Thursday, 12 March 2026

"दिल्ली का ज़िंदा गाँव"

रिपोर्ताज 

        "दिल्ली का ज़िंदा गाँव"

         अगर मैं मोटा मोटी कहूं तो दिल्ली का इतिहास लगभग 5000- 5500 सौ वर्ष पुराना है यानि महाभारत काल से मान लिया जाए तो दसवीं शताब्दी में तोमर वंश के राजा अनंगपाल ने इसे बसाया उसके बाद चौहान 's फिर दिल्ली सल्तनत फिर मुग़लस फिर अंग्रेज आए जिन्होंने 1911 में कलकत्ता से राजधानी उखाड़ी और वापिस दिल्ली में स्थापित कर दी। अब भैय्या इससे पहिले यानि कि 5000 साल पहले का इतिहास तो राम जी जाने। किशन जी तो द्वापर में हुए और इसी कालखंड में हुए कौरव भी और पाण्डव भी। जहां तक हमारा प्रश्न है तो महाराज हमने तो इस हसीन दिल्ली को 1980 से अपना मित्र बनाया वो भी बढ़िया वाला😊। कहीं भी नैन मटक्का कर आवें पर भाई साहब जो मज़ा दिल्ली की गोद में बैठने का है वो और कहीं कहां। डी टी सी बस एक मात्र सहारा होती थी उस समय हमारी घुमक्कड़ी का।  चालीस पैसे का टिकिट न खरीदना पड़े उसके लिए क्या क्या जतन नहीं किए।🤓🤓🤓

         1961 में जहां दिल्ली में 300 गाँव होते थे वहीं 2011 आते आते उनकी संख्या सिकुड़कर 112 रह गई थी अब तो दिल्ली में शायद इक्का दुक्का गांव ही बचे हों वो भी 2027 की जनगणना तक शायद विलुप्त न हो जाएं। मियां जी सरकारी भाषा में इसे ही तो विकास कहते हैं 🤣🤣🤣🤣🤣। तो भाई साहब उन्हीं 112 गाँव में से एक मुनिरका गांव की सन्तोष सम्प्रति जो साहित्य सृजन कुटुम्ब संस्था की संस्थापिका अध्यक्ष हैं और हम संस्थापक मंत्री। फ़ोन पर ही गुफ़्तियाए😁😁😁😁😁 और तय हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर कार्यक्रम आयोजित किया जाए लेकिन कुछ अलग अंदाज़ में। वोडा फ़ोन वाले आइडिये का तो पता नी चल रहा है या नहीं लेकिन अपना आइडिया निकल पड़ा। अब भैय्या लिखने पढ़ने का काम तो टीचर जी ही बढ़िया कर सकती हैं सो 1 मार्च के प्रोग्राम में जब हम पटेल चौक, द्वारका मोड़ मिले तो उन्होंने कार्यक्रम का पूरा खाका प्रस्तुत कर हमें चमत्कृत कर दिया और 7 मार्च को उसे जमीन पर उतार भी दिया। अब संतोष जी के काम का तरीका ऐसा ही है यानि फास्ट टैग से भी तेज़।

         सो हुआ यूँ के हम 7 को सुबह सुबह निकले। रैपिड 🚇 के सहारे दरिया गंज हंस पत्रिका के ऑफिस लेकिन अफसोस साहब दिल गड्ढे में। हल्के हल्के पसीने में तर बत्तर होते हुए ढूंढ़ते ढांढते जब हम हंस पत्रिका के कार्यालय पहुंचें तो वहां बड़े से शटर के ओर लटके हुए बड़े से ताले🔐 में ने हमें मुँह चिढ़ाते हुए पूछा "काला  हंस - काला हंस" यहां कैसे। अब समझ नी आया वो ये उद्बोधन हमारी शक्ल देखकर दे रहा था या हमारे कहानी संग्रह "काला हंस" को। और भई ये काला हंस- काला हंस दो बार क्यूँ बोला कहीं उसमें किक फिल्म के करेक्टर नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की आत्मा तो नहीं घुस गई। जो दो बार बोलता है पोलैंड पौलेंड। हमने भी खीजते हुए पूछ ही लिया अबे तुम शनिवार को कैसे बंद हो बे? तो भाई साहब शटर के दूसरी ओर लटके हुए ताले 🔐 🔐 🔒 के जुड़वां भाई ने गुस्से से अपनी छेद रूपी आँख को नीला पीला करते हुए कहा क्यों बे सरकारी छुट्टी का मज़ा क्या तुम ही लोगे चच्चा। हम भी तो फिर आगे के शब्द उसने चिढ़ाने के उद्देश्य से हवा में तैरने के लिए छोड़ दिए। हम खिसियाए हुए से अपनी तशरीफ़ का टोकरा वापिस मोड़ते हुए खरामा खरामा दिल्ली गेट 🚇 की ओर लपक लिए।
  
         एक बात कहें वैसे कई बार कह चुके हैं फ़र्क तो किसी पे पड़ता नहीं फिर भी एक बार और सुन लो भाई साहब समय के कुछ ज़्यादा ही पाबंद हैं हम सो ठीक 2.10 पर सन्तोष जी के घर जा पहुंचे। 💦 पानी पिया और सामान लेकर मुनिरका गांव की टेढ़ी मेढ़ी गलियों से पहचान करते हुए पिलर वाले समुदाय भवन जा पहुंचे। कुछ व्यवस्थाएं हमने मिलकर ठीक की और धीरे धीरे प्रतियोगी आने लगे। स्टूडेंट की मम्मियां, गाँव की महिलाएं वो भी पूरे टशन के साथ, निर्णायक मण्डल और कुछ कवि मित्र। दीप प्रज्ज्ववल, सरस्वती वन्दना, निर्णायक मण्डल , कवियों का आदर सत्कार फिर गर्मा गर्म चाय पकौड़े। ठीक 4.35 पर महिलाओं के लिए आयोजित नारी शक्ति संगम प्रश्नोत्तरी जिसमें 75 प्रश्न 75 अंक एवम् समय पूरम पट्ट एक घंटा। पुरस्कारों में प्रथम 3100/-, द्वितीय 2100/- व तृतीय 1100/-  निर्धारित था। मुनिरका गाँव की ही एक महिला जो यू ट्यूबर है ने पूरा कार्यक्रम फ़ेसबुक पर लाइव किया, धनवान बनो देवी। निर्णायक मण्डल ने सूचित किया कि तृतीय स्थान पर दो महिलाओं ने बराबर अंक प्राप्त किए हैं तो क्या राशि आधी आधी कर दी जाए। अध्यक्ष ने हमसे विचार विमर्श किया और फिर अध्यक्ष तो अध्यक्ष ठहरी तुरंत 1100/- का एक और लिफ़ाफ़ा तैयार और लो जी प्रथम पुरस्कारशालिनी खन्ना, द्वितीय वन्दना चौधरी एवम तृतीय की संयुक्त दावेदार और पुरुस्कृत हुई पूनम अरोड़ा एवम् खुशबू कुमारी। एन्नू कैदे बड़े दिल वाला या वाली जी समझे के नाही। ❤️ 🌹🌹🌹🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

        विजेताओं को पुरस्कार राशि प्रदान करने का पुनीत कार्य हमें दिया गया। बात तो कायदे की थी अरे भाई संस्था के मंत्री हो🤠🤠🤠😂😂 कुछ काम तुम भी तो करो की तर्ज़ पर हमने इस जिम्मेदारी का निर्वहन किया। इसके बाद छोटी छोटी कविताओं के पाठ का दौर।  हमने कविता न पढ़कर छोटी छोटी दो कहानियां उपस्थित जनों के साथ साझा की जिन्हें सभी ने सराहा भी और साथ ही साझा की साहित्य सृजन कुटुम्ब की अभी तक की यात्रा 🧳 साथ ही यह भी साझा किया कि साहित्य सृजन कुटुम्ब संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम चाहे दिल्ली में हों या बाहर संस्था ने आज तक किसी भी प्रतिभागी से एक भी पैसा नहीं लिया है और सभी का धन्यवाद अलग से। अब खेल ख़त्म तो पैसा हजम की तर्ज़ पर सबने फिर से काले जाम का जायका गर्मा गर्म चाय की सुड़की के साथ लिया और लौट पड़े अपने अपने घरौंदे की ओर।

प्रदीप डीएस भट्ट -11032026