Saturday, 30 September 2017

ये दुर्घटनाएं कुछ कहती





“ये दुर्घटनाएँ कुछ कहती हैं”
(भारतीय रेल)


कल मम्बई के एल्फिस्टन रोड एवं परेल उपनगरीय रेलवे स्टेशनों को जोड़ने वाले फुटओवर ब्रिज पर लगभग 10:30 बजे के समय उडी अफवाह कि ब्रिज गिरने वाला है भगदड़ मच गयी और इस भगदड़ ने 22 लोगों की जान ले ली इसके अतिरित 30 के लगभग लोग घायल भी हो गए  27 घायल हो गए। रेलवे के सूत्र जहाँ उस पुल की चौड़ाई 8  मीटर बता रहे हैं वहीँ उस फुटओवर ब्रिज की चौड़ाई नापने पर मत्री 2.5 मीटर चौड़ी ही पाई गई। ये एक अजीब तरह का विरोधाभास है आख़िर साढ़े पांच मीटर चौड़ाई कहाँ चली गई? पिछले ही वर्ष इस फुट ओवर ब्रिज को बनवाने के लिए रेलवे ने 11.8  करोड़ रूपये की राशी आवंटित की थी किन्तु वही लालफीताशाही के चलते उस पर कोई कार्रवाई ही अभी तक नहीं हो पाई। आख़िर हम इतने असंवेदनशील कैसे हैं? क्या रेलवे प्रशासन इस बात का इंतजार करता रहता है कि जब तक दुर्घटना न हो,लोग ना मेरे तब तक वो कोई भी कार्य प्रारंभ नहीं करने वाली ? ये स्थिति निश्चित रूप से अच्छी नहीं है


वर्ष 2017 को अगर किसी ख़ास कारण से याद किया जायेगा तो निश्चित भारतीय रेल प्रशासन के लिए।जितनी दुर्घटनाएँ इस वर्ष हुई हैं मुझे याद नहीं पड़ता कि इससे पूर्व कभी इस तादाद में दुर्घटनाएँ हुई हों और उनमें भी ट्रेन के डिब्बों का पटरी से उतरना? ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे प्रभु की रेल प्रभु की भी नहीं सुन रही थी। और जहाँ उसका मन होता था वह पटरी छोडकर पटरी के किनारे उतर पड़ती थी जैसे कि उसे अचानक याद हो आया हो की मुझे तो खेत में भी कुछ काम करना था?खैर ये सिलसिला अभी भी अब जब रेल मंत्री बदल चुके हैं और पियूष गोयल को ये अहम मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है। यहाँ एक बात तो निश्चित है कि इन दुर्घटनाओं के लिए किसी भी प्रकार से रेल मंत्री तो दोषी नहीं हैं। क्यों कि अब हर पटरी की पड़ताल मंत्री महोदय तो जाकर करने वाले नहीं इन सब कामों के लिए एक तंत्र बना है जिसकी महती जिम्मेदारी है कि वह दिए गए कार्यों का पूरी निष्ठा से किर्यान्वयन करे किन्तु ऐसा होता नहीं हैहर विभाग में लालफीताशाही इस कदर हावी है कि सब अपनी जिम्मेदारी दूसरे पर थोप कर साइड से निकल जाना चाहते हैं। यही एक कारण नहीं है भारत में रेल दुर्घटनाओं के लिए

२२ दिसम्बर १८५१ को भारत की प्रथम रेल (मॉल गाड़ी ) रूडकी जो अब उत्तरांखंड में आता है से चलकर एक गाँव तक पहुंची। इस गाड़ी का उपयोग उस गाँव के किसानों के लिए मिट्टी लाने के लिय उस माल गाड़ी का परिचालन किया गया।  इसके लगभग दो वर्ष बाद 16 अप्रैल 1853 को इस 35 किमी के सफर का शुभारंभ किया गया था। भाप के इंजन के साथ 14 डिब्बों की रेलगाड़ी मुंबई से ठाणे के बीच रवाना हुई थी।। तब से अब तक भारतीय रेल अपना सफ़र तय करते हुए यहाँ तक आ पहुंची है जहाँ अब वह मुंबई अहमदाबाद के मध्य बुलेट ट्रेन १९२२ तक चलाने की तैयारी कर रही हैजिसे डेल्ही से मुंबई डेल्ही से कोलकत्ता,डेल्ही से चेन्नई तक चलाने की बातें की जा रही है। जो कि अच्छी बात है किन्तु हमें वर्तमान रेलवे की दशा और दिशा दोनों सुधारने पर भी धयान दिए जाने की आवश्यकता है। भारतीय रेलवे का नेटवर्क दुनिया में अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथा सबसे बड़ा नेटवर्क है। हालंकि तकनीक के मामले में ये तीनों देश भारत से कुछ या बहुत आगे हैं।जब हम इस बात को गर्व से कहते हैं कि भारतीय रेल दुनियां की चौथी सबसे बड़ी रेल व्यवस्था है तो हमें पहले तीनों देशो की रेल व्यवस्थाओं पर भी गौर करना चाहिए ताकि गुणवत्ता बनी रहे।

फर्स्ट क्लास में सलाम करते थे हैड टीटी उस समय इस ट्रेन में फर्स्ट क्लास में सफर करने वाले का अलग ही सम्मान होता था। फर्स्ट क्लास का इतना रुतबा था कि ट्रेन के रुकने पर हैड टीटी आकर डिब्बे में सलाम मारकर सार-संभाल करते थे। भोजनालय में इतना स्वादिष्ट खाना बनता था कि शहर से लोग डबल रोटी लेने ट्रेन तक जाया करते थे।

भारत में जहाँ सबसे पहले रेल 1851 में दौड़ी थी, जबकि चीन में इसके 23 साल बाद यानी 1876 में। जब भारत आजाद हुआ तो भारत में रेल नेटवर्क की कुल लंबाई 53,596 किमी थी, जबकि चीन का रेल नेटवर्क सिर्फ 27,000 किमी ही था। स्वतंत्रता के 70 वर्षों के पश्चात् भारत में केवल 12,000 किमी की या उसे कुछ ही अधिक बढ़ोतरी हो पाई है, जब कि चीनमें लगभग 80,000  किमी के रेल नेटवर्क के साथ भारत से काफी आगे निकल गया है तथा उसका रेल नेटवर्क भारत की तुलना में फैलता ही जा रहा है। उसने ठेठ तिब्बत तक जिसे दुनियां की छत के नाम से भी जाना जाता है तक रेल लाइनें बिछा दी हैं। भारत में  भारतीय रेलवे में तीन तरह की प‍टरियां बिछी हुई हैं, ये हैं- बड़ी लाइन, छोटी लाइन तथा संकरी लाइन। इनमें से बड़ी लाइन की पटरियों का संजाल भारत के अधिकांश हिस्सों में फैला हुआ है। अधिकतर गा‍ड़ियां इसी पटरी पर चलती हैं।
छोटी लाइन की पटरियां अब धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। मध्यप्रदेश में संभवत: रतलाम से अकोला तक का छोटी लाइन का नेटवर्क बचा हुआ है। यह भाग भी अब शीघ्र ही बड़ी लाइन में बदल दिया जाएगा।
संकरी लाइन का भी भाग मप्र में संभवत: नागपुर-छिंदवाड़ा-जबलपुर वाले भाग में ही शेष रह गया है, जो कि भविष्य में बड़ी लाइन में बदल दिया जाएगा। इसके बाद शायद ही कोई छोटी या संकरी लाइनें सिर्फ़ मध्य प्रदेश  में ही शेष रह पाएगी।



भारतीय रेल की कुछ रोचक जानकारी

·        भारतीय रेलवे अधिनियम वर्ष 1890 में पारित किया गया।
·        वर्ष 1939 में वातानुकूलित यात्री गाड़ी चलाई गई।
·        स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय रेल का 1950 राष्ट्रिय कारण कर दिया गया।
·        भारतीय रेलवे का शुभंकर लालटेन (जिसमें हरी बत्ती जलती रहती है) उठाए एक हाथी है।
·        वर्ष 1952 में कुल छ: जोनों के साथ जोनल सिस्टम शुरू किया गया,वर्तमान में कुल 17 जोन कार्य कर रहे हैं।
·        सबसे व्यस्त रेलवे नेटवर्क में भारतीय रेल की गिनती होती है।
·        एक वर्ष में लगभग 600 करोड़ से अधिक यात्री यात्रा करते हैं।
·        रेलवे में लगभग 13 लाख लोग काम करते हैं।
·        हिमसागर एक मात्र ऐसी ट्रेन है जो कुल 3753 किलोमीटर का सफ़र कन्याकुमारी से जम्मू के मध्य तय करती।
·        सबसे बड़ा और लम्बा प्लेटफार्म खडगपुर है जिसकी लम्बाई 1072 मीटर है।
·        गतिमान एक्सप्रेस ट्रेन 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार पर चल सकती है इससे पूर्व भोपाल शताब्दी थी जिसकी अधिकतम गति 140 कोलोमिटर प्रति घंटे थी।
·        भारतीय रेल में लाइफ लाइन (हॉस्पिटल ऑन व्हील) नामक ट्रेन भी है जिसमें इलाज की सभी सुविधाएँ मौजूद है यहाँ तक कि ओपरेशन की भी व्यस्था भी है।
·        फेयरी क्वीन दुनियां में सबसे पुराना इंजन है, जो अभी भी दौड़ता है। 
·        वर्ष 1977 में धरोहर, पर्यटन शिक्षा मनोरंजन के सरंक्षण एवं प्रोत्साहन के राष्ट्रिय रेल संग्रहालय खोला गया
·        भारत की भव्य रेल गाड़ियों जैसे कि डेक्कन ओडिसी, पैलेस ऑन व्हील एवं 100 वर्ष से भी ज्यादा पुराणी ट्रॉय ट्रेन को सोसाइटी ऑफ़ इंटरनेशनल ट्रेवलर्स ने 25  सर्वश्रेष्ठ ट्रेनों की सूचि में शामिल किया है। 
·        वर्ष 2002 में जन शताब्दी ट्रेन की शुरआत की गई 
·        वर्ष 2007 से देशभर में टेलेफोन नंबर 139 की ट्रेन की सामान्य जानकारी के लिए शुरुआत हुई 
·        वर्ष 2004 से इन्टरनेट के माध्यम से आरक्षण की शरुआत हुई
·          1974 में हुई भारतीय रेलवे की हड़ताल अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल मानी जाती है। यह हड़ताल 20 दिन चली थी। 1974 के पश्चात रेलवे में कोई हड़ताल नहीं हुई।
·        1974 में हुई भारतीय रेलवे की हड़ताल अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल मानी जाती है। यह हड़ताल 20 दिन चली थी। 1974 के पश्चात रेलवे में कोई हड़ताल नहीं हुई।
·        भारतीय रेलवे का नेटवर्क 1.16 लाख किमी लंबा है। कोई 15 हजार रेलगाड़ियां इस नेटवर्क पर दौड़ती हैं। इस नेटवर्क पर 6 हजार से ज्यादा स्टेशन हैं। करीब 2 करोड़ लोग रोज रेल‍गाड़ियों के माध्यम से इधर से उधर आते-जाते हैं।

भारतीय ट्रेन में आमूल चूल परिवर्तन की आवशयकता तो है किन्तु वो कब और कैसे संभव है इसका जवाब तो रेल मंत्रालय ही दे सकता है क्यों कि बार बार होती दुर्घटनाएँ जनमानस में एक ग़लत सन्देश देती हैं जहाँ आवशयकता है वहां खाली पदों को तुरंत भरा जाना ही चाहिए क्यों कि सारे काम कंप्यूटर तो करने से रहा? मैंन पवार की ज़रूरत होती ही है ,इतना बड़ा नेटवर्क संभलना भी बच्चों का खेल नहीं है किन्तु भारतीय रेल में इसके कार्यों की समय समय पर समीक्षा की जाती रहनी चाहिए ताकि मानव रहित रेलवे क्रासिंग हो ये ढहते पुल (रेलवे के) इनका निरीक्षण और समाधान समय समय पर किया जाता रहना आवश्यक है। विजयदशमी से एक दिन पूर्व 22 लोगों की मौत कुछ कहती है आवश्यकता है सिर्फ़ ध्यान से सुनने,समझने और अमल करने की।



                  - प्रदीप भट्ट –

                                              Satarday, September 30, 2017

Saturday, 12 August 2017

गोरखा




गोरखा यानि गोखारली यानि हटी/लड़ाकू  और जो मौत से नहीं डरता”
(If a man says he is not afraid of dying, he is either lying or is a Gurkha)
"यदि कोई कहता है कि मुझे मौत से डर नही लगता, वह या तो
वह झूठ बोल रहा है या वह गोरखा है।" (जनरल सैम मानेक्षा- इंडियन आर्मी)



पिछले कुछ दिनों से पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी से 47 किलोमीटर दूर स्थित दार्जिलिंग जिसे आम भाषा में गोरखालैंड भी कहा जाता है गोरखा लैंड की मांग के कारण काफी चर्चा में रहा है। ऐसा पहली बार हुआ हो ऐसा भी नहीं है कुछ समय पहले भी गोरखालैंड की मांग बहुत तेजी से हुई थी किन्तु बाद में यह राजनैतिक कारणों से या अन्य किसी करना से स्वत: ही दब गई किन्तु इस बार इस मांग के पीछे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का बेतुका और अड़ियल आदेश रहा जिसमें उन्होंने सभी स्कूलों में बांग्ला भाषा पढना लाज़िमी करार कर दिया जिसके विरोध में लोग सड़कों पर उतर आये और लगभग एक माह से पश्चिम बंगाल से निकलकर जाने वाले नेशनल हाइवे पर गोरखा जन मुक्ति मोर्चा का कब्ज़ा हो गया है जिस कारण पडोसी राज्य सिक्किम भी संकट के दौर से गुजर रहा है जिसका कारण नेशनल हाइवे का जाम होना है। हालांकि सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन चामलिंग ने गोरखालैंड की मांग का नैतिक समर्थन किया है किन्तु फ़िर भी सबसे ज्यादा परेशानी भी सिक्किम जैसे छोटे पहाड़ी राज्य को भुगतनी पड़ रही है। सिक्किम की अर्थव्यवस्था पूर्णतय: टूरिज्म पर निर्भर है जहाँ वर्ष में लगभग 1500 करोड़ का कारोबार होता है किन्तु आज स्थिति इसके बिलकुल विपरीत है। नेशनल हाइवे पूरी तरह बंद या ये कहे कि उपद्रवियों के कब्जे में होने के  कारण टूरिस्ट आने बंद हो गए हैं । सिक्किम में एंट्री के लिए पश्चिम बंगाल के न्यू जलपाई गुडी रेलवे स्टेशन और बागडोगरा स्थिति एक मात्र हवाई अड्डा है जहाँ से सड़क मार्ग से रास्ता तय करके ही सिक्किम में एंट्री की जा सकती है। राज्य के लगभग 8000 होटल खाली पड़े हैं यही हाल टैक्सी वालों का है लगभग 5 करोड़ रूपये का नुकसान तो अकेले सिक्किम को हो रहा है। इस स्थिति को देखते हुए सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन चामलिंग ने सर्वोच्च न्यायालय में नेशनल हाइवे को खुलवाने के लिए याचिका भी दायर की है इसके अतिरिक्त उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी  और केंद्र सरकार से इस विषय में दखल देने का भी अनुरोध किया है।किन्तु अभी तक समस्या जस की तस ही है। आख़िर ये समस्या कब और क्यों उत्पन्न हुई आइये इस एक नजर डालते हैं।  राज्य की तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने सुभाष घीसिंग के साथ एक समझौते के तहत दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद का गठन किया था. घीसिंग वर्ष 2008 तक इसके अध्यक्ष रहे. लेकिन वर्ष 2007 से ही पहाड़ियों में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बैनर तले एक नई क्षेत्रीय ताकत का उदय होने लगा था. साल भर बाद विमल गुरुंग की अगुवाई में मोर्चा ने नए सिरे से अलग गोरखालैंड की मांग में आंदोलन शुरू कर दिया।


लेकिन आखिर अबकी मोर्चा ने नए सिरे से गोरखालैंड की मांग उठाने का फैसला क्यों किया है? विमल गुरुंग का आरोप है, "गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) को समझौते के मुताबिक विभाग नहीं सौंपे गए. पांच साल बीतने के बावजूद न तो पूरा अधिकार मिला और न ही पैसा. राज्य सरकार ने हमें खुल कर काम ही नहीं करने दिया. ऊपर से जबरन बांग्ला भाषा थोप दी." मोर्चा के महासचिव रोशन गिरि कहते हैं, "यह हमारी अस्मिता का सवाल है. भाषा, संस्कृति और रीति-रिवाजों में भिन्नता के बावजूद हमें नेपाली कहा जाता है." वह कहते हैं कि नेपाली से पड़ोसी देश का नागरिक होने का संदेह होता है। दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में गोरखालैंड की मांग सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है। इस मुद्दे पर बीते लगभग तीन दशकों से कई बार हिंसक आंदोलन हो चुके हैं। ताजा आंदोलन भी इसी की कड़ी है. दार्जिलिंग इलाका किसी दौर में राजशाही डिवीजन (अब बांग्लादेश) में शामिल था. उसके बाद वर्ष 1912 में यह भागलपुर का हिस्सा बना. देश की आजादी के बाद वर्ष 1947 में इसका पश्चिम बंगाल में विलय हो गया. अखिल भारतीय गोरखा लीग ने वर्ष 1955 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को एक ज्ञापन सौंप कर बंगाल से अलग होने की मांग उठायी थी.उसके बाद वर्ष 1955 में जिला मजदूर संघ के अध्यक्ष दौलत दास बोखिम ने राज्य पुनर्गठन समिति को एक ज्ञापन सौंप कर दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार को मिला कर एक अलग राज्य के गठन की मांग उठायी. अस्सी के दशक के शुरूआती दौर में वह आंदोलन दम तोड़ गया. उसके बाद गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के बैनर तले सुभाष घीसिंग ने पहाड़ियों में अलग राज्य की मांग में हिंसक आंदोलन शुरू किया. वर्ष 1985 से 1988 के दौरान यह पहाड़ियां लगातार हिंसा की चपेट में रहीं। इस दौरान हुई हिंसा में कम से कम 13 सौ लोग मारे गए थे उसके बाद से अलग राज्य की चिंगारी अक्सर भड़कती रहती है। गोरखा मतलब क्या है पर भी सूक्ष्म प्रकाश डालते हैं।

गोरखा शब्द जैसे ही जहन में आता है तुरंत पांच साढ़े पांच फुट का ऐसे व्यक्ति का चित्र आखों के सामने तैर जाता है जो हटी है, निडर है, लड़ाकू है, ईमानदार है और साहस तो उसमें कूट कूट कर भरा ही होता है गोरखा जिन्हें नेपाल में गोरखाली  भी कहते है उनको ये नाम  8 वीं शताब्दी के महान हिंदू  योद्धा  संत गुरु गोरखनाथ से प्राप्त हुआ। संत गोरखनाथ के शिष्य बाप्पा रावल जिन्होंने कल्भोज और शैलाधिश जिनका वास्तविक जन्मस्थान मेवाड़ राजपुताना (राजस्थान) था को बाद में बाप्पा रावल के वंश लड़ाई के दौरान उनका वंश सुदूर पूर्व की तरफ़ बढ़ते रहे और गोरखा नामक स्थान में अपने साम्राज्य स्थापित किया ततपश्चात् उन्होंने नेपाल अधिराज्य को भी स्थापित किया इन्हीं के वंश के चित्तौडगढ़ के मन्मथ राणाजी  राव के पूत भूपाल राणाजी राव भी नेपाल पहुंचे। आधुनिक नेपाल के 75 जिलों में से एक गोरखा जिला भी है। गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह जो बाद में नेपाल के शासक बने,उनकी सेना में जो सैनिक हुए बाद में उन्हें ही गोरखा या गोरखाली कहा गया। खास्तोर्पे नेपाल के पश्चिम के पहाडी लड़ाकू जातियाँ  जैसे कि मगर ,गुरुगं,पहाड़ी राजपूत जिनमें क्षेत्री और ठकुरी या ठाकुरी भी कहा जाता है साथ ही पूर्व से किरात जातियाँ भी पाई जाती हैं
गोरखली लोग अपने साहस और हिम्मत के लिए विख्यात हैं और वे नेपाल आर्मी और भारतीय आर्मी के गोरखा रेजिमेंट और नेपाली आर्मी  और भारतीय आर्मी में गोरखा रेजिमेंट और ब्रिटिश आर्मी के गोरखा ब्रिगेड के लिए भी जाने जाते हैं। गोरखलियों को ब्रिटिश भारत   के अधिकारियों ने मार्शल रेस की उपाधि दी थी। उन लोगों का ऐसा मत रहा है कि  गोरखाली प्राकृतिक रूप से ही योद्धा होते हैं और युद्ध में ये अत्यंत आक्रामक होते हैं, वफादारी,साहस इनमें जन्मजात गुण हैं। ये  आत्म निर्भर होते हैं, भौतिक रूप से मजबूत और फुर्तीले, सुव्यवस्थित होते हैं, लम्बे समय तक कड़ी मेहनत करने वाले, हठी लड़ाकू, आर्मी की रणनीति में ये महारत रखते हैं।ब्रिटिश आर्मी में इन गोरखाओं को मार्शल रेसेज़ कहा जाता था और इनकी विशेष रूप से भर्ती की जाती थी।महाराजा रणजीत सिंह  ने भी गोरखों को अपनी सेना में शामिल दिया था क्यों कि वो इनके युद्ध कौशल से भली भांति परिचित थे। अंग्रेजों के लिए गोरखों ने दोनों विश्व युद्धों में अपने अ-प्रतिम साहस और युद्ध कौशल का परिचय दिया। पहले विश्व युद्ध में दो लाख गोरखा सैनिकों ने हिस्सा लिया था, जिनमें से लगभग 20 हजार ने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की।दूसरे विश्वयुद्ध में लगभग ढाई लाख गोरखा जवान सीरिया, उत्तर अफ्रीका, इटली, ग्रीस व बर्मा भी भेजे गए थे। उस विश्वयुद्ध में 32 हजार से अधिक गोरखों ने शहादत दी थी। भारत के लिए भी गोरखा जवानों ने पाकिस्तान और चीन के खिलाफ हुई सभी लड़ाइयों में शत्रु के सामने अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया था। गोरखा रेजिमेंट को इन युद्धों में अनेक पदको़ व सम्मानों से अलंकृत किया गया, जिनमें महावीर चक्र और परम वीर चक्र भी शामिल हैं।  अंग्रेजों ने अपनी फौज में 1857 से पहले ही गोरखा सैनिकों को रखना आरम्भ कर दिया था। 1857 के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में इन्होंने ब्रिटिश सेना का साथ दिया था क्योंकि उस समय वे ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए अनुबंध पर काम करते थे। वर्तमान में हर वर्ष लगभग 1200-1300 नेपाली गोरखे भारतीय सेना में शामिल होते है। गोरखा रायफल   में लगभग 80 हजार नेपाली गोरखा सैनिक हैं, जो कुल संख्या का लगभग 70 प्रतिशत बैठता है। शेष 30 प्रतिशत में देहरादून, दार्जिलिंग और धर्मशाला असम आदि के स्थानीय भारतीय गोरखे शामिल हैं। इसके अतिरिक्त रिटायर्ड गोरखा जवानों और असम राइफल्स में गोरखों की संख्या करीब एक लाख है।

वैश्विक योद्धा के रूप में मशहूर गोरखा युद्धक्षेत्र में अपनी दिलेरी और सैन्य कुशलता के लिए जाने जाते हैं। गोरखाओं से आप तीन चीजें कभी नहीं छीन सकते- उसकी खुखरी, मांदल और रक्षी (एक प्रकार का नशीला... कहने की आवश्यकता नहीं कि वे अनेक निजी सेनाओं में भाड़े के सैनिकों के रूप में भी काम करते हैं। उल्लेखनीय है कि एक समय में क्यूबाई सेना को सोवियत साम्राज्य का गोरखा कहा जाता था। सोवियत संघ के लिए क्यूबाई...  विक्टोरिया क्रॉस पलटन : नेपाल के लिए ये भाड़े के सिपाही या सौभाग्य के सिपाही पर्यटन के बाद आय के दूसरे सबसे बड़े स्रोत हैं। सिर्फ भारतीय सेना में काम करने वाले गोरखाओं से ही नेपाल को हर साल 1000 करोड़ की आमदनी होती है। गोरखओं ने अनेक युद्ध किये  और इन युद्धों में अपने अभूतपूर्व साहस के बलबूते कुल तीन विक्टोरिया क्रॉस में से दो तो इसने 24 घंटे के अंदर सिर्फ एक अभियान में ही हासिल किए थे। यह कार्रवाई 1944 में इंफाल के निकट मोर्टार ब्लफ में हुई थी। इसी कार्रवाई में सूबेदार नेत्र बहादुर थापा...  की विधवा पत्नी नामसारी थापिनी को दिया गया था, जो नेपाल के कोल्मा नामक स्थान की रहने वाली थी।  

ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से पहले विश्वयुद्ध में नेपाल के दो लाख गोरखा सैनिकों ने भी हिस्सा लिया. यह दक्षिण एशिया से बाहर उनकी पहली लड़ाई थी लेकिन उनकी बहादुरी के किस्से आज भी कहे सुने जाते हैं हिमालय की तलहटी में बसे नेपाल में एक जिला है गोरखा. वह आज भी अपने मशहूर योद्धाओं के लिए विख्यात है. गोरखा किसी एक जाति के योद्धा नहीं, बल्कि उन्हें पहाड़ों में रहने वाले सुनवार, गुरंग, राय, मागर और लिंबु जातियों से भर्ती किया जाता है. "आयो गुरखाली" के युद्धनाद और "कायरता से मरना अच्छा" के नारे के साथ उन्होंने खौफ पैदा करने वाली ख्याति पाई है. कहते हैं कि जब गोरखा अपनी खुखरी निकाल लेता है तो वह खून बहाए बिना मयान में नहीं जाती। ब्रिटेन के ब्रिटिश गोरखा वेल्फेयर सोसाइटी के टिकेंद्र दीवान कहते हैं, "हिम्मत और वफादारी के साथ जुड़ी मासूमियत उनकी ख्याति का कारण है." उनकी निर्भीकता के बारे में भारत के सेनाध्यक्ष रहे सैम मानेकशॉ ने कहा था, "यदि कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मरने से डर नहीं लगता तो वह या तो झूठा है या गोरखा." मौजूदा समय में गोरखा सैनिक भारत की आजादी के समय में किए गए एक समझौते के तहत नेपाल की सेना के अलावा भारत और ब्रिटेन की सेनाओं में काम करते हैं. भारतीय सेना में 1,20,000 गोरखा सैनिक हैं तो ब्रिटिश सेना में उनकी तादाद 3,500 है।

गोरखा सैनिकों का पश्चिम के साथ पहला संपर्क 1814-16 में तब हुआ जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने नेपाल के खिलाफ लड़ाई लड़ी. हालांकि इस लड़ाई का अंत अंग्रेजों की जीत के साथ हुआ लेकिन गोरखा जवानों ने उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया। एक ब्रिटिश सैनिक ने आत्मकथा में लिखा, "अपने जीवन में पहले कभी मैंने इतना जीवट और साहस नहीं देखा था. वे भागते नहीं थे और मौत से उन्हें जैसे डर ही नहीं था हालांकि उनके आसपास उनके साथी मरे पड़े थे अपने दुश्मनों की युद्धक्षमता से इस तरह प्रभावित अंग्रेजों ने नेपाल के राजा के साथ हुई शांति संधि में यह भी जोड़ दिया कि वे गोरखा जवानों की भर्ती ब्रिटिश सेना में कर सकेंगे। यह समझौता उसके बाद दोनों पक्षों के बीच 200 साल से ज्यादा से चल रहे सैनिक रिश्तों का आधार बन गया. हालांकि उस समय किसी ने नहीं सोचा था कभी उन्हें अपने देश से हजारों किलोमीटर दूर यूरोप में पहले विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से लड़ना होगा।कुल मिलाकर दो लाख गोरखा सैनिकों ने पहले विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस से लेकर फारस तक की खाइयों में लड़ाई लड़ी। 1914 से 1918 तक पहले विश्व युद्ध के दौरान गोरखा सैनिकों के 33 राइफल बटालियन थे. गोरखा सैनिकों पर लिखी किताब में बेनिटा एस्टेवेज ने लिखा है। "नेपाल की सरकार ने समझ लिया कि मित्र देशों की लड़ाई के लिए गोरखा जवान कितने महत्वपूर्ण हैं और ब्रिटिश कमान को सभी मोर्चों पर लड़ने के लिए और टुकड़ियां मुहैया करा दी।“

राजनीतिक रूप से देखें तो इस समस्या का समाधान निकलना इतना भी आसान नहीं है किन्तु वर्तमान में जो परिस्थिति है उसे ज्यादा देर तक नकार पाना किसी भी सरकार के लिए अच्छा नहीं होगा अतएव बेहतर तो यही होगा कि इस समस्या का समाधान तुरंत निकाला जाये और ये जिम्मेदारी सिर्फ़ केंद्र सरकार की नहीं है इसमें पश्चिम बंगाल की सरकार को ही पहल करनी होगी। अन्यथा जिस प्रकार बंद के दौरान सिक्कम और दार्जलिंग से फंसे हुए सैलानियों को निकलने में फ़ोर्स की मदद लेनी पड़ी उस अवस्था में हिंसक आन्दोलन के चले पश्च्चिम बंगाल सिक्किम और दार्जलिंग में आने वाले सैलानी कहीं और जाना पसंद करेंगे।


                       - प्रदीप भट्ट -