Monday, 24 November 2025

" चिख़ुरी कुछ नया लिखा क्या "

रिपोर्ताज 

"चिख़ुरी कुछ नया लिखा क्या "

        अचानक फ़ोन की टुन्न टूनिया बज उठी। दूसरी तरफ़ गुरुग्राम से डॉक्टर प्रवीण शर्मा थी, उन्होंने राधे राधे कहा और हमने जय श्रीराम यानि उन्होंने द्वापर का प्रतिनिधित्व किया और हमने त्रेता का 😄 प्रवीण जी ने आग्रह किया कि उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर ABS4 "प्रज्ञान विश्वम" का विशेषांक निकाल रही है अतएव आपसे प्रार्थना है कि आप इसमें अपना सहयोग अवश्य दें। सहयोग से कुछ और मतबल मत निकाल लेना पाठकों🤔😎😎 यहाँ सहयोग का तात्पर्य आलेख से था, पईसे से बिलकुल भी नी, हाँ नई तो। ख़ैर हाँ भर दी।

तो भैय्या 19th नवम्बर को रेपिडो फिर रैपिड मेट्रो नमो भारत का आनन्द लेते हुए जा पहुँचे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया वो भी 10:10 पर। यूँ प्रश्न वाचक दृष्टि से मती देखो 👀👀👀👀 टेम से पहुँचने की अच्छी वाली आदत है म्हारी समझे के नाही।👑👑👑 तो बस म्हारे से पहले कौन होगा वहाँ सोचो सोचो,सही पकड़े हैं 😺😺😺😺 शर्मा फैमिली। भाई साहब कित्ता भी समझा लो पर सबको यही ग़लत वाली फैमिली है कि वो मुन्शी प्रेमचंद और दिनकर से भी बड़े साहित्यकार हैं 😡😡😡😡

         ख़ैर सवा ग्यारह बजे गायत्री मंत्र से प्रोग्राम की शुरूआत हुई। मुख्य,विशिष्ट और अतिविशिष्ट कौन था राम जाने पर हम थे न मात्र अतिथि सो नीरव जी के आग्रह पर लगे हाथ कइयों को सम्मानित कर डाला।😍😝😍😝😍😛 अब चूँकि प्रोग्राम तो डॉक्टर प्रवीण शर्मा, गुरुग्राम की अभी तक की शैक्षणिक, सामाजिक एवं साहित्यिक यात्रा को स्मरण करने का था सो इस कार्य हेतु साहित्य एवं राजभाषा हिन्दी की अलख जगाती संस्था अखिल भारतीय सर्वभाषा, संस्कृति समन्वय समिति ने डॉक्टर प्रवीण शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर "प्रज्ञान विश्वम" का विशेषांक निकालने का निर्णय लिया। निश्चित ही ये कार्य साहित्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे साहित्यकारों के लिए विशेष जड़ी बुटी देने का कार्य कर रहा है जिसके लिए सुरेश नीरव जी बधाई के पात्र हैं।

" साहित्यिक यज्ञ की गिलहरी "

         मेरा मानना है कि आप किसी भी क्षेत्र से संबंध रखते हो यदि आपको अपने जीवन के शुरु में मध्य में या रिटायरमेंट के बाद साहित्य का कीड़ा काट ले तो आपके सोचने समझने के तरीके में बदलाव आ जाता है। जहां तक संपूर्ण जीवन का प्रश्न है वो भी माया काया के फेर से द्वंद करते हुए अंततोगत्वा साहित्य में अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है ऐसा इसलिए भी कि युवावस्था में जहां लेखक प्यार व्यार में अपनी लेखनी को ज़्यादा सक्रिय रखता है वहीं शादी का लड्डू खाने के कुछ महीनों या वर्षों के बाद उसे जीवन के धरातल के अनुभव होते हैं तब उसकी लेखनी कम किंतु अनुभव आधारित लिखने लगती है। यूं तो मनुष्य जिम्मेदारियों से कभी भी पीछा नही छुड़ा पाता किंतु जिम्मेदारियों के पूर्ण होने पर उसकी कलम सत्य लिखने का साहस कर पाती है वैसे ऐसा सबके साथ नही भी हो पाता किंतु जो लेखक इन अनुभवों को जीते हैं वे जानते हैं कि सत्य कहने और लिखने में यक़ीन रखते हैं उन्हें ज्ञात होता है कि वे किन परिस्थितियों से होकर इस लक्ष्य तक पहुँच पाए हैं।

         9 फ़रवरी 2025 को प्रेस क्लब में हुई पहली मुलाक़ात से लेकर 19 नवंबर तक के सफर में मैं जितना उन्हें जान पाया,समझ पाया उन्हें शब्दों में बांधकर उनके लिए कुछ लिखकर मैंने भी प्रवीण जी की साहित्यिक यात्रा के हवन में अपने हिस्से की आहूति डाल दी। प्रवीण जी में नया और वो भी कुछ अलग करने की इच्छा ज़बरदस्त है। अच्छी बात ये रही कि ये शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी रही हैं जहां सदैव कुछ अलग करने की संभावनाएं सदा मौजूद रहती हैं। उन्हीं संभावनाओं को टटोलती उनकी दृष्टि सदैव कुछ नया पा ही जाती है। हरियाणा जो कि उनकी जन्मभूमि भी है और कर्मभूमि भी में संतुलन साधते साधते प्रवीण जी धीरे धीरे साहित्य की ओर आकर्षित हो गईं और साहित्य तो प्रेम की वह अविरल धार है जिसमें से जिसे जो चाहिए वह निश्चित ही पा जाता है। अच्छी बात ये रही कि अपनी शैक्षणिक यात्रा के दौरान इन्हें दिल्ली हरियाणा की जर्नी में इन्हें कई ऐसे किस्से मिले जिसे इन्होंने अपनी लेखकीय यात्रा में इस्तेमाल किया है।

        जहां तक प्रवीण जी की कविताओं का प्रश्न है उनमें मन में त्वरित उपजे भावों की अभिव्यक्ति नज़र आती है। उनकी कविताई प्रकृति, मानव पीड़ा, श्रृंगार के इर्द गिर्द बुनी लगती है, एक बानगी देखिए:

  
राम जो तुम आ जाते एक बार 
तो बेड़ा सबका हो जाता पार 
हम नव दीप जलाते,
उपवन में फूल खिल जाते।
संसार सुखी हो जाता 
राज विद्या बुद्धि का होता 
दुःखी न रहता कोई,
धन्य धान से वंचित रहता न कोई 
राम जो तुम आ जाते एक बार 
आ कर कुछ तो करते जतन 
आकर धर्म का रोकते पतन।

होती पितृ भक्ति की जय जय कार 
होता भरत लक्ष्मण भाई सा प्यार 
राम जो तुम आ जाते एक बार 

         सवा बजे कार्यक्रम सम्पन्न हुआ और फिर लंच। सो भैय्या आदत अनुसार दो पीस गुलाम जामुन पेट में डालकर ब्राह्मण कुल में जन्म होने का कर्तव्य पूरा किया 😍😍😍😍 फिर थोड़ा सा ये थोड़ा सा वो और निकल पड़े वाया मेरठ वाया दिल्ली विश्वविद्यालय होते हुए 🍩🍩🍩🍩एक बालक को जन्मदिन की शुभकामनायें देते हुए। क्यूँ अच्छा किया न महाराज 

प्रदीप डीएस भट्ट - 25112025

Friday, 21 November 2025

हरबे हरबे -- जितबे कब

"हरबे हरबे जीतबे कब" 

सन् राइज के चक्कर में सन सेट करा बैठे 
"गिरे तो भी टांग ऊपर"

         अपना भारत देश भी जो है न भाईसाहब पूरा गजबई से भरा हुआ देश है। यहाँ कौन क्या और कब कुछ ऐसा कर देता है जिसे समझने में ही लोगों के पांच सात साल निकल जाते हैं। बात अगर गांव की करें तो अलग ही कहानी चल रही होती है। वहां खाता न बही, जो प्रधान जी ने कही बस वही सही। आजकल जिसे देखो एस आर आई ,एस आर आई खेलने पे लगा हुआ है। वोटर कार्ड तो अपना भी है लेकिन मुम्बई का। अब भैय्या फार्म नम्बर छः भरकर ऑनलाइन ऑफलाइन दोनों तरह से दे दिया है लेकिन सूचना अब तक भी न प्राप्त हुई। अब चूंकि हम अभी यहाँ नए हैं तो आस पड़ोस से पूछताछ की तो पता चला सबके वोट गांव के है हमने पूछा ऐसा काहे महराज बोला हमारे वोट की कीमत शहर में नहीं है जनाब लेकिन गांव में भरपूर है। गांव में चुनाव चाहे प्रधानी का हो या विधायक का या फ़िर लोकसभा का ग्राम प्रधान महीने भर पहले से दे फ़ोन दे फोन करके कन्फर्म करता रहता है कि कहीं हम टपक तो नहीं गए। हमारे एक वोट से गाँव की प्रधानी जा भी सकती है और मिल भी सकती है और खातिर दारी के तो क्या ही कहने। भाई साहब हमें पहली बार अपने वोट की क़ीमत का पता चला साथ में बड़े वाला दुःख भी हुआ कि हम गांव से छिटके क्यूँ और ख़ुद छिटके तो ठीक वोट काहे छिटकवा दिए बे। फिर भारत तो उत्सवों का देश तो हइए ही चुनावों का भी देश है इसलिए हलवाईयों की दुकान भी चलती रहती है। चुनाव के बाद वोटरों की लड्डू खाने की डिमांड जो रहते हैं।

         खैर एक बात तो पक्की है कि नेता चाहे छुटभैय्ए हो बढ़ैया उनका जीत से बड़ा कोई नशा नहीं होता वरना क्या कारण है कि ग्राम प्रधानी या ब्लॉक के चुनाव जीतने के लिए क्या क्या और कैसे कैसे जुगाड/जतन नहीं किए जाते हैं। जुगाड/जतन से मतबल खून खच्चर से है मियां। पहले विरोधी लाठी डंडों से निबटाए जाते थे अब तमंचा काम में लिया जाता है। देसी तमंचे से काम चला तो ठीक वरना विलायती वाला बस काम होना चाहिए। मजाल है कि पुलिस चू चपड़ करे आख़िर आधी पुलिस भी तो गांव को ही बिलांग करती है जी। और भैय्या भगवान से पहले मुंह गांव वालों को दिखाना ज़रूरी जो है। ख़ास बात ये है कि विलायती तमंचे से जो विरोधियों को निपटा देता है उसकी धाक तो गांव में वैसे ही बन जाती है। गांव खेड़े में बात पैसे की कभी नहीं होती, होती है तो बस मूंछों की। दुई की जगह चार किल्ला जमीन बिक जाए लेकिन मूंछ नीचे नहीं होनी चाहिए। चुनाव जीतने के बाद नए प्रधान जी चौपाल में कुछ लठैत, कुछ चमचे और सरकंडों से बनी प्रधान जी बड्डी वाली कुर्सी। रोज़ शाम यहीं नज़ारा देखने गाँव का गांव आ धमकता है प्रधान जी के किस्से कहानियां सुनो और आधी परात पूरी सब्जी पेट में उतार लो फिर बड़ी वाली डकार मार कर घर वापिस। अगर मूड हुआ तो दीन दुनिया की ख़बरों पर तब्सिरा अलग से लेकिन गांव की हद में। ट्रंप रूस को धकियाए या चीन को या फिर ईरान को प्रधान जी ट्रंप में ख़ुद को और कभी कभी ख़ुद में ट्रंप को देखते हुए चूल्हे पर पकती काढ़ा हुई जा रही चाय के साथ पारले जी के पांच रुपए वाले बिस्किट को भिगोकर खाते हुए अपनी विशेष टिप्पणी देते और सभा बर्खास्त। लेकिन लेकिन लेकिन!!!!

         कैसा लगता होगा जब कोई चुनाव सिर्फ़ इसलिए लड़े कि उसे चुनाव हारना है तो। न न न आप ग़लती से सही समझ रिए हो मियां । मैंने कहा था न अपने देश में एक से एक लक़ड़ बग्घे पड़े हैं जो गांधी जी कि आत्मा को शान्ति दिलवाकर ही मरना चाहते हैं वरना क्या कारण है कि छियानवे हारों के बाद भी बंदा हारों की सेंचुरी पूरी करने के लिए कमर कसे बैठा है। भई उसपे तो फ़र्क न पड़ रहा है लेकिन छियानवे हारों से पार्टी की नींव जरूर भुरभुरी हो गई है। इस पार्टी की इमारत लखोड़ी ईंटों से बनी इमारत है जो एक सौ इकतालीस साल से जैसे तैसे सब कुछ झेल रही है। अच्छी बात ये है कि इस इमारत की नींव रखने वाले ए ए ह्यूम एक अंग्रेज थे अगर कहीं ये मिंग शिंग़ झे होते तो चांद तो छोड़ो ये इमारत शाम से पहले ही अपनी मिट्टी पलीत करवा लेती। मिलेगा मुकद्दर की तर्ज़ पर आशान्वित होना बुरा नहीं है लेकिन भाई ईश्वर ने हर चीज़ की एक्सपायरी निश्चित की हुई है। जनसंघ विलुप्त हुआ तो भाजपा का सूर्य सिर्फ़ उदय ही नहीं हुआ वरन चमका भी और खूब जोर से चमक रहा है और क्या चमक रहा है जी। सीटों में फर्क आया है लेकिन नीयत में कतई नहीं। जिन विचारों को लेकर जनसंघ चला उन्हीं विचारों के साथ पार्टी तो आगे बढ़ ही रही है साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रेटिंग डेटिंग दोनों भी बढ़िया चल रही है। ऐसा इसलिए भी कि भाजपा के शीर्ष को ये मालूम है कि "जिन्दगी की यही रीत है, हार के बाद ही जीत है " इसके उलट विपक्षी अपना गढ़ बचाने में ही सारी ऊर्जा स्वाहा किए जा रहे हैं। अब आप इस बात को इस उदाहरण से समझेंगे। अब भैय्या हम उदाहरण दे रहे हैं समझना न समझना आपके ऊपर है।

         अपने छोटे से शहर के बड़े वाले चौधरी साहब जनाब रौला सिंह। हटी इतने कि राज हट,बाल हट और स्त्री हट भी उनके हटी पन के आगे पानी मांगने लगे जी। राजनीति का चस्का इतना कि 56 वसन्त देख चुके हैं लेकिन राजनीति का ऐसा पैशन कि कि छोटे बड़े कुल मिलाकर 96 चुनावों में हार का मुंह देख चुके हैं लेकिन जनाब बात बात में अपनी जवानी की कसम खाने वाले रौला सिंह जी की सेहत पर रत्ती भर भी फ़र्क न पड़ रहा है और पड़ेगा भी क्यूँ भई उन्होंने छोटी सी जिन्दगी में एक ही तो शौक पाला है और वो है राजनीति का और मान लो वो 96 हार से घबराकर राजनीति से संन्यास लेने की सोच भी लें तो क्या गारंटी है राजनीति उन्हें छोड़ देगी। आख़िर उनकी 96 हारों से पता नहीं कितने घरों के चूल्हे जल रहे हैं। आख़िर दादा लाई 200 एकड़ खेती की ज़मीन में से अभी भी 52 एकड़ जमीन उन्हें कभी न कभी तो जीतेंगे वाली आस का दिलासा देती रहती है। जमीन चाहे पूरी बिक जाए लेकिन बस एक बार मैं जीत जाऊं इसी आस पर रौला सिंह के जीतने की घास लहलहा रही है। उस लहलहाती घास में कुछ लोग पानी डाल रहे हैं कुछ मदिरा और कुछ जले भुने लोग मट्ठा। अब रौला सिंह को कौन समझाए कि पानी मदिरा तक तो ठीक है लेकिन मट्ठा डालने वालों पर तो लगाम कसें या उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएं लेकिन जब मन हो पाजी तो क्या करेगा काज़ी। उन मट्ठा डालने वालों ने मट्ठे की बोतल पर हिमायनी पानी का लेबल लगा रक्खा है और रौला सिंह लेबल उतारकर सच्चाई देखना नही चाहते तो फिर तो जैसे गड्डी चल रही है चलने दो। अगले मार्च तक रौला सिंह अपनी सेंचुरी भी पूरी कर लेंगे और सो कॉल्ड महात्मा की आत्मा को शान्ति भी प्रदान कर देंगे। महात्मा जी की अंतिम इच्छा तो याद है अगर नहीं तो गूगल में उगल कर लो।

         अब ऐसा तो है नहीं कि वो इस तरह की महत्वाकांक्षा पालने वाले पहले व्यक्ति हैं उनसे पहले भी जाने कितने आए और जाने कितने गए लेकिन उनकी महत्वकांक्षा मरते दम तक उनके साथ चिपकी रही। आपको याद होगा धरती पकड़ अजी हाँ वही काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ बरेली वाले अजी वही उत्तर प्रदेश का जिला बरेली जहाँ 1966 में मेरा साया फ़िल्म की नायिका साधना का झूमका गिरा था। एक सच्ची बात और जान लो भैय्या कि 1941 में हरिवंश राय बच्चन की पत्नि तेजी बच्चन का सोने का झूमका वास्तव ? में बरेली में गिर गया था ,राजा मेंहदी अली खान ने इस घटना को गाने में पिरो दिया और भैय्या गाना भी सुपर डूपर हिट हो गया। 2020 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 200 किलो का झुमका बरेली चौक में स्थापित करवा दिया। एक गाने ने कमाल कर दिया न। तो भैय्या वही काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ ( जो व्यक्ति किसी कार्य हेतु उम्र भर उस कार्य से चिपका रहे जैसे काका जोगिंदर सिंह) ने कुल छत्तीस बरस में 350 से ज़्यादा चुनाव लड़े और सगरे के सगरे हारे ही एक्को बार भी जीत न मिली। वो खुदई वोटरों से कहते थे भैय्या मैंने वोट मति देना। इसके अलावा भी कानपुर के भगवती प्रसाद घोड़े वाला और ग्वालियर के मदन लाल। ये सभी चुनाव लड़े ही इसलिए कि चुनाव हार जाएं। काका जोगिंदर सिंह उर्फ़ धरती पकड़ के अलावा तमिलनाडु के मैतुर्र शहर के पद्माराजन चिरस्थाई चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति हैं ये महराज अभी तक 238 चुनाव हार चुके हैं । इन्हें भले ही जोगिंदर सिंह की तरह इलेक्शन किन्ग की तरह याद न किया जाता हो किन्तु इनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में जरूर दर्ज़ किया गया है। 

         और लो जी बात करते करते इलेक्शन कमीशन ने पांच राज्यों में चुनाव भी घोषित कर दिये। असम केरल पुद्दुचेरी तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल अप्रैल में चुनाव होने निश्चित हुए हैं। रिज़ल्ट 4 मई को घोषित होगा। अब मसला ये है कि तो जनाब रौला सिंह के चुनाव का ऊंट जिस करवट बैठना होगा बैठ जाएगा। इस बात पर किसी को कुछ लेने देने की भी न पड़ी है लेकिन जिस तरह से राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के नेता रूपी पंछी फुदक फुदक कर बड्डी वाली पार्टी का बाजरा चुग रहे हैं तो लगता है परिणाम ढाक के तीन पात ही रहने वाला है। लोग सेंचुरी सेंचुरी कर रहे हैं पर मैंनु ऐ लगदा है बंदा 96+4=101 का शगुन डाल कर ही मानेगा। चलो कोई तो है जो गांधी जी की आत्मा की तसल्ली के लिए कुछ योगदान दे रहा है। वरना धरती पकड़ हो या घोड़े वाला या कोई और उनका योगदान सिर्फ इतना था कि ख़ुद के लिए लड़े ख़ुद ही हारे लेकिन हंसते हुए क्यों कि वो चुनाव लड़ ही हारने के लिए रहे थे लेकिन ये बंदा पांच राज्यों में हारेगा और ख़ुश रहेगा। अजब ये होगा कि हार के लिए फिर कोई बकरा तलाश जाएगा और सारा दोष उस पर मढ़ दिया जाएगा और ये बंदा फिर निकल लेगा विदेश यात्रा पर अगले चुनाव में हार का गणित समझने और हार का अंतर ज़्यादा करने के लिए कोई प्रमेय सिद्ध कर लेगा, फिर कुछ दिनों बाद शान से सीना चौड़ा करके लौटेगा ये बताने के लिए कि मैं हारा नहीं हराया गया हूँ यानि गिरे तो भी टांग ऊपर।


प्रदीप भट्ट 
व्यंग्यकार,मेरठ
22032026
 

Wednesday, 12 November 2025

"काँपे टांग जाएंगी"

रिपोर्ताज 

        "कांपे टांग जाएंगी"

         इश्क़ भी अजब चीज़ है मियां कब किससे कहां और कितना हो जाए भाई साहब मैनू कि पता😻😻😻 किसी और नू पता होए तो मैन्नू भी दसना। अब आप भी सोच रिए होंगे ए कि गल्ल कित्ती तो भाई साहब पिछले तीन चार दशक में जोर जबरदस्ती से ही सही हम मंच शेयर कर ही रहे हैं 🤓🤓🤓🤓 लेकिन एक बात तो सच्ची सच्ची बता रिया हूं उर्दू फ़ारसी अरबी के बड़े बड़े लच्छेदार शब्दों के घाल मेल से महफ़िल सजती भी देखी है और भैय्या उजड़ती भी। दिल्ली मुम्बई हैदराबाद लखनऊ और छोटे मोटे का तो ज़िक्र ही क्या करना हुज़ूर😊😊 हमने ऐसी ऐसी नशिस्त देखी हैं जहाँ सुनने वाले और सुनाने वाले सब के सब अंतर्राष्ट्रीय😛😛😛😛😛😛 कोई भी ससुरा वॉकल फॉर लोकल ना हो रिया 👺👺बस बजट के चक्कर में भारत में आयोजन करके अंतरराष्ट्रीय होने का सुख प्राप्त कर रहे हैं। करो करो मैंनूं की लोड।

         सो महाराज जब भारत सरकार की सेवा से निवृत हुए तो मेरठ को अपना ठिकाना बना लिया। वो स्लोगन आपने सुना है न "जिन्दगी के साथ भी जिन्दगी के बाद भी" तो बस मेरठ में रहकर दिल्ली गुड़गांव गाजियाबाद में सुबह निकलकर साहित्यिक समारोहों में अपनी हाजिरी दर्ज कर आते हैं।👁️👁️👁️👁️ इसी क्रम में कथा रंग और "महफ़िल ए बारादरी" से जुड़ाव हुआ और वो भी सच्चा वाला। इसे ही शास्त्रों में सच्चे वाला इश्क़ कहते हैं हुज़ूर। महफ़िल ए बारादरी की सबसे बड़ी खासियत ये है यहाँ सिर्फ़ पढ़ने वाले ही नही अपितु श्रवण सुख प्राप्त करने वाले भी अपनी हाज़िरी लगाते हैं। बढ़िया वाले वैन्यू के साथ बढ़िया वाला मैन्यू भी ब्राह्मण का इसके बिना गुजारा न है जी 😛😛😛😛और शायरी UPSC क्रैक करके क्लॉस वन अधिकारी वाली। नवागंतुको के लिए  एकदम परफैक्ट पाठशाला। अब इत्ती सारी खूबियां हों तो इश्क़ तो होवे ही होवे, तो महाराज हमें भी हो गया। निश्चित इसके लिए डॉक्टर माला कपूर गौहर और रियल संयोजक के साथ एंकर भी  की तरह महफ़िल ए बारादरी नामक जहाज को संभाल कर रखने वाले आलोक यात्री जी। मैंने कुछ ज़्यादा तारीफ़ तो नी कर दी। अब कर दी तो कर दी भाया 🤠🤠🤠🤠🤠🤠🤠🤣 बुरा लगे तो हैप्पी 🫟।

         9 नवंबर को रैपिड 🚇 का आनन्द लेते हुए मेरठ से गाजियाबाद और फिर  रैपिडो का साथ,लो जी जा पहुंचे सिल्वर लाइन प्रेस्टिज स्कूल वो भी टैम से पहले। ठीक सवा तीन बजे आलोक जी ने माइक संभाला, दीप प्रज्ज्ववलन के बाद मित्र इंद्रजीत सुकुमार द्वारा सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की गई फिर माइक संभाला तरुणा मिश्र जी ने और लो जी कार्यक्रम विधिवत शुरू हो गया। इस बार की महफ़िल गज़लों के उस्ताद शायर कृष्ण बिहारी ''नूर'' की जन्मशताब्दी के अवसर पर विशेष आयोजन के तहत रखी गई।  मुख्य अतिथि नीना सहर,  गोविन्द गुलशन, डॉक्टर सुधीर  त्यागी जिन्हें इस बार "बारादरी जीवन पर्यन्त साहित्य सृजन सम्मान" से नवाजा गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इरफ़ान आज़मी जी ने की। सुरेन्द्र सिंहल जी, इंद्रजीत, दीपक श्रीवास्तव, बी के शर्मा जैदी, जगदीश पंकज, सुधा गोयल, वेद प्रकाश, रवि पाराशर, विपिन जैन, तारा गुप्ता, अनिमेष शर्मा, ईश्वर सिंह तेवतिया, ताबिश खैराबादी, असलम राशिद, डॉक्टर रणवीर सिंह परमार, संजीव शर्मा, संजीव निगम, नरेंद्र शर्मा, शोभना श्याम, राजेश श्रीवास्तव, सोनम यादव, मनीषा जोशी, उषा श्रीवास्तव, विनोद तोमर, पवन तोमर, सुभाष चंदर,विवेक वशिष्ठ, कपिल खंडेलवाल, तूलिका सेठ और भैय्या मित्र विनय के साथ विक्रम और विक्रम के साथ सिंह साहब दी ग्रेट,। देख लो जी कितने पॉवर फूल मित्र मण्डली है हमारी💪🏼💪🏼💪🏼👊🏼। अब इतने सारे महानुभावों के बीच हम भी जींस के ऊपर बाटीक प्रिंट वाला खादी का कुर्ता पहने ख़ुद को तुर्रम खां समझ रिए थे। भाई साहब अपनी भी बारी आई और भैय्या कोई सत्रह अठारह बरस पहले की ताज़ी ताज़ी ग़ज़ल लपेट दी। ग़लती से अच्छी बात ये रही दोस्तों ने वाह वाह भी कर दी मतबल पप्पू पास हो गया 🤩😝😝😝🤪🤪🤪🤪🤪 हेल्लो हेल्लो ऐ जी क्या कै रिए हो आपको भी पढ़नी है तो लो जी पढ़ लो बधाई अगली बार दे देना 😅😅😅😂

माया काया फेर में पड़कर, उलझे जाने कितने लोग 
दूर तमाशा देख रहे थे, हम जैसे अंजाने लोग 

ठगनी माया कब ठहरी है, एक जगह तू सोच ज़रा 
बौराए से फिरते रहते ,कुछ जाने पहचाने लोग 

बाहर से काला कोई, अन्दर से काला होता है 
भेद समझ न पाए अब तक, कैसे हैं बचकाने लोग 

हंसना रोना खोना पाना,जीवन के हैं रंग कई 
दुःख से भागे मयखाने में, पैमाने पी जाते लोग 

जिसकी गाड़ी ने कल बदला, इंसानों को लाशों में 
उसके दर पे कब से बैठे, मांग रहे हर्जाने लोग 

इसकी उसकी तेरी मेरी, फ़िक्र करी है कब ख़ुद की 
बस छोटी मुस्कान की खातिर, लूट जाते दीवाने लोग 

कितना समझाया लोगों ने, नहीं समझ पर कुछ आया 
हंसते हंसते जान गवा दें, कैसे हैं 
मरजाने लोग 

मैंने तो दस्तूर निभाया, हंस कर उनसे बातें की 
बिला वज़ह गढ़ने लगते हैं, कितने ही अफसाने लोग 

ऊंची ऊंची बातें करना जिनकी फ़ितरत होती है 
उतने ज़्यादा घर में गहरे रखते हैं तैयखाने लोग 

आंधी और तूफ़ानों से ये, दीप नहीं' बुझने वाला 
धरती पर दो चार बचे हैं, हम जैसे परवाने लोग 

--प्रदीप -- 08082008 (मीठी बाई कॉलेज, मुम्बई)

मुक्तक 
 भले दूरी नहीं कुछ भी, मगर दूरी सी लगती है।
अधूरी हैं कई ईप्साएँ, पर पूरी सी लगती हैं।
तुम्हीं बतलाओ इन सबसे, मैं बाहर आऊँ अब कैसे,
करूं न कुछ अगरचे मैं, तो मजबूरी सी लगती है।।
प्रदीप डीएस भट्ट-1572025

         और अंत में भाई साहब जब पढ़ने वाले चालीस पचास हों और एंकर एक तो तकलीफ़ तो होती है वो भी बड़ी वाली। सब कवियों/ शायरों की शान में एक डेढ़ शेर तो पढ़ना ही पड़ेगा न तो अगर 50 कवि हुए तो कम से कम 100 मिनिट फिर बार बार उठना बैठना वो भी चेहरे पर डेढ़ इंच मुस्कान लिए और फिर अपना नम्बर आने पर कविता भी पढ़नी। महाराज चार साल 2003-7 में करके देख चुके हैं। जल्दी समझ में आ गया मियां ये रोग हमारे बस का न है। सो भैय्या प्रवचन कर्ता थोड़ी ठंड रक्खा करें एंकरिंग कोई मूंग की दाल का हलवा नही है बल्कि उड़द की दाल का हलवा है खाना आसान है पचाना मुश्किल। यकीं नई तो एक बार ट्राई करके देख लो मियां और मियन। वरना बकौल पाकिस्तानी एंकर" काँपे टांग जाएंगी" 😻😻😻😻😻🙆‍♂️🙆‍♂️🙆‍♂️
जय श्रीराम 

प्रदीप डीएस भट्ट - 1211025