Saturday, 14 July 2018

झिरिया -पानी पानी पानी

                                  “झिरिया
(पत्थरों के बीच अस्थायी गढ्ढे खोदकर पानी निकालना )
पाषण युग में बसे मुंबई शहर की कहानी भी अजीब है। 225 ईसा पूर्व इसे हैप्तानेसिया के नाम से पुकारा जाता था तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में इस द्वीप समूह मौर्यों के साम्राज्य का एक विशिष्ट भाग रहा ।इसके बाद सिल्हारा वंश के हिंदू राजाओं ने इस पर शासन किया तत्पश्चात इस पर गुजरात के राजा ने इस पर अधिकार कर लिया।1534 में इस द्वीप को पुर्गालियों ने इसे अपने कब्जे में ले लिया जिसे बाद में इंग्लैंड के चार्ल्स द्वितीय को इसे उपहार स्वरूप प्रदान कर दिया गया। इसके बाद बड़ा फेर बदल 1668 में हुआ जब ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी को इसे नाम मात्र के 10 पौंड में पत्ते पर दे दिया गया । 1661 में इस द्वीप की आबादी मात्र 10 हजार ही थी। किन्तु 1675 आते आते इस द्वीप की आबादी आश्चर्यजनक रूप से 60 हजार हो गई ।इसी दौरान ईस्ट इण्डिया कंपनी ने सूरत से अपना मुख्यालय बम्बई में शिफ्ट कर लिया। 1817 से सभी द्वीपों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य प्रारम्भ हुआ जिसमें सिविल कार्यों  द्वारा पुनर्स्थापन किया गया । इस परियोजना को होर्न्बोय वेल्लार्ड के नाम से पुकारा गया जो 1845 में पूर्ण हुआ। सभी द्वीपों को आपस में जोड़ने से इसका क्षेत्रफल लगभग 431 किलोमीटर के लगभग बैठता है ।इंग्लैंड से माहरानी मैरी  व जोर्ज पंचम के आगमन को उत्सव में तब्दील करने के उद्देश्य से ही 2 दिसम्बर 1911 को गेटवे ऑफ इण्डिया का निर्माण कार्य शुरू हुआ और अंतत: 4  दिसम्बर 1924को इसे पूरा कर लिया गया जो आज के मुंबई की एक विशेष पहचान बन गया है। 1906 आते आते इस शहर की आबदी बढ़कर 10 लाख हो गई थी जो  की जनसँख्या के लिहाज से कलकत्ता के बाद दूसरे नंबर पर थी। आज  2018 में आते आते  लगभग 2 करोड़ को पार कर गई है।   1947  में आज़ादी मिलने के बाद इसे बॉम्बे राज्य की राजधानी बनाया गया 1950 में उत्तरी ओर स्थित सैलसेट द्वीप के भागों को मिला लिया गया जो कि इस शहर की आज तक की स्थिति को दर्शाता है ।1955 के पश्चात् जब बॉम्बे राज्य को पुनर्व्यवस्थित किया गया तो इसे भाषा के आधार पर महाराष्ट और गुजरात दो भागों में विभक्त कर दिया गया । इस दौरान बॉम्बे को लेकर फ़साद भी हुए कि इसे किधर रखा जाना ठीक होगा इसी में लगभग 105 लोगों ने पुलिस फायरिंग में अपनी जान दे दी 1 मई 1960 को इस महाराष्ट और गुजरात दो राजों में पूर्ण रूप से बाँट दिया गया तथा बोम्बे को महाराष्ट की राजधानी घोषित कर दिया गया।
मुंबई शहर में कार्यरत्त Bombay Municipal Corporation यानि BMC जिसका वार्षिक बजट किसी छोटे मोटे देश के बराबर है हर वर्ष मुंबई शहर की सड़कों के गढ्ढे भरने का बीड़ा उठती है किंतु मुंबई की पहली ही बारिश में उसकी पोल खुल जाती है ये सिलसिला मैं व्यक्तिगत रूप से पिछले 12 वर्षो से देख रहा हूँ ऐसा ही कुछ हाल NDMC & MCD ट्रांस यमुना नमक अलग निगम बना दिया गया है किन्तु स्थिति जस की तस है। कल ही मिंटो ब्रिज के नीचे पानी भर गया और DTC की एक बस लगभग दो तिहाई तक डूब गई। बाकी इलाकों का जिक्र करना तो फ़िजूल ही है । मैं लगभग 25 वर्ष डेल्ही में रहा हूँ और मिंटो ब्रिज के पास ही मेरा ऑफिस होता था हर बरसात में मिंटो ब्रिज में पानी भरने के कारण कोई ना कोई दुर्घटना होती ही रहती थी कई मर्तबा तो मैंने रबर की नाव से पुलिस वालों को मिंटो ब्रिज के नीचे फंसे हुए वाहनों  से लोगों को निकलते हुए देखा है । शायद डेल्ही की बरसात का मिंटो ब्रिज ही बैरोमीटर में तब्दील हो गया है जिसे देखकर शहर के अन्य हिस्सों में हुई बारिश का अंदाजा लगाया जा सकता है। कुछ इसी तरह मुंबई की बारिश में भी वरली, जय हिन्द माता रोड मिलन सबवे  (26 july-2005 की बाढ़ का ट्रेड मार्क ) वगैरह में यदि बारिश का पानी जमा हो जाए तो मान लीजिए भयंकर बारिश हुई है। 

आख़िर आज मुझे ये मुंबई शहर के विषय में संक्षिप्त जानकारी क्यूँ देनी पड़ रही है तो इसका कारण है मुंबई शहर के लोगों को पानी की आपूर्ति करने वाली झीलों पर पड़ रहे अनवश्यक बोझ को कुछ समझा जा सके । जब से ये शहर अस्तित्व में आया है तब से यहाँ पर रहने वाले लोगों कुछ ना कुछ तो खा रहे होंगे और प्यास बुझाने के लिए कहीं ना कहीं से पानी प्राप्त कर ही रहे होंगे। इतिहास में झांक कर देखें तो पाएंगे कि मुंबई शहर को पानी सप्लाई करने वाली मुख्य झीलें किस कदर वर्ष दर वर्ष अपने ऊपर अतिरिक्त बोझ ढ़ोने को अभिशप्त हैं और इसका कारण है तेजी से बढती जनसँख्या जिसके लिए कोई उपाय नहीं किये जा रहे हैं आख़िर कब तक ये झीलें मुंबई का बोझ उठाएंगी ।
अपर वैतरणा :- अपर वैतरणा झील (डैम) महाराष्ट्र के इगतपुरी में स्थित है मुंबई से इसकी दूरी लगभग 100 K.M. है इसकी  ऊंचाई लगभग 41 मीटर या 135 फीट है,लम्बाई 2578 मीटर या 8304 फीट  भण्डारण क्षमता केवल 6038,046 मिलियन लीटर है। इसे 1973 में जनता के लिए खोला गया।
वैतरणा :- ये महाराष्ट के पालघर जिले में स्थित है जो कि मुंबई से लगभग 100 K.M. है इसकी ऊंचाई 82 मीटर यानि 269 फीट है इसकी लम्बाई 567.7 मीटर यानि 1860.5 फीट।इसकी भण्डारण क्षमता 174,790,000 m इसे 1957 में जनता के लिए खोला गया।

तानसा :-तानसा झील या डैम मुंबई से लगभग 90 किलोमिएटर दूर अटगाँव (महुली की पहाड़ियों  )में स्थित है। इसे एक ब्रिटिश इंजिनियर Mr.Tullock जो कि म्युनिसिपल कारपोरेशन ऑफ़ ग्रेटर मुंबई की देखरेख में १९८२ में शरू हुआ और १९२५ में पूर्ण हुआ २००१ से २००४ के मध्य में पुन: इसकी क्षमता बढाई गई है। इसकी ऊंचाई 41 मीटर,लम्बाई 2804 मीटर है । इसकी भण्डारण क्षमता 2,08,700 cubic meter है।
भातसा :- भातसा झील मुंबई से  लगभग दूर शाहपुर में स्थित है इसकी ऊंचाई 88.5 m (290 ft),लम्बाई 959m  or 3146 ft एवं  इसकी भण्डारण क्षमता 226,025 cu mi है इसे 1983 में पूरा किया गया 
तुलसी झील :-  तुलसी लेक मुंबई के संजय गाँधी नेशनल पार्क, बोरीवली में स्थित है।  इसे   1872 में बनाना शुरू किया गया एवं 1897 में इस झील का कार्य पूर्ण कर लिया गया इसका सरफेस एरिया 1.35 K.M. एवरेज डेप्थ 12 मीटर या 39 फीट है। तुलसी झील की भण्डारण क्षमता केवल 8,046 मिलियन लीटर है।

विहार झील :- 1845 में मुंबई के लोगों को जब पीने के पानी की ज़बरदस्त तंगी महसूस हुई तो इसके लिए उनके द्वारा बाकायदा आंदोलन किया गया तब  ब्रिटिश सरकार ने दो लोगों की एक समिति इस समस्या के समाधान के लिए बनाई , इस समिति के सदस्य कैप्टेन क्राफोर्ड ने मानसून के दौरान जल संग्रहण की योजना का खाका पेश किया  जिसकी अनुमति मिलने के पश्चात १८५६ में विहार लेक का कार्य शुरू हुआ व १८६० में यह कार्य पूर्ण हो गया। तब से इस लेक द्वारा मुंबई के लोगो की प्यास बुझाई जा रही है।  इस लेक का  केचमेंट एरिया 18.96 k.m. , surface area 2.7 sqa mi, Max depth 34 m (112 ft) एवं  विहार झील की भण्डारण क्षमता केवल  27,698 मिलियन लीटर है।
मोदक सागर:- मोदक सागर झील महाराष्ट्र के थाना जिला के अंतर्गत आती है, इसका सरफेस     एरिया 80.42 m  इसकी भण्डारण क्षमता 16,500,000,000 imp gal है ।
अब प्रश्न फिर वही है कि  2005 में जहाँ मुंबई की आबादी 1,78,91,000 (Growth-15,24,000)  2010 में  1,94,22,000 (Growth-15,31,000) 2015 में  2,10,43,000 (Growth-16,21,000) 2018 में  2,20,46,000 (Growth-10,03,000) की तेजी से दर्ज की जा रही है तो सरकार और BMC क्यों सोई हुई है। अगर मुंबई की जनसंख्याँ इसी तेजी से बढती रही तो वो दिन दूर नहीं जब लोग पानी के लिए त्राही त्राही करेंगे और मजबूर होकर लोग 1845 की तरह फिर से आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे ।सरकार कुछ  नई झीलें बनाने के विषय में क्यों नहीं सोच रही है । वर्तमान झीलें इस बढती आबादी को झेलने के लिए तैयार नहीं हैं हमें समय रहते चेतना होगा अन्यथा अपनी बर्बादी के लिए हम स्वंम जिम्मेदार होंगे। कहीं ऐसा ना हो कि बुंदेलखंड के पन्ना ( झिरिया यानि पत्थरों के बीच अस्थायी गढ्ढे खोदकर पानी निकालना ) में जिस प्रकार लोग दो बूंद पानी के लिए मोहताज हैं आज नहीं तो कल ये स्थिति यहाँ भी हो सकती है।

-प्रदीप भट्ट -

Saturday, 2 June 2018

unisef मतलब चुनिंदा धर्म जातियों के बच्चों का रखवाला

               .            Satarday, June-02,2018

“यूनिसेफ मतलब चुनिंदा धर्म और जातिओं के बच्चे”

पिछले सप्ताह हिंदी एवम होलिवुड फ़िल्मों की जानी मानी अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने म्यांमार स्थित रोहिंग्या शरणार्थी कैम्प्स का दौरा किया। इन कैम्प्स में लगभग 7 लाख के तक़रीबन शरणार्थी रह रहे हैं, निश्चित रूप से उनकी स्थिति अच्छी नहीं है और ऐसा भी नहीं की विश्व में जहाँ जहाँ भी शरणार्थी रह रहे हैं उनकी स्थिति बहुत अच्छी है किंतु पिछले 2-3   वर्षों से रोहिंग्या मुस्लमानों  के विषय में मीडिया और राजनैतिक स्तर पर कुछ ज्यादा ही तव्वजो दी जा रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है किपूरे  विश्व में केवल रोहिंग्या पर ही सबसे ज्यादा अत्याचार हो रहा है। जब कि अगर ईमानदारी से विश्व पटल पर नज़रें दौड़ाई जाए तो पाएंगे कि पूरे विश्व में सबसे ज्यादा अत्याचार करने में सिर्फ़ मुस्लिम ही ज़िम्मेदार हैं। मुसलमान  हिंदुओं क्रिश्चन,यहुदिओं और अन्य धर्मो के लोगों  मारकर अपना वर्चस्व कायम करना चाहता है।अजीब बात ये भी है कि इस वर्चस्व कायम करने ही होड़ में वे मुसलमानों को भी मार रहे हैं कभी शिया के नाम पर कभी सुन्नी के नाम पर या  फिर अहमदिया के नाम पर। और इसकी ताज़ा मिसाल म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमान जिन्होंने 2012 में एक बौद्ध भिक्षुणी के साथ सामूहिक बलात्कार किया और उसके परनाम स्वरूप “बौद्ध” जो शांति के लिए जाने जाते हैं ने भी तात्कालिक सरकार के उदासीन रैवैय्ये को देखते हुए हथियार उठाना ही एक मात्र उपाय समझा। उसके बाद से ये रोहिंग्या मुसलमान आज उस स्थिति में पहुँच गए हैं कि इनके लिए अपना कोई देश ही नहीं बचा।  चूँकि  ये  अपनी बद आदतों के चलते  खुराफ़ात किये बिना बाज़ नहीं आते जिस देश में रहेंगे उसी देश के दुश्मन बन जायेंगे, शिया सुन्नी अहमदिया और ना जाने क्या क्या ब्राचों के लोग अपने ही लोगों के दुश्मन बन जायेंगे । लड़ना झगड़ना मरना इनके स्वभाव में है। सामान्यत: हर गलत काम के पीछे इन्हीं लोगों का रोल निकलता है तो आज विश्व में इनकी स्थिति बहुत ही ज्यादा शोचनीय बनती जा रही है। लेकिन यक्ष प्रश्न ये है कि वो चाहते हैं क्या और किससे ?

प्रियंका चोपड़ा द्वारा म्यांमार स्थित रोहिंग्या शरणार्थी कैम्प्स के दौरे के समय हर प्रकार के मीडिया ने अलग अलग तरह ही तस्वीरे जिसमें प्रियंका रोहिंग्या बच्चों के साथ खेलते हुए, दुलार करते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त करने का प्रयत्न कर रही हैं। इस प्रकार की तस्वीरे मीडिया पर वायरल होते ही प्रियंका तुरंत ट्रोल होने लगी ।जितनी चीख चिल्लाहट हुई उससे ऐसा प्रतीत होने लगा कि जैसे देश में बहुत कुछ गलत हो गया है और उसकी जिम्मेदार केवल प्रियंका चोपड़ा ही है। जब कि प्रियंका चोपड़ा UNICEF की ब्रांड राजदूत होने के कारण सिर्फ़ अपना काम ही कर रही थी।  प्रियंका चोपड़ा के अतिरिक्त भी हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री से सदी के महानायक अमिताभ बच्चन एवं शर्मीला टैगौर भी यूनिसेफ के ब्रांड रह चुके हैं। राजदूत चलिए पहले यह जान लेते हैं कि ये यूनिसेफ है क्या और ये विश्व स्तर पर क्या क्या कार्य करती है।

यूनिसेफ यानि यूनाईटेड चिल्ड्रेन फण्ड नमक एक संस्था है जो कि दूसरे विश्व युद्ध के बनी इस संस्था का उद्देद्श्य ही द्वितीय युद्ध में नष्ट हुए राष्ट्रों के बच्चों को स्वास्थ्य सेवाएँ के साथ साथ खाना उपलब्ध कराना भी था। इसकी स्थापना 11 दिसम्बर 1946 को हुई एवं इसका मुख्यालय न्यूयार्क में बनाया गया। UNICEFको इसके कार्यो के लिए 1965 में नोबेल शांति पुरुस्कार से नवाजा गया। इसी क्रम में इसे 1989 में इदिरा गाँधी शांति पुरुस्कार से भी सम्मनित किया गया। यूनिसेफ 190 से अधिक देशों  में कार्य कर रही है। यूनिसेफ बच्चों को शिक्षा, पोषित आहार एवं स्वास्थ्य संबधित सहायता प्रदान करती है । यह संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ मिलकर कार्य करती है।

निश्चित रूप से यूनिसेफ एक विश्व कल्याण के लिए कार्य करने वाली संस्था है किन्तु लोगों का गुस्सा यूनिसेफ के लिए न होकर इस बात पर  है कि भारत में लगभग 40 प्रतिशत आबादी ऐसी है जिसको इस संस्था की मदद सबसे ज्यादा ज़रूरत है किन्तु ये संस्था सिर्फ़ वहीँ अपनापन दिखाती है जहाँ इसे अपने आप को विश्व बिरादरी के सामने ज्यादा प्रोजेक्ट करना होता है। प्रियंका चोपड़ा को क्यों नहीं वो 40 प्रतिशत आबादी दिखाई नहीं देती है जो ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन व्यापन कर रहे हैं , उस बिरादरी में तो सभी धर्मों और जातियों के बढ़े बूढ़े बच्चे सभी शामिल हैं। लेकिन यक्ष प्रश्न फ़िर वही है कि प्रियंका को कौन बताएगा कि भारत में ही इन बच्चों की भी फिर्क की जानी चाहिए। चूँकि प्रियंका चोपड़ा ये काम सीधे तो करती नहीं है तो ये तो  यूनिसेफ की ही हुई कि वो प्रियंका का बताए कि तुम्हारे अपने देश में भी बच्चे इन्हीं सब मुसीबतों से दो-चार हो रहे है तो आओ भारत में कश्मीरी विस्थापितों की भी ख़ोज खबर ले ली जाये किन्तु यूनिसेफ को इससे क्या मतलब सो   इस बार उन्होंने इस दिखावे के लिए म्यांमार को चुना और वो भी रोहिंग्या मुसलमानों के कैंपस को क्यों की यूनिसेफ भी वहीं इस प्रकार का दिखावा करती है जहाँ उसे अमेरिका का हित दिखाई देता है उसके लिए बाकी सभी देश गौण हैं। जिन रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यांमार में हिंदुओं का सामूहिक नरसंघार  किया क्या उनके बच्चों को यूनिसेफ की मदद की दरकार नहीं है। मदद में भी पक्षपात ? 1947 तक जब पाकिस्तान,बांग्लादेश  भारत वर्ष का ही हिस्सा थे तो इन दोनों ही देशों में हिन्दुओ की आबादी क्या थी और आज क्या है? जो मारे गए उनके बच्चों के लिए  यूनिसेफ या और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने क्या किया। निश्चित रूप से कुछ नहीं । मैं गूगल पर सर्च करता रहा किन्तु मुझे तो कुछ नहीं मिला कि यूनिसेफ ने कश्मीरी बच्चों के लिए कुछ किया हो। शायद उनके शब्दकोष में कश्मीरी विस्थापितों और विशेष कर हिंदुओं को छोड़कर पूरा विश्व समाहित है।

रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यांमार में जो तांडव किया है उसके बाद उनकों कोई भी देश क्यों कर स्वीकार करना चाहेगा । रोहिंग्या मुसलमानों के कैम्प्स की फोटों देखिये फटेहाल स्थिति किंतु  “ एक आदमी एक औरत उसके आसपास 7-8 बच्चे और एक पेट में ज़रूर दिखाई देगा “ वो निकला तो 2 महीने बाद दूसरा दिखाई देगा मतलब इनका जन्म ही बस जन संख्यां बढ़ाने के लिए हुआ लगता है। यूनिसेफ इसको रोकने के उपाय क्यों नहीं करती। इसका एक मतलब और हो सकता है कि विश्व की चौथाई आबादी सिर्फ़ इसलिए कमाए ताकि इन जाहिलों का पेट भरा जा सके। आख़िर ये स्थिति क्यों और कब तक ? कभी तो इस भयावह होती स्थिति को रोकने का यत्न करना पड़ेगा अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब पानी के साथ साथ खाने के भी लाले पड़ने वाले हैं।  

-                                              -प्रदीप भट्ट -








 




 





Sunday, 6 May 2018

बोतल में बंद जिन्न या जिन्ना

                          SATARDAY, 05th May-2018


“बोतल में  जिन्न या जिन्ना”

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रागंण की दीवार  में लगी  मौहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर ने पिछले कुछ समय से बवाल मचाया हुआ है। तस्वीर लगाने के पक्ष और विपक्ष में तलवारें खिंच गई हैं। नेता तो आम तौर पर ऐसे मौकों के लिए तैयार ही बैठे रहते हैं सो उन्होंने तुरंत ही अपने अपने फायदे के अनुसार अपनी अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं।  लेकिन प्रश्न ये है की आजाद भारत के किसी भी विद्यालय या महाविद्यालय में एक कट्टर शिया मुसलमान की तस्वीर क्यों लगाई  जाए जब कि वो भारत के टुकड़े करने के लिए जिम्मेदार हो । अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय के छात्र नेताओं का ये कहना कि उनकी तस्वीर १९९३८ से वहां लगी हुई है तो गलती किसकी है भाई ? आप ही की ना ,आपने समय रहते क्यों नहीं उसे उठाकर बाहर का रास्ता दिखया ? या आपको पाकिस्तान के जनक से ज्यादा प्यार था तो आप भी पाकिस्तान में ही  विराजते। स्वतंत्र भारत में ऐसे लोगों की तस्वीर तो छोडिये उनका नाम लेना भी हराम होना चाहिए ।  अलोगढ़ मुस्लिम विश्विद्याल के उन छात्र नेताओं/वहां के प्रशासन पर अभी तक भी कोई  एक्शनक्यों नहीं  लिया गया ? एक छात्र नेता का यह कहना कि जिन्ना वहां के लाइफ मेम्बर थे तो भैय्या लाइफ मेम्बर का मतलब तो समझ लो ।  जब तक आदमी जीता है तभी तक तो ना वो तो 11 सितम्बर 1948 को ये दुनियां छोड़ गया तो उसके बाद क्यों नहीं उतारी। मतलब मन में चोर है “खायेंगे रहेंगे भारत  में   और गीत गायेंगे पाकिस्तान के ? तो ऐसे लोगों के लिए सही कहा गया है कि “एक टंगड़ी के लिए अपने अब्बा को नकार कर पडौसी को अब्बा बना लो “ ताकि वो जब भी टंगड़ी बनाए तुम्हें दे देगा। अब वो देगा या नहीं ये तो दूसरा विषय है लेकिन आस पर ही तुम जैसे लोग अपना अब्बा बदल लेते हों फिर ये तो देश की बात है।

जीवन में कुछ चीज़े/लोग ऐसे होते हैं  जो मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ते।  मौहम्मद अली जिन्ना वही चीज समझ लें या लोग। आज़ादी से पहले अपनी महत्वकांशाओं के पखों पर सवार होकर मौहम्मद अली जिन्ना ने उस समय की सभी राजनैतिक पार्टियों के नाक में दम करके रखा हुआ था। नेहरु के साथ उनका बैर तो जग जाहिर रहा ही है। उनकी महत्वकांशाओं की पूर्ति में आल इण्डिया मुस्लिम लीग जिसकी स्थापना मुस्लिम नेताओं ने नवाब सलीमुल्ला की लीडरशिप में 30 दिसम्बर 1906 को ढाका में की। सलिमुल्ल्हा ही इसके संस्थापक व अध्यक्ष थे किन्तु इसके पहले अधिवेशन की अध्यक्षता मुश्ताक हुसैन नि की थी। मुस्लिम लीग का सबसे प्रमुख उद्देश्य यही था कि वे किसी भी प्रकार से  अंग्रेजों को तलवे चाट कर उनके द्वारा थोपे गये क़ानूनी या गैर क़ानूनी किसी भी प्रकार के अधिकारों के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करना ताकि वे अंग्रेजों की आँखों के तारे बन सके। अपनी इसी निष्ठा का सबूत देने के लिए उन्होंने अमृतसर के अधिवेशन में मुस्लिमों के लिए पृथक देश या कहें कि द्विराष्ट्र का खाका खींचा जिससे अंग्रेजों को ये मेसेज जाए कि भारत के आजाद होने पर मुस्लिमों के लिए एक अलग देश बनाने के लिए अंग्रेजों को राजी किया जा सके।मौहम्मद अली जिन्ना को अपनी राजनैतिक महत्वकांशा पूरी करने के लिए मुस्लिम लीग एक मुफ़ीद प्लेटफोर्म लगा और उन्होंने इसका उपयोग अपने फायदे के लिए करना शुरू कर दिया ।जिन्ना मुसलमानों का एक छत्र नेता बनकर नेहरु को ये दर्शाना चाहते थे कि हिंदुस्तान के मुस्लमान सदैव उनके साथ खड़े रहेंगे किन्तु ऐसा था नहीं भारत के सारे मुस्लमान जिन्ना को अपना एक छत्र नेता नहीं मानते थे। आगे बढ़ने से पहले आइये जिन्ना के विषय में कुछ जान लिया जाए। 

मौहम्मद अली जिन्ना (मुहम्मद अली झीणाभाई – गुजराती )का जन्म 25 दिसम्बर 1876 आधुनिक सिंध प्रान्त के कराची जिले के वजीर मेसन में हुआ था । जिन्ना मिठीबाई और जिन्नाभाई पूंजा की सात संतानों में सबसे बड़े थे। इनके पिता एक संपन्न गुजरती परिवार के व्यापरी थे लेकिन जिन्ना के जन्म के पहले ही वे कठियावाद छोड़ कर सिंध में जाकर बस गए। जिन्ना मूलतः हिंदू राजपूत थे किन्तु इनके पिता द्वारा इस्लाम धर्म अपनाने के कारण सब भाई बहनों का नामकरण मुस्लिम नामकरण किया गया जिन्ना की स्कूली शिक्षा अलग अलग जगहों पर हुई जिनमें सिंध मदरसा उल इस्लाम ,फिर गोकुलदास तेज प्राथमिक विद्यालय ,फिर क्रिश्चन मिशनरी स्कूल कराची  चले गए तथा बाद में इन्होने बम्बई विश्विद्यालय से ही मैट्रिक  पास किया। मैट्रिक की पढाई पूरी करने के बाद जिन्ना ग्रैहम शिपिग एंड ट्रेडिंग कंपनी में अप्रन्तिस हो गए तदुपरांत माँ के आग्रह पर इंग्लैंड जाने से पूर्व इन्होने शादी भी कर ली जो ज्यादा दिनों तक टिक न स्की। इंग्लैंड में पढाई के दौरान ही ये दादाभाई नौराजी एवं फिरोजशाह मेहता के प्रशंसक बन गए एवं ब्रिटिश संसद में दादाभाई नौराजी के प्रवेश के लिए इन्होने छात्रो के साथ प्रचार में भी भाग लिया । पिता के व्यवसाय में फेल होने पर ये बम्बई आ गए और वकील बन गए । इनकी योग्यता को देखते हुए बालगंगाधर तिलक इनसे प्रभावित हुए और उन्होंने १९०५ में अपने ऊपर गले राजद्रोह के मामले की सुनवाई के लिए जिन्ना को ही आपना वकील नियुक्त कर दिया।1918 में उन्होंने एक पारसी लड़की रति से विवाह कर लिया उनके इस अंतधार्मिक विवाह का पारसी और कट्टरपंथी मुस्लिम समाज में व्यापक विरोध हुआ जिसकी परिणिति रति के इस्लाम धर्म क़ुबूल करने से हुई । 1919 में दोनों की एक पुत्री हुई जिसका नाम डीना रखा गया । जिसकी शादी बाद में एक भारतीय पारसी बिजनेसमैन नेविल वाडिया से हुई कितु जिन्ना अंत तक इस शादी के खिलाफ रहे। विभाजन के बाद जिन्ना पाकिस्तान चले गए और डीना ने भारत में रहना ज्यादा ठीक समझा।  

1896 में जिन्ना कांग्रेस पार्टी में शामिल हो  गए। प्रारम्भ में तो जिन्ना ने हिंदू मुस्ल्मिम एकता पर ही अपना फ़ोकस रखा एवं कांग्रेस और मुस्लिम लीग का लखनऊ में समझौता भी करवाया। काकोरी कांड में पकड़े गए चरों कैदियों को जब मृत्यु दंड दिया गया तब सन्ग्त्रल कौंसिल के 78 सदस्यों ने तत्कालीन वायसराय व गवर्नर  जनरल अद्वार्ड फ्रेडरिक लिंडले वुड को शिमला जाकर उन कैदियों की सजा कम करने हेतु (मृत्यु दंड को आजीवन कारावास में बदलने हेतु) मेमोरियल दिया गया था जिस पर जिन्ना के अतिरिक्त पंडित मदन मोहन मालवीय एन सी केलकर लाला लाजपत रे व गोविन्द वल्लभ पन्त आदि के भी हस्ताक्षर थे। किन्तु कांग्रेस द्वारा मुसलमानों के प्रति उदासिनता को देखते हुए उन्होंने कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया और 1913 में मुस्ल्मिल लीग में शामिल हो गए और 1916 में  लखनऊ अधिवेशन की अधक्ष्ता भी की । वैसे भी उन्हें  इस हिंदू मुस्लिम  एकता से कुछ लेना देना नहीं था क्यों कि वे जानते थे कि आज़ादी मिलने के बाद गाँधी जी नेहरु को ही प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहेंगे। अतएव उन्होंने देश में रह रहे मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा और स्वशासन के लिए  लाहौर अधिवेशन चौदह सूत्री संवैधानिक सुधर का प्रस्ताव रखा साथ ही मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र का लक्ष्य भी निर्धारित किया । 1946 में हुए चुनावों में ज्यादातर मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग की ही जित हुई और जिन्ना ने पाकिस्तान की आज़ादी के त्वरित कार्यवाही का अबियाँ शुरू कर दिया किन्तु कांग्रेस द्वारा इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देने के कारण देश में जब कर बवाल हुआ । चूँकि दोनों ही पार्टियाँ गठबंधन की सरकार बनाने में असफल रही अतएव ब्रिटिश राज ने भारत के विभाजन को सैधांतिक मंजूरी प्रदान कर दी। किन्तु यहाँ ये विशेष है कि पाकिस्तान नाम कहाँ से आया तो मैं आपको बताता चलूँ कि  जिन्ना और इक़बाल की तहरीरों को सुन सुन कर 1940 के लाहौर अधिवेशन से पूर्व ही जिन्ना की दो राष्ट्रों की थ्योरी को अमली  जामा पहनाने के मकसद से रहमत अली ने 1933 में पर्चे छापकर भारत से अलग होने वाले देश का नाम “पाकिस्तान” रख दिया था। पाकिस्तान बनने के बाद जिन्ना को कायदे-आज़म,बाबा-इ-कौम यानि राष्ट्र पिता जैसी उपाधि से सुशोभित कर दिया गया उन्हें आजाद पकिस्तान का प्रथम गवर्नर जनरल बनाया गया ।११ सितम्बर १९४८ को उनकी मृत्यु हो गई जिस पर सभी को संशय है कि उन्हें जानबूझकर हास्पिटल में भर्ती करने में देरी की गई जबकि वो कैंसर से पीड़ित थे।
आख़िर इतना सब लिखने का तात्पर्य क्या है ? इसलिए की जिन लोगों को ये लगता है कि जिन्ना सेकुलर थे वे अपने दिमाग का इलाज करा लें वे कतई सेकुलर नहीं थे कट्टरवाद कूट कूट कर भरा हुआ था। चूँकि उनके पिता ने इस्लाम धर्म अपनाया था और वो  शिया समुदाय में शामिल हुए थे तो उनकी सोच की आप काल्पना कर सकते हैं । कांग्रेस बीजेपी या अन्य किसी दल में जो उनके हितैषी बैठे थीं और मौहोम्म्द अली जिन्न की तस्वीर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में लगाये जाने से सहमत है उन्हें अपनी मानसिकता बदलनी चाहिए । आख़िर सिर्फ़ वोटों की राजनीती कहाँ तक चलाएंगे। हर उस विषय में मुस्लिम शामिल हैं सभी पार्टियाँ क्यूँ कर अपने नेताओं को इतनी छुट दे देती हैं जिससे वे मुस्लिम तुष्टिकरण करने लगते हैं वे क्यों और कैसे भूल जाते हैं कि  पाकिस्तान में गाँधी  या अन्य किसी नेता की मूर्ति वहां क्यों दिखाई देती। वहां के नौनिहालों को भारत के राष्ट्रनायकों को उग्रवादी और आतंकवादी पढाया जाता है ?

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैय्यद भी कोई गंगा जमुना तहज़ीब के परोकर नहीं थे उनकी सोच भी बड़ी घटिया और कट्टरपन को बढ़ावा देने वाली थी। एक पुस्तक “खिलाफ़त” जिसको लिखने वाले काजी मुहम्मद अदील अब्बासी ने इस किताब में जिक्र किया है कि आजाद भारत मुस्लिमों के लिए बिलकुल भी मुफीद नहीं होगा क्यों कि आजाद भारत में बहुसंख्यक हिंदू उन्हें चैन से नहीं रहने देंगे और उन पर तरह तरह से जुल्म करेंगे।  आज़ादी के सत्तर वर्षो के पश्चात् विश्व पटल पर नज़र दौड़ाने से किसी को भी ये अच्छी तरह से समझ आ जायेगा कि विश्व में 56 मुस्लिम देशों के बनिस्पत भारत के मुस्लमान कितने शिक्षित और भय के वातावरण से कोसों दूर हैं अन्यथा सभी मुस्लिम देशों में शिया सुन्नी और ना जाने जाने कौन कौन सी नयी ब्रांचे आपस में ही लड़ मर कर ख़त्म हो रहीं हैं।  तो जिन्ना हो या सर सैय्यद सभी ने मुसलमानों को अपने फायदे के लिए भड़काया ही है और स्थिति आज भी वैसी ही है। मुसलमानों का नेता बनकर कितनों ने अपनी सात पुश्तों को इंतजाम कर लिया है ये भी किसी से छुपा हुआ नहीं है ।
 

                                                 -प्रदीप भट्ट –