“भारत मे यहूदी“
यहूदी शब्द का उच्चारण
करते ही इज़राइल का ध्यान आना स्वाभाविक हैं।क्यो की दुनियाँ मे सबसे ज्यादा
यहूदियों की संख्या यहीं पाई जाती है किन्तु क्या आपको ज्ञात है कि भारत मे भी कुछ
यहूदी परिवार बसते हैं। भारत मे जहाँ हर दूसरी जाती अपने को अल्पसंख्यक का दर्ज़ा
दिये जाने पर और आरक्षण दिये जाने बाबत जमीन आसमां एक किए रहती है और अपने आपको
हिंदुओं के बनिस्पत कम संख्या के होने का दावा करती हैं वहीं यहूदी बरसों से शांति
के साथ महराष्ट्र की राजधानी और देश की वित्तीय राजधानी मुंबई मे निवास करती हैं।
देश के अन्य भागों मे भी इनके इक्का दुक्का मिलने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया
जा सकता। किन्तु इनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति वास्तव मे पूर्व के मुक़ाबले काफी
दयनीय हो गई है। इनकी बरसों से चली आ रही अल्पसंख्यक का दर्ज़ा दिये जाने संबंधी
मांग भी काफी समय से महाराष्ट्र सरकार के पास लंबित है जिसे शायद इस वजह से लंबित
रखा गया हो कि इनकी पूरे देश मे आबादी है ही कितनी ? और वैसे भी इनसे कुछ राजनैतिक फायदा तो किसी भी प्रांतीय या राष्ट्रीय
पार्टी को होने वाला नहीं है। अगर ऐसा है तो ये दुर्भाग्यपूर्ण है। जो लोग बरसों
से भारत मे रह रहे हैं कम से कम वे भारत के खिलाफ तो कुछ करने से रहे क्यों कि
भारत उनकी जन्म-भूमि या मात्रभूमि और कर्मभूमि है। भारत मे लगभग 5000 यहूदी रहे हैं।
आइये चलिये कुछ भारत मे रह रहे यहूदियों
पर प्रकाश डालते हैं:-
ऐसा माना जाता है कि
लगभग 2000 वर्ष पहले जब येरूशलम मे सेकंड टेंपल तबाह हुआ तब इज़राइल के उत्तरी
हिस्से से पानी के जहाज से वहाँ से पलायन कर समुद्र के रास्ते भारत के आज के
महराष्ट्र राज्य के नौगांव मे प्रवेश कर गए। यहाँ तक आते आते उनका जहाज चकनाचूर हो
गया जिससे उनके लिए आगे बढ़ना मुश्किल था इसलिए उन्होने यहीं पर अपना ठिकाना बना
लिए और स्मृति स्वरूप एक स्मारक बना दिया ताकि आने वाली नस्लों को याद रहे।यहाँ यह
विशेष है कि इन लोगों को बेने इज़राइल कहा जाता हैं। इसके अतिरिक्त भी बगदादी और
कोचीनी यहूदी भी यहाँ पाये जाते हैं। आज की तारीख मे ये तीनों ही मान्यता प्राप्त
यहूदी समुदाय हैं। इसके अतिरिक्त भी मिज़ोरम और मणिपुर मे एक जनजाति ब्नेई मेनशे को
भी यहूदी समुदाय समझा जाता है ऐसा इसलिए क्यों कि 2005 मे इज़राइल प्रधान रब्बी ने इसकी
पुष्टि कि और इन्हे आप्रवासी घोषित कर दिया गया इसी कड़ी मे आंध्र प्रदेश मे तमिल बोलने
वाले एक जनजाति बेने एफराइम भी यहूदी होने का दावा कर रही है और ब्नेई मेनशे की ही तरह व्यवहार होने की उम्मीद कर
रही है।
चूंकि यहूदियों मे धर्मांतरण
नहीं होता और वे अपने आप को ईश्वर के चुने हुए लोग मानते हैं अतएव उन्हें सिर अंतरधार्मिक
विवाह के लिए ही बढ़ावा दिया जाता है। यहाँ यह विशेष है कि भारत मे रहने वाले यहूदी
इस बात को बड़ी मजबूती से रखते हैं कि और देशों के मुक़ाबले भारत मे कभी भी यहूदियों
का शोषण नहीं हुआ न ही यहूदियों पर किसी भी प्रकार का जुल्म हुआ वरन उन्हे यहाँ के
लोगों से बेन्तेहा प्यार और इकरार मिला हाँ ये शिकायत अवश्य रही कि भारत के लोग उन्हें
गलती से ईसाई समझने कि भूल कर जाते हैं ऐसा इसलिए भी कि जब 2011 मे जनगणना हुई तो जानकारी
के अभाव मे जानकारी जूटा रहे लोग उनके धर्म के विषय मे ज्ञान न रख पाने के कारण उनको
ईसाई लिख देते हैं। इसका कारण कुछ लोग ये भी मानते हैं कि अब उनके ही समुदाय के लोग
अच्छे जीवन के आशा मे अपने धर्म विशेष पर ध्यान नहीं देते।जब वे स्वंम ऐसा करते हैं
तो फिर अपने बच्चों के कैसे सिखाएँगे।
भारत मे रह रहे यहूदी इस
बात से भी खफा हैं कि उनके समुदाय के पास इबादत कि अगुआई करने के लिए कोई क्वालिफ़िएड
पुरोहित तक नहीं है इसलिए लिए बच्चे के जन्म से लेकर मरण तक का सारा कार्य परिवार के
बुजुर्ग ही कर रहे हैं। महाराष्ट्र मे बगदादी यहूदियों ने काफी अच्छे सामाजिक कार्यों
को अंजाम दिया है। जिनमे पुणे मे कुष्ठ रोग अस्पताल,मुंबई मे डेविड सासुन लाइब्रेरी, सासुन गोदी,मेसीना अस्पताल,सासुन अस्पताल और इन सबमे सबसे बेहतरीन
कार्य Bank of India की स्थापना। भारत मे रह रहे यहूदी अपने सभी
विशेष कार्य हिब्रू भाषा मे ही करते हैं वैसे वे आम बोलचाल मे मराठी भाषा का ही प्रयोग
करते हैं। भारत मे सभी धर्मो के लिए विशेष अवकाश का प्रावधान है किन्तु यहूदियों की
कुछ विशेष पहचान नहीं होने के कारण यहूदियों को अपने उत्सवों (पासओवर, योम किप्पूर एवं,हनुक्का) पर भी काम करना पड़ता है अथवा
उन्हे अवकाश लेकर उत्सव मनाना पड़ता है।
येरुशलम एक ऐसा नाम है जो ईसाइयों, मुस्लिमों और यहूदियों के
दिल में सदियों से विवादित इतिहास के बीच बसता आ रहा है.हिब्रू
में इसे येरुशलाइम और अरबी में अल-कुद्स के नाम से जाना जाता है.ये दुनिया के सबसे
पुराने शहरों में एक है. इसे जीता गया, ये तबाह हुआ और फिर
बार-बार उठ खड़ा हुआ. इसका ज़र्रा ज़र्रा इसे इसकी अतीत की पहचान से जोड़ता है। हालांकि
इससे जुड़ी ज़्यादातर कहानियां इसके बंटवारे और अलग-अलग धर्मों केअनुयायियों में टकराव और संघर्ष से भरी पड़ी हैं, लेकिन वो सभी इस पवित्र
शहर का सम्मान करने में एक साथ हैं.दरअसल शहर की आत्मा पुराने शहर में है, संकरी गलियां और ऐतिहासिक स्थापत्य वाला पुराना शहर, जो इसके चार हिस्सों को अलग चरित्रों –ईसाइयों,
मुस्लिमों, यहूदियों और आर्मेनियाइयों से
जोड़ता है। ये चारों ओर पत्थर की दीवारों से
घिरा है और यहां कुछ ऐसी जगहें हैं, जिन्हें दुनिया के
पवित्रतम स्थलों में शुमार किया जाता है।
येरूशलम मे यहूदियों
के प्रार्थना स्थल जिसे पवित्र दीवार के नाम से जाना जाता है। यहूदी हिस्सा कोटेल
या पश्चिमी दीवार का घर भी है,
माना जाता है कि यहां कभी पवित्र मंदिर खड़ा था, ये दीवार उसी बची हुई निशानी है।यहां मंदिर में अंदर यहूदियों की सबसे
पवित्रतम जगह ''होली ऑफ होलीज'' है। यहूदी
मानते हैं यहीं पर सबसे पहली उस शिला की नींव रखी गई थी, जिस
पर दुनिया का निर्माण हुआ, जहां अब्राहम ने अपने बेटे इसाक
की कुरबानी दी।पश्चिमी दीवार, ''होली ऑफ होलीज'' की वो सबसे क़रीबी जगह है, जहां से यहूदी प्रार्थना कर
सकते हैं. इसका प्रबंध पश्चिमी दीवार के रब्बी करते हैं. यहां हर साल लाखों लोग आते हैं.दुनियाभर से लाखों यहूदी यहां
आते हैं और ख़ुद को अपनी विरासत से जोड़ते हैं, ख़ासकर
छुट्टियों के दौरान।
श्री सी वी राव
जो की महाराष्ट्र के राज्यपाल थे ने महराष्ट्र मे रह रहे यहूदियों को अल्पसंख्यक का
दर्ज़ा दिये जाने की सिफ़ारिश की थी। इस विषय मे यहूदी समुदाय के कुछ विशिष्ट लोगों ने
भारत सरकार तक से इस विषय मे ध्यान दिये जाने की प्रार्थना की है किन्तु मामला अभी
भी लंबित है। अब तो ऐसी आशा ही की जा सकती है कि इस विषय मे जल्द से जल्द कोई निर्णय
हो जाए ताकि महाराष्ट्र मे रह रहे 5000 यहूदियों को अपने अधिकारों के लिए धक्के न खाने
पड़े।
अच्छी बात ये रही कि इस
लेख को लिखते लिखते महाराष्ट्र सरकार ने महराष्ट्र मे रह रहे यहूदियों कि बरसों पुरानी
मांग को आखिर मान लिया और कल ही यहूदियों को अल्पसंख्यक कर दर्ज़ा दिये जाने का निर्णय
ले लिया गया है।
::: प्रदीप भट्ट
:::
22.06.2016




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