Wednesday, 23 July 2025

"कभी कभी यूं भ"ी

रिपोर्ताज 

            

             "कभी कभी यूं भी"
 
"हवाएं हक़ में हैं फिर भी, खड़ी नैय्या किनारे पर 
 भरोसा टूटा है शायद, खिवैय्या और नौका का "

         अब ये कतई मति पूछना कि इस शेर को यहाँ क्यूँ चिपका दिया।😊 भैय्या जी जैसे ही रिपोर्ताज लिखने बैठा तो शेर स्वत: बन गया। अब ऐसे तिरछी नज़र से हमें मति देखो। आज शिवरात्रि है भूखे पेट ऐसे ही शेर निकलेंगे दिमाग़ से। वैसे भी हर बात में लॉजिक मति ढूँढा करो महाराज 🤣 "कभी कभी यूं भी" समझ रिए हो न मियां। ख़ैर तो हुआ यूं कि दो तीन महीने से न तो "कथा रंग" और न ही महफ़िल ए बारादरी में जाना हो रहा था। बारादरी तो वैसे भी अज्ञात कारणों से नहीं हो पा रहा था और कथा रंग हम अन्यत्र घने😜 बिज़ी होने के कारण अटेंड न कर पा रिये थे और काँवण यात्रा के कारण उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सभी सड़कों पर लोगों का हूजूम समुन्दर टाइप उमड़ रहा था वैसे ये अनुभव पहले सिर्फ़ महाराष्ट्र के बम्बई में देखने को मिलता था या बंगाल में काली मां की यात्रा के दौरान किंतु भैय्या अब हमारे भगवान भी लोकळ से ग्लोबल😎 होते जा रहे हैं न सो ये नज़ारा देखना आम हो गया है। 

         पूरम पट्ट एक घंटा इंतज़ार के बाद देहरादून दिल्ली की बस मिली वो भी लम्बे वाले नए रूट और बढ़े हुए किराए के साथ मतबल 76 की जगह 139 का भुगतान कुल जमा सात यात्री, ड्राइवर भी बस को हवाई जहाज़ समझकर दन दना कर चलाए जा रहा था। टिकिट लिया साथ ही कंडक्टर नामक प्राणी से गुज़ारिश भी कर दी भैय्या देख गाजियाबाद उतार दियो वैसे तुम्हें जहां ठीक लगे उतार देना। उसने मुंडी हिलाई फिर पायलट को बता दिया और लो जी डेढ़ घंटे में पायलट बाबा ने इंस्ट्रक्शन के साथ डासना मोड़ पर उतार दिया। वहां से पुराने बस अड्डे⛅ फिर वहां से सिल्वर लाइन प्रेस्टिज पब्लिक स्कूल वो भी ठीक तीन बजे। पैसे ज़्यादा खर्च हुए गम नहीं पर टाइम पर पहुंच गए इसकी ख़ुशी कुछ ज्यादा ही। प्रवेश करते ही डॉक्टर माला कपूर, आलोक यात्री डॉक्टर वीणा मित्तल। राम राम श्याम श्याम हुई और जा पहुंचे प्रथम तल स्थित मीटिंग हॉल में।🌚 धीरे धीरे महफ़िल सजने लगी और अंततोगत्वा 3.40 पर कार्यक्रम शुरु। 

         बेहतरीन सरस्वती वन्दना के साथ कार्यक्रम का आग़ाज़ प्रिय आशीष ने किया संचालन का दायित्व डॉक्टर तरुणा मिश्र ने संभाला। कार्यक्रम अध्यक्ष मोईन शादाब "ये किन चिराग़ों का अहसान ले रहे हैं हम, धुंआ इनमें ज़्यादा है रोशनी कम" शायर खालिद अखलाक " एक तो फूल ही कागज़ के उठा लाया है, उस पे ये जिद है इन फूलों से खुशबू आए" डॉक्टर तारा गुप्ता जिन्हें जीवन पर्यन्त सृजन साहित्य सम्मान से नवाजा गया कि पंक्ति " आपसे मान सम्मान इतना यूं लगा, मेरी तो सद्गति हो गई"(ये बात कुछ हजम नहीं हुई) डॉक्टर माला कपूर ने पुस्तक "पंच तत्व" का लोकार्पण पर मेघों से झरता पानी, पर्वत पर जमता पानी " के अतिरिक्त कुछ और पंक्तियों का स स्वर पाठ किया। इंद्रजीत, तरुणा मिश्र, सुरेन्द्र शर्मा, कल्पना कौशिक, विपिन जैन के अतिरिक्त और भी उपस्थित कवियों और शायरों ने अपने कलाम प्रस्तुत किए।
हमने भी एक ग़ज़ल पढ़ी, आनन्द लें।

ग़ज़ल 

22  22  22  22  22  22  22  22

" रिश्तों की तुरपाई कर लूं "

रिश्तों की तुरपाई कर लूँ, थोड़ी और कमाई कर लूँ 
लम्बा जीवन आस है छोटी, मैं पूरी भरपाई कर लूँ 

किसकी खातिर ज़िंदा रहना, अपने लोग पराए निकले 
फिर भी जी की यही तमन्ना, थोड़ी और भलाई कर लूँ 

किसकी चाहत पूरी होती, जो मेरी भी हो जाएगी 
फिर भी मरने से पहले मैं, जीवन आना पाई कर लूँ 

लिख लिख कागज़ काले करना, तू भी कर ले मैं भी कर लूँ 
अच्छा हो गर मैं भी अपनी, क़िस्मत को चुग़ताई* कर लूँ 

इसकी उसकी छोड़ बुराई, इससे कुछ कब हासिल होगा 
इससे तो ये बेहतर होगा, मैं भी राम दुहाई कर लूँ 

वसन फटे हैं माना मेरे, पर किरदार बहुत है ऊंँचा 
साथ अगरचे थोड़ा तुम दो, मैं इसकी रफूआई कर लूँ 

पास तो हों पर पास नही हों, सोचो ये भी क्या जीवन है 
इससे बेहतर नाम बदलकर,  अपना नाम जुदाई कर लूँ 

धूल जमी है जिन रिश्तों पर, आज नहीं तो कल उतरेगी 
मन के जालों की मैं पहले, थोड़ी आज सफ़ाई कर लूँ 

प्यार बहुत है उससे लेकिन, छुप छुप मिलना ठीक नही 
उसकी बदनामी से बेहतर, मैं उससे कुड़माई कर लूँ

मिलती कब सपनों की रानी, कैसे अब यह जीस्त कटेगी 
सोच रहा हूंँ कुछ भी करके, जीवन फिर तरुणाई कर लूँ 

सुख दुःख पल दो पल का मेला, आज नही तो कल आएगा 
पास बिठाकर सुख को अपने, ख़ुद अपनी परछाईं कर लूँ 

जीवन के इस चक्रव्यूह से, पार सभी को होना ही है 
सोच रहा हूं इससे पहिले, रुपया एक दहाई कर लूँ 

अपनी मैं में चूर रहा हूँ , कभी किसी को कुछ कब समझा
इससे पहले ज्यादा बिगड़े, बातों में नरमाई कर लूँ 

'दीप' की क़िस्मत रात अमावस, बोलो जी क्या हो सकता है,
रब की मेहर मिले तो मैं भी, रोशन रात सवाई कर लूँ✅

प्रदीप डीएस भट्ट=16062025

         सायं आठ बजे तक चली महफ़िल के बाद कुछ जल पान 🥘🫕🍱🥧🍿🍮 फिर मेरठ पहुंचने की जद्दोजहद वो तो भला इंद्रजीत जी का जिन्होंने हमें विक्रम बेताल की भांति अपनी पीठ की जगह फटफटिया पर लादा और सीधे बस अड्डे पर अफसोस दिल गड्ढे में सूं सॉ मानस गंध🗿🗿🗿🗿 की तर्ज पर कोई बस नहीं अलबत्ता भीड़ बस पूछो मति, वहां से फिर पीठ रूपी फटफटिया पर लदे और 8.45 पर सीधे साहिबाबाद रैपिड 🚇 स्टेशन, भगवान भला करे सरकार का जो दिल्ली मेरठ के लिए रैपिड कनेक्टिविटी की व्यवस्था की वरना लोग बड़ी शान से बताते नहीं थकते कि दिल्ली NCR में रहता हूं लेकिन उनका दिल ही जानता था कि दिल्ली NCR कहने और लिखने में तो अच्छा लगता है किन्तु परन्तु लेकिन ट्रांसपोर्ट व्यवस्था लुंज पुंज। ख़ैर ठीक 9.25 पर मेरठ साउथ 🚇, स्टेशन से बाहर आते ही सिलसिला फिल्म का गाना याद आ गया " ये कहां आ गए हम" भीड़😡 के रेलम पेल से बचते बचाते कभी ऑटो कभी पैदल में सफ़र का आनन्द लेते हुए 11.45 घर में एंट्री मारी, नहाए, धोए दूध पिए और फिर हम हमारा बेडवा और ठंडी ठंडी हवा देता वोल्टास का एसी । सच्ची बता रिया हूं महाराज पता ही न चलो कब खर्राटे शुरु हो गए।🫣🫣🫣🫥🫥🫥

प्रदीप डीएस भट्ट=23.07.2025


         

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