Monday, 24 November 2025

" चिख़ुरी कुछ नया लिखा क्या "

रिपोर्ताज 

"चिख़ुरी कुछ नया लिखा क्या "

        अचानक फ़ोन की टुन्न टूनिया बज उठी। दूसरी तरफ़ गुरुग्राम से डॉक्टर प्रवीण शर्मा थी, उन्होंने राधे राधे कहा और हमने जय श्रीराम यानि उन्होंने द्वापर का प्रतिनिधित्व किया और हमने त्रेता का 😄 प्रवीण जी ने आग्रह किया कि उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर ABS4 "प्रज्ञान विश्वम" का विशेषांक निकाल रही है अतएव आपसे प्रार्थना है कि आप इसमें अपना सहयोग अवश्य दें। सहयोग से कुछ और मतबल मत निकाल लेना पाठकों🤔😎😎 यहाँ सहयोग का तात्पर्य आलेख से था, पईसे से बिलकुल भी नी, हाँ नई तो। ख़ैर हाँ भर दी।

तो भैय्या 19th नवम्बर को रेपिडो फिर रैपिड मेट्रो नमो भारत का आनन्द लेते हुए जा पहुँचे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया वो भी 10:10 पर। यूँ प्रश्न वाचक दृष्टि से मती देखो 👀👀👀👀 टेम से पहुँचने की अच्छी वाली आदत है म्हारी समझे के नाही।👑👑👑 तो बस म्हारे से पहले कौन होगा वहाँ सोचो सोचो,सही पकड़े हैं 😺😺😺😺 शर्मा फैमिली। भाई साहब कित्ता भी समझा लो पर सबको यही ग़लत वाली फैमिली है कि वो मुन्शी प्रेमचंद और दिनकर से भी बड़े साहित्यकार हैं 😡😡😡😡

         ख़ैर सवा ग्यारह बजे गायत्री मंत्र से प्रोग्राम की शुरूआत हुई। मुख्य,विशिष्ट और अतिविशिष्ट कौन था राम जाने पर हम थे न मात्र अतिथि सो नीरव जी के आग्रह पर लगे हाथ कइयों को सम्मानित कर डाला।😍😝😍😝😍😛 अब चूँकि प्रोग्राम तो डॉक्टर प्रवीण शर्मा, गुरुग्राम की अभी तक की शैक्षणिक, सामाजिक एवं साहित्यिक यात्रा को स्मरण करने का था सो इस कार्य हेतु साहित्य एवं राजभाषा हिन्दी की अलख जगाती संस्था अखिल भारतीय सर्वभाषा, संस्कृति समन्वय समिति ने डॉक्टर प्रवीण शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर "प्रज्ञान विश्वम" का विशेषांक निकालने का निर्णय लिया। निश्चित ही ये कार्य साहित्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे साहित्यकारों के लिए विशेष जड़ी बुटी देने का कार्य कर रहा है जिसके लिए सुरेश नीरव जी बधाई के पात्र हैं।

" साहित्यिक यज्ञ की गिलहरी "

         मेरा मानना है कि आप किसी भी क्षेत्र से संबंध रखते हो यदि आपको अपने जीवन के शुरु में मध्य में या रिटायरमेंट के बाद साहित्य का कीड़ा काट ले तो आपके सोचने समझने के तरीके में बदलाव आ जाता है। जहां तक संपूर्ण जीवन का प्रश्न है वो भी माया काया के फेर से द्वंद करते हुए अंततोगत्वा साहित्य में अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है ऐसा इसलिए भी कि युवावस्था में जहां लेखक प्यार व्यार में अपनी लेखनी को ज़्यादा सक्रिय रखता है वहीं शादी का लड्डू खाने के कुछ महीनों या वर्षों के बाद उसे जीवन के धरातल के अनुभव होते हैं तब उसकी लेखनी कम किंतु अनुभव आधारित लिखने लगती है। यूं तो मनुष्य जिम्मेदारियों से कभी भी पीछा नही छुड़ा पाता किंतु जिम्मेदारियों के पूर्ण होने पर उसकी कलम सत्य लिखने का साहस कर पाती है वैसे ऐसा सबके साथ नही भी हो पाता किंतु जो लेखक इन अनुभवों को जीते हैं वे जानते हैं कि सत्य कहने और लिखने में यक़ीन रखते हैं उन्हें ज्ञात होता है कि वे किन परिस्थितियों से होकर इस लक्ष्य तक पहुँच पाए हैं।

         9 फ़रवरी 2025 को प्रेस क्लब में हुई पहली मुलाक़ात से लेकर 19 नवंबर तक के सफर में मैं जितना उन्हें जान पाया,समझ पाया उन्हें शब्दों में बांधकर उनके लिए कुछ लिखकर मैंने भी प्रवीण जी की साहित्यिक यात्रा के हवन में अपने हिस्से की आहूति डाल दी। प्रवीण जी में नया और वो भी कुछ अलग करने की इच्छा ज़बरदस्त है। अच्छी बात ये रही कि ये शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी रही हैं जहां सदैव कुछ अलग करने की संभावनाएं सदा मौजूद रहती हैं। उन्हीं संभावनाओं को टटोलती उनकी दृष्टि सदैव कुछ नया पा ही जाती है। हरियाणा जो कि उनकी जन्मभूमि भी है और कर्मभूमि भी में संतुलन साधते साधते प्रवीण जी धीरे धीरे साहित्य की ओर आकर्षित हो गईं और साहित्य तो प्रेम की वह अविरल धार है जिसमें से जिसे जो चाहिए वह निश्चित ही पा जाता है। अच्छी बात ये रही कि अपनी शैक्षणिक यात्रा के दौरान इन्हें दिल्ली हरियाणा की जर्नी में इन्हें कई ऐसे किस्से मिले जिसे इन्होंने अपनी लेखकीय यात्रा में इस्तेमाल किया है।

        जहां तक प्रवीण जी की कविताओं का प्रश्न है उनमें मन में त्वरित उपजे भावों की अभिव्यक्ति नज़र आती है। उनकी कविताई प्रकृति, मानव पीड़ा, श्रृंगार के इर्द गिर्द बुनी लगती है, एक बानगी देखिए:

  
राम जो तुम आ जाते एक बार 
तो बेड़ा सबका हो जाता पार 
हम नव दीप जलाते,
उपवन में फूल खिल जाते।
संसार सुखी हो जाता 
राज विद्या बुद्धि का होता 
दुःखी न रहता कोई,
धन्य धान से वंचित रहता न कोई 
राम जो तुम आ जाते एक बार 
आ कर कुछ तो करते जतन 
आकर धर्म का रोकते पतन।

होती पितृ भक्ति की जय जय कार 
होता भरत लक्ष्मण भाई सा प्यार 
राम जो तुम आ जाते एक बार 

         सवा बजे कार्यक्रम सम्पन्न हुआ और फिर लंच। सो भैय्या आदत अनुसार दो पीस गुलाम जामुन पेट में डालकर ब्राह्मण कुल में जन्म होने का कर्तव्य पूरा किया 😍😍😍😍 फिर थोड़ा सा ये थोड़ा सा वो और निकल पड़े वाया मेरठ वाया दिल्ली विश्वविद्यालय होते हुए 🍩🍩🍩🍩एक बालक को जन्मदिन की शुभकामनायें देते हुए। क्यूँ अच्छा किया न महाराज 

प्रदीप डीएस भट्ट - 25112025

Friday, 21 November 2025

हरबे हरबे -- जितबे कब

हरबे हरबे जीतबे कब 

सन् राइज के चक्कर में सन सेट करा बैठे 
"गिरे तो भी टांग ऊपर"

Wednesday, 12 November 2025

"काँपे टांग जाएंगी"

रिपोर्ताज 

        "कांपे टांग जाएंगी"

         इश्क़ भी अजब चीज़ है मियां कब किससे कहां और कितना हो जाए भाई साहब मैनू कि पता😻😻😻 किसी और नू पता होए तो मैन्नू भी दसना। अब आप भी सोच रिए होंगे ए कि गल्ल कित्ती तो भाई साहब पिछले तीन चार दशक में जोर जबरदस्ती से ही सही हम मंच शेयर कर ही रहे हैं 🤓🤓🤓🤓 लेकिन एक बात तो सच्ची सच्ची बता रिया हूं उर्दू फ़ारसी अरबी के बड़े बड़े लच्छेदार शब्दों के घाल मेल से महफ़िल सजती भी देखी है और भैय्या उजड़ती भी। दिल्ली मुम्बई हैदराबाद लखनऊ और छोटे मोटे का तो ज़िक्र ही क्या करना हुज़ूर😊😊 हमने ऐसी ऐसी नशिस्त देखी हैं जहाँ सुनने वाले और सुनाने वाले सब के सब अंतर्राष्ट्रीय😛😛😛😛😛😛 कोई भी ससुरा वॉकल फॉर लोकल ना हो रिया 👺👺बस बजट के चक्कर में भारत में आयोजन करके अंतरराष्ट्रीय होने का सुख प्राप्त कर रहे हैं। करो करो मैंनूं की लोड।

         सो महाराज जब भारत सरकार की सेवा से निवृत हुए तो मेरठ को अपना ठिकाना बना लिया। वो स्लोगन आपने सुना है न "जिन्दगी के साथ भी जिन्दगी के बाद भी" तो बस मेरठ में रहकर दिल्ली गुड़गांव गाजियाबाद में सुबह निकलकर साहित्यिक समारोहों में अपनी हाजिरी दर्ज कर आते हैं।👁️👁️👁️👁️ इसी क्रम में कथा रंग और "महफ़िल ए बारादरी" से जुड़ाव हुआ और वो भी सच्चा वाला। इसे ही शास्त्रों में सच्चे वाला इश्क़ कहते हैं हुज़ूर। महफ़िल ए बारादरी की सबसे बड़ी खासियत ये है यहाँ सिर्फ़ पढ़ने वाले ही नही अपितु श्रवण सुख प्राप्त करने वाले भी अपनी हाज़िरी लगाते हैं। बढ़िया वाले वैन्यू के साथ बढ़िया वाला मैन्यू भी ब्राह्मण का इसके बिना गुजारा न है जी 😛😛😛😛और शायरी UPSC क्रैक करके क्लॉस वन अधिकारी वाली। नवागंतुको के लिए  एकदम परफैक्ट पाठशाला। अब इत्ती सारी खूबियां हों तो इश्क़ तो होवे ही होवे, तो महाराज हमें भी हो गया। निश्चित इसके लिए डॉक्टर माला कपूर गौहर और रियल संयोजक के साथ एंकर भी  की तरह महफ़िल ए बारादरी नामक जहाज को संभाल कर रखने वाले आलोक यात्री जी। मैंने कुछ ज़्यादा तारीफ़ तो नी कर दी। अब कर दी तो कर दी भाया 🤠🤠🤠🤠🤠🤠🤠🤣 बुरा लगे तो हैप्पी 🫟।

         9 नवंबर को रैपिड 🚇 का आनन्द लेते हुए मेरठ से गाजियाबाद और फिर  रैपिडो का साथ,लो जी जा पहुंचे सिल्वर लाइन प्रेस्टिज स्कूल वो भी टैम से पहले। ठीक सवा तीन बजे आलोक जी ने माइक संभाला, दीप प्रज्ज्ववलन के बाद मित्र इंद्रजीत सुकुमार द्वारा सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की गई फिर माइक संभाला तरुणा मिश्र जी ने और लो जी कार्यक्रम विधिवत शुरू हो गया। इस बार की महफ़िल गज़लों के उस्ताद शायर कृष्ण बिहारी ''नूर'' की जन्मशताब्दी के अवसर पर विशेष आयोजन के तहत रखी गई।  मुख्य अतिथि नीना सहर,  गोविन्द गुलशन, डॉक्टर सुधीर  त्यागी जिन्हें इस बार "बारादरी जीवन पर्यन्त साहित्य सृजन सम्मान" से नवाजा गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता इरफ़ान आज़मी जी ने की। सुरेन्द्र सिंहल जी, इंद्रजीत, दीपक श्रीवास्तव, बी के शर्मा जैदी, जगदीश पंकज, सुधा गोयल, वेद प्रकाश, रवि पाराशर, विपिन जैन, तारा गुप्ता, अनिमेष शर्मा, ईश्वर सिंह तेवतिया, ताबिश खैराबादी, असलम राशिद, डॉक्टर रणवीर सिंह परमार, संजीव शर्मा, संजीव निगम, नरेंद्र शर्मा, शोभना श्याम, राजेश श्रीवास्तव, सोनम यादव, मनीषा जोशी, उषा श्रीवास्तव, विनोद तोमर, पवन तोमर, सुभाष चंदर,विवेक वशिष्ठ, कपिल खंडेलवाल, तूलिका सेठ और भैय्या मित्र विनय के साथ विक्रम और विक्रम के साथ सिंह साहब दी ग्रेट,। देख लो जी कितने पॉवर फूल मित्र मण्डली है हमारी💪🏼💪🏼💪🏼👊🏼। अब इतने सारे महानुभावों के बीच हम भी जींस के ऊपर बाटीक प्रिंट वाला खादी का कुर्ता पहने ख़ुद को तुर्रम खां समझ रिए थे। भाई साहब अपनी भी बारी आई और भैय्या कोई सत्रह अठारह बरस पहले की ताज़ी ताज़ी ग़ज़ल लपेट दी। ग़लती से अच्छी बात ये रही दोस्तों ने वाह वाह भी कर दी मतबल पप्पू पास हो गया 🤩😝😝😝🤪🤪🤪🤪🤪 हेल्लो हेल्लो ऐ जी क्या कै रिए हो आपको भी पढ़नी है तो लो जी पढ़ लो बधाई अगली बार दे देना 😅😅😅😂

माया काया फेर में पड़कर, उलझे जाने कितने लोग 
दूर तमाशा देख रहे थे, हम जैसे अंजाने लोग 

ठगनी माया कब ठहरी है, एक जगह तू सोच ज़रा 
बौराए से फिरते रहते ,कुछ जाने पहचाने लोग 

बाहर से काला कोई, अन्दर से काला होता है 
भेद समझ न पाए अब तक, कैसे हैं बचकाने लोग 

हंसना रोना खोना पाना,जीवन के हैं रंग कई 
दुःख से भागे मयखाने में, पैमाने पी जाते लोग 

जिसकी गाड़ी ने कल बदला, इंसानों को लाशों में 
उसके दर पे कब से बैठे, मांग रहे हर्जाने लोग 

इसकी उसकी तेरी मेरी, फ़िक्र करी है कब ख़ुद की 
बस छोटी मुस्कान की खातिर, लूट जाते दीवाने लोग 

कितना समझाया लोगों ने, नहीं समझ पर कुछ आया 
हंसते हंसते जान गवा दें, कैसे हैं 
मरजाने लोग 

मैंने तो दस्तूर निभाया, हंस कर उनसे बातें की 
बिला वज़ह गढ़ने लगते हैं, कितने ही अफसाने लोग 

ऊंची ऊंची बातें करना जिनकी फ़ितरत होती है 
उतने ज़्यादा घर में गहरे रखते हैं तैयखाने लोग 

आंधी और तूफ़ानों से ये, दीप नहीं' बुझने वाला 
धरती पर दो चार बचे हैं, हम जैसे परवाने लोग 

--प्रदीप -- 08082008 (मीठी बाई कॉलेज, मुम्बई)

मुक्तक 
 भले दूरी नहीं कुछ भी, मगर दूरी सी लगती है।
अधूरी हैं कई ईप्साएँ, पर पूरी सी लगती हैं।
तुम्हीं बतलाओ इन सबसे, मैं बाहर आऊँ अब कैसे,
करूं न कुछ अगरचे मैं, तो मजबूरी सी लगती है।।
प्रदीप डीएस भट्ट-1572025

         और अंत में भाई साहब जब पढ़ने वाले चालीस पचास हों और एंकर एक तो तकलीफ़ तो होती है वो भी बड़ी वाली। सब कवियों/ शायरों की शान में एक डेढ़ शेर तो पढ़ना ही पड़ेगा न तो अगर 50 कवि हुए तो कम से कम 100 मिनिट फिर बार बार उठना बैठना वो भी चेहरे पर डेढ़ इंच मुस्कान लिए और फिर अपना नम्बर आने पर कविता भी पढ़नी। महाराज चार साल 2003-7 में करके देख चुके हैं। जल्दी समझ में आ गया मियां ये रोग हमारे बस का न है। सो भैय्या प्रवचन कर्ता थोड़ी ठंड रक्खा करें एंकरिंग कोई मूंग की दाल का हलवा नही है बल्कि उड़द की दाल का हलवा है खाना आसान है पचाना मुश्किल। यकीं नई तो एक बार ट्राई करके देख लो मियां और मियन। वरना बकौल पाकिस्तानी एंकर" काँपे टांग जाएंगी" 😻😻😻😻😻🙆‍♂️🙆‍♂️🙆‍♂️
जय श्रीराम 

प्रदीप डीएस भट्ट - 1211025