Thursday, 31 July 2025

"कुटाई चालू आहे"



"कुटाई चालू आहे"

         ऊर्जा मंत्रालय की बड्डी सी ऑफिस के घने बड़े से साहब ने आज समय से पन्द्रह मिनिट पहले ही ऑफिस में इंट्री मारी और सीधे शाकिर मियां को तुरन्त हाज़िर होने का हुकम छज्जू चपरासी को पकड़ा दिया।  छज्जू चपरासी भी हैरान परेशान 11,12 और कभी लंच के बाद आने वाले चतुर्वेदी साहब आज इत्ती जल्दी, और आते ही शाकिर मियां को याद कर रे, कुछ तो गड़बड़ है। ख़ैर सिर खुजाते हुए छज्जू ने शाकिर मियां को सलाम ठोका फ़िर चतुर्वेदी साहेब का आदेश ज्यों का त्यों पढ़ सुनाया कि, तुरन्त हाज़िर होना है। अब शाकिर मियां की तो पहले ही चतुर्वेदी साहेब से छत्तीस छत्तीस के आंकड़े में गुत्थम गुत्थी लगी पड़ी थी सो शाकिर मियां चपरासी को टरकाते हुए बोले , जा बोल दे उस पण्डित को मैं अभी आया नई। छज्जू आँखे तरेरते हुए बोला ज़्यादा खलीफा मति बनो मियां आज खटपट है तो पण्डित जी को टरका रहे हो कल तक तो बड़ी गल बहियां करते फिरते थे। पण्डित जी का गुस्सा दुध में आए उबाल की तरह है मियां वैसे भी तुम हो उनके डिप्टी हमने ज्वाइन करते ही बता दिया था साहब जब गुस्सा करें तो चुप्पी साध लो या उबलते दुध में दो लकड़ी की डंडी रख दो जैसे उबाल को शान्त रखने के दुध के भगोने पर दो लकड़ी की स्टिक रख दो तो दुध कभी बाहर नहीं आता। लेकिन तुम कतई न माने और जा भिड़े उस दुर्वासा से। अब जब पण्डित जी खुदई बुलवा भेज रहे हैं तो मेढ़की की तरह टांग न उठाओ मियां वरना अगर पण्डित जी बिफर गए न तो हम दोनों की बली लेकर ही मानेंगे। शाकिर ने अपनी इंसलेट तो महसूस की पर बोला कुछ नहीं बस इत्ता बोल पाया अच्छा मेरे बाप मुझे लघु शंका तो कर लेने दे, जा जाकर ये सच बता दे कि शाकिर मियां लघुशंका में व्यस्त हैं। छज्जू खींसे निपोरते हुए वहां से खिसका और शाकिर मियां लघुशंका निवृत होने के लिए सीधे गुसलखाने के लिए उड़न छु हो लिए।

         शाकिर मियां अभी लघुशंका में व्यस्तता का आनन्द ले ही रहे तभी चतुर्वेदी जी भी कान पर जनेऊ लपेटे हुए बगल में आकर लघुशंका में व्यस्त हो गए। शाकिर मियां को कुछ शंका का अहसास हुआ ही था तभी पण्डित जी ने लघुशंका के मध्य में शाकिर को अपनी मंशा प्रकट कर दी। देखो शाकिर बहुत बड़ी मुसीबत आन पड़ी है, तुम फारिग होने के बाद तुरन्त मेरे रुम में पहुंचो। इससे पहले कि शाकिर मियां कुछ समझते चतुर्वेदी जी हाथ धोकर कान से लिपटा जनेऊ वापिस बनियान में घुसेड़ते हुए वॉशरुम से बाहर, हतप्रभ से शाकिर मियां तुरन्त फारिग हुए और चतुर्वेदी जी के कमरे की ओर ये सोचते हुए लपक लिए कि जाने क्या मुसीबत आन पड़ी जो पण्डित जी को सबर न हुआ और मेरे पीछे पीछे गुसलखाने तक आ टपके। कमरे में घुसते ही पण्डित जी को साइड के सोफे पर बैठे देखा तो शाकिर मियां वहीं लपक लिए, फिर सामने वाले सोफे पर अपने को ढकेलते हुए बोले, क्या हुआ पण्डित जी ऐसी क्या मुसीबत आन पड़ी जो आप मेरे पिछु पिछु गुसलखाने तक दौड़ लगा बैठे। चतुर्वेदी जी ने एक गहरी स्वांस ली फिर घंटी बजाकर छज्जू को बुलाकर बोला, छज्जू आगरा मिठाई वाले से समोसे जलेबी मंगाकर पूरे ऑफिस में बांट दे और हां जाने से पहले दो कप चाय दे जा और देख मनोरमा मैडम को बोल दे शाम तक कोई भी मेरे कमरे में दाख़िल नई होगा। कोई पूछे तो बता दियो हेड ऑफिस का मसला है अर्जेंट मीटिंग चल रही है। छज्जू सर हिलाता हुआ बाहर की ओर लपक लिया।         
         शाकिर मियां कुछ सशंकित से होते हुए बोले क्या माजरा है पण्डित जी कुछ तो बताओ। चतुर्वेदी जी ने आधे गंजे सर पर आए पसीने को पोंछते हुए कहना शुरु किया। देखो शाकिर मसला ये है कि तुम्हें तो पता ही है फिर कुछ सोचते हुए बोले तुम्हें क्या पूरे शहर को पता है कि हम कविताएं लिखते हैं। पिछले दिनों ऑपरेशन सिन्दूर पर लिखी हमारी कविता " पाकिस्तान की "कुटाई " काफ़ी फेमस हो गई है। अब वो कविता प्रसिद्धि पाते पाते मंत्री जी तक पहुंच गई है। कल मंत्री जी ने घर बुलाकर आदेश दे दिया की स्वतंत्रता दिवस पर उनका ओज से भरा भाषण हम लिखें और उसमें  कुटाई शब्द बार बार पूरे ताल मेल और ऊर्जा से भरपूर होकर आना चाहिए। अब तुम्हीं बताओ मियां कविता लिखना और बात है भाषण लिखना अलग। करें तो क्या करें। जान सांसत में आन पड़ी है। शाकिर मियां कुछ सोचते हुए बोले पण्डित जी भाषण लिखना इत्ता मुश्किल काम भी ना है जीत्ता सोचकर आपका हलक सूखा जा रिया है देखो आप बचपन की यादों से शुरु करो कि बचपन से आज तक आपकी कितनी और कब कब कहां कहां कुटाई हुई है। सच्ची कै रिया हूं अभी तो 15 अगस्त में दो दिन पड़े हैं कुछ क्या बहुत कुछ कर लेंगे। देखो बात अगर जेहादी भाषण की होती तो हमऊ लिख देते लेकिन मामला देश भक्ति का है इसलिए हमसे ज्यादा उम्मीद मति राखियो आइडिया दे दिया है इसलिए याद करते जाओ लिखते जाओ कल फिर बैठक कर लेंगे। चतुर्वेदी जी झुंझलाते हुए बोले अबे तुम भी तो तकरीरें लिखते हो वो क्या नाम है उस अख़बार का ख़ैर छोड़ो भी कोई और सुझाव दो। एक बात बताए दे रहा हूँ शाकिर सवाल सिर्फ़ मेरी इज़्ज़त का नई है इस ऑफिस का और ऊर्जा मंत्रालय का भी है अगर कुछ गड़बड़ हुई तो हम सबकी ऊर्जा ख़त्म होने में टाइम न लगेगा वैसे भी ऊर्जा विभाग के मंत्री हमेशा ऊर्जा से ओत प्रोत रहते हैं कल ही दो इंजीनियरो की बलि ली है कसूर सिर्फ़ इतना था कि मंत्री जी के भाषण के अध बीच में लाइट चली गई वो भी ट्रांसफार्मर के फूंकने से एक तो वैसे ही ऊर्जा की खपत बढ़ गई है वो ट्रांसफार्मर भी क्या करता फिर ऊर्जा मंत्री का भाषण बिचारा लोड न उठा सका।। शाकिर मियां हाथ जोड़ते हुए बोले पण्डित जी अभी तो बताया जेहादी तकरीरें लिखते हैं हम उस अख़बार में लेकिन वो छपती हैं हामिद अंसारी जो कि बड़े इमाम के दामाद हैं, के नाम से मतलब काम मेरा नाम उनका हमें तो हर तकरीर लिखने के दुई हज़ार मिल जाते हैं बस। ऊपर का खर्चा पानी निकल जाता है। ख़ैर आप कागज़ कलम उठाईये और लिखने बैठिए, चतुर्वेदी जी को असमंजस में देखकर शाकिर मियां बोले अरे महाराज आग़ाज़ तो करो अंजाम तक भी पहुंच जायेंगे। चाहो तो हम आपको कुटाई के काफिए दिए देते हैं जहां ठीक लगे भाषण में घुसेड़ देना जैसे कि ठुकाई, दुहाई, रजाई, रंगाई, पुताई, मलाई, नलाई वगैरह वगैरह कहते हुए शाकिर मियां ये सोचते हुए कि सैंया भए कोतवाल तो अब डर काहे का फिर मुस्कुराते हुए मियां जी वातानुकूलित कमरे में झपकियां लेने में व्यस्त हो गए। 

         चतुर्वेदी जी ने ठंडी चाय की चुस्की लेते हुए दूसरे सोफे पर पसरे और ऊंघयाते हुए शाकिर को देखा फिर मुस्कुराते हुए अपनी कुर्सी में धसते हुए कलम उठाई, डायरी का पन्ना खोला उसपे ऊपर ॐ लिखा फिर सोचते जाते हँसते जाते और कलम चलाते जाते। लगभग दो घंटे के लेखन के बाद उन्होंने एक अंगड़ाई ली फिर खर्राटों से शाकिर के उठते गिरते पेट को देखा फिर मुस्कुराते हुए फिर लिखने में जुट गए। आख़िर फाइनली ढाई बजे भाषण फ़ाइनल किया और घंटी बजा दी, घंटी की आवाज़ से शाकिर मियां की नींद में खलल तो पड़ा लेकिन उसे जल्दी समझ आ गया कि वो घर में नहीं है ऑफिस में है और वो भी बॉस के कमरे में। छज्जू ने दरवज्जजा नॉक किया और अन्दर आकर सीधे सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया। छज्जू मेरा और शाकिर का खाना यहीं लगा दे। साढ़े तीन पर फिर मीटिंग शुरु होगी, कोई अंदर न आवे समझा, जी कहता हुआ छज्जू खाना लगाकर बाहर निकल लिया। चतुर्वेदी जी शाकिर से बोले, शाकिर तूने आइडिया अच्छा दिया बचपन याद करो बस वहीं से शुरु किया है। खाना खाकर तुझे सुनाता हुं ठुकाई क्या होती है। शाकिर मियां अंदर ही अंदर बड़बड़ाए आज तो रजिया गुंडों में फंस गई रे। चतुर्वेदी महाराज शाकिर मियां की मनोस्थिति अच्छी तरी समझ रहे थे लेकिन मरता क्या न करता कि तर्ज़ पर उन्हें समझ में ही नहीं आया मंत्री जी के आदेश से कैसे निपटु सो कल ही डिसाइड किया कि कल सुबह सुबह शाकिर से सलाह लेता हूं वैसे भी ऑफिस में कोई इस लायक दिखा भी नई, सब एक दूसरे को झटके देने में व्यस्त दिखे। शाकिर भला आदमी तो है लेकिन एक दम अड़ियल किस्म का इसलिए एक दिन चतुर्वेदी जी ने शाकिर को जोर का झटका कुछ ज़्यादा ज़ोर से दे दिया लेकिन आज जब सलाह लेने की बात आई तो चतुर्वेदी जी ने गधे को बाप बनाने से परहेज़ भी नही किया। क्या करते भई बात इज़्ज़त पे जो बन आई थी। सो जैसे ही छज्जू ने खाना प्लेट में परोसा चतुर्वेदी जी ने उसे बिना किसी हिल हवाई के सीधा पेट तक पहुंचा दिया। इधर शाकिर मियां भी खाना खाते खाते सोच रहे थे खा ले बेटा खा ले पण्डित के घर का खाना है आज दक्षिणा में इसका भाषण सुनना पड़ेगा इच।

         हां तो शाकिर मियां सुनो, जहां कुछ अतरंगी सा लगे तो टोक देना मैं उसे अंडर लाइन कर दूंगा और उस पर बाद में डिस्कस करके ठीक कर लेंगे तो मियां सुनो।अतिथियों को तो मंत्री जी खुदई नमस्कार चमत्कार करके सम्बोधित कर लेंगे मैं सिर्फ़ पढ़ता हूं और चतुर्वेदी जी शुरु हो गए:

         मित्रों, जैसे कि आप सभी को पता ही है कि 22 अप्रैल को पहलगाँव में आतंकियों ने 25 भारतीय हिन्दुओं की और एक हमारे नेपाली हिन्दू भाई की सिर्फ़ धर्म पूछकर ही नहीं बल्कि कपड़े खुलवाकर, चैक करके फिर प्वाइंट ब्लैंक से सर पे निशाना लगाकर हत्या की तो भैय्या पूरे देश में हाहाकार तो मचना ही था, फिर एक नापाकी ने जाते जाते म्हारी एक बेटी से कह दिया कि "मोदी से कह देना" बस मित्रों यही एक गलती पाकिस्तान पे घणी भारी पड़ गई और पाकिस्तान ने भारत को" कूटाई" का न्यौता दे दिया फिर क्या होना था मित्रों मोदी साहब सऊदी अरब से वापिस आए और तीनों सेनाओं को कह दिया कि अपने अपने कुटाई यंत्र निकाल लो इस बार इस "झंडू बाम" को असली कुटाई के अंतर्राष्ट्रीय दर्शन करवाते हैं। अब आपको तो पता ही है गांव हो या शहर भाई साहब ऐसा कोई न जिसने कूटाई का आनन्द न लिया हो। दूसरे की क्या जी मैं तो अपनी पे जो बीत्ति वो बता रिया हूँ मित्रों। सबसे पहले कुटाई का अनुभव अपनी मां से लिया ग़लती मैं करूं तो कुटाई भाई करे तो साथ में फिर से मेरी कुटाई, मैं रात में अपनी गात को खुदई सहलाता हुआ सोचता था कि जे क्या बात हुई मेरी गलती पे भी मेरी कुटाई, भाई की गलती पे भी साथ में कुटाई। बस भैय्या एक दिन ग़लती से मिस्टेक कर बैठा मां अहोई माता का व्रत रखें हुए थी अजी वही जो बच्चों की लम्बी उम्र के लिए रखते हैं सो मन्ने ये सोचकर आज तो मां का व्रत है गुस्सा न करेगी लेकिन मित्रों अगर मां को कूटना है तो क्या व्रत क्या अनाव्रत। जैसे ही मैंने पूछा मां भईया की गलती पर भैय्या के साथ मुझे क्यूं कूटती हो, मां हँसी और बोली तेरा बड़ा भाई अकेले पिटेगा तो अच्छा थोड़ी लगेगा फिर साहब बेटे ध्यान से सुन कूटने कूटाने से इम्युनिटी बहुत ज़्यादा बढ़ती है धीरे धीरे ये इम्युनिटी इतनी बढ़ जाएगी कि तेरी गात स्टील से भी घणी मजबूत हो जावेगी और साहब अगले दिन नाश्ते में देशी घी नमक मिर्च लगाकर दो बासी रोटी और एक गिलास दुध देने से पहले फिर कुटाई कर दी मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि मां पे गड़ाई तो बोली कल व्रत था न बेटे तो कल तेरी हिम्मत पे तुझे कूट न सकी इसलिए कल का उधार चुकता कर दिया वैसे भी उधार ज्यादा देर अपने पास रखना नी चाइए। और उसके बाद फिर जब स्कूल में गए तो मासाब ने कुटाई ठुकाई , रंगाई, नीलाई और पता नहीं क्या क्या और कैसी कैसी और जब मासाब नीम की गीली टहनी से सुताई करते थे तो बस पूछो मति दिन में ही आंखो के लाल नीले पीले तारे तैरने लगते थे। कुल मिलाकर घर पे कुटाई स्कूल में कुटाई, मां से कुटाई और कभी कभी पिताजी भी हाथ साफ़ करने से न चूकते वैसे भी पिताजी के द्वारा की गई डंडे से, बेल्ट से थप्पड़, लात घूंसे और कभी कभी पेड़ की टहनी बस भाई हमें ही पता है गात का क्या हाल होता था कभी कभी लगता था जैसे मां पिताजी का गुस्सा हमारी कुटाई करके निकाल रही है और पिताजी मां का गुस्सा हम पर निकाल रहे हैं लेकिन एक बात समझ न मासाब किसका गुस्सा हमारी कुटाई करके निकालते थे शायद प्रिंसिपल साहब का या मास्टरनी की का।

         तो मित्रों अब खुदई सोचो जब पूरे भारत को ये कुटाई का सुनहरी मौका मिला तो कैसे छोड़ देते सो छः सात की मध्यनी रात को भारत ने कुछ कुटाई यंत्रों को पाकिस्तान भेज दिया और लो जी 22 अप्रैल का बदला हमारे कुटाई यंत्रों ने 22 मिनिट में ले भी लिया। तड़के उन्हें बता दिया कि देखो बेटा कुटाई यंत्रों को प्रणाम करो और शांत चित्त बैठ जाओ लेकिन मित्रों पाकिस्तान कब माना जो अबके मानता सो अपने फूफा चीन और जीजा तुर्की के नूकाई यंत्रों को म्हारे पे छोड़ दिया भाइयों चीन का माल बीच रास्ते में ही फुस्स हो गया और मोदी जी जो म्हारे पीएम हैं न ,उन्हें भी गुस्सा आ गया और फिर हमने अपने संयंत्रों से ब्रह्मोस कुटाई यंत्र निकाले और पाकिस्तान की ऐसी कुटाई और ठुकाई की कि उनका फूफा और जीजा देखते रह गए और खुद को दुनिया का चौधरी समझे बैठा चौधरी ट्रंप भी भौंचक हो गए। शायद उसे पाकिस्तान के अंदर अपने संयंत्रों में रखे कुटाई यंत्रों की चिंता हो गई। और मित्रों इसके बाद भारतीय कुटाई यंत्रों की मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतनी बढ़ गई है कि अमेरिका का चौधरी भी सकते में है इसलिए वो आजकल आएं बाएं शाएं बोल रहा है। आपने एक कहावत सुनी होगी न कि "सब दिन होत न एक समाना" तो आजकल अपनी निकल पड़ी है, चीन पाकिस्तान क्या सारी दुनिया भारत की ताकत देखकर हैरान परेशान है।  तो मित्रों इसी बात पर बोलो भारत माता की जय और हां ध्यान से सुन ले पाकिस्तान ऑपरेशन सिन्दूर थमा है बेटा रुका नहीं या यूं समझ ले प्यारे कि "कुटाई चालू आहे"

         कैसा लगा भाषण शाकिर मियां उधर शाकिर मियां चतुर्वेदी जी को अपलक निहारे जा रिए थे। जब दोबारा चतुर्वेदी जी ने जोर से बोला तो शाकिर मियां की तंद्रा टूटी और एक दम से बोल पड़े तुमने तो कमाल कर दिया पण्डित जी। आख़िरी लाईन तो पंच लाइन है महाराज "कुटाई चालू आहे"। भाषण बिलकुल परफेक्ट लिखा है पण्डित जी। मैं भी बोलता हूँ "कुटाई चालू आहे पाकिस्तान" भारत माता की जय"।

प्रदीप डीएस भट्ट 
व्यंग्यकार, मेरठ (UP)

Wednesday, 23 July 2025

"कभी कभी यूं भ"ी

रिपोर्ताज 

            

             "कभी कभी यूं भी"
 
"हवाएं हक़ में हैं फिर भी, खड़ी नैय्या किनारे पर 
 भरोसा टूटा है शायद, खिवैय्या और नौका का "

         अब ये कतई मति पूछना कि इस शेर को यहाँ क्यूँ चिपका दिया।😊 भैय्या जी जैसे ही रिपोर्ताज लिखने बैठा तो शेर स्वत: बन गया। अब ऐसे तिरछी नज़र से हमें मति देखो। आज शिवरात्रि है भूखे पेट ऐसे ही शेर निकलेंगे दिमाग़ से। वैसे भी हर बात में लॉजिक मति ढूँढा करो महाराज 🤣 "कभी कभी यूं भी" समझ रिए हो न मियां। ख़ैर तो हुआ यूं कि दो तीन महीने से न तो "कथा रंग" और न ही महफ़िल ए बारादरी में जाना हो रहा था। बारादरी तो वैसे भी अज्ञात कारणों से नहीं हो पा रहा था और कथा रंग हम अन्यत्र घने😜 बिज़ी होने के कारण अटेंड न कर पा रिये थे और काँवण यात्रा के कारण उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सभी सड़कों पर लोगों का हूजूम समुन्दर टाइप उमड़ रहा था वैसे ये अनुभव पहले सिर्फ़ महाराष्ट्र के बम्बई में देखने को मिलता था या बंगाल में काली मां की यात्रा के दौरान किंतु भैय्या अब हमारे भगवान भी लोकळ से ग्लोबल😎 होते जा रहे हैं न सो ये नज़ारा देखना आम हो गया है। 

         पूरम पट्ट एक घंटा इंतज़ार के बाद देहरादून दिल्ली की बस मिली वो भी लम्बे वाले नए रूट और बढ़े हुए किराए के साथ मतबल 76 की जगह 139 का भुगतान कुल जमा सात यात्री, ड्राइवर भी बस को हवाई जहाज़ समझकर दन दना कर चलाए जा रहा था। टिकिट लिया साथ ही कंडक्टर नामक प्राणी से गुज़ारिश भी कर दी भैय्या देख गाजियाबाद उतार दियो वैसे तुम्हें जहां ठीक लगे उतार देना। उसने मुंडी हिलाई फिर पायलट को बता दिया और लो जी डेढ़ घंटे में पायलट बाबा ने इंस्ट्रक्शन के साथ डासना मोड़ पर उतार दिया। वहां से पुराने बस अड्डे⛅ फिर वहां से सिल्वर लाइन प्रेस्टिज पब्लिक स्कूल वो भी ठीक तीन बजे। पैसे ज़्यादा खर्च हुए गम नहीं पर टाइम पर पहुंच गए इसकी ख़ुशी कुछ ज्यादा ही। प्रवेश करते ही डॉक्टर माला कपूर, आलोक यात्री डॉक्टर वीणा मित्तल। राम राम श्याम श्याम हुई और जा पहुंचे प्रथम तल स्थित मीटिंग हॉल में।🌚 धीरे धीरे महफ़िल सजने लगी और अंततोगत्वा 3.40 पर कार्यक्रम शुरु। 

         बेहतरीन सरस्वती वन्दना के साथ कार्यक्रम का आग़ाज़ प्रिय आशीष ने किया संचालन का दायित्व डॉक्टर तरुणा मिश्र ने संभाला। कार्यक्रम अध्यक्ष मोईन शादाब "ये किन चिराग़ों का अहसान ले रहे हैं हम, धुंआ इनमें ज़्यादा है रोशनी कम" शायर खालिद अखलाक " एक तो फूल ही कागज़ के उठा लाया है, उस पे ये जिद है इन फूलों से खुशबू आए" डॉक्टर तारा गुप्ता जिन्हें जीवन पर्यन्त सृजन साहित्य सम्मान से नवाजा गया कि पंक्ति " आपसे मान सम्मान इतना यूं लगा, मेरी तो सद्गति हो गई"(ये बात कुछ हजम नहीं हुई) डॉक्टर माला कपूर ने पुस्तक "पंच तत्व" का लोकार्पण पर मेघों से झरता पानी, पर्वत पर जमता पानी " के अतिरिक्त कुछ और पंक्तियों का स स्वर पाठ किया। इंद्रजीत, तरुणा मिश्र, सुरेन्द्र शर्मा, कल्पना कौशिक, विपिन जैन के अतिरिक्त और भी उपस्थित कवियों और शायरों ने अपने कलाम प्रस्तुत किए।
हमने भी एक ग़ज़ल पढ़ी, आनन्द लें।

ग़ज़ल 

22  22  22  22  22  22  22  22

" रिश्तों की तुरपाई कर लूं "

रिश्तों की तुरपाई कर लूँ, थोड़ी और कमाई कर लूँ 
लम्बा जीवन आस है छोटी, मैं पूरी भरपाई कर लूँ 

किसकी खातिर ज़िंदा रहना, अपने लोग पराए निकले 
फिर भी जी की यही तमन्ना, थोड़ी और भलाई कर लूँ 

किसकी चाहत पूरी होती, जो मेरी भी हो जाएगी 
फिर भी मरने से पहले मैं, जीवन आना पाई कर लूँ 

लिख लिख कागज़ काले करना, तू भी कर ले मैं भी कर लूँ 
अच्छा हो गर मैं भी अपनी, क़िस्मत को चुग़ताई* कर लूँ 

इसकी उसकी छोड़ बुराई, इससे कुछ कब हासिल होगा 
इससे तो ये बेहतर होगा, मैं भी राम दुहाई कर लूँ 

वसन फटे हैं माना मेरे, पर किरदार बहुत है ऊंँचा 
साथ अगरचे थोड़ा तुम दो, मैं इसकी रफूआई कर लूँ 

पास तो हों पर पास नही हों, सोचो ये भी क्या जीवन है 
इससे बेहतर नाम बदलकर,  अपना नाम जुदाई कर लूँ 

धूल जमी है जिन रिश्तों पर, आज नहीं तो कल उतरेगी 
मन के जालों की मैं पहले, थोड़ी आज सफ़ाई कर लूँ 

प्यार बहुत है उससे लेकिन, छुप छुप मिलना ठीक नही 
उसकी बदनामी से बेहतर, मैं उससे कुड़माई कर लूँ

मिलती कब सपनों की रानी, कैसे अब यह जीस्त कटेगी 
सोच रहा हूंँ कुछ भी करके, जीवन फिर तरुणाई कर लूँ 

सुख दुःख पल दो पल का मेला, आज नही तो कल आएगा 
पास बिठाकर सुख को अपने, ख़ुद अपनी परछाईं कर लूँ 

जीवन के इस चक्रव्यूह से, पार सभी को होना ही है 
सोच रहा हूं इससे पहिले, रुपया एक दहाई कर लूँ 

अपनी मैं में चूर रहा हूँ , कभी किसी को कुछ कब समझा
इससे पहले ज्यादा बिगड़े, बातों में नरमाई कर लूँ 

'दीप' की क़िस्मत रात अमावस, बोलो जी क्या हो सकता है,
रब की मेहर मिले तो मैं भी, रोशन रात सवाई कर लूँ✅

प्रदीप डीएस भट्ट=16062025

         सायं आठ बजे तक चली महफ़िल के बाद कुछ जल पान 🥘🫕🍱🥧🍿🍮 फिर मेरठ पहुंचने की जद्दोजहद वो तो भला इंद्रजीत जी का जिन्होंने हमें विक्रम बेताल की भांति अपनी पीठ की जगह फटफटिया पर लादा और सीधे बस अड्डे पर अफसोस दिल गड्ढे में सूं सॉ मानस गंध🗿🗿🗿🗿 की तर्ज पर कोई बस नहीं अलबत्ता भीड़ बस पूछो मति, वहां से फिर पीठ रूपी फटफटिया पर लदे और 8.45 पर सीधे साहिबाबाद रैपिड 🚇 स्टेशन, भगवान भला करे सरकार का जो दिल्ली मेरठ के लिए रैपिड कनेक्टिविटी की व्यवस्था की वरना लोग बड़ी शान से बताते नहीं थकते कि दिल्ली NCR में रहता हूं लेकिन उनका दिल ही जानता था कि दिल्ली NCR कहने और लिखने में तो अच्छा लगता है किन्तु परन्तु लेकिन ट्रांसपोर्ट व्यवस्था लुंज पुंज। ख़ैर ठीक 9.25 पर मेरठ साउथ 🚇, स्टेशन से बाहर आते ही सिलसिला फिल्म का गाना याद आ गया " ये कहां आ गए हम" भीड़😡 के रेलम पेल से बचते बचाते कभी ऑटो कभी पैदल में सफ़र का आनन्द लेते हुए 11.45 घर में एंट्री मारी, नहाए, धोए दूध पिए और फिर हम हमारा बेडवा और ठंडी ठंडी हवा देता वोल्टास का एसी । सच्ची बता रिया हूं महाराज पता ही न चलो कब खर्राटे शुरु हो गए।🫣🫣🫣🫥🫥🫥

प्रदीप डीएस भट्ट=23.07.2025


         

Wednesday, 2 July 2025

" मरियम मुनीर का नैन मटक्का "


व्यंग्य 

       " मरियम - मुनीर का नैन मटक्का"

         मोहम्मद अली जिन्ना अपनी सो कॉल्ड जन्नत में पैरों को चौड़ा करके आराम फरमा रहे थे तभी उनकी खिदमत में तैनात एक कारिंदा हांफता दौड़ता हुआ प्रकट हुआ, पहले तो उसने नब्बे डिग्री पर अपने नाज़ुक से बदन को झुकाया फिर दाएं हाथ को ऊपर नीचे करके तीन बार सलाम बजाया फिर हुज़ूर हुज़ूर करते हुए गुहार लगाई तब जाकर बड़े उन्नीदें तरीके से हुज़ूर ने अपनी अध मिची आँखें खोलकर उस कारिंदे को ऊपर से नीचे तक देखकर थोड़ा गुस्से से बोला क्यों बे तुझे यही वक्त मिला था हमारी नींद में खलल डालने का। सुनकर कारिंदा पहले तो सकपकाया फिर संयत होते हुए बोला हुज़ूर अभी अभी चपटी धरती से एक ख़बर मिली है कि आपके नाम पर बने लाहौर वाले हॉस्पिटल का नाम मारियम नवाज़ ने बदल दिया है। जिन्ना ने घूरकर कारिंदे को देखा फिर आग उगलते हुए बोले अबे नमाकुल किसने की ये हिमाकत जरा नाम तो बता उसका। कारिंदा सर झुकाकर बोला हुज़ूर वो पहले वाले प्रधानमंत्री हैं न नवाज़ शरीफ़ जिन्हें अपनी जान बचाकर इंग्लैंड भागना पड़ा था न उन्हीं की बिटिया है न मरियम नवाज़ पंजाब की वज़ीर ए आला हुज़ूर उसी ने की है ये गुस्ताख़ी। जिन्ना गुस्से से लाल पीले होते हुए बोले अभी के अभी हमारी सो कॉल्ड जन्नत में आपातकालीन बैठक बुलाओ बे उस लौंडियां की इतनी हिम्मत की हमारे नाम पर बने कैंसर हस्पताल को अपने नाम में तब्दील कर दे। इससे पहले की जिन्ना और दहाड़ते,जो मेरे हुकुम आका कहकर कारिंदे ने वहां से दुड़की लगा ली और थोड़ी देर में ही कुल जमा पाँच लोगों की कमेटी बैठक के लिए अपनी टूटी फूटी कुर्सियों पर आकर लद गई।

         जनरल जिया उल हक़, फ़ील्ड मार्शल याह्या खान, जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनज़ीर भुट्टो, जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ और छटे ख़ुद कायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना अपनी सो कॉल्ड जन्नत के सर्वेसर्वा, जुल्फिकार की ओर मुखातिब होते हुए बोले देखो मियां हमारे साथ बड़ी ज्यादती हो गई है हमें अभी कुछ देर पहले ही हमारे एक मात्र कारिंदे लतीफुद्दीन ने बताया कि नवाज शरीफ की छोरी ने हमारे नाम पर बने कैंसर हॉस्पिटल का नाम बदलकर अपने नाम पे कर दिया है। अब बताओ जी ये क्या बात हुई अगर ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन पाकिस्तान के रुपये से भी हमारी फुटवा गायब हो जाएगी।  देखो मैंने पाकिस्तान को बनाने में बड़ी मेहनत की है जी। पाकिस्तान बनाने के लिए जितने नफ़रत के बीज मैंने बोए उतने तो आजतक पाकिस्तानियों ने अपने खेत में भी नहीं बोए। कायदे आज़म की बात को परवेज़, बेनज़ीर, याह्या खान बड़ी तल्लीनता से सुनते रहे और ख़ुद पे जो माजी में बीती थी उसे याद कर खून के आंसू छलका रहे थे। तभी कायदे आज़म बड़े कातर स्वर में बोले कुछ करो जुल्फि, कुछ करो न । 

         जुल्फि ने अपनी गोल गोल आँखे घुमाते हुए लतीफुद्दीन से पूछा पहले क्या था जो अब नहीं रहा। लतीफुद्दीन सिर खुजाते हुए बोला ऐं क्या कै रियो हो आप मेरे कु कुछ समझ नहीं आया, खुल के बताओ। जुल्फि चिढ़ते हुए बोले अबे नामाकुल हॉस्पिटल का पहले क्या नाम था जो अब न रहा और अब क्या हो गया है। लतीफुद्दीन चहकते हुए बोला तो यूँ पूछो न सीधे सीधे। देखो जनाब हमारे कायदे आज़म के नाम पर एक कैंसर हॉस्पिटल बनाया गया था। आपको तो मलूम ही होगा हुज़ूर हमारे कायदे आज़म इस दुनिया में 25 दिसम्बर: 1876 को कहने को कराची में पैदा हुए और 11 सितम्बर 1948 को किस बीमारी से अल्ला मियाँ को प्यारे हो गए वो आपको भी पता है। पहले इस हॉस्पिटल का नाम कायदे आज़म के नाम पर "जिन्ना इंस्टिट्यूट ऑफ कार्डियोलोजी" था पर पता नहीं उस मरी मरियम को क्या हुआ उसने इसका नाम बदलकर अब "मरियम नवाज़ इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलोजी" कर दिया है। हूं अच्छा कहते हुए जुल्फि ने जेब से 50 साल पुराना सिगार निकाला फिर बिना जलाए ही कायदे आज़म की ओर देखते हुए कहा, जनाब उस लौंडियां में इत्ती हिम्मत कहां से आ गई। जब हम भारत से युद्द के मैदान में 1971 की जंग हारे थे लेकिन अपनी धूर्तता से शिमला की टेबिल पर जीत गए थे लेकिन ला हॉल विला कुव्वत हमें फिर भी इस ज़ाहिल जिया उल हक़ ने l फांसी पर टांग दिया था। जिया उल हक़ कुछ कहने के लिए उठे ही थे कि जिन्ना बोले अबे खड़ूसो मैंने तुम्हें अपने मसले को निपटाने को बुलाया है। लड़ने का ज़्यादा शौक़ है तो अपनी कोठरी में जाकर सर फुटव्वल करना समझे। 

         तभी याह्या खान ने अपना हाथ उठाया, जिन्ना ने बोला फरमाइए। याह्या खान बोले देखो मिस्टर कायदे आज़म हम जितने भी यहां है सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि हमने पाकिस्तान तो बनाया लेकिन अपनी पॉवर का कित्ता और कैसे मिसयूज किया है इसका खामियाजा हम सो कॉल्ड जन्नत के सड़े और बदबूदार कोठरिया में न पूरी तरह से जी रहे हैं और मरने की तो बात ही मति करो। ख़ैर मेरी ख़ुफ़िया इकाई आज भी मुझे इक्का दुक्का जानकारी मुहैया करा देती है। मेरी जानकारी के अनुसार कोई फर्जी जनरल मुनीर है जिसे भारत ने 96 घंटे की लड़ाई में इतना पेला कि वो ख़ुद बंकर में जा छुपा, हमारे 11हवाई बेस भारत ने बर्बाद कर दिए फिर भी मरियम के चच्चा शहबाज़ शरीफ़ ने उसे जीत का सेहरा पहना दिया और उसे फ़ील्ड मार्शल बना दिया जिसे पाकिस्तानी ख़ुद फेल्ड मार्शल कह रहे हैं । तभी जबीं जबान से बेनज़ीर बोल पड़ी तुम भी तो फेल्ड मार्शल खुदई बने " झंडू के पंचारिष्ट", पाकिस्तान ने 78 साल में आज तक कौन सी लड़ाई जीती है जो दो दो मुए field marshal पाकिस्तान पे जबरदस्ती लाद दिए गए!  कायदे आज़म बोले क्या खुसर फुसर कर रही हो बेनज़ीर बोलो बोलो तुम भी बोलो। बेनज़ीर बोली मेरी सूचना के मुताबिक़ मुनीर और मरियम के बीच नैन मटक्का चालू है। मरियम को पता है पाकिस्तान में सेना ही सब कुछ है इसलिए उसने मुनीर को अपने खोपचे में लेकर सेट कर लिया है ये कायदे आज़म के नाम पर बने हॉस्पिटल का भी तभी कायदे से उसने हैप्पी हैप्पी कर दिया है अब वो पाकिस्तान की वज़ीर ए आज़म बनने के ख़्वाब देख रही है। सो भैय्या अब तै कर लो क्या करना है। सभी की भड़ास निकल चुकी थी सो तय हुआ कि इस मसले को लेकर गांधी जी के पास चला जाए, अब वो ही कुछ करें तो करें।

         गांधी जी घास फूस की झोपड़ी में वास्तव में जन्नत और जहन्नुम के बीच में खाली पड़े प्लाट में विराजे हुए थे बाहर 10,12 बकरियां मै मै करके अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थीं।  जिन्ना ने अपना दुखड़ा गाँधी जी को सुनाया तो एक बारगी तो वो भी चक्कर खाकर गिरते गिरते बचे फिर मन ही मन बड़बड़ाए अच्छा हुआ मैं पाकिस्तान के हिस्से में नहीं आया वर्ना तो.... बस आगे के शब्द उनके गले में ही अटके रह गए लेकिन मन ही मन सोचने लगे आज इस जिन्ना से थोड़ी सी खुश्की ले लूँ सो बोले जिन्ना एक बात बताओ तुम्हारे नाम पर पाकिस्तान में कुल कितनी सरकारी प्रोपर्टी हैं,  जिन्ना बोले ये क्या सवाल हुआ हुज़ूर फिर भी सोचकर बताता हूँ शायद 20,30 होंगी, गाँधी ठहाका लगाते हुए बोले फिर भी एक हॉस्पिटल का नाम चेंज हुआ और तू बिलबिला गया।मेरे नाम तो भारत में न जाने कितनी सरकारी प्रोपर्टी हैं । मजाल है किसी की जो आंख उठाकर भी देखे I  खादी ग्रामोद्योग आयोग की डायरी में मेरी फोटो न छपी बस फिर क्या था चेयरमैन क्या सीईओ क्या सबकी .... और हलक सूख गया अलग से। ख़ैर इस मसले में मैं क्या मदद करूं बताओ। जुल्फि बीच में ही बोल पड़ा महात्माजी जी वो क्या है न आप भी गुज्जू ,हमारे सो कॉल्ड कायदे आज़ाम भी गुज्जू और आपके मोदी भी गुज्जू हैं न तो थोड़ी जुगाड़ बिठाओ ।मुनीर तो किसी की सुनेगा नई हाँ मोदी साहब ब्रह्मोस का डर दिखाएं तो कुछ बात बनें। गाँधी जी कुछ देर हिसाब किताब लगाते रहे फिर बोले बड़ी मुश्किल से जुगाड़ लगाकर ये स्वर्ग और नर्क के बीच में ये प्लॉट मिला है। तुम्हारे चक्कर में मैं इसे नहीं गंवाने वाला समझे नालायकों । एक दम छहों बोल पड़े ऐसे कैसे जनाब आपकी तो बहुत चलती है भारत में। आपके मोदी तो अमेरिका से नहीं डरते चीन से नहीं डरते फिर बाकी की तो बिसात ही क्या? गाँधी जी बोले देखो भई वो ज़माना कुछ और था।ये नया भारत है घर में घुसकर मारता है क्यों भई बेनज़ीर तुम्हें तो पता ही होगा क्या तुम्हारे सुपुत्र ने नहीं बताया। 

         बेनज़ीर एक लम्बी उच्छ्वास लेती हुई बोली मैं क्या बताऊँ बापू वो तो सत्ता के लिए मेरे ही क़ातिलों से जा मिला। गाँधी जी हँसते हुए बोले यही तो मैं समझा रहा हूँ कि पाकिस्तान में सेना ही सब कुछ है और भारत में लोकतंत्र। जहां तक मोदी का ताल्लुक़ है मुझे विश्वास है अगर मैंने जिन्ना की मदद की बात करी तो वो कुछ ऐसा करेगा कि मुनीर मुनीर अलग और मरियम मरियम अलग नैन मटकाना तो छोड़ो दोनों एक दूसरे की शक्ल देखकर भागेंगे और जिन्ना तुम्हारा नाम फिर उस हॉस्पिटल पर आ जाएगा लेकिन मुझे एक डर है मोदी तुम्हारी मदद करने के दुस्साहस में कहीं मुझे ही न टांग दे फिर भारतीय परिवेश से, नोटों से और  सरकारी योजनाओं और इमारतों से मेरा ही अस्तित्व न गुम हो जाए। और आख़िर में सुनो मोदी की पावर अगर वो अपनी पर आ गया तो मुझे अपना झोला झंत्रा लेकर कहीं और जाना पड़ेगा इसलिए मुझे अपने इस मसले से दूर ही रक्खो। तुम जानो और तुम्हारा काम जय श्रीराम!


प्रदीप डीएस भट्ट-03:07:2025