Wednesday, 7 October 2026

"बरसत्ती बुआ और हम"


रिपोर्ताज 

       "बरससत्ती बुआ और हम" 

         सितम्बर के प्रथम रविवार को हम यानि "हम ख़ुदई भई" सज धज के रैपिडो से नमो भारत 🚉 🚉 स्टेशन से मात्र 500 सौ मीटर दूर ही पहुंचे होंगे कि बरसत्ती बुआ आसमान में विचरण करते हुए गढ़ गंगा की तरफ़ धूम धड़ाका करने जाती प्रतीत हुईं बस तभी हमारी भी निगाह ऊपर आसमान की ओर गई हमने बुआ को छेड़ते हुए कहा, बुआ मेरठ में नहीं बरसोगी का इससे पहले की बुआ कछु जवाब देती हम ने कटाक्ष कर दिया बुआ लगता है पानी 💦 🌊 🌊 🌊 ख़त्म हुई गवा है हमार तो नहाने का मन था चलो अगली बार ही सही। वैसे तो बरसत्ती बुआ को हमसे बहुत बड़े वाला प्यार है लेकिन लगता है उस दिन बुआ फूफा से लड़ भिड़ के विचर रहीं थीं कछु मूड ख़राब सा तो लगा पर इत्ता होगा पता नहीं था सो बुआ के पीछे भागते आ रहे बादल 🌨️ 🌨️ के टुकड़े को बुआ ने इशारा किया और वो ससुरा बिलकुल हमीं पर मतबल हमारे आस पास ही सौ दुई सौ मीटर में बरस 🌧️ 🌧️ 🌧️ 🌧️ ☔ ☔ ☔ पड़ा। अब कर लो क्या करो नमो भारत स्टेशन सामने और हम इधर पानी से सराबोर। पांच मिनिट में हमें निपटा के बादल 🌨️ ये तो ये जा वो जा और हम नीरज जी के गाने की तरह वहीं खड़े खड़े पता नहीं क्या क्या देखते रहे। पानी से तरबतर कपड़े उस पर बाटा की चप्पल भाई साहब ऐसे लग रिया था जैसे हम सौ दो सो किलो के हो गए हों। अब बारादरी में ऐसे तो जा नहीं सकते थे सो उसी अवस्था में एक ठो टैक्सी 🚕 बुक की ख़ुद को पिछली सीट पर धकेला और पहला ये काम किया आलोक जी को बताने का कि भैय्या बरससत्ती बुआ के आशीर्वाद से हम आ न सकेंगे। कपड़े सूख गए चप्पल  सूखने के बाद भी इस लायक न रही कि उसे आगे पहन सकें हाँ बढ़िया वाला ज़ुकाम अवश्य हो गया।

         अक्टूबर में फिर आमंत्रण दिल की महफ़िल सजी है 4 अक्तूबर को चले आइए। ज़ुकाम भी बीच बीच में मेडन ऑवर करके सताता रहा कभी लगे ठीक हो गया फिर दो दिन बाद फिर वही। ख़ैर डॉक्टर से तीन दिन की दवा ली और 4 अक्तूबर को दवाई जेब में रख जा पहुँचे महफ़िल ए बारादरी वो टाइम से पहले। माला जी और आलोक जी ने स्वागत किया। धीरे धीरे महफ़िल सजने लगी। तभी विनय विक्रम जी सपत्नीक ने हॉल में प्रवेश किया हमने इशारा किया और उन्होंने हमारा मान रखते हुए बगल की सीटों को पवित्र कर दिया 🪔। ठीक 3.20 बजे हॉल में आलोक जी की आवाज़ गूंजी यानि कार्यक्रम विधिवत शुरू डॉक्टर शफक सोपोरी Z टी वी के प्रस्तोता अनुराग मुस्कान मित्र श्वेता सिंह उमा, बारादरी के अध्यक्ष सुरेन्द्र सिंघल जी, डॉक्टर माला कपूर ' गौहर' बरसों से बारादरी का सम्मान का ख़्वाब संजोने वाले भाई इंद्रजीत सुकुमार जिन्हें इस बार बारादरी सम्मान से नवाज दिया गया। सुभाष चंदर जी, मासूम गाजियाबादी यानि कुल जमा 68 साहित्य साधकों की उपस्थिति रही। एक से एक बढ़िया प्रस्तुति। सच तो ये है कि अगर ये गोष्ठी हो तो ये अगले दिन सुबह 🌄 🌅 🌄 🌅 तक भी बदस्तूर जारी रह सकती है । महफ़िल ए बारादरी में शिरकत करने का मतलब जैसे कोई यू पी एस सी क्रैक करके मसूरी के लाल बहादुर ट्रेनिंग सेंटर में आई ए एस की ट्रेनिंग ले रहा हो और उस ट्रेनिंग के ऑब्जर्वर सदा बहार आलोक यात्री,😊 भाई साहब रिज़ल्ट अजी जाने भी दो 

        एक से बढ़कर एक कलाम ज़रा गौर फरमाएं :-

केत्ता रेउड़ी खइहौ भइया सरम करो।।
वै ब्वालैं तुमका तनखइया सरम करो।।

लीक भये हैं पेपर इत्ते काव कही।
उमिर बीति गै बनि कनकइया सरम करो।।
* *विनय विक्रम सिंह*

लाॅंघ सकूं तो लाॅंघ में जाऊॅं, उन नैनन की कोर 
जाने क्या उस ओर? सखी री! जाने क्या उस ओर 

 *शुभ्रा पालीवाल*

हुकूमत की थी गलती और तुम चुपचाप बैठे थे 
तुम्हें तो लिखना आता था तुम्हें लिखकर बताना था
* *सचिन परवाना*

कोई समझे न समझे वो मुझे अच्छा समझती है 
मैं बूढ़ा हो रहा हूँ माँ मुझे बच्चा समझती है 

डॉ नसीम अलीग
ख्वाब कुछ ढूँढिए फिर पुराने कभी।
जिन्दगी हँस उठे इस बहाने कभी।

मिल रहे घाव हैं हर किसी को यहाँ।
मिल सका कब किसी को है पूरा जहाँ।
चल चलें आँसुओं को भुलाने कभी।

* *अभिलाषा विनय*

“तुलसी सूख जाएगी”

वो बच्चों की तरह भोली है, हरदम मुस्कुराएगी
अगर अपनी कसम दे दूँ, मुझे आँखे दिखाएगी
करुँ मैं लाख कोशिश पर, शहर बिलकूल न आएगी
मेरी माँ को यही डर है, के तुलसी सूख जाएगी

* *प्रदीप भट्ट मेरठ*

         अनुराग मुस्कान सपोरी जी माला जी और दद्दा सुरेंद्र सिंहल जी को सुनना निश्चित एक सुखद अहसास है। स्वर्गीय गोविंद गुलशन जी की सुपुत्री प्रिय खुश्बू ने अपने बढ़िया वाले संचालन से ये साबित किया कि शायरी दिलों में ही नहीं खून में भी भरी होती है। अच्छी बात ये रही कि इस बार कार्यक्रम तय समय के आस पास ही सम्पन्न हुआ। बढ़िया वाला जलपान फिर फोटो शूट और लो जी राम जी का नाम लेते वापिस मेरठ वो भी एसी की ठंडी हवा के साथ तो गले की तो........ होनी ही थी तो भाई साहब एक सबक कि डॉक्टर से दवा लेकर जेब में मति रक्खो मियां कम स कम एक ख़ुराक़ तो लीजिए वरना करते रहिए खों खों मैंनू की लोड।

चलते चलते 
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डॉक्टर माला कपूर जी ने ग्रुप फ़ोटो को देखकर टिप्पणी की कि 
Attendance was 68...in this photo
there are only 37😴
बस भाई साहब पढ़ते ही खुपड़ियां 🙂‍↕️ 🗣️ 🗣️ 🙂‍↕️ के तार झनझना उठे और इंस्टेंट एक शेर लिख मारा 

"हमारा नाम दर्ज़ है, तिरी किताबों में 
 ये और बात हम, तस्वीर से नदारत हैं"

वैसे फ़ोटो में हमने भी बंदो की गिनती की, एक बंदा दूसरे के पीछे छुपा हुआ मिला लेकिन कि फरक पैंदा है जी 38 हो 37।


प्रदीप डीएस भट्ट -07102026

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