Friday, 2 September 2016

बीमार मानसिकता




“बीमार मानसिकता का कोई इलाज नहीं”

      पिछले दिनों एक लेख पढ़ रहा था जिसमे राम राज उर्फ़ उदित राज भारतीय खिलाड़ियों पर कुछ लिखने की चेष्टा कर रहे थे किन्तु जब कुछ ज्यादा समझ नहीं आया तो वही पुराना आरक्षण रूपी अस्त्र को चला बैठे। समझ नहीं आता हमारे देश मे हर वो व्यक्ति जिसका राजनीति से कुछ लेना देना हो या न हो आरक्षण पर अपनी विद्यता दिखने से क्यों बाज नहीं आता। अब यही एक क्षेत्र छुट गया है जहाँ इनका बस चले तो स्पोर्ट्स मे भी कोटा सिस्टम लागू करवाकर ही माने। उदाहरण अगर उच्च जाति का खिलाड़ी 200 मीटर भाला फेंक सकता है तो आरक्षित खिलाड़ी को 150 मीटर मे ही पास माना जाएगा, अगर हॉकी मे उच्च जाति का खिलाड़ी 5 गोल करेगा तो आरक्षित खिलाड़ी को 2 गोल पर ही पदक देना होगा, अगर वेट लिफ्टिंग मे उच्च जाति का खिलाड़ी 400 पॉण्ड वजन उठाता है तो आरक्षित खिलाड़ी को 250 पॉण्ड पर ही पदक से नवाजा जाना आवश्यक होगा आदि आदि। और ये सब नियम राष्ट्रीय ही नहीं वरन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं जैसे एशियन गेम्स और ओलंपिक मे भी मान्य करने होंगे अन्यथा भारतीय खिलाड़ी भाग नहीं लेंगे। ये सब बेहूदगियाँ क्यों और कब तक ? एक शोभा डे कम हैं जो अनर्गल प्रलाप करती फिरती हैं जो अब उस जमात मे उदितराज भी शामिल हो गए हैं।
      उदित राज का हालिया बयान कि उदित राज ने ट्वीट किया, "जमैका के यूसैन बोल्ट ग़रीब थे और तब उनके ट्रेनर ने उन्हें बीफ़ खाने की सलाह दी, जिसके बाद यूसैन बोल्ट ने ओलंपिक में कुल नौ गोल्ड मेडल जीते." या “पी वी सिंधु और साक्षी मलिक” के ओलंपिक मे पदक जीतने पर लगभग 9 लाख लोग गूगल मे ये ढूंढ रहे थे कि इन दोनों खिलाड़ियों कि जाति क्या है ये कहकर वो क्या साबित करना चाहते हैं।अब प्रश्न ये है कि भई ये उदित राज कौन हैं और ऐसा प्रलाप क्यों कर रहे हैं। आइये कुछ जानकारी साझा करते हैं।
      अब यही एक क्षेत्र छुट गया है जहाँ इनका बस चले तो स्पोर्ट्स मे भी कोटा सिस्टम   लागू करवाकर ही माने। उदाहरण अगर उच्च जाति का खिलाड़ी 200 मीटर भाला फेंक     सकता है तो आरक्षित खिलाड़ी को 150 मीटर मे ही पास माना जाएगा, अगर हॉकी मे     उच्च जाति का खिलाड़ी 5 गोल करेगा तो आरक्षित खिलाड़ी को 2 गोल पर ही पदक देना होगा, अगर वेट लिफ्टिंग मे उच्च जाति का खिलाड़ी 400 पॉण्ड वजन उठाता है तो       आरक्षित खिलाड़ी को 250 पॉण्ड पर ही पदक से नवाजा जाना आवश्यक होगा आदि    आदि। और ये सब नियम राष्ट्रीय ही नहीं वरन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं जैसे एशियन गेम्स    और ओलंपिक मे भी मान्य करने होंगे



       






         उदित राज का जन्म 1 जनवरी 1958 को खटीक जाति मे रामनगर (उत्तर प्रदेश) में  हुआ। उदित राज ने भारतीय राजनीति मे अपना भविष्य तलाशने के उद्देश्य से इंडियन जस्टिस पार्टी  की स्थापना की। किन्तु अनंत इच्छाओं के रथ पर सवार उदित राज को जब ज्यादा कामयाबी हाथ नहीं लगी तो फ़रवरी 2014 में उदितराज ने  इंडियन जस्टिस पार्टी  का विलय भारतीय जनता पार्टी मे कर लिया और आज वो भाजपा के लोकसभा सांसद हैं। इससे पहले कि मैं खटीक समाज पर कुछ प्रकाश डालूँ यहाँ ये बताना आवश्यक हो जाता है कि श्रीमान उदितराज कि पत्नी (सीमा खत्री)एक उच्च जाति “खत्री” से हैं। अगर वो आरक्षण के इतने ही समर्थक हैं तो क्यों नहीं महादलित स्त्री विवाह किया। इसका अर्थ ये भी हो सकता है कि सीमा खत्री से विवाह उपरांत भी उदित राज अपने मन से हीन भावना निकाल पाने मे असमर्थ रहे।

      इतिहास के आलोक मे अगर नज़र दौड़ाए तो पाएंगे कि खटिक जाति के लोगों ने धर्मांतरण के विरोध स्वरूप शस्त्र को उठाया और वीरता कि अनेकों गाथाएँ लिखी किन्तु उदित राज जी को शायद इस का भान नहीं हैं।आज जिसे दलित और अछूत आप मानते हैं न, उस जाति के कारण हिंदू धर्म का गौरव पताका हमेशा फहराता रहा है। हिंदू खटिक जाति: एक धर्माभिमानी समाज की उत्‍पत्ति, उत्‍थान एवं पतन का इतिहास, लेखक- डॉ विजय सोनकर शास्‍त्री के अनुसार  खटिक जाति मूल रूप से वो ब्राहमण जाति है, जिनका काम आदि काल में याज्ञिक पशु बलि देना होता था।किन्तु इसमें थोड़ा बहुत नहीं बहुत ज्यादा मतभेद हैं । आदि काल में यज्ञ में बकरे की बलि दी जाती थी। संस्‍कृत में इनके लिए शब्‍द है, 'खटिटक'इसी खट्टिक का अप्रभंश खटीक है। खटीक जाति के लोग कितने अदम्य साहसी थे इसका जिक्र प्रभात प्रकाशन एवम आजादी से पूर्व कोलकाता में हुए हिंदू मुस्लिम दंगे में खटिक जाति का जिक्र, पुस्‍तक 'अप्रतिम नायक: श्‍यामाप्रसाद मुखर्जी' में आया है। यह पुस्‍तक भी प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। डॉ विजय सोनकर शास्‍त्री के लिखे।
       ऐतिहासिक द्रष्टिकोण से देखने  पर आपको इस जाति की महानता और कर्मठता का पता चलता हैं । आजादी से पूर्व जब मोहम्‍मद अलि जिन्‍ना ने डायरेक्‍ट एक्‍शन की घोषणा की थी तो मुसिलमों ने कोलकाता शहर में हिंदुओं का नरसंहार शुरू किया, लेकिन एक दो दिन में ही पासा पलट गया और खटिक जाति ने मुस्लिमों का इतना भयंकर नरसंहार किया कि बंगाल के मुस्लिम लीग के मुख्‍यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि हमसे भूल हो गई। बाद में इसी का बदला मुसलमानों ने वर्तमान बंग्‍लादेश में स्थित नाओखाली में लिया। इसी प्रकार 1857 की लडाई में मेरठ व उसके आसपास अंग्रेजों के पूरे के पूरे परिवार को मौत के घाट उतारने वालों में खटिक समाज सबसे आगे था। इससे गुस्‍साए अंग्रेजों ने 1891 में खटिक जाति को अपराधि जाति घोषित कर दिया। अपराधी एक व्‍यक्ति होता है, पूरा समाज नहीं। लेकिन जब आप मेरठ से लेकर कानपुर तक 1857 के विद्रोह की दासतान पढेंगे तो रोएं खडे हो जाए्ंगे। जैसे को तैसा पर चलते हुए खटिक जाति ने न केवल अंग्रेज अधिकारी, बल्कि उनकी पत्‍नी बच्‍चों को इस निर्दयता से मारा कि अंग्रेज थर्रा उठे। क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने खटिकों के गांव के गांव को सामूहिक रूप से फांसी दे दिया गया और बाद में उन्‍हें अपराधि जाति घोषित कर समाज के एक कोने में ढकेल दिया।
       आज हम आप खटिकों को अछूत मानते हैं, क्‍योंकि हमें खटीक जाति का सही इतिहास न बताकर उस इतिहास को दबा दिया गया है। आप यह जान लीजिए कि दलित शब्‍द का सबसे पहले प्रयोग अंग्रेजों ने 1931 की जनगणना में 'डिप्रेस्‍ड क्‍लास' के रूप में किया था। उसे ही बाबा साहब अंबेडकर ने अछूत के स्‍थान पर दलित शब्‍द में तब्‍दील कर दिया। इससे पूर्व पूरे भारतीय इतिहास व साहित्‍य में 'दलित' शब्‍द का उल्‍लेख कहीं नहीं मिलता है। हमने और आपने मुस्लिमों के डर से अपना धर्म नहीं छोडने वाले, हिंसा और सूअर पालन के जरिए इस्‍लामी आक्रांताओं का कठोर प्रतिकार करने वाले एक शूरवीर खटिक जाति को आज दलित वर्ग में रखकर अछूत की तरह व्‍यवहार किया है और आज भी कर रहे हैं। हमें शर्म भी नहीं आती, जिन लोगों ने हिंदू धर्म की रक्षा की, वो लोग ही हमारे समाज से बहिष्‍कृत हैं। मध्‍यकाल में जब क्रूर इस्‍लामी अक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया तो सबसे पहले खटिक जाति के लोगों ने ही उनका प्रतिकार किया। राजा व उनकी सेना तो बाद में आती थी। तैमूरलंग को दीपालपुर व अजोधन में खटिक योद्धाओं ने ही रोका था और सिकंदर को भारत में प्रवेश से रोकने वाली सेना में भी सबसे अधिक खटिक जाति के ही योद्धा थे। तैमूर खटिकों के प्रतिरोध से इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने सोते हुए लाखों खटिक सैनिकों की हत्‍या करवा दी और एक लाख सैनिकों के सिर का ढेर लगवाकर उस पर रमजान की तेरहवीं तारीख पर नमाज अदा की।मध्‍यकालीन बर्बर दिल्‍ली सल्‍तनत में गुलाम, तुर्क, खिलजी, तुगलक, सैयद, लोदी वंश आदि और बाद में मुगल शासनकाल में जब डरपोक हिंदू जाति मौत या इस्‍लाम चुनने में से इस्‍लाम का चुनाव कर रही थी तो खटिक जाति ने खुद के धर्म और अपनी बहु बेटियों को बचाने के लिए अपने घर के आसपास सूअर बांधना शुरू किया। इस्‍लाम में सूअर को हराम माना गया है और खटिकों ने मुस्लिम शासकों से बचाव के लिए सूअर पालन शुरू कर दिया। उसे उन्‍होंने हिंदू के देवता विष्‍णु के वराह (सूअर) अवतार के रूप में लिया। मुस्लिम जब गो हत्‍या करने लगे तो उसके प्रतिकार स्‍वरूप खटिकों ने सूअर का मांस बेचना शुरू किया और धीरे धीरे यह स्थिति आई कि वह अपने ही हिंदू समाज में पद-दलित होते चले गए।

      ऐसी महान  जाति जिसने हिन्दू समाज को आक्रांतियों से बचाने का कार्य किया उस जाति मेन पैदा हुआ एक व्यक्ति अपनी जाति के इतिहास के विषय मे कैसे नहीं जनता या जानना नहीं चाहता। शायद इसलिए कि अगर उसने इतिहास का हवाला दिया तो वर्तमान मे जो उसकी जो साख या पहचान बनी हुई है वो धूल-धूसरित होने का भय तो नहीं। उदित राज का बैडमिंटन खिलाड़ी के विषय मे यह कहना कि “जहां एक तरफ पी वी सिंधु के नाम का जयकारा लग रहा था वहीं दूसरी तरफ भारी संख्या में लोग गूगल पर यह खोजने में जुटे थे कि वह किस जाति कि है” और ये सिलसिला क्वाटर फ़ाइनल से ही शुरू हो गया था,उदित राज का यह कहना कि जब सिंघू केरोलिना मरीन से फ़ाइनल में खेल रही थी तब 9 लाख लोग गूगल पर उनकी जाति ढूंढ रहे थे और जैसे ही वे सेमीफिनल मे पहुंची तो ये संख्या 10 गुना तक बढ़ गई। कुछ ऐसा ही साक्षी मालिक के बारे में भी टिप्पणी की गई है। शायद उदितराज जी को यह इल्म नहीं है कि साक्षी मालिक हरियाणा से हैं और हरियाणा में मालिक मतलब जाट मालिक वैसे मालिक सरनेम पंजाबी भी लिखते हैं और converted मुस्लिम भी तो साक्षी के विषय मे तो clear-cut है कि वो जाट है और हिन्दू भी है अब प्रश्न रहा पी वी सिंधु का तो उदित राज जी कृपया ये समझाएँ कि उन 9 लाख या दस गुना 90 लाख लोगों मे से से कितने दलित थे कितने उच्च जाति से संबंध रखते थे शायद दलित ही ये खोजबीन कर रहे हों कि चलो दोनों मे से अगर एक भी दलित खिलाड़ी निकली तो वो उसे अपने राजनीतीक तवे पर कुछ रोटियाँ सेंकने का साधन बना पाएँ।

      इसी लेख मे आगे उदित राज क्रिकेट में कांबली(दलित) और तेंदुलकर (ब्राह्मण) का जिक्र करना नहीं भूले। फिर उन्होने प्रणव धनवाडे और अर्जुन तेंदुलकर का भी जिक्र किया। ये विषय अलग है कि अर्जुन का चयन पूर्व में ही किया जा चुका था। मतलब आज पढे लिखे लोगों मे जाति को लेकर इतने विकार भर गए हैं कि अनपढ़ों को मैं उनसे ज्यादा बेहतर मानने लगा हूँ। ऐसा इसलिए भी कि आज तक दलित, महादलित  का कार्ड खेलकर पहले काँग्रेस और अब तो सभी राजनैतिक पार्टियां अपनी रोटियाँ सेकने में कोई कसर नहीं छोडती। परसों ही “आप” के विधायक संदीप कुमार सेक्स स्केण्डल में पकड़े गए अरविंद केजरीवाल ने तुरत फुरत उन्हे मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया और कल उनका वक्तव्य आया कि चूँकि मैं दलित हूँ इसलिए मेरे खिलाफ साजिश रची गई है। आजकल तो ये फैशन बन गया है कि आप पर कोई कानूनी कार्रवाई हो तो आप तुरंत प्रभाव से प्रलाप करना शुरू कर दीजिये कि चूँकि आप दलित हैं इसलिए उच्च जातियाँ आपके विरुद्ध षड्यन्त्र रच रही हैं। मतलब बेहूदगियों को पराकाष्ठा।

:: प्रदीप भट्ट ::: 
02:09:2016
      
  







Friday, 26 August 2016

कालाहांडी




“ एक अभिशप्त जिले की कहानी- आखिर कालाहांडी ही क्यों “

 

      कालाहांडी  उड़ीसा के कालाहांडी जिले का एक शहर है।ओड़िशा का वर्तमान कालाहांडी जिला प्राचीन काल में दक्षिण कोसल का हिस्सा था। आजादी के बाद इसे ओड़िशा में शामिल कर लिया गया। उत्तर दिशा से यह नवपाडा और बालंगीर, दक्षिण में छत्तीसगढ़  के रायगढ़ और पूर्व में बूध एवं रायगढ़ जिलों से घिरा हुआ है। पूर्वी सीमा पर स्थित भवानीपटना जिला मुख्यालय है। 8197 वर्ग किमी. के क्षेत्रफल में फैले इस जिले में जूनागढ़, करलापट, खरियर, अंपानी, बेलखंडी, योगीमठ और पातालगंगा आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। एक समय में कालाहांडी से लगभग 26 KM दूर पर स्थित जूनागढ़ कालाहांडी रियासत की राजधानी हुआ करती थी। यह स्थान अपने किले और मंदिरों के लिए खासा चर्चित है। यहां के मंदिरों में उडिया भाषा में अनेक अभिलेख खुदे हुए हैं। सती स्तंभ यहां का मुख्य आकर्षण है।जूनागढ़ राउरकेला से 180 किमी. दूर है।


    रामकृष्ण आश्रम कालाहांडी के मदनपुर-रामपुर ब्लॉक में स्थित है। आश्रम में रामकृष्ण परमहंस और उनकी पत्‍नी शारदामनी देवी व स्वामी विवेकानंद के विचारों की शिक्षा दी जाती है। आश्रम में बताया जाता है कि किस प्रकार मोक्ष प्राप्त किया जाए और जनसमुदाय के कल्याण हेतु किस प्रकार कार्य किया जाए। आश्रम दो हिस्सों में बंटा हुआ है। मुख्य आश्रम में एक मंदिर, आदिवासी छात्रों का हॉस्टल, वृद्धाश्रम, डिस्पेंसरी, पुस्तकालय और साधुओं और कर्मचारियों के लिए कमरे बने हुए हैं। आश्रम ध्यान लगाने के लिए एक आदर्श स्थान है। किन्तु इस आश्रम मे आकार लोग या सीख कर भूल जाते हैं या सिखाया नहीं जाता कि मानवता से बढ़कर कोई धर्म नहीं है अन्यथा कालाहांडी बार बार नकारात्मक बातों के लिए ही क्यों चर्चा मे आता।





         






     





          बरसों पहले कालाहांडी का नाम इस बात से चर्चा मे आया था कि हिंदुस्तान मे वह पहला स्थान था जहां लोग भूख से मर रहे थे ।तब की उड़ीसा सरकार और दिल्ली मे बैठी हुई भारत सरकार को जवाब देते नहीं बन पड़ रहा था कि आजादी के बाद भी जब कि देश मे हरित क्रांति हो चुकी हो देश मे एक स्थान ऐसा भी है जो विश्व पटल पर सिर्फ इसलिए छा गया क्यों कि वहाँ पर लोग भूखे मर रहे थे। आखिर क्या कारण है कि कालाहांडी का नाम तभी क्यों सुर्खियों मे आता है जब वहाँ कुछ अनिष्ट हुआ होता है। वैसे तो उड़ीसा को पिछड़ा राज्य माना जाता है लेकिन पिछड़ा मे भी क्या अति पिछड़ा भी गिना जा सकता है।


      अब कल एक विडियो वाइरल हो गया जिसमे परसों यानि बुधवार के दिन दीना मांझी नाम का शख़्स अपनी पत्नी उमंगा जिसका तपेदिक के कारण भवानी जिला मुख्यालय के एक अस्पताल मे निधन हो गया था, के शव को अपने कंधे पर रखकर,अपनी बेटी के साथ 10 KM तक चलने को मजबूर हुआ क्याओन कि जिला अस्पताल ने मुर्दाघर की गाड़ी या एम्ब्युलेन्स देने से माना कर दिया और मजबूरी सिर्फ इतनी कि उसके पास मुर्दाघर की गाड़ी या एम्ब्युलेन्स के किराए के लिए पैसे नहीं थे। लोग तमाशा देख रहे थे या विडियो बनाने मे मस्त थे लेकिन उसकी मदद करने को नहीं। आखिर मानवता क्या सिर्फ किताबों मे पढ़ने के लिए रह गई है। ये अलग बात है कि विडियो वाइरल होने के बाद तुरत फुरत कालाहांडी जी जिला कलेक्टर बुन्द्रा डी ने गुरुवार साँय तक जांच कर रिपोर्ट दाखिल करने के लिए समय सीमा निर्धारित कर दी है।

दीना मांझ अपनी पत्नी उमंगा के शव के साथ     शव कंधे पर ढोते हुए 
   
     एक अच्छी बात ये रही कि जब ये विडियो वाइरल हो रहा था तब तक मांझी भवानी पटना से 60 KM दूर अपने गाँव मेलघरा के रामपुर ब्लॉक की बढ़ रहा था। तभी कुछ स्थानीय पत्रकारों ने इस हृदयविदारक दृश्य को देखकर एम्ब्युलेन्स का इंतजाम किया जिससे अगले 50 KM का सफर उसने इस एम्ब्युलेन्स से पूरा किया। यहाँ ये विशेष है कि बीजू जनता दल जिनकी उड़ीसा मे वर्तमान मे सरकार है ने सरकारी अस्पतालों और सरकार से संबद्ध अस्पतालों से शवों को मृतक के घर तक पहुँचाने की वयवस्था का आदेश फरवरी-2016 से ही “महापरायन योजना” के अंतर्गत दे रक्खा है।

      आखिर क्या कारण है कि एक तरफ जहां भारत वर्ष विश्व पटल पर नित नये आयाम गढ़ रहा है वहीं स्वतन्त्रता के 70 वर्षों के बात भी कालाहांडी बार बार गलत चीजों से ही क्यों चर्चा मे आ रहा है। क्यो नहीं मानव मानवता का सिर्फ चैनलों पर सिर्फ ढिंढोरा ही पीटता नज़र आता है जब कि यथार्थ मे मानवता की इक्की दुक्की घटनाएँ प्रकाश मे आती हैं।

                                                    :: प्रदीप भट्ट ::: 26.08.2016





 




  


Wednesday, 24 August 2016

बुलेट पर बैलेट भारी




“बुलेट पर बैलट भारी”
(मुस्तफा कमाल अतातुर्क’ पाशा  का कमाल” तुर्की जैसे जाहिल देश को किया निहाल”)

मुस्तफा कमाल अतातुर्क’ पाशा
(जाहिल इस्लामिक और कट्टरपंथी देश से नए पढे लिखे (मॉडर्न) युग की शुरुआत के पुरोधा)

      15 जुलाई-2016 को तुर्की मे एक नाकाम तख़्ता पलट हुआ जिसमे अप्रत्याशित रूप से तुर्की की जनता की जीत हुई। शायद इतिहास मे ऐसा कभी नहीं हुआ होगा जब सैन्य तख़्ता पलट के विरुद्ध उस देश की जनता सेना के मुक़ाबिल आकार खड़ी हो गई और तख़्ता पलट की कोशिश कर रहे विद्रोहियों को मैदान छोडकर भागने पर मजबूर होना पड़ा। इस्तांबुल और अंकारा की सड़कों पर सैन्य साजो समान से लैस विद्रोही सेना की एक टुकड़ी आम आबादी के ऊपर जंगी जहाज या हेलीकाप्टर उड़ेंगे और विरोधियों का दस्ता ऐसा सोचेगा कि वे आम आदमी पर अपनी धाक जमा लेंगे और जो जी मे आएगा वो कर लेंगे तो तुर्की कि जनता द्वारा जिस साहस का परिचय उन सैनिकों को दिया जिससे वे ही नहीं वरन पूरे विश्व परिदृश्य पर एक संदेश साफ गया कि कभी कभी परिस्थिति विकत मोड भी ले लेती है। इस तख़्ता पलट की असफल कोशिश मे जीत तुर्की की जनता की जीत हुई जो एक अच्छा शगुन ही नहीं वरन लोकतन्त्र के लिए एक अच्छा संकेत भी है।
15 जुलाई-2016 को हुए सैन्य विद्रोह की तस्वीरें 
      पिछले 60 वर्षो मे तुर्की मे ये पाँचवी बार तख़्ता पलट हुआ जिसमे जीत तुर्की की जनता की हुई। इस बार के तख़्ता पलट मे जहां तुर्की के राष्ट्रपति राजब तैयब एडोर्गन जो कि 2004 से ही तुर्की की सत्ता पर काबिज हैं इस पूरी वारदात मे निपट खामोश रहे वही तुर्की के प्रधानमंत्री बिनली यिलिदरिम बार बार कहे जा रहे थे कि मुझे विश्वास है कि ये तख़्ता पलट की कोशिश नाकाम हो जाएगी। आखिर इस तख्ता पलट की विभीषिका मे जहां 265 लोगों ने अपनी जान गवाईं और लगभग 2000 लोग घायल हुए ऐसा क्या चमत्कार हो गया कि सैन्य तख़्ता पलट की कोशिश को तुर्की जनता ने नाकाम कर दिया। एक निजी तुर्की चैनल ने तुर्की के प्रधानमंत्री बिनली यिलिदरिम का आई फोन पर एक फेस टाइम इंटरव्यू प्रसारित कर दिया, जिसमे तुर्की के प्रधानमंत्री बिनली यिलिदरिम ने तुर्की की जनता से आहवाहन किया कि वे बिना किसी डर और भय के सड़कों पर निकले और तख़्ता पलट कि इस कोशिश को नाकाम कर दें जिसके बाद लोग कर्रफ़्यू तोड़कर सड़कों पर जमा होने लगे और विद्रोही सैन्यकर्मी को मैदान छोडकर भागने पर मजबूर कर दिया।आइए आज तुर्की के विषय मे कुछ सूक्ष्म दर्शन कर लिया जाए।

       तुर्की के इतिहास को तुर्क जाति के इतिहास और उससे पूर्व के इतिहास के दो अध्यायों में देखा जा सकता है. सातवीं से 12वीं सदी के बीच में मध्य एशिया से तुर्कों की कई शाखाएं यहां आकर बसीं। इससे पहले यहां से पश्चिम में आर्य (यवन, हेलेनिक) और पूर्व में कॉकेशियाई जातियों की बसावट रही।तुर्की में ईसा के लगभग 7500 वर्ष पहले मानव बसाव के प्रमाण यहां मिले हैं। हिट्टी साम्राज्य की स्थापना 1900-1300 ईसा पूर्व में हुई थी. 1250 ईस्वी पूर्व ट्रॉय की लड़ाई में यवनों (ग्रीक) ने ट्रॉय शहर को नेस्तनाबूत कर दिया और आसपास के इलाकों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।1200 ईसा पूर्व से तटीय क्षेत्रों में यवनों का आगमन आरंभ हो गया. छठी सदी ईसापूर्व में फारस के शाह साईरस ने अनातोलिया पर अपना अधिकार जमा लिया. इसके करीब 200 वर्षों के पश्चात 334 ईस्वी पूर्व में सिकन्दर ने फारसियों को हराकर इस पर अपना अधिकार किया. बाद में सिकन्दर अफगानिस्तान होते हुए भारत तक पहुंच गया। ईसा पूर्व  130 ईस्वी में अनातोलिया रोमन साम्राज्य का अंग बना। ईसा के 50 साल बाद संत पॉल ने ईसाई धर्म का प्रचार किया और सन 313 में रोमन साम्राज्य ने ईसाई धर्म को अपना लिया. इसके कुछ सालों के अन्दर ही कान्स्टेंटाईन साम्राज्य का अलगाव हुआ और कान्स्टेंटिनोपल इसकी राजधनी बनाई गई.


      कैस्पियन सागर के पश्चिम सागर के पश्चिम मे वे मधी तुर्की के कोनया मे स्थापित हो गए 1071 में उन लोगों ने बिजेंटाइनों को परास्त कर एशिया माइनर पर अपना आधिपत्य जमा लिया। मध्य टर्की में कोन्या राजधानी बनाई और मुस्लिम संस्कृति को अपना लिया।इस साम्राज्य को 'रुम सल्तनत' कहते हैं क्योकि इस इलाके़ में पहले इस्तांबुल के रोमन शासकों का अधिकार था जिसके नाम पर इस इलाक़े को रुम कहते थे। यह वही समय था जब तुर्की के मध्य (और धीरे-धीरे उत्तर) भाग में ईसाई रोमनों (और ग्रीकों) का प्रभाव घटता गया और यहाँ ईसाइ के बदले मुस्लिम शासकों का राज हो गया था। अपने ईसाई तीर्थ स्थानों की यात्रा का मार्ग सुनिश्चित करने और कई अन्य कारणों की वजह से यूरोप में पोप ने धर्म युद्ध आह्वान किया। योरोप से आए धर्म योद्धाओं ने यहाँ पूर्वी तुर्की पर अधिकार बनाए रखा पर पश्चिमी भाग में सल्जूक़ों का साम्राज्य बना रहा। लेकिन इनके दरबार में फ़ारसी भाषा और संस्कृति को बहुत महत्व दिया गया। अपने सामानान्तर के पूर्वी सम्राटों, गज़नी के शासकों की तरह, इन्होंने भी तुर्क शासन में फ़ारसी भाषा को दरबार की भाषा बनाया। सल्जूक़ दरबार में ही सबसे बड़े सूफ़ी कवि रूमी (जन्म 1215) को आश्रय मिला और उस दौरान लिखी शायरी को सूफ़ीवाद की श्रेष्ठ रचना माना जाता है। सन् 1220 के दशक से मंगोलों ने अपना ध्यान इधर की तरफ़ लगाया। कई मंगोलों के आक्रमण से उनके संगठन को बहुत क्षति पहुँची और 1243 में इनके कई साम्राज्य को मंगोलों ने जीत लिया। हाँलांकि इसके शासक 1308 तक शासन करते रहे पर साम्राज्य बिखर गया।

     
      वर्तमान तुर्क पहले यूराल  और अल्ताई पर्वतों के बीच बसे हुए थे। जलवायु के बिगड़ने तथा अन्य कारणों से ये लोग आसपास के क्षेत्रों में चले गए। लगभग एक हजार वर्ष पूर्व वे लोग एशिया माइनर में बसे। नौंवी सदी में ओगुज़ तुर्कों की एक शाखा कैस्पियन सागर के पूर्व बसी और धीरे-धीरे ईरानी संस्कृति को अपनाती गई। ये सल्जूक़ तुर्क थे। तुर्क या ओटोमन साम्राज्य दुनिया के अब तक के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। 1839 में व्यापक सुधार आंदोलन आरंभ हुआ, जिससे सुलतान के अधिकर नियंत्रित कर दिए गए। इसी आशय का एक संविधान 1876 में पारित हुआ, किंतु एक वर्ष तक चलने के बाद वह स्थगित हो गया। तब वहाँ अनियंत्रित राजतंत्र पुन: स्थापित हो गया। 1908 में  युवक क्रांति  हुई, जिसके बाद 1876 का संविधान फिर लागू हुआ। करीब सात सौ वर्षों तक यह साम्राज्य चला। सन 1908 में समाज के युवा वर्ग ने ओटोमन साम्राज्य के निरंकुश और अधिनायकवादी शासक अब्दुल हमीद दितीय के शासन को ध्वस्त किया और देश के पुराने संसदीय जनतंत्र को फिर से लागू किया। तभी से विश्वविद्यालय के इन क्रांतिकारी छात्रों को युवा तुर्क बोला जाने लगा। इसी संविधान की वजह से तुर्की या टर्की विश्व का अकेला ऐसा देश है जो मुस्लिम बहुल (99 प्रतिशत) होने के बाद भी संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्ष है। इस राष्ट्र को यूरोप और एशिया के बीच का पुल कहा जाता है और वास्तव में राजनैतिक, भौगोलिक और सांकेतिक दृष्टि से यह देश दोनों महाद्वीपों के बीच पुल का काम करता है। इसके एक शहर इस्ताम्बुल में ऐसा पुल है जो एशिया की धरती को यूरोप की धरती से जोड़ता है। संसार में यही एक ऐसा शहर है जो दो महाद्वीपों में बसा है।
      तुर्की से संबन्धित कुछ विशेष घटनाएँ निमन्वत हैं:-
1.  एक समय में ऑटोमन साम्राज्य का केंद्र रहे तुर्की में 1920 के दशक में राष्ट्रवादी नेता       मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में धर्मनिर्पेक्ष गणतंत्र की स्थापना की गई। 1923 में तुर्की को गणतंत्र को घोषित किया गया है। मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क को तुर्की      का    राष्ट्रपति बनाया गया।
2.  1938 में अतातुर्क के निधन के बाद लोकतंत्र और बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था के    विकास में खलल पड़ गया. इसके बाद से सेना ने कई बार धर्मनिर्पेक्षता के लिए       ख़तरा समझी जाने वाली सरकारों को बेदखल किया है।
3.  1952 में तुर्की ने अतातुर्क की तटस्थता की नीति को छोड़ नेटो गठबंधन सेना के साथ हाथ मिला लिया।
4॰  1960 में डेमोक्रटिक पार्टी की सरकार का सेना ने तख़्तापलट किया।
5.  1974 में तुर्की की सेनाओं ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर नियंत्रण कर लिया जिसका नतीजा साइप्रस     द्वीप का बंटवारा था।
6.  1980 में तुर्की के चीफ़ ऑफ़ जनरल स्टाफ़ केनान एवरेन के नेतृत्व में तीसरा तख़्तापलट किया गया।
7.  1984 में कुर्द संगठन पीकेके ने अलगाववादी गुर्रिला अभियान शुरू किया जो एक गृहयुद्ध      में तब्दील हो गया. अब तक कुर्द संगठनों और तुर्की की सरकार के बीच संघर्ष जारी है।
8.  तुर्की काफ़ी लंबे समय से यूरोपीय यूनियन का हिस्सा बनना चाहता रहा है. 2005 में   सदस्यता पर     बातचीत शुरू हुई थी लेकिन इसमें बहुत धीमी प्रगति हुई है, क्योंकि कई       E.U. सदस्य देश तुर्की के     सदस्यता को लेकर पूरी तरह सहमत नहीं हैं.2011 में    सीरियाई युद्ध शुरू होने के बाद तुर्की की सीमाओं     पर लगातार स्थिति तनापूर्ण बनी हुई      है। सीरियाई युद्ध से विस्थापित हुए लाखों शरणार्थी तुर्की पहुंच रहे हैं।
9.  2015 तुर्की कई पिछले कुछ समय से कई चरमपंथी हमलों का शिकार रहा है. अंकारा में पिछले साल एक रैली पर हमला हुआ, पिछले दिनों इस्तांबुल में अतातुर्क अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर चरमपंथी हमले में कई लोगों की जान गई थी।

     
1913 में सुलतान मेहमत शासन का अध्यक्ष बना। प्रथम विश्वशुद्ध के समय टर्की के नेताओं ने जर्मनी का साथ दिया। इस युद्ध में टर्की पराजित हुए। युद्ध-विराम-संधि के होते ही अनबर पाशा और उसके सहयोगी अन्य शीर्षस्तरीय नेता टर्की छोड़कर भाग गए। एशिया माइगर  आदि क्षेत्र ब्रिटेन, फ्राँस, ग्रीस और इटली में बटँ गए। 1919 में ग्रीस ने अनातोलिया पर आक्रमण किया, किंतु मुस्तफ़ा कमाल  (कमाल अतातुर्क) के नेतृत्व में हुए संघर्ष में (1922) ग्रीस पराजित हुआ। सुलतान का प्रभाव क्षीण होने लगा और अंकारा में मुस्तफा कमाल के नेतृत्व में व्यापक मान्यताप्राप्त राष्ट्रीय सरकार की स्थापना हुई। 1923 की लासेन संधि के अनुसार टर्की का प्रभुत्व एशिया माइनर तथा थ्रेस के कुछ भाग पर मान लिया गया। 29 अक्टूबर 1923 को टर्की गणराज्य घोषित हुआ।इसके पश्चात् टर्की में अतातुर्क सुधारों के नाम से अनेक सामाजिक राजनीतिक और विधिक सुधार हुए। गणतांत्रिक संविधान में धर्मनिरपेक्षता, धार्मिक संगठनों के उत्मूलन और स्त्रियों के उद्धार आदि की व्यवस्था हुई। अरबी लिपि  के स्थान पर रोमन लिपि का प्रचलन घोषित हुआ। मुस्तफा कमाल की मृत्यु (1938) के पूर्व तक उसके नेतृत्व में रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी अत्यधिक प्रभावशाली और मुख्य राजनीतिक संगठन के रूप में रही।
     
      आधुनिक तुर्की के संस्थापक मुस्तफा कमाल पाशा मुस्तफ़ा कमाल पाशा फ़र्स्ट वर्ल्ड वार में तुर्की ने जर्मनी का साथ दिया। 1919 में मुस्तफ़ा कमाल पाशा (अतातुर्क) ने देश का आधुनिकीकरण आरंभ किया। उन्होंने शिक्षा, प्रशासन, धर्म इत्यादि के क्षेत्रों में पारम्परिकता छोड़ी और तुर्की को आधुनिक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।सेकंड वर्ल्ड वार में टर्की प्राय: तटस्थ रहा। 1945 में यह "संयुक्त राष्ट्रसंघ" (UNO) का सदस्य बना। 1947 में USA  ने टर्की को सोवियत संघ के विरुद्ध सैनिक सहायता देने का वचन दिया। वह सहायता अब भी जारी है। इस समय टर्की नाटो, सेंटो और बाल्कन पैक्ट का सदस्य है।मुस्लिम-टर्की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का पूरा आश्वासन है। मुसलमानों में सुन्नी बहुसंख्यक हैं। तुर्की  यहाँ प्राय: सार्वभौम भाषा है। इसमें वर्णों की रचना ध्वनि पर आधारित है। 1928 के भाषा-सुधार आंदोलन से अरबी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि  का प्रयोग होने लगा है।1960 तक तत्कालीन प्रधान मंत्री मेंडरीज  ने विधिक स्वातंत्र्य, भाषा, लेखन और प्रेस स्वातंत्र्य पर रोक लगा दी। इसके विरुद्ध प्रबल आंदोलन हुआ। 27 मई 1960 को प्रधान मंत्री मेंडरीज़ और राष्ट्रपति बायर (Bayar) "नेशनल यूनिटी कमिटी"  द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। जनरल गुरसेल  कार्यवाहक अध्यक्ष तथा प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करने लगे। ग्रांड नेशनल असेंबली की स्थापना हुई और 1961 में जनरल गुरसेल राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।1961 के संविधान में टर्की पुन: प्रजातांत्रिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बना, जिसमें जन-अधिकारों तथा विधिसम्मत न्याय की पूर्ण व्यवस्था है। राष्ट्र पर किसी एक व्यक्ति, समूह या वर्ग का अधिकार नहीं है। टर्की की आधी राष्ट्रीय आय का स्रोत कृषि है। सेकंड वर्ल्ड वार के पश्चात् उद्योगीकरण की ओर राष्ट्र की प्रवृत्ति बढ़ी। कृषि के क्षेत्र में मशीनों के प्रयोग ने विशेष क्रांति को जन्म दिया। 1960 में सैनिक शासन स्थापित होने के समय टर्की की आर्थिक स्थिति संतोषजनक नहीं थी। विकास-योजनाओं को तेजी से बढ़ा देने के कारण टर्की ऋण-ग्रस्त हो गया। व्यापार में घाटे की स्थिति उत्पन्न हो गई। इसके बाद आर्थिक उन्नति के लिए व्ययों में कटौती, मूल्यनियंत्रण का उन्मूलन, करों में संशोधन आदि आवश्यक कदम उठाए गए।टर्की में प्राकृतिक साधन तो प्रचुर मात्रा में हैं, किंतु अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए उसे मशीनी उद्योग में अधिक व्यय करना पड़ता है। इसके निमित्त उसे पाश्चात्य देशों से, विशेषकर अमरीका से, ऋण भी मिलता है। 1990 के दशक में देश में मुद्रास्फीति 70% तक बढ़ गई थी।
      एक जाहिल इस्लामिक कट्टरपंथी देश को मात्र 10 वर्षो मे एक  पढ़ा लिखा और उन्नति शील देश के रूप मे स्थापित किया उन्होंने 10 साल के अन्दर टर्की को एक जाहिल इस्लामिक देश से एक modern पढालिखा progressive देश बना दिया। उनके विषय मे एक रोचक तथ्य यह है कि सबसे पहले उन्होंने एक अभियान चलाया और टर्की को उसकी अरबी जड़ों से काटकर तुर्की के आत्मसमान को जागृत किया। तत्पश्चात उन्होंने देश में अरबी भाषा पर प्रतिबन्ध लगा दिया। अरबी लिपि को त्याग कर Latin आधारित नयी लिपि तुर्की भाषा के लिए विकसित कराई । एक मीटिंग के दौरान उन्होने वहाँ उपस्थित शिक्षा शिक्षा-विदों,एवं मंत्रियों के समूह से पूछा कि हम किंतने दिनों मे नयी तुर्की लिपि को सभी देश वासियों को सीखा सकते हैं और कितने दिनों मे इसे राजकाज की भाषा मे इस्तेमाल कर सकते हैं। तब सभी ने अपने अपने अंदाज मे किसी ने एक वर्ष, किसी ने 2 वर्ष, किसी ने तीन वर्ष और अंत मे एक मंत्री जो शिक्षाविद भी थे ने कहा कि ये कार्य मुकम्मल करने मे कम से कम 7 वर्षों का समय लगेगा। तब मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने कहा एक वर्ष यानि 1 दिन और 7 वर्ष यानि 7 दिन।अगले सात दिनों मे राजकाज का सभी कार्य नयी तुर्की लिपि मे किया जाना आवश्यक है अन्यथा सज़ा के लिए तैयार रहें।   मुस्तफा कमाल अतातुर्क (राष्ट्रपति-तुर्की)  ने कुरआन शरीफ को नयी तुर्की लिपि में लिखवाया। मस्जिदों से अरबी अजान बंद कर दी गयी और उसे तुर्की भाषा में दी जाने लगी। मुस्तफा कमाल अतातुर्क (राष्ट्रपति-तुर्की)  का कमाल ने कहा कि हमें अरबी इस्लाम नहीं चाहिए हमें तुर्की इस्लाम चाहिए। हमें अरबी भाषा में कुरआन रटने वाले मुसलमान नहीं चाहिए बल्कि तुर्की भाषा में कुरआन समझने वाले मुसलमान चाहिए।
      ‘मुस्तफा कमाल अतातुर्क (राष्ट्रपति-तुर्की) न टर्की को इस्लामिक राज्य से एक सेयुलर राज्य मे तब्दील कर दिया। उन्होंने इस्लामिक शरियत की शरई courts जो सदियों से चली आ रही थी उन्हें बंद भी कर दिया और तुर्की का नया कानून बनाया जो इस्लामिक न हो के modern था .इसके बाद उन्हें मुस्लिम सिविल कोड को abolish कर Turkish सिविल कोड बनाया। मौखिक तलाक गैर कानूनी कर दिया। 4 शादियाँ गैर कानूनी कर दी। family planning अनिवार्य कर दी। अतातुर्क ने पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था बदल दी । नयी तुर्की लिपि में पाठ्य पुस्तकें लिखी गयी मदरसों और दीनी इस्लामिक शिक्षा पे प्रतिबन्ध लगा दिया गया । पूरी तुर्की में modern शिक्षा को अनिवार्य कर दिया गया । नतीजा ये निकला की सिर्फ 2 सालों में देश में साक्षरता 10% से बढ़ के 70 % हो गयी .
      सबसे बड़ा काम जो अतातुर्क ने किया वो देश के इस्लामिक पहनावे और रहन-सहन को बदल दिया। इस्लामिक दाढ़ी, कपडे, पगड़ी प्रतिबंधित कर दी। पुरुषों को पगड़ी की जगह Hat पहनने की हिदायत दी गयी।महिलाओं के लिए हिजाब नकाब बुर्का प्रतिबंधित कर दिया गया । देखते देखते महिलाएं घरों से बाहर निकाल कर पढने लिखने लगी और काम करने लगी।पर्दा फिर भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। इसके लिए अतातुर्क ने एक तरकीब निकाली। वेश्याओं के लिए बुर्का और पर्दा अनिवार्य कर दिया । इसका नतीजा ये निकला की जो थोड़ी बहुत महिलाएं अभी भी परदे में रहती थी उन्होंने एक झटके में पर्दा छोड़ दिया । अतातुर्क ने रातों रात देश की महिलाओं को इस्लामिक जड़ता और गुलामी से मुक्त कर दिया। मुस्तफा कमाल अतातुर्क पाशा ने महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा दिया। 1935 के आम चुनावों में तुर्की में 18 महिला सांसद चुनी गयी थी।ये वो दौर था जब की अभी बहुत से यूरोपीय देशों में महिलाओं को मताधिकार तक न था।


::: प्रदीप भट्ट :::24.08.2016

  


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