Wednesday, 15 October 2025

जबरा मारे रोने न दे ( बुलडोजर बाबा से पंगा)


"जबरा मारे रोने न दे "
(बुलडोजर बाबा से पंगा) 

रहिमन जिह्वा बावरी, कह गई सरग पाताल,
आप कह भीतर भई, जूती खाए कपाल। 

         आज से करीब 969 बरस पहले जब रहीम दास जी ने इस दोहे की रचना की होगी तो उन्हें थोड़े ही पता था कि 2014 में भाजपा जब केंद्र की सत्ता में आयेगी और तीन बरस बाद उत्तर प्रदेश में 2017 में योगी आदित्यनाथ उर्फ़ बुलडोजर बाबा सत्ता संभालेंगे तब इस दोहे को दो चार लमढींग पूरा पूरा मान सम्मान देंगे और बदले में पता नही अपना क्या क्या लाल करवाएंगे और सिर्फ़ अपना नही अपने रिश्ते नाते दारों का भी। वो क्या है न जब योगी बाबा जी किसी का इलाज़ करते हैं तो वो गर्म तवे पर आस पड़ोस, रिश्तेदारों और ऐसे लमढींगो के हम दर्दों का भी इलाज़ कर देते हैं ताकि न रहे बांस न बजे बासुंरी। तुम्हें मेरी सच्ची वाली मुहब्बत की कसम यकीन कर लो सच कै रिया हूं इसी में भलाई है महाराज। जिसे भी लगता हो योगी जी उसके साथ ज्यादती कर रहे हैं वो एक बार इनके फेरे में पड़कर देख लो भाई इलाज़ के पहले चरण में ही पांच वक्त का नमाजी भी सु प्रभात और शुभ संध्या कहने लगता है। अगर कोई ज़्यादा ही ढीठ हुआ तो उसका इलाज़ जैसे जैसे अंतिम चरण में पहुंचता है उसे अपनी आठवीं पीढ़ी सनातनी नज़र आने लगती है और फिर वो योगी जी के चरणों में लोट पोट होकर जय श्री राम राधे राधे कहता हुआ इलाज़ को रोकने की मिन्नतें करने लगता है। 

         आपको याद होगा सम्भल वाले बर्क मियां, अरे महाराज नाराज़ काहे होते हो 2011 में भीमनगर बनाया था मायावती ने नमाजवादी ने 2012 में फ़िर से सम्भल कर दिया। वैसे भाई साहब शास्त्रों के हिसाब से सतयुग में सम्भल का नाम सत्यव्रत , त्रेता में  महदगिरि और द्वापर में पिंगल  वैसे कलयुग में नागभट्ट द्वितीय के लिखे ताम्र शिला लेखों में इसका नाम शम्भुपल्लिक है । पता नी किसने इसका नाम सम्भल कर दिया। हां तो महाराज सीनियर वाले बर्क मियां अजी वही नमाजवादी पार्टी के बड़डे वाले नेता जी भाई साहब जब भी मुंह खोलते थे ऊटपटांग ही बोलते थे। शफ़्फाक दाढ़ी और कपड़ों में लिपटे डेढ़ सौ ग्राम के मियां बर्क योगी बाबा के प्रकोप से जैसे तैसे बच गए इसलिए पहली फुर्सत में निकल लिए लेकिन जूनियर बर्क की एक ग़लती देखो क्या करा गई अभी तक कसमसा रहा है। योगी जी टैम टैम पर मुग़ली घुट्टी 555 की डॉज देते रहते हैं।  कुछ ऐसा ही दुस्साहस इलाहाबादी माफिया का हुआ अजी क्या नाम था उसका हां हां हां याद आया अतीक अहमद उर्फ़ अतीकवा याद आया न कोर्ट में किसी ने अतिकवा कहा तो भड़क गया था। योगी जी पूरे प्राण जाए पर वचन न जाए की तर्ज पर शोले के गब्बर की तरह विधानसभा में दहाड़े मिट्टी में मिला देंगे और भाई साहब कोर्ट से निकलते ही अतिकवा के साथ उसका सगे वाला भाई अशरफ़ का भी हैप्पी वाला बर्थडे। उसके बाद वो मूंछों पर ताव देते एक और माफिया मुख़्तार अंसारी भाई साहब क्या तूती बोलती थी, योगी जी की वक्र दृष्टि पड़ी और उसका भी जेल में ही जय श्रीराम।

         रामपुर के चौधरी आज़म ख़ान जो अपने आप को आबे जम जम खान समझने की भूल में थे, पहले कोंग्रेस ने सहारा दिया और फिर नमाजवादी पार्टी ने सीधे सर पर बिठा लिया। जरा सोचिए 2012-2017 में जनाब के क्या जलवा ए जलाल थे। एक मुख्यमंत्री अखिलेश एक आज़म ख़ान और आधे बाक़ी यादव यानि कुल जमा ढाई मुख्यमंत्रियों की बारात लेकिन आज़म ख़ान का जलवा बस पूछो मति। जब आदमी पॉवर में होता है तो आएं बाएं शाएं कुछ भी बोल देता है बस ग़लती से मिस्टेक इन्होंने भी कर दी और लोकसभा में अपने टर्म में बोलते बोलते कुछ ज्यादा ही जौहर दिखा गई और भैय्या बोल गए राष्ट्रपति भवन से ज़्यादा बेहतर तो जौहर यूनिवर्सिटी है। बस उस दिन से उनका सितारा ऐसा गर्दिश में आया है कि अभी अभी जेल से बाहर आ पाए हैं। इल्ज़ाम भी कैसे कैसे, भैंस चोर, जमीन चोरी मतबल कुल मिलाकर मुकदमों की सैंचुरी हो गई है। बुरे वक्त में नमाजवादी पार्टी ने भी मियां साहब की खूब फिरकी ली। अब जेल से बाहर आएं हैं तो अपने आपको सनातनी घोषित करने में लगे हैं और बात बात में भगवान राम और कृष्ण का गुणगान अलग से। लेकिन एक और कहावत है क़िस्मत में हों ककंर, तो क्या करेंगे शंकर सो भैय्या अभी आज़म ठीक से स्वांस भी नहीं ले पाए थे कोर्ट ने फर्जी पैनकार्ड मामले में बाप बेटे को सात सात साल की सजा मुकर्रर हुई है। पचास हज़ार का जुर्माना अलग से।

         अब आप खुदई सोचो बाबा जी की वक्र दृष्टि से ऐसे ऐसे तीस मार खां न बचे तो फिर तौक़ीर रजा किस खेत की मूली है। ऐं जी कौन तौकीर रजा अरे भाई बरेली वाले अहमद रज़ा खान बरेली आंदोलन के जनक ये कलमुंहा उन्हीं का परपोता है। कहने को तो इस्लामी धर्म गुरु हैं  बरेली मसलक के धार्मिक नेता और राजनैतिक दल इत्तेहाद ए मिल्लत परिषद् के संस्थापक भी। अब धर्म नीति में पिछवाड़े से राजनीति भी करनी है सो पड़ोसी रामपुर जिले के आज़म खान और सम्भल के बड़े वाले बर्क मियां की तरह इन्हें भी अनाप शनाप बोलने की सुरसुरी उठी। अब सुरसुरी उठी तो उठी। मौक़ा कोई भी हो दस्तूर कोई भी हो तौक़ीर मियां को तो बोलना ही बोलना है सो समजवदिया पार्टी की शय पाकर देश के ख़िलाफ़ बोलने के इस बंदे ने सारे रिकॉर्ड ही तोड़ डाले। जितना ज़्यादा कड़वा बोले उससे ज़्यादा सरकारी ग़ैर सरकारी सम्पत्ति पर कब्जा करते रहे। न कोई रोकने वाला न कोई टोकने वाला। किसी ने ज़्यादा चू चपड़ की तो एक आवाज़ पे हज़ारों लोग सड़को पर। जिले की क्या औकात जब तौकीर के तार लखनऊ और दिल्ली से जुड़े हों। लखनऊ में समजवदिया पार्टी और केंद्र में पापिन कॉन्ग्रेस। कोई करे भी तो क्या करे। 2010 का दंगा इस बात का जीता जागता उदाहरण है जी। लेकिन तब मुख्यमंत्री थीं मायावती तौक़ीर की मुश्कें बंधवाकर लखनऊ मंगवा लिया पर कर कुछ न सकी। ऊपर से दबाव और तौक़ीर शान से बिना मूंछों के होते हुए भी ताव देता हुआ वापिस बरेली वो भी पूरी शान ओ शौकत से वो भी ये कहते हुए की बरेली का झुमका हूं बरेली में ही सजूंगा।

         लेकिन कहते हैं न "समय समय की बात है समय बड़ा बलवान, खड़ी गोपियां लुट गईं वही अर्जुन वही बाण " तो भैय्या 2017 में उत्तर प्रदेश में आ गए बाबा जी वो भी लठ्ठ लेकर और मुनादी करा दी "गुंडन गुंडई छोड़ दें या उत्तर प्रदेश" वरना हम छुड़वा देंगे और महाराज उसके बाद जो गुंडन और माफिया की डेटिंग पेंटिंग,धुलाई रंगाई पुताई होनी शुरू हुई वो बदस्तूर जारी है।  जो प्रेम से माना उसे लड्डू जो नहीं माना उसे लठ्ठ और जो ख़ुद को ख़ुदा समझने के फेर में था उसकी बत्ती जड़ से गुल। इधर इस चौराहे पर लड़की पर फब्ती कसी उधर अगले चौराहे पर यमदूत तैयार। कुछ जड़ बुद्धि फिर भी नहीं माने तो बाबा जी ने पहली फुर्सत में ऑपरेशन लंगड़ा लॉन्च कर दिया। हर दूसरे दिन पैर में गोली लगे लंगड़ाते हुए तीन चार छुटभैय्ए नेता और कुछ टुच्चे से टट पुंजीए। तो हुआ यूं कि बरेली वाले तौक़ीर मियां की जीभ को फिर खुजली हो गई कि कुछ अनाप शनाप भौं भौं शुरू कर दी। लोगों ने बहुत समझाया मियां बाबा जी की दृष्टि आपके कुकर्मों पर पहले से ही और पंगा मति लो पर तौक़ीर कहां मानने वाला था सो आई लव मुहम्मद पर 25 सितम्बर को आएं बाएं शाय बोल गया। प्रशासन सख़्त हुआ तो इसने अगले दिन 26 को शुक्रवार को हजारों की भीड़ इक्ट्ठी करके प्रशासन को चुनौती दे डाली। बात बाबा जी तक पहुंची, तौक़ीर का रसूख दादागिरी और बहन मायावती जैसी सख़्त प्रशासक के बावजूद उसकी दबंगई की चर्चा हुई। बाबा जी ने सख़्त आदेश दे डाला बाबा जी की ओर से खर्चा पानी दे दो साथ में बहन मायावती की जो किरकिरी हुई थी उसका भी हिसाब किताब करो। अब ये बंदा मुगालते में था बाबा जी मेरा क्या ही उखाड़ लेंगे हम तौक़ीर हैं हमने तो समजवदिया और बसपा प्रमुख को भी घुटनों पर ला दिया तो योगी जी किस खेत की मूली हैं। ये सुनकर इधर बाबा जी धीरे से मुस्कुराए और उधर बरेली में लठ्ठ चालू और अगले तीन चार दिन में बाबा जी ने तौक़ीर समेत कइयों को समझा दिया बाबा जी ख़ेत की मूली नहीं बड़े वाले मठ के मूला हैं। लठ कहां से घुसेगा और कहां से निकलेगा ख़ुद बाबा जी को भी न पता हां नई तो। 

         अब तोकीर रजा अब गिड़गिड़ा रहा है जुगाड लगा रहा है कह रहा है कि योगी जी कसम से पूरी जिंगदी किसी मंदिर में भजन कीर्तन सत्संग करके काट लूंगा बस बख़्श दो।दंगा फसाद आगजनी तोड़फोड़ तो दूर मुंह भी नहीं खोलूंगा बस बख़्श दो लेकिन महाराज योगी आदित्यनाथ नाथ तो ठहरे पक्के वाले बाबा जी पहली फुर्सत में तौक़ीर को फतेहगढ़ जेल भेजा दस बीस मुक़दमे दर्ज, अगली पिछली कई पीढ़ियों की जन्मकुंडली खंगाली गई फिर शुरू हुआ बरेली में स्वच्छ भारत अभियान का श्रीगणेश। तौक़ीरवा के दूर के पास के सभी रिश्तेदारों पर योगी जी का नजला गिर रहा है। ऐंठन बैठन, हेकड़ी वेकड़ी रंगबाजी छिनैति गिरी सब हवा। इतना बड़ा एक्शन लिया है बाबा जी ने कि तौक़ीर के रिश्तेदार ही उसके जानी दुश्मन बन गए हैं। जब तौक़ीर के कारण कब्ज़ा कर रहे थे तो सब अच्छा था लेकिन अब छिन गया तो आप समझ रिए हो न मैं क्या कै रिया हूं। नाते रिश्तेदारों की तौक़ीर से इस कदर नाराज़गी बढ़ गई है कि दूर के सूत्रों से ये ख़बर मिली है कि कुछ लौंडे लपाडो को तौक़ीर के साथ वही करने के लिए कहा गया है जो पाकिस्तान में इमरान खान के साथ जेल में हुआ है। सच्ची कै रिया हूं ये सजा कुछ ज़्यादा न हुई मियां पर भाई जान से बढ़कर कुछ थोड़े है सो जान बची तो.......।


प्रदीप डीएस भट्ट - 20112025
व्यंग्यकार मेरठ