रिपोर्ताज
"नदी चली मायके"
यूं तो दो बरस हो गए हैदराबाद को छोड़े लेकिन आँख🥸 बंद करो तो साढ़े चार साल के हैदराबाद प्रवास की यादें आंखो के आगे चित्र की भांति अब भी यूं गुजर जाती है जैसे बरसात के दिनों में नदी नाले उफान मार जाएं। अब आप सोच रिए होंगे जे क्या उदाहरण हुआ जी तो भैय्यू इस बार गर्मी तो जितनी पढ़नी थी पड़ ली लेकिन बरसतिया 🌧 बुआ छप्पर फाड़ के सूखी जमीन का गला तर करने पर तुली हुई हैं। अब करें भी क्यूँ न गंगा मैय्या हों या जमुना, राप्ती हों या झेलम या फिर इनकी चचेरी ममेरी तहेरी बहनें, बहुत दिनों से वो अपने ससुराल की जमीन पर बहे जा रहीं थीं बहे जा रही थीं अब वो का है न ससुराल में कुछ ज़्यादा ही प्यार जो मिल रिया था हुज़ूर सो अब भैय्या ससुराल का मामला है कौन किसको क्या कहे बरसों बरस हो गए बहते हुए किसकी हिम्मत जो मइया जी को टोक दे कि बुआ तनिक भाई भतीजों का भी हाल चाल 👍 मालूम कर लो, तो हुआ यूं के म्हारे बार बार गिड़गिड़ाने पर जून में सभी बुआओं ने एक मीटिंग कर डाली और तय किया कि चलो इस बार मायके चलते हैं देखें भैय्या भाभी भतीजा भतीजी कैसे हैं , राम राम भी हो जाएगी और मायके घूम भी आयेंगे, पर भैय्या आयेंगे कहां से जहां ये सारी नदिया बहती थीं वहां तो क्या माननीय सांसद क्या विधायक, क्या कॉर्पोरेटर क्या मुखिया सब ससुरों ने बड्डी बड्डी बिल्डिंग 👷♀️ 🏢 🏗 डाली रही सही कसर भाई भतीजों ने पूरी कर दी और लो जी भैया जो थोड़ी भोत धार चल री थी या बची हुई थी वहां किनारे पर अपने अपने घर बना डाले। अब जब सभी बुआओं ने मायके जाने के लिए बड्डी वाली बरसतिया 🌧 🌦 बुआ के साथ मायके जाने का रस्ता पकड़ा तो उन्हें रस्ता न मिल के दिया जब घणी परेशान हो गई तो अपने बादल ☁️ 😶🌫️ मित्र को बुलावा भेज दिया कि तनिक ऊपर से देखकर बताओ हमारा मायका कहां है।
अब बादल मित्र भी क्या करते बिन पानी उड़ान भरते भरते उन्होंने HD फ़ोटो खींची और सारी नदियों को व्हाट्सअप कर दिया। फ़ोटो देखते देखते वॉयरल भी हो गई। अब तो फ़ोटो देखते ही सारी बुआओं को घणा गुस्सा आ गया अबे ये हमारा मायका था इसे क्या तुम सबने सरकारी ज़मीन समझकर ग़ैर क़ानूनी कब्ज़ा कर लिया बे, हमारी पूजा भी करोगे और हमीं पे कब्ज़ा। सजा मिलेगी बरोबर मिलेगी और उन्होंने सावन के पावन महीने में भोले नाथ को फुनवा लगा दिया उधर भोले नाथ भी तनिक गुस्से में बैठे थे वो इसलिए कि धरती पे जितने भी सो कॉल्ड भक्त हैं सब ससुरे सुबह देखें न शाम दिन देखें न रात उनकी पिंडी पे लोटा से ड्रम से (नीला 🛢️ नी महाराज) भर भर के दे जल दे जल। अरे भैय्या माना वो भोले नाथ हैं पर नेचर कॉल तो उन्हें भी निपटानी पड़ती है न। बस फिर क्या था नदी बुआ ने जैसे ही अपना दुखड़ा सुनाया भोले नाथ ने नन्नक सी अपनी तीसरी आँख खोलकर बादलों ☁️ को इशारा कर दिया। अब बादल तो बादल ठहरे नदियों के दोस्त और भोले का इशारा बस भक्तों ने जितना जल पिंडी पे उड़ेला था उसका लाख गुना पानी छलनी की जगह अपनी पेंदी में छेद करके बरसा दिया अब आप उसे बादल फटना कहो या चखना बादल नू कि फ़र्क पैंदा है जी। अब आप खुदई देख लो शेर सिंह के ढाबे का अगड़ा हिस्सा चमक रिया है पिछले का तो हैप्पी बड्डे हो भी गया। जिधर देखो त्राहिमाम त्राहिमाम। कहां तो पाकिस्तान एक एक बूंद पानी के लिए तरस रिया था और धमकी अलग से दे रिया था पानी 💧 नी मिला ते अपन भारत की सांसे बंद कर दांगे, खून बहा दांगे। एक तो मुझे समझ नी आंदा ऐ पाकिस्तान उर्दू विच क्यूँ नी बोलदा खैर मैनू की लोड़। अब पानी चड्ड दीत्ता ती कै रिया है इत्ता पानी काय नू चड्ड दित्ता । ओ लो जी मैंनु भी पंजाबी बोलन दी आदत पड़ गी सी। मैनू ऐसा लग रिया है कि नदियों ने कब्ज़ा करने वालों पर ट्रंप डैडी की तरह 5000 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है। जय भोले नाथ की।
हां तो हम कहां थे जी ओह याद आया नदियों की लीला से त्रसित मानव त्राहिमाम त्राहिमाम कर ही रहा था तभी हमें हैदराबाद से एक ठो सूचना मिली काव्य धारा प्रकाशन इन्दौर में एक दिनी कार्यक्रम आयोजित कर रहा है उसमें हमें भी आमंत्रण दिया गया। भाई इन्दौर को मिनी मुम्बई😎 भी कहा जाता है सो सबसे पहले मित्र दिनेश दवे जी को सूचित किया कि हम 23 अगस्त को इन्दौर पधार रहे हैं सो स्वच्छ इन्दौर को हमारे स्वागत के लिए और स्वच्छ करवा दिया जाए। दवे जी भी उस्ताद निकले तुरन्त बोले तथास्तु🥳 साथ ही सूचना दी कि इन्दौर से इंद्र देवता रूठे हुए हैं उतनी नहीं हुई जितनी होनी चाहिए। हमने ठहाका मारते हुए पूछा अभी तक उतनी क्या नहीं हुई माहराज इससे पहले वो बोलते हम खुदई बोल पड़े आमदनी क्या अब ठहाका उधर से आया फिर बोले गुरु तबियत से बारिश 🌧 🌦 न हुई अब तक। हमने अपने बनियान के कॉलर ऊंचे करते हुए कहा इन्द्र देव से बात हो गई है दवे जी हम 23 अगस्त को प्रातः 6.05 पर ट्रेन से उतरेंगे और उतरते ही स्वच्छ इन्दौर को पानी पानी कर देंगे।
अब कह दी तो कह दी। खैर 22 अगस्त को 11.40 पर हल्की बूंदा बांदी के बीच हमने जैसे ही ऋषिकेश इन्दौर एक्सप्रेस के B1 के कंपार्टमेंट में एंट्री मारी तो घुसते ही 12 नम्बर सीट पर आराम फरमाते हुए एक ठो लड़की 👦 मिली, सामान रक्खा और सामने वाले से बोले दो मिनिट में फ्रेश होकर आते हैं, रेस्ट रुम गए,जुल्फें करीने से सेट की और वापिस सीट पर लैदर बैग को सीट के नीचे सरकाया खाने का झोला सामने टांगा तो सामने से आवाज़ आई कहां तक जाएंगे हमने अपनी जुल्फें पीछे की तरफ़ धकेली और बोले बस थोड़ी दूर तक हुज़ूर। उन सज्जन ने एक गहरी सांस ली और हमारी सीट पर भगवान विष्णु की तरह शेष शैय्या की मुद्रा में लेटी हुई लड़की 👧 को रिलेक्स का इशारा किया। हम भी थोड़ा रिलेक्स हुए फिर उन साहब से पूछा आप कहां तक तो बोले आखिरी स्टेशन तक यानि इन्दौर ये कल सुबह पहुंचेगी। हमने हां में मुंडी हिलाई तो फिर पूछ बैठे वैसे आप क्या दिल्ली तक या मथुरा, हमने फिर जुल्फों को झटका देते हुए कहा बस इन्दौर तक। एक बारगी तो वहां बैठे सब गड़बड़ा गए जब हमने दोबारा दोहराया तो बोले मान गए पक्के ह्यूमरिस्ट हो हमने उनकी आंखों में झांकते हुए पूछा शक्ल से या... उन्होंने दोनों हाथ पकड़ते हुए बोला मजा आ गया इन्दौर तक अच्छा रास्ता कटेगा तब तक वो लड़की उठ कर बैठने की चेष्टा कर रही थी। हमने सर पे हाथ रखते हुए कहा तत्काल प्रभाव से ये सीट आपकी हुई बच्चा वैसे एक बात बताओ एक्सीडेंट में चोट ही खानी थी तो लेफ्ट में खाते राइट में क्यूँ प्लास्टर चढ़ा रखा है उसने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा अंकल स्कूटी स्किड हो गई सड़क पर और.... हमने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा क्या सड़क को भी प्लास्टर चढ़ा है। अब ये सुनते ही उस बच्चे के चेहरे पर जो हंसी आई है बस पूछो मति मज़ा आ गया। दिन 🌞 कैसे निकला पता ही नही चला रात 🌙 आई और बीच वाली सीट में किसी तरह खुद को फंसा कर सो गए। सुबह 🌄 चार बजे उज्जैन आँख खुली तो हमने सीट से बाहर निकलकर ट्रेन से महाकाल को प्रणाम किया लेकिन ये क्या बूंदा बांदी शुरु हम कुछ समझ पाते तभी कानों में सुरसुराहट हुई बेटा प्रदीप भट्ट तू भी तो घर में रखी पिंडी पर मुझे तीन बूंद जल रोज़ाना उड़ेलता है तो ले बेटे थोड़ी मौज तू भी ले ले।
म्हारी क़िस्मत भी न गज़ब की है जी ठीक ठाक बारिश में 🚂 ने भी हमें 6.05 की जगह 5.35 पर इन्दौर स्टेशन का पटका। सह यात्रियों से राम राम की और एक छज्जे के नीचे दुड़की लगा दी बस सर ही गिला हुआ तभी मुबलिया🤗 घनघना उठा उधर डॉक्टर खामोश भागिया जी अजीब इत्तेफ़ाक है जनाब उनकी ट्रेन 🚆 भी आधे घंटे पहले ही अहमदाबाद से इंदौर जंक्शन पर आ धमकी खैर तय हुआ 🏨 में मिलते हैं और लीजिए हुज़ूर बारिश में ही पंद्रह मिनिट में वो उधर से हम इधर से सीधे 🏨 और बरखा रुक गई। गले मिले फिर रिसेप्शन वाले ने बताया गया कि रुम जल्दी से जल्दी भी करेंगे तो रूम दस बजे मिलेगा फ़िलहाल आपको फ्रेश होने के लिए दूसरा रुम दिए देते हैं। Thx बोलकर हम दोनों बाहर आए और बूंदा बांदी शुरू ख़ैर स्वच्छ इन्दौर में सुबह सुबह कूड़ा करकट देखा फिर दोनों ने चाय 🍵 भी और भागिया जी ने एक सिगरेट सुलगा ली फिर गम को हंसी में उड़ाते हुए दो दीवाने शहर में कूड़ा करकट देखते हुए वापिस 🏨। 9.00 रुम लिया फ्रेश हुए फिर पूरी, करेला, आंवला और हां कृष्णाष्टमी की बची हुई पंजीरी से नाश्ता किया फिर अन्य आए हुए अन्य मित्रों से मुलाक़ात की। शाम को मित्र दिनेश दवे आ पहुंचे हमने भी जी भर कर उनका आथित्य स्वीकारा, यकीं नहीं तो कटोरियां 🥣 गिन लो जी। अगले दिन नाश्ता किया और साढ़े दस बजे सबों के साथ हम भी श्री मध्य भारत हिन्दी सेवा समिति के प्रांगण में जो 🏨 से बा मुश्किल पांच मिनिट की दूरी पर था में प्रवेश कर गए। खूबसूरत हॉल जहां चारों ओर एक से बढ़कर दिवंगत साहित्यकारों के चित्र। सबसे अच्छी बात सब A 4 साइज़ के फ्रेम में जड़े हुए। मतलब समझ गए न आप जिंदा रहते सब के सब अपनी मैं में तने हुए मैं ये मैं वो करने वाले यहाँ सब एक साइज़ में चलो यहाँ आकर तो इंसाफ़ हुआ।
11.30 पर दीप प्रज्ज्वलन से कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत हुई राजस्थान से आईं पायल शर्मा और रश्मि शर्मा ने सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम का शुभारंभ किया। मंच पर प्रोफ़ेसर राजीव शर्मा जिन्होंने दुष्यन्त पर पी एच डी की है, हरे राम बाजपेई, सत्य प्रसन्न जी, डॉक्टर ख़ामोश भागिया, काव्य धारा प्रकाशन की सुनीता लुल्ला, ब्रजेश शर्मा, बागड़ी जी और नोएडा से पधारे बढ़िया वाले विज्ञान व्रत जी उपस्थित रहे। समारोह में कुल दस पुस्तकों 📖 📕 📘 का लोकार्पण हुआ जिसमें 8 एकल व 2 साझा संकलन किसलय और मनीषा। पहले सत्र में यही सब कुछ होता है पुस्तक लोकार्पण, सम्मान समारोह यहां भी यही हुआ फिर लंच और भैय्या फिर दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन जिसमें कोई पांच मिनिट पढ़ेगा फिर भी टोका टाकी होगी और किसी को जब तक वो चाहे। हर कार्यक्रम का यही ढर्रा है इसलिए किसी एक को दोष देना ठीक नहीं। मंच पर पहले और दूसरे सत्र में लगभग एक जैसी मूर्तियां जे बात ठीक न है जी 2021 में इससे बेहतर व्यवस्था थी।दूसरी बात आधे पौने घण्टे में 10 पुस्तकों 📖 📕 📘 का लोकार्पण, किसी एक पुस्तक पर भी चर्चा न होना दिखाता है कि सब के सब भेड़ चाल में व्यस्त हैं। बस पुस्तक छपवा लो फिर पुस्तक का फ़ोटो सेशन करवा लो फिर जय हिंद जय भारत। ये सोचने का विषय है कि क्वांटिटी नहीं क्वालिटी की बात तो सब करते हैं लेकिन मानता कोई नहीं। और भी बहुत कुछ लेकिन छड़ो भी। बुरा मान जाएंगे मैं तो कहता हूं बुरा मान के भी देख ले शायद साहित्य का कुछ भला हो जाए। अब हमें भी पढ़ना था सो पढ़ दिया आप भी पढ़कर धन्य हो जाओ जी।
“दरगाहों पर जाना क्यूँ है”
दरगाहों पर जाना क्यूँ है, मन अपना बहलाना क्यूँ है
धर्म सनातन सर्वश्रेष्ठ फिर, दर दूजा खटकाना क्यूँ है
जो भी जीव धरा पर आये,ब्रह्मा जी ने उन्हें बनाया
बच्चे की फिर चाह में मत्था, हर दर पर टिकवाना क्यूँ है
चींटी को कण हाथी को मन,तोल सभी को विष्णु देते
आँखे नीची करके अपनी, हाथ सदा फैलाना क्यूँ है
बिन इच्छा के महादेव की, बाल भी बाँका हो न पाए
झाड फूँक करने वालों को, डर अपना दिखलाना क्यूँ है
धन की देवी मात वैष्णवी, हर इच्छा पूरण करती हैं
साँझ सवेरे करो अर्चना,पीरों के दर जाना क्यूँ है
संकट हरणी मात शांभवी, दुर्जन निकट नहीं आ पाता
दुर्गा काली अरि अवरोधी, कृष्ण तिलक लगवाना क्यूँ है
नाम से जिनके भूत भी काँपे, वो बजरंग बली हैं भैय्या
खली फली के डर से बोलो, फिर तुमको घबराना क्यूँ है
राम नाम में इतनी ताकत, पत्थर भी तैरे जाते हैं
क्रोध दिला श्रीराम से तुमको, सागर को सूखवाना क्युँ है
कृष्ण की लीला कृष्ण ही जाने, और दूजा न जाने कोई
बार बार कनकी उँगली फिर, गोवर्धन उठवाना क्यूँ है
दिया ईश ने जन्म जहाँ तुम, बस उसका सम्मान करो जी
धर्म बदल कर कोख को अपनी, नालायक कहलाना क्यूँ है
जाने कितने धर्म हैं उपजे, इसी सनातन पारावर से
बार बार चमडे का सिक्का, फिर तुमको चलवाना क्यूँ है
रहो चैन से खुद भी और तुम, दूजे को भी रहने दो न
बात बात पे रार बढाकर, आपस में टकराना क्यूँ है
छोडो भी जाने दो बातें , कहाँ कोई है सुनने वाला
वक्त से पहले चित्र पे अपनी, माला को चढ़वाना क्यूँ है
समय शेष है 'दीप' चेताओ, अब सब अपने मुख को खोलें
मौन की अग्नि से फिर वर्ना, देश नया जन्मवाना क्यूँ है
© प्रदीप देवीशरण भट्ट -24:02:2021
दवे जी से फिर से बात हुई और तय हुआ वो शाम चार बजे 🏨 आएंगे, अपुन सामान सहित उनकी गाड़ी में जा ठूंसेगे घूमेंगे और बाद में नौ साढ़े नौ बजे वे हमें टेशन छोड़ देंगे। हमने सोची जे भी ठीक है, बस गणेश भगवान का छजराना मंदिर 🛕 🕍 🛕 🕍 🛕 देख लें तो काफी है सो जैसे ही जाम से जूझते हुए दवे जी छः बजे पहुंचे हम उनकी गड्डी में सामान सहित जा गिरे एक बात जो मैने नोट की वह ये कि मैं और भागिया जी जितनी बार होटल 🏨 से निकले इंद्र देवता कुनन मिनन करते मिले भाई साहब इस चक्कर में इन्दौर घूमने का प्रोग्राम चौपट अब 25 की रात्रि ट्रेन 🚆 🚉 🚄 और इंद्र महाराज हैं कि ऐंठे हुए हैं हमने पूछा काहे दुर्वासा हुए जा रहे हो तो बोले बेटे भोले नाथ से पंगे लोगे तो तुमही तो भुगतोगे। भोले बाबा 22 को ही बोल दिए थे ई ससुरा प्रदीपवा बहुत बड़ा फेंकोलिजवा है जहां तहां फेंक देता है, ट्रेन में फेंक दिया कि इन्दौर पहुंचते ही बादल बरसेंगे और इसका फेंका हुआ लपेटना हमें पड़ता है। क्या करें सच्चे वाला भगत है इसकी बात तो माननी ही पड़ेगी।तो बस भैय्या हम तो उनका आदेश मान रिए हैं जब तक तुम इन्दौर की स्वच्छ धरती पर हो हम तुम्हें कतई सूखने न देंगे ज़ालिमलोशन। बारिश और जाम को देखते हुए दवे जी सीधे अपने घर ले गए रास्ते में भगवान गणेश जी का छजाराना मन्दिर की चोटी के दर्शन किए, गाड़ी में बैठे बैठे ही गणेश जी को नमस्ते की तभी फिर कान में सुरसुराहट हुई गणेश जी कह रहे थे क्यूँ बेटा बाप को नाराज़ करके बेटे के दर्शन करेगा फिर हँसते हुए बोले चल कोई गल्ल नी नेक्स्ट टाइम श्योर। दवे जी के यहाँ उपमा खाया, चाय पी फिर सीधे इन्दौर जंक्शन, प्लेटफॉर्म नंबर 2 से भागिया जी शान्ति एक्सप्रेस पकड़ी और आधे घंटे बाद प्लेटफॉर्म नम्बर 4 से हमने फिर अगले दिन वाया दिल्ली होते हुए सीधे मेरठ लेकिन लेकिन लेकिन बारिश अभी भी चालू आहे, अब बस भी करो भोले नाथ। 🙏 रिपोर्ताज लिखने दोगे की नाही, हां नई तो।
प्रदीप डीएस भट्ट -01092025