रिपोर्ताज
"चिख़ुरी कुछ नया लिखा क्या "
अचानक फ़ोन की टुन्न टूनिया बज उठी। दूसरी तरफ़ गुरुग्राम से डॉक्टर प्रवीण शर्मा थी, उन्होंने राधे राधे कहा और हमने जय श्रीराम यानि उन्होंने द्वापर का प्रतिनिधित्व किया और हमने त्रेता का 😄 प्रवीण जी ने आग्रह किया कि उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर ABS4 "प्रज्ञान विश्वम" का विशेषांक निकाल रही है अतएव आपसे प्रार्थना है कि आप इसमें अपना सहयोग अवश्य दें। सहयोग से कुछ और मतबल मत निकाल लेना पाठकों🤔😎😎 यहाँ सहयोग का तात्पर्य आलेख से था, पईसे से बिलकुल भी नी, हाँ नई तो। ख़ैर हाँ भर दी।
तो भैय्या 19th नवम्बर को रेपिडो फिर रैपिड मेट्रो नमो भारत का आनन्द लेते हुए जा पहुँचे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया वो भी 10:10 पर। यूँ प्रश्न वाचक दृष्टि से मती देखो 👀👀👀👀 टेम से पहुँचने की अच्छी वाली आदत है म्हारी समझे के नाही।👑👑👑 तो बस म्हारे से पहले कौन होगा वहाँ सोचो सोचो,सही पकड़े हैं 😺😺😺😺 शर्मा फैमिली। भाई साहब कित्ता भी समझा लो पर सबको यही ग़लत वाली फैमिली है कि वो मुन्शी प्रेमचंद और दिनकर से भी बड़े साहित्यकार हैं 😡😡😡😡
ख़ैर सवा ग्यारह बजे गायत्री मंत्र से प्रोग्राम की शुरूआत हुई। मुख्य,विशिष्ट और अतिविशिष्ट कौन था राम जाने पर हम थे न मात्र अतिथि सो नीरव जी के आग्रह पर लगे हाथ कइयों को सम्मानित कर डाला।😍😝😍😝😍😛 अब चूँकि प्रोग्राम तो डॉक्टर प्रवीण शर्मा, गुरुग्राम की अभी तक की शैक्षणिक, सामाजिक एवं साहित्यिक यात्रा को स्मरण करने का था सो इस कार्य हेतु साहित्य एवं राजभाषा हिन्दी की अलख जगाती संस्था अखिल भारतीय सर्वभाषा, संस्कृति समन्वय समिति ने डॉक्टर प्रवीण शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर "प्रज्ञान विश्वम" का विशेषांक निकालने का निर्णय लिया। निश्चित ही ये कार्य साहित्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे साहित्यकारों के लिए विशेष जड़ी बुटी देने का कार्य कर रहा है जिसके लिए सुरेश नीरव जी बधाई के पात्र हैं।
" साहित्यिक यज्ञ की गिलहरी "
मेरा मानना है कि आप किसी भी क्षेत्र से संबंध रखते हो यदि आपको अपने जीवन के शुरु में मध्य में या रिटायरमेंट के बाद साहित्य का कीड़ा काट ले तो आपके सोचने समझने के तरीके में बदलाव आ जाता है। जहां तक संपूर्ण जीवन का प्रश्न है वो भी माया काया के फेर से द्वंद करते हुए अंततोगत्वा साहित्य में अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है ऐसा इसलिए भी कि युवावस्था में जहां लेखक प्यार व्यार में अपनी लेखनी को ज़्यादा सक्रिय रखता है वहीं शादी का लड्डू खाने के कुछ महीनों या वर्षों के बाद उसे जीवन के धरातल के अनुभव होते हैं तब उसकी लेखनी कम किंतु अनुभव आधारित लिखने लगती है। यूं तो मनुष्य जिम्मेदारियों से कभी भी पीछा नही छुड़ा पाता किंतु जिम्मेदारियों के पूर्ण होने पर उसकी कलम सत्य लिखने का साहस कर पाती है वैसे ऐसा सबके साथ नही भी हो पाता किंतु जो लेखक इन अनुभवों को जीते हैं वे जानते हैं कि सत्य कहने और लिखने में यक़ीन रखते हैं उन्हें ज्ञात होता है कि वे किन परिस्थितियों से होकर इस लक्ष्य तक पहुँच पाए हैं।
9 फ़रवरी 2025 को प्रेस क्लब में हुई पहली मुलाक़ात से लेकर 19 नवंबर तक के सफर में मैं जितना उन्हें जान पाया,समझ पाया उन्हें शब्दों में बांधकर उनके लिए कुछ लिखकर मैंने भी प्रवीण जी की साहित्यिक यात्रा के हवन में अपने हिस्से की आहूति डाल दी। प्रवीण जी में नया और वो भी कुछ अलग करने की इच्छा ज़बरदस्त है। अच्छी बात ये रही कि ये शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी रही हैं जहां सदैव कुछ अलग करने की संभावनाएं सदा मौजूद रहती हैं। उन्हीं संभावनाओं को टटोलती उनकी दृष्टि सदैव कुछ नया पा ही जाती है। हरियाणा जो कि उनकी जन्मभूमि भी है और कर्मभूमि भी में संतुलन साधते साधते प्रवीण जी धीरे धीरे साहित्य की ओर आकर्षित हो गईं और साहित्य तो प्रेम की वह अविरल धार है जिसमें से जिसे जो चाहिए वह निश्चित ही पा जाता है। अच्छी बात ये रही कि अपनी शैक्षणिक यात्रा के दौरान इन्हें दिल्ली हरियाणा की जर्नी में इन्हें कई ऐसे किस्से मिले जिसे इन्होंने अपनी लेखकीय यात्रा में इस्तेमाल किया है।
जहां तक प्रवीण जी की कविताओं का प्रश्न है उनमें मन में त्वरित उपजे भावों की अभिव्यक्ति नज़र आती है। उनकी कविताई प्रकृति, मानव पीड़ा, श्रृंगार के इर्द गिर्द बुनी लगती है, एक बानगी देखिए:
राम जो तुम आ जाते एक बार
तो बेड़ा सबका हो जाता पार
हम नव दीप जलाते,
उपवन में फूल खिल जाते।
संसार सुखी हो जाता
राज विद्या बुद्धि का होता
दुःखी न रहता कोई,
धन्य धान से वंचित रहता न कोई
राम जो तुम आ जाते एक बार
आ कर कुछ तो करते जतन
आकर धर्म का रोकते पतन।
होती पितृ भक्ति की जय जय कार
होता भरत लक्ष्मण भाई सा प्यार
राम जो तुम आ जाते एक बार
सवा बजे कार्यक्रम सम्पन्न हुआ और फिर लंच। सो भैय्या आदत अनुसार दो पीस गुलाम जामुन पेट में डालकर ब्राह्मण कुल में जन्म होने का कर्तव्य पूरा किया 😍😍😍😍 फिर थोड़ा सा ये थोड़ा सा वो और निकल पड़े वाया मेरठ वाया दिल्ली विश्वविद्यालय होते हुए 🍩🍩🍩🍩एक बालक को जन्मदिन की शुभकामनायें देते हुए। क्यूँ अच्छा किया न महाराज
प्रदीप डीएस भट्ट - 25112025