Monday, 14 March 2022

रिपोतार्ज़ "दी कश्मीर फाइल्स"

“दी कश्मीर फाईल्स”
(असलियत से सामना)
कल अचानक 11:15 पर सुहास भटनागर का फोन आया। रविवार का दिन होने के कारण मैं आराम से कमरे में ही टहल रहा था  इस आशय से कि  “लामाकान” के प्रोग्राम में तो सांय:16:00 जाना है। फोन उठाते ही कहने लगे आपने व्हाट्सअप नही देखा अभी तक? मैंने कहा हुज़ूर  प्रोग्राम में तोशाम को जाना है क्या कोई तबदीली हुई है। फिर कहने लगे नहीं, “दी कश्मीर फाईल्स”देखनी है न मैंने कहा निश्चित तौर पर मैं तो इंतेज़ार कर रहा हूँ। उन्होंने बात बीच में काटते हुए कहा 12:30 तक नारायणगुडा स्थित  “INOX Maheshwari Parmeshwari” पहुँचो। मैंने कहा ठीक है और तुरत फुरत तैय्यार होकर मेट्रो पकडकर पहुँच गये ।  1:10 पर शो शुरु होना था  और हम वहाँ पहुँचे 12:50  टिकिट विंडो पर बैठी हुई लडकी ने टका सा जवाब दे दिया  सॉरी सर आज इस फिल्म का एक भी टिकिट बचा नही है ,टोटल फुल है सर्।  मैं रास्ते में सुहास जी को  “Buddha in Traffic Jam”, “The Tashkent Files” के बारे में बताता हुआ आ रहा था और उन्हें कहा भी कि आप ये दोनों फिल्में भी ज़रुर देखें। खैर  इस  स्थिति की कल्पना न तो मैंने की थी न ही सुहास जी ने  दोनों ने एक दूसरे का मुँह देखा और बाहर आकर बैठ गये। पिछले तीन चार दिन से गर्मी ने अपना रंग दिखाना शुरु कर दिया है सो पसीना आना स्वाभाविक था। अचानक सुहास जी बोले भाई 15:15 का “गंगू बाईकठियावाडी” का टिकिट ले लेता हूँ। तब तक कुछ खा भी लेते हैं। मैंने एक उचटती हुई निगाह उन पर डाली और कहा “ “ठंड रखो हुज़ूर ठंड” और मैंने गन्ने के जूस के दो ग्लास का आर्डर दे दिया, सुहास जी- भाई भूख लग रही है ये गन्ने के जूस से थोडे मिटेगी? मैंने फिर वही दोहराया “ठंड रखो हुज़ूर ठंड” तब तक जूस वाला दो ग्लास दे गया। मैंने बडे ही दार्श्निक अंदाज़ में कहा देखो सुहास जी मैं ठहरा दिल्ली वाला हार तो मानूँगा नहीं ठंड रखो कोई न कोई रास्ता निकल जाएगा वो मेरी बात बीच में ही काटते हुए बोले  भाई ब्लैक भूल जाओ अब वो जमाने गये मैंने फिर वही जुमला दोहरा दिया “ठंड रखो हुज़ूर ठंड”। जूस वाले को पैसे देकर सीढियों से लगभग उछलते हुए उन्हें अपने पीछे आने का इशारा कर दिया। लोग टिकिट दिखाकर लाइन से अंदर जा रहे थे मैं वहीं खडा हो गया, तभी एक सज्जन ने कहा मेरा साथी नही आ रहा अगर आप चाहें तो... मैंने बडी विनम्रता से उन्हें बताया हम दो हैं जनाब तभी एक व्यक्ति ने हाँ भर दी और वे अंदर चले गये।
        गिरिजा टिक्कू
सुहास जी फिर बोले भाई कुछ नही होगा तभी फिर एक टिकिट ऑफर हुई सुहास जी ने कहा आप देख लो मैं वापिस घर जाता हूँ । इस बार मैंने चिपरिचित वाक्य दोहराया नही बल्कि हाथ का इशारा कर दिया। अब लगभग 1:20 हो गये थे। सुहास जी कुछ परेशान से थे तभी एक यंग बॉय बोला मेरे दो लोग नही आए आप.... मैंने कहा कितने पैसे हुए, उसने कहा बाद में मैंने कहा अभी ले और हम स्क्रीन नम्बर में दो में एंटर हो गये। मुझे ये देखकर अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि जिसने हमें टिकिट ऑफर की थी वो लगभग 20 लोगों का ग्रुप था और सभी की उम्र 20-25 के लगभग थी जिससे यंग जैनरेशन का इस फिल्म में दिलचस्पी का पता चलता है। पूरा हॉल खचाखच भरा हुआ। कोई शोर शराबा नही सिवाय फिल्म देखने आने वाले लोगों के अतिरिक्त अन्यथा “ PIN DROP SILENCE”  कभी कभी कोई सुबकी लेने की आवाज़ तंत्रा अवश्य भंग कर रही थी। फिल्म समाप्त हुई। हम दोनों बाहर निकले और घर प्रस्थान करने से पह्ले रेस्टरुम का रुख किया ।निफराम होकर बाहर आया तो देखा एक 35-40 के मध्य की महिला रोये जा रही थीं, मैं सब कुछ समझ गया था किंतु फिर भी ढांढस बढाने के उद्देश्य से उन्हें सांत्वना देने लगा। फिर मैंने उनके पहनावे को देखकर उनसे पूछा कि You are from Kashmir” क्यूँ कि उन्होंने कान में जिस ढंग से कुण्डल पहन रखे थे वो स्टाइल सामान्यत: जम्मू काश्मीर की महिलाओं को ही पहनते देखा है। उन्होंने ना कहा और बताया कि वे यहीं हैदराबाद से ही हैं और एक हिंदू सनातनी परिवार से आती हैं। तभी मैंने पास ही में खडी एक 2—21 साल की लडकी को देखा जो मुझे कुछ चिंतित मुद्रा में लगी मैंने पूछा क्या हुआ बच्चा शायद मुझसे ऐसे सम्बोधन की उस लडकी को कतई उम्मीद नही थीं। बिलकुल रुआँसे अंदाज़ में बोली सर क्या काश्मीर में ये सब हुआ है तो फिर हमें ये सब क्यूँ नही मालूम। मैं सामान्यत: ज़ियादा भावूक नही होता हूँ किंतु उस लडकी के प्रश्न ने मुझे अंदर तक हिला दिया यकायक मेरा हाथ उसके सर पर चला गया ,थपकी देते हुए कहा बेटा जो तुमने फिल्म में देखा है वो तो 0.01 प्रतिशत भी नही है जो नंगा नाच उन चंद दिनों में काश्मीर में हुआ है वो सिर्फ वही लोग समझ सकते हैं जो इन स्थितियों से गुजरे हैं “जिस तन लागी वो तन जानी” और ऐसा पहली बार नही बल्कि पूरी एक सदी हम सनातनियों ने झेला है। किंतु फिर भी किसी एक ने भी कभी भी तलवार तो क्या पत्थर भी अपने हाथों में नही उठाया क्यूँ कि हम सनातनी लोग हैं, अगर ज़मीन पर चींटी भी दिख जाए तो उससे बचकर या फंलाग कर चले जाते हैं, मारने का विचार भी कभी मन में नही आता क्यूँ कि जीव  छोटा हो बडा है तो जीव ही, जिसने उसे जन्म दिया है वही उस की समय आने पर मृत्यु भी निश्चित करता है। मैंने और भी बहुत सी बातें उस लडकी और महिला को बताईं। और ये सब रेस्टरुम के दरवाजे के सामने। 

दी कश्मीर फाईल्स पर बात करने से पहले हम थोडा कश्मीर के विषय में जान लेते हैं। ऋषि कश्यप के नाम पर इस प्रदेश का नाम कश्मीर पडा। यहाँ के रमणीय स्थल पूरे विश्व में प्रसिद्ध थे। आप सोचिये ऋषि वाग्भट्ट ने यहीं पर रहकर आयुर्वेद की रचना की। इसी कश्मीर में बौद्धों ने ज्ञान गंगा के दर्शन किये इसी कश्मीर में आदि शंकराचार्य ने विहार किया एवम अनमोल पुस्तकें लिखी और न जाने कितने महापुरूषों ने लोगों के कल्याण के लिए कार्य किये किंतु हर अच्छी चीज़ के बाद कुछ ऐसा हो जाता है जो किसी भी प्रकार से प्रिय नही कहा जा सकता। बकौल सुशील पण्डित- लगभग 1315 के आस पास शमीर ने स्वात में अपने पिता को सत्ता से बेदखल करने का एक असफल प्रयास किया परिणाम स्वरुप उसके पिता ने उसे देश निकाला दे दिया। जब वो भयातुर होकर कश्मीर में दाखिल हुआ तो उसकी आप बीती सुनकर कश्मीर के हिंदू राजा ने उसको 1315अपने राज्य में शरण दी। उसी शमीर ने 1339 में उसी हिंदू राजा को मौत के घाट उतार दिया और कश्मीर का सुल्तान बन बैठा। उस नराधम शमीर ने पूरे कश्मीर में हजारों की संख्या में मंदिर तोड डाले। तलवार की नोक पर हजारों स्त्रियों का शील भंग ही नही किया वरन लाखों हिंदुओं को तलवार की नोक पर ही इस्लाम स्वीकार कराया।  इस कार्य में उसका साथ दिया चकों ने, शियाओं ने और पठानों ने। लगभग 480 वर्ष तक कश्मीर के हिंदुओं का कत्लेआम होता रहा। हालात यह हो गई कि जो कश्मीर हिंदुओं का देश था उसमें सिर्फ 10 से 15 % हिंदू ही जिंदा बचे। 1846 ईस्ट इंडिया कम्पनी से डोगरा महाराजा ने  86 लाख देकर उन हिंदुओं की जान बचाई। किंतु वे फिर भी उन हिंदुओं को सताते रहे तब महाराजा रणजीत सिंह ने पठानों से सीधे टक्कर ली और उन्हें अनेकों बार युद्द के मैंदान में धूल चटाई।


अब बात करते हैं “दी कश्मीर फाईल्स” की बिना किसी लाग लपेट के कहूँ तो दर्शन कुमार ने पहली बार सिद्ध किया कि वे एक अच्छे अभिनेता हैं और उनमें अच्छा बनने की अपार सम्भावनाएं मौज़ूद हैं बशर्ते निर्देशक अतुल अग्निहोत्री जैसा हो। मिथुन दा का अभिनय देखकर मुझे फिल्म मृगया में निभाया गया उनका किरदार याद हो आया। इस किरदार के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड मिला था। मिथुन दा त्वाडा जवाब नही! अनुपम खेर के विषय में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर होगा। अगर एक पंक्ति में कहूँ तो वे सारांश के किरदार से बहुत बहुत आगे निकल आएं हैं। मृणाल कुलकर्णी ने सिद्ध किया कि वो एक बेहतरीन अदाकारा हैं ।।भाषा सम्बली के अभिनय ने मुझे चौंका दिया।दिया।चिन्मय मांडलेकरलेकर बिट्टा के किरदार में जान फूँकने में कामयाब रहे। एक आँख बंद करके डॉयलाग बोलकर उन्होंने मुझे गुलशन ग्रोवर की याद दिला दी। प्रकाश बेलवादी डॉकटर महेश के किरदार में अपना काम कर गये।  पुनीत इस्सर तो खैर पुनीत इस्सर ठहरे, बलशाली कद काठी बहुत कुछ कह जाती है। अतुल श्रीवास्तव विष्णु के किरदार को जीने में कामयाब रहे। प्रकाश बेलवादी और अतुल के बीच का झग़डा ये बताता है कि जब हम सिस्टम के आगे लाचार हो जाते हैं तब हम अपना गुस्सा अपनों पर ही निकालते हैं। अब बात करता हूँ फिल्म के एक किरदार राधिका मेनन की। एक अभिनेता या अभिनेत्री अपने अभिनय से दर्शकों को रुला सकती है, बेचारगी के दर्शन करा सकती है किंतु नफरत पैदा कराना इतना आसान नही होता। पलल्वी जोशी के अभिनय देखकर एक क्षण में मुझे “भारत एक खोज” सीरियल याद हो आया जिसमें उन्होंने कई किरदार निभाए थे किंतु गुर्जरनी का किरदार WOW, डॉयलाग डिलिवरी ऐसी गज़ब कि मन करे कि एक ताली तो बनती है बॉस्। खैर यही एक किरदार और अभिनेता या अभिनेत्री की जीत है किंतु पर्दे पर राधिका का किरदार देखकर मैं भूल गया था कि मैं एक फिल्म देख रहा हूँ बस मन किया कि राधिका पास हो तो दो चार घूँसे इसके चेहरे पर रसीद कर दूँ।लेकिन मेरे दिल में ये ख्याल आना ही तो उस किरदार की जीत है। एक बात और जीवन के न जाने कितने बसंत बीत गये फिल्में देखते देखते। शिक्षाप्रद फिल्म में भी लम्बे लम्बे डॉयलाग फिल्म की रफ्तार कम कर देते हैं अभी अभी अमिताभ और हाशमी की चेहरे देखी, क्लाइमेक्स में अमिताभ का भाषण इतना ज्यादा बोर करता है कि........ बस क्या कहूँ। ये फिल्म अभी तक उन सबसे अलग रही। दर्शन कुमार का अभिनय तो था ही किंतु वो भाषण कभी भी कहीं से भी भटकता हुआ नही लगा और इस फिल्म की सफलता का ये में कारण भी है। जैसे कोई गृहणी अपनी मन पसंद डिश बनाए और उसमें बिलकुल स्वादानुसार ही मसालों का प्रयोग करे।एक बात दिमाग से निकल गई, "दि कपिल शर्मा शो" भाई विवेक, इसकी क्या गारंटी है कि जिन फिल्मों का प्रमोशन वहाँ होता है वो सब हिट हो जाती है। सिर्फ दिमाग का वहम है जितनी जल्दी हो सके इसे निकाल दें। वैसे भी कॉमेडी के नाम पर वहाँ क्या परोसा जा रहा है हम सभी भली भाँती जानते हैं इसलिए उस पर बात करके उसको भाव मत दो। 

"चाह जीने की अगर तुझमें पनपती है प्रबल।
 रास्ता रोकेगा कैसे फिर तुम्हारा दावानल॥
 कर नही पाएगी तुझको कोई भी मुश्किल विकल ।
 गर इरादे तेरे होंगे आसमाँ जितने अटल ॥
 तू अगर सच्चा है तो फिर डर तुझे किस बात का।
 मंज़िलों की जस्तुजू में हौसले लेकर निकल।।"
                                                                                                   -प्रदीप देवीशरण भट्ट-

और अंत में प्रिय विवेक अग्निहोत्री तुमने और ज़ी स्टूडियो ने अपना काम ईमानदारी से कर दिया है और निश्चित मानो इस बार ये खास जनता भी अपना काम बखूबी करेगी। परिणाम दिखने शुरु हो भी गये हैं। एक सीन अवश्य खटका जब सब कौल साहब के घर पर जमा हैं (पुरुष,महिलाएं, बच्चे बच्चियाँ , तभी खट खट की आवाज़ सुनकर एक लडकी कहती है आतंकवादी आतंकवादी और खिडकी से बाहर छलांग लगा देती है, कैमरा उस लडकी को नीचे ज़मीन पर पडा दिखाता है और कैमरे एक एक कोण दर्शाता है कि खिडकी में एक सरिया अभी भी मौजूद है। सरिये तोडकर तो लडकी नही गिरेगी न फिर वो सरिया भले ही लकडी का हो) खैर दक्षिण भारत के शहर हैदराबाद में ““दी कश्मीर फाईल्स” की” इतनी अच्छी ओपनिंग ये दर्शाती है कि लोग ईमादार लोगों की ही नही वरन ईमानदार काम की भी कद्र करना सीख गये हैं। वरना प्रभास की राधेश्याम के टिकिट मिल रहे हैं और “दी कश्मीर फाईलस की” के नही। एक विषेश बात आप फिल्म फेयर जैसे फालतू के अवार्ड की चिंता न करे निश्चित ही “दी कश्मीर फाईल्स” राष्ट्रीय पुरुस्कार की हकदार है। हिंदी फिल्म उद्योग में कुछ लोग अपना घर और करियर चलाने के लिए  बिकने को तैय्यार खडे हैं और बिक भी गये हैं{“ बिकने हूँ तैय्यार खरीदार नही है/ज़्यादा जीऊँ ऐसे मेरे आसार नही हैं- प्रदीप देवीशरण भट्ट) तभी तो उल जलूल फिल्में बन रही हैं,पिट रही हैं लेकिन उन्हें हिट करार दिया जा रहा है। शायद वे लोग नही जानते “साँच को आँच नही होती” खैर अनेको नेक शुभकामनाएँ इस आशय से कि जल्दी ही हम “ नेता जी फाईलस”, चंद्रशेखर आज़ाद फाईलस” और हाँ गाँधी जी फाईल्स”से भी रुबरू होंगे।
-प्रदीप देवीशरण भट्ट-
हैदराबाद (तेलांगना)
13:03:2022

" सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है "

“सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है”


साठ- सत्तर के दशक में हम जितने भी लोग पैदा हुए हैं और जिनके सर पर हिंदी फिल्मों का भूत सवार हुआ है उन्हें कालीचरण फिल्म का ये संवाद बखूबी याद होगा। उस समय गली मुहल्ले के छोटे‌ या फिर बडे बच्चे भी अपने अपने ग्रुप में यही सब करते थे। कोई शत्रुघन सिन्हा बन जाता और कोई अजीत (हामिद अली खान)  और ये सिलसिला जब तक चलता रहता था जब तक कोई दूसरी फिल्म में इससे भी ज़ियादा दमदार संवाद न हो। मुझे याद है अगर मैं अपनी याददाश्त पर जोर डालूँ तो सोहराब मोदी, चंद्र मोहन, राज कुमार, पृथ्वीराज कपूर, देव आनंद,प्राण ( लटके झटके के साथ) अजीत (खलनायिकी की पारी में ) दुर्गा खोट,राजेश खन्ना, सुनील दत्त, शत्रुघन सिन्हा और अंत में अमिताभ बच्चन एवम अमरीश पुरी। जहाँ तक अमजद खां का प्रश्न है उनके संवाद केवल शोले फिल्म में ही हिट हुए। इसी तरह प्रेम चोपडा ने न जाने कितनी फिल्मों में काम किया किंतु जो प्रसिद्धि उन्हें बॉबी के सिर्फ एक संवाद “ प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपडा” से मिली लोग जीवन भर इसके लिए उनसे रश्क कर सकते हैं। लोग नायक नायिका,खलनायक को भले ही याद न करें किंतु उनके द्वारा बोले गये संवाद को सदैव याद रखते हैं। हामिद अली खाँ उर्फ अजीत भी हीरों के रुप में वो प्रसिद्धि न पा सके जो उन्होंने फिल्म कालीचरण के एक संवाद “ सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है” से मिली।

सारा शहर मुझे लॉयन के नाम से जानता है...और इस शहर में मेरी हैसियत वही है, जो जंगल में शेर की होती है

25 बरस देल्ही, 12 बरस मुम्बई और पिछ्ले तीन बरस से खूबसूरत शहर हैदराबाद में हूँ। शुक्रवार, 25 फरवरी-2022 को मुझे भी हिंदी फिल्म इंड्स्ट्री के कुछ चुनिंदा खलनायकों में से एक अजीत “ दि लॉयन “ के बारे में जानने समझने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मौका था अजीत पर एक कॉफी टेबल बुक (English) के लोकार्पण का जिसे इकबाल रिज़वी (देल्ही) ने लिखा है। कार्यक्रम “निज़ाम क्ल्ब ऑफ हैदराबाद” के प्रांगण में आयोजित किया गया। मैंने जैसे ही अपने मित्र सुहास व संजय के साथ वहाँ प्रवेश किया तो देखा अजीत साहब के बडे साहबज़ादे शाहिद अली खान, बडी ही आत्मियता के साथ लोगों का स्वागत कर रहे हैं। जहाँ कुछ उनके परिचित हैं वहीं कुछ मुझ जैसे अपरिचित भी किंतु मेरे नमस्कार करने पर गर्दन को थोडा सा झुकाकर उन्होंने मेरे अभिवादन का उत्तर दिया। खूबसूरत वातावरण में हरियाली घास पर कई गोल टेबल लगे हुए थे और उन पर कुछ लोग बातों में मश्गूल थे। मैंने उचटती सी एक नज़र अपने आस पास डाली तो पाया कि जहाँ मेरे पैरों के नीचे हरियाली थि वहीं आसमान में भी बादल के छोटे- छोटे टुकडे इधर उधर छितरे हुए थे जो शायद अजीत साहब को सलामी देने आये लगते थे। कुछ देर यूँ ही इधर उधर बतियाते हुए एक कट ऑउट पर निगाह गई जिसमें अजीत साहब बडे ही शान से खडे थे मैं उसके साथ एक फोटो लेने का मोह न छोड सका। तभी किसी ने मेरे काँधे पर हाथ रखकर बडे ही अदब के साथ हाई टी लेने का नुरोध किया। बेहतरीन मेहमान नवाज़ी।
लगभग सात बजे कार्यक्रम की शुरुआत हुई,  प्रेरणा जो कि एंकरिंग कर रही थी ने बडे ही सधे हुए लहज़े में कार्यक्रम के चीफ गेस्ट जो कि जयेश रंजन, IAS का परिचय दिया तदुपरांत अजीत साहब के तीनों साहबज़ादों शाहिद अली खान, ज़ाहिद अली खान और आबिद अली खान का परिचय दिया, फिर इकबाल रिज़वी जो इस पुस्तक के लेखक हैं को मंच पर आमंत्रित किया। उन्होंने किताब लिखने की प्रेरणा अपने अनुभव वहाँ उपस्थित लोगों के साथ साझा किये। फिर बारी थी थियेटर की जानी मानी शख्सियत विनय वर्मा की, जिन्होंने अपने अंदाज़ में अजीत साहब का परिचय, उनके बचपन की खट्टी मिठी यादें, उनका हैदराबाद से मुम्बई का सफरनामा, वहाँ कि जद्दोजहद का खुबसूरत चित्रण किया। इसके बाद पाटनी जी, मजूमदार जी ने भी अपने अनुभव साझा किये। और अंत में एंकर ने सूचना दी कि अब जयेश रंजन जी अजीत साहब पर लिखी गई कॉफी टेबिल बुक (अंग्रेजी संस्करण) का लोकार्पण करेंगे।  एक बेहतरीन शाम का अंत बेहतरीन ढंग से हुआ किंतु एक कसक रह गई। अजीत साहब  जो कुछ भी थे या हम सबकी यादों में हैं वो हिंदी फिल्म इंड्स्ट्री की वजह से हैं फिर टैक्स बुक के रुप में उनकी कहानी हिंदी में दो महीने बाद क्यूँ और अगर हिंदी में दो माह बाद तो उर्दु में । ये मानसिकता क्यूँ और कब तक भई।

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-

Wednesday, 19 January 2022

रिपोतार्ज

रिपोतार्ज

-मेरा बेहतरीन नाशिक प्रवास और विद्योत्तमा फाऊंडेशन-

कितना अजीब है न, 34 वर्षो के पश्चात नाशिक के उसी शालीमार स्थित सुरुचि रेस्टोरेंट में अपने मित्र राम कृष्ण सहस्र बुद्दे के साथ खाना खाना, एक पल में मैं फरवरी-मार्च-1987 के दौर में लौट गया। 🤗
मौका था,विद्योतमा फांऊनडेशन, द्वारा एच आर डी सेंटर, नाशिक (महाराष्ट्र) में दिनांक: 09.01.2022 को विश्व हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर “राष्ट्रीय हिंदी साहित्य सम्मान समारोह” का भव्य आयोजन जिसे कोरोना के सभी प्रोटोकाल का पालन करते हुए किया गया। दिनांक: 07.01.2022 की सांय हैदराबाद के सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकडते हुए सुबोध मिश्र जी अध्यक्ष विद्योत्तमा फाउंडेशन का फोन आना और पूछना प्रदीप जी आप आ रहे हैं न, मैं एक क्षण में समझ गया ये जो कोरोन के मामा का लडका  “ओमिक्रान आया है🤪🤪 इस कारण कार्यक्रम की प्रशासन द्वारा स्वीकृति नही मिली है। मैंने उत्तर दिया, बडे भाई पहली बात तो ये है कार्यक्रम अवश्य होगा फिर भी यदि कुछ पाबंदिया लगती हैं तो हम जितने भी लोग कार्यक्रम के लिए पहुँचेगें निश्चित रुप से अपने अपने कमरों में धमाल मचायेंगे। शायद मेरी इस बात से सुबोध जी को कुछ राहत सी मिली होगी। 

खैर 8 जनवरी की सुबह 8 बजे मनमाड फिर वहाँ से नाशिक की ट्रेन और लीजिए हुज़ुर 10:30 हरे भरे सुरम्य वातावरण वाले एच आर डी सेंटर्। बाहर सडक पर जहाँ नाशिक एक महानगरीय अनुभव से दो चार करा रहा था वहीं एच आर डी सेंटर के अंदर प्रवेश करते ही गाने क़ी पंक्तियाँ याद आ गई “ ये कहाँ आ गये हम” चारों तरफ हरे भरे पेडों का हुजूम, पुराने समय की रिहाइश के दर्शन, कमरे में प्रवेश करते ही, खपरैल वाला कमरा वो भी अटैच्ड लेट्रिन बाथरुम, वातानाकुलित यंत्र, दो चारपाइयां, एक टेबल दो कुर्सी, करीने से बिछा हुआ बिस्तर,कुछ कमियाँ थीं जिन्हें इग्नौर किया जा सकता है। यहाँ है लिखना आवश्यक है कि असल में ये एक पुराना चर्च है जिसे अब ट्रस्ट बनाकर कमर्शियल तौर पर यूज़ किया जाने लगा है। खैर मैं और राम कृष्ण जी निफराम होने के बाद बाजार घूमने निकल पडे और अक्स्मात मेरी निगाह सुरुचि रेस्टोरेंट पर पडी, मुझे वहीं ठिठकता देख राम कृष्ण जी ने कहा अभी आगे और भी रेस्टोरेंट हैं, मैंने एक ही श्वांस में 1987 के ट्रेनिंग पीरियड का पूरा किस्सा उन्हें सुना दिया कि कैसे हम रोज रोज़ मैस के खाने से परेशान होकर शनिवार व रविवार इसी रेस्टोरेंट में खाना खाते थे। कुल 3 रुपये 75 पैसे की थाली जिसमें एक सब्ज़ी,एक दाल, सांभर अचार, तीन रोटी, एक पापड और चावल्। राम कृष्ण जी ने तय किया कि मार्किट घूमने के बाद इसी में खाना खायेंगे। मैंने जानबूझ कर खाने का पेमेंट कार्ड से किया ताकि सनद रहे।

शाम को, ज्ञान चंद मर्मज्ञ जो कि पत्नि के साथ बंगलौर से पधारे थे मुलाकात हुई, पता चला काफी लोगों ने कोरोना के कारण अपनी टिकिट कैंसिल कर दी हैं कुछ की रेलवे ने कैंसिल कर दीं। सायं को कुछ बेहतरीन स्थानीय लोगों से मुलाकात हुई जिनमें सुधीर जी के साथ सुनीता माहेश्वरी, सुधा सिंह, सी पी मिश्र, प्रिय स्वप्निल (जो लगातार कार्यक्रम के इंतेज़ामात में व्यस्त रहे), नागपुर से पूनम मिश्र,श्रद्धा शिंदे जी अपने पति के साथ एक और नाम शायद रागनी जी, मिलकर लगा ही नही हम पहली बार मिल रहे हैं। और तभी बरखा रानी ने अपना ज़बरदस्त रुप दिखाया चारों तरफ पानी ही पानी,केटरिंग वाले को मैंने पहले ही सावधान कर दिया था कि आप कॉरिडोर में शिफ्ट हो जाएं, खुले में तकलीफ होगी (शायद इस डर से कि बारिश ने गडबड कर दी तो रात भर भूखा ही रहना पडेगा) 😅राम कृष्ण जी लगातार चाँदनी समर जी के सम्पर्क में थे जो कि अपने पिताजी के साथ मुजफ्फरपुर बिहार से आ रही थीं। इसके अतिरिक्त एक फैमिली चार सदस्यों के साथ नागपुर से भी अपनी कार से आ रही थी। सुधीर जी से चर्चा के दौरान यह तय हुआ कि देर रात तक जो भी लोग आने वाले हैं हम उन्हें एंटरटेन कर लेंगे आप लोग घर जाकर आराम करें क्यों कि उन्हें कार्यक्रम की और बहुत सारी तैय्यारी करनी थी। चूँकि बारिश लगातार हो रही थी तो तय किया कि केटरिंग वाले भी खाना लगाकर चले जाएं क्यों कि उन्हें भी सुबह सवेरे आना था। लगभग 10:30 पर चाँदनी और 11 के करीब नागपुर वाली फैमिली आई जिसे हम दोनों ने अच्छे से एंटरटेन किया वो भी हास्य विनोद के साथ्।😉😁

अगले दिन यानि 9 जनवरी को विधिवत कार्यक्रम की भव्य शुरुआत करगिल युद्द के जीवित हीरो में से एक नायक दीप चंद, (यहाँ यह विदित हो कि करगिल वार के समय नायक दीप चंद ने युद्ध में अपने दोनों पैर व एक हाथ को खो दिया है।) द्वारा दीप प्रजव्वलित कर की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता उद्योगपति व समाज सेवी श्री के सी पाण्डेय द्वारा की गई, कार्यक्रम में सुबोध मिश्र, अध्यक्ष विद्योतमा फांऊनडेशन ऋषि कुमार मिश्र, एवम प्रसिद्ध साहित्यकार  डॉक्टर विद्या केशव चिटको एवम शिल्पी अवस्थी ( Mrs India International) उपस्थित रहीं। कार्यक्रम दो सत्रों में आयोजित किया गया। प्रथम सत्र में देश के विभिन्न भागों से पधारे साहित्यकारों का पुरुस्कार राशि के साथ साथ विधिवत्त रुप से सम्मानित भी किया गया। विद्योतमा फांऊनडेशन  द्वारा मेरी प्रथम पुस्तक “दरिया सूखकर सहरा हुआ है” के लिए मुझे “साहित्य सारथी” सम्मान से सम्मानित किया गया।
दूसरे सत्र में देश के विभिन्न भागों से पधारे कवियों ने काव्य पाठ कर उपस्थित श्रोताओं को आनंदित कर दिया वहीं मेरे द्वारा नव वर्ष के उपलक्ष्य में पढी गई गज़ल  “बीते वर्ष की बातें करके क्या होगा/ हम अच्छे तो साल नया अच्छा होगा” ने श्रोताओं को आत्मविभोर कर दिया। चाय के समय सभी कविगण फिर से एकत्र हुए ।प्रसिद्ध साहित्यकार डॉक्टर विद्या केशव चिटको द्वारा मेरे पास आकर मेरी गज़ल की तारीफ करना मेरे लिए आशीर्वाद स्वरुप रहा।
अंत में सुधीर जी एवम उनकी पूरी टीम जिसने इतने बेहतरीन इंतेज़ाम किये उनका हार्दिक धन्यवाद और विशेष धन्यवाद सुधीर जी को उनकी सह्रदयता के लिए जिन्होंने सुबह से अपने काम में मश्गूल उन फ़ोटोग्राफर महोदय का भी सम्मान कराया निश्चित ही ये बात मेरे दिल पर अंकित हो गई क्यों कि सामान्यत: लोग फोटोग्राफर से यही कहते देखे हैं कि भईय्या जाने से पहले खाना ज़रुर खा लेना, धन्यवाद देना और सम्मान करना तो जाने दीजिए। 

एक बेहतरीन और यादगार प्रवास।

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-
- 18:01:2022

Tuesday, 28 September 2021

मेरी नज़र से

नज़्म

     "मेरी नज़र से"

मेरी कोशिश है 
य़े स्केच ख़ूबसूरत हो
बिलकुल तुम्हारी तरह
जैसी क़े तुम दिखती हो

मैं पशोपेश में हूँ
लोग तुम्हें कैसे देखेंगे
पर चाहता हूँ तुम्हें देखें
भले ही एक बार
पर देखें मेरी नज़र से

य़े इतना मुश्किल भी नही
स्त्री को स्त्री सा देखना
मगर लोग देखते नही
देखते है उसके कपड़े
और शायद.....

मगर मैं आश्वस्त हूँ
मेरे साथ ऐसा नही होगा
लोग देखेंगे मेरी तन्मयता
मेरी मेहनत मेरा प्यार
मेरी नज़र से

-प्रदीप देवीशरण भट्ट-
28:09:2021

Monday, 13 September 2021

हिंदी की आस बनेगी एक दिन ख़ास यानि लिंगंवा फ्रांक़ा

“हिंदी की है आस बनेगी एक दिन खास यानि ‘लिंग्वा फ्रांका’ ”
      हम इस वर्ष स्वंत्रता के 75 वां वर्ष मना रहे हैं’ सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर भी इसे भव्यतम रुप में मनाने की होड सी लगी हुई है। निश्चित रुप से ये अच्छी बात है। हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी 14 सितम्बर को “हिंदी दिवस” के रुप में  मनाया जाएगा। मुझे उम्मीद है कुछ मंत्रालयों में इस विषय में पत्रावलियाँ अंग्रेजी में ही प्रस्तुत की जाएगीं। हम जैसे हिंदी प्रेमियों को इससे कितना कष्ट होता है उनकी बला से। किंतु कहीं न कहीं दिल में ये आस अवश्य है कि एक न एक दिन हमारी हिंदी भाषा भी ‘लिंग्वा फ्रांका’ (प्रयोग में ली जाने वाली वह प्रभावशाली भाषा जो प्रयोग में लेने वालों की मातृ भाषा न हो) बनेगी) 

       विश्व परिदृश्य पर पिछले तीन हजार वर्ष के इतिहास में देखें तो ग्रीक, लैटिन, पॉर्च्युगीज, स्पैनिश, फ्रेंच और अंग्रेजी एथेंस की ग्रीक भाषा अलग-अलग दौर में प्रभावशाली रही हैं। 18वीं सदी के मध्य में फ्रांस के विद्वान वॉल्टेयर ने ‘फिलॉसफी ऑफ हिस्ट्री’ लिखी। इसका विषय संपूर्ण मानव जाति का इतिहास था। अध्ययन में यह तथ्य निकलकर आया कि ईसा पूर्व नौवीं सदी से लेकर चौथी सदी तक यूरोप शहर रूपी कई साम्राज्यों में बंटा हुआ था। इनमें से एथेंस व्यापार और सैन्य ताकत बनकर उभरा। इसलिए प्रभावशाली एथेंस की ग्रीक भाषा यूरोप की लिंग्वा फ्रांका बनी। ईसा पूर्व 201 से आने वाले 600 वर्षों तक एथेंस यूरोप का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बना रहा। लिहाजा कैथोलिक चर्च की ताकत बढ़ी और रोमन भाषा लैटिन लिंग्वा फ्रांका बन गई। लेकिन लैटिन लिंग्वा फ्रांका बनी रही क्यों कि आने वाले एक हजार साल तक कोई नई वैश्विक शक्ति नहीं उभरी।

       1492 में कोलंबस ने अमेरिका की खोज की और छह वर्ष बाद वास्कोडिगामा ने भारत में कदम रखा। ये दोनों यात्राएं पुर्तगाल के खर्चे पर हुई और इस तरह से पुर्तगाल साम्राज्य शक्तिशाली होने लगा। पुर्तगाल की देखा-देखी स्पेन और फ्रांस भी उपनिवेशवाद में कूदे। इस दौरान पॉर्च्युगीज, स्पेनिश और फ्रेंच लिंग्वा फ्रांका की दौड़ में रहीं। इंग्लैंड में स्थिति ऐसी थी कि राजघराने में जो शिक्षा ली जाती थी उसका माध्यम फ्रेंच भाषा होती थी न कि अंग्रेगी। उस सम्य के सभ्य समाज में अंग्रेजी गरीबों की भाषा और दरिद्रता की निशानी मानी जाती थी। 

       वर्तमान में अंग्रेजी भाषा को ‘लिंग्वा फ्रांका’ का दर्जा प्राप्त है। ऐसा इसलिए कि पिछ्ले लगभग 600 वर्षो से  ब्रिटेन आर्थिक, सामजिक,राजनैतिक बाजारी कारण व सैनिक शक्ति के लिहाज से विश्व के उन पाँच महत्वपूर्ण देशों में स्थान रखता है जो कि सीधे सीधे शेष विश्व पर अपना प्रभाव रखते हैं। चूँकि अमेरिका के अतिरिक्त विश्व प्रमुख 7 देशों में अंग्रेजी ही बोली जाती है इसलिए वर्तमान दौर में अंग्रेजी ही लिंग्वा फ्रांका बनी हुई है। जहाँ तक अंग्रेगी का ताल्लुक है इसे प्रथम अंतर्राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है। चूँकि ये एक पश्चिम जर्मेनिक भाषा है जिसकी उत्पती एंग्लो-सेक्सन इंग्लैंड में हुई। चूँकि ब्रिटिश हुकूमत कई देशों पर रही है अतएव जैसे जैसे अंग्रेगी का प्रचलन बढा ये उन देशों में भी ज्यादा बोले जाने लगी जहाँ उस देश की अपनी भाषा पहले से ही मौजूद थी। ऐसा इसलिए भी हुआ क्यों कि ब्रिटिश लोगों ने 18,19 एवम 20वीं शताब्दी में  सैन्य, राजनितिक, आर्थिक, वैज्ञानिक एवम सांस्कृतिक पर अपनी पकड बनाने के उद्देश्य से अंग्रेगी भाषा के प्रयोग पर अधिक बल दिया जिससे इसे छटी भाषा के रुप में लिंग्वा फ्रांका होने का गौरव प्राप्त हुआ। कुछ देश ऐसे भी रहे जिन्होंने इसे अपनी मातृ भाषा के बाद दूसरी भाषा के रुप में मान्यता प्रदान की।

       अगर मैं यह कहूँ कि अंग्रेगी भाषा का उत्थान चौथी या शायद पाँचवी शताब्दी के मध्य में इंग्लैंड में एंग्लो-सेक्सन लोगों द्वारा शुरु हुआ। एंग्लो सेक्सन लोग कई तरह की बोलियों/ भाषाओं को बोलते थे,यहाँ यह कथन स्प्ष्ट है कि वाइकिंग हमलावरों द्वारा अपनाई गई प्राचीन नोर्स भाषा का प्रभाव वर्तमान अंग्रेगी भाषा पर ज्यादा है। ये विषय अलग है कि अंग्रेजी भाषा लगातार अपना विकास करती रही और अन्य देशों में बोले जाने वाली भाषा के शब्दों को स्वंय में समाहित करती रही जिससे इसकी ताकत में ज्यादा वृद्धि हुई। वर्तमान में जो अंग्रेजी बोलते हैं उसमें नोर्मन शब्दावली और वर्तनी के नियमों का भारी संख्या में उपयोग हुआ है। वर्तमान अंग्रेजी भाषा में प्राचीन ग्रीक और लैटिन का अत्याधिक प्रभाव दिखायी पडता है। अंग्रेजी बोलने वाले लगभग 53 देश हैं जिनमें संयुक्त राष्ट्र, यूरोपितन संघ,राष्ट्रमण्डल, नाटो देश व नाफ्टा के देश शामिल हैं। एक सर्वे के अनुसार पूरे विश्व में अंग्रेजी बोलने वाले देशों के क्रम में अमेरिका प्रथम स्थान भारत दूसरे स्थान पर ,नाइजिरिया तीसरे स्थान पर और आश्चर्यजनक रुप से ब्रिटेन चौथे स्थान पर आता है। इसके बाद फिलिपिंस कनाडा और आस्ट्रेलिया का नम्बर आता है। मतलब जिस अंग्रेजी भाषा की उत्पती ब्रिटेन में हुई वही देश अंग्रेजी बोलने वाले देशों में चौथे नम्बर पर है मतलब उसने अपना आधिपत्य जमाने के उद्देश्य से अंग्रेजी भाषा को इतना ताकतवर बना दिया कि समूचा विश्व बिना अंग्रेजी भाषा के चल नही सकता। किंतु हर जगह अपवाद होते हैं जो यहाँ भी है। चीन में मंदारिन भाषा सबसे ज्यादा बोली जाती है किंतु चीन के बाहर न के बराबर किंतु चीन ने आज जो मुकाम हासिल किया है वह मंदारिन की बदौलत ही किया है। अंग्रेजी का उपयोग उतना ही किया गया जितना आव्श्यक था।

       जहाँ तक हिंदी भाषा का प्रश्न है तो विश्व में अंग्रेजी, मंदारिन के बाद इसका स्थान तीसरा है। भारत में हिंदी के बाद सबसे अधिक बंगाली भाषा( लगभग 30 करोड) बोली जाती है। जिस प्रकार आज अंग्रेजी वैश्विक भाषा के रुप में विश्व में प्रतिष्ठित है उसी प्रकार आने वाले समय में हिंदी भी वैश्विक भाषा के रुप में निश्चित अपना स्थान बनाएगी। हिंदी भारत के अतिरिक्त नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, पाकिस्तान, तिब्बत, अफगानिस्तान, श्रीलंका इत्यादि  देशों में प्रमुख रुप से बोली और समझी जाती है।पूरे भारतीय उपमहाद्वीप हिंदी धीरे धीरे सम्पर्क भाषा के रुप में अपना स्थान निश्चित करती जा रही है । भारत में इस समय कुल छ: कास्मोपोटिन शहर हैं जिनमें चेन्नई को छोडकर आपको हिंदी भाषा बोलने वाले समझने वाले देल्ही,मुम्बई, बंगलौर,कोलकत्ता और हैदराबाद में आसानी से मिल जायेंगे।

       भारत की संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को इसे राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया जिससे इसका प्रयोग और चौतरफा विकास हुआ। जैसे बंगला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि को क्रमश: बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल आदि की राजभाषा (मुख्य प्रांतीय भाषा) बनाया गया है। ऐसा करने से किसी भी भाषा का महत्व कम नही हुआ है? निश्चित रुप से नही। बल्कि इससे उन सभी भाषाओं का उत्तरदायित्व और प्रयोग क्षेत्र पहले से अधिक बढ़ गया है। जहाँ पहले केवल परस्पर बोलचाल में काम आती थी या उसमें साहित्य की रचना होती थी, वहीं अब प्रशासनिक कार्य भी हो रहे हैं। यही स्थिति हिन्दी की भी है। इस प्रकार हिन्दी सम्पर्क और राष्ट्रभाषा तो है ही, राजभाषा बनाकर इसे अतिरिक्त सम्मान प्रदान किया गया है।

       आज का युवा निश्चित रुप से अंग्रेगी के साथ हिंदी भाषा को भी महत्व देने लगा है उसे अच्छी तरह से पता है कि विकास का पहिया केवल अंग्रेजी या प्रांतीय भाषा के सहारे नही घूम सकता। पिछ्ले कुछ वर्षो में देश में ही नही वरन विदेशों में हिंदी और संसकृत भाषा सीखने की एक होड मची हुई है।  मल्टीनेशनल कम्पनियाँ अच्छी तरह से जानती है कि भारत एक बहुत बडा बाज़ार है, अगर उन्हें अपना माल बेचना है तो उन्हें भारत की मुख्य भाषा हिंदी को स्वीकार करना ही होगा साथ ही इसी बहाने प्रांतीय भाषाओं का भी विकास हो रहा है सिर्फ माल बेचने के उद्देश्य से नही वरन फिल्म उद्योग भी अपनी सभी फिल्मों, वेब सीरिज़ को हिंदी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में डब कराके प्रदर्शित करता है ताकि ज्यादा से ज्याद लोगों तक उसकी पहुँच सुनिश्चित हो। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। यहां 24 आधिकारिक भाषाएं हैं, परंतु हिंदी लगभग सब जगह बोली जाती है और यह सबसे अधिक तेजी से बढ़ भी रही है।   पढाई का माध्यम भी धीरे धीरे हिंदी अंग्रेजी के इर्द गिर्द ही सिमटता जा रहा है जो कि एक अच्छा संकेत है। इस विषय में भारत सरकार द्वारा भी विभिन्न स्तरों पर प्रोत्साहन प्रदान किये जा रहे हैं। मैं आशा करता हूँ कि 2050 तक हिंदी अगली (सातवीं) लिंग्वा फ्रांका का होने कादर्जा अवश्य प्राप्त कर लेगी। 

 
- प्रदीप देवीशरण भट्ट -14:09:2019
01:09:2021

“अफगानिस्तान के राजनितिक घटना क्रम का भारत पर प्रभाव”




अफगानिस्तान के राजनितिक घटना क्रम का भारत पर प्रभाव




इससे पहले कि मैं अफगानिस्तान के वर्तमान हालात पर अपनी बात रक्खूँ , बेहतर होगा कि अफगानिस्तान के इतिहास पर एक सूक्ष्म दृष्टी डाल ली जाए। पूर्व में अफगानिस्तान भारत वर्ष का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। आज जिसे हम कंधार के नाम से जानते हैं वह महाभारत के एक महत्पूर्ण पात्र शकुनि जिसे आमजन की भाषा में शकुनि मामा के नाम से विख्यात है । आज से लगभग पाँच हजार पाँच सौ वर्ष पूर राजा सुबाला का गंधार प्रदेश पर राज्य करते थे। शकुनि इन्हीं राजा सुबाला के पुत्र थे इनकी बहन गंधारी का विवाह हस्तिनापुर के राजा धर्तराष्ट्र के साथ हुआ था। महाराजा रणजीत सिंह ने कई मर्तबा अफगानिस्तानियों को युद्ध में हराया था।एक लम्बे समय तक अफगानिस्तान ब्रिटिश शासन के अधीन रहा। सोवियत संघ में कम्युनिस्टों का राज्य था जो कि अपने विस्तारवाद के लिए जाने जाते हैं इसी तरह चीन भी विस्तारवाद के लिए जाना जाता है। ईरान एवम सोवियत संघ की इस क्षेत्र में उठा पटक चलती ही रहती थी। ब्रिटिशर अफगानिस्तान में आए दिन के उठा पटक से घबरा गए थे या ये कहें तो ज्यादा उचित होगा कि उन्हें इस उठा पटक के भारत में पहुँचने या उसका असर यहाँ पर पडने का ज्यादा अंदेशा हो गया था। अतएव ब्रिटिश इंडिया की ओर से मॉटीमर डूरंड और अफगानिस्तान की ओर से अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच एक समझौता हुआ (जो की अमीर अब्दुर रहमान की मृत्यु तक ही मान्य था) दोनों ने जिस समझोते पर दस्तखत किये कालान्तर में उसे ही डूरंड रेखा के नाम से जाना गया। य रेखा  हिंदुकुश पर्वत श्रंखला जो कि लगभग 800 मील लम्बी है, से सर मार्टिमर डूरंड ने एक रेखा खींची जो कि भारत और अफगानिस्तान के जनजातीय प्रभाव वाले क्षेत्रों से होकर गुजरी  वर्तामन में यह रेखा 2430 किलो मीटर लम्बी है जो कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान को विभाजित करती है। भारत और अफगानिस्तान के मध्य इसका केवल 106 किलोमीटर का ही हिस्सा है जिसे विवादित माना गया है।

         जो बाइडन, अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा की गई घोषणा कि अमेरिकी सेना 11 सितम्बर-2021 तक अफगानिस्तान से वापस अमेरिका लौट जाएगी” के बाद जिस तेजी से अफगानिस्तान के हालात बदले हैं, निश्चित रुप से उसकी कल्पना अमेरिका ने कभी नही की होगी। 20 वर्ष तक अफगानिस्तान में जबरदस्ती अपनी नाक घुसेडे रक्खी। वो भी सिर्फ इसलिए ताकि सोवियत संघ जिसने अफगानिस्तान में 18 वर्षो तक अफगानिस्तान में अपनी दादागिरि चलाने की कोशिश की को नीचा दिखाया  जा सके। जब कि इससे पूर्व ब्रिटेन भी मुँह की खाकर अफगानिस्तान छोड चुका था।  सेना वापसी के इस फैसले से पिछ्ले एक सप्ताह में जो बाइडन की लोकप्रियता 56 प्रतिशत से गिरकर 43 प्रतिशत पे आ गई है। जो विश्व प्ररिदृष्य पर ये साबित करने के लिए काफी है कि जो बाइडन के इस एक फैसले से कैसे सिर्फ दक्षिण एशिया ही नही वरन पूरे विश्व में यह संदेश गया कि अमेरिका ने पिछ्ले दरवाजे से तालिबान को सत्ता सौंपने का रास्ता साफ कर दिया है वो भी सैनिक साजो सामान के साथ जिससे अफगानी जनता त्राही त्राही करने को मजबूर हो गई है।

 

        चूँकि अफगानिस्तान की सीमाएँ पूर्व में पाकिस्तान,उत्तर पूर्व में भारत तथा चीन, उत्तर में ताजिकिस्तान, कजाकस्तान व तुर्केमिस्तान से तथा पश्चिम में ईरान से लगी हुई हैं अतएव सीधे सीधे अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने से इन देशों पर बहुत ज्यादा दबाव बना रहने वाला है। वर्तमान में चीन ने तालिबान को मान्यता देने का मन बना लिया है ऐसा करके वो तालिबान से शिंझियांग प्रांत में उईगर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार को नज़र अंदाज़ करने की शर्त रख सकता है किंतु इससे भी बडा कारण अफगानिस्तान में तांबे, लिथियम के लगभग 75 लाख डालर के भंडार पर उसकी लालची नज़र है। जहाँ तक पाकिस्तान का प्रश्न है तो तालिबान उसकी ही नाज़ायज़ औलाद है जिसे उसने अफगानिस्तान के सम्पूर्ण भू भाग पर कब्ज़े के दृष्टीकोण से पैदा किया। इसके अतिरिक्त अफगानिस्तान में अलकायदा व हक्कानी ग्रुप भी सक्रिय है।

 

जहाँ तक भारत का प्रश्न है 2001 से आज तक भारत ने लगभग पच्चीस हजार करोड का इंवेस्ट्मेंट अफ्गानिस्तान में विकास के लिए किया है। इसी के मद्दे नज़र भारत देखो और इंतज़ार करो की नीति पर चल रहा है। वैसे भी भारत के लिए मानवता प्रथम ,व्यापार द्वितीय पायदान पर आता है। किंतु तालिबान की पुरानी इमेज को देखते हुए उस पर किसी भी हाल में भरोसा नही किया जा सकता। एशिया में रुस भारत का  पारम्परिक मित्र है अतएव अफगानिस्तान के वर्तमान हालात को देखते हुए भारत को रुस के साथ मिलजुल कर भविष्य की योजना बनानी होगी। ताकि पाकिस्तान और चीन के षडयंत्रो पर लगाम लगाई जा सके। यहाँ यह विषेश है कि अफगानिस्तान का एक प्रांत पंजशीर अभी भी तालिबान के हाथ में नही आया है। इतिहास गवाह है कि पंजशीर पर न ब्रिटेन विजय पा सका,न सोवियत संघ न तालिबां। जब कि अमेरिका ने तालिबान के विरुद्ध पंजशीर के लडाकों  की सहायता अवश्य ली। ये सही है कि आज तालिबान का कब्जा पूरे अफगानिस्तान पर हो गया है और वहाँ अंतरिम सरकार का भी ऐलान कर दिया है किंतु जिस सरकार के ज्यादातर मंत्री दुर्दांत आतंकवादी हों उस देश और उसके आस पडौस के देशों के हालात कितनी तेजी से बदलेंगे ये कोई नही जानता। ये सर्व विदित है कि पूर्व में तालिबान को अमेरिका ने पाला पोसा और वर्तमान में पाकिस्तान अपने कुत्सित इरादों के लिए तालिबान को इस्तेमाल कर रहा है किंतु जहाँ तक तालिबान के विषय में मेरी समझ है मैं निश्चित रुप से कह सकता हूँ कि तालिबान वही रोल अदा कर रहा है जो कि भारतीय माइथालौजी में “भस्मासुर” ने किया है। पंजाब का उग्रवाद याद है न, जिन्होंने भिंडरेवाला को अपने दुश्मनों को ठोकने के लिए उत्पन्न किया उसने पहले अपने आका की सुनी फिर अपने आका को ही ठोक दिया। (बुरे काम का बुरा नतीज़ा)।जब तक तालिबान को खुद को आर्थिक और सौनिक दृष्टी से मजबूत नही कर लेता वो पाकिस्तान और चीन दोनों की बातें मानने का नाट्क करेगा और जैसे ही वह मजबूत होगा वह अपना असली रंग दोनों ही देशों को दिखायेगा। परिणाम स्वरुप या तो तालिबान का पूरी तरह खात्मा हो जाएगा ये पाकिस्तान और चीन में वो तबाही मचाएगा कि दोनों ही देशों को षडयंत्रों से बाज आना पडेगा।

 

निश्चित रुप से भारत को फूँक फूँक कर कदम रखना होगा और दक्षिण एशिया में अपने आप को एक धीर गंभीर देश के रुप में अपनी स्थिति को मजबूत करना होगा साथ ही अपने चिरपरिचित सहयोगियों/मित्रों को लेकर ही इसका सामना करना होगा। ये कहना गलत नही होगा कि वर्तमान स्थिति में केवल भारत ही एक ऐसा देश है जो अफगानिस्तान में स्थिरता दे सकने में सक्षम है और ऐसा भारत के दोस्त ही नही वरन दुश्मन भी चाहेंगे क्यों कि भारत की इमेज अफगानिस्तान में एक खास दोस्त की है जिसने अफगानिस्तान को दोबारा खडा करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। अफ्गानिस्तान की अस्थिरता न रुस के लिए बेहतर है न चीन के लिए न पाकिस्तान के लिए और न ईरान के लिए।

- प्रदीप देवीशरण भट्ट -13:09:2019


Saturday, 26 June 2021

ड्रग डे

"ड्रग डे"
आज विश्व ड्रग डे है। 
सर्वप्रथम अन्तर्मन ने एक प्रश्न किया इसकी क्या आवश्यकता है?
ख़ैर पश्चिमी सभ्यता जो भी दे  उसे मीठा समझकर गप्प गप्प खा जाईये और अपने बच्चों को भी खिलाइये। आख़िर इसे अपना कर ही तो आप स्वयं क़ो साबित कर पाएंगे कि आप  मॉडर्न हैं। किंतु भारतीय संस्कृति क़ो कड़वा समझकर थू थू करते रहिए। तो चलिए एक लघु कथा का रसास्वादन करते हैं। 

युवा फ़िल्म डायरेक्टर मोहित वर्मा फ़िल्म क़े नायक सुदर्शन खन्ना क़ो सीन समझाते हुए बता रहे थे कि सुदर्शन ये सीन इंजीनियर कॉलिज क़े "एनुअल डे" पर आयोजित एक कार्यकम का है जहाँ आप प्रोफ़ेसर हैं औऱ कॉलेज स्टूडेंट क़ो ड्रग से दूर रहने औऱ इसे देश में पूरी तरह प्रतिबंधित करने क़े लिए आह्वान करते हैं। सुदर्शन ने हाँ में सर हिलाते हुए कहा हो जाएगा यार चिंता न कर वैसे भी मैं इसी कॉलिज का पास आउट हूँ।  मोहित ने आश्चर्य से देखते हुए कहा, आपने पहले क्यूँ नही बताया। सुदर्शन ने चहकते हुए बताया सरप्राइज था तुम सबके लिए। 

     मोहित ने सब तैय्यारियों का जायज़ा लिया फ़िर एक्शन बोलते ही सुदर्शन ने अपने डायलॉग बोलने शूरु कर दिये किंतु ये क्या ? सुदर्शन बीच में ही अटक गया ख़ैर बार बार रीटेक से तंग आकर मोहित ने सुदर्शन क़े पास जाकर बोला,  यार क्या हो रहा। सुदर्शन ने मोहित क़ो एक तरफ़ कोने में खींचते हुए अपनी बहुत बड़ी समस्या साझा की कि यार आज 'पुड़िया' नही ली है औऱ ये कम्बख्त मैनेजर भी इंतजाम  नही कर पा रहा है, कह रहा है पुड़िया होटल में रह गई है  औऱ होटल यहाँ से 60 किलोमीटर दूर है औऱ हाँ एक बात औऱ यार अब तू मुझे ड्रग पे भाषण मत पेलना। पुड़िया लिऐ बिना मुझसे एक्टिंग नही होती। 
     मोहित ने एक तीखी नज़र सुदर्शन पर डाली फ़िर हँसते हुए कहा बिना पुड़िया मुझसे भी डायरेक्टिरी कहाँ होती है?  मूड ही नही बनता ससुरा। फ़िर दोनों मुस्कुराते हुए वैनिटी वैन की तरफ़ चल दिये। 

-  प्रदीप देवीशरण भट्ट  -
26:06:2021