अपनी बेबाक राय अवश्य रखे किन्तु इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि आपकी बेबाक राय से व्यक्ति विशेष के सम्मान को ठेस न लगे । हम अपनी स्व्तंत्रता के प्रति सजग रहे किन्तु दूसरों कि स्वतन्त्रता मे बाधक भी न बने ।
Wednesday, 9 November 2022
"मन चाहा होता नहीं प्रभु चाहें तत्काल"
Tuesday, 25 October 2022
दो खूबसूरत शामें The Feet On Earth Festival के नाम
Monday, 17 October 2022
“गुड बॉय”
रिपोतार्ज़
“गुड बॉय”
पिछले कुछ दिनों से ऐसा लग रहा है कि मानसून विदाई ले रहा है किंतु तभी मौसम विभाग भविष्य्वाणी कर देता है “ बंगाल की खाडी में उठे चक्रवात के कारण फलां फलां प्रदेशों में बदरा जम के बरसेंगे”।अरे भैय्या पूरे नोर्थ में जब लोग भीषण गर्मी से त्राही माम त्राही माम कर रहे थे तब तो तुम न बरसे और न ई सुसरा चक्रवात ही कहीं उठा। लगभग पूरे नोर्थ की धरती मैय्या पर बसे लोगां भगवान इंद्र को अगले इलेक्शन में वोट न देने का फैसला कर चुके थे । शायद किसी ने उनसे चुगली कर दी सो भगवान इंद्र को भी जल्दी समझ में आ गया कि भारत में लोक तंत्र है और आजकल लोग कुछ ज्यादा ही जागरूक हो गये हैं सो रिसर्व वाटर का ढक्कन खोल दिया और बदरा जम कर बरसने लगे। सच्ची बताउँ कई रिश्तेदारों से बात चीत हुई तो बताया भैय्या कई दिनों से एक ही कच्छे में विचरण कर रहे हैं, सुसरा सूखता ही नहीं है। सूरज निकलता नहीं और बारिश रुकती नहीं और दामिनी की अपनी इच्छा आए तो दस घंटे और न आए तो घंटा घंटा।
यहाँ हैदराबाद में तो पिछले तीन बरस से बादल कुछ ज्यादा ही बरस रहे हैं, ऑफिस के लोगां और कुछ अच्छे दोस्तां ताना मारते हैं कि भैय्या जब से तुम्हारी चरण रज इस हैदराबाद की धरती पे पडी है इंद्र भगवान कुछ ज्यादा ही मेहरबान हो गये हैं। सर्दी भी औसत से ज्यादा ही सता रही है। खैर शुक्रवार को GHMC ने 20 तारीख तक के लिए येलो अलर्ट जारी किया है। येलो मतलब बारिश पडेगी तो पडेगी नहीं पडी तो जय श्रीराम्। तो साह्ब शुक्रवार को दामिनी भी तडक भडक के साथ गरजी (शायद कहीं गिर भी गई हो) और लगभग पूरी रात बदरा जम के बरसे भी। शनिवार सुबह टी0 वी में उसी अंदाज़ में रिपोर्टर चीख चीख के बतलाए जा रहे रहे थे कि शहर के किन किन स्थानों पर जल भराव हुआ है कुछ बेचारे GHMC की कार्य प्रणाली को भी कोस कर अपने प्रदर्शन में सुधार करने की कोशिश कर रहे थे।
पिछले लगभग दो माह से अपने साथ भी कुछ अजब गजब चल रहा है समझ नहीं आ रहा कुछ लोगों के अच्छे बुरे कर्मो का फैसला भगवान पर छोड दें (जो आज तक करते आए हैं) या फिर कभी लगता है कि शायद भगवान ने कुछ लोगों को सबक सिखाने का माध्यम हमें ही बनाया हो और हम अपनी आदत के अनुसार सब भगवान पर छोड दिये जा रहे हैं। (वो भी किस किस के कर्मो का फैसला करेगा) खैर इसी उधेडबुन में थे कि मोबलिया घनघना उठा। चिरपरिचित आवाज़ सुनी “ गुड बॉय देखने चलेंगें” हम तो दो महीने से भरे बैठे हैं सो हमने भी आदतन उनको अपने अंदाज़ में जवाब दे दिया” चलेंगे क्या किसी का गुड बॉय कर दें क्या” उधर से हें हें करके हँसने की आवाज़ आई फिर बोले अमिताभ और रश्मिका मंधाना की फिल्म है कल ही रिलीज़ हुई है अभी टीज़र देखा है। जब दिमाग पे तनाव ज्यादा बढता है तो मैं या तो कॉमेडी फिल्म देखता हूँ या 11 नम्बर की बस ( पैदल पैदल) का इस्तेमाल कर कई कई किलोमीटर चलता रहता हूँ जब तक थक न जाउँ। सो ये सोचकर गुड बॉय कॉमेडी फिल्म होगी मैंने हाँ भर दीं। रविंद्र भारती में लीड इंडिया फाऊंडेशन भारत रत्न डॉक्टर अब्दुल कलाम के जन्मदिन पर एक विशेष कार्यक्रम कर रहा था सो पहले उसे अटेंड किया फिर कुछ खाया पिया और 1.30 बजे इर्रम मंज़िल स्थित मॉल में पहुँच गये।
एक वाहयात गाने के साथ फिल्म की शुरुआत होती है। कुछ ही देर में नीना गुप्ता जो कि अमिताभ बच्चन की पत्नि का किरदार निभा रही हैं की मृत्यु का समाचार अमिताभ रश्मिका मंधाना को देने का प्रयास करते हैं किंतु वो कान फोडू संगीत के साथ वाइन गटकती हुई नज़र आती हैं। अगले दिन अमिताभ के साथ उनका फोन पर वार्तालाप/व्यव्हार (वे ऑफ टॉकिंग) ये प्रदर्शित करता है कि आजकल के 99 प्रतिशत बच्चों को माँ बाप की कितनी परवाह है। घर में एक मात्र ऐसी लडकी जिसे नीना गुप्ता नोर्थ ईस्ट से लाकर अपने साथ रखती हैं का नीना व अमिताभ के प्रति कितना अधिक अटैचमेंट होता है वो उन पाँच बच्चों में से एक है जो कि अमिताभ और नीना के साथ रहती है। खैर एक लडका जो विदेश में है के लिए कम्पनी का प्रोजेक्ट अहम है वो तय नहीं कर पा रहा कि माँ की मृत्यु ज़रुरी है या कम्पनी का प्रोजेक्ट्। एक लडका जो सरदार है वो भी विदेश में है किंतु जैसे तैसे दुबई के रास्ते आने की कोशिश कर रहा है। एक लडका नकुल जिसका फोन नहीं लग रहा है सो हारकर धर्म बेटी उसको एक मैसेज करके छोड देती है। आशिष विद्यार्थी सिंह साहब की भूमिका में ये बताने की कोशिश करते हैं कि ऐसे समय में क्या करना है और क्या नहीं करना है। नीना गुप्ता की डेड बॉडी घर के बाहर के बरामदे में रखी है। उस बॉडी को पूरब दिशा में रखना है या उत्तर में वहाँ उपस्थित हुज़ूम समझ ही नहीं पा रहा है। मुझे अकस्मात “जाने भी दो यारों” की याद ताज़ा हो आई जिसमें नीना गुप्ता एक अहम किरदार में थीं और सतीश शाह की डेड बॉडी के साथ क्या क्या प्रयोग किये जाते हैं। इसी डेड बॉडी संग एक लम्बे सीन पर पूरी फिल्म का पूरा दारो-म-दार टिका हुआ था। इन सबके बीच रश्मिका मंधाना का हर रीति रिवाज़ में लॉजिक ढूँढना या ये बताने की कोशिश करना कि नीना गुप्ता मेरी भी माँ थी और वो कैसे मरना चाहती थीं पर अमिताभ संग काफी तीखी बहस होते दिखाया गया है। फिल्म देखते देखते सनातनी लोगों को लगेगा कि इस फिल्म के द्वारा हमारे रीति रिवाज़ों पर कुठाराधात किया गया है किंतु......
फिल्म का टर्निग़ पॉइंट सुनील ग्रोवर की एंट्री से होता है जो एक पढा लिखा और विचार शील, तर्कवान कर्मकाण्डी पंडित की भूमिका में है। हरिद्वार हर की पैडी की घिचपिच का अच्छा चित्रण किया गया है। कर्मकाण्ड के बाद पंडित जी का छोले भटूरे खाने का आग्रह करना और ये बताना कि पेट की क्षुधा शांत होगी तभी सब काम ठीक प्रकार सम्पन्न होंगे। सुनील ग्रोवर किस तरह रश्मिका मंधाना के उल जलूल प्रश्नों के उत्तर बडी तार्किकता के साथ देता रहता है जिससे धीरे धीरे रश्मिका को अपने अधकचरे ज्ञान का अहसास होता है और वह सनातन धर्म संसकृति को धीरे धीरे ही सही समझने लगती है। एक सीन बडा मजेदार है जब हर की पौडी पर सुनीन ग्रोवर कहता है कि बडे लडके को (जिसने क्रिया सम्पन्न की है) को अपने बालों का त्याग करना होगा।बडा लडका जो अभी तक रश्मिका मंधाना ओ रीति रिवाजों क्यूँ ज़रुरी है के लिए ज्ञान बाँट रहा होता है वो बाल न कटवाने के लिए नाना प्रकार के बहाने ढूँढता है क्यों कि उसे लगता है गंजा होने पर वो कम्पनी के प्रजेंटेशन कैसे देगा। बाल कटवाने क्यूँ ज़रुरी है इस बात को काफी अच्छे से समझाया गया है।
अंत आते आते तीन में से दोनों भाई (सरदार को छोडकर) समझ आने पर अपनी इच्छा से बालों का यानि अहम का त्याग करते दिखाये गये हैं। इस फिल्म का एक छुपा हुआ पहलू यह भी है कि पाँचों बच्चे ( तीन लडके, दो लडकी) अमिताभ और नीना गुप्ता द्वारा अडॉप्ट किये जाते हैं। मुझे लगता है आज के दौर में जब फिल्म निर्माण पूर्णतया एक व्यापर हो गया है। कार्पोरेट घरानों द्वारा सिर्फ पैसा कमाने के उद्देश्य से ही ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों के साथ हद से ज्यादा छेड छाड की जा रही है,जिसका जागरुक दर्शक द्वारा ऐसी बेतुकी फिल्मों का बहिष्कार करके ऐसे निर्माताओं को सबक सिखाने का प्र्यास किया जा रहा है। गुड बॉय हिन्दी फिल्मों के निर्माताओं के लिए एक दर्पण साबित होगी।
-प्रदीप देवीशरण भट्ट- 17.10.2022
Tuesday, 27 September 2022
"सब कुछ ठीक नहीं है"
रिपोतार्ज़
“सब कुछ ठीक नहीं है”
फेस बुक फेस बुक भी है फेक बुक भी है, जिन्होने
भुगता है वो जानते हैं। अपने अपने फालोवर बढाने की एक अंधी दौड में लगे हुए हैं
कुछ पुरुष मित्रों को तो नहीं अपितु महिला मित्रों से ये बात अवश्य साझा की व आगाह
किया कि सिर्फ अपने परिचित की फोटो देखकर ही फ्रेंड रिक्वेस्ट न स्वीकारें। कुछ
फेक चेहरे लगाकर भी फेस बुक पर एक्टिव हैं। पता नहीं उन्होंने मेरी बात को कितनी
गम्भीरता से लिया है या नहीं भी। जाने अंजाने में बिना खोज बीन के मैं रिक्वेस्ट
एक्सेप्ट नही करता हूँ फिर भी गलती है हमसे भी हो जाती है और फिर कुछ दिनों बाद उन
सज्जन या सज्जनी को ब्लॉक ही करना पडता है। कुछ लोग मेसेंजर पर शिकायत भी करते हैं
“आप अपने आप को क्या समझते हैं ........... ......वगैरह
वगैरह” अब उन्हें कौन बताए भैय्या फेस बुक की निर्धारित लिमिट से आगे जाया नहीं जा
सकता। और कुछ बंदे या बंदी तो औसतन माह में चार पाँच सीधे मेसेंजर कॉल ठोक देते
हैं। शुरु में उठाया फिर जब शिकायत का सिलसिला चल निकला तो हमने बताया फेस बुक की
लिमिट हमारे हाथ में नहीं है तो तुरंत सुझाव आप किसी को अन फोलो कर दीजीए हमें जोड
लीजिए। न तो स्वंय किसी रिश्ते में गम्भीर हैं न चाहते और कोई रहे, आज अगर मैं किसी और को निकाल कर उन्हें एड कर लूँ तो कल उन्हें भी तो
निकाल सकता हूँ, लोग समझते ही नहीं, माना
ये आभासी दुनियाँ है किंतु रिश्ते तो रिश्ते हैं। ऐसा कई बार हो चुका है इसलिए
मेसेंजर कॉल उठाना ही बंद कर दिया है। लेकिन ऐसी स्थिति आने पर एक बार गलतफहमी
होनी स्वाभाविक है “ कहीं अपुन भगवान तो नहीं हो गये” खैर जोक सपाट्। इस आभासी
दुनियाँ के कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी हैं जो हमें झेलने ही पडेगें। अब फिर
वो चाहे फेसबुक हो अन्य सोशल मीडिया के फन्ने खाँ। खैर अब असली मुद्दा।
अप्रैल माह में नेपाल जाने से पूर्व
राजपाल जी से उनके गुङगाँव स्थित आवास पर मिलना हुआ। उन्होंने दो आग्रह किये कि आप
नीरव जी से अवश्य मिले जिसे मैंने नेपाल के साहित्यिक प्रवास के बाद पूरा किया और
दूसरा आग्रह आगमन से जुडने का। मैं काफी मंचो से जुडा हूँ और आगमन से जुडने का
प्रस्ताव मुझे 2020 में मेरी एक साहित्यक मित्र ने दिया था जिसे मैंने अपनी
व्यस्तता का हवाला देते हुए क्षमा माँगते हुए मना कर दिया। किंतु अब लगभग दो वर्ष
बाद फिर आग्रह। खैर एक दिन पवन जैन जी का फोन आया और जब उनका परिचय प्राप्त हुआ तो
मैंने तुरंत हाँ कर दी। कुछ दिनों बाद पवन जी ने सूचना दी कि 18 सितम्बर-2022 को देल्ही में आगमन के दसवें स्थापना
दिवस पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं अगर आप विशिष्ट अतिथि के तौर पर
कार्यक्रम में शिरकत करें तो प्रसन्नता होगी। मैंने अपने परिचितों से फोन कर पूछा
तो एक को छोडकर सबने कहा देखेंगें । वास्तव में बच्चे के Exam छोडकर उन एक मात्र मित्र का इस कार्यक्रम में सम्म्लित होना ठीक भी नहीं
था। खैंर 17 सितम्बर की सुबह 07:15 की
हैदराबाद से राजधानी पकडी और नाश्ता करके बी पी की गोली खाई और सो गये ।सामान्यत:
मैं दिन में कभी नहीं सोता चूँकि पूरी रात प्रवचन सुनते बीती तो सो गये। उठे तो
पाया मोबालिया को चार्जिंग पे लगाया, फ्रेश होने गये,
खाना खाया तब तक 2:20 हो गये थे, बस यूँ ही कवि कैफे ग्रुप में नागपुर की साहित्यिक मित्र को उनकी पोस्ट की
कमेंट के साथ लिख मारा “ नागपुर के थाने दार साहब हम नागपुर से गुजरने वाले हैं”
इधर मेसैज उधर फोन, और फिर उनका आने के लिए कहना, हमने कहा 5 मिनिट्स के लिए 15-16 किलोमीटर से चलकर आना किंतु साहब थानेदार तो थानेदार ठहरे इधर 15:20
पर गाडी ने प्लेट्फॉर्म को छुआ और थानेदार साहब गेट के सामने।
उलाहना बनता था सो उन्होंने दिया। थोडी देर बार दूसरा मोबाईल चेक किया तो पाया
“ वो खास बन गया है जो महफिल में आम है” की मिस कॉल है वापिस किया
तो ....... अब मन पूरी तरह और ज्यादा खिन्न हो गया था ऐसा पहली बार हुआ जब मैंने 21
घंटे के सफर में किसी सह यात्री से बात नहीं की दो तीन ने कुछ पूछा
भी तो सलेक्टिड उत्तर देकर इति श्री कर ली। मन खिन्न होने के कारण “मौन सर्वार्थ साधकम” अपना लिया।
खैर अगले दिन सुबह 05:34 पर ट्रेन निज़ामुद्दीन स्टेशन पहुँच गई, ऑटो लिया और
सीधे पवन गोयल साहब के दर पर (देल्ही छोडे सोलह बरस हो गये, पहले
मुम्बई से आते या जाते हुए हॉल्ट अब हैदराबाद से, 42 बरस का
याराना है) फ्रेश हुए और 10:10 पर सीधे चौथे माले स्थित आगमन
के कार्यक्रम मे।पवन जी मुलाकात हुई, लखनऊ से पधारी रेखा
वोरा को देखना सुखद रहा उनसे जनवरी-2020 के कार्यक्रम में
जयपुर में मुलाकत हुई थी। धीरे धीरे लोग आते रहे तभी थपियाल जी से मुलाकात हुई
उनसे भी गोवा के कार्यक्रम में मुलाकत हो चुकी थी, नईम जी
नेपाल के महोत्सव में मिल चुके थे, निशा माथुर जयपुर,
और भी कई लोग जो मुझे पहचान रहे थे किंतु मैं उन्हें पहचान नहीं पा रहा
था। खैर 11 बजे शालिनी अगम द्वारा प्रथम सत्र का संचालन
सँभाला गया। माँ सरस्वती के चरण स्पर्श व ‘प्रदीप’ प्रज्व्व्लित करने का सौभाग्य
पाण्डेय जी व तुषा शर्मा के साथ मुझे भी मिला। प्रथम सत्र में जहाँ कार्यक्रम में
पधारे मुख्य व विशिष्ट अतिथियों को सम्मानित किया गया वहीं वागीश्वरी पत्रिका का
विमोचन भी किया गया। दूसरे सत्र की अध्यक्षता श्रीमती व श्री लक्ष्मी शंकर बाजपई
द्वारा की गई। सभी ने अपनी अपनी रचनाओं से समां बाँधा। मैंने भी अपना एक गीत “ आज
से मन ये मेरा तुम्हारा हुआ” पढी। कार्यक्रम का समापन राष्ट्र गान से हुआ। दूसरे
सत्र का संचालन अनुराधा पाण्डेय व मानसी जोशी ने सन्युक्त रुप से किया। कार्यक्रम
के बाद प्रिय पंकज चावला का बर्थडे मनाना यादगार रहा। एक बात जिसका ध्यान मैं सदैव
रखता हूँ कि जब भी स्टेज पर जाओ नंगे पैर ही जाओ।
अगले दिन एक विशेष कार्य का निपटान
करना था सो सुबह 11 बजे से रात 9 बजे तक बढिया वाली धूप
में सिकते हुए उस कार्य को पूर्ण किया। ये एक नया अनुभव था जिससे मैं पहली बार दो
चार हुआ किंतु संतोष की बात ये कि मैं अपने मिशन में कामयाब होकर लौटा। अगले दिन
मेरठ और इंद्र देवता ने मेरे पहुँचते ही सारी टोंटी खोल डाली, पानी रे पानी तेरा रंग कैसा की तर्ज़ पर्। एक दिन में तीन लोगों से मिलना
वो भी बारिश की छपाक के साथ्। इसका अलग ही आनंद है। अगले दिन की दो मीटिंग्स बारिश
की भेंट चढ गई। मुरादाबाद का कार्यक्रम भी इसी क्रम में रह गया। इंद्र देवता के
तेवर कम होने का नाम नहीं ले रहे थे, एक मित्र के आग्र्ह पर
शनिवार 4 बजे देह्ली में एक मीटिंग रखी चूँकि ट्रेन 19:50
की थी सो एक बजे मेरठ से बस पकडी, अंदाज़ा था 15:30
आई टी ओ पहुँच जायेंगे किंतु बारिश की गति को देखते हुए मित्र को
मना करना पडा और हम 16:00 बजे ही निज़ामुद्दीन स्टेशन पहुँच
गये। लगभग 4 घंटे स्टेशन पर बारिश अपने पूरे रौ में बरस रही
थी। खैर ट्रेन पकडी खाना खाया और सो गये फिर अगले दिन फिर वही मौन इख्तियार कर लिया,
मन को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था सो अगले दिन हैदराबाद ।काम करने
थे किये किंतु “ कोई मन का अगर न मिले जीस्त में, बात करने से भी मन उचट जाता है “ संतोष इस बात का रहा ट्रेन में एक छोटी
सी बच्ची बार बार अंकल अंकल कहकर अपनी तोतली भाषा में कुछ समझाती रही शायद मैं भी
उसकी बात समझ पा रहा था, बच्चे में भगवान जो बसते हैं। जय
श्री राम
-प्रदीप देवीशरण भट्ट-27:09:2022
Thursday, 18 August 2022
"चेन्नई आ रहा हूँ मैं"
कार्यक्रम पूर्व रिपोतार्ज़
प्रदीप बाबू बढिया है!!!
"चेन्नई आ रहा हूँ मैं"
“आजादी का अमृत
महोत्सव”
यानि
“शब्दाक्षर
साहित्यिक महोत्सव, चेन्नई"
सामान्यत: मैं किसी भी इवेंट के
समपन्न होने के पश्चात ही रिपोतार्ज लिखता हूँ। मुझे ये लिखने में कोई संकोच नहीं
कि जितनी तारीफ मुझे गीत गज़ल कविता या आर्टिकल के लिए मिलती है उससे कहीं ज़ियादा मेरे
रिपोतार्ज के लिए मिलती है। (कभी कभी आलोचना भी कि यार इस गीत/गज़ल /कविता या
आर्टिकल में मज़ा नही आया। किंतु संतोष की बात ये है कि रिपोतार्ज के विषय में आज
तक कोई आलोचना नहीं हुई वरन कुछ मित्र तो फोन करके पूछते हैं “अबे अगला कब लिख
रिया है” (मित्र ऐसे ही बात करते हैं, कमीने कहीं के) खैर पिछले वर्ष
सितम्बर माह में ज्योति नारायण जी का फोन आया नमस्कार चमत्कार के बाद बोलीं “ आप
अपना एक चित्र व परिचय मुझे तुरंत भेज दें। पिछले साढे तीन वर्ष के हैदराबाद
प्रवास में काफी सारे साहित्यिक मित्रों से मिला हूँ ज्योति जी का सद व्यव्हार
काबिले तारीफ है। इसलिए बिना किसी ना नुकुर के तुरंत ही दोनों चीज़े भेज दी गईं।
कुछ दिनों बाद ही उनका फोन आया कि 29 सितम्बर-2021 को शब्दाक्षर की मीटिंग घर पर
ही रखी है आपको संगठन मंत्री बनाया गया है। कैलेंडर पर निगाह दौडाई तो पाया बुद्द्वार
है किंतु आदेश की अवहेलना तो अपने बस की बात न थी सो एक ठो सी एल ली और पहुँच गये।
बढिया माहौल में सरस्वती वंदना के साथ मीटींग शुरु हुई और रुचिकर रात के खाने के
साथ सम्पन्न ( अब हैदराबाद में देल्ही स्टाइल का खाना मिल जाए तो बल्ले बल्ले होनी
स्वाभाविक है)
तभी कोरोना ने देश के दरवाजे पर पुन:
दस्तक दी तो मीटिंग्स का सिलसिला वर्चुअल हो गया किंतु मीटिंग रुकी नहीं। मुझे याद
है 15 मार्च की मीटिंग्स,
जिसमें मुझे अध्यक्ष का दायित्य सौंपा गया। सांय 7 बजे से रात्रि 11.30 बजे तक
मैराथन मीटिंग चली किंतु अच्छी बात यह है कि सभी ने साहित्यिकआन्नद की अनुभूति प्राप्त
की। अप्रैल के अंतिम सप्ताह में मैं नेपाल
एक साहित्यिक कार्यक्रम में सम्म्लित होने के लिए गया था। देल्ही वापिस आने
पर सूचना मिली कि चेन्नई में अगस्त के
प्रथम सप्ताह में “शब्दाक्षर साहित्य महोसव” का भव्य आयोजन किया जा रहा है।
सहभागिता हेतु निमंत्रण भी था। सो हैदराबाद आने के बाद सबसे पहले जो काम किया वो
था टिकिट बुकिंग का। चूँकि शुक्रवार होने के कारण अवकाश लेना सम्भव नहीं था सो 5 अगस्त की सांय छ: बजे का टिकिट किया और वापिसी
का नौ अगस्त का।
अब बात करते हैं इस आयोजन की जिस
प्रकार से शब्दाक्षर के कर्मठ पदाधिकारी निस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएँ दे रहे हैं
वो काबिले तारीफ है प्रिय सागर शर्मा हों या निशांत सिंह ‘गुलशन’ (उपनाम के
अनुरुप) केवल कोठारी जी हों या रवि प्रताप सिंह जी या फिर ज्योति नारायण जी या फिर
अन्य वो मित्र जो किसी न किसी रुप में इस साहित्यिक महोत्सव में अपना सहयोग दे रहे
हैं ( जैसे रामसेतु के निर्माण में नर हो या वानर या हम जैसी चिखूरी) वह अनुकरणीय है।
अंत में इस वर्ष भारत अपनी स्वतंत्रता के 75
वर्ष मना रहा है। तो फिर हम क्यूँ पीछे रहें, सो हम यानी शब्दाक्षर के सभी मित्र गण शब्दाक्षर के “चेन्नई-साहित्यिक
महोत्सव” को “आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत” अभूतपूर्व बनाने का अवश्य
प्रयत्न करेंगे।
तो आईये मिलते हैं चेन्नई के लश
गार्डन रिसोर्ट, में 6 7 व 8
अगस्त-2022 को और मचाते हैं धमाल।
जय श्री राम!!!!!
-प्रदीप देवीशरण
भट्ट-03.08.2022
उपाध्यक्ष, “शब्दाक्षर”, तेलांगना
ईकाइ, हैदराबाद
"चेन्नई जा रहा हूँ मैं"
रिपोतार्ज़
“चेन्नई जा रहा हूँ मैं”
-खुबसूरत यादों और अहसासों को समेटे-
5 अगस्त को चारमीनार एक्स्प्रेस से
हैदराबाद डेक्कन रेलवे स्टेशन से सायं 6 बजे प्रस्थान कर बिना किसी विघ्न बाधा के
चेन्नई के ताम्बरम रेलवे स्टेशन सुबह 8:10 पहुँच गये। वहाँ पहले से ही गोवा की टीम
प्रतीक्षारत्त थी । टैक्सी की व्यवस्था कोठारी जी द्वारा पहले से ही कर दी गई थी
सो लगभग एक घंटे बाद लश गार्डन जो कि चेन्नई सेंट्रल से लगभग 40 किलोमीटर है पहुँच
गये। रुम अलॉट्मेंट के बाद पता चला कि एक रुम में तीन लोगों की व्यव्स्था की
गई। मेरे रुम पार्टनर में एक सज्जन कानपुर
व दूसरे सज्जन राजस्थान से, दोनों
लगभग 25 बरस के रहे होंगे। नमस्कार के
उपरांत मैं फ्रेश होकर कार्यक्रम स्थल पहुँचा तो बताया गया हुज़ूर पहले पहले पेट
पूजा (नाश्ता) कर लें। जब नाश्ते में छ: सात: आइटम हों तो सोचिए लंच और डिनर में
कितने होंगे। सो पेट पूजा के पश्चात मीटिंग हाल में पहुँचा, कुछ
ही देर में सरस्वती वंदना से कार्यक्रम की शुरुआत हो गई। पहला सत्र सम्मान समारोह
में गुजरा तत्पश्चात लंच के बाद दूसरा सत्र लगभग 3 बजे प्रारम्भ हुआ। गज़ल सत्र में
औरों के अतिरिक्त हमने भी अपनी एक गज़ल “संग संग तेरे चलना चाहूँ,
चल न पाऊँ, क्या बोलूँ” पढी। दूसरा सत्र सांय को लगभग
9:30 बजे समाप्त हुआ। घोषणा हुई डिनर के बाद मीटींग हाल के सामने वाले हाल में फिर
महफिल जमेगी, सो 11 बजे महफिल फिर जमी, उस महफिल का अध्यक्ष हमें बना दिया गया। लगभग ढाई बजे अध्यक्षीय टिप्प्णी
के बाद हमने अपने लिखी गज़ल “ बेवजह खुर्शीद पर उँगली उठाया मत करो, खाक हो जाओगे तुम नज़रें मिलाया मत करो” पढकर महफिल की बर्खास्तगी की घोषणा
की फिर उन्नीदें से होकर हम अपने रुम की ओर चल पडे, नॉक किया
राजस्थानी मित्र ने दरवाजा खोला, दोनों ही मित्र आराम से बेड
पर सोये हुए थे मेरी उपस्थिति से दूसरा मित्र भी जाग गया। इससे पहले कि वो कुछ
कहते मैंने स्थिति को भाँपते हुए कहा “ आप दोनों ऊपर पलंग पर ही सोयेंगे और मैंने
तुरंत कपडें चेंज करते हुए गद्दा बिछाया और ये लो जी पाँच मिनिट में ही निंद्रा
रानी की गोद में सर रखकर सपनों में खो गये।
अगली सुबह दोनों मित्रों के चेहरों
पर कुछ उलझन के भाग देखे तो पूछा तबियत किसकी गडबड है, कानपुर वाले मित्र बोले, सर हमें कल से बुखार है, हमने ठीक है, यहाँ से प्रस्थान तक आप पलंग पर ही
सोयेंगे, फिर कुछ और बातों का सिलसिला चल निकला, या यूँ कहूँ कि वरिष्ठ होने के नाते उन्हें कुछ समझाया भी ताकि उनकी
हिचकिचाहत दूर की जा सके। थोडी देर में ही दोनों मुस्कुराते हुए जवाब देने लगे। ये
एक शुभ संकेत था। फ्रेश हुए नाश्ता किया और पहुँच गये कार्यक्रम स्थल दूसरा तीसरा
सत्र गीत सत्र था जिसमें से हमने स्वंय ही नाम वापिस ले लिया। ऐसा करके हम किसी पर
अहसान नही जताना चाहते थे बल्कि हमारा मानना है कि ये क्या ज़रुरी है कि हर कवि हर
सत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए ही। ऐसे कितने ही कवि हैं जिन्हें यदा कदा ही
मंच मिलता है तो उन्हें मौका मिलना चाहिए था किंतु अफसोस दिल गड्डे में। दो चार को
छोड दें तो ऐसा प्रतीत होता हुआ जैसे
सबके पेट मेंंअफारा हो रहा था। बस एक ही लगन ज्यादा से
ज्यादा कविताएं सुना डालो। खैर जैसी प्रभु की इच्छा। लंच के बाद दो खूबसूरत सत्र
एक छंद/दोहे/मुक्तक का जिसमें मुझे अतिथि के तौर पर मंच पर सम्मान दिया गया किंतु
मैंने यहाँ भी कार्यक्रम अध्यक्ष श्री भदोरिया से स्वंय कुछ भी प्रस्तुत न करने के
लिए माफी माँग ली। अगला सत्र छंद मुक्त कविताओं/अतुकांत कविताओं का था जिसका मैंने
भरपूर आंनद लिया।एक से बढकर एक प्रस्तुति।
ऐसी कविता जो किसी बंधन की मोहताज़ नहीं । कविता दिल से लिखी, दिल से पढी, और दिल
तक जा पहुँची। यही तो कविता का धर्म है। अंतिम सत्र चूँकि कवि सम्मेलन का था इसलिए
देर होती देख तय किया गया कि ये सत्र डिनर के बाद कल वाली जगह पर आयोजित होगा। ये
सत्र 8 अगस्त की सुबह लगभग तीन बजे तक चला।
फ्रेश हुए नाश्ता किया और 11 बजे के लगभत दो बसों में सवार
होकर शब्दाक्षर परिवार महाबलीपुरम के लिए प्रस्थान किया, पौराणिक काल के मंदिर देखे,कोवलम बीच पर मस्ती की और सांय 8 बजे के लगभग बैक टू दी पैविलियं। डिनर के
बाद महफिल फिर जमी और लीजिए हुज़ुर 8 अगस्त की रात्रि 11 बजे से 9 अगस्त की प्रात:
तक जोरदार कवि सम्मेलन हुआ। कुछ लोग तो फ्रेश हुए उड लिए एअर पोर्ट के लिए। मैं भी
लगभग 9 बजे फ्रेश होकर उसी स्थान पर मय सामान के हाज़िर हो गया। आदेश ऐसा ही था कि
सुबह फ्रेश होकर मय सामान के नियत स्थान पर सभी हाज़िर रहें, गाडियों
की व्यव्स्था पहले ही की जा चुकी थी। नाश्ता से फ्री होकर फिर से महफिल जम गई इस
बार संचालन मेरे हाथ में था। लोग आते गये कवि कारवाँ जमता गया। राऊंड द क्लॉक की
तर्ज़ पर मैंने संचालन सँभाला एक के बाद एक कवि पढते गये। तभी रवि प्रताप सिंह,
राष्ट्रीय अध्यक्ष भी पधार गये। महफिल आगे बढी, किन्हीं सज्जन ने दखलंदाज़ी की तो मैंने उन्हें विनम्र्ता से समझा दिया “
देखिए हुज़ुर इस अनौपचारिक सत्र का संचालन मैं कर रहा हूँ। बारी आने पर ही कविता
पढनी होगी इससे पूर्व कदापि नहीं। कृपया मर्यादा का पालन करना सीखें। शायद उन्हें
अच्छा न लगा हो किंतु मैं चाहता हूँ कि कुछ लोगों को ऐसे आयोजन से कुछ तो सीखना
चाहिए। देश के लगभग हर कोने से लोग पधारें हैं अब अगर हर व्यक्ति इस प्रकार का
व्यवहार करेगा तो कैसे होगा। 6,7,8 व
नौ अगस्त तक का आधा दिन गीत, गज़ल,मुक्तक,
छंद की प्रस्तुति व व्याख्या साथ ही हल्की फुल्की चुहल बाजियों में
निकल गया। हमने भी 1:45 बजे सामान लपेटा और एक अन्य साथी के साथ चेन्नई सेंट्रल के
लिए निकल पडें। समय से काफी पहले पहुँच भी गये।
अंतिम पैरा लिखने से पूर्व अगर मैं
चंद खूबसूरत लोगों के विषय में कुछ न कहूँ तो मेरी कलम का कोई फायदा नहीं। रवि
प्रताप सिंह जो शब्दाक्षर के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, उनकी कविताएँ माशा अल्लाह, संचालन बेहद
उम्दा, दोनों में ही गाँव की महक के दर्शन कराने का उनमें
उत्तम गुण है। दयाशंकर मिश्र जी, राष्ट्रीप कोषाध्यक्ष,
सौम्य हैं सरल हैं, कविताओं पर अच्छी पकड है।
केवल कोठारी जी जो शब्दाक्षर के तमिलनाडू के प्रांतीय अध्यक्ष हैं, इनके बारे में क्या कहूँ। सभी उनका गुणगान कर रहे हैं। गुस्से को गुस्सा
आता है किंतु कोठारी जी को नहीं। सहृदय, एकला चलो का पाठ
पढाते हुए। बचपन से सुनते आ रहे हैं अकेला चना भाड नही फोड सकता , लेकिन मुझे शब्दाक्षर के इस कार्यक्रम के विषय में यह कहने में कोई संकोच
नही कि कोठारी जी नामक चने ने अपना सब कुछ झोंक दिया। मैं हमेशा कहता हूँ अगर बडे
हो तो बडे के जैसे काम भी करने चाहिए” कोठारी जी इस उक्ति पर सौ फीसदी खरे उतरते
हैं। मैंने अपने अभी तक के जीवन में 2-3 लोगों में ऐसी कर्मठता देखी है।है। केवल
अर्थात मात्र/शुद्ध्। मुझे आपका सानिध्य मिला मैं इससे अभिभूत हूँ। ज्योति नारायण
जो तेलांगना प्रदेश की अध्यक्ष है, मैं उनसे पिछ्ले तीन
वर्षो से परिचित हूँ।सौम्य, मृदु भाषी, बच्चों जैसी खिलखिलाहट की स्वामिनी। प्रिय अजय श्रीवास्तव, विश्वजीत
शर्मा जी, प्रिय शिल्पी या सुनीता जी प्रिय वंदना, वर्षा, दत्ता प्रसाद जोग,रीटा
सहगल,उमेश सहगल, प्रिय रुहानी, कुसुम, अंजु छारिया जी, श्रीमती
त्रिवेदी, सी0 ए0 ,अमन शुक्ला, महावीर सिन्ह वीर, कनक लता तिवारी जी, अन्नपूर्णा,आलोक जायसवाल,राज
कुमार महोबिया,श्यामल मजुमदार दादा,सुबोध
मिश्र, कुछ और मित्र भी जिनका नाम स्मरण नहीं हो पा रहा है।(
अभी इन तीनों ने पूरी तरह पिंड नहीं छोडा है शायद इसलिए) प्रिय सागर एवम निशांत की
मेहनत के बिना ये महोत्सव महोत्सव जैसा नही होता, नई पीढी के
बच्चे हैं। तकनीक का सुंदर प्रयोग जानते हैं। इन दोनों को विशेष स्नेह्। एक सुंदर
आयोजन के लिए सभी का सह्योग रहा। सिर्फ
कविता पढना या सुनना आवश्यक नहीं है वरन इस तरह के आयोजन से हम उन लोगों से मिलते
हैं जिन्हें वर्चुअल के माध्यम से पहचानते हैं या नहीं भी। इस महोत्सव की एक बडी
उपल्ब्धि या ये कहूँ तो ज्यादा श्रेयस्कर होगा कि विशेष उपल्ब्धि ये रही की
शब्दाक्षर ने नई पीढी के लिए मंच प्रदान किया जो साहित्य के लिए शुभ संकेत है।
थ्रोट इंफेक्शन बुख़ार बॉडी पेन
जाने कब से घात लगाए बैठे थे ,या यूँ कहूँ तो ज़ियादा बेहतर होगा कि मैं इन्हें appointment
नहीं दे रहा सो ये तीनों गुस्से में थे। तीन दिवसीय साहित्य
महोत्सव में तो इन तीनों क़ी हिम्मत नहीं हुई शायद भीड़ देखकर घबरा गए हों या डर रहा
हो अगर इस बंदे को छेड़ा तो 72 कवि अपनी कविताएं सुनाकर उन्हें ही न बीमार कर
दें।एक क़े हिस्से में लगभग 25 कवि 😜किंतु परसों जैसे ही मैं रेलवे स्टेशन पहुँचा तीनों घेर लिए
बहुत अनुनय विनय क़ी पर ससुरे माने नहीं रात भर बहुत तंग किया वो तो भला हो हमने
हैदराबाद प्रस्थान से पूर्व ही डोलो क़ी ठो गोली रख ली थीं सो सात बजे ही निगल ली
और कंबल खींचकर सोने का प्रयास किया किंतु अफ़सोस दिल गड्ढे में। राम राम करते
सुबह ट्रेन ने 05:35 पर हैदराबाद डेक्कन का प्लेटफार्म छुआ तो जान में जान आई।
जैसे ही प्लेट्फार्म पर कदम रखा तो ठंटी बयार ने जोरदार स्वागत किया, अनुमानत: 35-40 किलोमीटर प्रति घंटे की
रफतार रही होगी। वो तो भला हो हमारे बैग का जिसका वजन हमें हमें सँभाले रखा वरना
बिना ऑटो के ही घर पहुँच जाते।ख़ैर अब घऱ पर आराम फरमा रहें है। थोड़ा आराम है किंतु
जब खाँसी आती है तो पूरी बॉडी कभी शेर कभी मुक्तक कभी कविता कभी ग़ज़ल क़ी तरह पटक
पटक क़े प्यार देती है।
कित्ता आनंद आ रहा है 😜😜😜
-प्रदीप देवीशरण
भट्ट-12.08.2022
उपाध्यक्ष, “शब्दाक्षर”, तेलांगना ईकाइ, हैदराबाद




