Saturday, 26 June 2021

ड्रग डे

"ड्रग डे"
आज विश्व ड्रग डे है। 
सर्वप्रथम अन्तर्मन ने एक प्रश्न किया इसकी क्या आवश्यकता है?
ख़ैर पश्चिमी सभ्यता जो भी दे  उसे मीठा समझकर गप्प गप्प खा जाईये और अपने बच्चों को भी खिलाइये। आख़िर इसे अपना कर ही तो आप स्वयं क़ो साबित कर पाएंगे कि आप  मॉडर्न हैं। किंतु भारतीय संस्कृति क़ो कड़वा समझकर थू थू करते रहिए। तो चलिए एक लघु कथा का रसास्वादन करते हैं। 

युवा फ़िल्म डायरेक्टर मोहित वर्मा फ़िल्म क़े नायक सुदर्शन खन्ना क़ो सीन समझाते हुए बता रहे थे कि सुदर्शन ये सीन इंजीनियर कॉलिज क़े "एनुअल डे" पर आयोजित एक कार्यकम का है जहाँ आप प्रोफ़ेसर हैं औऱ कॉलेज स्टूडेंट क़ो ड्रग से दूर रहने औऱ इसे देश में पूरी तरह प्रतिबंधित करने क़े लिए आह्वान करते हैं। सुदर्शन ने हाँ में सर हिलाते हुए कहा हो जाएगा यार चिंता न कर वैसे भी मैं इसी कॉलिज का पास आउट हूँ।  मोहित ने आश्चर्य से देखते हुए कहा, आपने पहले क्यूँ नही बताया। सुदर्शन ने चहकते हुए बताया सरप्राइज था तुम सबके लिए। 

     मोहित ने सब तैय्यारियों का जायज़ा लिया फ़िर एक्शन बोलते ही सुदर्शन ने अपने डायलॉग बोलने शूरु कर दिये किंतु ये क्या ? सुदर्शन बीच में ही अटक गया ख़ैर बार बार रीटेक से तंग आकर मोहित ने सुदर्शन क़े पास जाकर बोला,  यार क्या हो रहा। सुदर्शन ने मोहित क़ो एक तरफ़ कोने में खींचते हुए अपनी बहुत बड़ी समस्या साझा की कि यार आज 'पुड़िया' नही ली है औऱ ये कम्बख्त मैनेजर भी इंतजाम  नही कर पा रहा है, कह रहा है पुड़िया होटल में रह गई है  औऱ होटल यहाँ से 60 किलोमीटर दूर है औऱ हाँ एक बात औऱ यार अब तू मुझे ड्रग पे भाषण मत पेलना। पुड़िया लिऐ बिना मुझसे एक्टिंग नही होती। 
     मोहित ने एक तीखी नज़र सुदर्शन पर डाली फ़िर हँसते हुए कहा बिना पुड़िया मुझसे भी डायरेक्टिरी कहाँ होती है?  मूड ही नही बनता ससुरा। फ़िर दोनों मुस्कुराते हुए वैनिटी वैन की तरफ़ चल दिये। 

-  प्रदीप देवीशरण भट्ट  -
26:06:2021

Saturday, 17 April 2021

"असमंजस"

         
         " असमंजस  "

    लगभग 23-24 वर्ष पहले का वाक्या है। मैं देल्ही में नौकरी कर रहा था, कभी कभी मंडी हाऊस या अन्यत्र कहीं नाटक देखने भी चला जाता था। पिक्चर देखने,  घूमने औऱ कविताएँ लिखने के अतिरिक्त एक नया शौक़ लगा था औऱ वो था अंक विद्या (Nimerology) में हाथ आजमाना। 

     मई या जून का महीना चल रहा था मैं देहरादून में बडे़ भाई साहब के पास मिलने के लिए गया हुआ था। रविवार का दिन था उन्होंने मुझसे कहा शाम को प्रेमनगर एक मीटिंग में चलेंगे। मायने स्वीकारोक्ति में सर को हिला दिया। शाम को चार बजे मैं उनके साथ नियत स्थान पर पहुँच गया, लेकिन ये क्या हमारे पहुँचने के 5 मिनिट्स के बाद ही झमाझम बारिश शुरू हो गई। जल्दी ही समझ आ गया क़ि ये बारिश 2-3 घंटे से पहले तो रुकेगी नही। मीटिंग के लिए कोरम पूरा नही था सो मीटिंग पोस्टपोंड कर दी गई। जिनके यहाँ मीटिंग थी वो एक क्रिश्चन फेमिली थी। चाय के साथ बातों अनवरत सिलसिला चल निकला। कई विषयों पर बात करते हुए भाई साहब ने मेरे शौक़ के विषय में बताया तो बात numerology पर आ गई । उनकी छोटी लड़की ने मरियम ने तुरंत मुझसे कई सवाल कर डाले मैंने भी बारी बारी से उसके सवालों का जवाब दिया तभी मरियम क़ी मम्मी ने अपने लड़के शायद पीटर नाम था के विषय में कुछ जानना चाहा मेरे स्वीकृति में सर हिलाते ही दरवाजा खुला औऱ एक 15-16 साल का लड़का भीगता हुआ अंदर आया औऱ भाई साहब के पैर छुए, मेरा परिचय पाकर वो मेरे भी पैर छूने के लिए झुका तो मैंने रोकते हुए उसे गले लगा लिया। कुछ देर निःशब्दता छाई रही फ़िर पुनः चर्चा शुरू हो गई। पीटर ने स्वयं ही बता दिया क़ि पिछले लगभग एक वर्ष से वह साधुओं के संपर्क में है उसे चर्च जाना अच्छा नही लगता वो सन्यास लेना चाहता है। एक बारगी तो मैं भी चक्कर खा गया क्यों क़ि इस तरह क़ी स्थिति उत्पन्न होगी इसकी मैंने कल्पना भी नही क़ी थी वैसे भी इस समस्या का समाधन numerology के माध्यम से होने का प्रश्न ही नही था । मैं कुछ देर शांत रहा फ़िर पीटर क़ी DOB ली कुछ गुणा भाग किया तो इतना समझ आ गया क़ि अंक सात का जबरदस्त प्रभाव है किंतु ये अस्थाई है। ख़ैर कुछ देर बाद मैंने मनोचिकित्सक क़ी भाँति उससे बात क़ी। मैंने पूछा तुमने कौन कौन सी धार्मिक पुस्तकें पढ़ी हैं उसने तपाक से श्रीमद्भागवत औऱ रामायण का नाम लिया, मैंने पूछा बाईबिल तो उसने कहा, नही, मैंने पूछा क्यों, तो उसने कहा अंदर से इच्छा नही होती। 
       मैंने उससे कुछ औऱ प्रश्न पूछे जिसका उसने बड़ी बेबाकी से उत्तर दिया। मेरे एक प्रश्न क़ि जिन साधुओं के पास तुम जाते हो क्या वे तुम्हें क्रिश्चियन धर्म त्यागने औऱ सनातन धर्म अपनाने के लिए किसी तरह का प्रेशर डालते हैं तो उसने हँसते हुए कहा भईय्या वो सब मस्त रहते हैं कुछ भी उल्टा सीधा पाठ नही पढ़ाते वरन कहते हैं जब तक तेरा मन हो आया कर जब ना हो तो मत आना। 

      मैंने कहा ठीक है तुम अगले तीन महीने तक साधुओं क़ी टोली के वहाँ न जाओ बल्कि घऱ में एक घंटा बाईबल पढ़ो, हर संडे चर्च जाओ अगर उसके बाद भी तुम्हारा मन न करे तो तुम वही करना जो तुम्हारा मन करे। मैं तीन महीने बाद सिर्फ़ तुमसे मिलने स्वयं आऊँगा। पीटर ने कुछ देर तक सोचा फ़िर पैरों को हाथ लगाते हुए बोला ठीक है भैय्या ये भी करके देखता हूँ। शायद मम्मी को ख़ुशी मिले। फ़िर मैंने बात बदलते हुए हँसते हुए कहा मेरी दक्षिणा ? उसने कहा कितने देने हैं, उसकी मम्मी उठी भी मैंने हाथ के इशारे से रोकते हुए कहा पैसे नहीं अपन को गर्म समोसे मांगता। वो मुसकुराता हुआ उठा औऱ छाता लेकर बाहर क़ी ओर चला गया। 

       मैंने पीटर क़ी मम्मी को कहा मैंने जानबूझ कर उसे बाहर भेजा है ताकि आपको कुछ बता सकूँ। देखिए पीटर पर  ज्य़ादा दबाव न बनाएं। मैं एक प्रयास कर रहा हूँ मुझे उम्मीद है सफ़लता मिलेगी। अगर फ़िर भी वो संन्यास लेना चाहता है तो उसे डांटे डपटें नहीं। कुछ औऱ सुझाव देते हुए मैंने उन्हें ईश्वर पर विश्वास करने क़ी बात कही। तब तक पीटर भी समोसे ले आया था। चाय समोसे चट्ट करने के बाद हमने उनसे विदा ली। रास्ते में स्कूटर चलाते हुए भाई साहब ने मेरा नया नामकरण कर दिया। 'स्वामी प्रदीपानंद'! !

(c)प्रदीप देवीशरण भट्ट
17:04:2021

Monday, 8 February 2021

"पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन औऱ मानदेय"

“पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशक और लेखकों का मानदेय”
इससे पहले कि मैं इस विषय में अपने विचार प्रकट करुँ मैं आपके साथ महाभारत की एक घटना साझा करना चाहता हूँ।  ईश कृपा से जब वेदव्यास जी ने जब यह जान लिया कि द्वापर के अंत में और कलयुग प्रारम्भ होने से पूर्व एक ऐसा युद्द लडा जाएगा जिसमें अट्ठारह अक्षोणिनी सेना का विनाश होना तय है तब उन्होंने इसे पूर्व में ही कलमबद्ध करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने सर्वप्रथम ब्रह्मा जी से आज्ञा ली और निवेदन किया कि आप तीनों लोकों में कोई ऐसा व्यक्ति या देवता बतावें जो  इसे कलबद्ध करने में सहायक हो तब ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान विष्णु जी के पास जाने का अनुरोध किया । वेदव्यास जी भगवान विष्णु के पास गये और उन्हें अपनी समस्या बताई साथ ही निवेदन किया कि वे इस पुनीत कार्य में उनकी सहायता करें। भगवान विष्णु ने कहा हे! वेदव्यास मेरी दृष्टी में एक मात्र गणेश ही ऐसा है जो यह कार्य अविरल गति से कर सकता है अतएव आप देवाधिदेव भगवान शंकर के पास जाएँ एवम उनसे गणेश जी को इस पूनीत कार्य के लिए माँग लें। वेदव्यास जी तुरंत भगवान शंकर के पास पहुँचे और लेखन कार्य के लिए गणेश जी की सहायता का अनुरोध किया। शंकर जी ने कहा ठीक है किंतु आप स्वंय गणेश से ही इस विषय में अनुरोध करें वो आपकी बात भी कदापि न टालेगें। तुरंत गणेश जी को बुलाया गया, वेदव्यास जी ने उनसे महाभारत काव्य के लेखन का भार वहन करने का अनुरोध किया। गणेश जी ने कहा मुझे कोई आपत्ति नही किंतु एक अनुरोध है कि मेरी कलम एक बार लिखने के लिए उठी तो वह लगातार लिखेगी अतएव आप इस बात का ध्यान रक्खें कि मेरी कलम रुकने न पाए, अगर रुकी तो मैं तुरंत ही कार्य मध्य में ही छोड दूँगा। वेदव्यास जी भी तुरंत ही समझ गये कि गणेश कार्य बंधन में बंधने के इच्छुक नही है इसलिए वे इस प्रकार का व्यव्हार कर रहे हैं। वेदव्यास जी ने गणेश जी से कहा मुझे आपका प्रस्ताव स्वीकार है किंतु मेरा भी एक अनुरोध है कि जब तक आपको मेरे श्लोक का अर्थ स्पष्ट न हो आप उसे कलम बद्ध न करें। गणेश जी ने इस पर अपनी सहमति दे दी। जब लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ तो वेदव्यास जी ऐसे श्लोकों की रचना करते जिनका अर्थ समझने में गणेश जी को अधिक समय लग जाता और उस दौरान वेदव्यास जी अगले कई शोलोकों की रचना कर लेते थे।

• भारत में 31 मार्च 2014 तक कुल 99,660 अखबार और पत्रिकाओं का रजिस्ट्रेशन हुआ है। इनमें 13,761 अखबार और 85,899 पत्रिकाएं हैं। सबसे ज्यादा अखबार और मैगजीन हिन्दी में छपते हैं। हिन्दी में कुल 40,159 अखबार-मैगजीन हैं।

• भारत का पहला न्यूज पेपर 'द बंगाल गैजेट' 29 जनवरी 1780 को जेम्स अगस्टस हिक्की द्वारा प्रकाशित किया गया था. इसे 'कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर' भी कहा जाता था और लोग इसे 'हिक्की गेज़ेट ' के रूप में याद रखते थे। 

कलयुग से तात्पर्य मशीनों के युग से है। आज भी कमोबेश वही स्थिति है। लोग बिना सोचे समझे बस लिखे जा रहे हैं क्यों कि उनको लिखना है, छपना है और खपना भी है। कम लिखो किंतु अच्छा लिखो कोई नहीं कहता बस लिखो, छपो, और और इस अंधी दौड में खप जाओ।  लेखन की स्थिति यह है कि एक से बढकर एक पत्रिकाएँ बंद हो गई है और तो जाने दीजिए लब्ध प्रतिष्टित “ गीता प्रेस,गोरखपुर भी बंद हो गई है। आजकल जिधर भी देखिए कुकरमुत्ते की तरह प्रकाशक उभर आएँ हैं  और ऐसा इसलिए कि लोग छ्पना चाहते हैं इसलिए उनका काम सिर्फ इतना ही है कि वे टैकस्ट बुक की तरह किताबें छापें बिना यह जाने कि ये छपने योग्य हैं भी या नहीं। प्रकाशक को पैसा चाहिए और छपने वाले को वाह वाही। ऐसी स्थिति में गुणवत्ता की बात करना ही बेईमानी है । इनसे भी बुरा हाल उन समाचार पत्रो का है जो दो चार पंक्तियों की कविता के साथ कवि को फोटो छाप रहे हैं। उन्हें ये मालूम ही नही कि इनसे उनकी साख दिन प्रतिदिन और नीचे गिर रही है। क्यों कि ऐसे प्रकाशक कवि वगैरह कुछ भी नही हैं न ही उन्हें कविता का क आता है सिर्फ और सिर्फ व्यापार। उनकी भी मजबूरी है पत्रि पत्रिकाएँ या न्यूज़ पेपर चलाए रखने की तो लेखकों को मानदेय कौन देगा और कहाँ से देगा। अब तो धीरे धीरे स्थिति ये आ गई है कि पत्र पत्रिकाओं में या समाचार पत्रों में छपने के लिए प्रकाशक उल्टे लेखकों से मानदेय लेगा। अब ऐसी स्थिति में आप साहित्य की बडी बडी बातें तो भूल ही जाइये।

Friday, 29 January 2021

"दिलकश अदा" A bueatifull date


 “दिलकश अदा” 
“ ब्यूटीफुल डेट”

दोस्तों ये बात है 2003 की, मैं शाहदरा (देल्ही) से रोज़ाना 08:50 बजे की रुट नम्बर 317 की DTC बस से कनाट प्लेस जाता था। कुछ दिनों से उस समय की बस उपलब्ध न होने के कारण किसी सह-यात्री ने एक स्वराज माज़दा को बुक कर लिया था। हम कुछ चुनिंदा लोग ही उससे सफर करते थे। 2003 में ही रिलायंस के मोबाईल ने दूरभाष के क्षेत्र में क्रांति ला दी थी। 16500/- की कीमत पर (स्टालमेंट में भी उपलब्ध था) सैमसंग या मोटोरोला जो जिसको पसंद हो। मैंने भी अपने लिए एक स्टालमेंट में बुक किया। उसे बड़ी शान से सहेज कर रखते थे। कोई देखना भी चाहे तो दूर से ही दर्शन कराते थे (जैसे उसके हाथ में लेते ही काल लग जाएगी) ख़ैर लगभग तीन महीने बाद ये घटना घटी। मैं 08:40 बजे उस स्वराज माज़दा में चढ़ा और अपनी नियत सीट पर बैठ गया तभी एक आवाज आई।  

- माफ कीजिए शायद आपका मोबाइल गिर गया है ।

- मैंने प्रश्न वाचक दृष्टी से अपनी ग्रीवा को उधर घुमाया जहाँ से आवाज़ आई थी। देखा तो पाया कि एक गोरे रंग की औसत कद की गोरी मेरी ओर ही निहार रही थीं । मैने पूछा आप मुझसे मुखातिब हैं ?

- जी हाँ मैं ही ...आगे के शब्द उसने अधूरे ही छोड़ दिये थे।

- मैंने तुरंत जेब में हाथ डाला, मोबाईल जेब से नदारत था, तुरंत सीट के नीचे झुककर देखने का प्रयास किया किंतु स्पेस कम होने के कारण देख न सका।
- उसने बडी अदा से मेरे पीछे की सीट पर जाकर मोबाईल उठाया मुझे पकड़ा दिया। मैंने शिष्टाचार निभाते हुए उन मोहतरमा की तरफ मुस्कान के साथ शुकिया उछाल दिया। जिसे उन्होंने बडी शालीनता के साथ कैच भी कर लिया। 

- अगले पाँच सात मिनिट्स तक इधर उधर की बातें होती रहीं फिर उन मोहतरमा ने अपना मोबाईल नम्बर दिया:  9385711878। शिष्टता वश मैंने भी अपना मोबाईल नम्बर: 9385731221 उनके साथ शेयर किया। 

- -चूँकि रिलायंस टू रिलायंस फ्री था तो पहले पहले यदा कदा बातें होती रही फिर धीरे धीरे दिन दो या तीन बार। 

- चूँकि मेरे office के सामने मोहन सिंह पैलेस में इंडियन काफी हाऊस था और देल्ही सरकार का भी एक काफी होम ऑफीस के पास ही खुल गया था, तो बातों बातों में उन मोहतरमा ने बताया कि वो चाय नहीं पीती हैं सिर्फ और सिर्फ काफी । सो शिष्टाचार वश मैंने उन्हें काफी पर Invite कर लिया। फिर तो सप्ताह में एक या दो बार शाम को हम बस पकडने से पूर्व काफी हाउस में बैठ जाते। मैं कभी कभी ऑफिस अपनी बाइक से कभी मेट्रो से आ जाता था तो 10:30 के अंदर उन मोहतरमा का फोन आ जाता। अरे आज आप कहाँ रह गये थे? मैं इंतज़ार कर रही थी या अगर आपको बाइक से आना था तो मुझे पिक कर लेते वगैरह वगैरह।

 एक बात विशेष जब बंदी बोलना शुरु करती थी तो उसे रोकना मुश्किल होता था। रिश्तों पर, दोस्ती पर, लम्बे लम्बे भाषण देना उसका शगल था। जब एक बार उसने दोस्ती के विषय में पूछा तो मैंने कहा मैं सिर्फ दोस्त की दोस्ती से मतलब रखता हूँ उसकी पारिवारिक या निजी ज़िंदगी में दखल देना बिलकुल भी पसंद नहीं करता। “दोस्ती देने का नाम हैं-पाने की चाह का नहीं” उसने मज़ाक में ही कहा था यार तुम तो साधु संतो जैसे प्रवचन देते हो फिर बोली अपना नाम प्रदीप भट्ट से “स्वामी प्रदीपानंद” कर लो।
 उसकी इस बात पर मैं भी मुस्कुराए बिना न रह सका। 

- -ऐसे ही मार्च-2004 आ गया। एक दिन अकस्मात उसने कहा शाम को मिलो बहुत ज़रूरी बात करनी है। मैंने कहा मार्च चल रहा है वर्किग डे में तो सम्भव नही है कल शनिवार को मिलते हैं वैसे अगर ज़्यादा ज़रुरी है तो फोन पर बता दो, वो बोली नही Saturday मेरा half होता है कल तीन बजे मैंने कहा ठीक है। 
- -मैं 2:45 पर ही काफी होम पहुँच गया। बंदी आई मैंने पूछा कुछ खाना है या सिर्फ काफी। उसने कहा सिर्फ काफी नहीं कुछ खिलाओ भी मैं आज लंच नही लाई थी। मैंने आर्डर दिया वेटर ने कहा सर 15 मिनिट वेट करना पडेग़ा। मैंने कहा कोई बात नही और फिर बातों का सिलसिला चल निकला। दस मिनिट् बाद मैंने टोकते हुए कहा पहले ज़रुरी बात कर लो मोहतरमा, उसने कहा हाँ यार, ऐसा है कि मम्मी ने आपको घर पर Invite किया है। अपने  चिरपरिचित अंदाज़ में मैंने पूछा क्यों भाई?  उसने घूरते हुए कहा ये तो वो ही बताएगीं। मैंने असमंजस की स्थिति में पूछा क्या निकिता (उसकी बड़ी बहन) की शादी पक्की हो गई। उसने कहा वो तो दो महीने पहिले ही पक्की हो गई। 7 अप्रैल की शादी भी फिक्स हो गई है समझे। अब मुझे थोड़ी सी घबराहट होने लगी थी। (तभी वेटर आर्डर रख कर चला गया) अपने को सयंत करते हुए मैंने काफी की सिप ली और पूछ ही लिया “फिर किस कारण से बुला रही हैं” अब उसके चेहरे पर झुंझलाहट साफ दिखायी दे रही थी। फिर मुस्कुराते हुए कहा मेरी शादी के लिए! अब मैं पूरी स्थिति समझ चुका था। मैंने सैंड्विच और काफी की ओर इशारा करते हुए कहा कुछ खा पी लो फिर बात करते हैं। पता नहीं उसे क्या लगा ह्त्थे से उखड़ते हुए उसने कहा पहले कह डालो फिर खा पी लूँगी। मैंने एक लम्बी उच्छ्वास भरते हुए पर्स निकाला और अपनी बेटी की फोटो दिखाते हुए कहा तुम्हें शायद गलत फहमी हो गई है मैं शादी शुदा हूँ और इस बच्ची का बाप भी। उसने दोनों हाथों में सर पकड़ते हुए मुझे खूब बुरा भला कहा। कुछ लोग हमारी तरफ देखने लग पडे थे कई तो जानते भी थे। मैंने कहा इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है मेरी तरफ से दोस्ती अभी भी औन है। उसने फिर मुझे घूरा और कहा भाड में जाओ तुम और भाड में जाए तुम्हारी दोस्ती। 
फिर पैर पटकते हुए वो बिना कुछ खाए पीए काफी होम से बाहर। 

- मैं ये सोचकर परेशान ये सैंड्विच (उसका),औऱ डोसा (जो मेरा आर्डर था) दो काफी हे भगवान कैसे खाऊँगा/पीऊँगा। लेकिन दोनों आइटम्स को पेट के हवाले कर मैं भी घऱ क़ी ओर चल दिया। 

- इसी बीच 2006 में मैं देल्ही से ट्रांसफर होकर मुम्बई आ गया। 13 अक्टूबर-2007 को देल्ही से मुम्बई की फ्लाइट पकड़ने मैं घर से निकला। प्लान किया कि पहले कनाट प्लेस चलते हैं हनुमान मंदिर की आलू की सब्ज़ी और कचौरी खाई जाए फिर एक ठो काफी फिर वहीं से एअर पोर्ट। कश्मीरी गेट से मेट्रो चेंज करते हुए क्या देखता हूँ वही मोहतरमा एक दो-ढाई साल के बच्चे का हाथ पकड़े मेरे साथ साथ मेट्रो में प्रवेश कर रहीं हैं , नज़रें मिली, उसने एक हल्की सी मुस्कान मेरी ओर उछाल दी मैंने भी शिष्टाचार का पुन: पालन किया और मुस्कुराकर अभिवादन किया। फिर उसने बच्चे की ओर इंगित करते हुए कहा बेटा अंकल को हेलो कहो, बच्चे ने झट से मेरी ओर हाथ बढा दिया मैंने भी गर्म जोशी से हाथ मिलाते हुए कहा “कैसे हो दोस्त, क्या नाम है आपका ? बच्चा बोला शलभ अंकल। मैंने जानबूझ कर दोस्त शब्द पर ज्यादा ज़ोर दिया था। एक उचटती सी नज़र मैंने उन मोहतरमा पर डाली, उसने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा सॉरी, मैंने हँसते हुए कहा कोई बात नही, गलत फहमी के लिए तो आपको माफ किया परंतु उस सैंड्विच, डोसा और दो काफी पीने के लिए मजबूर करने के लिए माफी ..फिर रुककर कहा फिर कभी। 
-
-                                                                                -प्रदीप देवीशरण भट्ट- -30:01:2021

Friday, 8 January 2021

" बचपन-पचपन"

      "बचपन-पचपन" 

मखमल से गद्दे पे लेटा 
गहरी निंद्रा में वो लीन
जब चाहेगा तब उठ्ठेगा 
भले बजाओ कितनी बीन 

दुनियाँदारी वो न जाने 
घऱ में सबको न पहचाने
जो भी प्यार जताता उससे 
उसको ही वो अपना माने

पापा का वो राज दुलारा 
औऱ माँ क़ी आँखों का तारा 
दादी औऱ छुटकी बुआ क़ी 
नज़र में वो है सबसे न्यारा

सबका ध्यान उसी पर रहता
पास में एक न एक है रहता 
जब दो तीन हों पास में उसके 
कहना हो ग़र आँख से कहता

जब तक है बचपन तुम जी लो 
बड़े हुए तो पढ़ लो खेलो
औऱ हुए कुछ बडे़ तो प्यारे 
बस एक दूजे क़ो ही झेलो 

- प्रदीप देवीशरण भट्ट - 
08:01:2021

Thursday, 7 January 2021

"यात्रा तीन ज्योतिर्लिंग क़ी"

                 “यात्रा वृतांत”
जब तक हमें किसी बात का भान न हो तब तक हम दीन दुनियाँ से बेखबर रहते हैं और जैसे ही हमें थोडी सी भी जानकारी हो जाए हम परेशान हो जाते हैं, और खंगालने लगते हैं अगले पिछ्ले सभी रिकार्ड्। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 1987 में ट्रेनिंग के लिए नासिक आया तो त्रम्बेक्श्वर के दर्शन कर लिया बिना तब ये नहीं पता था कि ये ज्योतिर्लिंग हैं। जब पता चला तो उत्कंठा हुई कि और कहाँ कहाँ हैं सूची निकाली ।त्रम्बेक्श्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन तो दो तीन बार और कर लिए किंतु बाकी का नम्बर नहीं आया या ये कहूँ कि जब तक प्रभु न चाहें तब तक दर्शन थोडे ही होने हैं खैर 2013 में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग (नागेश्वर धाम छूट गया), 2018 में उज्जैन, ओम्कारेश्वर, 2019 में मल्लिकार्जुन ,2019 में ही बाबा विश्वनाथ। फिर कोरोना काल आ गया घर में पडे पडे पगला सा गय सो नवम्बर में देल्ही को निकल गए और दिसेम्बर में रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग का प्लान बनाया । गुजरात से आने वाले ट्रेन का 23 दिसम्बर को टिकिट भी बुक हो गया किंतु वापसी का नहीं। फिर सर्च किया और अपने प्रिय मित्र सुहास भटनागर के साथ पर्लीवैजनाध ज्योतिर्लिंग, घ्र्ष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग और भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के दर्शन का प्लान किया और देखिए 23 दिसम्बर की ही टिकिट मिल भी गई। यहाँ यह कहना आवश्यक है कि मैं लगभग 13 वर्ष मुम्बई रहा किंतु इन तीनों ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का बस प्लान ही बनता रहा फलीभूत कभी नहीं हुआ।
अब चूँकि कोरोना काल है,लिमिटिड ट्रेन हैं सो 24 दिसम्बर को समय से 40 मिनिट्स पूर्व ही पर्ली पहुँच गये, फ्रेश हुए और पहुँच गये आटो पकड कर भोले के दरबार में वो खाली और हम भी सो तसल्ली से दर्शन लाभ लिया, नाश्ता किया और चल पडे बीड बस द्वारा ( No direct bus service is available), बीड से फिर बस बदली और औरंगाबाद ( यार महाराष्ट्र कैबिनेट ने जब औरंगाबाद का नाम सम्भा जी के नाम पर करने के लिए निर्णय ले लिया तो फिर अब तक काहे नहीं किया, बहुत लेट लतिफी है भाई) फिर औरंगाबाद से घ्र्ष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग (ऐलोरा की गुफाएँ आधा फर्लांग की दूरी पर हैं), कमरा लिया फ्रेश हुए और पहुँच गये मंदिर दर्शन के लिए सांय की आरती में सम्म्लित होना एक रोमांचकारी अनुभव था मैंने इससे पहले कभी ये अनुभव नहीं किया, मैं उस दौरान शायद भक्ति में पूरा लीन हो चुका था। फिर अगले दिन प्रात: पुन: दर्शन किए फिर पहुँचे ऐलोरा (1987 में पहले भी देख चुका हूँ शायद घ्र्ष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग  के दर्शन किये हों किंतु याद नहीं) ऐलोरा में कुछ समय व्यतीत कर मंदिर से सादिलाबाद से औरंगाबाद से अहमदनगर से आड़े फाटा से मंचर से 21:15 पर आखिर भीमा शंकर पहूँच ही गये। भीमाशंकर में रुकने के नाम पर (मंदिर के पास) बहुत बुरा अनुभव हुआ। 

खैर सुबह फिर भोलेनाथ के दर्शन किया वो भी पूरी तसलल्ली के साथ्। फिर नाश्ता और फिर बस द्वारा पूना। वहाँ मैं अपने ऑफ़िस के गेस्ट हाऊस में रुका सुबह ऑफ़िस के सामने वाली लेन पर नाश्ते के लिए और क्या देखते हैं सड़क के दोनों ओर बरगद के घने और मोटे मोटे वृक्ष। सुहास जी तो धड़ाधड़ फोटो लेने लगे वो इस माहौल को अपने मोबाईल में क़ैद करके बहुत संतुष्ट दिखे। सांय को उन्हें हैदराबाद की बस के हवाले कर मैं मुम्बई के लिए प्रस्थान कर गया। लगभग डेढ वर्ष बाद मुम्बई आना हो रहा था।  घूमता घाता मैं भी 31 दिसम्बर को वापिस हैदराबाद वापिस आ गया। किंतु इस एक हफ्ते के प्रवास की यादें अभी दिमाग से निकल नहीं पा रही हैं। 


-प्रदीप देवीशरण भट्ट- -07:01:2021

Thursday, 17 December 2020

"आत्मिक सुख"


"मुझे बदनाम करने से, तुम्हें हासिल न कुछ होगा 
चलो ऐसा करो कुछ तुम, मुहब्बत हमसे हो जाए”

दिनांक: 13:12:2020 को लगभग 11:15 बजे सुहास जी का फोन पर आदेश आया कि जिंदादिल शख़्सियत के मालिक प्रिय राजकुमार जी अपनी गाड़ी लेकर चलने वाले हैं अतएव आप मिट्टीगुडा मेट्रो स्टेशन पहुँच जाएँ, विजय लक्ष्मी बस्वा भी वहीं पर हमें ज्वाइन करेगीं। (तय कार्यक्रम के मुताबिक पहले हमें मियापुर मेट्रो स्टेशन पर 13:00 मिलना था) एक लंबे अरसे बाद गाना गाते चुहलबाजियाँ करते हुए हम लोग मियापुर पहुँचे मैने आर्या जी को फोन किया तो उन्होंने कहा आप लोग चले मैं थोडी देर में निकलती हूँ। हमने बिंदास फिर गाड़ी आगे बढ़ा दी “गूगल माता के सहारे” सुहास जी ने हँसते हुए कहा  राज जी हम लोग जल्दी पहुँच जाएगें और “लीजीए गूगल माता नाराज़ हो गई”। हमें कायदे से 13:30 तक पहुँच जाना चाहिए था किंतु गूगल माता ने “सब इतना गडमड कर दिया कि हमें पुराने तरीके अपनाने पड़े और कभी आटो वाले से कभी चौकीदार से कभी फल वाले से पूछते थक नहीं गए वरन पक गये । (अच्छी बात ये थी कि पेट्रोल टैंक फूल था)  गैर भला हो आटो में बैठी उस कृष्णकली का जिसने हमें अपने पीछे आने को कहा और लगभग 14:15 बजे हम “एलिएन स्पेस स्टेशन, तेलापुर, हैदराबाद”” पहुँच गये। मैंने मन ही मन कहा बेटा “एलिएन” से मिलने आए हो तो ठंड रक्खो। 

  अपरान्ह 15:00 बजे आर्य जी ने क्षमा माँगते हुए दर्शन दिए तब तक हम भी अपनी भडास एलिएन स्पेस स्टेशन-14 में चल रहे एक समारोह में बिन बुलाए मेहमान की तरह घुसकर उनके रेफ्ररेशमेंट और पानी पर निकाल चुके थे अतएव हम सभी ने मुस्कुराते हुए कहा “कोई गल्ल नई जी”। हमारी तरह हसीन वारावरण का (ढूँढते- ढूँढते) आनंद लेते हुए प्रिय शिल्पी और तरुणा जी ने भी दर्शन दे दिये, कुछ देर बाद सुदेशन जी और योगेश पाण्डेय और अंत में गिटार के साथ प्रिय अनुराग मुस्कान हाजिर हुए। खैर कुछ ज़रुरी इंतज़ामात के बाद “कहानीवाला”(“कहानीवाला आर्ट एंड थियेटर”) की तृतीय सभा का कार्यक्रम शुरु हुआ।  प्रथम सत्र में जहाँ  “सबंधो के बदलते स्वरुप” पर एक गहन एवम सार्थक चर्चा की गई। वही मध्यान में प्रिय अनुराग के द्वारा गाए लोकगीत/गज़ल का आनंद गिटार के साथ लिया गया। 

दूसरे सत्र में कविताओं,गीत,गज़ल नज़्मों का एक बेहतरीन दौर चला जिसमेन,अनुराग मुस्कान अपनी एक कविता से समां बांधा वहीं योगेश पाण्डेय ने अपनी कविता “दूर कही ले जाकर तुम्हें/मैं तुमहारे पास आना चाहता हूँ, श्आर्या झा ने हथेली पर मेरी चाँद तुमने/पेशानी पर मैंने प्यार लिखा, मंजूला दूसी ने “जानती हूँ की बहतु दूर निकल आए हैं, तरुणा मन्ना ने “क्यूँ इतनी गहरी उदासी में खोई रहती हूँ” ,शिल्पी भटनागर ने क्यूँ न चिंतन करें/आत्म मंथन करें व तुझे आजकल मैं सोचता हूँ”, सुदेषणा सामंथा ने एक दीवानगी सी हो गई है/हर शाम तुम्हें देखने की आदत हो गई है”  विजया बस्वा ने अपनी एक रचना के माधयम से कोरोना पर जमकर अपनी भडास निकाली, राजकुमार छाबरा ने बच्चों की मनोदशा पर बेहतरीन रचना “दूसरे बच्चे का पदार्पण पर पहले बच्चे के अह्सासात पर” प्रस्तुत की। सुहास भटनागर ने मोनालिसा पर लिखी अपनी रचना”ये जो तुम्हारी मुस्कुराहट है,मुझे मुझसे ही दूर ले जाती है प्रस्तुत कर उपस्थित लोगों का मन मोह लिया “ और अंत में मेरी बारी आई और मैंने पहले माहौल को देखते हुए अपना एक शेर पढ़ा फिर अपनी दो नज़्मों  “यदि तुम्हें उससे प्रेम है अनंत”  एवम “इस धरा पर बस तुम्हीं हो जो मुझे अच्छी लगीं” पढ़ी।
और अंत में आर्या झा जी की खूबसूरत मेहमान नवाज़ी, राज जी का चाय के प्रति अटूट प्रेम और बिना किसी लाग लपेट के चाय की फर्माइश करना मेरा भूख लगने पर समोसों पर टूट पड़ना। एक ख़ुशनुमा माहौल, खूबसूरत लोग  खूबसूरत बातें, कुछ मुस्कुराते चेहरे,मर्यादित चुहलबाज़ी।  सब कुछ मन को कहीं अंदर तक छू गया। सुदेशना जी द्वारा आयोजित कहानीवाला की दूसरी मीटिंग की याद भी ताज़ा कर गया। हाँ शर्मा जी और नेहा जी हमने आप दोनों को मिस किया। 

आपका अपना ही
-प्रदीप देवीशरण भट्ट-