तो एक हफ्ते के लिए सुदेश के साथ जाकर रह ले या यहीं रहे किंतु सुदेश इस घर में नहीं आना चाहिए। आर्या ने भी टका सा जवाब दे दिया इसकी कोई ज़रुरत नहीं है मैं यहीं रहूँगी। जब तक हम दोनों का तलाक नहीं हो जाता और सुदेश और मेरी शादी नहीं हो जाती तक कुछ भी नहीं। मतलब किशोर ने यूँ ही लापरवाही से पूछा तो आर्या बोली कुछ भी नहीं मतलब कुछ भी नहीं मेरे और सुदेश के बीच आज तक कुछ भी नहीं हुआ और जब तक शादी नहीं होगी तब तक कुछ होगा भी नहीं ये बात मैंने उसे शादी के लिए हाँ करने से पहले ही बता दी थी। मेरे इस निर्णय का सम्मान वो भी करता है। किशोर ने एक अजीब सी नज़रों से आर्या को देखा फिर सोने के लिए बेड पर चला गया। अचानक जब उसकी आँख खुली तो बाथरुप की रोशनी से उसने आर्या को बडे गौर से देखा और उसके दिमाग में कुछ चलने लगा था। आर्या भी जागते हुए भी मकर भरे पडी रही। 

         जब सुबह आर्या ने बेड टी किशोर को दी तो उसने उसे अपने पास बैठने का इशरा किया फिर बोला क्या तुम महाबलेश्वर चलोगी। आर्या ने थोडी देर सोचकर कहा कब जाना है तो किशोर बोला शनिवार को निकलेंगे शाम तक महाबलेश्वर फिर चार पाँच दिन रुकेंगे अगर मूड किया तो माथेरान भी घूम लेंगे। फिर अगले शनिवार या रविवार तक वापिस फिर उसके अगले हफ्ते में तो मुझे जम्मू ज्वाइन करना ही है तो सोचा थोडा घूम फिर लिया जाए। ठीक है मैं आज ही लीव अप्लाई कर देती हूँ। किशोर जहाँ खुश था वहीं आर्या को जाने क्यूँ कुछ शंका सी हो रही थी। शनिवार के दिन सुबह नाश्ता करके के बाद सात बजे के लगभ आर्या और किशोर ने अपनी यात्रा शुरु की आर्या ने रास्ते के लिए दो समय का खाना बनाकर रख लिया था। रात्रि नौ बजे जाकर दोनों महाबलेश्वर पहुँचे। चुँकि किशोर ने होटेल की बुकिंग पहले ही कर रक्खी थी इसलिए दोनों फ्रेश हुए कुछ खाया और सो गये। अगले दिन सुबह फ्रेश हुए नाश्ता किया और नौ बजे के करीब घूमने निकल गये। वैसे तो महाबलेश्वर अक्टूबर के बाद जाने का मौसम है किंतु घूमने वालो के लिए क्या अक्टूबर क्या जून और क्या जुलाई। जुलाई माह में बारिश अपने पूरे शबाब पर होती है क्या सड्क क्या पहाड सब जगह पानी ही पानी और थोडी सी भी ऊँची जगह हो तो झरने आपका स्वागत करने को तैयार रहते हैं। प्रतापगढ फोर्ट,फोर्ट, वेन्ना लेक, एंफिल पोइंट,माप्रो गार्डन और विल्सन पोइंट वो खूबसूरत जगह हैं जहाँ प्रकृति टुरिस्टों का मन मोह लेती है। आज महाबलेश्वर में किशोर और आर्या का तीसरा दिन था सो किशोर ने 1656 में बने प्रतापगढ फोर्ट जाने का निश्चय किया था। किला इतना बडा था कि उसे देखते देखते ही पूरा दिन निकल जाए। आर्या पिछ्ले दो दिन से किशोर के साथ घूम रही थी किंतु किसी अंजानी आशंका से वो सतर्क भी थी। प्रतापगढ किला देखने के बाद जब दोनों चार बजे लगभग नीचे होटेल के लिए उतर रहे थे तो आखिरी चढाई से उतरते हुए अचानक आर्या का पैर स्लिप हो गया और वो दस-पंद्रह बीस फुट नीचे गड्डे में जा गिरी। चूँकि उनके अलावा और लोग भी थे सो एकदम हडकम्प मचना स्वाभाविक था। आधा घंटा बीतते बीतते पोलिस, फायर और एक एम्बूलेंस भी वहाँ आ पहुँची खैर जैसे तैसे आर्या को बाहर निकाला गया। गड्डे में तीन फुट के करीब पानी भरा हुआ था इसलिए आर्या को चोट तो लगी लेकिन उतनी नहीं जितनी खाली गड्डे में लगती। बाएँ पैर में फ्रेक्चर हो गया था, बाएँ हाथ की ही दो ऊँगलियों में भी फ्रेक्चर था साथ ही जगह रगड वगैरह के निशान अलग थे । हॉस्पिटल पहुँचकर तुरंत ही उपचार प्रारम्भ हो गया, बाएँ पैर और हाथ में प्लास्टर बाँध दिया गया था। फिलहाल जब डॉक्टर को पता चला कि ये दम्पती हैदराबाद से यहाँ घुमने आएँ है तो उन्होंने किशोर को कम से कम एक हफ्ते तक फुल रेस्ट की सलाह दी उसके बाद ही हैदराबाद जाने की अनुमति प्रदान की गई। आर्या के चेहरे पर भी काफी चोट लगी थी जिस कारण उसे बोलने में परेशानी हो रही थी। जैसे तैसे एक हफ्ते के बाद किशोर आर्या को लेकर हैदराबाद पहुँचा और अपनी बडी बहन विद्या को फोन से सारी स्थिति बताई तो वो तुरंत ही अगले दिन अपने चार साल के बेटे के साथ हैदराबाद आ गई। आर्या विद्या को देखते ही चौंक गई। अरे दीदी आप यहाँ, विद्या ने आर्या के सर पर हाथ फेरते हुए कहा कितने दिन हो गये हैदराबाद आए एक फोन भी नहीं किया खैर छोडो मैंने कहा मैं ही चलती हूँ अपनी भाभी को देखने। विद्या के आने से किशोर ने ऑफिस जाना शुरु कर दिया था और कोटि स्थित एस बी आई में खुद चीफ मैंनेजर से मिलकर स्थिति बयां कर दी थी। चीफ मैंनेजर रेड्डी ने कोई बात नही पाण्डेय जी जब तक आर्या बिलकुल स्वस्थ न हो जाएँ उन्हें आने की ज़रुरत नहीं है तब तक मैं कोशिश करुँगा कि आर्या का तबादला सिकंद्राबाद ब्रांच  में हो जाए। किशोर रेड्डी जी को धन्यवाद देकर उठा तो उसने पाया कि कोई है जो रेड्डी जी के कमरे में बार बार झाँक कर जा रहा है। उसे अंदाज़ा हो गया कि हो न हो ये सुदेश तिवारी ही है।किशोर ने ऑफिस में तीने महीने बाद रिलीव करने के लिए प्रार्थना की जो कि स्थिति को देखते हुए स्वीकार भी कर लिया गया कर।

         इधर आर्या ये सोच सोच कर परेशान हो रही थी कि वो तो किशोर की तरफ से कुछ उल्टा सीधा किये जाने की आशंका से घिरी थी कहाँ वो खुद ही गड्डे में जा गिरी। सच तो ये है कि जब उसका पैर फिसला तब उसके दिमाग में यही आ रहा था कि किशोर उसे अब धक्का देगा तब धक्का देगा और उसकी इहलीला समाप्त कर देगा लेकिन वैसा तो कुछ हुआ नहीं वो स्वंय ही उल्टे सीधे ख्यालों को दिमाग में जगह देती रही और परिणाम सामने गढ्ढे के दर्शन। ख़ैर धीरे धीरे ऐसे ही दो महीने निकल गये अब आर्या न केवल स्वंय अच्छी तरह चल पा रही थी वरन उसने किचन का काम भी सम्भाल लिया था। एक दिन उसने किशोर से कहा कि अब वो पूरी तरह ठीक है वो दीदी को सूरत छोड आएँ वहाँ उनका परिवार भी सफर कर रहा होगा। किशोर ने कहा कोई बात नहीं विद्या दीदी का ससुराल काफी बडा है या यूँ कहूँ तो ज्यादा बेहतर होगा कि सन्युक्त परिवार होने के कारण वहां सब कुछ अच्छे से निपट जाता है। मैं दीदी से बात करता हूँ अगर वे जाना चाहेंगी तो ठीक है वर्ना वो जब कहेंगी तब्। ठीक है कहकर आर्या अपने काम में लग गई। शाम को जब किशोर आया तो आर्या ने बताया कि रेड्डी सर का फोन था उन्होंने मेरा तबादला सिकंद्राबाद ब्रांच में करा दिया है। वही बता रहे थे कि मेरा भी प्रमोशन ड्यू है शायद इस महीने या अगले महीने आर्डर आ जाएँगे। अभी वो बात कर ही रहे थे कि बैल बजी तो किशोर दरवाज़ा खोलने के उठा तो विद्या ने कहा किशोर तुम रहने दो मुझे मालूम है कौन आया है। किशोर ने अचकचा कर विद्या को देखा तो उसे मुस्कुराता पाकर वो सब कुछ समझ गया। दरवाजा खुला तो प्रणव द्विवेदी हाजिर्। किशोर और आर्या ने पैर छुकर प्रणव का आशीर्वाद लिया।  प्रणव थोडा हँसमुख स्वभाव का था इसलिए किशोर को गले लगाते हुए बोला किशोर हैदराबाद से सूरत एक हजार किलोमीटर ही है। फ्लाइट में बैठो तो डेढ घंटे में । कभी याद नहीं आती क्या और ये क्या विद्या बता रही थी कि तुम्हारा प्रमोशन हो गया है और तुम जम्मू जा रहे हो, भई ये बात अपनी तो समझ में आई नही। आर्या बनारस से यहाँ तुम्हारे पास आई और तुम फिर इसे छोडकर जम्मू जा रहे हो। तभी आर्या बोल पडी जीजा जी अब ऐसा कुछ नहीं होने वाला , मेरा भी प्रमोशन ड्यू है एक आध महीने बाद मैं भी जम्मू ही पहुँच जाऊँगी। आर्या की बात सुनकर किशोर एक बारगी तो चौंका लेकिन फिर संयत होते हुए बोला जीजा जी हम ठहरे नौकरी वाले आपकी तरह बिजनेसमैन थोडे ही है जो पूरी ज़िंदगी एक ही जगह निकल जाएगी। फिर इसी तरह हँसी ठहाको के बीच तीन चार दिन यूँ ही निकल गये। प्रणव विद्या को लेकर सूरत लौट चुका था। आर्या ने सिंकंद्राबाद ब्रांच में ज्वाइन कर लिया था। किशोर आर्या द्वारा जीजा जी को कही गई बात पर स्पष्टीकरण चाहता था किंतु न जाने क्या सोचकर चुप हो जाता था ।

         अब किशोर साढे नौ बजे घर से निकलता आर्या को बैंक छोडकर फिर अपने ऑफिस पहुँच जाता। आर्या के साथ हुए हादसे ने उसे अंदर तक हिला दिया था। वो ये सोचकर परेशान था कि अगर उसे कुछ हो जाता तो वो अपने और आर्या के घरवालों को क्या जवाब देता। उसे अगले पंद्रह दिनों में जम्मू ज्वाइन करना था लेकिन उसका मन आर्या को छोडकर जाने को नहीं कर रहा था। इसी पशोपेश शुक्रवार शाम को जब वो ऑफिस से निकलकर आर्या के बैंक पहुँचा तो आर्या के हाथ में कई सारे गिफ्ट और बुके देखकर चौंक गया ।कई सारे साथी आर्या के साथ ही बैंक के बाहर खडे थे। ऐसी स्थिति देखकर किशोर तुरंत कार से बाहर निकला और सबको हाय हल्लो बोलकर आर्या के हाथ से सामान लेकर गाडी की पिछली सीट पर रखने लगा तो तभी राजेश चौधरी ने किशोर को शुभकामनाएँ दी तो किशोर चौंक पडा। अरे अरे ऐसे मत देखो पाण्डेय जी भाभी जी का प्रमोशन हो गया है अब वो स्केल वन में आ गई हैं और दूसरी शुभकामनाएँ इसलिए कि इनका तबादला भी जम्मू हुआ है।  भई इस बार मैंने कोशिश की थी और मैं सफल हुआ। इसके लिए तुमसे अलग से पार्टी लूँगा। फिर हा हा करके राजेश चौधरी हँसने लगे। थोडी देर बाद जब आर्या और किशोर घर की ओर रवाना हुए तो किशोर ने पूछा  ये सब कब हुआ और मुझे क्यूँ नहीं बताया। फिर प्रश्न वाचक दृष्टि से देखते हुए बोला अगले महीने कोर्ट की भी डेट है याद है ना। आर्या ने किशोर की तरफ देखे बिना ही कहा हाँ मुझे सब याद है अब इस विषय में रात में बात करते हैं।

         खाना वगैरह से निपटकर जब आर्य बेडरुम में दाखिल हुई तो देखा किशोर आज फिर हेडफोन लगाकर जगजीत सिंह की गज़ले सुनने में वयस्त हैं। जब किशोर बहुत खुश या दु:खी होता था तो वो जगजीत सिंह की गज़ले ही सुनना पसंद करता था। आर्या ने धीरे से किशोर के कानों से हेडफोन उतारे फिर बोली , अब बोलो कार में क्या कह रहे थे। किशोर ने कुछ नहीं बस तुम्हें याद दिला रहा था कि अगले महीने तलाक की डेट पर सुनवाई है और हो सकता है उसी दिन फैसला भी हो जाए। किशोर की बात बीच में ही काटते हुए आर्या ने कहा बाक़ी छोड़ो पहले मेरे एक सवाल का जवाब दो महाबलेश्वर जाने से पाँच दिन पहले तुम रात में बाथरुम के लिए उठे थे तुमने लाइट जलाई फिर तुम निवृत हुए फिर लाईट बंद न कर तुम मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे। जान सकती हूं ऐसा क्यूं और तुम्हारे दिमाग में उस समय चल क्या रहा था। तुम्हारे उठकर जाते ही मेरी भी आँख खुल गई थी मैंने सोचा तुम बाहर आओगे तो मैं जाऊँगी लेकिन तुम्हें अपनी तरफ देखकर मुस्कुराता हुआ देखा तो मुझे कुछ आशंका हुई फिर वापिस आकार तुम आँख बंद करके सोने की चेष्टा कर रहे थे लेकिन तुम्हारे होटों पर तब भी मुस्कान तैर रही थी । जब अगले दिन तुमने मुझे महाबलेश्वर चलने के लिए कहा तो मैं किसी आशंका से ग्रस्त हो गई थी फिर ये सोचकर की जो होगा देखा जाएगा मैं तुम्हारे साथ चली गईं मुझे लगा तुम मुझे घुमाने के बहाने वहीं महाबलेश्वर में मार डालना चाह्ते हो शायद पहाडी से धक्का देकर ताकि तुम साबित कर सको कि वो एक्सीडेंट था लेकिन हो उल्टा गया। मेरा खुद ही पैर फिसल गया और मैं गड्डे में जा गिरी। पानी होने के कारण चोट कम लगी लेकिन गड्डे में पडे पडे भी मैं तुम्हारी तेज आवाज़ सुन रही थी तुम पोलिस को समझा रहे थे। मुझे उसी अवस्था में लगा अगर ये आदमी मुझे मारने लाया है तो फिर इतना परेशान क्यूँ है फिर तुम्हारा हॉस्पिटल में सेवा करना, यहाँ विद्या दीदी को बुलाना और भी बहुत कुछ ऐसा जिससे मैं परेशान हो गई। किशोर पहले मुझे इन्हीं सब का जवाब दो। 

         किशोर ने आर्या को गौर से देखा फिर बोला ठीक है उस दिन जब मैं तुम्हें बाथरुम में निफराम हो रहा था तो मुझे अपनी और तुम्हारी प्रेम कहानी स्मरण हो आई। दो बरस का प्रेम फिर शादी, फिर बच्चे न हो पाने के कारण तुम्हारा सुदेश तिवारी से शादी का फैसला, तुम्हारा अम्मा को "आधा सच" बताना वगैरह वगैरह, मैं यही सोचकर मुस्कुरा रहा था कि जीवन भी क्या है न कल तक हम जिसके लिए जी जान एक किए दे रहे थे आज सिर्फ एक समस्या उत्पन्न होने पर ऐसी स्थिति कैसे बन गईं कि हम अलगाव की स्थिति तक आ पहुंचे। बस यही सब और कुछ नहीं और तुमने समझा मैं तुम्हें महाबलेश्वर में मार डालने की नीयत से ले जा रहा हूँ। खैर कोई बात नहीं जो हुआ सो हुआ। एक गहरी श्वांस लेते हुए आर्या बोली अब आखरी बात मेरी सुनो मुझे विद्या दीदी ने वो आधा सच बता दिया है जो तुमने मुझसे छुपा कर रक्खा। मैंने वही अधकचरा सच अम्मा और बडे पाण्डेय जी को अपने अहम की तुष्टी के लिए बता दिया लेकिन तुमने इतना सब सहा मुझे सच नहीं बताया जान सकती हूँ क्यूँ । माना मैं थोडी बेवकूफ हूँ लेकिन इतना तो समझ ही सकती थी। सच कहूँ तो मुझे अपने द्वारा किये गये व्यव्यार पर दु:ख नहीं वरन घृणा उत्पन्न हो रही है। “तुम तो बाप बन सकते हो पर मैं कभी भी माँ नहीं बन सकती किशोर” जब से मुझे ये सत्य पता चला है मैं जाने कितनी बार मरी हूँ। डॉक्टर से मिलकर तुमने रिपोर्ट ही बदलवा दी क्यूँ किशोर क्यूँ। तुम अच्छे हो माना लेकिन अपने अच्छे पन में मुझे सच न बताकर तुमने मुझे बहुत छोटा कर दिया। खैर अब तलाक का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता जहाँ तक बात जम्मू जाने की है तो वो मैंने बहुत सोच समझ कर ही फैसला लिया है। राजेश चौधरी सर ने मदद कर दी सो ये काम और आसान हो गया अब तुम पर डिपेंड करता है कि तुम तलाक लेना चाहते हो तो हम अगले महीने आकर ले लेंगे लेकिन अगर मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती तो कम से कम एक शहर में तो रह ही सकती हूँ। तभी किशोर उठा और आर्या का हाथ अपने हाथ में लेकर बोला इस सबकी कोई ज़रुरत नहीं है आर्या। मैं अभी भी वही किशोर हूँ और तुम भी वही आर्या बस समय का फेर है खैर अभी इतनी भी देर नहीं हुई है  कि हम दोनों अपना रास्ता ही बदल लें। आर्या ने किशोर को जोर से पकड़कर कहा इस पगली को माफ़ कर दो किशोर प्लीज़।

प्रदीप देवीशरण भट्ट-16.06.2023

Tuesday, 30 July 2024

" भूखे भजन न होय गोपाला "

 रिपोतार्ज 

       "भूखे भजन न होय गोपाला 
       पकड़ ये अपनी कंठी माला "
 
  18 जुलाई को अचानक (राब्ता) शिवम झा की कॉल आई तब मैं कहीं जा रहा था तो पहली फुर्सत में कॉल बैक किया। फ़ोन उठाते ही शिकायत कि दादा आपने मैसेज नहीं देखा क्या? मैंने अचकचा कर कहा थोड़ा व्यस्त था बालक बताओ क्या बात है तो शिवम ने बताया कि 20 जुलाई को पुराने वैन्यू पालम में ही 11 बजे से कार्यक्रम है आप स्वीकृति देवें। मैंने भी हँसते हुए कहा लो जी लो दी भई 😊। मैं समय से हाज़िर हो जाऊंगा। अब प्रोग्राम गुडगांव में हो या दिल्ली के दूसरे कोने में या मध्य में मुझे समय से पहुंचना पसंद है। हैदराबाद में वक्त की पाबंदगी बड़ी समस्या है। ऐसा कई प्रोग्राम में देखने में आया कि मैं समय से उपस्थित हो गया किंतु जिन्होंने आमंत्रण दिया वे स्वयं नदारत थे😱। सो सामान्य शिष्टाचार के अनुसार मैं 30 से 45 मिनिट प्रतीक्षा करता फिर संबंधित को एक मेसेज ड्रॉप कर वापिस बैक टू पैवेलियन। हाल तो दिल्ली का भी कुछ अच्छा नहीं है किंतु वास्तविक साहित्यकार समय पर उपस्थित होकर साहित्य की गरिमा बचाए हुए हैं।👍🏼

         ख़ैर 20 जुलाई को सुबह 5 बजे उठे, फ्रेश हुए फिर तेजगढ़ी से 7 बजे ब्ला ब्ला ली और ठीक 8.40 ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट वहां से दो मेट्रो बदली और ठीक साढ़े नौ बजे मीटिंग स्थल। लेकिन ये क्या मीटिंग हॉल पर लगा गोदरेज का ताला हमें मुंह चिढ़ा रहा था 😏जैसे कहना चाह रहा हो क्यूं बे घर से फालतू हो क्या जो सुबह इतनी जल्दी टपक पड़े। अब उसे कैसे समझाएं कि इसमें हमारी गलती कछु नाही है। हम तो प्रिकॉशन ले रहे थे लेकिन ब्ला ब्ला ने हमें कुछ ज्यादा ही जल्दी ड्रॉप कर दिया। गर्मी अपने पूरे शबाब पर थी इसलिए और कहीं जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता सो वहीं जीने की सीढ़ियों पर पसर गए।🙃 कुछ रुके फिर शिवम को फ़ोन मिलाने के लिए जैसे ही मोबाइल निकाला तो शिवम का मेसेज देखा किन्ही अपरिहार्य कारणों से प्रोग्राम11 की जगह 12 बजे शुरु होगा। बस भैय्या जोर वाली झुंझलाहट हो आई पर कर भी क्या सकते थे। शिवम से बात हुई तो उसने बताया कि आधे घंटे में पहुंचता हूं। मैंने भी झट कह दिया आ जा भाई सुबह पांच बजे निकला हूं नाश्ता संग संग करेंगे🥘🍰। शिवम अनय के साथ पहुंचा और लग गया काम में। शिवम भी नाश्ता भूल गया और गर्मी का प्रकोप देखते हुए हमने भी उसे याद न दिलाई। तभी संजय जैन जी ने प्रवेश किया फिर आज की उत्सव मूर्ति अमृत बिसारिया जी भी परिवार के साथ आ पहुंची। धीरे धीरे हॉल भरने लगा और ठीक 12 बजे मां सरस्वती की मूर्ति पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के पश्चात सरस्वती वन्दना हुई। संचालन का दायित्व संभाला शायर संजय जैन जी ने।
      
         राब्ता के संरक्षक विवेक कवीश्वर डॉक्टर कामना मिश्र, खुर्रम नूर, डॉक्टर पूजा सिंह गंगानिया, नीलम गुप्ता जिन्होंने औरों पर एवम स्वंय पर भी अच्छा तंज कसा के अतिरिक्त हशमत भारद्वाज, गोल्डी गीतकार, दीपिका वल्दिया सीमा कौशिक के अतिरिक्त शिवम झा ने भाई बहन के रिश्तों पर गद्यात्मक कविता प्रस्तुत की। मैंने भी अपनी एक गज़ल प्रस्तुत की। वाह वाह के बीच कुछ रिफ्रेशमेंट वितरित हो गया और जब हम फ्री हुए तब तक जय श्री राम। अब भैय्या सुबह से भूखे बैठे ब्रह्म देवता के हिस्से में भोजन तो नहीं अलबत्ता जमकर वाह वाह जरूर हिस्से में आई।🫠

ग़ज़ल 

प्रेम नहीं इतना भी आसां, ख़ुद को खोना पड़ता है 
प्रेम पगे तो हसरत जगती, वरना रोना पड़ता है 

दो ज़िस्मो की बात नहीं ये, दिल का साथ ज़रूरी है 
छत के नीचे साथ हों फ़िर भी, तन्हा सोना पड़ता है

एक दूजे की फ़िक्र भले हो,फ़िर भी ऐसा हो जाता है 
दुनिया को दिखलाने ख़ातिर, इक सा होना पड़ता है 

यकीं नहीं तो आकर देखो, हर घऱ यही कहानी है 
मिट्टी के बर्तन को मिट्टी, से भी धोना पड़ता है

नहीं जगत में कोई ऐसा, जिसको सब कुछ हासिल हो
कभी कभी कुछ पाने खातिर, सब कुछ खोना पड़ता है 

प्रेम की चाहत सच्ची है ग़र,गमलों से शुरआत करो 
नफ़रत के जंगल में उल्फ़त, बीज ही बोना पड़ता है 

यही रीत है यही गीत है, यही मश्वरा है मेरा  
कभी कभी दूजे का बढ़कर, बोझ भी ढोना पड़ता है 

जो अक्षम है प्रेम में उसको, दुनिया ताने देती है 
कभी प्रेम में ख़ुद की ख़ातिर, ख़ुद को रोना पड़ता है  
 
दुनिया की सब बातें छोड़ो, ख़ुद पे कर विश्वास 'प्रदीप' 
प्रेम का धागा सुई नू हौले, हौले पिरोना पड़ता है 
- प्रदीप डीएस भट्ट  -20524

         कार्यक्रम से निफराम हुए और दो मोहतरमाओं के साथ सीधे मेट्रो स्टेशन हौज़ ख़ास चेंज की तभी परम पूजनीय पेट से आकाशवाणी हुई देखो भैय्या मेरठ तक जाना है तो कुछ मुझमें डालो वरना हम तो यहीं मेट्रो 🤤के फर्श पर लेट रहे हैं। हमें भी लगा प्रदीप बाबू पेट के साथ इतनी ज्यादती भी अच्छी नहीं सो भईया एक साथी नाम भूल गया रे...... के साथ भुट्टे के दाने खाए फिर एक एक कॉफी गटकी तब जाकर जान में जान आई। फिर कनॉट प्लेस से आनंद विहार की मेट्रो ली फिर कौशांबी से फिर वही ब्ला ब्ला और भइया जी सीधे साढ़े आठ बजे मेरठ अपने महल में। एक बात पल्ले बांध ली घर से भले किसी समय निकलो पहले ठूस लो नईं तो.....😹


प्रदीप डीएस भट्ट -30724