Monday, 20 July 2026

"एक थाली के चट्टे बट्टे यानि तिलचट्टे"


"हिट करेगी फिट"
चट्टे बट्टे यानि तिलचट्टे 

         तू कौन कि मैं खां म खां, तो चल मेरे संग मिलकर करेंगे तिलचट्टा पार्टी।  बात तो हास्य की है लेकिन इसमें इस बार व्यंग्य का तड़का लगा हुआ है। मई में चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया ने व्यंग्य के तौर पर बेरोजगारों को कॉकरोच कह दिया। बस भाई साहब कुछ देश में और कुछ विदेश में बैठे खां म खां के लोगों को इसमें अपना राजनीतिक अस्तित्व नज़र आने लगा। आनन फानन में कुछ घमौरी टाइप लोगों ने इसका खाका तैय्यार किया और सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा दी। वैसे भी विपक्षी पार्टियों के कुछ नेताओं को सोशल मीडिया पर ही बाल्टी बाल्टी खेलने में मज़ा आता है और शाम होते ही "सूरज अस्त नेता जी मस्त" की तर्ज पर नेता जी बाल्टी भरकर भरकर दारू पार्टी करते हैं। कई बरस पहले (अब इत्ते ज़्यादा बरस भी न हुए हैं हां नई तो), एक वित्त का आदमी अपनी वित्तई दिखाता और सबको ठेंगा दिखाता हुआ एक नई पार्टी बना लेता है और आश्चर्य लोगों के बीच छा भी जाता है और भाई साहब कभी रो के कभी पिट के या ख़ुद को पिटवा के आम आदमी को बिना नमक मिर्च लगाए साबुत निगल भी जाता है। अब उसी छद्म पार्टी से प्रेरणा लेकर एक तिलचट्टा जो कभी उस छद्म पार्टी का समर्थक था किंतु परंतु लेकिन उस छद्म पार्टी के लकड़बग्घे को अपना आदर्श मानता था, हित न सधने पर उसे खूब गरियाता है और फिर निराश होकर विदेश में जा बसता है। वक़्त का पहिया घूमता है और लकड़बग्घे नामक नेता की बग्गी निकल कर दूर जा गिरी अगर कुछ बचा तो लकड़ और उसके साथ कभी ख़त्म न होने वाली अकड़। तो भाई साहब उन साहब को आज की तारीख़ में सब अकडुद्दीन बोलते हैं। हंसो मति महाराज अगर सिर्फ अकड़ लिखेंगे तो न पकड़ लोगे इसलिए अकडुद्दीन ही ठीक है। अब इन्हीं अकडुद्दीन की बुआ का लड़का जो विदेश में जा बसा था अजी वही दीमक तिलचट्टा। सो भाई साहब हारे महिया के साथ अटरू मटरु  को मिलाकर तिलचट्टा गैंग ने दो चार लाख डॉलर कुछ करम जले भी और नासपीटे भी से समेटे और तिलचट्टा कैंपेन चालू । फ़ॉलोअर बढ़े तो हसरतें बढ़ी और लो जी तिलचट्टा गैंग ने एक पार्टी बना डाली और अंग्रेजी मिश्रित नाम रख दिया कॉकरोच जनता पार्टी । अब विपच्छ में तो कछु बचा न है सो बीजेपी से मिलता जुलता नाम रखकर ही वैतरणी पार करने की सोची तिलचट्टों ने।

          यूँ तो सदियों से अज्जी मतलब जब से मैकाले भैय्या की पद्धति से शिक्षा का चलन हुआ है तब से म्हारे देश में वो भी लेफ्टिस्टों के भरोसे रिक्शा रूपी शिक्षा एक दूसरे से क़दम ताल मिलाकर चले जा रही हैं।  ये पेपर सैटिंग, अपनों के लिए कुछ अपना पन दिखाते हुए कुछ करमजले नेताओं की बदौलत कुछ तिलचट्टे पहले भी ऐसी खुराफातें करते रहे हैं और आज भी अपने पैतृक काम की विरासत को संजोय हुए हैं। पेपर की सेटिंग से लेकर लीक तक सब कुछ इत्ता करीने से होता था कि मजाल है इसकी ख़बर मीडिया में आ जाए। वैसे भी संबंधित को चढ़ावा टाइम पे मिल जाए तो लीक को बाकायदा क्रिकेट लीग की तरह चलाया जा सकता है। बस इक्का दुक्का केस छोड़ दो मियां। लेकिन बुरा हो इस तिलचट्टे सोशल मीडिया का जिसमें टेलीग्राम प्रमुख है ने सब गुड़ गोबर करके रख दिया। भाई साहब चढ़ावे का खेल इत्ता पॉवर फुल है कि हर साल दस पांच बच्चों की बलि लेकर भी ये खेल बदस्तूर जारी है। लेकिन मजाल है किसी के कान पे जूं भी रेंग जाए। अब जूं है ज़रूरी है रेंगे ही दौड़ लगाकर कुछ खुजली वालों के सर में भी घुस सकती है। 

         अब पार्टी बनी तो कुछ तो करना था सो सोशल मीडिया से इतर कुछ करने की खुजली मची और एजेंडा ढूँढते तीन एजेंडों पर सहमति बनी। पहली मांग नीट की परीक्षा नीट एंड क्लीन क्यूँ नहीं हुई, बच्चों ने आत्महत्या की है उन्हें एक करोड़ रुपये दो तीसरा प्रधान साहब इस्तीफ़ा दो और लो जी पहुंच गए सगरे जंतर वाले मंतर पर। अब जंतर मंतर वो जगह है जहां साउथ इंडियन फ़ूड जबरदस्त वाला मिलता है। बाजू में केरल हाउस है न और वहां तो सामान्य दिनों के अलावा शनिवार रविवार को ज्यादा भीड़ रहती है मतबल 200-250 आदमी आम तौर पर दिखाई दे ही जायेंगे अगर कोई मदारी खेल दिखाए तो भीड़ बढ़कर 500-700 भी हो जाती है। अब ये तिलचट्टा पार्टी ने डेरा जमाया तो 200,400 और जुट गए। भारत में भीड़ की क्या कमी है। फ्री का शरबत बटे तो हज़ार दुई हज़ार मिनटो में हाज़िर। सो यहां भी 15-20 दिन तक नीट के समर्थन में ऐसे ऐसे कार्टून देखने को मिले हँसते हँसते लग गए रस्ते। सरकार को पता है कि इसके पीछे कौन और क्यूँ है सो सरकार अपने महत्वपूर्ण बिलो पर लोकसभा और राज्यसभा में समर्थन समर्थन खेलने में मस्त। तिलचट्टा पार्टी हैरान परेशान कि कोई इधर को कोई क्यूँ नहीं फटका रा। अबे फटकेगा कैसे पुलिस के डंडे से सबकी फटती है मियां। 

         भाई साहब फिर से एक जोर की कहावत याद आ रही है "कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा"  सुसरा कुनबा जुड़ गया लेकिन न राजा न प्रजा कोई लोड ही नी ले रा । "तभी अनिश्चय के बादल में बिजली चमकी रस्ता पाया याद मुझे फिर ये दिन आया" ( मेरी कविता की पंक्तियां हैं) की तर्ज़ पर लेह के सो कॉल्ड लौह पुरुष कुछ कुछ वांगडू साहब को मैसेज भेजा वो भी वहां खाली बैठे मक्खियाँ ही मार रहे थे सो पहली फुर्सत में आ टपके और बिना किसी एजेंडा के सीधे आमरण अनशन। भाई साहब ऐसा कौन करता है पर ये साहब करते हैं सो किया।  दीमक तिलचट्टे को ये समय मुफीद लगा सो तुरत विदेश से सीधे दिल्ली लैंड। लेकिन ये क्या दिल्ली पुलिस ने "दिल्ली पुलिस आपके लिए, सदैव आपके साथ" का उद्घोष करती हुई एयर पोर्ट पर ही दीमक को पेस्ट कंट्रोल में लिपटा प्रेम पत्र पकड़ा दिया भैय्या ज़्यादा चि पों की तो पौ बारह कर देंगे।

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